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  • सत् शिव सुन्दर 5 - निजता का पाठ (36)

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    आचार्यश्री विद्यासागर जी की सूक्तियाँ (quotes)
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  • खजुराहो में सर्वोदय सम्मान

    चलो खजुराहो
    संयम स्वर्ण महोत्सव समापन समारोह सर्वोदय सम्मान 
      आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज की दीक्षा के 50 वर्ष  पूर्ण होने पर मनाए जाने वाले, संयम स्वर्ण महोत्सव के समापन अवसर पर आयोजित, नेपथ्य के नायकों का सम्मान सत्र 17 जुलाई 2018 ,मंगलवार ठीक दोपहर 2:00 बजे से  खजुराहो मध्य प्रदेश में प्रस्तावित है, वर्ष 2018 का यह सर्वोदय सम्मान देश के उन नायकों को दिया जा रहा है जो सामाजिक ,सांस्कृतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रहे हैं, भारी मात्रा में शामिल होकर कार्यक्रम की गरिमा को दुगुना करें। कृपया इसे जन जन तक पहुँचाने में सहयोग करे     वर्ष 2018 के हमारे 7 नक्षत्र अथवा नायक हैं- 1.आदिलाबाद आंध्र प्रदेश में स्थित कला के स्वर्गीय रविंद्र शर्मा गुरुजी - कला ,कारीगरी एवं सामाजिक व्यवस्था के जानकार 2.श्री एच वाला सुब्रमण्यम संगम एवं तमिल साहित्य के गैर हिंदी भाषी सुप्रसिद्ध अनुवादक. आपने दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार एवं प्रसार में निर्णायक भूमिका निभाई है 3. टिहरी उत्तराखंड प्रदेश से आए हुए श्रीमान विजय जड़धारी जी. विजय जी चिपको आंदोलन की उपज है, और वर्तमान में बीज बचाओ आंदोलन से जुड़े हुए हैं. 4. श्रीराम शर्मा जी मध्य प्रदेश से संबंध रखते हैं, आपके पास भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम आंदोलन के तमाम महत्वपूर्ण दस्तावेज यथा पत्र पत्रिकाएं ,अखबार एवं ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं का अद्भुत संग्रह है 5. बाबा आया सिंह रियारकी महाविद्यालय जिला गुरदासपुर पंजाब  के संचालक गण. महिला शिक्षा के बाजारीकरण के खिलाफ एक स्वदेशी प्रयोग, एक ऐसा अकादमिक संस्थान जो बालिकाओं के लिए बालिकाओं के द्वारा बालिकाओं का महाविद्यालय है. 6. महाराष्ट्र राज्य के गढ़चिरौली जिले के मेडा लेखा गांव के भूतपूर्व सरपंच श्री देवाजी तोफा भाई. आपने गांधीवादी संघर्ष कर प्राकृतिक संसाधनों पर ग्राम वासियों के अधिकारों को सुनिश्चित किया. आप का नारा है हमारे गांव में, हम ही सरकार. 7. राजस्थान उदयपुर के भाई रोहित जो विगत कई वर्षों से जैविक कृषि में संलग्न है और अपने प्रयोगों के माध्यम से इसे युवा पीढ़ी में लोकप्रिय भी कर रहे हैं 8. श्री विष्णुभाई कांतिलाल त्रिवेदी - प्राचीन वास्तु शास्त्र के माध्यम से अद्भुत मंदिर श्रंखलाओं के  निर्माता एवं शिल्पकार| आपने मंदिरों का सम्पूर्ण कार्य नक्शों के मुताबिक घाड़ाई व फिटिंग का काम करवाया हैं जिसमे आपका ४५ वर्ष का अनुभव हैं | 9 श्री शफीक जी खान - आप गौ संरक्षक एवं गाय संस्कृति के पालन हार |      

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    सूचना पट्ट - आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज ससंघ 2

    आज खजुराहो में हुआ आचार्य श्री का मंगल प्रवेश

    आज खजुराहो में हुआ आचार्य श्री का मंगल प्रवेश

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    सूचना पट्ट - आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज ससंघ 7

    आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का भव्य मंगल प्रवेश आज, डिंडोरी मप्र में अत्यंत भक्ति और उत्साहमय वातावरण में हुआ।

    12 मार्च 2018 परम पूज्य गुरुदेव, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का भव्य मंगल प्रवेश आज, डिंडोरी मप्र में अत्यंत भक्ति और उत्साहमय वातावरण में हुआ। अब डिंडोरी में हर दिन होली, हर रात दीवाली सी खुशियां।
        विहार अपडेट 8 मार्च 2018 Ⓜ    👣👣👣👣    Ⓜ
    सागर- संतशिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का ससंघ मंगल विहार प्रसिद्ध सर्वोदय जैन तीर्थक्षेत्र अमरकंटक से डिंडोरी की ओर 2 बजे हो गया। अमरकंटक से डिंडोरी की दूरी 84 किलोमीटर है। कबीर चौराहा,करंजिया, रूसा,  गोरखपुर,  सागर टोला, हो करके डिंडोरी पहुंचा जा सकता है जबलपुर से डिंडोरी की दूरी 145 किलोमीटर है जबलपुर से कुंडम शहपुरा होकर के डिंडोरी जाया जा सकता है डिंडोरी में पंचकल्याणक गजरथ महोत्सव का आयोजन 23 मार्च से 29 मार्च महावीर जयंती तक होगा पंचकल्याणक के प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रहमचारी विनय भैया बंडा होंगे
    Ⓜ मुकेश जैन ढाना Ⓜ
    एमड़ी न्यूज़ सागर     मंगल विहार संभावित परम पूज्य आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार आज दोपहर लगभग 2 बजे हो सकता है, डिंडोरी की ओर। आगामी दिनों में डिंडोरी में होंगे पंचकल्याणक महोत्सव।

     

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    सूचना पट्ट - आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज ससंघ 1
  • वंदन है उस तपस्वी को

    वंदन है उस  तपस्वी को जो आत्मसाधना के साथ भारत और भारतीयता के लिए निरंतर चिंतनशील हैं.   जैन धर्म विश्व के प्राचीन धर्मों में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है l जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को वैदिक परंपरा में अष्टम् अवतार माना गया है l भगवान ऋषभदेव की परंपरा में भगवान महावीर चौबीसवें तीर्थंकर हुए है जिन्होंने जैन धर्म-दर्शन को मजबूत आधार प्रदान किया l उनके दिव्य उपदेशों का प्रभाव पूरे भारतीय समाज पर दिखाई देता हैl महावीर ने अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत जैसे महान् मानवीय मूल्यों पर आधारित समाज संरचना का सन्देश दिया, साथ ही व्यक्ति की मुक्ति के लिए आत्मानुभूति और कठिन तपश्चर्या का मार्ग बताया l भगवान् महावीर द्वारा निर्दिष्ट मार्ग इतना निर्विवाद और अनुकरणीय है कि विगत 2600 वर्षों से लाखों साधु-मुनियों ने उस पथ पर चलकर समाज का और स्वयं का कल्याण किया l यह भारत भूमि का परम सौभाग्य है कि आज के इस भौतिकतावादी युग में भी महावीर के पथ के अनुयायी अपनी कठिन तपश्चर्या से नई पीढ़ी को आध्यात्मिक सन्देश दे रहे हैं l आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज इस महान आध्यात्मिक परंपरा के उत्कृष्ट साधु हैं. जितना सुना है, जाना है और उनके विषय में पढ़ा है ,उसका  निष्कर्ष यही निकला कि इस युग में ऐसे साधू और साधुता के दर्शन अतिदुर्लभ हैं | इस युग में जन्मे प्रत्येक व्यक्ति का यह सौभाग्य है कि हम इस युग में जन्में हैं, जब उनके दर्शन प्राप्त हो सकते हैं | उनके विचार “भारत के विकास और संस्कारयुक्त शिक्षा” को महत्त्व देते हैं | भारत और भारतीयता के स्वप्न को साकार करवाने की अभिलाषा रखने वाले यह संत , आत्मकल्याण के साथ साथ बालिकाओं की शिक्षा, युवाओं के प्रशिक्षण,गौ पालन, बुनियादी रोज़गार हेतु हथकरघा, अहिंसा मूलक जैविक कृषि, समन्वित चिकित्सा व्यवस्था जैसे समाजोपयोगी कार्यक्रमों की  प्रेरणा भी देते हैं l  राष्ट्रोत्थान उनके चिंतन का प्रमुख बिंदु है l इसलिए आचार्यश्री स्वदेशी उद्योग, भारतीय भाषाओं के संरक्षण और स्वदेशी संस्कारों पर अपने प्रवचनों में निरंतर सन्देश देते हैं l हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं के भविष्य को लेकर उनकी चिंता हम सभी के समग्र प्रयासों से दूर होगी, ऐसी मैं आशा करता हूँ| आचार्य विद्यासागर जी को मुनि दीक्षा लिए 50 वर्ष हो रहे हैं l  आचार्यश्री अपने सैकड़ों आज्ञानुवर्ती साधू-मुनियों,आर्यिकाओं और आस्थावान श्रावकों के माध्यम से निरंतर आत्मसाधना और लोकमंगल के महायज्ञ में सन्नद्ध हैं l अतः अध्यात्म और संस्कृति प्रेमी समूचा भारत इस वर्ष को “संयम स्वर्ण महोत्सव” के रूप में मना रहा है l आज विश्व को महावीर के अहिंसा–अपरिग्रह-अनेकांत आधारित जीवन दर्शन की आश्यकता है l आचार्य विद्यासागर महावीर के जीवन दर्शन के साक्षात  प्रतिरूप हैं और इसलिए हम सबके लिए अनुकरणीय हैं l पुनः मैं श्रमण परंपरा के महान तपस्वी निर्ग्रन्थ साधक आचार्य १०८ विद्यासागर जी के चरणों में अपनी प्रणामांजलि निवेदित करता हूँ l

    प्रवीण जैन
    प्रवीण जैन
    नमोस्तु गुरुवर

    कहाँ होगा आचार्य श्री का चातुर्मास - क्या कहता हैं आपका अनुमान

    आप सभी अपना अनुमान नीचे लिखें और हा यह भी लिखे की १७ जुलाई का कार्यक्रम कहा पर हो सकता हैं  हमे हैं इंतज़ार आपकी विशेष टिपण्णी का   

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    नमोस्तु गुरुवर 67

    वंदन हमारा गुरु चरणों में गुरु चरणों में

    Meri jholi choti pad gayi re Itna Diya मैंतो  शरण में तेरी आओ रे Tere Charno Mein Ram Jaun re  me to nit pretty Shish zukauon re और मेरा होवे समाधि मरण गुरुवर तेरे चरणों में namostu

    Mukesh Sanghi
    Mukesh Sanghi
    नमोस्तु गुरुवर 1

    संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज को मेरा शत शत नमन !

    संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज को मेरा शत शत नमन ! नमोस्तु गुरुवर  - सौरभ जैन जयपुर  आप सभी से निवेदन इस पोस्ट पे कमेंट करके अपने भाव प्रकट करें - गुरुवर को नमोस्तु के रूप में अपनी भावांजलि प्रकट करें !

    Saurabh Jain
    Saurabh Jain
    नमोस्तु गुरुवर 98
  • स्वभाव

    एक बार आचार्य महाराज जी ने बताया कि पाठ करते समय मात्र पाठ (शब्दों) की ओर दृष्टि जाने पर लीनता नहीं आती है बल्कि लीनता तो अर्थ की ओर जाने पर आती है। शिष्य ने कहा - लेकिन आचार्य श्री जी अर्थ की ओर चले जाते हैं तो पाठ भूल जाते हैं। आचार्य श्री ने कहा - भूलना तो स्वभाव है। "जैसे ज्ञान आत्मा का स्वभाव है वैसे ही भूलना मनुष्य का स्वभाव है।” मनुष्य तो भूल का पुतला है। दूसरे शिष्य ने कहा - भूलता तो पागल है, आचार्य श्री जी बोले - यह भी एक भूल है, दूसरे को पागल कहना। भूल तो मात्र भगवान् से नहीं होती बांकी सभी से होती है। अन्त में उन्होंने कहा - अनावश्यक को भूलना सीखो तो आवश्यक स्मरण में रहेगा। मनोरंजन में नहीं आत्मरंजन में रहना सीखो |

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संस्मरण मुनि श्री कुन्थुसागर जी

    महानता

    विदिशा में गर्मी के समय प्रवास चल रहा था, गर्मी बहुत थी। 8 अप्रैल को गुरूदेव ने केशलुंच किया था। उसी रात पानी गिरा एवं मौसम ठंडा हो गया। सुबह आचार्य श्री जी से कहा - आपके केशलुंच होने के कारण देवताओं ने वर्षा कर दी ओर मौसम ठंडा हो गया। यह सुनकर आचार्य महाराज जी ने कहा - आप लोगों ने ऐसी भावना भायी होगी। आप लोगों की भावना से ऐसा हुआ है, हमने कहा नहीं आचार्य श्री जी यह सब आपका ही प्रताप है। आचार्य भगवन् हमेशा जब कभी अपनी प्रशंसा सुनते हैं तो मौन हो जाते हैं या यों कह देते हैं कि सब गुरु महाराज की कृपा है, या यह सब आप लोगों की भावना से हुआ। ऐसा कह देते हैं। स्वयं अपने को इससे अछूता रखते हैं। मान से हमेशा दूर रहते हैं यह उनकी महानता है।   कर्तव्य के समय यदि हमारी दृष्टि प्रलोभन की और चली जाती है तो हमारी दिशा विपरीत हो जाती है। कर्तव्य सामान्य होकर किया जाता है और कर्त्तव्य विशेष स्वामी बनकर किया जाता है। कर्तव्य को दिशाबोध तत्वज्ञान से प्राप्त होता है।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संस्मरण मुनि श्री कुन्थुसागर जी
  • विभाव अभाव

    हे! प्रभो! आपने सिद्धांत के सारमय समयसारमय वीतराग वीतमोह स्वभाव भाव की प्रसूति से पर निरपेक्ष स्वापेक्ष विभूति से   शुद्धात्मानुभूति से वैभाविक / औपाधिक क्रोध प्रणाली को जो संसार की पृष्ठभूमि है जड़ है अपने चेतन के धरती-तल से आमूल उखाड़ दिया है   अन्यथा... आपाद कंठ अंग अंग औ उपांग आपके अनंग के अंग की नैसर्गिक आभा का उपहास करने वाले पलाश के उत्फुल्ल फूल की लालिमा को धारण करते हैं किन्तु करुणा रस से आपूरित लबालब निश्चल अडोल विशाल दो लोचन लाल अरुण वर्ण से वंचित क्यों ?... रंजित क्यों नहीं...?

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    नर्मदा का नरम कंकर

    लाघव भाव

    जिनके जीवन में निरन्तर अनुस्यूत बहती रहती मानानुभूति ज्ञान की आपको अपना ज्ञान विज्ञान प्रमाण दर्शित / प्रदर्शित कर अपमानित करने का लाघव भाव विभाव वैभाविक मन में भावित कर आपके सम्मुख उद्ग्रीव मुख विनय-विमुख फूल समान नासा फुलाते पहली बार खडे हैं अपने ध्रुव पर अड़े हैं   भावी गौतम! इन्द्रभूति!! मोहातीत मायातीत औ अपूर्ण ज्ञान से सुदूर/अतीत हो तुहिन कण की उजल आभा सी   स्फटिक शुद्ध पारदर्शिनी स्व-पर-प्रकाशिनी सकलावभासिनी परम चेतना रूपी जननी के पावन पुनीत परम पद्-प्रद् पदपद्मों में अपनी कृतज्ञता का भाव व्यक्त अभिव्यक्त करते हुए विनत मन प्रणत तन नत नयन अंग अंग औ उपांग नमित करते अमित अमिट अतुल / विपुल विमल / परिमल गुण गण कमलों का अर्घ अर्पित समर्पित करते आपको निरखते हैं… उस तरह जिस तरह हरित भरित पल्लव-पत्रों फूले फूलों फलों दलों से लदा हुआ मस्तक झुकाता अपनी जननी वसुंधरा के चरणों में विनीत वह पादप! प्रतिफल यह हुआ कि उनके मानस-सरोवर में कल्पनातीत आशातीत विकल्पों की तरल तरंगमाला... पल भर बस परवश तरंगायित हो। उसी में उत्सर्गित तिरोहित   इस निर्णय के साथ हार रे। अब तक मेरा निर्णय, निश्चय निश्चय से सत्य तथ्य से अछूता रहा नश्वर असत्य सारहीन को छूने दीन बना है... भ्रमित मन छटपटा रहा है मुम् आत्मा, मान से संतुष्ट     वह आत्मा प्रमाण से सम्पुष्ट मैं परिधि पर भटक रहा अटक रहा   मेरा मन विषयों के रस में चटक मटक कर रहा यह केन्द्र में सुधारस गटक रहा मैं उलटा लटक रहा यह सुलटा अनन्य दुर्लभ सुख सम्वेदनशील घटना का घटक रहा मैं विभाव भाव दूषित मैं परावलम्बित पराभूत यह स्वावलम्बित अभिभूत पूत !... इसके इस तुलनात्मक दृष्टिकोण ने मौन का विमोचन कर अपने अंग-अंग को सामयिक आदेश इंगन से इंगित किया कि हो जाओ जागृत ! सावधान! अपने कर्तव्य के प्रति प्रतिपल...! लोचन युगल एक गहरी नती की अनुभूति में लीन हो डुबकी लगाने लगा कर कमल प्रभु के चरणों में समर्पित होने उद्यत आतुर... जुड़ गये घुटने धरती पर टिक गई पंजों का सहारा एड़ी पर पीठ आसीन और भूली फूली नासिका प्रायश्चित माँगती यह स्वभाव भाव भूषित   धरती पर रगड़ने लगी अपनी अनी!... उत्तमांग चिर समार्जित मान का विसर्जन करने कृतसंकल्प प्रणत!... अनन्त काल के लिए हे अनन्त के पार उड़ने वाले! अनन्त सन्त...!!

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    नर्मदा का नरम कंकर

    अमन

    हे! जितकाम ललाम आपने ऐसा कौन सा किया है काम की काम का तमाम काम हो बेकाम   आगामी सीमातीत काल तक अनुभव करता रहेगा विराम का विदित होता है कि युक्ति से काम लिया है आपने शक्ति से नहीं एक पंथ दो काज!... इस सूक्ति का निर्माण किया है   यथार्थ में आपने चिरकालीन चंचल मन की सत्ता को जो है पर से प्रभावित चेतना का ही एक विकृत परिणाम दुखधाम और मनोज का अधिकरण उद्गम स्थान अधिष्ठान हे आप्त! समाप्त किया है...!   आपकी दृष्टि मूल पर रही   चूल पर नहीं कारण के नाश में कार्य का विकास / विलास संभव नहीं / असम्भव! कारण के सहवास में कार्य का वह विनाश भी असंभव!...   यह व्याप्ति है औ आपका न्याय-सिद्धान्त । हे शंभव! इसलिए आपका संदेश है। आदेश है कि दूर रहो...   हे भद्रभव्यो!... । मन से मनोज से मनोज के बाण सुमन से... फिर बनो अमन...!

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    नर्मदा का नरम कंकर
  • प्रवचन सुरभि 66 - स्थितिकरण ! सो क्या ?

    प्राज्ञ का अर्थ विशेष रूप से जानने वाले यानि विद्वान्, पण्डित, ज्ञानी है। सम्यक दर्शन के छठे अंग स्थितिकरण की सुरक्षा ज्ञानियों के द्वारा होती है। स्वयं की स्थिति को सम्भालते हुए दूसरे को स्खलित होते समय ऊपर उठावे, यही विद्वानों का काम है। नीचे गिरे को ऊपर उठाना ही वास्तविक काम है। उसके लिए पूरी शक्ति लगानी पड़ती है, अपने पैरों को मजबूत रखना पड़ता है। विद्वान् वह है, जो शक्ति न होने, प्रमाद से अथवा अज्ञान की वजह से नीचे गिर रहा है, उसे निष्प्रमादी होकर ऊपर उठावे। प्राज्ञ धर्म के साथ सम्बन्ध रखता है। स्खलन अधर्म है, स्थिति धर्म है। प्राज्ञ स्थिति को चाहता है, स्खलन को नहीं। गिरा व्यक्ति वह है जो उठ रहा था-पर नीचे गिर गया। ऊपर उठते हुए नीचे गिर गया, उसे ज्ञानी ही ऊपर उठायेगा। प्रागभाव और प्रध्वंसा भाव, ये दोनों हुआ करते है। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसके समय-समय पर भावों में परिवर्तन नहीं होता रहता है। संयम को अपनाने वाले व्यक्ति के भावों में भी परिवर्तन हो सकता है, अज्ञान व प्रमाद से।   पास होने की चेष्टा करने वाला व्यक्ति फैल (नापास) भी हो जाता है, पर वह उस व्यक्ति से तो अच्छा है जो परीक्षा में बिल्कुल नहीं बैठता। नापास को भी विषयों में नम्बर मिले, यूं कह सकते हैं, जितने चाहिए उतने न मिले। M.A. में एक छात्र फैल हो गया तो वह M.A. की अपेक्षा नापास है पर B.A. की अपेक्षा से तो पास है। वह दुबारा प्रयत्न करके पास हो सकता है। थोड़ी कमी को दूर करने के लिए ज्यादा समय की जरूरत नहीं। सप्लीमेंट्री वाले छात्र को साल भर तक पढ़ने की जरूरत नहीं, महीने २ महीने में परीक्षा देकर पास हो सकता है। भावों में परिवर्तन आते ही हैं। जो ऊपर उठता है वह किसी न किसी आदर्श को लेकर उठता है। जो आदर्श नहीं रखता, वह एक दृष्टि से गिरा हुआ ही है। ज्ञानियों की उपयोगिता ज्ञानियों के लिए नहीं बल्कि अज्ञानियों के लिए है। जिसका मुख स्वच्छ व साफ है, उसके लिए दर्पण की जरूरत नहीं, दर्पण की कीमत वहाँ है, जिसके मुख पर कालिमा है। सामथ्र्य जिसके पास है वह स्खलित के सामने आदर्श उपस्थित करे। परिणामों में स्खलनता व विकास जल्दी-जल्दी होता है।   व्यक्ति एक अन्तर्मुहूर्त में मिथ्यात्व को पार कर सिद्धालय में विराजमान हो सकता है। परिणामों की बड़ी विचित्रता है। अत: हमेशा जागृत रहना चाहिए। पता नहीं किस समय प्रमाद के वश पतन हो जाये और जागृत होने पर विकास हो जाये। दीक्षा, नियम दिये नहीं जाते, लिए जाते हैं। हृदय में भाव जागृत होने पर व्यक्ति दीक्षा लेता है। एक राजा ने सात बार दीक्षा ली और सात बार वापस घर चला गया। आठवीं बार दीक्षा लेते ही पाँच मिनट में ही ऐसे भाव हुए कि केवल ज्ञान प्राप्त हो गया। चार पाये को तो आप बाँध सकते हैं, पर दो पाये को नहीं बाँध सकते। चौपाये के भी गले में पट्टा ही तो बाँध सकते हैं, पर विचारों को तो नहीं बाँध सकते। जीव ने अनन्त बार शादी की है। राजा ने अगर सात बार घर जाकर शादी की तो सात बार दीक्षा भी तो ली और प्राग्भाव, प्रध्वंसाभाव के द्वारा अनन्त संसार का छेद किया।   आत्मा की शक्ति अलौकिक है, अतींद्रिय है, पौदूलिक नहीं। केवलज्ञान अनन्त लोकाकाश के ज्ञान को भी हजम कर लेता है। यह ज्ञान प्राप्त करने की शक्ति आप सबमें है। कोई छोटा बड़ा नहीं है। पर्याय क्षणिक है। विशेषण पर्यायों में है अन्दर में नहीं। अन्दर सब समान है, ऐसा विचारने पर ही स्थितिकरण अंग अपनाएँगे। पुरुषार्थ करके भावों को स्थिर करो दृष्टि स्खलन की तरफ न रखो। स्खलित होना विद्वान् का काम नहीं। दूसरों को भी स्थितिकरण में रखो। गिरना नहीं है, चलते रहना है। इससे विद्वता, ज्ञान सामने आता है। धर्म के साथ वात्सल्य, प्रेम रखने वाला दूसरे को कभी भी मिथ्या दृष्टि देखना पसन्द नहीं करेगा। उसकी यही दृष्टि होगी कि दूसरा ऊपर उठे उसकी दृष्टि समीचीन बने। इसके लिए पुरुषार्थ करना है। दृष्टि पर आई हुई मलिनता को पुरुषार्थ से दूर करना है। अभव्य तथा भव्य तुम्हारी दृष्टि में नहीं। गुरु वही है जो आगे बढ़ रहा है। भगवान् ऋषभनाथ बैठे रहे और पोता उनका सिद्ध हो गया। अत: कौन ऊँचा कौन नीचा है? ऐसा विकार स्खलन के लिए कारण है।   त्रेकालिक सत्ता को देखो, हरेक में वही सत्ता है, हरेक विकास कर सकता है। सब अंगों में स्थितिकरण सबसे बड़ा है। सम्यक दृष्टि जब किसी का अनन्त संसार विच्छेद होता देखेगा तो आनन्द मनाएगा। स्थितिकरण में अपना व दूसरे का भी भला है। नीचे गिरे को उठाने पर सब प्रशंसा करेंगे।अगर दूसरे का स्खलन दूर न कर सको तो अपना स्खलन तो दूर करो। अपने द्वारा अपना इलाज हो जाने पर दूसरे की ओर दृष्टि होगी। जीव का साधर्म भाई जीव ही है, धन वैभव नहीं। सबसे बड़ा वह है जो दर्शन ज्ञान, चारित्र से स्खलन को प्राप्त हो रहे अन्य व्यक्ति को हिम्मत बंधा दे, स्थित कर दे, रोक दे। जहाँ स्खलन है, वहाँ मदद की जरूरत है। दर्शन से गिरकर जो अनन्त को बढ़ा रहा है, उसे मदद करना है। धन के अभाव में आज कल के व्यक्तियों का धर्म निभाना मुश्किल है। कहा है कि गृहस्थ के पास कोड़ी नहीं तो कोड़ी का है (किसी काम का नहीं) और साधु के पास कोड़ी है तो कोड़ी का है (साधु किसी काम का नहीं)। गृहस्थ में धर्म की जरूरत है तो धन की भी जरूरत है। आज धन के अभाव में कई व्यक्ति धर्म छोड़ चुके हैं। धन के अभाव में जो धर्म से च्युत हो रहा है। उसको देखकर के धनवान व्यक्ति उसकी मदद नहीं करता तो वह भी पापी है। टार्च से दूसरे को रोशनी दिखाने पर कमी नहीं आती। धन जो पुण्य के द्वारा प्राप्त किया है, अपने काम के साथ दूसरे के काम आ जाये दूसरा धर्म पर टिक जाये। यही धन के द्वारा स्थितिकरण अंग को सुरक्षित रखना है।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    विद्या वाणी

    प्रवचन सुरभि 58 - पाप की जड़

    आत्मा के परिणामों की बड़ी विचित्रता है। अनादिकाल से यह संसारी जीव भोगों का दास बना हुआ है। इन्द्रियों की इच्छा पूर्ण करने में लगा है। आज एक प्राणी ने भोगों को पाप का मूल समझा और उसके मन में त्याग के भाव जागे हैं। अब वह सबसे पहले आरम्भ परिग्रह का त्याग करेगी। आरम्भ को इस जीव ने अनादि से अच्छा मान रखा है पर इस महिला ने इसे पाप का मूल समझा। ८ वीं प्रतिमा आरम्भ त्याग प्रतिमा होती है। अब यह सांसारिक कार्यों, खाने-पीने के बारे में आरम्भ नहीं करेगी, धार्मिक कार्य कर सकती है। इसके बाद परिग्रह त्याग प्रतिमा है।   महावीर का संदेश है कि सबसे बड़ा साहूकार, धनवान, अमीर, सुखी वह है, जिसके पास तिल मात्र भी परिग्रह नहीं है। आज रथयात्रा में उसी का दिग्दर्शन झाँकी के द्वारा किया गया। परिग्रह के प्रति इस महिला को घृणा हो गई है। अब इसके सांसारिक परिग्रह का त्याग है। जीवन के अन्तिम समय में मोह का विकास नहीं, मोह का अभाव होना चाहिए। दसवीं प्रतिमा वह है कि सांसारिक बातों के लिए अनुमति नहीं देगी। धार्मिक चर्चा के अलावा मुख से अन्य बातें न निकलेगी। यह अच्छा विचार किया है इस महिला ने। दसवीं प्रतिमा के भाव इसलिए किए कि अन्तिम समय में समाधि हो। इस महिला ने अपने जीवन के द्वारा धार्मिक विकास के लिए यहाँ सहयोग दिया है। अत: अन्त में कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इनकी सेवा करना चाहिए। यह एक अच्छी शुरूआत है उदासीनाश्रम के लिए। वैयावृत्य करने से कराने वाले का तथा करने वाले का दोनों का जीवन सुधर जाता है।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    विद्या वाणी

    कुण्डलपुर देशना 11 - स्वयं धर्मात्मा

    धर्म मन वचन काय या धन से नहीं वह तो चेतन से संबंध रखने वाला तत्व है। वह खरीदने बेचने या डिब्बे में रखकर बंद कर लेने की वस्तु नहीं अपितु धर्मात्मा के अंदर की परिणति है। धर्मात्मा होने की बात तो की जा सकती है परन्तु पहले स्वयं धर्मात्मा बनें, न कि धर्मात्मा बनाने के चक्कर में पड़े। किसी को मार्ग बताने के पूर्व स्वयं उसको पूर्णत: या अंशत: अपने जीवन में आचरित करें।   धर्म निर्जीव वस्तु नहीं जिसे यूँ ही स्थापित कर दिया जावे। उसकी आवाज सुनने की चेष्टा करें। तन-मन-धन या वचनों से डर लग सकता परंतु धर्म की शरण में जाकर भयावह प्रसंगों से अपने आपको बचाया जा सकता है। देश में जो सांस्कृतिक उत्सव होते हैं वे मात्र औपचारिकता पूर्ण नहीं बल्कि उनसे जनता की सुप्त चेतना जागृत होती है। इसीलिए धार्मिक या सामाजिक उत्सव पूर्ण आनंद और उत्साह से मनाये जाते हैं। मन में उत्साह उमंग होने पर वह वचनों से अभिव्यक्त होता है तथा वचनों में आ जाने पर यह अंग प्रत्यंग के हाव-भाव से प्रगट होने लगता है। उत्साह भीतर हो तो वह शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति को प्राप्त होता है, क्योंकि हृदय के भाव चेहरे पर भी झलकने लगते है। समता भज तज प्रथम तू पक्षपात परमाद। स्याद्वाद आधार ले समयसार पढ़ बाद।   वर्तमान लोकतंत्रीय व्यवस्था के संबंध में कहा कि राजकीय सत्ता में यथा 'राजा तथा प्रजा' की उक्ति चरितार्थ होती है पर लोकतंत्रीय व्यवस्था में यथा प्रजा तथा राजा की सार्थकता होनी चाहिए। जिस कारण जनता अयोग्य व्यक्तियों को हटाकर योग्य व्यक्तित्व को उस पद पर स्थापित करती है। अपने घर की व्यवस्था करने में जो फेल हो वह संपूर्ण भारत देश को क्या नियंत्रित करेगा? जो स्वयं ही अनुशासित-संयमित न हो। वस्तुत: प्रजा का कर्तव्य है कि यदि राजा (शासक) धर्मनीति से स्खलित हो रहा है तो उसमें सुधार करावें पर आज तो राजा ही नहीं रह गया और प्रजातंत्र के नाम पर आज मात्र स्टाप सा क्षतिपूर्ति ज्यों लग रहा है।   ये धर्मानुराग से प्रेरित नहीं बल्कि जातीयता, स्वार्थ या अपनत्व के कारण होता इसलिए उसे चेतन से अनुराग नहीं होता। जिनकी शरीर की ओर दृष्टि होती है उन्हें आत्मा की जाति का ज्ञान नहीं होता-वैसे चेतना तो सबके पास है। वेश बदलने मात्र से चेतना लुप्त नहीं हो जाती, वेश-परिवेश या देश की बदलाहट से जन्म-मरण की कुण्डली भले ही बदल जाये पर आत्मा की कुण्डली सदा एक सी रहती है। उसकी कोई भिन्न जाति अंश या वंश नहीं होता। मात पिता रज वीरज मिलकर बनी देह तेरी। मांस हाड़ नस लहूँ राधकी, प्रकट व्याधी घेरी॥   इस रज और वीर्य के संयोग से बने शरीर की बात अलग है। पर्याय बदल जाने पर ज्ञान भी पलट जाता है। पर धर्म के संस्कार जिसके जीवन में पड़ गये हों वह प्रशम, संवेग, अनुकंपा और आस्तिक्य दया से संयुक्त हो करुणामय भावों के साथ जीवन-यापन करते हैं उन्हीं का साक्षात्कार प्रभु से हो जाता है - साक्षात्कार प्रभु से जबलों न होता, संसारी जीव तबलों भव बीच रोता। पट्टी सु साफ करता नहिं घाव धोता, कैसे उसे सुख मिले, दुख-बीज बोता॥   "महावीर भगवान् की जय!"

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    विद्या वाणी
  • अन्तर्यात्री-महापुरुष जयपुर शहर में 16 जुलाई को शाम 6.30 बजे सुबोध पब्लिक स्कूल

    सन्त शिरोमणि गुरुदेव आचार्य श्री108 विद्यासागर जी महाराज की दीक्षा के '50वें "संयम-स्वर्ण महोत्सव" के अंतर्गत मुनि पुंगव श्री 108 सुधा सागर जी महाराज के आशीर्वाद से  व क्षुल्लक श्री 105 धैर्य सागर जी महाराज की प्रेरणा से "संयम-स्वर्ण महोत्सव समिति,जयपुर"(अध्यक्ष) समाज श्रेष्ठी श्री गणेश राणा व (महामन्त्री) समाज भूषण श्री राजेन्द्र के.गोधा के मार्गदर्शन द्वारा आयोजित और "अरिहन्त नाट्य संस्था,जयपुर" द्वारा प्रस्तुत क्षुल्लक श्री 105 धैर्य सागर जी महाराज द्वारा रचित एवम् श्री किरण प्रकाश जैन द्वरा रूपान्तरित आचार्य श्री की जीवनी पर आधारित भव्य लाइट एण्ड साउण्ड नाट्य प्रस्तुति (संसार शिखर से महाशिखर की ओर...एकमहायात्रा)"
    "अन्तर्यात्री-महापुरुष"
    जयपुर शहर में 16 जुलाई को शाम 6.30 बजे सुबोध पब्लिक स्कूल,रामबाग सर्किल पर किया जाएगा। इस  नाटक में जयपुर शहर के 100 से भी अधिक कलाकार अभिनय करते नज़र आयेंगे, नाटक का निर्देशन युवा रंगकर्मी अजय जैन,आशीष गुप्ता कर रहे है व संगीत निर्देशन अवशेष जैन (जबलपुर) का है । देखना ना भूले 16 जुलाई शाम 6.30 बजे,सुबोध पब्लिक स्कूल में भारत के स्वर्णिम जैन इतिहास का सबसे बड़ा नाटक "अन्तर्यात्री-महापुरुष''
    निवेदक
    श्री गणेश राणा
    (अध्यक्ष)
    श्री राजेन्द्र के.गोधा
    (महामंत्री)
    संयम-स्वर्ण महोत्सव समिति,जयपुर
    अजय जैन (मोहनबाड़ी)
    आशीष गुप्ता
    (निर्देशक)
    अरिहन्त नाट्य संस्था,जयपुर
    7615060671

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव

    संयम स्वर्ण महोत्सव समापन समारोह 17 जुलाई 2018 के कार्यक्रम

    🙏🏻🙏🏻17 जुलाई 2018🙏🏻🙏🏻  
                संयम स्वर्ण महोत्सव
                   समापन समारोह  प्रातः कालीन कार्यक्रम:- *प्रभात फेरी /जुलूस/रैली  -आ.श्री जी की तस्वीर हो -आ.श्री जी के 50 वर्षों की साधना पर झांकी अथवा  आ.श्री जी के आशीर्वाद से चल रहे प्रकल्प (जैसे हथकरघा ,शिक्षा,भारत और इंडिया आदि)पर झांकी -जुलूस में पुरुष वर्ग सफेद परिधान एवं महिला वर्ग केसरिया साड़ी /सूट -जुलूस में बच्चे भी शामिल हो *ध्वजारोहण /ध्वज वन्दन(ध्वज गीत) *विद्या गुरु विधान /विघ्न हर विद्या सागर विधान, आचार्यश्रीजी  की भव्य पूजन का आयोजन *साधु संत/व्रती /विद्वान द्वारा व्याख्यान आ. श्री जी के जीवन ,चर्या ,तप-त्याग ,साधना पर *वृक्षारोपण-स्वर्णिम संयमोत्सव विद्या तरु मंदिर परिसर में,तीर्थ क्षेत्र आदि पर *मिष्ठान्न वितरण सरकारी दफ्तर ,अनाथालयों में *संयम कीर्ति स्तंभ /अहिंसा द्वार का उद्घघाटन  *जेल में आ.श्री जी की पूजन -आरती ,आचार्य श्री जी तस्वीर भेंट करे *आचार्य श्री जी के कैलेंडर ,तस्वीर भेंट करें सरकारी दफ्तर /विद्यालय /महाविद्यालय में *घरों में दीपक जलाना, रंगोली बनाना , तोरण लगाना , आचार्य श्री जी की फ़ोटो लगाना  * 17 जुलाई को एकासन , उपवास / रसी अथवा रस का त्याग * संयम स्वर्ण महोत्सव - पुरुस्कार  वितरण , छात्रवृत्ति / आर्थिक शिक्षा सहयोग * संयम स्वर्ण महोत्सव के उपलक्ष्य में व्यापारी 5%/10% डिस्काउंट दे अथवा व्यवसाय अवकाश । *आपके द्वारा आयोजित कार्यक्रम अपने नगर /ग्राम के स्थानीय अखबार ,न्यूज़ चैनल पर दे । * कार्यक्रम की सम्पूर्ण जानकारी ,फोटो  नीचे दी हुई आई डी पर विवरण के साथ मेल करे ताकि संयम स्वर्ण महोत्सव में प्रकाशित होने वाली स्मारिका में शामिल हो सके। Mahotsav.1718@gmail.com   दोपहर-- * आचार्य श्री जी विधान
    * सांस्कृतिक कार्यक्रम - ( महिलाएँ / बच्चे )
    - रंगोली प्रतियोगिता
    - हाइकू प्रतियोगिता
    - चित्रकला प्रतियोगिता
    - गुरु भक्ति शतक बुलावा
    - भजन प्रतियोगिता ( आचार्य श्री जी पर )
    - प्रश्नोत्तरी
    - आचार्य श्री जी पर ध्यान / जाप   रात्रि कालीन -- * महा आरती ठीक रात्रि -8:30( आचार्य श्री जी की )
    वेश भूषा -पुरुष वर्ग -सफेद
                  महिला वर्ग- केशरिया
    * नाटक - विद्याधर से विद्यासागर
    *फ़िल्म-अपराजेय साधक 20 मिनट
       (You tube से प्राप्त करें)
    * कवि सम्मेलन / भजन संध्या
    कृपया इस संदेश को जन जन तक पहुंचाए।
     पीडीएफ .  

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव

    जीव दया वर्ष संयम स्वर्ण महोत्सव 5 जुलाई भाऊँदाजी रोड,(Matunga) मुंबई

    जय जिनेन्द्र 🙏🙏 आ ग ई वो घडी, उलटी गिनती शुरु, एक सपना था संयम स्वर्ण महोत्सब मनाने का,गुरुजी का आशिर्वाद मिला और मन खुशी से झुम उठा। 5 जुलाई को हम सब मिल गुरुवर का जयकारा लगाएगे कि सुन हमारी पुकार ,गुरु जी चरण या गुरुजी की छाया को मुम्बई मे आना होगा।
    और वो हम करके दिखलाएँगे👍 हम प्रतिदिन प्रगतिशील समाज मे देख रहे है कि उन्नति तो कर ली किन्तु हर समाज मे उसके नुकसान देखने को मिलते।अहंकार जब हावी होता तब व्यक्ति सब मर्यादा भुल, सप्त व्यसनो मे लिप्त हो परिवार बरबाद कर देता। आओ आज देखे अहंकार के दुष परिणाम और और.......   हमारी प्रस्तुति ......
    OLX  PAR BECH DE 
          “अहंकार का दहन" तारक मेहता का उल्टा चश्मा के सेलेब्रिटी संग।। #  उच्च पद पर कार्यरत जैन बंधुओ का सत्कार
    # जीव दया का प्रण लेते हुए चमडे की वस्तु का त्याग करता  फॉर्म का विमोचन 
    🌷🌷🌷🌷🌷🌷
    👉दिनांक -5 जुलाई 2018 को 
    👉समय—दोपहर 2 बजे से 5 बजे 
    👉स्थान—-मैसूर असोसीएशन             ऑडिटोरियम,
    भाऊँदाजी रोड,(Matunga)
    धन्यवाद 🙏🙏🙏🙏🙏   Mysore Association Auditorium
    393, Bhaudaji Rd, Matunga, Mumbai, Maharashtra 400019
    022 2402 4647
    https://goo.gl/maps/WQ5prt3Zeqm

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
  • हे आत्म रहस्य ज्ञायक… गुरुदेव!

    भिन्न-भिन्न देश की भाषा के आप हो ज्ञाता, मूकमाटी के हो मुखबित कर्ता, अध्यात्म वक्ता, परमात्म पंथ के हो आप दृष्टा, शुद्धात्म भाव के ज्ञायक, मुनिगण नायक, अनेक गूढ़ ग्रंथों के अनुवादक, आपको शत्-शत् वंदन! भावो से अभिनंदन!   “कई शतक पद्यानुवाद और भक्ति का अनुवाद किया। मूकमाटी को मुखरित करके, परम गूढ़ अध्यात्म दिया।। अनेक भाषाविद् गुरुज्ञानी, आगम भाषा के ज्ञायक। ज्योतिपुंज श्री विद्यासागर, अनेक मुनिगण के नायक।।”   आर्यिका पूर्णमती माताजी

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    मेरे गुरुवर - आर्यिका पूर्णमती माताजी

    हे अंतः प्रेरक... गुरूदेव!

    मैं जो कर रहा हूँ, वह आपको पसंद है, मुझे नहीं मालूम, और जो मैं नहीं कर रहा हूँ, उसे आप कराना पसंद करते हैं, मुझे यह भी नहीं मालूम, लेकिन मुझे इतना जरूर मालूम है कि... जो मुझमें हो रहा है, वह सब आप ही की अंत:प्रेरणा से हो रहा है।   “मिले गुरु सान्निध्य यदि तो, सुषुप्त शक्ति जागृत हो। कायर भी हो परम तपस्वी, हालाहल विष अमृत हो॥ मूर्ख बने विद्धान शीघ्र ही, दुर्जन सज्जन हो जाता। खिन्न हृदय भी प्रसन्न होता, जब गुरुदर्शन हो जाता।।''   आर्यिका पूर्णमती माताजी

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    मेरे गुरुवर - आर्यिका पूर्णमती माताजी

    हे निजानुभवी... गुरुदेव !

    आपको क्या हो गया? न अच्छे से आहार करते हो! न निद्रा लेते हो! न बोलते हो! न देखते हो! न जाने कहाँ खोये रहते हो... क्या, निजानुभूति प्रिया की यादों में रहते हो?   “निजानुभूति रमणी के संग, शुद्धातम में रमते हैं। जग को लगता हमें देखते, पर वह निज को लखते हैं।। देखो कहकर बात टाल कर, निज में देखा करते हैं। निज आतम के परिणामों का, प्रतिपल लेखा करते हैं।”   आर्यिका पूर्णमती माताजी

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    मेरे गुरुवर - आर्यिका पूर्णमती माताजी
  • 39. कृतज्ञता : धरा के प्रति

    पवन की बात सुन फूल कुछ न बोला, केवल उसने अपनी दृष्टि सुदूर बैठे शिल्पी की ओर कर दी, जो उदास बैठा हुआ, औरों को क्या अपने तन को भी नहीं देख पा रहा है प्रभु भक्ति में डूबा हुआ है। कुछ पल बाद ही क्रोधित हो ऊपर बादलों की ओर नजर की फूल ने, जो बादल कलह करने में लीन हैं, विघ्न की मूर्ति बने हैं। भिन्न-भिन्न पात्रों को देखकर भिन्न मुखाकृति, परिणामों की बदलाहट पर्याप्त थी पवन के लिए क्योंकि -   "अनुक्त भी ज्ञात होता है अवश्य उद्यमशील व्यक्ति के लिए फिर ...... तो संयमशील भक्ति के लिए किसी भी बात की अव्यक्तता आकुलित करेगी क्या? सब कुछ खुलेगी-खिलेगी उसके सम्मुख....अविलम्ब !" (पृ. 260) जो पुरुषार्थशील होता है वह बिना कहे ही इशारे से सब कुछ समझ जाता है फिर जो संयमित हो, भक्ति-भाव से भरा हो, वह कैसे न समझ पाएगा। सहज ही सारा का सारा विषय, अपना कर्त्तव्य उसे समझ में आ गया।   प्रासंगिक कार्य पता चलते ही उसे पूर्ण करने के लिए सानन्द तैयार होता है पवन । धरती द्वारा किए उपकार को चुकाने हेतु भयंकर रूप धारण करता हुआ पवन बादलों से कहता है-सन्मार्ग से च्युत हुए हे बादलों! अपनी शक्ति का सदुपयोग करो, छल-कपट छोड़ो क्योंकि इससे जीवन में कभी भी तुम्हें सुख- शान्ति नहीं मिल सकती। अब कुछ करो अथवा न करो, तुम्हारा अन्तिम समय निकट आ ही गया है। मति की गति से भी तीव्र गति वाला होता हुआ पवन आकाश में पहुँचता है, बादलों को अपनी चपेट में ले उनका मुख समुद्र की ओर मोड़ देता है। फिर पूरी ताकत लगाकर एक ठोकर लगा देता है, जैसे बालक गेंद को पैर से ठोकर लगा दूर फेंक देता है। फिर क्या कहना? बादलों सहित अनगिनत ओले एक साथ सागर में जा गिरते हैं। जैसे पापकर्म के वशीभूत हो पापी जीव नरकों में जा पड़ते हैं।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    तृतीय खण्ड - पुण्य का पालन पाप का प्रक्षालन

    30. प्रार्थना सेठ की : गुरुवर से

    आहारदान की क्रिया सम्पन्न हुई। आसन पर बैठ पेट-छाती-हाथ आदि अंगों को अपने हाथों में जल लेकर स्वच्छ बना श्रमण पुनः कुछ समय के लिए पलकों को अर्थोन्मीलित कर परमात्मा की भक्ति (कायोत्सर्ग) में लीन हो जाता है।   कायोत्सर्ग पूर्ण होने पर सेठ ने अपने हाथों से, मुनिराज के दोनों हाथों में मयूर पंख से बनी पिच्छिका प्रदान की। जो कि मृदु, कोमल, हल्की और मन को आकर्षित करने वाली भी है। प्यास बुझाने हेतु नहीं किन्तु शास्त्र-स्वाध्याय के पूर्व और शौचादि क्रियाओं के बाद हाथ-पैरादि की शुद्धि हेतु कमण्डलु में प्रासुक जल डाला गया जो कि 24 घण्टे तक उपयोग में लाया जा सकता है इसके पश्चात् सदोष हो जाता है अर्थात् त्रस जीवों की उत्पत्ति की संभावना हो जाती है।   अतिथि के चरण छूने तथा पावन दर्शन हेतु अड़ोस-पड़ोस की जनता आँगन में आ खड़ी हुई । ज्यों ही अतिथि का आँगन में आना हुआ त्यों ही जय- जयकार के घोष से सारा आकाश गूंज उठा और भावुक जनता सहित सेठ ने प्रार्थना की गुरुवर से -   "पुरुषार्थ के साथ-साथ हम आशावादी भी हैं आशु आशीर्वाद मिले शीघ्र टले विषयों की आशा, बस! चलें हम आपके पथ पर।" (पृ. 344)   हे गुरुवर! हमारे विषयों की इच्छा शीघ्र ही दूर हो, ऐसा आशीर्वाद जल्दी ही प्रदान करें। क्योंकि पुरुषार्थ के साथ-साथ कुछ इच्छा भी रखते हैं हम। सो आपके जैसे बने, आपके पथ पर चलें और जाते-जाते ऐसा सूत्र देते जाइए, जिससे बंधे हम अपने आपको जान सकें। क्योंकि जो सुई- सूत्र अर्थात् धागे से बंधी होती है वह कभी गुमती नहीं। हमारा जीवन भी ऐसा ही बने।   इस पर अतिथि सोचता है कि उपदेश के योग्य न ही यह स्थान है और न ही समय। फिर भी भीतरी करुणा उमड़ पड़ी और सीप से निकलने वाले मोती के समान पात्र के मुख से निकलते हैं कुछ शब्द -   "बाहर यह जो कुछ भी दिख रहा है सो......मैं.....नहीं....हूँ और वह मेरा भी नहीं है।" (पृ. 345)   इन दो आँखों से जो भी कुछ संसार में दिख रहा है यह शरीर, भाई-बन्धु, मकान, दुकान, नगर आदि वह मैं अर्थात् मेरा स्वरूप नहीं है और न ही वे मेरे अपने हैं। अर्थात् बाहरी सभी पदार्थ मुझसे सर्वथा भिन्न हैं।   ये आँखें मेरे वास्तविक स्वरूप को देख नहीं सकती क्योंकि मैं तो स्पर्श, रस, गंध, वर्ण से रहित, अमूर्त हूँ। और ये आँखें रूपी पदार्थों को ही अपना विषय बनाती हैं, किन्तु मैं जीव हूँ मुझमें ही देखने की शक्ति है। उस शक्ति का ही स्वामी मैं हूँ, था और रहूँगा। यह मेरा त्रैकालिक स्वभाव है। भाव यह निकला कि शरीर सो मैं नहीं किन्तु शरीर के भीतर मैं हूँ। यूँ कहते-कहते पात्र (मुनिराज) के पद चल पड़े उपवन की ओर तथा पीठ हो गई दर्शकों की तरफ।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    चतुर्थ खण्ड - अग्नि की परीक्षा चाँदी सी राख

    31. रोना : रुक न सका

    हाथ में कमण्डलु लिए सेठ जी छाया की भाँति श्रमण के पीछे-पीछे जा रहे हैं। नगर के पास में ही उपवन (बगीचा) है उपवन में नसियाँ जी है, जिसमें नयनहारी नेमिनाथ भगवान् का जिनबिम्ब है, जो निजस्वरूप का ज्ञान कराता है। नसियाँ जी का गगन चूमता-सा ऊँचा शिखर है, शिखर पर स्वर्ण का कलश चढ़ा हुआ है। जो अपनी कान्ति से बता रहा है कि संसार की सारी चमक-दमक भ्रम पैदा करने वाली और चतुर्गतियों में भटकाने वाली है । इनसे सन्मार्ग नहीं मिलता। जिनबिम्ब के दर्शन करते ही तन रोमांचित हो, मन हर्षित हुआ।   एक बार पुनः गुरु चरणों को नमस्कार कर सेठ ने घर लौटने का उपक्रम किया, पर शरीर शक्ति हीन-सा लगा। आँखों में आँसू भर आए, पथ ओझल-सा हो गया, पैर भारी से लगने लगे। रोकने का प्रयास किया किन्तु रोना रुक न सका। पूज्यपाद, गुरु चरणों में लोट-पोट होता हुआ सेठ जोर-जोर से रोने लगा। रोते हुए मुख से निकले कुछ शब्द-हे गुरुवर! यह जीव आपके चरणों की शरण को छोड़कर वापस घर लौटना नहीं चाहता है। जैसे-हंस मानसरोवर को छोड़ अन्यत्र कहीं जाना नहीं चाहता। फिर भी दुःख की बात है कि शरीर को मन का साथ देना ही पड़ता है।   मेरा मन भी बहुत चंचल है प्रभो ! जल्दी ही उद्वेग-आवेग (क्रोधादि की तीव्रता) से घिर जाता है फिर ऐसी परिस्थिति में संसार के दुःख, पापों से भयभीत हो, धर्म के प्रति रुचि रूप परिणामों के साथ सदाचरण-सम्यक्चारित्र का पालन कैसे संभव हो सकता है? फिर समीचीन आधार के बिना यह जीवन कैसे टिकेगा?   तीव्र कर्मोदय के कारण चाहकर भी धर्म का पालन, पहाड़-सा भारी और कठिन लग रहा है। आषाढ़ माह में आने वाली बाढ़ में, छोटे-छोटे ही नहीं बड़े-बड़े हाथी जैसे प्राणी भी बह जाते हैं, वही दशा मेरी भी हो रही है कर्मों के आगे मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ। मैं अपने आपको बौना ही नहीं किन्तु अपाहिज भी महसूस कर रहा हूँ। लम्बा पथ है कैसे चलें, आकाश को छूता शिखर है कैसे चढ़े और कुशल साथी भी तो नहीं है कैसे बढ़े अब आगे।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    चतुर्थ खण्ड - अग्नि की परीक्षा चाँदी सी राख
  • गागर में सागर - हायकू (258).jpg

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    आचार्य श्री द्वारा रचित हाइकू (हायकू)

    गागर में सागर - हायकू (269).jpg

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    आचार्य श्री द्वारा रचित हाइकू (हायकू)

    गागर में सागर - हायकू (5).jpg

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    आचार्य श्री द्वारा रचित हाइकू (हायकू)
  • बचाओ पर्यावरण : नहीं तो अकालमरण

    हम अपने खेत में इन जहरीली रासायनिक खादों को डालकर धरती के साथ अन्याय न करें, धरती को बीमार न करें, उसके साथ खिलवाड़ न करें, धरती ही जीवन है। यदि धरती बीमार हो जाएगी तो समझ लेना उसी क्षण यहाँ की हरियाली नष्ट हो जाएगी। याद रखो! हरियाली के नष्ट होने पर आदमी का जीना मुश्किल हो जाएगा, हरियाली के अभाव में आप खा नहीं सकेंगे, जी नहीं सकेंगे, सो नहीं सकेंगे। यदि जीवन की रक्षा चाहते हो तो हरियाली की रक्षा करो, पर्यावरण की रक्षा करो, धरती की रक्षा करो, बचाओ पर्यावरण, नहीं तो अकालमरण। -१९९७, नेमावर

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    व्यवसाय और भारत

    विज्ञापन से बचो और आदर्शों के आदर्श अपनाओ

    गुणवत्ता वाली वस्तु को सभी पसंद करते हैं और प्राथमिकता उसे ही देते हैं परन्तु कभी-कभी विज्ञापन के प्रभाव में गुणवत्ता का अभाव हो जाता है और कम गुण वाली वस्तु से संतुष्ट होना पड़ता है। आज विज्ञापन का इतना जोर है कि समाचार पत्रों में विज्ञापन की अधिकता के कारण खबरों की गुणवत्ता कम हो जाती है। कोई भी निष्कर्ष तभी निकलता है जब हम गुणवत्ता को अच्छे से परख लेते हैं। कुशल तैराक भी बाढ़ में बह जाता है। उसी प्रकार आप लोग भी विज्ञापन की बाढ़ में बह रहे हो। -१ सितम्बर २०१६, भोपाल

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    व्यवसाय और भारत

    राष्ट्रीय परिचर्चा से पूर्व पत्रकारों को सम्बोधन

    शिक्षा और भारत राष्ट्रीय परिचर्चा से पूर्व पत्रकार वार्ता ३ नबम्बर २o१६, भोपाल आयोजक-शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नईदिल्ली एवं श्री दिगम्बर जैन पंचायत कमेटी ट्रस्ट, भोपाल   पत्रकार - आचार्य श्री! आज देश एवं समाज को मोड़ देने की जरूरत है; इस पर आप के क्या विचार हैं?   आचार्य श्री - आने वाले २ दिनों में जो संगोष्ठी होने जा रही है उसकी आज यहाँ पूर्व पीठिका के रूप में आप लोग आए हैं।   आपने एक शब्द कहा-मोड़ देने की आवश्यकता है। मोड़ने का अर्थ है, किसी ऐंगल को लेकर मोड़ना। जहाँ पर विपरीत ही दिशा हो, वहाँ पर मोड़ की आवश्यकता नहीं। भारतीय संस्कृति पूरब की ओर मुख वाली है अब किस ओर मोड़ना है दक्षिण या उत्तर, क्योंकि पश्चिम की ओर तो मोड़ हुआ ही है, देख ही रहे हैं।   अब हम पूछना चाहते हैं कि मोड़ क्या चीज है, कितना मोड़ होना चाहिए?   जो परिवर्तन हुआ है उसको वापस स्थिति में लाना ही तो मोड़ है। इसके लिए ठीक विपरीत दिशा में जाना पड़ेगा। हमें सृष्टि का परिवर्तन नहीं करना है, हमें तो दृष्टि में परिवर्तन लाना है। हम समष्टि का कल्याण चाहते हैं किन्तु कल्याण चाहने मात्र से नहीं होगा क्योंकि हमारे युवाओं में मोड़ की बात नहीं है। हमें तो भविष्य की बहुत चिंता नहीं है, हमें तो इस भारत को अतीत की और ले जाना है। जो ७० साल में विपरीत दिशा में चला गया है। उसके लिए ७० साल की आवश्यकता नहीं और ना ही १७ पापों की आवश्यकता हैं। बस, सतक होने की आवश्यकता है। यदि हम एक ही बार में घूम जाएँ तो हमारे सामने पूरब रहेगा, प्रतिदिन हम उस सूर्यनारायण का आलोक पाएँगे और जब हम विश्राम करेंगे उस समय घूमकर के देखेंगे कि सूर्य पश्चिम की ओर ढल गया है, हमें ढलने की भी बात नहीं है-मुड़ने की बात नहीं है, हमें पूरे के पूरे संकल्प लेने हैं कि हमें अतीत के भारत के दर्शन करने हैं और उसे विश्वास में लेना है इसीलिए विश्वास है।   हमें राष्ट्र को नहीं मोड़ना है क्योंकि सीधा ही रास्ता है भारत का, कभी भी मोड़दार रास्ता नहीं रहा, बिल्कुल सीधा रास्ता है, वह अहिंसा का उपासक रहा है। मैं चाहूँगा कि आप लोग एकदम 'इंडिया' को एक प्रकार से पूरब की ओर ले जाएँ जहाँ ‘भारत' का दर्शन होगा और जब ‘इंडिया' में ' भारत' का दर्शन होगा तो ‘इंडिया' को पूरे के पूरे लोग भूल जाएँगे क्योंकि भारत की महिमा ही ऐसी है।   एक औसत के अनुसार इसका परिवर्तन हुआ है, उसमें कमी किसकी है; मैं कह नहीं सकता, क्योंकि वर्षों तक एक सत्ता चली। वह अर्थ-व्यापार के माध्यम से सत्ता पर आई और २00-२५0 वर्षों तक सत्ता पर काबिज रही। यह बहुत भयानक स्थिति रही, इसको हम २००-२५० वर्षों तक समझ नहीं पाए। अब हमें समझना होगा और यह तभी सम्भव है जब हम इतिहास को देखेंगे एवं उसके अनुसार कार्य करेंगे। अपने को राष्ट्र का निर्माण करना है तो पीछे जहाँ से हैं बिल्कुल रास्ता बना हुआ है, बहुत ही अच्छा रास्ता बना हुआ है। आज राजनीति के जितने नेता-कर्णधार हैं उनको कहना चाहता हूँकि आप रोड का चक्कर छोड़ दीजिए मोड़ का चक्कर भी छोड़ दीजिए। आप को कोई खतरा नहीं होगा। जहाँ मोड़ होगा वहाँ पर खतरे होते हैं और गांधीजी की आवश्यकता पड़ती है। आप ऑख मींच कर भी जा सकते हैं, पर ऑख मींच कर नहीं चलना, नीचे देखकर के चलो, यह हम लोगों को भारतीय संस्कृति की विनम्रता है।   आप लोग एक दिन पूर्व में आए हैं, मैं समझता था कि कल ही प्रारंभ है लेकिन पत्रकारों ने कहा एक दिन पहले पत्रकार वार्ता चलती है, क्योंकि जो परोसने वाला होता है उसको पहले से ही तैयारी करनी होती है। हमने समझा सर्वप्रथम पत्रकारों को ही परोस दो ताकि यह लोग अच्छे ढंग से थाली दिखाएँ सब लोगों को और इसको मैं अच्छा, सभ्य मानता हूँ, क्योंकि जब तक भोजन को हर व्यक्ति के पास नहीं ले जाएँगे, तो उसका मूल्यांकन बहुत कठिन होगा। फिर भी भारत बहुत समझदार है, उसको इस हाल में लाया गया है। जैसे मंदी लाई जाती है ना। वस्तुत: मंदी लाई जाती है, मंदी आती नहीं। ऐसे घुमावदार कथानकों के माध्यम से, वस्तुओं के माध्यम से भारत को एक प्रकार से विपरीत दिशा में ले जाया गया और वे उसमें सफल हो गए। सफर ज्यादा दूर नहीं है, ७० वर्ष नहीं लगेंगे और मैं बार-बार कहना चाहता हूँ७० वर्ष नहीं लगेंगे, बल्कि बहुत कम समय में हमारी दृष्टि पूरब की ओर हो सकती है। पूर्व का अर्थ होता है-ठीक दिशा जहाँ से हम आए हैं-उस ओर जाएँ हम। इसके लिए अन्धा भी अपनी आँखों का प्रयोग करता है; समझे। अंधे को भी बता दो तुम्हारा मुख पश्चिम की ओर है, अब तुम्हें पूरब की ओर करना है। तो वह अपने अनुभव ज्ञान के अनुसार तत्काल घूमकर अपना मुख पूरब में कर लेता है। हमें पूरब की ओर जाने के लिए कोई दिशा पूछने की आवश्यकता नहीं। जिस रास्ते से हम आए हैं उस रास्ते को पूछने की आवश्यकता नहीं। जहाँ भटक जाते हैं, वहाँ हमें पूछने की आवश्यकता है। भारत को चाहिए कि किसी की पूछता के चक्कर में ना रहे। आप भी याद रखें, हमेशा-हमेशा इसको पूरब की ओर ही जाना है और फिर इसके उपरांत बहुत समय नहीं लगेगा। कुछ ही दिनों में हम उसका अनुभव कर सकते हैं। जो हमारे पास था-जो है, इस प्रकार अनुभव होगा जैसे सब कुछ बदल गया है। यद्यपि आप लोग कुण्डली को मानते हो या नहीं मानते हो, मैं नहीं समझता, लेकिन इंडिया के कारण भारत की कुण्डली बदल गई है। पुन: भारत को अपने रूप में लाने के लिए इंडिया को छोड़ना होगा, हमें किसी को हटाना नहीं है। हमें ईस्ट दिशा की ओर जाना है बस। किसी को हम उपेक्षा दृष्टि से नहीं देखेंगे, किन्तु हमारी अपेक्षा पूरब की है। हम किसी का विरोध नहीं कर रहे हैं, हम समर्थन नहीं करेंगे, क्योंकि हम पूर्व वाले पश्चिम का समर्थन कभी संस्कृति, आधार भिन्न-भिन्न हैं।   एक प्रश्न यह उठता है कि विरोध क्यों न किया जाए? तो हम पश्चिम का विरोध करके हम अपनी शक्ति को क्यों खोएं? हम तो बोध रखने वाले हैं और होश-हवास के साथ चलने वाले हैं किन्तु प्रमाद के कारण पूरा-पूरा परिवर्तन हो गया, भारत के इतिहास का। इसीलिए 'इंडिया' आ गया। 'इंडिया' नाम ही अपने आप में गड़बड़ है। इतना ही पर्याप्त समझता हूँ कि हमें भारत की पहचान के लिए घूमकरके विपरीत दिशा में अपना मुख करना है, और तब हमारे सामने जो भारत दिखेगा, वह भारत देखने योग्य है, महसूस करने योग्य है और उसमें कोई चिंता का विषय नहीं है। अपने पास सब कुछ भंडार हैं। चेतन का भी भंडार है, अचेतन का भी भंडार है। इतिहास का भी भंडार है, गणित का भी भंडार है। कोई भी इतिहास खोल करके आप एक बार देख लीजिए। जो कुछ भी विज्ञान है और तंत्र-ज्ञान है या कृषि-विज्ञान वह सब भारत से निकले हैं, भारत में ही ऐसा होता था। भारत तो खान है, बस खान को खोदने वाले की आवश्यकता है। इनमें मूर्धन्य विद्वान्, चिंतक और भारत के हितैषी सब कह रहे हैं, उनको हमें सुनना है, लेकिन उनकी सुनते हुए कोई शब्द खटकेगा; तो हम उसका उत्तर अवश्य देने का प्रयास करूंगा और भारतीय इतिहास के आधार पर देने का साहस अवश्य करूंगा। आप पत्रकारों से मेरा कहना है कि आप भी वही साहस के साथ इसका प्रकाशन अवश्य करें। मेरा कहना है आप डरिए नहीं, भारत कभी भी डरता नहीं है। जो वस्तु-स्थिति है उसको सबके सामने रखना चाहिए। आप दबकरके मत चलिए, दबंगता के साथ चलिए। जनता आपके साथ अवश्य रहेगी, लेकिन अखबार के साथ खबर अच्छी रखना चाहिए। खबर अच्छी का अर्थ स्वादिष्ट नहीं, सही रखना चाहिए। सही का समर्थन यदि आप लोग नहीं करेंगे तो कभी भी इस देश का उद्धार नहीं होने वाला है। आप एक मजबूत स्तंभ के रूप में हैं और इसकी बड़ी आवश्यकता है। आप लोग यहाँ आए हैं, आपके लिए जो कुछ बताना आवश्यक था वह बता दिया है।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    भारत स्वाभिमान : हमारी पहचान
  • स्वरूप सम्बोधन पच्चीसी

    स्वरूप सम्बोधन पच्चीसी   ज्ञानावरणादिक कर्मों से, पूर्णरूप से मुक्त रहे। केवल संवेदन आदिक से युक्त, रहे, ना मुक्त रहे ॥ ज्ञानमूर्ति हैं परमातम हैं, अक्षय सुख के धाम बने। मन वच तन से नमन उन्हें हो, विमल बने ये परिणाम घने ॥१॥   बाह्यज्ञान से ग्राह्य रहा पर, जड़ का ग्राहक रहा नहीं। हेतु-फलों को क्रमशः धारे, आतम तो उपयोग धनी॥ ध्रौव्य आय औ व्यय वाला है, आदि मध्य औ अन्त बिना। परिचय अब तो अपना कर लो, कहते हमको सन्त जना ॥२॥   प्रमेयतादिक गुणधर्मों से, अचिदात्मा यह होता है। तथा ज्ञानगुण दर्शन से तो, चिन्मय शाली होता है। अतः सचेतन तथा अचेतन, स्वभाव वाला आतम है। तत्त्वदृष्टि से भीतर देखो, पलभर में मिटता तम है ॥३॥   संज्ञा संख्या लक्षण द्वारा, आत्मज्ञान दो भिन्न रहे। किन्तु भिन्न ना प्रदेश उनके, अनन्य हैं, ना अन्य रहे॥ आत्म द्रव्य हो ज्ञान उसी का, त्रैकालिक गुण साथ रहे। आतम गाथा गाता आगम, यही हमें शिव-पाथ रहे ॥४॥   मात्र ज्ञान के रहा बराबर, आतम ऐसा मत समझो। तथा देह के रहा बराबर, समझो मानो मत उलझो॥ इसीलिए भी रहा सर्वगत, नहीं सर्वथा माना है। संत जमाना यही मानता, ज्ञानोदय का गाना है ॥५॥   नाना ज्ञानों की पर्यायों, को धारण करने से ही। एक रहा है अनेक भी है, कह ना सकते ऐसे भी॥ मात्र चेतना एक स्वभावी, होता है नि:शंक रहा। एकानेकात्मक आतम हो, यही न्याय अकलंक रहा ॥६॥   पर के गुणधर्मों से निश्चित, अवाच्य है माना जाता। अपने गुणधर्मों से सुनलो, अवक्तव्य ना कहलाता। इसीलिए एकान्त रूप से, वाच्य नहीं निज आतम है। वचन अगोचर नहीं सर्वथा, सन्तों का यह आगम है ॥७॥   अपने गुणधर्मों से आतम, अस्तिरूप से रंजित है। पर के गुणधर्मों से यह तो, नास्तिरूप से संचित है। बोधमूर्ति होने से सचमुच, मूर्तिक माना जाता है। किन्तु रहा विपरीत धर्म से, सदा अमूर्तिक भाता है॥८॥   इसविध बहुविध धर्मों को औ, बन्ध मोक्ष के कारण को। बन्ध मोक्ष को बन्ध मोक्ष के, फल को अघ के वारण को॥ आतम ही खुद धारण करता, निजी योग्यता यही रही। श्रद्धा ऐसी मति को करती, और चरित को सही सही ॥९॥   ज्ञात रहे यह नियम रहा, जो कर्मों का कर्ता होता। कर्म फलों का भी वह निश्चित, आतम होता है भोक्ता॥ उपादान औ निमित्तपन से, कर्मों का हो छुटकारा। होता है यह स्वभाव से ही, मन को दो अब फटकारा ॥१०॥   ज्ञान चरित दर्शन ये, तीनों समीचीन जब होते हैं। उपाय बनते आत्म सिद्धि के, कर्म कीच को धोते हैं। तथा तत्त्व में अचल अचल से, होना माना जाता है। आतम दर्शन दुर्लभतम है, आगम ऐसा गाता है ॥११॥   पदार्थ जिस विध उस विध उसको, जाननहारा ज्ञान सही। यथा प्रकाशित दीपक करता, निज को पर को भान सही॥ समीचीन यह ज्ञान कथंचित् , ज्ञप्ति क्रिया से भिन्न रहा। करण क्रिया से अभिन्न भी ना, नहीं सर्वथा भिन्न रहा ॥१२॥   ज्ञान तथा दर्शन गुण की जो, पर्यायें होती रहती। लहरें सी है लगातार हो, पीछे ना आगे बहती॥ उन पर सवार होकर यात्रा, पूरी अपनी करनी है। या सुख दुख में समता रखना, ममता तन की हरनी है ॥१३॥   जाननहारा देखनहारा साकारा हूँ अविकारा। सुख का अवसर या दुख का हो, एकाकी तन से न्यारा॥ इस विध चिंतन मंथन का जो, प्रवाह बहता है मन में। परमोत्तम सो चारित होता, विरले ही साधक जन में ॥१४॥   चिंतन मंथन मौनादिक, ये निशिदिन मन का जो रमना। मूल-भूत निज उपादान को, जागृत करना उपशमना॥ उचित देश में उचित काल में, उचित द्रव्य से तप तपना। निमित्तकारण बाह्य रहा सो, पूरण करता है सपना ॥१५॥   प्रमाद तजकर इन विषयों पर, विचारकर भरपूर सही। दुविधा में हो या सुविधा में, अपने बल को भूल नहीं॥ रागरंग से दूर रहा जो, रोष कोष से रहित रहा। आतम का अनुभव कर ले अब, और भाव तो अहित रहा ॥१६॥   कषाय कलुषित चित्त हुआ है, चिन्ता से जो आहत है। भूल कभी भी तत्त्वबोध में, होता ना अवगाहित है। नीलकण्ठ सम नील वसन पर, कुंकुम का वह रंग कभी। चढ़ सकता क्या? आप बता दो, तथ्य रहा यह व्यंग नहीं ॥१७॥   अतः मूलतः दोषों को यदि, उखाड़ना है आर्य महा। मोह भाव को प्रथम पूर्णतः, उजाड़ना है कार्य रहा॥ उदासीनता की धरती पर सुखासीन हो रहना है। तथा तत्त्व की गहराई में, खोना फिर क्या कहना है ॥१८॥   उपादेय सो कौन रहा है, और हेय वह कौन रहा। उचित रूप से सोच समझ ले, और और सो गौण अहा॥ हेय तत्त्व के आलम्बन को, पूर्णरूप से तजना है। उपाय का आलम्बन लेकर, उपादेय को भजना है ॥१९॥   पर में निज को, निज में पर को मत परखो तुम बचपन से। पर को परखो, परपन से तो, निज को निरखो निजपन से॥ विकल्पजालों संकल्पों से, सो ऊपर उठते उठते। जाओ जाओ अन्त अन्त तक, अनन्त सुख हो दुख मिटते ॥२०॥   सुनो मोक्ष की अभिलाषा भी, ना होती जिसके मन में। मोक्ष उसी को नियम रूप से, मिलता है इस जीवन में। इसविध सन्तों का कहना है, पालन उसका करना है। कहीं किसी की आकांक्षा से, नहीं भूलकर करना है ॥२१॥   चूंकि सुलभ है आतम में वह, अभिलाषा का उदय रहा। इसीलिए बस उसके चिंतन, में जुटता यह हृदय रहा॥ सुख भी तो फिर निज आतम, के सुनो तात! आधीन रहा। वहाँ यतन क्यों नहीं करोगे, मन क्यों होता दीन रहा ॥२२॥   पर को जानो मना नहीं है, किन्तु किसी से मोह नहीं। सही सही पहचानों निज को, सोना है सो लोह नहीं॥ अपने संवेदन में आता, स्वरूप अपना अपना है। सदा निराकुल केवल निज में, रहना बाहर सपना है ॥२३॥   अपने से अपने को अपने, द्वारा अपने लिए तथा। अपने में अपना अपना सो, लखना अपने आप यथा॥ इसी ज्ञान से इसी ध्यान से आनंदामृत का झरना। झर झर झर झरता झरता, मिटता फलतः चिर मरना ॥२४॥   आत्मतत्त्व का चिंतन इस विध, करता अन्तर बाहर से। इसको सुनता और सुनाता, औरों को जो आदर से॥ यथाशीघ्र परमार्थ संपदा, इस पर वह बरसाती है। ‘स्वरूप संबोधन पच्चीसी', उसकी बनती साथी है ॥२५॥

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    स्वरूप संबोधन पच्चीसी

    स्वरूप सम्बोधन पच्चीसी

    स्वरूप सम्बोधन पच्चीसी   आचार्य अकलंकस्वामी ने संस्कृत में २५ श्लोक प्रमाण ‘स्वरूप सम्बोधन' की रचना की। यह आध्यात्मिक रचना है। आचार्यश्री ने इसका हिन्दी पद्यानुवाद ३० मात्रा वाले छंद में ‘स्वरूप सम्बोधन पच्चीसी' नाम से किया, इसमें आत्मिक स्वभाव का वर्णन है। कवि ने रचनाकाल व स्थान का उल्लेख नहीं किया है। सम्भवतः इसकी रचना श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र तारंगाजी प्रवास के समय हुई है।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    स्वरूप संबोधन पच्चीसी

    पञ्चमहागुरुभक्ति

    पञ्चमहागुरुभक्ति (चौपाई)   सुरपति शिर पर किरीट धारा जिसमें मणियाँ कई हजारा। मणि की द्युति-जल से धुलते हैं प्रभु पद-नमता सुख फलते हैं ॥१॥   सम्यक्त्वादिक वसु-गुण धारे वसु-विध विधि-रिपु नाशन-हारे। अनेक-सिद्धों को नमता हूँ इष्ट-सिद्धि पाता समता हूँ ॥२॥   श्रुत-सागर को पार किया है शुचि संयम का सार लिया है। सूरीश्वर के पदकमलों को शिर पर रख लूँ दुख-दलनों को ॥३॥   उन्मार्गी के मद-तम हरते जिनके मुख से प्रवचन झरते। उपाध्याय ये सुमरण कर लूँ पाप नष्ट हो सु-मरण कर लूँ ॥४॥   समदर्शन के दीपक द्वारा सदा प्रकाशित बोध सुधारा ॥ साधु चरित के ध्वजा कहाते दे-दे मुझको छाया तातैं ॥५॥   विमल गुणालय-सिद्धजिनों को उपदेशक मुनि-गणी गणों को ॥ नमस्कार पद पञ्च इन्हीं से त्रिधा नमूँ शिव मिले इसी से ॥६॥   नमस्कार वर मन्त्र यही है पाप नसाता देर नहीं है। मंगल-मंगल बात सुनी है आदिम मंगल-मात्र यही है॥७॥   सिद्ध शुद्ध हैं जय अरहन्ता गणी पाठका जय ऋषि संता। करे धरा पर मंगल साता हमें बना दें शिव सुख धाता ॥८॥   सिद्धों को जिनवर चन्द्रों को गणनायक पाठक वृन्दों को। रत्नत्रय को साधु जनों को वन्दूँ पाने उन्हीं गुणों को ॥९॥   सुरपति चूड़ामणि-किरणों से लालित सेवित शतों दलों से। पाँचों परमेष्ठी के प्यारे पादपद्म ये हमें सहारे ॥१०॥   महाप्रातिहार्यों से जिनकी शुद्ध गुणों से सुसिद्ध गण की। अष्ट-मातृकाओं से गणि की शिष्यों से उपदेशक गण की ॥ वसु विध योगांगों से मुनि की करूँ सदा थुति शुचि से मन की॥११॥   अञ्चलिका   पञ्चमहागुरु भक्ति का करके कायोत्सर्ग। आलोचन उसका करूँ ले प्रभु तव संसर्ग ॥१२॥   (ज्ञानोदय छन्द)   लोक शिखर पर सिद्ध विराजे अगणित गुणगण मण्डित हैं। प्रातिहार्य आठों से मण्डित जिनवर पण्डित-पण्डित हैं॥ आठों प्रवचन-माताओं से शोभित हों आचार्य महा। शिव पथ चलते और चलाते औरों को भी आर्य यहाँ ॥१३॥   उपाध्याय उपदेश सदा दे चरित बोध का शिव पथ का। रत्नत्रय पालन में रत हो साधु सहारा जिनमत का ॥   भाव भक्ति से चाव शक्ति से निर्मल कर-कर निज मन को। वंन्दूँ पूजूँ अर्चन कर लूँ नमन करूँ मैं गुरुगण को ॥१४॥   कष्ट दूर हो कर्म चूर हो बोधि लाभ हो सद्गति हो। वीर-मरण हो जिनपद मुझको मिले सामने सन्मति ओ!॥   समय व स्थान परिचय   गगन चूमता शिखर है भव्य जिनालय भ्रात। विघन-हरण मंगलकरण महुवा में विख्यात ॥१॥   बहती कहती है नदी ‘पूर्णा' जिसके तीर। पार्श्वनाथ के दर्श से दिखता भव का तीर ॥२॥   गन्ध गन्ध गति गन्ध की सुगन्ध दशमी योग। अनुवादित ये भक्तियाँ पढ़ो मिटे सब रोग ॥३॥   पूर्णा नदी के तट पर अवस्थित श्री विघ्नहर पार्श्वनाथ की मनोहारी प्रतिमा के लिए सुप्रसिद्ध श्री विघ्नहर पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र महुवा (सूरत) गुजरात में वर्षायोग के दौरान भाद्रपद शुक्ल सुगन्ध दशमी वीर निर्वाण संवत् २५२२, वि. सं. २०५३ तदनुसार २२ सितम्बर १९९६ को भक्तियों का यह पद्यानुवाद सम्पन्न हुआ।   यहाँ ज्ञातव्य है कि नन्दीश्वर भक्ति का पद्यानुवाद आचार्य श्री जी द्वारा बहुत पहले किया जा चुका था।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    भक्ति पाठ
  • पाठ्यक्रम 16ब - संसार अथवा मुक्ति का कारण - ध्यान

    किसी एक विषय पर मन को केन्द्रित करना ध्यान है। ध्यान के चार भेद हैं - 1. आर्तध्यान 2. रौद्रध्यान 3. धम्र्यध्यान 4. शुक्लध्यान   इनमें आदि के दो ध्यान अशुभ हैं उनसे पाप का बंध होता है। शेष ध्यान शुभ हैं, उनके द्वारा कर्मों का नाश होता है। आर्तध्यान - आर्त का अर्थ है पीड़ा, पीड़ा में कारणभूत ध्यान आर्तध्यान है। शरीर का क्षीण हो जाना, कान्ति नष्ट हो जाना हाथों पर कपोल रख पश्चाताप करना, आँसू बहाना इत्यादि और भी आर्तध्यान के बाह्य चिह्न हैं। आर्तध्यान के चार भेद - इष्ट वियोगज आर्तध्यान - अपने प्रिय पुत्र, स्त्री और धनादिक के वियोग होने पर उनकी प्राप्ति के लिए संकल्प अर्थात् निरन्तर चिन्तन करना इष्ट वियोगज नाम का आर्तध्यान है। अनिष्ट संयोगज आर्तध्यान - दुखकारी विषयों का संयोग होने पर यह कैसे दूर हो, इस प्रकार विचारते हुए विक्षिप्त चित्त हो चेष्टा करना अनिष्ट संयोगज नाम का आर्तध्यान है। पीड़ा चिन्तन आर्तध्यान - वातादि विकार जनित शारीरिक वेदना के होने पर उसे दूर करने के लिए सतत् चिन्ता करना पीड़ा चिन्तन आर्तध्यान है। निदान आर्तध्यान - पारलौकिक विषय सुख की आसक्ति से, भविष्य में धन-वैभव आदि प्राप्ति के लिए सतत् चिन्तन करना निदान नाम का आर्तध्यान है।   2. रौद्रध्यान - रुद्र का अर्थ क्रूर आशय है इसका कर्म या इसमें होने वाला भाव रौद्रध्यान है। रौद्रध्यान के चार भेद - हिंसानन्द रौद्र ध्यान - तीव्र कषाय के उदय से हिंसा में आनंद मानना हिंसानन्द रौद्रध्यान है, जैसे जीवों के समूह को अपने द्वारा अथवा अन्य के द्वारा मारे जाने पर हर्ष मनाना (टी.व्ही. आदि में चित्र देखकर भी), हार-जीत सम्बन्धी भावना करना, बैरी से बदला लेने की भावना। मृषानन्द रौद्रध्यान - अनेक प्रकार की युक्तियों के द्वारा दूसरों को ठगने के लिए झूठ बोलने का भाव करते हुए आनन्दित होना मृषानन्द नाम का रौद्रध्यान है। जैसे-छल-कपट, मायाचार द्वारा धन लूटना आदि। चौर्यानन्द रौद्रध्यान - दूसरे के धन को हरण करने का, चिन्तन करना चौर्यानन्द नाम का रौद्रध्यान है। चोरी आदि कार्यों में आनन्द मनाना इसी का रूप है। विषय संरक्षणानन्द रौद्रध्यान - अपने परिग्रह में यह मेरा परिग्रह है। उसकी रक्षा के लिए संकल्प का बार-बार चिंतन करना विषय संरक्षणानन्द नाम का रौद्रध्यान है। क्रूर चित्त होकर बहुत आरम्भ-परिग्रह की रक्षा में मन लगाना, इसी ध्यान का रूप है।   3. धम्र्यध्यान - रागद्वेष को त्याग कर अर्थात् साम्य भाव से जीवादिक पदार्थों का वे जैसे-जैसे अपने स्वरूप में स्थित हैं, वैसेवैसे ध्यान या चिन्तन करना धर्मध्यान है। पूजा, दान, विनय आदि करना, धर्म से प्रेम करना, चित्त स्थिर रखना आदि धर्मध्यान के बाह्य चिह्न हैं। धर्मध्यान के चार भेद - आज्ञा विचय धर्मध्यान - वीतराग सर्वज्ञ प्रणीत आगम को प्रमाण मान करके यह ऐसा ही है इसी श्रद्धान द्वारा अर्थ का पदार्थ का निश्चय करना आज्ञाविचय धर्मध्यान है। जैसे - पृथ्वी आदि जीव हैं। अपाय विचय धर्मध्यान - दूसरों का दु:ख दूर हो जावे ऐसा निरन्तर चिन्तन करना अपायविचाय धर्मध्यान है। विपाक विचय धर्मध्यान - पुण्य पाप के फल रूप सुखदु:ख का विचार करना, विपाक विचय धर्मध्यान है। जैसेगरीब और अमीर व्यक्ति को देख पूर्वकृत पाप-पुण्य का चिन्तन करना । संस्थान विचय धर्मध्यान - तीनों लोक के आकार आदि का चिन्तन करना संस्थान विचय धर्मध्यान है।   4. शुक्लध्यान - ध्यान करते हुए साधु के बुद्धिपूर्वक राग समाप्त हो जाने पर जो निर्विकल्प समाधि प्रकट होती है, उसे शुक्ल ध्यान कहते हैं। शुक्ल ध्यान के चार भेद - पृथकत्व वितर्क वीचार शुक्ल ध्यान - श्रुतज्ञान का आलम्बन लेकर विविध दृष्टियों से विचार करता है और इसमें अर्थ व्यञ्जन तथा योग का संक्रमण (परिवर्तन) होता रहता है। अत: इसका नाम पृथक्त्व वितर्क वीचार शुक्ल ध्यान है। एकत्व वितर्क अवीचार शुक्ल ध्यान - श्रुत के आधार से किसी एक द्रव्य या पर्याय का चिन्तन करना एकत्व वितर्क अवीचार नाम का शुक्लध्यान कहलाता है। सूक्ष्म क्रिया आप्रतिपाती शुक्ल ध्यान - कार्य वर्गणा के निमित से आत्मप्रदेशों का अति सूक्ष्म परिस्पन्दन शेष रहने पर सूक्ष्मक्रिया अप्रतिपाति ध्यान होता है। व्युपरत क्रिया निवृति शुक्ल ध्यान - काय वर्गणा के निमित्त से होने वाले आत्मप्रदेशों का अतिसूक्ष्म परिस्पंदन भी शेष नहीं रहने पर और आत्मा के सर्वथा निष्प्रकम्प होने पर व्युपरत क्रिया निवृत्ति शुक्लध्यान होता है।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    स्वध्याय पाठ

    पाठ्यक्रम 23अ - सच्चे सुख का एक मात्र साधन - सम्यक ज्ञान

    जो ज्ञान वस्तु के स्वरूप को न्यूनता रहित तथा अधिकता रहित, विपरीतता रहित, जैसा का तैसा, सन्देह रहित जानता है, उसे सम्यक् ज्ञान कहते हैं।   सम्यक् ज्ञान के आठ अंग होते है :- १. कालाचार, २. विनयाचार, ३. उपधान, ४. बहुमान, ५. अनिहनव ६. अर्थ ७. शुद्धि, ८. व्यञ्जन शुद्धि एवं ९. अर्थ-व्यञ्जन (तदुभय) शुद्धि।   कालाचार - आगम में वर्णित स्वाध्याय के काल में ही अध्ययन करना 'कालाचार' कहलाता है। जैसे सन्धिकालों में, अष्टमी - चतुर्दशी आदि पर्व के दिनों में, सूर्यग्रहण चन्द्रग्रहण के काल में, अतिवृष्टि के साथ उल्कापात होने के काल में सिद्धान्त ग्रन्थों का अध्ययन नहीं करना। परन्तु ऐसे समयों में भी अनुप्रेक्षात्मक स्वाध्याय कर सकते हैं। विनयाचार - मन-वचन-काय से शास्त्र का विनय करना, आलस्य रहित होकर ज्ञान का ग्रहण करना अभ्यास और चिन्तन करना, जिनवाणी को उच्चासन पर विराजमान करना, शास्त्र पर वेष्टन लगाना, काय शुद्धि यानि हाथ-पैर धोकर ही ग्रन्थ को स्पर्श करना आदि 'विनयाचार' है। उपधान - स्वाध्याय प्रारंभ करने से लेकर पूर्ण होने तक खाद्य पदार्थ, भोगोपभोग आदि सामग्री का त्याग करना, विशेष नियम उपवासादि का नियम करना 'उपधान अंग' है। बहुमान – कर्म निर्जरा के हेतु, आचार्यां की वाणी का पूजा सत्कारादि से पाठ करना अर्थात् मंगलाचरण पूर्वक पवित्रता से हाथ जोड़कर, मन को एकाग्र कर, बड़े आदर के साथ ग्रंथों का स्वाध्याय करना 'बहुमान' नामक अंग है। अनिहनव - अपने पढ़ाने वाले गुरु का तथा पढ़े हुए शास्त्र का नाम नहीं छिपाना, उसको सबके समक्ष प्रगट करना 'अनिहनव" नामक सम्यक् ज्ञान का अंग है। अर्थ शुद्धि - अर्थ शब्द का भाव शब्दोच्चारण के होने पर मन में जो अभिप्राय उत्पन्न होता है वह है। अत: संशय, विपर्यय, अनध्यवसायादि दोषों से रहित गणधरादि द्वारा रचित सूत्र के अर्थ का निरूपण करना 'अर्थ शुद्धि' है। व्यञ्जन शुद्धि - उच्च उच्चार के समय उच्च उच्चारण करना एवं हृस्व उच्चार के समय हुस्व उच्चारण करना, वर्ण, पद वाक्य को शुद्ध पढ़ना 'व्यञ्जन शुद्धि' है। अर्थ-व्यञ्जन (तदुभय) शुद्धि - अर्थ शुद्धि और व्यञ्जन शुद्धि दोनों का पालन करते हुए स्वाध्याय करना अर्थात् व्यञ्जन की शुद्धि और उसके वाच्य, अभिप्राय की जो शुद्धि है वह अर्थ-व्यञ्जन नामा तदुभय शुद्धि है। सम्यक् ज्ञान पाँच प्रकार का है :- मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान मन:पर्यय ज्ञान और केवल ज्ञान।   मतिज्ञान पाँच इन्द्रियों और मन से जो पदार्थ का ग्रहण होता है, उसे मति ज्ञान कहते है। यह मतिज्ञान अवग्रह, ईहा, आवाय और धारणा के भेद से चार प्रकार का है । अवग्रह मतिज्ञान - पदार्थ और इन्द्रिय का सम्बन्ध होने पर सर्वप्रथम दर्शन होता है उसके पश्चात् जो पदार्थ का ग्रहण होता है वह अवग्रह कहलाता है। जैसे चक्षु इन्द्रिय के द्वारा 'यह शुक्ल (सफेद) रूप है' ऐसा ग्रहण करना अवग्रह है। ईहा मतिज्ञान - अवग्रह के द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थों में विशेष धर्म, गुण आदि जानने की इच्छा होना 'ईहा' है। जैसे ग्रहण किया शुल्क रूप ध्वजा है अथवा कोई पक्षी है इत्यादि। आवाय मतिज्ञान - ईहा से जाने गये पदार्थ में सन्देह दूर हो कर निर्णयात्मक, यथार्थ ज्ञान होना 'आवाय' है। जैसे यह ऊपर नीचे हो रहा है आगे बढ़ रहा है अत: श्वेत पक्षी ही है। धारणा मतिज्ञान - आवाय से निर्णीत पदार्थ को कालान्तर में नहीं भूलने रूप 'धारणा' मतिज्ञान है।   श्रुतज्ञान इन्द्रिय से ग्रहण किये गए विषय से विषयान्तर का ज्ञान श्रुतज्ञान कहलाता है। जैसे आँखों से नीला पेन देखा यह मतिज्ञान, यह पेन किस कम्पनी का है। यह किस काम आता है इसमें कौन सी स्याही है इत्यादि का ज्ञान श्रुतज्ञान कहलाता है।   अवधिज्ञान जो ज्ञान इन्द्रिय और मन की सहायता के बिना, द्रव्य-क्षेत्रकालभाव की मर्यादा को लिये रूपी पदार्थों को स्पष्ट जानता है उसे अवधिज्ञान कहते हैं। इस अवधिज्ञान के छह भेद हैं :- (1) अनुगामी, (2) अननुगामी, (3) वर्धमान (4) हीयमान, (5) अवस्थित तथा (6) अनवस्थित।   जी अवधिज्ञान अपने स्वामी (जीव) के साथ क्षेत्र से क्षेत्रान्तर, भव से भवान्तर जावे, उसे 'अनुगामी अवधिज्ञान' कहते हैं। जो अपने स्वामी के साथ न जावे, उसी क्षेत्र में ही छूट जावे उसे 'अननुगामी अवधिज्ञान' कहते हैं। जो शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह अपने अन्तिम स्थान तक बढ़ता जाय उसे 'वर्धमान अवधिज्ञान' कहते हैं। जो कृष्ण पक्ष के चन्द्रमा की तरह अपने अन्तिम स्थान तक घटता जाय उसे 'हीयमान अवधिज्ञान' कहते हैं। जो सूर्यमण्डल के समान न घटे, न बढ़े, उसे 'अवस्थित अवधिज्ञान' कहते हैं। जो चन्द्रमण्डल की तरह कभी घटे और कभी बढ़े उसे 'अनवस्थित अवधिज्ञान' कहते हैं।   मनः पर्यय ज्ञान जो इन्द्रियादिक बाहय निमित्तों की सहायता के बिना ही दूसरे के मन में स्थित चिन्तित, अचिन्तित अथवा अर्ध चिन्तित अर्थात भूतकाल में जिसका चिन्तन किया हो, जिसका भविष्य काल में चिन्तन किया जायेगा अथवा वर्तमान में जिसका चिन्तन किया जा रहा है। ऐसे रूपी पदार्थ को स्पष्ट जानता है उसे मन: पर्यय ज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान अढ़ाई द्वीप में अर्थात मनुष्यलोक में मुनियों को ही होता है।   केवल ज्ञान  जो समस्त द्रव्य और उनकी समस्त पर्यायों को वर्तमान पर्याय की तरह स्पष्ट जाने उसे केवलज्ञान कहते हैं। उपरोक्त पाँच ज्ञानों में प्रथम तीन ज्ञान मति, श्रुत और अवधिज्ञान मिथ्यादृष्टि जीवों के आश्रय से मिथ्या भी होते हैं। इन मिथ्याज्ञानों को कुमति, कुश्रुत एवं कुअवधि (विभंग) ज्ञान कहा जाता है।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    स्वध्याय पाठ

    पाठ्यक्रम 28द - दिग. जैन मुनि की चर्या का प्रतिपादक ग्रन्थ- मूलाचार

    वट्टकेरस्वामीकृत मूलाचार दिगम्बर सम्प्रदाय में मुनिधर्म के लिये सर्वोपरि प्रमाण माना जाता है। कहीं-कहीं यह ग्रन्थ कुन्द कुन्दाचार्यकृत भी कहा गया है। इसमें १२ अधिकार और १२५२ गाथायें है। १.मूलगुण अधिकार २. बृहत् प्रत्याख्यान संस्तव अधिकार ३. प्रत्याख्यान अधिकार ४. सम्यक्आचार अधिकार ५. पंचाचार अधिकार ६. पिण्ड शुद्धी अधिकार ७. षट् आवश्यक अधिकार ८. अनगार भावना अधिकार ९. द्वादशानुप्रेक्षा अधिकार १०. समयसार अधिकार ११. षट्पर्याप्ति अधिकार १२. शीलगुण अधिकार।   पहले मूलगण अधिकार में मुनि के अट्ठाईस मूलगुणों का निरूपण किया है। बृहत्प्रत्याख्यानसंस्तव अधिकार में दर्शनाराधना आदि चार आराधनाओं का कथन किया गया है। प्रत्याख्यानाधिकार में सिंह, व्याघ्र आदि के द्वारा आकस्मिक मृत्यु उपस्थित होने पर कषाय और आहार का त्यागकर समताभाव धारण करने का निर्देश किया है। सम्यक्आचाराधिकार में दश प्रकार के आचारों का वर्णन है। आर्यिकाओं के लिये भी विशेष नियम वर्णित है। पंचाचाराधिकार में दर्शनाचार, ज्ञानाचार आदि पाँच आचारों और उनके प्रभेदों का विस्तार सहित वर्णन है। पिण्डशुद्धि अधिकार में एषणा समिति, आहारयोग्य काल, भिक्षार्थगमन करने की प्रवृत्ति-विशेष आदि का भी वर्णन आया है। सप्तम पडावश्यकाधिकार में कृति कर्म, कार्यात्सर्ग के दोष आदि का वर्णन है। आठवें अनगारभावनाधिकार में लिंग, व्रत, वसति, विहार, भिक्षा, ज्ञान, शरीर, संस्कारत्याग, वाक्य, तप और ध्यानसंबंधी शुद्धियों के पालन पर जोर दिया गया है।  नवम द्वादशानुप्रेक्षाधिकार में अनित्य आदि अनुप्रक्षाओं के चिन्तन का वर्णन है। दशम समयसाराधिकार में तप, ध्यान, प्रतिक्रमण, प्रतिलेखनक्रिया विभिन्न प्रकार की शुद्धियों का निरुपण आया है। बारहवें शीलगुणाधिकार में शीलों के उत्पत्ति क्रम आलोचना के दोष, गुणों की उत्पत्ति प्रकार संख्या और प्रस्तार के निकालने की विधि का विस्तारपूर्वक वर्णन आया है। इस महाग्रन्थ में मुनि के आचार का बहुत ही विस्तृत एवं सुन्दर वर्णन किया गया है। यतिधर्म को अवगत करने के लिये एक स्थान पर इससे अधिक सामग्री का मिलना दुष्कर है।   दिग. जैन श्रावक की चर्या का प्रतिपादक ग्रन्थ- रत्नकरण्डश्रावकाचार ईसा की द्वितीय शताब्दी में आचार्य समन्तभद्र स्वामी द्वारा श्रावक के जीवन और आचार की व्याख्या करते हुए १५० पद्यों की रचना संस्कृत भाषा में की गई। इस ग्रन्थ में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्रचारित्र का विवेचन करते हुए सलेखना को भी श्रावकों के व्रतों में स्थान दिया है। इसका दूसरा नाम समीचीन धर्मशास्त्र भी है। इस ग्रन्थ पर प्रभाचन्द्र आचार्य द्वारा संस्कृत टीका एवं अनेक विद्वानों द्वारा हिन्दी टीका भी लिखी गई है।

    संयम स्वर्ण महोत्सव
    संयम स्वर्ण महोत्सव
    स्वध्याय पाठ
  • Past Food , भारतीय रसोई, जैन रसोई

    शुद्ध शकाहारी जैन भोजन, व्यंजन विधि के लिए भारतीय रसोई प्रस्तुतकर्ता - वैशाली जैन प्रेरणा एवं आशीर्वाद : संत शिरोमणि आचार्यश्री १०८ विद्यासागर जी महाराज

    हथकरघा

    हथकरघा उद्योग। ---नौकर नहीं मालिक बनो यदि आपको अभी तक कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली है अथवा आप अपनी नौकरी से निराश हैं और अपने स्वाभिमान को बनाये रखने के लिए कुछ ऐसा कार्य करना चाहते हैं जो आपके लिए और देश के लिए लाभकारी हो तो आप हथकरघा योजना से जुड़ सकते हैं।  यह योजना मध्य प्रदेश के बीना बारहा क्षेत्र में चल रही है।  इस योजना के अंतर्गत आपको 6 महीने की ट्रेनिंग द्वारा हथकरघा से कपडा निर्माण करना सिखाया जायेगा। इन 6 माह में आपको 9000 प्रति माह आय के रूप में दिया जायेगा। 6 माह बाद इस आय को आप अपना करघा लगाने के लिए उपयोग कर सकते हैं ।  आवास और भोजन की सुविधा भी वहीँ रहेगी। इस योजना से जुड़कर आप अपना कपडा निर्माण करके आगे चलकर प्रति माह 40000 से 50000 तक की आय कर सकते हैं।  देश में बढ़ती हुई बेरोजगारी, पूँजी के अभाव में व्यापार के घटते अवसरों को देखते हुए आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से युवाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए एक योजना है । कुण्डलपुर में अक्षय तृतीया 9 मई का हथकरघा की नई शाखा का शुभारम्भ आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज के ससंघ सानिध्य में होने जा रहा है जिसकी चयन प्रक्रिया के अंतर्गत दिनांक 4 मई 2016 को साक्षात्कार होना है।आप अथवा आपकी जानकारी में जो भी युवा इस योजना से जुड़ना चाहते हैं कृपया इस नंबर पर संपर्क करें: 

    दयोदय महासंघ

    अहिंसा प्रधान भारत देश में हिंसा का तांडव बढ़ ही रहा है | २०१२-१३ में भारत से १८.९ लाख टन मांस का निकास हुआ था , जो २००९ की अपेक्षा तीन गुना था | हमें यह कैसे मान्य हो सकता है कि जिस धरती को भगवान महावीर ने अपने अहिंसा के उपदेश से सिंची हो, वही धरती आज गौमाता और अन्य निरीह पशु के खून से रंगी जा रही हो ! कम से कम हमारा देश तो मांस के गिनौने व्यापार से निवृत्त हो जाए, यह हम सभी अवश्य चाहेंगे | मांस निर्यात के विरोध में आप भी अपनी सहमती दर्ज कराकर कमसे कम १०० और लोगो तक यह बात पहुचायें और उनकी भी सहमति एक पत्र पर लेकर दयोदय महासंघ के कार्यालय पहूँचायें | यदि १ करोड़ हस्ताक्षर से एक वर्ष में १ करोड़ गाय बचती हैं तो प्रत्येक फॉर्म भरने वाले को आजीवन १ वर्ष में १ गाय बचाने का (१ गौ दान ) का फल मिलेगा |

    शांतिधारा

    शुद्ध दुग्ध उत्पादन

    भाग्योदय तीर्थ धर्मार्थ न्यास

    आपके स्वस्थ भविष्य के लिए हृदयालय धर्मालय चिकित्साल्य महाविद्यालय

    पूरी मैत्री

    शुद्ध खाद्य पदार्थ

  • Our picks

    • “विद्या तरु/विद्या-वाटिका” अभियान
      भारत का प्रत्येक जैन तीर्थ हो हरा-भरा
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    • संयम स्वर्ण महोत्सव प्रतियोगिता 1 से  15 जुलाई 2018
    • Most Jain Monasticism bestowed by a Muni
      The world record of "most Jain monasticism bestowed by a muni" has been achieved by  Maha Manishi Santshiromani Digambar  Jainacharya  Shri Vidyasagar ji Mahamuniraj  From India
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    • ◼संयम स्वर्णिम कीर्ति स्तम्भ लोकार्पण समारोह - अजमेर 30 जून 2018◼
      परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के दीक्षा के 50 वर्ष पूर्ण होने पर उनकी दीक्षा स्थली अजमेर में परम पूज्य मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद एवं प्रेरणा से संस्थापित 71 फुट ऊंचा भव्य कीर्ति स्तंभ जैन समाज के श्रेष्ठी पाटनी परिवार आर के मार्बल्स ग्रुप द्वारा इस कीर्ति स्तम्भ का पुण्यार्जन किया गया ।
       
      कीर्ति स्तम्भ के साथ अन्य  लोकार्पर्ण 
      बड़ा दड़ा संयम स्वर्ण भवन का भी लोकार्पर्ण हुआ  डाक टिकिट भी जारी किया गया  आचार्य श्री के हायकू एवं विचार्रों पर विशेष  डायरी   
       
      📵इस सम्पूर्ण कार्यक्रम को यहां देखें 📵
       
       
       
       
       
       
       
      समाज में आरके मार्बल जैसे परिवार की जरुरत-जैन मुनि सुधासागर। नारेली तीर्थ का मुख्य द्वारा आचार्य विद्यासागर महाराज के नाम से बनेगा। स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल होगा जीवन चरित्र
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      30 जून को अजमेर के महावीर सर्किल के निकट पंचायत बड़ धड़ा की नसिया के परिसर में आचार्य विद्यासागर महाराज के 71 फिट ऊंचे कीर्ति स्तंभ का लोेकार्पण जैन मुनि सुधासागर महाराज ने किया। इसी स्थान पर 50 वर्ष पूर्व आज के दिन ही बालक विद्यासागर ने आचार्य ज्ञान सागर महाराज से दीक्षा ग्रहण की थी। इस स्तंभ पर कोई 2 करोड़ रुपए की राशि खर्च हुई है। कीर्ति स्तंभ का सम्पूर्ण निर्माण कार्य आरके मार्बल और वंडर सीमेंट के मालिक अशोक पाटनी की ओर से करवाया गया है। इसलिए लोकार्पण समारोह में पाटनी परिवार के सदस्यों का अभिनंदन भी किया गया। सुधासागर महाराज ने कहा कि पैसा तो बहुत लोगों के पास होता है। लेकिन ऐसे लोग कम होते हैं जो धर्म के कार्यों पर खर्च करते है। आचार्य विद्या सागर महाराज के कीर्ति स्तंभ का निर्माण कर अशोक पाटनी ने अजमेर के धार्मिक महत्व को और बढ़ाया है। आज समाज में पाटनी परिवार जैसों की जरुरत है। अशोक पाटनी ने बिना कहे कीर्ति स्तंभ का निर्माण कर समाज के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया है। अब अजमेर आने वाले लोग इस कीर्ति स्तंभ का अवलोकन भी करेंगे। इस अवसर पर पाटनी का कहना रहा कि मैं आज जो कुछ भी हंू उसके पीछे आचार्य विद्यासागर महाराज और जैन मुनि सुधासागर महाराज का आशीर्वाद है।
       
      नारेली तीर्थ का द्वारः

      समारोह में अजमेर प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेड़ा ने घोषणा की कि नारेली तीर्थ स्थल का मुख्य द्वार आचार्य विद्या सागर महाराज के नाम पर बनाया जाएगा। द्वार के निर्माण का कार्य प्राधिकरण करेगा। वहीं स्कूली शिक्षा मंत्री देवनानी ने कहा कि अगले शिक्षा सत्र में आचार्य विद्यासागर महाराज की जीवनी को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा।
      एस.पी.मित्तल) (30-06-18)
       
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    • 🗓३० जून २०१८, शनिवार🗓
      ⛳आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के ५० वे दीक्षा संयम स्वर्ण महोत्सव के उपलक्ष्य में समस्त पाटनी परिवार (आर के मार्बल्स) द्वारा 
      ⛳फव्वारा सर्किल स्थित बड़े धड़े की नसियां, जिला अजमेर, राजस्थान में⛳
      🗼६५ फीट ऊँचे कीर्तिस्तम्भ का निर्माण कराया गया है🗼
      🗼इस कीर्तिस्तम्भ का लोकार्पण
      ⛳मुनिश्री सुधासागर जी महाराज
      ⛳मुनिश्री महासागर जी महाराज
      ⛳मुनिश्री निष्कम्पसागर जी महाराज
      ⛳क्षुल्लकश्री गंभीरसागर जी महाराज
      ⛳क्षुल्लकश्री धैर्यसागर जी महाराज
      के पावन सानिध्य में 
      श्री कंवरीलाल जी पाटनी, श्री अशोक जी पाटनी, श्री सुरेश जी पाटनी, श्री विमल जी पाटनी, एवं समस्त पाटनी परिवार और अन्य गणमान्य श्रावकों द्वारा ३० जून २०१८, शनिवार को किया जाएगा
      🗼कीर्तिस्तम्भ की विशेषता🗼
      ⛳यह कीर्तिस्तम्भ आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज की दीक्षाभूमि पर स्थित है
      ⛳इस कीर्तिस्तम्भ पर आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के जन्म से लेकर बाल्यकाल, किशोरावस्था, दीक्षा एवं संयम जीवन के अनेक जीवन वृतांत पत्थर में उत्कीर्ण किए गए हैं
      ⛳इस कीर्तिस्तम्भ पर आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज द्वारा शिष्यों को दी गई दीक्षा के दृश्यों को भी पत्थर में तराशा गया है
      ⛳इस कीर्तिस्तम्भ पर आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज का पूर्ण जीवन परिचय भी तराशकर लिखा गया है 
      ⛳यह कीर्तिस्तम्भ मुनिश्री सुधासागर जी महाराज की प्रेरणा और आशीर्वाद से बनाया गया है
      ⛳इस कीर्तिस्तम्भ पर अद्वितीय नक्काशी और शिल्पकला का सृजन किया गया है 
      ⛳यह कीर्तिस्तम्भ भारत का सबसे ऊँचा कीर्तिस्तम्भ है
      ⛳ इस कीर्तिस्तम्भ की नींव (फ़ाइल फाउंडेशन) जमीन के नीचे ४५ फीट तक है
      ⛳यह कीर्तिस्तम्भ बयाना भरतपुर के बंसी पहाड़पुर के पत्थर (पिंक स्टोन) से बनाया गया है
      ⛳इस कीर्तिस्तम्भ के निर्माण में एक वर्ष का समय लगा
      🗼आप सभी श्रावक इस कीर्तिस्तम्भ के लोकार्पण के कार्यक्रम में सहभागी होकर पुण्यार्जन करें🗼
      👏🏽💐हम समस्त पाटनी परिवार के इस पुण्य कार्य की अनुमोदना करते हैं एवं समस्त पाटनी परिवार को 💎जिनशासन संघ💎 की ओर से शुभकामनाएं और बधाई 💐👏🏽
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