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  2. 22 फरवरी, गुरुवार - परम पूज्य आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का भव्य मंगल प्रवेश आज दोपहर बाद, सन्मति विहार, बिलासपुर में होने जा रहा है। बिलासपुर में आयोजित बेदी प्रतिष्ठा महोत्सव में पूज्य आचार्यसंघ का परम सानिध्य मिलेगा। आयोजन के प्रतिष्ठाचार्य होंगे ब्र. श्री सुनील भैया जी। चर्चा है कि बेदी प्रतिष्ठा उपरांत आचार्यश्री जी अमरकंटक तीर्थ की ओर मंगल विहार करेंगे एवम 3 मार्च को अमरकंटक में प्रवेश संभावित है।
  3. ४-०४-२०१६ बड़ोदिया (बाँसवाड़ा राजः) अध्यात्म जगत् के यशस्वी साधक गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में नमोस्तु करता हूँ.... हे गुरुवर आपकी साधना, ज्ञानाराधना, प्रवचनामृत, जिज्ञासा-समाधान एवं वृद्धावस्था में भी अद्वितीय-अनुपम कार्य करने के कारण समाजजन आपसे बेहद प्रभावित थे। इस कारण अखबारनवीस आपके अनोखे समाचार से पाठकों को आश्चर्यचकित करते रहते थे और अपने अखबार के पाठक बढ़ाते रहते थे। इस सम्बन्ध में मुझे इन्दरचंद जी पाटनी (महामंत्री दिगम्बर जैन महासंघ, अजमेर) ने कुछ अख़बारों की कटिंग दी, जो आपको दिखा रहा हूँ- १. आचार्य श्री को श्रद्धांजलि मदनगंज-किशनगढ़ में आचार्यश्री का समाधि दिवस। यहाँ पर ज्ञानमूर्ति वयोवृद्ध परम तपस्वी श्री १०८ श्री मुनि ज्ञानसागर जी महाराज का संघ सहित वर्षायोग हो रहा है। जिससे अपूर्व धर्म प्रभावना हो रही है। महाराजश्री के कुछ दिनों से नेत्रों में कष्ट हो जाने से स्थानीय दिगम्बर जैन समाज में अत्यन्त चिन्ता व्याप्त रही थी। अब पूर्व की अपेक्षा ठीक है। दिनाँक ०६-०६-१९६७ को जैन धर्म के वर्तमान काल के धर्म प्रवर्तक चारित्र चक्रवर्ति स्व. श्री १०८ आचार्य शान्तिसागर जी का समाधि दिवस भक्तिपूर्वक मनाया गया। जिसमें महाराजश्री ने आचार्यश्री को भावभरी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपने संक्षेप भाषण में बताया कि आज जो जैन त्यागी मुनि नजर आ रहे हैं, वह आचार्य श्री की ही देन हैं। आचार्य श्री के जीवन पर संघस्थ त्यागियों के भाषण हुए। वैद्य पन्नालाल पाटनी (जैन गजट १४ सितम्बर १९६७) २. विहार व पुनः आगमन मदनगंज १५-०१-१९६८ को मध्याह्न में ३:३० बजे श्री १०८ ज्ञानमूर्ति ज्ञानसागर जी महाराज के संघ ने दादिया किशनगढ़ की ओर विहार कर दिया। विहार के समय महाराज श्री का सारगर्भित भाषण हुआ पश्चात् श्री विद्याकुमार जी सेठी अजमेर व श्री मूलचंदजी लुहाड़िया मदनगंज के भाषण के बाद संघ का विहार हो गया। रात को संघ किशनगढ़ शहर में ठहरा किशनगढ़ में समाज के अनेक प्रमुख व्यक्तियों ने महाराज श्री से विहार न करने के लिए निवेदन किया क्योंकि महाराज श्री के नेत्रों को क्षति पहुँचने का विशेष खतरा है। ध्यान रहे महाराज श्री के संघ का चातुर्मास मदनगंज में हुआ था। इस बीच महाराज श्री के नेत्रों में व्याधि हो गई थी। श्रीमान् धर्मवीर सर सेठ भागचंद जी साहब व श्री माणकचंद जी सोगाणी अजमेर ने भी श्री महाराजश्री से अभी यहीं रुकने के लिए प्रार्थना की, हर्ष है कि महाराजश्री पुनः मदनगंज पधारगए हैं। –वैद्य पन्नालाल पाटनी (जैन गजट १५ फरवरी १९६८) ३. संघ आगमन दादिया- श्री १०८ मुनि ज्ञानसागर जी महाराज ससंघ मदनगंज-किशनगढ़ से रवाना होकर १२-०२-१९६८ को यहाँ पधारे हैं। दादिया आगमन पर समाज के सभी स्त्री-पुरुषों ने आपका स्वागत किया। सभी साधर्मी बन्धुओं से समाज का अनुरोध है कि यहाँ पधारकर महाराज श्री के प्रवचनों का लाभ उठायें। संघ में विद्वान श्री १०५ क्षुल्लक जी महाराज श्री सन्मतिसागर जी, सिद्ध सागर जी एवं शंभूसागर जी व त्यागीगण आदि हैं। गुमानमल झाँझरी (जैन गजट २२ फरवरी १९६८) ४. मुनि दीक्षा लेने वाले ब्रह्मचारी की विराट शोभायात्रा अजमेर के इतिहास में मुनिदीक्षा की अविस्मरणीय घटना (कार्यालय प्रतिनिधि द्वारा) अजमेर २१ जून। रविवार को स्थानीय जैन परिवार के जिस युवक ब्रह्मचारी श्री विद्याधर का ऐतिहासिक दीक्षा समारोह होने जा रहा है उसके सम्मान में आज हजारों जैन धर्मावलंबियों ने नगर में एक विराट शोभायात्रा निकाली। सम्भवतः अजमेर में यह प्रथम अवसर है जब जैन समाज के एक तरुण ब्रह्मचारी ने वैराग्य भावना में लीन होकर परम वीतरागी निर्ग्रन्थ दिगम्बरी मुनि दीक्षा लेनी चाही हो। रविवार को बड़ा धड़ा दिगम्बर जैन पंचायती नसियाँ में भव्य विराट आयोजन सम्पन्न होगा। जिसे देखने के लिए अजमेर से बाहर के जैन मतावलम्बी भी भारी संख्या में अजमेर आ रहे हैं। ब्रह्मचारी विद्याधर को मुनि दीक्षा जैन मुनि श्री ज्ञानसागर जी ग्रहण करायेंगे। इस विराट आयोजन की पूर्व संध्या स्थानीय कबाड़ी मोहल्ले से ब्रह्मचारी विद्याधर की एक विराट शोभायात्रा निकाली गई। जो शहर के विभिन्न मार्गों से होती हुई सोनी जी की नसियाँ में समाप्त हुई। ब्रह्मचारी श्री एक सुसज्जित हाथी पर अवस्थित थे और उनके आगे पीछे हजारों की संख्या में जैन समाज के नेता एवं श्रद्धालु स्त्री-पुरुष महावीर स्वामी का जय-जयकार करते हुए चल रहे थे। (दैनिक नवज्योति अजमेर (राजः) दिनाँक ३० जून १९६८, रविवार) ५. २२ वर्षीय जैन ब्रह्मचारी द्वारा मुनि दीक्षा ग्रहण २० हजार धर्मप्रेमियों की उपस्थिति में विशाल समारोह सम्पन्न (कार्यालय प्रतिनिधि द्वारा) अजमेर, ३० जून स्थानीय सुभाषबाग के पास स्थित बड़ा धड़ा नसियाँ में हजारों नर-नारियों एवं श्रद्धालु लोगों की अपार भीड़ के बीच आज बेलगाँव मैसूर के २२ वर्षीय ब्रह्मचारी श्री विद्याधर जैन मुनि की दीक्षा लेकर कठोर साधना एवं संयम व त्याग के अनुगामी हो गए। उल्लेखनीय है कि आज तक इतनी कम आयु का कोई भी ब्रह्मचारी मुनि दीक्षा जैसे कठिन मार्ग का अनुगामी इस शहर में नहीं बना। यही कारण था कि इस आत्म संयमी युवक ब्रह्मचारी के दीक्षा समारोह को देखने के लिए न केवल अजमेर से अपितु जयपुर, ब्यावर, नसीराबाद, केकड़ी, किशनगढ़ एवं अन्य अनेक दूरस्थ स्थानों तक के श्रद्धालु लोग उपस्थित हुए थे। ब्रह्मचारी विद्याधर समारोह सुविख्यात जैन मुनि आचार्य ज्ञानसागर जी के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। दीक्षा के सम्पन्न होने के साथ ही हजारों स्त्री-पुरुषों के हर्ष विह्वल जय जयकार के बीच नव दीक्षित मुनि को आचार्य विद्यासागर के नाम से अलंकृत कर दिगम्बर जैन मत के अनुसार उन्हें निरावरण कर दिया गया। यों तो समारोह स्थल पर आज प्रात: से ही दर्शनार्थी स्त्री पुरुषों का मेला लगना प्रारम्भ हो गया था किन्तु दीक्षा का कार्यक्रम दोपहर से पूर्व ही प्रारम्भ हो गया। इस विशाल समारोह का प्रारम्भ आज मध्याह्न १२:०५ बजे से नव दीक्षित बाल ब्रह्मचारी विद्याधर जी के कर कमलों से शान्ति विधान पूजा के साथ प्रारम्भ हुआ। तत्पश्चात् भजन एवं गायन के हर्षोल्लास पूर्ण वातावरण के साथ २ बजे शुभ मुहूर्त पर दीक्षा कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। इस अवसर पर सेठ भागचन्द सोनी द्वारा प्रस्तावित तथा समाज द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव के अनुसार जैन मुनि श्रीज्ञानसागर को चारित्र विभूषण की पदवी से विभूषित किया गया। इस समारोह के अन्तर्गत ५ दिन तक विराट शोभायात्रायें निकाली गई जिसमें लगभग ढाई हजार रुपया भेंट स्वरूप प्राप्त हुआ। एक प्रवक्ता के अनुसार इस धन राशि का उपयोग शास्त्रे प्रकाशन में किया जाएगा। दीक्षा समारोह के अवसर पर नव दीक्षित मुनि के धर्म के माता-पिता श्री हुकुमचंद लुहाड़िया और उनकी धर्मपल्लि ने आजन्म ब्रह्मचर्य का व्रत धारण किया। कार्यक्रम के अन्त में जैन मुनि श्री ज्ञानसागर और नवदीक्षित मुनि विद्यासागर ने उपस्थित जन समुदाय को आशीर्वाद दिया। जीवन परिचय - नव दीक्षित मुनि की जैन समाज द्वारा प्रकाशित परिचय पुस्तिका के अनुसार आपका जन्म मैसूर प्रान्त के बेलगाँव जिला स्थित सदलगा ग्राम में हुआ था। उक्त मुनि वहाँ के एक कृषक परिवार से संबन्धित हैं। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा कन्नड़ भाषा के माध्यम से प्रारम्भ हुई। आपका मन ९ वर्ष की आयु से ही वैराग्य की ओर अभिमुख हुआ। आपने कन्नड़ भाषी होते हुए भी संस्कृत के साथ-साथ हिन्दी भाषा का भी ज्ञान प्राप्त किया। आपने ब्रह्मचर्य अवस्था में ही आजन्म पद यात्रा का व्रत धारणकर रखा है। (दैनिक नवज्योति, अजमेर (राजः) दिनाँक १ जुलाई १९६८) ६. अजमेर में विद्याधर जी की दीक्षा का अभूतपूर्व आयोजन अजमेर ३० जून (नि.सं.) जितना हर्ष और उल्लास आज अजमेर में सम्पन्न परम कल्याणकारी मुनि दीक्षा समारोह के शुभ अवसर पर जैनाजैन सभी समाजों के आबालवृद्ध नर-नारी सभी में देखने को मिला वह अभूतपूर्व था। लोगों को सर्वत्र यह कहते सुना गया कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा दृश्य देखकर कभी नेत्रों को कृतार्थ किया हो-ऐसा उनको स्मरण नहीं। श्रीमान् धर्मवीर सर सेठ साहब भागचंद सोनी जी के शब्दों में प्राकृतिक सुषमा से पूर्ण भारत के हृदय स्वरूप अजमेर नगर के महान् पुण्योदय से अजमेर के इतिहास में हुई यह प्रथम मुनि दीक्षा थी। इससे अजमेर धन्य हो गया। मैसूर राज्यान्तर्गत बेलगाँव जिला के सदलगा ग्राम निवासी स्वनामधन्य बाल ब्रह्मचारी २२ वर्षीय तरुण, पूज्य श्री विद्याधर जी ने ज्यों ही स्थानीय बाबाजी के नसियाँ के उद्यान में मध्याह्न २ बजे करीब ३० हजार जैनाजैन जनता के समक्ष एवं १०८ ज्ञानमूर्ति चारित्र विभूषण पूज्य मुनिराज श्री ज्ञानसागर जी महाराज के श्री चरणों में मुनिलिंग धारण करने की अपनी इच्छा प्रकट की तो श्री पं. विद्याकुमार जी का माइक पर इसे प्रकट करते ही गला भर आया और नेत्रों से मोती टपक पड़े। इन्द्रदेव भी भला पीछे कैसे रह सकते थे समस्त उपस्थित जन समुदाय के साथ ही वे भी हर्षाश्रु स्वरूप हल्की-हल्की बूंद बरसाने को मजबूर हो गए। यह कोई अनहोनी नहीं थी यह तो प्राकृतिक थी और प्रकृति भला अपने स्वभाव से इस परम आनन्द दायक कल्याणकारी अनुपम अवसर पर क्यों चूकती। दीक्षा समारोह का कार्यक्रम ठीक १२ बजे परमपूज्य मुनिराज श्री १०८ ज्ञानमूर्ति ज्ञानसागर जी महाराज के संसघ गाजे बाजे सहित पाण्डाल में पधारते ही जयकारों के गगनभेदी घोष के साथ प्रारम्भ हुआ। सर्वप्रथम एक ५ वर्षीय नन्हें बालक ने अपनी तोतली वाणी में मंगलाचरण किया। पश्चात् कुछ गायन भाषणों के बाद दीक्षार्थी श्री विद्याधर जी ने परमपूज्य महाराज श्री के चरणों में दीक्षा हेतु अनुरोध के बाद। दीक्षा की आज्ञा मिलने पर उपस्थित प्राणी मात्र से क्षमा याचना की। समस्त उपस्थित जन समुदाय अपलक नेत्रों से उक्त क्रियाओं को देखकर आनन्द विभोर हो रहा था। इस अवसर पर मैसूर राज्य से दीक्षार्थी ब्रह्मचारी जी के अग्रज तथा भतीजे भी पधारे थे। उन्होंने दीक्षार्थी के वयोवृद्ध माता-पिता तथा अपना दीक्षा हेतु अनुमोदन किया। प्रभावना की अटूट धारा में जब दीक्षार्थी पूज्य ब्रह्मचारी जी ने अपने लम्बे घने काले बालों का निर्ममत्व भाव से केशलुंचन प्रारम्भ किया तब मोही प्राणी त्याग की इस पराकाष्ठा को देखकर गदगद हो आर्द्र हो गया। केशलोंच के मध्य में अनेक वैराग्यपूर्वक भाषण हुए जिनमें श्री पण्डित विद्याकुमार जी सेठी, श्री नाथूलाल जी वकील बँदी, श्री के.एल. गोधा, श्री पण्डित हेमचन्द्र जी शास्त्री के नाम उल्लेखनीय हैं। केशलोंच के अन्त में दीक्षार्थी ब्रह्मचारी विद्याधर जी ने समस्त परिग्रह का त्याग तृणवत् कर दिया। आकाश गगनभेदी जयनादों से गुंजायमान हुआ। इसी बीच समाज के शिरोमणि धर्मवीर दानवीर श्रीमान् रा.ब. सर सेठ भागचंद साहब सोनी का अत्यंत विद्वत्तापूर्ण ओजस्वी भाषण हुआ। भाषण के अंत में स्वागत समिति के माननीय अध्यक्ष के रूप में श्रीमान् माननीय सर सेठ साहब ने धन्यवादांजलि प्रस्तुत की। दीक्षा समापन के तुरंत बाद लगभग १० मिनट तक मूसलाधार जलवृष्टि हुई। उपस्थिति लगभग ४० हजार जन समूह धर्मप्रभावना देखकर भावविभोर हो गया। नवदीक्षित मुनिराज श्री का नाम श्री १०८ परमपूज्य मुनिराज विद्यासागर जी रखा गया। अंत में नवदीक्षित पूज्य मुनिराज तथा परमपूज्य श्री १०८ ज्ञानमूर्ति ज्ञानसागर जी महाराज के क्रमशः आशीर्वादात्मक संक्षिप्त प्रवचन हुए। आज के आयोजन में ही माननीय अध्यक्ष महोदय श्रीमान् धर्मवीर सर सेठ भागचंद जी साहब सोनी ने समस्त समाज की ओर से परमपूज्य मुनिराज ज्ञानमूर्ति श्री १०८ ज्ञानसागर जी महाराज को ‘चारित्र विभूषण' की उपाधि से समलंकृत किया। अंत में कलशाभिषेक के बाद कार्यक्रम का जयघोष के साथ समापन हुआ। वस्तुत: अजमेर नगर निवासियों का महान् पुण्योदय ही है कि अभी गत माह हुई क्षुल्लक दीक्षा को १ माह ही हुआ था कि फिर उन्हें नेत्र सफल कर जीवन में कुछ करने की प्रेरणा प्राप्त करने का अवसर मिल गया। फिर भला उस अवसर से लाभ लेने में समाज पीछे क्यों रहता। समाज तन, मन और धन से इस अवसर को स्वर्णिम बनाने में जुट गया। दीक्षा के पूर्व लगातार ५ दिन तक दीक्षार्थी ब्रह्मचारी जी की शोभा यात्राएँ निकाली। बिन्दोरियाँ क्रमशः २५-०६-१९६८ को सेठ मिश्रीलाल जी, मीठालाल जी पाटनी, २६-०६१९६८ को सेठ राजमल जी मानकचंद जी चाँदीवाल, २७-०६-१९६८ को सेठ पूसालाल जी गदिया, २८०६-१९६८ को श्री सेठ मांगीलाल जी रिखबदास जी (फर्म सेठ नेमीचंद जी, शान्तिलाल जी बड़जात्या), २९-०६-१९६८ को श्री समस्त दिगम्बर जैन समाज जैसवाल पंचायत केसरगंज तथा ३०-०६-१९६८ को श्री सेठ हुकमचंद जी नेमीचंद जी दोषी की ओर से निकली। अंतिम बिन्दोरी प्रातः ७:३० बजे प्रारम्भ हुई।। इसके अतिरिक्त सभी बिन्दोरियाँ रात्रि को ७ बजे से निकली थी। अंतिम तीन बिन्दोरियों का आकर्षण अपूर्व था। दिनाँक २९ व ३० को बिन्दोरी हाथी पर निकली जिन्हें लगभग एक लाख व्यक्तियों ने देखा। दिनाँक २८-०६-१९६८ को श्री सेठ नेमीचंद जी शान्तिलाल जी की ओर से निकली बिन्दोरी का जुलूस का स्थानीय श्वेताम्बर बन्धुओं की ओर से भव्य स्वागत किया गया। दिनाँक २९-०६-१९६८ की शानदार बिन्दोरी में अजमेर की जनता ने दीक्षोन्मुख भव्यप्राणी को जब ट्यूबलाइटों से घिरे हुए हाथी पर अपनी सादा पोशाक, धोती और दुपट्टे में वीतराग मुद्रा में देखा तो वाह-वाह कर उठी। उल्लेखनीय है कि वयोवृद्ध साहित्य मनीषी ज्ञानमूर्ति श्री १०८ परमपूज्य ज्ञानसागर जी महाराज विहार करते हुए २०-०६-१९६८ को प्रातः काल ससंघ यहाँ पधारे थे। आपका स्वागत जुलूस के सरगंज पुलिस थाने से प्रारम्भ होकर नगर के प्रमुख बाजारों में घूमता हुआ श्री धर्मवीर सर सेठ भागचंद जी साहब सोनी की नसियाँ जी में पहुँचा। आपके स्वागत सम्मान में अनेकों विद्वानों के भाषण हुए। श्री सर सेठ साहब ने महाराज श्री से ससंघ यहीं चातुर्मास करने की प्रार्थना की। पश्चात् महाराज श्री का अन्त:स्पर्शी सारगर्भित प्रवचन हुआ। मौन सम्मति के साथ ही साथ तभी यह भी शुभ संकेत प्राप्त हुआ था कि इसी आषाढ़ शुक्ला ५ रविवार ३० जून को संघस्थ ब्रह्मचारी श्री विद्याधर जी मुनि दीक्षा ग्रहण करेंगे। जिसका सौभाग्य आज अजमेर के ही नहीं अपितु बाहर के हजारों धर्म श्रद्धालु महानुभावों ने प्राप्त किया। श्री परमपूज्य १०८ ज्ञानमूर्ति चारित्र विभूषण ज्ञानसागर जी महाराज के यहाँ पदार्पण के समय से ही महती धर्म प्रभावना हो रही है दिनाँक २२ जून से २४ जून तक बाल आश्रम दिल्ली के कलाकारों का कार्यक्रम हुआ। ऋषभदेव उदयपुर से वापिस पधारते हुए श्रीमान् सेठ सुनहरीलाल जी आगरा के साथ श्री पण्डित बाबूलालजी जमादार भी पधारे। आपके यहाँ अत्यंत ओजस्वी सारपूर्ण दो भाषण हुए। उक्त सभी कार्यक्रमों को स्थानीय समस्त समाज का पूर्ण सहयोग प्राप्त रहा। स्वागत कमेटी के माननीय अध्यक्ष श्रीमान् धर्मवीर रा.ब.सर सेठ भागचंद जी सोनी का पूर्ण वरदहस्त आयोजन के लिए प्राप्त रहा। सर सेठ साहब की अटूट गुरु भक्ति का ही प्रतिफल है कि आयोजन के प्रत्येक कार्य में समाज ने उन्हें कर्मठ पाया। सर सेठ साहब के अतिरिक्त सर्व श्री छगनलाल जी पाटनी, स्वरूपचंद जी कासलीवाल, शान्तिलाल जी बड़जात्या, पदमकुमार जी फोटोग्राफर, पदमकुमार जी वकील, किशनलाल जी जैन, मिलाप चंद जी पाटनी, स्थानीय संगीत मण्डल, जैन वीर दल, जैसवाल जैन स्वयं सेवकदल, पुलिस विभाग, नगर पालिका तथा पत्रकारों आदि का कार्यक्रम को पूर्ण सफल बनाने में सक्रिय सहयोग अविस्मरणीय रहा। दिनाँक ३० जून को सायंकाल बाहर से आगत समस्त साधर्मी बंधुओं की भोजन व्यवस्था निसंदेह उत्तम रही। (जैन गजट ४ जुलाई १९६८) ७. पर्वराज सम्पन्न अजमेर-यहाँ परमपूज्य ज्ञानमूर्ति श्री १०८ ज्ञानसागर जी महाराज के विराजने से महती धर्म प्रभावना हो रही है। पर्वराज पर्युषण मुनिराज श्री के सान्निध्य में यहाँ महती प्रभावना के साथ सम्पन्न हुए। पर्व में ऐलक पन्नालाल सरस्वती भवन ब्यावर के व्यवस्थापक श्री पण्डित हीरालाल जी सिद्धान्त शास्त्री के पधारने से तत्त्वचर्चा व धर्म-श्रवण का काफी आनन्द रहा। श्री सर सेठ भागचन्द जी साहब सोनी के सरावगी मोहल्ला स्थित मन्दिर जी में पण्डित जी का नित्य प्रति मध्याह्न व रात्रि में तत्त्वार्थसूत्र व दशधर्म पर ओजस्वी प्रवचन होता था। पूजनोपरान्त लगभग साढ़े दस बजे मंदिर जी में ही षोडशकारण भावना व दशधर्म पर स्वयं श्रीमान् धर्मवीर सर सेठ भागचन्द जी साहब सोनी अत्यन्त हृदयग्राही प्रवचन करते थे। प्रात: व मध्याह्न में ३ बजे से नसियाँ जी में परमपूज्य मुनिराज ज्ञानसागर जी महाराज व पूज्य श्री विद्यासागर जी महाराज का मार्मिक गम्भीर प्रवचन होता था। अनन्त चतुर्दशी व प्रतिपदा को नसियाँ जी तथा शहर के मन्दिरों में कलशाभिषेक हुए। भाद्रपद शुक्ला २ को परमपूज्य चारित्रचक्रवर्ती श्री १०८ आचार्यवर्य स्वः शान्तिसागर जी महाराज का स्वार्गारोहरण दिवस धूमधाम से मनाया गया। इसी प्रकार गत वर्ष सल्लेखनापूर्वक दिवंगत मुनिराज श्री १०८ सुपाश्वसागर जी महाराज की पुण्यतिथि भी मनाई गयी। (जैन गजट, सितम्बर १९६८) ८. केशलोंच अजमेर-यहाँ चातुर्मास काल में श्री १०८ परमपूज्य ज्ञानमूर्ति ज्ञानसागर जी महाराज के ससंघ विराजने से अपूर्व धर्म प्रभावना हुई। दिनाँक ०३-११-१९६८ को परमपूज्य मुनिराज श्री १०८ ज्ञानसागर जी महाराज का केशलोंच अत्यन्त प्रभावना पूर्वक सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर सर्वश्री पण्डित विद्याकुमार जी सेठी, पण्डित चंपालाल जी, बा. निहालचंद जी के अतिरिक्त श्रीमान् सर सेठ भागचंद जी साहब सोनी का ओजस्वी सामयिक भाषण हुआ। श्रीमान सर सेठ साहब द्वारा नवीन पिच्छिका समर्पित करने के बाद परमपूज्य मुनिराज श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज व परमपूज्य ज्ञानमूर्ति १०८ ज्ञानसागर जी महाराज का सारगर्भित ओजस्वी उपदेश हुआ। अन्त में चातुर्मासिक प्रतिक्रमण हुआ। (जैन गजट, गुरुवार ७ नवम्बर १९६८, मगसिर कृष्ण ३ वी.नि.सं. २४९५) ९. प्रवचन अजमेर जाटियावास में ज्ञान-ध्यान-तपोरक्त तपस्वी मुनिराज श्री ज्ञानसागर जी मुनिराज व मुनि श्री विद्यासागर जी के प्रवचन के लिए वहाँ के प्रमुख व्यक्तियों ने आयोजन किया। इस स्थान पर पहले आचार्य देशभूषण महाराज का भी प्रभावशाली प्रवचन हो चुका है। पाण्डाल की सुन्दर व्यवस्था थी। जैनों के अतिरिक्त अजैन बन्धु भी हजारों की संख्या में उपस्थित थे। पूज्य मुनि ज्ञानसागर जी महाराज ने 'मानव चरित्र की विशेषता को बतलाते हुए संग्रहवृत्ति की भावना को बुरा बताया विज्ञान ने मानव के लिए सुख-सुविधा के साधन अवश्य जुटाए हैं, लेकिन इससे असंतोष एवं अधैर्य को मानव जीवन में प्रोत्साहन अवश्य मिल रहा है। पूज्य मुनि विद्यासागर जी महाराज ने 'त्याग के महत्व को बतलाते हुए जीवन को त्यागमय बनाने पर जोर दिया। पं. विद्याकुमार जी सेठी शास्त्री, पं. हेमचंद शास्त्री, ब्र. हीरालाल जी, श्री माणकचंद जी सोगानी व श्री निहालचंद जी जैन ने भी सामयिक विचार प्रकट किए। श्री प्रभुदयाल जी जैन ने भी स्वरचित कविता पढ़ी। यह कार्यक्रम दिन के २ बजे से ४ बजे तक सम्पन्न हुआ। (जैन गजट १४ नवम्बर १९६८) १०. संघ विहार अजमेर-चातुर्मास काल में यहाँ विराजमान परमपूज्य वयोवृद्ध ज्ञानमूर्ति चारित्र विभूषण श्री १०८ मुनिराज ज्ञानसागर जी महाराज तथा परमपूज्य श्री १०८ मुनिराज विद्यासागर जी महाराज का दिनाँक ०१-१२-१९६८ को केशरगंज के लिए ससंघ विहार हो गया। विहार बेला पर आयोजित सभा में अनेक वक्ताओं ने अपने मार्मिक विचार प्रकट किए। प्राय: सभी वक्ताओं ने पूज्य मुनिराज संघ से अभी यहीं विराजमान रहने का विनम्र अनुरोध करते हुए कहा कि परमपूज्य मुनिराज ज्ञानसागर जी महाराज की वृद्धावस्था तथा समयसार प्रकाशन के महत्त्वपूर्ण कार्य की यथाशीघ्र संपूर्ति के लिए मुनिसंघ का यहाँ विराजना अत्यंत आवश्यक तथा समाज हित में हैं। आशा है, परमपूज्य मुनिराज समाज के अनुरोध को अवश्य स्वीकार करेंगे। वक्ताओं के अंत में मुनिराजद्वय का प्रभावशाली उपदेश हुआ। (जैन गजट, ५ दिसम्बर १९६८)
  4. कभी बरसते नहीं, अनुकूल मित्रों पर कभी हरसते नहीं और ख्याति-कीर्ति-लाभ पर कभी तरसते नहीं। क्रूर नहीं, सिंह-सम निर्भीक किसी से कुछ भी माँग नहीं भीख, प्रभाकर-सम परोपकारी हो प्रतिफल की ओर कभी भूल कर भी ना निहारें, निद्राजयी, इन्द्रिय-विजयी जलाशय-सम सदाशयी मिताहारी, हित-मित-भाषी चिन्मय-मणि के हों अभिलाषी, निज-दोषों के प्रक्षालन हेतु आत्म-निन्दक हों पर निन्दा करना तो...दूर... पर-निन्दा सुनने को भी जिनके कान उत्सुक नहीं होते ...कहीं हों बहरे! यशस्वी, मनस्वी और तपस्वी हो कर भी, अपनी प्रशंसा के प्रसंग में जिनकी रसना गुंगी बनती है। सागर-सरिता-सरवर-तट पर जिनकी शीत-कालीन रजनी कटती, फिर Never feels puffed up With the favourable friends, And Never pines for Fame, glory and gain. Not cruel, but as fearless as a lion, No demand from any corner for alms, As benevolent as the Sun Never expects some return Even by mistake, Who attains victory over sleep and the sense organs, Well-intentioned like a water-reservoir. Modest in diet, benevolent moderate counsellor, One of those, who are desirous of the jewel of Supreme Soul; Who, for the cleansing of his own drawbacks Should be self-critical, What to talk of censuring the others... Whose ears are never eager Even to hear the calumny of others ...As if they have turned deaf Despite being The renowned, the strong-minded and an ascetic Whose tongue turns mute In the context of his own applause. Whose Winter night passes On the shores of a sea, a river, or a lake, Thereafter...
  5. पात्र-दान अतिथि-सत्कार। परन्तु, पात्र हो पूत-पवित्र पद-यात्री हो, पाणिपात्री हो पीयूष-पायी हंस-परमहंस हो, अपने प्रति वज्र-सम कठोर पर के प्रति नवनीत... ...मृदु और पर की पीड़ा को अपनी पीड़ा का प्रभु की ईडा में अपनी क्रीड़ा का संवेदन करता हो। पाप-प्रपंच से मुक्त, पूरी तरह पवन-सम निःसंग परतन्त्र-भीरु, दर्पण-सम दर्प से परीत हरा-भरा फूला-फला पादप-सम विनीत। नदी-प्रवाह-सम लक्ष्य की ओर, अरुक, अथक...गतिमान। मानापमान समान जिन्हें, योग में निश्चल मेरु-सम, उपयोग में निश्छल धेनु-सम, लोकैषणा से परे हों मात्र शुद्ध-तत्त्व की गवेषणा में परे हों, छिद्रान्वेषी नहीं गुणग्राही हों, प्रतिकूल शत्रुओं पर Alms to a worthy personage, hospitality to a guest. But, The personage should be deserving and pious Should be a traveller on foot, using his palms as his vessels A nectar-taker, a liberated soul a great ascetic with divine powers, Hard upon himself like a thunder-bolt For the others, as soft and mild… As butter..., and Should be experiencing His own pain in the pain of the others’ His own playfulness in the eulogy to God. Free from all snares of sin Fully, without bondage, like air, Afraid of dependence, Like a mirror, devoid of arrogance Humble like a tree - Green, grown-up, under perfect fruition. Like the flow of a river, Towards his destination Undeterred, unwearied...dynamic. For whom regard and disregard is similar, Firm like the Mount Meru,while observing penance, Like an honest cow while providing functional consciousness, Who lives beyond worldly ambitions Attains excellence only in the Investigation of Supreme Reality; Should be the merit-seeker And not the fault-finder Who never tells heavily upon The opposing foes,
  6. ३-०४–२०१६ सागडोद (बाँसवाड़ा राज०) ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञायक के साक्षात्कार गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज को त्रिकाल प्रणति निवेदित करता हूँ... हे गुरुवर ! नसीराबाद के शान्तिलाल जी पाटनी ने आपका परीक्षक बनकर ब्रह्मचारी विद्याधर जी की परीक्षा ली और उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त की। उन्होंने बताया मुनि बनने के बाद भी परीक्षा से पीछा नहीं छुटा "अजमेर चातुर्मास १९६८ के समय मुझे एक दिन गुरुजी ज्ञानसागर जी महाराज ने कहा- शान्तिलाल आप सदा मोक्षमार्ग प्रकाशक की बात करते हो। हमारे मुनि विद्यासागर जी उसे कभी नहीं पढ़ते। तब मैंने कहा- मैं परीक्षा कर लूँ क्या ? तो ज्ञानसागर जी महाराज ने अनुमति दे दी। मैं मुनि विद्यासागर जी के पास गया और उन्हें मोक्षमार्ग पढ़ने के लिए दिया। तो वो बोले-गुरुजी की आज्ञा है कि आचार्य प्रणीत ग्रन्थ ही पढ़ा करें और उन्होंने लेने से मना कर दिया।" इस तरह विद्यासागर जी की कभी भी कैसी भी परीक्षा करो। वो कभी अनुत्तीर्ण नहीं हुए। इस संसार से उत्तीर्ण होने के लिए गुरु आज्ञा नौका के समान है जिस पर मुनि श्री विद्यासागर जी चढ़ गए हैं, निश्चित ही उस पार उतरेंगे। ऐसी आज्ञाकारिता को नमन करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  7. कर पर ले, फिर धरती पर रखता जा रहा कुम्भों को। धरती की थी, है, रहेगी माटी यह। किन्तु पहले धरती की गोद में थी आज धरती की छाती पर है कुम्भ के परिवेश में। बहिरंग हो या अन्तरंग कुम्भ के अंग-अंग से संगीत की तरंग निकल रही है, और भूमण्डल और नभमण्डल ये उस गीत में तैर रहे हैं लो कुम्भ को अवा से बाहर निकले दो-तीन दिन भी व्यतीत ना हुए उसके मन में शुभ-भाव का उमड़न बता रहा है सबको, कि अब ना पतन, उत्पतन… उत्तरोत्तर उन्नयन-उन्नयन नूतन भविष्य-शस्य भाग्य का उघडून...! बस, अब दुर्लभ नहीं कुछ भी इसे सब कुछ सम्मुख...समक्ष! भक्त का भाव अपनी ओर भगवान को भी खींच ले आता है, वह भाव है- Taking them up on the palm, Is placing the pitchers on the earth. of the Earth was, is and shall remain This soil. But formerly it was into the lap of the Earth, While today, it dwells upon the chest of the earth In the appearance of the pitcher. Whether it is outward or inward, A wave of music is flowing out From each and every limb of the pitcher, And These spheres of earth and sky Are floating into that song. Lo, even two or three days only weren't gone When the pitcher was brought out of the kiln The gush of noble sentiments within its mind Is indicating to all that, There is now no falling down only uprising... Progressive upgrading, uplifting, The unfolding of the fortune Of a new future-harvest...! Enough, Now, nothing is beyond its reach Everything present within...the eye-view ! The true devotion of a devotee draws Even God towards his side, That sentiment is –
  8. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह भीतरी दोष-समूह सब जल-जल कर बाहर आ गये हों, जीवन में पाप की प्रश्रय नहीं अब, पापी वह प्यासे प्राणी को पानी पिलाता भी कब? कुम्भ के मुख पर प्रसन्नता है मुक्तात्मा-सी तैरता-तैरता पा लिया हो अपार भव-सागर का पार। जली हुई काया की ओर कुम्भ का उपयोग कहाँ ? संवेदन जो चल रहा है भीतर...! भ्रमर वह अप्रसन्न कब मिलता है? उसकी भी तो काया काली होती है, सुधा-सेवन जो चल रहा है सदा! काया में रहने मात्र से काया की अनुभूति नहीं, माया में रहने मात्र से माया की प्रसूति नहीं, उनके प्रति लगाव-चाव भी अनिवार्य है। सावधान हो शिल्पी अवा से एक-एक कर क्रमशः It seems to appear as if All the jumble of inner vices On being burnt off Has emerged out, There is no protection in life for sins now, When does a sinner Make a thirsty being Even to drink water ? On the face of the pitcher, there reflects joy as that of a liberated soul As if, while swimming constantly, the other extremity Of the endless, ocean of existence has been reached. Where is the applied consciousness of the pitcher Towards its scorched body ? It is the introspection which is transpiring inwardly....! When does the large black bee Is found unhappy ? Its body too is dark black indeed, Although it is found always busy with gathering honey! Only by being into a body The bodily perceptions aren't necessarily gained, Illusions aren't born Due to merely dwelling into illusory worldliness, The sense of attachment and longing too Is inevitable for them. The Artisan, having a cautious approach towards the Kiln One by one, in an orderly manner,
  9. २-0४–२०१६ वीरोदय (बाँसवाड़ा राजः) कल्पद्रुम महामण्डल विधान दिगम्बरत्व के संवाहक गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में त्रिकाल प्रणति निवेदित करता हूँ... हे गुरुवर! अजमेर चातुर्मास में जब आपने केशलोंच किया था। उस दिन दिल्ली निवासी मानकचंद जैन ने अपनी आँखों से जो कुछ देखा। वह संस्मरण सुनाया और लिखकर दिया, जिसको सुनकर आपकी दूरदर्शिता अनुभूत हुई, वह मैं आपको बता रहा हूँ OCEAN OF KNOWLEDGE “३-११-१९६८ अजमेर, सोनी जी की नसियाँ के प्रांगण में पूज्य मुनि श्री ज्ञानसागर जी महाराज के केशलोंच को दो विदेशी व्यक्ति देख रहे थे। एक फ्रांस का था और दूसरा स्विट्जरलैंड का था। दोनों ने नसियाँ जी के पिछले भाग में विश्व की अद्वितीय स्वर्ण से निर्मित अयोध्या नगरी का दृश्य देखा और उसके बाद नीचे पूज्य मुनि श्री ज्ञानसागर जी महाराज के केशलोंच देखे और फोटो खींचे। दिगम्बरत्व रूप को देखकर एवं केशलोंच की क्रिया देखकर वो बड़े आश्चर्यचकित हो रहे थे। तब टीकमचंद जैन हाई स्कूल के प्रिंसिपल श्री मनोहरलाल जी ने उन्हें अंग्रेजी भाषा में दिगम्बर मुनि के बारे में समझाया। तो वो बहुत आश्चर्य करने लगे। उन्होंने नाम पूछा तो मनोहरलाल जी ने उन्हें बताया '0CEAN OF KNOWLEDGE' नाम सुनकर बड़े प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने मुनि ज्ञानसागर जी के साथ फोटो खिचवाने की प्रार्थना की। तो ज्ञानसागर जी महाराज ने स्वीकृति दे दी। उन्होंने फोटो खिचवा ली। उसके बाद ज्ञानसागर जी महाराज जाने लगे जैसे ही वो खड़े हुए तो उन्होंने पुन: खड़गासन अवस्था के साथ फोटो खिचवाई ताकि अपने देश में यह साधुता दिखा सकें। फोटो खिचवाने के बाद दोनों विदेशी बड़े खुश हुए जैसे कोई निधि मिल गई हो। तब ज्ञानसागर जी महाराज बोले- 'धर्म प्रभावनार्थ आचार्य शान्तिसागर जी महाराज ने भी यह किया था।" इस तरह हे गुरुवर! आपने धर्मप्रभावनार्थ कई कार्य किए-कराये, किन्तु अपनी चर्या में दोष नहीं लगाया। आपकी इस विशेषता से लोग बड़े प्रभावित थे। इस सम्बन्ध में दिल्ली निवासी प्रेमचंद जैन जयको घड़ी जैनावॉच कंपनी एवं अधिष्ठाता श्री दिगम्बर जैन अहिंसा स्थल महरौली, दिल्ली ने एक संस्मरण लिखकर भेजा, जो मैं आपको बता रहा हूँ ज्योतिष आत्मविद्या नहीं “मुनि ज्ञानसागर जी महाराज ज्योतिष के धुरन्धर विद्वान् थे, किन्तु मुनि अवस्था में उसका उपयोग नहीं करते थे। मैं उनको पहले से जानता था जब वे देशभूषण जी महाराज के साथ क्षुल्लक अवस्था में कुछ दिन रहे। मोदी नगर मेरठ में एक दिगम्बर जैन मंदिर बनकर तैयार हुआ और उसकी प्रतिष्ठा का मुहूर्त किससे निकलवाया जाए ऐसी समस्या खड़ी हुई। तब मुझे क्षुल्लक ज्ञानभूषण जी का ध्यान आया और पता चला कि वे वर्तमान में दिगम्बर मुनि बन चुके हैं। मैं उनके पास गया एवं उनसे निवेदन किया। तो उन्होंने बड़ी मुश्किल से प्रतिष्ठा का मुहूर्त निकालकर देते हुए कहा था- ‘अब मैं यह कार्य नहीं करता।' तब हमने कहा-महाराज ये तो मंदिर की प्रतिष्ठा का मुहूर्त है। तो बोले- 'अब मेरी अवस्था इसके लिए नहीं है। ये सब विकल्प के कारण हैं और आत्मसाधना में बाधक हैं। ज्योतिष ज्ञान आत्मविद्या नहीं है।' तब हमने क्षमा माँगी कि आगे से आपको कोई विकल्प नहीं कराऊँगा। तभी मुहूर्त निकालकर दिया था।" इस तरह आप अपनी चर्या को निर्दोष बनाये रखने के लिए बड़ी ही चतुराई से समाधान दिया करते थे। जिससे श्रावकगण संतुष्ट होकर जाते थे और आपके लाड़ले शिष्य भी आपके दिए संस्कारों को पूर्णत: पालन करते हुए ज्योतिष या तंत्र-मंत्र से कोशों दूर हैं। आपके द्वारा दिया गया आत्मज्ञान, अध्यात्म विद्या में सदा लीन रहते हैं। वही उनका ज्ञान है, वही उनकी सोच है, वही उनकी चर्या है, वही उनकी साधना है, वहीं उनकी तपस्या है, वही उनका उपदेश हैं। इसी तरह दिल्ली की श्रीमती कनक जैन (वर्तमान वानप्रस्थ आश्रम ज्ञानोदय अजमेर में साधनारत) ने एक संस्मरण लिखकर दिया। जिसको सुनकर कुतर्कियों के मन की उहापोह समाधित हो जाती है। वह संस्मरण आपको लिख रहा हूँ चश्मा परिग्रह नहीं “एक बार की बात है। अजमेर में सोनीजी की नसियाँ में गुरुजी ज्ञानसागर जी महाराज स्वाध्याय कर रहे थे। तब वहाँ बहुत से लोग स्वाध्याय सुन रहे थे। इतने में एक महानुभाव ने कहा- महाराजश्री कुछ लोग आपको नमस्कार नहीं करते। उनका कहना है कि आप चश्मा लगाते हैं और चश्मा मुनियों के लिए परिग्रह है। यह बात सुनकर गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज ने बड़ी सरलता से उत्तर दिया- ‘यह कथन सही हो सकता है। यदि चश्मे को परिग्रह के रूप में उपयोग किया जाए तो चश्मा परिग्रह तब बनेगा जब चश्मे से चक्षु इन्द्रिय का विषय- रूप सौन्दर्य का सेवन किया जाये, परन्तु दिगम्बर मुनि की यदि आँख कमजोर है और शरीर स्वस्थ है। ऐसी स्थिति में वह समाधि नहीं ले सकता। तब खाली बैठकर क्या करेगा ? और अध्ययन नहीं करेगा तो रत्नत्रय कुशल नहीं रह पायेगा, प्रौढ़ नहीं बन पायेगा, विशुद्ध नहीं बन पायेगा अतः चश्मा के माध्यम से मुनि स्वाध्याय, चर्या, समिति आदि का पालन करता है, तो उससे कर्म बन्ध नहीं अपितु निर्जरा ही होगी। तो वह परिग्रह कैसे हुआ ? वह तो उपकरण है। यह सुनकर उपस्थित सभी जन प्रसन्न हो गए और वो सज्जन भी संतुष्ट होकर चले गए।" इस तरह आपकी वाणी से मन के द्वन्द्वों की समाधि अनुभूत होती है। आपके अंदर विराजमान जिनसरस्वती को प्रणाम करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  10. प्रकृष्ट कष्ट का अनुभव हुआ उत्कृष्ट अनिष्ट का आना हुआ काल के गाल में जा कर भी बाल-बाल बच कर आया कुम्भ। कुम्भ की काया को देखने से दुःख-पीड़ा का, रव-रव का, परीक्षा-फल को देखने से सुख-क्रीड़ा का, गौरव का और धारावाहिक तत्त्व को देखने से न विस्मय का, न स्मय का कुम्भकार ने अनुभव किया। परन्तु, काल की तुला पर वस्तु को तौलने से जो परिणाम निकलता है वह भी पूर्णतः झलक आया उसके मानस-तल पर! पावन व्यक्तित्व का भविष्य वह पावन ही रहेगा। परन्तु, पावन का अतीत-इतिहास वह इति...हास ही रहेगा अपावन...अपावन...अपावन। आज अवा से बाहर आया है। सकुशल कुम्भ। कृष्ण की काया-सी नीलिमा फूट रही है उससे, The intensive sufferings have been undergone, The highest disaster has been faced Despite being caught into the jaws of death Having fared a narrow escape, the pitcher comes out safe. Of grief and pain, of hellish noise and tumult The Artisan has a feeling, On having a look upon the body of the pitcher, Of happy display, of dignity – On seeing the test-results. And On discerning the fluent essential element The Artisan experienced Neither surprise nor pride, But, By weighing a thing on the balance of time The outcome which is arrived at, - That too, is fully evident Upon his mental level ! The future of the pious personality Shall remain pious, indeed, But, The past...history of that pious one- Shall remain a laughing stock, even after it concludes - Impure...Impure...Impure. Today has come out of the Kiln The safe and sound pitcher. Like that of the body of Shri Krishna, A bluishness is emanating from it,
  11. वह रोग कहाँ वह वदन कहाँ और वह आग का सदन कहाँ ? जो, इन कानों ने, आँखों ने और हाथों ने सुने, देखे, छुए थे स्वप्न में ? अक्षरशः स्वप्न असत्य निकला, स्वप्न का घातक फल टला। “कुम्भ की कुशलता सो अपनी कुशलता” यूँ कहता हुआ कुम्भकार सोल्लास स्वागत करता है अवा का, और रेतिल राख की राशि को, जो अवा की छाती पर थी हाथों में फावड़ा ले, हटाता है। ज्यों-ज्यों राख हटती जाती, त्यों कुम्भकार का कुतूहल बढ़ता जाता है, कि कब दिखे वह कुशल कुम्भ… लो, अब दिखा! राख का रंग कुम्भ का अंग दोनों एक-दोनों संग सही पहचान नहीं पातीं आँखें ये अनल से जल-जल कर काली रात-सी कुम्भ की काया बनी है। Where is that ailment Where is that face And where is That mansion of flames ? Which These ears, these eyes And these hands Had heard, seen and touched in dreams ? The dream comes out untrue in the real sense of the word, The deadly result of the dream passes away. 'The well-being of the pitcher reflects our own Well-being'; –Having remarked thus, the Potter-artisan Welcomes joyfully the Kiln, And The heap of the dusty ashes, Which has gathered upon the chest of the kiln Is removed by him with a spade in hand. The more the ashes get out of the way, The more the curiosity of the Potter-artisan Grows as to When that proficient pitcher should come in view… Lo, now it comes to sight ! The hue of the ashes, the limb of the pitcher - Both of them as one, are together, These eyes are unable to recognize truly – After being burnt into the flames gradually, The body of the pitcher has assumed its shape As that of a dark night.
  12. प्रायः स्वप्न प्रायः निष्फल ही होते हैं इन पर अधिक विश्वास हानिकारक है। ‘स्व' यानी अपना ‘ए’ यानी पालन-संरक्षण और ‘न’ यानी नहीं, जो निजी-भाव का रक्षण नहीं कर सकता वह औरों को क्या सहयोग देगा ? अतीत से जुड़ा मीत से मुड़ा बहु उलझनों में उलझा मन ही स्वप्न माना जाता है। जागृति के सूत्र छूटते हैं स्वप्न-दशा में आत्म-साक्षात्कार सम्भव नहीं तब, सिद्ध-मन्त्र भी मृतक बनता है।” यूँ, अवा की आवाज सुनता-सुनता अब वो शिल्पी अवा के और निकट आ गया पर, कहाँ सुनी जा रही है कुम्भ की चीख ...? कहाँ माँगी जा रही है कुम्भकार से भीख ? न ही कुम्भ की यातना न ही कुम्भ की याचना मात्र...वह...वहाँ तब! कहाँ हैं प्यास से पीड़ित-प्राण ? वह शोक कहाँ वह रुदन कहाँ The dreams are generally unavailing To confide too much in them is harmful. Swa', that is, our own ‘self’ 'P', that is, ‘breeding-securing’ And “Na’, that is ‘not', - That which can't secure the sense of our own ‘self How shall it be of any help to others ? Connected with the past Departed from the intimate associate - The mind, entangled indeed with so many worries, The threads of awakening are left behind in a dreamy condition Self-realization is not possible then, Even the accomplished incantation falls ineffective.” Thus, having heard the voice of the Kiln, That Artisan, now, Approaches nearer the Kiln, But, Where is being heard The shrieks of the pitcher ?... Where is being asked The begging from the Artisan ? Neither the tortures of the pitcher Nor the entreaties by the pitcher Only the pitcher itself...there at the spot...then ! Where are the vital life-breaths pained by thirst ? Where is that sorrow Where are those bewailings –
  13. जिन आँखों में अतीत का ओझल जीवन ही नहीं, आगत जीवन भी स्वप्निल-सा धुंधला-धुंधला-सा तैरने लगा, और भावी, सम्भावित शंकिल-सा कुल मिला कर सब-कुछ धूमिल-धूमिल-सा बोझिल-सा झलकने लगा। सन्ध्या-वन्दन से निवृत्त हो। कुम्भकार ने बाहर आ देखा- प्रभात-कालीन सुनहली धूप दिखी धरती के गालों पर जो ठहर न पा रही है, ऊषा-काल से पूर्व-प्रत्यूष से ही उसका उर उतावला हो उठा है आज अवा का अवलोकन करना है उसे! कुम्भ ने अग्नि-परीक्षा दी और अग्नि की अग्नि-परीक्षा ली, शत-प्रतिशत फल की आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है, फिर भी मन को धीरज कहाँ और...कब? विपरीत स्वप्न जो दिखा...! अपनी ओर बढ़ते शिल्पी के चरण देख कुम्भ की ओर से स्वयं अवा ने कहा : ‘‘हे शिल्पी महोदय! The eyes in which Not only the elapsed life of the past But also the present life, like a dream, Floats in a hazy manner, And All the future, the probable, the suspected - In toto, everything Reflects as smoky, hoary And somewhat cumbersome. After taking repose from the morning prayers, The Artisan, on stepping out, views – The golden sunshine of the morn is seen Which is sliding Over the cheeks of the Earth; Before the early morning since the very dawn His heart has become impatient, He has to undertake a survey Of the Kiln today! The pitcher passes through the fire-test And The fire itself is put to an ordeal, There is not only some hope, but full confidence About the cent-per-cent results, Even then, where does the mind keep up restraint, And...when ? The dream visualized is, indeed, out of accord...! On seeing the steps of the Artisan moving towards it,The kiln itself speaks out on behalf of the pitcher : “O Mr. Artisan Sir !
  14. अपनी प्यास बुझाये बिना औरों को जल पिलाने का संकल्प मात्र कल्पना है, मात्र जल्पना है।” लगभग रुदन की ओर मुड़ी कुम्भ की याचना सुन कर उसकी गम्भीर स्थिति पर, उस उर की पीर की अति पर, सोच रहा है उदार-उन्नत उर व्यथित हुआ कुम्भकार का भी। और, कुम्भ में धैर्य के प्राण फूँकने उसकी क्षुधा-तृषा के वारण हेतु कुछ भोजन-पान ले कर अवा की ओर उद्यत हुआ, कि कुम्भकार की गहरी निद्रा टूट गई, और वह स्वप्न की मुद्रा छूट गई ! वैसे, जब चाहे मनचाहे स्वप्न कहाँ दिखते हैं ! वह तभी...तो...प्रथम, स्वप्निल दशा पर शिल्पी को हँसी आई, फिर, उसकी आँखें गम्भीर होती गईं। Without quenching our own thirst, The resolve to cause the others to drink water Is mere fancy, Is bare boasting." Having listened to the entreaty of the pitcher Almost turned towards weeping, The liberal, large and troubled heart, Of the Artisan too Is pondering Over its grave condition, Over the excess of pain of that heart. And, To vitalize the pitcher with the life-breath of patience, For warding off its hunger and thirst, The Artisan goes towards the Kiln With some refreshment When, at once, the Artisan's deep sleep is broken, And that Dreaming posture is abandoned ! Thus, Where can the dreams be visualized Whenever they are wished for ! That...is...why, at first, The Artisan feels like laughing at his dreamy condition, Thereafter, his eyes Go on growing grave –
  15. मृत्यु के मुख में मत ढकेलो मुझे! आगामी आलोक की आशा दे कर आगत में अन्धकार मत फैलाओ! अब यह उष्णता सही नहीं जाती, सहिष्णुता की कमी क्रमशः इसमें आती जा रही है। इस जीवन को मत जलाओ शीतल जल ला पिलाओ इसे! चाहो इसे जिलाओ, माँ!” जब धरती-माँ की ओर से आश्वासन-आशीर्वचन भी नहीं मिले तब कुम्भ ने कुम्भकार को स्मरण में ला, कहा- “क्या त्राण के सब-के-सब धाम कहीं प्रयाण कर गये ? कुम्भ के कारक और पालक हो कर आप भी भूल गये इसे ? अब ये प्राण जल-पान बिन सम्मान नहीं कर पाएँगे किसी का। यानी, इनका प्रयाण निश्चित है, ये अग्नि-परीक्षा नहीं दे सकते अब, कोई प्रतिज्ञा छोटी-सी भी मेरु-सी लग रही है इन्हें आस्था अस्त-व्यस्त-सी हो गई, भावी जीवन के प्रति उसुकता नहीं-सी रही। अफसोस है, कि अब सोच रहा हूँ- Don't push me into the jaws of death ! By arousing the expectations for the future brightness Don't spread darkness in the present ! Now this heat is beyond forbearance, The lack of tolerance is Gradually making its headway into it. Don't burn off this life Fetching the cool water, make it drink it ! Re-vitalize it, O Mother !” When, from the side of the mother Earth, Even the assurances and blessings aren't bestowed Then, having remembered the Artisan, The pitcher said – “Have all the means of protection Departed somewhere else ? Being the doer and fosterer of the pitcher Have you too have forgotten it ? Now these life-breaths Won't be able to honour any one Without some drinking water. That is, Their departure is sure and certain Now they can no more enter into a fire-test, Any vow, even an insignificant one, Is appearing to them as tough as the mount Meru, The faith has almost been shattered, No trace of curiosity for future life has almost left its mark. Alas, that Now i am Pondering -
  16. रहस रहा, जो विहँस रहा है।” अरी, इधर यह क्या ? आकस्मिक यातना की घरी..! याचना की ध्वनि किधर से आ रही है? किसकी है, किस कारण से, किसकी गवेषणा को निकली है? नर की है, या नारी की, बालक की है या बालिका की ? किसी पुरुष की तो नहीं है निश्चित, कारण कि अनुपात से पर्याप्त पतली लग रही है कानों को। आखिर इसका क्या आशय है ? इसकी स्पष्टता-प्रकटता अब...विदित हुई, सो… ‘‘ओ धरती माँ! सन्तान के प्रति हृदय में दया धरती क्या शिशु की आर्त-आवाज कानों तक नहीं आ रही ? मंजिल का मिलना तो दूर, मार्ग में जल का भी कोई ठिकाना नहीं! फल-फूल की कथा क्या कहूँ, यहाँ...तो… छाया की भी दरिद्रता पलती है। The mystery of existence Which is still laughing around." O my goodness, what is this hither ? The period of some sudden agony...! Where from is being emitted The voice of humble entreaty ? Whose voice is it, For what reason, For whose search does it set itself out ? Is it the voice of a male or that of a female, Does it represent a boy or a girl ? Definitely, it is not that of a man, Because, proportionately, It is resounding into the ears softly enough. Ultimately, what does it mean ? Its clarity and display Has now...been evident, therefore… "O Mother-Earth ! Isn't it the aggrieved voice of a child, – Which infuses the heart with compassion for the offspring, Reaching your ears ? The destination still being beyond access, There is no hope even for some water on the way! What about the story of fruits and flowers, Here...indeed... The paucity even of shade is sustained –
  17. रुक-रुक कर रुख बदलता काल इन दिनों कहाँ मिलता है ? अवा में काल का विभाजन रुक ही गया है। अक्षुण्ण-अखण्ड काल का प्रवाह है, बस! इसी प्रसंग को ले कर यकायक अवा में कोई स्वैरविहारिणी हाँ-में-हाँ मिलाती ध्वनि की धुन... ...अरे राही, सुन! यह एक नदी का प्रवाह रहा है- काल का प्रवाह, बस बह रहा है। लो, बहता-बहता कह रहा है, कि ‘‘जीव या अजीव का यह जीवन पल-पल इसी प्रवाह में बह रहा बहता जा रहा है, यहाँ पर कोई भी स्थिर-ध्रुव-चिर न रहा, न रहेगा, न था बहाव बहना ही ध्रुव रह रह्म है, सत्ता का यही, बस In these days, where can be found The time which changes its countenance In a convulsive manner ? Amid the kiln, the division of time Has really come to a standstill Only, there is a constant flow of unbroken and indivisible time ! In this very contex All of a sudden A flattering refrain of sound from within the Kiln… Like that of a wanton wanderer – ...O thou wayfarer, hark ! It has been a continuous flow of a river – The constant flow of time, indeed, It glides on and on. Lo, While gliding forth It is muttering, that “ This life of the sentient or the insentient beings Is gushing off Is floating away Into this stream, every second, Here, no one Has ever been, shall be or was Constant - permanent - everlasting - The flow of the current Has only been perpetual, It has really been –
  18. दर्शन का आयुध शब्द है—विचार, अध्यात्म निरायुध होता है सर्वथा स्तब्ध-निर्विचार! एक ज्ञान है, ज्ञेय भी एक ध्यान है, ध्येय भी। तैरने वाला तैरता है सरवर में भीतरी नहीं, बाहरी दृश्य ही दिखते हैं उसे। वहीं पर दूसरा डुबकी लगाता है, सरवर का भीतरी भाग भासित होता है उसे, बहिर्जगत् का सम्बन्ध टूट जाता है।” अहा हा! हा!! वाह! वाह!! कितनी गहरी डूब है यह दर्शन और अध्यात्म की मीमांसा ! और कुम्भ से मिलता है साधुवाद, अग्नि को। फिर क्या हुआ, सो...सुनो! साधुवाद स्वीकारती-सी अग्नि और धधक उठी। बाहर भले ही चलता हो मीठी-मीठी शीतलता ले ऊषा-कालीन वात वो, पर, उसका कोई प्रभाव नहीं अवा पर! तापमान का अनुपात बढ़ता ही जा रहा है। दिन में और रात में, प्रताप में, प्रभात में कुछ अन्तर ही नहीं रहा। The weapon-word of philosophy is-‘thought', The spiritualism is weaponless Entirely stilled, devoid of thoughts ! The one is knowledge, the knowable too, The other is meditation, the ‘meditated upon too. A swimmer swims into a tank – Not the inward, But the outward scenes indeed come to his sight. At that very place, the other one takes a dip, The inner portion of the tank Is discernible to him, The contact with the outer world is suspended." How excellent, bravo, well done ! What a deep dive is it ! The investigation of philosophy and spiritualism! And The fire earns an eulogy from the pitcher. What happened thereafter, please...listen ! The fire got kindled extraordinarily, As if accepting the eulogy. That morning breeze With a heartening coolness May well blow outside, But, It didn't leave any imprint upon the Kiln ! The ratio of temperature is growing on The day in and the day out, There remained no difference Between the sharp heat, and the day-break.
  19. १-०४-२०१६ वीरोदय (बाँसवाड़ा-राजः) कल्पद्रुम महामण्डल विधान रूप और रूपातीत सौन्दर्य का संयुक्त गान करने वाले साहित्य सृजक गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में भक्तिगान पूर्वक नमन करता हूँ... हे गुरुवर! आपसे एवं आपके नवोदित शिष्य की साधना से प्रभावित होकर जैन जगत् के प्रसिद्ध प्रवक्ता बाबूलाल जी जमादार बड़ौत ने अपने बेटे को दिगम्बर मुनि की चर्या देखने के लिए आप द्वय के पास भेजा था। तब उनके बेटे अशोक कुमार जमादार ने आकर जो कुछ देखा और अनुभव किया वह सब मुझे उन्होंने १०-१२-२०१४को लिखकर दिया, मेरा मन आपको बताने का हो रहा है सो मैं आपको लिख रहा हूँ गुरु ने की शिष्य की देखभाल "सन् १९६८ में, मैंने अपने पूज्य पिताश्री को निवेदन किया कि मुझे दिगम्बर साधु की चर्या को जानने एवं देखने की इच्छा हो रही है। तब पिताश्री बोले-बेटे यदि सच्चे दिगम्बर संत परम्परा की चर्या-क्रिया देखना है तो तुम अजमेर चले जाओ वहाँ मुनि ज्ञानसागर जी महाराज का चातुर्मास हो रहा है उनको देखो, उनकी सेवा करो। पिताश्री ने एक पत्र सर सेठ भागचन्द जी सोनी के नाम लिख दिया। मैं बड़ौत से सीधे अजमेर पहुँच गया और जाकर सर सेठ सोनी जी से मिला, उन्होंने मेरे पिता बाबूलाल जी जमादार का पत्र पढ़ा और बड़े ही खुश हुए। वो मुझे परमपूज्य गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज के पास ले गए और कहा-यह जमादार जी का बड़ा बेटा है आपके पास रहना चाहता है। पूज्य गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज बोले- 'अच्छा है मुनि विद्यासागर जी की उम्र का है दोनों ही साथ रह लेंगे।" गुरु आज्ञा मिलते ही मैंने सफेद धोती-दुपट्टा पहन लिए, सिर के बाल कटवा लिए एवं मुनि श्री विद्यासागर जी के साथ ही रहने लगा। मुझे गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज ने निर्देशित किया कि विद्यासागर जी के अध्ययन व साधना में किसी प्रकार की विघ्न-बाधा न आए ध्यान रखना और उन्हें आहार में मस्तिष्क की पौष्टिकता के लिए कुछ चीजें देने के लिए कहा। मैं उन वस्तुओं को देने की कोशिश करता तो मुनि श्री विद्यासागर जी मनाकर देते थे। तब गुरुदेव का नाम लेकर मैं चलाया करता था। तपस्या की उत्कट भावना एक दिन मुनि श्री विद्यासागर जी मुझसे बोले- 'अशोक जी आपको तो हिन्दी अच्छी आती है मुझे नहीं आती आप भी दीक्षा ले लो और अपन दोनों साथ में रहेंगे। आप अच्छा प्रवचन करना और मैं अध्ययन और तपस्या करूँगा।' उन्हें हमने अपने प्रवास काल में कभी भी हँसी-मजाक करते हुए नहीं देखा और व्यर्थ की कोई चर्चा करते हुए नहीं देखा। दिन-भर अध्ययन करते थे, रात्रि में सामायिक के बाद गुरुदेव की वैयावृत्य किया करते थे और गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज को लिटाकर वो स्वयं ध्यान-चिन्तन-मनन में बैठ जाते थे। मैं तो थक जाता था। ११:00 बजे तक सो जाता था, उनकी सेवा करने के लिए कहता तो वो मना करते हुए कहते– ‘मुझे जरुरत नहीं। इस तरह हमने मुनि विद्यासागर जी को कभी सोते हुए नहीं देखा। जबरदस्त याददास्त मुनि विद्यासागर जी महाराज को जो भी शिक्षक पढ़ाने आते थे या गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज पढ़ाते थे तो पहले उन्हें वो पिछला पूरा पाठ सुनाते थे। पाठ को सुनाते समय उन्हें कभी भी अटकते हुए नहीं देखा। आज्ञाकारी शिष्य ने गुरु से सीखा योगासन सुबह शौचोपक्रिया के उपरान्त एकान्त में योगासन आदि क्रियाएँ करते थे और विचित्र योगासन जो किसी से नहीं बनते वो भी कर लेते थे। यह सब उन्होंने गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज से सीखा था। उनकी गुरु भक्ति की कसौटी यह थी कि गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज का हर आदेश, उपदेश, संकेत को हर्षित होकर स्वीकार करते थे और कभी भी मुख से न नहीं कहते थे। गुरु सेवा की सबसे बड़ी साधना जब कभी गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज का स्वास्थ्य थोड़ा भी कमजोर होता तब मुनिवर विद्यासागर जी हर पल सेवा में दत्तचित्त रहते थे। मैंने कहा कि आप मुझे क्यों नहीं आदेश देते। यह कार्य तो मैं कर दिया करूँगा। तब मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज बोले- ‘गुरु सेवा स्वयं की जाती है दूसरे से नहीं कराई जाती है। कई बार तो बच्चों के समान गुरु के सिर के नीचे अपना हाथ का तकिया लगा देते थे। यह साधना मुझे सबसे बड़ी साधना लगी बिना हाथ हिलाए घण्टों बैठे रहना। गुरु की भविष्यवाणी पूरी हुई मुझे गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने जैन सिद्धान्त प्रवेशिका पढ़ाना शुरु किया और कभी-कभी मेरी रुचि के अनुसार कभी-कभी सामुद्रिक शास्त्र (हस्तरेखा) की भी सूक्ष्म बातें बता दिया करते थे। मैं उनकी बातों को सुनकर एक दिन मुनि श्री विद्यासागर जी की शुद्धि करा रहा था तब उनका हाथ देखने में आया गुरुदेव के बताए अनुसार मुझे सब कुछ दिख गया। मैंने गुरुदेव को जाकर बताया तो गुरुदेव बोले- ‘श्रमण संस्कृति का नाम रोशन करेगा। आचार्य कुन्दकुन्द और समन्तभद्र, अकलंक आदि आचार्यों की प्रतिछवि के रूप में निखरेगा।' गुरुदेव ज्ञानसागर जी का चमत्कार एक दिन मैं मुनि श्री विद्यासागर जी के साथ शौच क्रिया के उपरान्त लौट रहा था। तब रास्ते में कुछ असामाजिक व्यक्तियों ने व्यंग कसा कि इन नंगे साधुओं के कारण ही वर्षा नहीं हो पा रही है। मैंने यह बात। गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज से जाकर कही और कहा-मुझे क्रोध आ रहा है पीड़ा भी हो रही है कि इन मूर्खा को यह पता नहीं कि जैन साधु प्राणीमात्र के लिए जीते हैं छोटे से छोटे जीवों के जीवन की भी चिन्ता करते हैं। वो प्रकृति को किसी भी रूप में नहीं छेड़ते। गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज बोले- ‘क्रोध मत करो, क्रोध करना व्यर्थ है क्योंकि अज्ञानियों को नहीं पता दिगम्बर साधुओं की साधना। वो अज्ञानी है, इसलिए क्षमा के पात्र हैं। फिर उन्होंने बोला-‘ये छोटा-सा कार्य तो तुम ही कर सकते हो, जाओ बैठ जाओ खुले में और एक घण्टे तक णमोकार मंत्र का जाप ध्यान करो।' गुरु आदेश पर मैं मानस्तम्भ के पास ध्यानस्थ हो गया और १० मिनट बाद ही वर्षा शुरु हो गई, ऐसी धुंआधार वर्षा शुरु हुई कि अजमेर में पानी-पानी हो गया। यह थी गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज की कृपा। दीक्षा के बाद प्रथम केशलोंच पर गुरु का मार्मिक प्रवचन गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज के मुख में दाँत एक भी नहीं बचा था। इस कारण उनकी आवाज साफ नहीं निकलती थी, किन्तु उनके प्रवचन इतने मार्मिक और सरल होते थे कि जनता बड़ी एकाग्रता व आनन्द के साथ सुनती थी। एक दिन मुनि श्री विद्यासागर जी का दीक्षा के बाद प्रथम केशलोंच स्टेज पर हो रहा था और गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज प्रवचन कर रहे थे। तब उन्होंने एकान्तवादियों के द्वारा चारित्र को न मानने वाले मत की ओर निशाना साधते हुए कहा- ‘ज्ञानामृत पीने के लिए चारित्ररूपी प्याला होना चाहिए। जिस प्रकार चाय पीने के लिए बर्तन या कप का होना अति आवश्यक है, वरना वह चाय बर्तन में ही रह जायेगी। इसी प्रकार आत्मा का ज्ञानामृत या आत्मानुभूति या शुद्धात्मानुभूति की योग्यता होने के बावजूद भी चारित्र के बिना उसका रसास्वादन सम्भव नहीं है। इसी तरह मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज की टूटी-फूटी हिन्दी में कन्नड़ का टोन होने के कारण उनका प्रवचन सभी को मीठा लगता था। वे भी छोटे-छोटे दृष्टान्त से आत्मा की बात को समझाया करते थे। मुनि श्री विद्यासागर जी के सान्निध्य का प्रभाव उत्कृष्ट वैरागी तपस्वी मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज के समागम से मेरे भाव वैराग्य से ओत-प्रोत हो गए। तब मैंने मुनि श्री विद्यासागर जी के साथ मुनि बनकर साधना करने का विचार किया। मुझे वह दिन भी याद आ रहा है सोनी जी की नसियाँ में प्रवचन के लिए पूरा प्रांगण जनता से भरा हुआ था। मंच पर पूज्य ज्ञानसागर जी महाराज, मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज एवं क्षुल्लक सन्मतिसागर जी महाराज, क्षुल्लक सुखसागर जी महाराज आदि विराजमान थे और सभा में सर सेठ भागचन्द जी सोनी आदि गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। तब मैं हाथों में श्रीफल लेकर खड़ा हुआ और निवेदन किया- हे गुरुदेव! मुझे मोक्षमार्ग पर चलने हेतु महाव्रत प्रदान करें, मुनि दीक्षा देवें और मुझे अपना शिष्य स्वीकार कर मेरा आत्मकल्याण करें। इतना मेरा बोलना हुआ और पूरी सभा में हंगामा हो गया। तरह-तरह की बातें होने लगीं विरोध को देखते हुए श्री भागचन्द जी सोनी ने बीच-बचाव किया और उन्होंने गुरुदेव से निवेदन किया। हे गुरुदेव! आपने अभी एक जवान युवा को दीक्षा दी है। अतः उन्हें आप १-२ वर्ष देख लें, उसके बाद ही किसी अन्य जवान को दीक्षा देवें। जब तक अशोककुमार जी संघ में रहकर साधना कर लेंगे। समाज को डर है कि जवानी में कहीं कोई अनहोनी न हो जाये। तब गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज बोले- 'अभी भव्य मुमुक्षु ने अपनी भावना रखी है। अभी हमने कोई निर्णय नहीं लिया है। आप लोग व्यर्थ ही चारित्रमोह कर्म को बन्ध कर रहे हैं। समय चक्र के चलते मेरा ऐसा अन्तराय कर्म का उदय आया कि परिजन आकर के मुझे घर ले गए और संसार चक्र में फँसा दिया। इस तरह आपके शिष्य की अनोखी चर्या देखकर भव्यात्मा के भाव भींग उठे। आज तक आपके शिष्य की आध्यात्मिक साधना से प्रभावित होकर सहस्राधिक भव्यात्माओं के भाव वैराग्य से भींगे और अपनी योग्यतानुसार साधना मार्ग में आरूढ़ हुए हैं। ऐसे पारलौकिक चमत्कारी आध्यात्मिक शिष्य को त्रिकाल कोटिकोटि वंदन करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  20. इस पर अग्नि की देशना प्रारम्भ होती है : सो...सुनो तुम : ‘‘दर्शन का स्रोत मस्तक है, स्वस्तिक से अंकित हृदय से अध्यात्म का झरना झरता है। दर्शन के बिना अध्यात्म-जीवन चल सकता है, चलता ही है पर, हाँ! बिना अध्यात्म, दर्शन का दर्शन नहीं। लहरों के बिना सरवर वह रह सकता है, रहता ही है पर हाँ! बिना सरवर लहर नहीं। अध्यात्म स्वाधीन नयन है दर्शन पराधीन उपनयन दर्शन में दर्श नहीं शुद्ध तत्त्व का दर्शन के आस-पास ही घूमती है तथता और वितथता वह यानी, कभी सत्य-रूप, कभी असत्य-रूप दर्शन होता है, जबकि अध्यात्म सदा सत्य चिद्रूप ही भास्वत होता है। स्वस्थ ज्ञान ही अध्यात्म है। अनेक संकल्प-विकल्पों में व्यस्त जीवन दर्शन का होता है। बहिर्मुखी या बहुमुखी प्रतिभा ही दर्शन का पान करतीं है, अन्तर्मुखी, बन्दमुखी चिदाभा निरंजन का गान करती है। Hereat, the discourse of the fire starts : Therefore...you listen: “ The source of philosophy is the head, The spring of spiritualism flows from The heart marked with fylfot. The spiritual life can move on – Does, indeed, move without philosophy But, yes ! Without spiritualism, No appearance of philosophy is there. Without waves, a tank May exist, does exist, indeed, But yes! There can be no wave without a tank. Spiritualism is an independent eye Philosophy is a dependent second-eye, In philosophy, there is no vision of the Supreme Soul "Reality' and 'Non-reality’ Revolve around the philosophy That is, the philosophy, at times, assumes the Truth And, at times, it assumes falsehood, While, the spiritualism, always Radiates in the form of Truth and the Supreme Spirit. The right knowledge of the ‘Self' is spiritualism. The life of philosophy Is engrossed with various resolves and options. An extrovert or a versatile genius only Drinks at the fount of philosophy, An introvert silent halo of intuition Sings the Songs of the, path of salvation / Eternal Soul.
  21. प्रखर चिन्तकों-दार्शनिकों तत्त्व-विदों से भी ऐसी अनुभूतिपरक पक्तियाँ प्रायः नहीं मिलतीं...जो आज अग्नि से सुनने मिलीं। यूँ सोचता हुआ कुम्भ दर्शन की अबाधता और अध्यात्म की अगाधता पाने अग्नि से निवेदन करता है पुनः क्या दर्शन और अध्यात्म एक जीवन के दो पद हैं ? क्या इनमें पूज्य-पूजक भाव है ? यदि...हो...तो... पूजता कौन और पुजता कौन ? क्या इनमें कार्य-कारण भाव है ? यदि..हो...तो.. . कार्य कौन और कारण कौन? इनमें बोलता कौन है और मौन कौन ? ध्यान की सुगन्धि किससे फूटती है? उसे कौन सूँघता है अपनी चातुरी नासा से ? मुक्ति किससे मिलती है ? तृप्ति किससे मिलती है ? बस, इन दोनों की मीमांसा सुनने मिले इस युग को ! From the gifted thinkers, philosophers Even the metaphysicians Aren't generally obtained Such utterings, mellowed by experience..., Which reached the ears that day through the fire. Thinking thus, the pitcher, For achieving the undeniability of philosophy And, The fathomlessness of spiritualism, Entreats the fire again : Are philosophy and spiritualism The two steps of one and the same life ? Are they connected with the sense of the a adored and the adorer ? If...they are, then… Which one is the adorer and which one the adored ? Are they connected With the sense of cause and effect ? If...they are...then... Which one is the effect and which one the cause ? Between them Which one is expressive and which one silent ? Wherefrom does the fragrance of meditation erupt ? Which one smells it With its clever nose ? Through whom the liberation is attained ? Through whom the contentment is achieved ? This Age ought to hear Only the thorough investigation of these both !
  22. ध्यान की बात करना और ध्यान से बात करना इन दोनों में बहुत अन्तर है- ध्यान के केन्द्र खोलने-मात्र से ध्यान में केन्द्रित होना सम्भव नहीं है। लो, ध्यान के सन्दर्भ में आधुनिक चित्रण ! कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं : ‘‘इस युग के दो मानव अपने आपको खोना चाहते हैं- और एक भोग-राग को मद्य-पान को चुनता है; और एक योग-त्याग को आत्म-ध्यान को धुनता है। कुछ ही क्षणों में दोनों होते विकल्पों से मुक्त। फिर क्या कहना। एक शव के समान निरा पड़ा है, और एक शिव के समान खरा उतरा है।” To observe meditation And To converse with meditation Between these two there is a vast difference It is not possible to be absorbed in meditation By simply starting the centres of meditation. Lo, a new-fashioned depiction In the context of meditation ! Some lines are as follows: 'Two human beings Of the modern age Wish to get absorbed Themselves - By the first one The sensual enjoyments The drinking of wine Is selected; While the other one Practises Austerities and renouncement, Profound self-meditation. Within a few moments Both of them Are freed from their options, What to say, then ? The first one is lying alone Like a dead-body, While the other one Has proved his worth Like that of auspicious ‘Šiva.’
  23. ३१-०३–२०१६ वीरोदय (बाँसवाड़ा-राजः) कल्पद्रुम महामण्डल विधान ऊर्ध्व से ऊर्ध्वतर ज्ञान चैतन्य क्रियाशक्ति को प्रकाशित करने वाले गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज को अनन्त नमन करता हूँ... हे गुरुवर! आपके अनोखे शिष्य की हर क्रिया पर भक्तों की पैनी दृष्टि लगी हुई रहती थी। भक्तों की दृष्टि से मुनि विद्यासागर जी की साधना के शिखरों की चमकती धवलता छिप न सकी। इस सम्बन्ध में पदमचंद जी सेठी जयपुर ने एक संस्मरण लिख दिया, वह आपको बता रहा हूँ। विशेषता में विशेषता "सन् १९६८ में दीक्षा से पहले और दीक्षा के बाद हमने कई बार विद्यासागर मुनिराज को रातरातभर एक टाँग पर खड़े देखा है। आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के कहने पर मुनि विद्यासागर जी को स्वास्थ्य की दृष्टि से नीम की पत्तियों का एक लोटा रस पीना पड़ता था। तो भी वो इतने कड़वे रस को पीते हुए नाक-मुँह नहीं सिकोड़ते थे, हँसते-हँसते पी लेते थे और भोजन में स्वादिष्ट रस नमक और मीठा ब्रह्मचारी अवस्था से ही छोड़ दिया था। उनका यह रसना इन्द्रिय विजय के पुरुषार्थ की दृढ़ता इतनी अधिक थी कि कोई भी धोके से भी किसी चीज में मिलाकर नमक-मीठा नहीं दे सकता था। एक बार विद्यासागर जी के हाथ में एक जहरीला कीड़ा ने काट दिया। हाथ में सूजन आ गई किन्तु अपनी वेदना किसी को नहीं बताई। विद्यासागर जी में गुरु के प्रति श्रद्धा-भक्ति-समर्पण इतना था कि वो उनकी पर्याय बन गए थे, कभी भी उनसे दूर नहीं बैठते थे और उनकी नजरों से ओझल नहीं होते थे। मैं कभी-कभार कोई धर्म की बात मुनि विद्यासागर जी से करता था और उस समय ज्यों ही ज्ञानसागर जी महाराज का इशारा होता या कोई हलचल होती तो तत्काल वो वहाँ पहुँच जाते थे। गुरुजी की सेवा में ऐसे तल्लीन रहते थे जैसे-श्रवणकुमार माता-पिता की सेवा में रहते थे। उस समय मुनि विद्यासागर जी को हिन्दी भाषा अच्छे से नहीं आती थी, तो भी गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज इनका हिन्दी का अभ्यास बढ़ाने के लिए प्रवचन करवाया करते थे, मुझे याद है, विद्यासागर जी का पहला प्रवचन सरावगी मोहल्ला अजमेर में हुआ था और वह प्रवचन "Honesty Is The Best Policy" विषय पर हुआ था। वह प्रवचन ऐसा धाराप्रवाह हिन्दी, अंग्रेजी में हुआ था कि सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। इतने अल्प समय में कन्नड़भाषी होने के बावजूद भी हिन्दी, अंग्रेजी भाषा पर दक्षता हासिल कर ली थी। उस प्रवचन के बाद अजमेर में जगह-जगह प्रवचन हुए, जिसको सुनने के लिए लोग दौड़े-दौड़े आते थे।" इस तरह मुनि विद्यासागर जी के प्रवचन से प्रभावित होकर अजमेर में कई स्थानों पर आपके एवं मुनि विद्यासागर जी के प्रवचनों का आयोजन किया जाता था। मुनि विद्यासागर जी महाराज ज्ञानानुभूति को निरंतर आपकी कसौटी पर कसते चले जा रहे थे। ऐसे सम्यक् पुरुषार्थी को नमन करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  24. और कर्तव्य की सत्ता में पूरी तरह डूब गया है, अब मौन मुस्कान पर्याप्त नहीं, आपके मुदित मुख से बस, बचना चाहता है, प्रभो! परिणाम-परिधि से अभिराम-अवधि से अब यह बचना चाहता है, प्रभो! रूप-सरस से गन्ध-परस से रहित, परे अपनी रचना चाहता है, विभो! संग-रहित हो। जंग-रहित हो। शुद्ध लोहा अब ध्यान-दाह में बस पचना चाहता है, प्रभो!’’ प्रभु की प्रार्थना, कुम्भ की तन्मयता ध्यान-दाह की बात, ज्ञान-राह की बात सुन कर, अग्नि बोलती है बीच में : ‘‘युगों-युगों की स्मृति है, बहुतों से परिचित हूँ, साधु-सन्तों की संगति की है ! And It has fully immersed into The power of dutifulness, Now Only a silent smile isn't enough, It wishes indeed, From your joyous face. Your holy utterings, O Lord! - From the compass of consequences From the fascinating durations Now it Desires to keep himself away, O Lord! Beyond the charms of beauty and juices Beyond the charms of fragrance and touch It wants to make its own creation, O Lord ! Having no ‘alloy' 78a with it of worldly possessions Having no ‘rusted element' 78% of alien feelings thoughts and deeds. Now, the genuine iron Tries to be only immersed Into the flames of meditation, my Lord !" On hearing about the earnest prayer to Lord, The complete identification of the pitcher, The point of absorption into the meditation, The point of the path of knowledge, The fire interrupts to say: "I remember from time immemorial, Am acquainted with very many persons Have moved in the company of saints and hermits !
  25. “मन-वांछित फल मिलना ही उद्यम की सीमा मानी है''_ इस सूक्ति को स्मृति में रखता हूँ। यही कारण है कि, पथ में विश्राम करना यह पथिक नहीं जानता। प्रभु से निवेदन-फिर से अपूर्व शक्ति की माँग! भुक्ति की ही नहीं, मुक्ति की भी चाह नहीं है इस घट में वाह-वाह की परवाह नहीं है प्रशंसा के क्षण में। दाह के प्रवाह में अवगाह करूं परन्तु, आह की तरंग भी कभी नहीं उठे इस घट में...संकट में। इसके अंग-अंग में रंग-रग में विश्व का तामस आ भर जाय कोई चिन्ता नहीं, किन्तु, विलोम-भाव से यानी ता...म...स स...म...ता...! हे स्वामिन्, और सुनो...! व्यक्तित्व की सत्ता से पूरी तरह ऊब गया है यह, ‘The attainment of the desired results indeed, Has been acknowledged the limit of the endeavours’ - -This saying is retained in my memory. That is the reason why, This wayfarer doesn’t know To take rest on the way. Pray to God-again a requisition For an unique strength ! Not only the longing for sensual gratifications, But even that for liberation Isn't there within this Pitcher There is no concern for repeated applauds In the moments of praise. Let me immerse into the stream of feverish heat, But, Even a ripple of sigh Should never arise Into this pitcher...in severe troubles. Let the darkness of the universe should come And fill its each and every limb, Each and every nerve- There is nothing to be worried for, But, through the sense of a reverse order of words-, That is to say, "Tāmasa”, that is ignorance'... Samatā...,” that is, 'Equanimity’! O Lord, listen a bit more...! It has been bored up fully With the sway of personality,
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