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    1. *‼आहारचर्या*‼
       *श्री सिद्धयोदय नेमावर*
        _दिनाँक :१४/०८/२०१९_
      *आगम की पर्याय महाश्रमण युगशिरोमणि १०८ आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज* _को आहार दान का सौभाग्य *श्रीमान विनय कुमार जी जैन लुहाड़िया खातेगांव* वालो को एवं उनके परिवार को प्राप्त हुआ है।_

      इनके पूण्य की अनुमोदना करते है।
                  💐🌸💐🌸
      *भक्त के घर भगवान आ गये*
                🌹🌹🌹🌹
      *_सूचना प्रदाता-:श्री अक्षय जी जैन खातेगांव_*
             🌷🌷🌷
      *अंकुश जैन बहेरिया
      *प्रशांत जैन सानोधा

    2. पर्यूषण पर्व / मोक्ष का साक्षात उपाय है ‘मैं’ छोड़कर दूसरों को क्षमा करना

       

      पर्युषण पर्व पर आज के अतिथि संपादक आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज...

      उन्होंने कहा, पयुर्षण जीवन को सर्वोत्तम तरीके से जीने की कला सिखाने वाले 10 लक्षणों काे व्यवहार में उतारने का पर्व

       

       

      पर्युषण पर्व मोह की नींद में सोए लोगों के लिए सबक लेकर आया है। इन दिनों संसार के मूल कारण- आठ कर्म छूट जाते हैं। कहा भी है- 


      पर्वराज यह आ गया, चला जाएगा काल।
      परंतु कुछ भी ना मिला, टेढ़ी हमारी चाल॥

       

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      हमारी चाल टेढ़ी है, पर्वराज न आता है, न जाता है। हम चले जा रहे हैं। हमें सांसारिक संबंधों से छुट्टी लेनी है, परिश्रम से नहीं। आचार्यों ने वस्तु के स्वभाव को धर्म बताया है। दस प्रकार के क्षमादि भावों को धर्म कहते हैं। धर्म, अधर्म, आकाश और काल भी वस्तु है। सभी का अपना स्वभाव ही उनका धर्म है। तो आज हम कौन से धर्म का पालन करें, जिससे कल्याण हो।

      स्वभाव तो हमेशा धर्म रहेगा ही, लेकिन इस स्वभाव की प्राप्ति के लिए जो किया जाने वाला धर्म है वह है- ‘खमादिभावो या दसविहो धम्मो’- क्षमादि भाव रूप दस प्रकार का धर्म आज से शुरू हो रहा है। क्षमा धर्म के लिए आज का दिन तय है। क्षमा धर्म की बड़ी महत्ता बताई गई है। करोड़ नारियल चढ़ाने में जितना फल मिलता है, उतना फल एक स्तुति से मिलता है और करोड़ स्तुति का फल एक बार जाप से मिलता है।

      जितना फल करोड़ जाप से मिलता है, उतना एक बार मन-वचन-काय को एकाग्रकर ध्यान से मिलता है। शारीरिक-वाचनिक-मानसिक क्रिया जितनी निर्मल होती जाती है, उतना फल मिलता जाता है। कोटि बार ध्यान से जो फल मिलता है, वह एक क्षमा से मिलता है। क्षमा से बैर नहीं रखना है। मोक्ष का साक्षात उपाय क्षमा है। आप आधि-व्याधि से तो दूर हो सकते हैं, पर उपाधि से दूर होना मुश्किल है, ‘मैं’पना नहीं निकलता।

      आधि मानसिक चिन्ता को कहते हैं और व्याधि शारीरिक बीमारी है। उपाधि बौद्धिक विकार है। समाधि आध्यात्मिक है। क्षमा करने वाले अनंतचतुष्टय का अनुभव करते हैं। पर घाति चतुष्टय का क्या? वहां सुख अनंत है, यहां दुख अनंत है। आत्मा के अहित का कारण कषाय यानी राग-द्वेष जैसे अवगुण हैं। इन्हें हटाने पर ही क्षमा की सच्ची भावना आ पाएगी।

      सर्वोत्तम तरीके से जीने की कला सिखाने वाले 10 लक्षणों

       

      • 1. उत्तम क्षमा: क्रोध- बैर छोड़कर सभी से क्षमा मांगना और क्षमा करना; उत्तम क्षमा है।
      • 2. उत्तम मार्दव: सब मैं करता हूं- यह सोच अहंकार है। इसे छोड़कर नम्र होना मार्दव धर्म है।
      • 3. उत्तम आर्जव: मन की बात सुनना यानी मन, वचन, कार्य से एक हो जाना आर्जव धर्म है। 
      • 4. उत्तम शौच: शुचिता को शौच कहते हैं। मन को निर्मल बनाने का प्रयास उत्तम शौच है।
      • 5. उत्तम सत्य: जो सत्य पर अटल, वो साधक है। ईश्वर को अंतिम सत्य मानना उत्तम सत्य है।
      • 6. उत्तम संयम: स्वस्थ, संतुलित सोच के लिए नियंत्रित जीवन जीना उत्तम संयम है।
      • 7. उत्तम तप: जीवन का सार तप है। भीतर की अपार संभावनाओं को पहचानना उत्तम तप है।
      • 8. उत्तम त्याग: आधी आय परिवार, एक चौथाई आपत्ति के लिए, एक चौथाई दान उत्तम त्याग है।
      • 9. उत्तम आकिंचन्य: कुछ भी मेरा नहीं है, ऐसा व्यवहार और भाव रखना उत्तम आकिंचन्य है।
      • 10. उत्तम ब्रह्मचर्य: ब्रह्म का अर्थ है आत्मा और आत्मा को जानने की कोशिश है ब्रह्मचर्य।
      •  

      आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ( आचार्य श्री मध्यप्रदेश के नेमावर में चातुर्मास कर रहे हैं)

       

       

       

       

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    3. गुरु प्रभावना मे दे सहयोग 
      इस बार दस लक्षण पर्व पर आपके मंदिर मे इस का प्रिंट निकाल कर जरूर लगाए 

      प्रिंट करने के लिए  पीडीऍफ़ डाउनलोड कर सकते हैं 

       

       

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    आचार्य श्री द्वारा रचित हाइकू (हायकू)

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    आचार्य श्री द्वारा रचित हाइकू (हायकू)

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  • संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज

    ये ऐसे संत है जिनका जीवन एक सम्पूर्ण दर्शन है जिनके आचरण में जीवों के लिए करुणा पलती है जिनके विचारों में प्राणी मात्र का कल्याण आकर लेता है,जिनकी देशना में जगत अपने सदविकास का मार्ग प्रशस्त करता है |आप निरीह, निस्पृह वीतरागी है फिर भी आपके विचार भारतीयता के प्रति अगाध निष्ठा, राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यपरायणता से ओतप्रोत है आपका चिंतन प्राचीन भारतीय हितचिंतको दार्शनिको एवं संतो का अनुकरण करते हुए भी मौलिक है |आचार्य महाराज तो ज्ञानवारिधी है और उनके विचारों को संकलित करना छोटी सी अंजुली में सागर को भरने का असंभव प्रयास करना है|

    रास्ता उनका, सहारा उनका, मैं चल रहा हूँ दीपक उनका, रौशनी उनकी मैं जल रहा हूँ प्राण उनके हर श्वास उनकी मैं जी रहा हूँ

     

    From Wikipedia Acharya Shri Vidyasagarji Maharaj (born 10 October 1946) is one of the best known modern Digambara Jain Acharya(philosopher monk). He is known both for his scholarship and tapasya (austerity). He is known for his long hours in meditation. While he was born in Karnataka and took diksha in Rajasthan, he generally spends much of his time in the Bundelkhand region where he is credited with having caused a revival in educational and religious activities. Know more about him

     

     

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