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अर्थ को सामने भले ही रखो किंतु अर्थ को अपने सिर पर मत रखना सिर पर तो श्री जी को रखना ही शोभा देता है - आचार्य श्री

छतरपुर / खजुराहो में विराजमान परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज ने अपने मांगलिक प्रवचन के दौरान मनुष्य को प्राप्त अलौकिक अनुभूतियों के बारे में बताया आचार्य श्री ने कहा देवों के पास बहुत सारी विभूतियां होती हैं । और देवों का देव सोधर्म इन्द्र सभी देवताओं में अग्रणी माना जाता है। परंतु उसके मन में एक प्रश्न की उलझन सदैव बनी रहती है । कि मैं सर्वशक्तिमान होकर भी अपनी इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पा रहा हूँ। भगवान के दीक्षित होने के उपरांत सौधर्म इंद्र जब भगवान का अभिषेक करता है और देवों की पंक्ति में सबसे आगे रहता है। फिर भी सौधर्मेंद्र जब देखता है कि मनुष्य भगवान को आहार दे रहे हैं और मैं आहार नहीं दे पा रहा हूं। यह देख कर उसके मन में कुंठा होती है ।और वह गुणगान करके भक्ति भाव करके अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है। उस समय सभी देव  प्रमुदित होते हैं परंतु सौधर्मेंद्र इतना प्रमुदित और तल्लीन हो जाता है कि वह तांडव नृत्य करने लगता है। इसके बावजूद भी उसके पास आहार दान देने की योग्यता नहीं आती है । सौधर्म इन्द्र आहार दान तो नहीं दे सकता पर अमृतपान करा सकता है। परंतु मुनिराज अमृत ले तभी तो वह अमृतपान कराएं। लेकिन अमृत आहार का पात्र नहीं है । अमृत को कभी आहार की संज्ञा नहीं दी गई। वह खाने की चीज नहीं है । वह केवल चखने की चीज है अमृत परिश्रम के द्वारा प्राप्त नहीं होता है। परिश्रम के आधार पर दिया गया आहार ही मुनिराज के ग्रहण योग्य है । सौधर्म इंद्र  को तांडव नृत्य करने के बाद भी पसीना तक नहीं आता है ।   इसलिए सौधर्म इंद्र  की पर्याय तपस्या के योग्य नहीं मानी गई है । दान आदि देने योग्य भी नहीं है अभिषेक के समय वह सबके साथ शामिल होकर हाथ बस लगा सकता है। उसे मात्र हाथ लगाने का सौभाग्य प्राप्त होता है। सौधर्मेंद्र के मन में पीड़ा तो होती होगी पर कर क्या सकता है। सौधर्म इंद्र ना तो कुछ ले सकता है ना कुछ दे सकता। यदि वह दे सकता है तो धोक  (नमन) दे सकता है और ले सकता है तो मात्र आशीर्वाद ले सकता है। योग्यताएं अनेक प्रकार की हुआ करती है पर्यायगत यह कमी है । कि सौधर्म देव होने के बाद भी महादेव नहीं बन सकता। वह देवाधिदेव के सेवा तो कर सकता है परंतु सीमा में ही कर सकता है। इन सभी बिंदुओं को लेकर हम सभी को सोचना है कि हमें जब तक मुक्ति नहीं मिलती अर्थात हम देव हो गए तो हमारा क्या होगा। वहां हम पूजन तो कर सकेंगे पर भोजन नहीं कर सके। सौधर्म इंद्र के नृत्य  करते हुए भावनाओं को देख कर ऐसा लगता है कि उसे अगली पर्याय में मुक्त होने का सौभाग्य प्राप्त करने वाला है। सौधर्म इंद्र  के पास इतना पुण्य अर्जित है लेकिन वर्तमान में उसका पुण्य काम नहीं आ रहा है । अर्थात वह आहार दान नहीं दे पा रहा है उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में धन पुण्य  से ही आता है लेकिन उसे देने के लिए भी पुण्य का उदय चाहिए । जिसके माध्यम से कर्मों की निर्जरा हो जाती है पुण्य को अर्जित करने से भी कर्मों की निर्जरा होती है। सौधर्म इंद्र सोचता है मनुष्य कितना भाग्यशाली है वह धरती का देवता है पूरक परीक्षा में पास होने वालों को अधर में लटकना पड़ता है हमारे पास स्वतंत्रता है परंतु देवों के पास कई प्रकार की परतंत्रताएं हैं अतः मनुष्य जीवन का सही उपयोग करो । और मनुष्य जीवन को मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर करके दान के माध्यम से आगे बढ़ाओ। पोंटिंग के आर्थिक विचार की पुस्तक का जिक्र करते हुए आचार्य श्री ने कहा सही अर्थशास्त्री वही है जो अर्थ का भली-भांति उपयोग करके जानता है। अर्थ को सामने भले ही रखो किंतु भारत को कभी सिर पर मत रखना सिर पर तो श्री जी ही शोभा देते हैं।
  आचार्य श्री के संघस्थ ब्रह्मचारी सुनील भैया ने बताया कि आज के बाद प्रक्षालन का सौभाग्य प्रदेश के वित्त मंत्री जयंत मलैया के भाई अमेरिका निवासी यशवंत मलैया को प्राप्त हुआ । साथ ही शास्त्र भेंट प्रदान करने का सौभाग्य प्रदेश के वित्त मंत्री की धर्म पत्नी श्रीमती सुधा मलैया और श्रीमती अंजलि मलैया अमेरिका को प्राप्त हुआ। चातुर्मास में एक कलश स्थापना करने का सौभाग्य श्री मदनलाल धन्य कुमार संजय कुमार जी देवास को प्राप्त हुआ। आज के आहार दान का सौभाग्य छतरपुर निवासी श्री पवन कुमार जैन को प्राप्त हुआ। इसके साथ ही दुबई से पधारे पवनेश कुमार जैन ने एक प्रतिमा और एक चातुर्मास कलश की स्थापना करने का सौभाग्य प्राप्त किया।
 

सूर्य की भांति हमारे जीवन से मोह रूपी अंधकार को हटाना ही जीवन की सार्थकता है आचार्य श्री विद्यासागर

दिन  में आप सूर्य को ही मात्र देख सकते हैं ज्योतिष मंडल में बहुत प्रकार के तारामंडल विद्यमान रहते हैं सूर्य के प्रकाश से हम सभी वस्तुओं को तो देख सकते हैं परंतु ज्योतिष में विद्यमान तारामंडल को नहीं देख सकते। तारामंडल बहुत चमकदार होते हैं । लेकिन प्रभाकर का प्रकाशपुंज इतना तेज होता है कि उस प्रकाश के कारण संपूर्ण तारामंडल लुप्त रहता है । चंद्रमा ज्योतिष मण्डल मे गायब तो नहीं होता लेकिन  पर वह अपना प्रकाश भी नहीं फैला पाता है चंद्रमा अपना प्रकाश सूर्य के सामने नहीं फेंक सकता । ऐसा क्यों होता है की संपूर्ण तारामंडल और चंद्रमा सूर्य के आलोक के कारण अपना प्रकाश दिखाने में फीके पड़ जाते हैं सूर्य का तेज इतना अधिक है कि उसके आलोक के आगे तारामंडल दिखते नहीं है और चंद्रमा का दिखना औपचारिकता मात्र रहता है । लेकिन दिन मे उससे प्रकाश प्राप्त नहीं होता ।   हाँ  एक दिन ऐसा भी आता है जब ग्रहण के समय जब सूर्य के तेज राहु के कारण छिप जाता है। लेकिन सूर्य का प्रकाश धरती पर रहता है। और हम सभी राहु के बीच में आ जाने के कारण भी एक दूसरे को देख सकते हैं। यही हाल हमारे जीवन का है मोह रूपी अंधकार हमारे जीवन से प्रकाश खत्म कर देता है । हमारी आत्मा का तेज सूर्य के समान है परंतु अभी हमारा जीवन अंधकारमय है । और हम मात्र चंद्रमा और तारे के प्रकाश से प्रकाशित हो रहे हैं । सूर्य का प्रकाश अभी हमारी आत्मा से नहीं निकला है । हमें अपनी आत्मा में सूर्य रूपी प्रकाश का आलोक प्रकाशित करना है। और मोह रूपी चांद और तारों का प्रकाश सूर्य रूपी प्रकाश के आगे हमारे जीवन में अन्धकारमय बनाये हुए है। यह उद्गार खजुराहो में विराजमान परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन के माध्यम से हजारों की तादाद में उपस्थित जैन समुदाय के बीच रखी प्रवचन में आचार्य श्री की वैज्ञानिक शैली को सुनकर सभी हतप्रभ रह गए कार्यक्रम के प्रारंभ में पाद प्रक्षालन का सौभाग्य सम्यक जैन गुवाहाटी हुकम चंद जैन कुलदीप जैन अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ग्वालियर काका कोटा अनूप जैन कैलिफोर्निया को प्राप्त हुआ पारसनाथ भगवान जिनालय में अखंड दीपक रखने का सौभाग्य हुकम चंद काका को प्राप्त हुआ इसी प्रकार आदिनाथ जिनालय में अखंड ज्योति रखने का सौभाग्य अनुज जी कैलिफोर्निया को प्राप्त हुआ शास्त्र दान का सौभाग्य योगेश जैन खजुराहो को प्राप्त हुए
  साभार : ब्र. सुनील भैया 

मत_फूलों_पाने_पर ...आचार्यश्रीविद्यासागरजीमुनिराज प्रवचन

आँगन में दादाजी बैठे है, उनकी गोदी में नाती बैठा है, दोनों प्रातःकाल की सुनहरी धूप का आनन्द ले रहे है। इसी बीच भीतर से आवाज आती है, ले जाओ..., ले जाओ....., नाती उछल कर भीतर जाता है, भीतर में उसे कहा जाता है यह लडडू तुम्हारे लिए और यह लडडू दादाजी के लिए है। अब वह नाती नाचता हुआ लडडू खा रहा है, दादाजी देखते हुए सोचते है यह होनहार है, अभी इसे अनुभव नही है। फिर इसके उपरांत जो दादाजी को लडडू मिला था, उसमें से भी आधा लडडू नाती को दे देते है इस बार तो कहना ही क्या, नाती और अधिक नाचने लगता है।
अब तत्व दृष्टि से घटाए बालक अवस्था में अज्ञान दशा रहती है, वह किसमे सुख है, किसमे दु:ख है, इसका ज्ञान नही कर पाता। वृद्धावस्था में उसे ज्ञान होता है, वह जानता है कि, किन किन पदार्थों का मैंने अनुभव कर लिया, अब उछलने, कूदने की तो बात ही नही है। इसी तरह ज्ञान दशा होने पर, मांगने की बात नही वस्तु स्वरूप होने पर, वह छोटी झोली को, बड़ी झोली बनाने की बात नही करेगा।
अभी पूजन में बार बार एक ही लाइन को दोहराया जा रहा था। "मेरी झोली छोटी पड़ गई रे..... इतना दिया गुरुवर ने......" मैं तो अब भगवान से यही प्रार्थना करता हूं कि इनकी झोली ही समाप्त हो जाए क्योंकि जो भी झोली में लेगा, दूसरा उससे बड़ी झोली की बात करेगा, इस लिये बिन मांगे सब काम हो जाए। पपौराजी 7 जून गुरुवार के प्रातःकालीन प्रवचन |

समय-समय पर दान करना सीखें श्रावक- आचार्यश्री

सागर से ढाई हजार लोगों ने श्रीफल भेंट कर चातुर्मास का किया निवेदन सागर/ प्रसिद्ध जैन तीर्थक्षेत्र पपौराजी में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर महाराज को सागर से ढाई हजार श्रावको ने सामूहिक रुप से आचार्यश्री से सागर में चातुर्मास हेतु निवेदन करते हुए श्रीफल समर्पित किया 
सागर समाज की तरफ से मुकेश जैन ढाना ने कहा कि 1998 के बाद से  सागर में आचार्य संघ का वर्षा कालीन चातुर्मास नहीं हुआ है।  सागर में चतुर्मुखी जिनालय का का निर्माण कार्य चल रहा है आपके चातुर्मास से इस कार्य में और तेजी आएगी 
ब्रह्मचारिणी रेखा दीदी ने कहा कि सागर में प्रतिभास्थली  कॉलेज की आवश्यकता है। और चातुर्मास के दौरान कॉलेज की आधारशिला रखी जा सकती है 
इस अवसर पर विधायक शैलेंद्र जैन ने भी सागर में चातुर्मास हेतु निवेदन किया।
   आचार्यश्री की सामूहिक पूजन सागर जैन समाज के श्रावक श्रेष्ठियो ने की। पारसनाथ मंदिर कटरा की  पारस प्रगति महिला मंडल ने द्रव्य सजाकर पूजन की। समाज के श्रावक श्रेष्ठि महेश बिलहरा,विधायक शैलेंद्र जैन, प्रेमचंद जैन उपकार,आनंद जैन स्टील और गुरुवर यात्रा संघ के सदस्यों ने आचार्य श्री का पाद प्रक्षालन किया। 
आचार्य श्री जी ने इस अवसर पर अपने मंगल प्रवचन में कहा प्रत्येक श्रावक का कर्तव्य है की वह बांटना सीखे समय-समय पर वितरण (दान) करते रहना चाहिए । क्योंकि दान बहुत महत्वपूर्ण है जैसे किसान फसल काटने के बाद वितरण करता है  उसी प्रकार श्रावक को दान करना चाहिए आप लोगों के द्वारा चातुर्मास की मांग की गई है देखते हैं क्या होता है बुंदेलखंड में नौतपा की एक अलग परंपरा है 9 दिन के तपा यहां पर तपते हैं और जो नीचे तप् जाता है वह ऊपर चला जाता है सागर का जल तप गया और बादल बनकर ऊपर चला गया। और उसके बाद फिर झमाझम बरसता है आचार्य श्री जी ने कहा मानसून आकर भी भटक जाता है जो अनुमान का विश्वास करते हैं वह उनकी ओर नहीं आता है उसे ही भटकना कहते हैं।
भाग्योदय परिसर में  बनने वाले सहस्त्रकूट जिनालय के लिए श्रीमती साधना राजीव जैन, श्रीमती अनीता पदम सिंघई, अनिल मोदी दलपतपुर और  सुषमा प्रदीप फणीन्द्र अंकुर कॉलोनी ने एक-एक प्रतिमा जी  स्थापना कराने की स्वीकृति दी ।
सागर से प्रमुख रुप से पपौरा जी जाने वालों में देवेंद्र जैन स्टील मुकेश जैन ढाना, ऋषभ जैन ठेकेदार, सुरेंद्र जैन मालथोन, सट्टू कर्रापुर, डॉक्टर अरुण सराफ पूर्व विधायक सुनील जैन, ऋषभ मडावरा, अमित जैन रामपुरा, राजाभैया जैन, संतोष कर्द, अनुराग कैटर्स, राजेंद्र सुमन, राजेश जैन रोडलाइंस अशोक पिडरुआ, श्रीमती शकुंतला जैन, डॉ नीलम जैन,जिनेश बहरोल मोनू जैन, संजय शक्कर, गुरुवर यात्रा संघ से सपन जैन, संजय जैन टडा, अंकुश जैन, प्रशांत जैन, मनीष नायक, राकेश निश्चय,आशीष बाछल,अजय लॉटरी,इंजी अनिल जैन,राहुल सतभैया,जित्तू जैन,कमलेश जैन, ऋषभ जैन,सोनू आईटीआई, सहित हजारों लोग उपस्थित थे।

जब तक भ्रम मुक्त नहीं रहेंगे तब तक हमें मुक्ति नहीं मिलेगी : आचार्यश्री

टीकमगढ़ - आचार्य श्री ने कहा कि 2 मित्र बहुत दिन बाद मिलते हैं वे दोनों मित्र कुशल कुशलता उनमें प्राय बनी रहती थी दोनों ने मिलने के बाद ठान लिया कि जो बचपन के दिनों में जो तत्व चर्चा होती है उस पर बात करेंगे एक मित्र ने कहा मैंने राजा के बारे मे आंखों के द्वारा देखा दूसरे मित्र ने पूछा क्या देखा भाई देखना तो पड़ेगा भाई आप बतला दो भाई मैंने वह दृश्य देखा एक राजा को पहले घोड़ी पर बैठा दिया जाता है फिर राजा को घोड़े से हाथी पर बैठा दिया हाथी पर बैठकर राजा अपने नगर में भ्रमण कर रहा था राजा अपने नगर में भ्रमण कर रहा था ऊपर नीचे का दृश्य देख रहा था हाथी से उतारकर राजा को पालकी में बैठा दिया पालकी सुंदर थी जो राजा पालकी पर आराम से बैठा हुआ था ऊपर की ओर ऊपर का दृश्य देख रहे थे। अब राजा की यात्रा का समय पूरा हुआ राजा को पालकी से नीचे उतारा गया नीचे उतरते ही राजा के सेवक हाथ पैर दबाने लग जाते हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि दूसरा मित्र कहता है वह कहता है राजन हाथी पर बैठे घोड़े पर बैठे पालकी पर बैठे और राजन को नीचे उतारा तो सेवक पैर दबाने लग जाते हैं। वह कहता है राजन पैदल तो एक कदम भी नहीं चले फिर थके कैसे ? आचार्य श्री जी कहते हैं यह व्यक्ति का स्वयं का पुण्य होता है जो व्यक्ति को इस प्रकार वैभव की प्राप्ति होती है यह उसके कर्मों का प्रतिफल है हम अध्यात्म की बात करते हैं कर्म आत्मा का परीगमन सामने आता है।   हमें परिश्रम करना चाहिए तभी हम दुख से बच सकते हैं आचार्य श्री जी ने कहा हर पदार्थ की क्रिया अखंड है आचार्य श्री जी ने कहा कोई पूछता है सात तत्व हैं जब तक हम भ्रम मुक्त नहीं रहेंगे तब तक हमें मुक्ति नहीं मिलेगी आचार्य श्री जी ने कहा हम भगवान के दर्शन करते है तो हमेशा हमें 7 तत्व दिखना चाहिए नहीं तो वह दर्शन पूर्ण नहीं माना जाता है आचार्य श्री ने कहा कि बरसों बीत जाते हैं आचार्य श्री ने कहा कोई राजा होता है तो कोई रकं होता है हमें परिश्रम करना चाहिए तभी हम दुख से बच सकते हैं आचार्य श्री जी ने कहा प्राथमिक दशा में कुछ कर्म तकलीफ देते हैं तो उसको दवाई के द्वारा इंजेक्शन के द्वारा ठीक किया जा सकता है रोगों का बाहर आना निश्चित हो जाता है आचार्य श्री जी ने कहा बहुत दिन हो गए है मोक्ष मार्ग पर चलते चलते अज्ञान की दशा में ज्ञानी व्यक्ति भी अपने पथ से भटक जाता है।   संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी

जब तक ज्ञान नहीं होता तब तक परिणामों का नियंत्रण नहीं हो पाता।

जब तक ज्ञान नहीं होता तब तक परिणामों का नियंत्रण नहीं हो पाता। मोक्ष मार्ग का यदि श्रवण ही कर ले तो हमारे परिणाम भी उस पर चलने के हो जाते है। अंत समय में भी यदि हम धर्म के मार्ग पर चलकर मृत्यु को प्राप्त होते है तो भी हमारा कल्याण हो सकता है। यद्यपि हमें आज के काल में अवधि ज्ञानी नहीं मिलते लेकिन आज जो मोक्षमार्ग तीर्थंकरों के द्वारा लिखाया गया उस पर ही बढ़ना चाहिये।   गुरूवर ने बताया रोगी व्यक्ति लौकिक चिकित्सा से निराश होकर अन्त में आध्यात्मिक चिकित्सा में संतो के पास आता है।   मन के अधीन होना छोड़ देना कठिन है लेकिन संभव है स्वाध्याय एवं क्रिया करना दोनों आवश्यक है। कृत, कार्य, अनुमोदना तीनों से व्यक्तियों को पुष्प लाभ होता है। गुरूओं की वाणी अजर-अमर बनाने वाली होती है। परिणामों की विचित्रता पर ज्ञानी को श्रद्धान रखना चाहिए।अशांति मन में होती है शरीर तो मन द्वारा नियंत्रित होता है। धर्मध्यान के लिए छहों संघनन सहायक होते है।   अच्छा श्रावक दो बार ही अहार ग्रहण करता है। एक बार ग्रहण करता है वह योगी है। दो बार ग्रहण करता है वह भोगी तथा तीन बार करता है वह रोगी है।   मोक्ष मार्ग पक्का रास्ता है इस पर दुर्घटना नहीं होती है यदि हमें अच्छा मार्गदर्शक रूपी गरू का सानिध्य प्राप्त होता है।   आज गुरूवर का सुबह 8:30 बजे पाद प्रक्षालन महरौनी से पधारे श्रद्वालुओं द्वारा किया गया एवं तत्पश्चात् गुरूवर का पूजन किया गया।   यह जानकारी डॉ. धर्मेन्द्र जैन द्वारा दी गई एवं संचालन ब्रह्मचारी सुनील भैया जी इन्दौर द्वारा किया गया।  

प्रवचन : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज : (पपौराजी)

आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने पपौराजी में प्रवचन में कहा कि वर्षों पूर्व यहां हमारा चातुर्मास हुआ था। उसका स्मरण ताजा हो रहा है। आपकी बहुत सालों से भावना थी आशीर्वाद की। आज की प्रात:काल की पूर्णिमा के मंगल अवसर पर इंदौर में भी आर्यिका के सान्निध्य में शिलान्यास होने जा रहा है। वे लोग यहां के शिलान्यास का स्मरण कर रहे हैं। कार्य वहां का भी सानंद संपन्न हो जाए, आशीर्वाद उनका मिल रहा है। महाराजश्री ने कहा कि गुरुजी ने संघ को गुरुकुल बनाने का कहा था। यहां से धर्म-ध्यान मिलता है। हमें गुरुजी का जो आशीर्वाद मिला है, वरदान मिला है, गुरुजी की जहां पर कृपा होती है, वहां पर मांगलिक कार्य होता है। भावों के साथ यहां की जनता तपस्यारत थी। भावों के साथ तन-मन-धन के साथ अपने भावों की वर्षा की है। आज पूर्णिमा है, वह भी रविवार को आ गई है। तिथियां अतिथियों को बुला लेती हैं। महाराजश्री ने कहा कि गुरुजी ने सल्लेखना के समय हमसे कहा था तो हमने पूछा था कि हमें आगे क्या करना है? उन्होंने कहा था जो होता है, जिसका पुण्य जैसा होता है, उसकी भावना बलवती होती रहती है। यहां का कार्य संपन्न है। आज हर मांगलिक कार्य आप लोगों की भावना व उत्साह को देखकर कार्य करने को कटिबद्ध हो गए हैं। वैसे काम छोटा लगता है लेकिन काम की गहराई की नाप भी निकाली जाती है, भावों की गहराई भी देखी जाती है। कल 5-6 महाराजजी आ गए हैं, उनका भी समागम हो गया है। भावों में कभी दरिद्रता नहीं रखी जाना चाहिए। महाराजश्री ने कहा कि बुंदेलखंड बाहर के प्रदेश वालों को प्रेरित करता रहता है। यहां के लोगों के समूह ने उदारता के साथ जो धनराशि दी है, वह गौरव का विषय है तथा जो कुछ अधूरा है, वह पूर्ण होने जा रहा है। जैन जगत जागरूक व समर्पित है। करोड़ों रुपए बड़े बाबा के पास आ गए और आते जा रहे हैं। जनता अभी थकी नहीं है। सात्विक भोजन हो रहा है। बच्चों को आगे के जीवन में और अच्छे संस्कार बढ़ाते जाएं। सहयोग बहुत दूर से भी मिल रहा है। देव भी उनके चरणों में सहयोग वहां देते रहते हैं। उनके चरणों में रहते हैं। जहां दया, धर्म, संस्कार व अहिंसा धर्म की विजय होती है, वे सहयोग में रहते हैं। यहां पर आसपास छोटे-छोटे गांवों में 4-5 हजार समाज के घर हैं। यहां के लोगों ने बीड़ा उठाया है। उत्साह के साथ आए हैं और आएंगे। अभी मंगलाचरण हुआ है। महाराजश्री ने कहा कि यहां पर प्रतिभास्थली की पूर्व पीठिका की कार्यस्थली बनी है। सेवा की गतिविधियां ब्रह्मचारिणी संभालेंगी। अध्ययन के साथ संचालन करेंगी। एकाध महीने का समय बचा है। निवृत्त होकर मंगलाचरण बढ़ाएंगी। इंदौर में शिलान्यास संपन्न होकर तैयार हो रहा है। वे यहां पर भी आई हैं। 110 छात्राओं के आवेदन आए हैं। 54 आवेदनों का चयन हो गया है। यह आंकड़ा 9 का है तथा अखंड है। महाराजश्री ने आगे कहा कि यह संख्या उत्साह का कार्य है। रात-दिन एक करके व अपनी भावनाएं उड़ेल करके कार्य अवश्य तैयार करेंगे। यह सब कुछ गुरुदेव की कृपा से हो रहा है। हम तो बीच में आकर लाभ ले रहे हैं। मूल स्रोत तो गुरुजी ही हैं। हमें फल की इच्छा नहीं है लेकिन उत्साह गुरुजी से मिलता रहता है। आपकी उत्साह, भावना व प्रवृत्ति बढ़ती चली जाए।

आचार्य श्री प्रवचन २९ अप्रैल २०१८ पपौरा जी

निर्मलकुमार पाटोदी,इंदौर : वर्षों पूर्व यहाँ हमारी चातुर्मास हुआ था। उसका स्मरण ताज़ा हो रहा है। आपकी बहुत सालों से भावना थी, आशीर्वाद की। आज की प्रात:काल की पूर्णिमा के मंगल अवसर पर इंदौर में भी आर्यिका के सानिध्य में शिलान्यास होने जा रहा है। वे लोग यहाँ के शिलान्यास का स्मरण कर रहे हैं। कार्य वहाँ का भी सानंद सम्पन्न हो जाए, आशीर्वाद उनके मिल रहा है। गुरु जी ने संघ को गुरुकुल बनाने का कहा था। यहाँ से धर्म-ध्यान मिलता है। हमें गुरु जी का जो आशीर्वाद मिला है, वरदान मिला है। गुरु जी की की जहाँ पर कृपा होती है, वहाँ पर माँगलिक कार्य होता है। भावों के साथ यहाँ की जनता तपस्या रत थी। भावों के साथ तन-मन-धन के साथ अपने भावों की वर्षा की है। आज पूर्णिमा है, वह भी रविवार को  आ गई है।  तिथियाँ अतिथियों को बुला लेती है। 
गुरु जी ने सल्लेखना के समय हमसे कहा था
हमने पूछा था, हमें आगे क्या करना है ? उन्होंने कहा था जो होता है, जिसका पुण्य जैसा होता है, उसकी भावना बलवती होती रहती है। यहाँ का कार्य सम्पन्न है। आज हर मांमलिक कार्य, आप लोगों की भावना, उत्साह को देख कर, कार्य को करने को कटिबद्ध हो गए हैं।  वैसे काम छोटा लगता है लेकिन काम की गहराई की नाप भी निकाली जाती है, भावों की गहराई भी देखी जाती है। 
कल पाँच-छ: महाराज जी आ गए हैं, उनका भी समागम हो गया है। 
भावों में कभी दरिद्रता नहीं रखी जाना चाहिए। बुन्देलखण्ड बाहर के प्रदेशवालों को प्रेरित करता रहता है। यहाँ के लोगों का समूह ने उदारता के साथ जो धनराशि दी है, यह गौरव का विषय है। जजों कुछ अधुरा है, पूर्ण होने जा रहा है। जैन जगत जागरुक है समर्पित है। करोड़ों रुपए बड़े बाबा के पास आ गए और आते जा रहे हैं। जनता अभी थकी नहीं है। सात्विक भोजन हो रहा है। 
बच्चों को आगे के जीवन में और अच्छे संस्कार बढ़ाते जाए। सहयोग बहुत दूर से भी मिल रहा है। देव भी उनके चरणों में सहयोग वहाँ देते रहते हैं। उनके चरणों में रहते हैं। जहाँ, दया, धर्म, संस्कार, अहिंसा धर्म की विजय होती है, वे सहयोग में रहते हैं। यहाँ पर आस पास छोटे-छोटे गाँवों में चार-पाँच हज़ार समाज के घर हैं। यहाँ के लोगों ने बीड़ा उठाया है। उत्साह के साथ आए हैं और आवेंगे। अभी मंगलाचरण हुआ है। यहाँ पर प्रतिभा स्थली की पूर्व पीठिका की कार्य स्थली बनी है। सेवा की गतिविधियाँ ब्रह्मचारिणी सम्हालेंगी। अध्ययन के साथ संचालन  करेंगी। एकाध महिने का समय बचा है। निवृत्त होकर मंगलाचरण बढ़ावेंगी। इंदौर में शिलान्यास सम्पन्न होकर के तैयार हो रहा है। वे यहाँ पर भी आई हैं। ११० छात्राओं के आवेदन आए हैं। ५४ आवेदनों का चयन हो गया है। यह आँकड़ा ९ का है अखण्ड है। यह संख्या उत्साह का कार्य है। रात-दिन एक कर के अपनी भावनाएँ उँड़ेल कर के कार्य अवश्य तैयार करेंगे। 
यह सब कुछ गुरुदेव की कृपा से हो रहा है। हम तो बीच में आ कर लाभ ले रहे हैं। मूल स्त्रोत तो गुरु जी ही हैं। हमें फल की इच्छा नहीं है। लेकिन उत्साह गुरु जी से मिलता रहता है। आप अपकी उत्साह, भावना, प्रवृत्ति
बढ़ती चली जाए।

सोयावीन जैसे घातक बीज से जमीन की उर्वरक क्षमता हो रही कम ....... आचार्य श्री

डिंडौरी (मप्र)-  सोयावीन भारत का बीज नहीं है, यह विदेशों में जानवरो को  खिलाने वाला आहार है। उक्त उदगार दिगम्बर जैनाचार्य श्री विधासागर जी महाराज ने मध्यप्रदेश के वनांचल में वसे डिंडौरी नगर में एक महती धर्म सभा को  सम्बोधित करते हुऐ व्यक्त किये। आचार्य श्री ने वताया कि भारत मे सोयावीन से दूध,विस्किट, तेल आदि खाद्यय उपयोगी वस्तुएं लोग खाने में उपयोग कर रहे है।  सोयावीन का बीज भारत मे षणयंत्र पूर्वक भेजा गया है। इसे अमेरिका जैसे अनेक देशों में शुअर आदि जानवरों को खिलाने के लिये उत्पादित करते है।     भारत मे आज बहुतायात सुबह नींद से उठते ही इसका उपयोग विसकुट, पैक दूध बच्चों से लेकर बड़े तक खाने में उपयोग कर रहे है।विदेश का जानवरों का खाद्वय  पद्वार्थ हम जानकर उपयोग कर रहे है। इसके घातक परिणाम देखने को मिल रहे है। गम्भीर विमारियाँ, बच्चों के शारीरिक,मानसिक विकास में कमी, आदि कई प्रकार के परिणाम परोक्ष रूप से देखने मिल रहे हैं। इस देश की सोना उगलने बाली उपजाऊ  जमीन की उर्वरक क्षमता खत्म हो रही है। जिसका मुख्य कारण वह विदेशी सोयावीन का बीज जो दिनों दिन जमीन से सारे तत्व नष्ट कर रहा है । 
पारम्परिक बीजों की बुवाई करें। स्वदेशी अपनावें। सोना , हीरा, मोती उगलने  बाली जमीन को वापिस पाएं।। धर्म सभा मे गोटेगांव से पूर्व नगर पालिक अध्यक्ष श्री राजकुमार जैन, अशोक नगर से श्री विजय धुर्रा, तेंदूखेड़ा से महीष मोदी, सतना से अशोक जैन, जबलपुर,रांझी, मण्डला,विलासपुर, आदि स्थानों से बड़ी तादात में धर्मानुरागी जन उपस्थित थे। ब्र.सुनील भैया द्वारा धर्मसभा का कुशलता पूर्वक संचालन किया गया।।
 

फ़टे हुये जींस पहनना दरिद्रता को आंमत्रण देना है👉🏻आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

डिंडोरी (म.प्र.)- आप लोग भिन्न भिन्न प्रकार के हार गले में पहनते हैं और यदि नकली हो  तो नहीं पहनेगे।लेकिन आज नकली आभूषण भी पहने जा रहे हैं। नकली आभूषणो,फटे वस्त्रो,का प्रभाव व्यक्ति पर पङता है ज्योतिष शास्त्रों में इसका स्पष्ट उल्लेख है,यहाँ तक की जिन फटे वस्त्रो को भिखारी भी नहीं पहनता उन जींस आदि वस्त्रों को फैशन के नाम पर बच्चे पहन लेते है इसका दुष्प्रभाव देखने में आ रहा है। उक्त आशय के उदगार डिडोरी में धर्म सभा को संबोधित करते हुए संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज ने कहे।आचार्य श्री ने कहा कि सोना  खाया भी जाता है,पहले रहीस लोग सोना खाते थे।क्या खाना ?कैसे खाना ? इसका प्रभाव पडता है।
हमारे पास एक विद्यार्थी आया वह फटा हुआ जींस पहने था वह भी एक एक जगह से नहीं कई जगह से फटा था हमने उससे समझाया तो वह मान गया। वस्तुतः शिक्षा के साथ वस्त्र,आभूषण भी हमारे संस्कारों को दिखाते हैं।आप को क्या खाना है ?, क्या पहनना हैं ? ये आपके संस्कृति और संस्कारों दिखाने वाले हैं इसीलिए माता पिता को इस ओर ध्यान देना चाहिए।आज हथकरघा में शुद्ध वस्त्रो का उत्पादन हो रहा है ये वस्त्र शरीर के गुण धर्म के अनुरूप तो है ही अन्य लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं और इनका उत्पादन पुरी तरह आहिंक रूप से किया जा रहा है।
पूज्य आचार्य भगवंत ने हथकरघा के लिए आचार्य श्री ने श्रमदान का नाम दिया है और इसके माध्यम से सौकङो लोगो को अत्मनिर्भर होने का अवसर मिला रहा है।हम सब शुद्ध बस्त्रों को अपनाते हुए दुसरे लोगों को भी प्रेरित करे।

मंगल प्रवचन- आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज @ अमरकंटक

मंगल प्रवचन- आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज @ अमरकंटक उपदेश के बिना भी विद्या प्राप्त हो सकती है। जिस राह नहीं चलते वहां रास्ता नहीं, यह धारणा नहीं बनाना चाहिए। कुछ लोग होते हैं, जो रास्ता बनाते जाते हैं। महापुरुष आगे चलते जाते हैं और रास्ता बनता जाता है। आचार्यश्री ने अपने मंगल प्रवचनों में आगे कहा कि समवशरण में सब कुछ प्राप्त हो जाता है किंतु सम्यग्दर्शन मिले, जरूरी नहीं। बाहरी कारण मिलने के साथ भीतरी कारण मिले, यह नियम नहीं होता। अंतरंग निमित्त बहुत महत्वपूर्ण होता है। चक्रवर्ती भरत के 923 बालक जिन्होंने कभी नहीं बोला, वे दादा तीर्थंकर से 8 वर्ष पूर्ण होने के बाद कहते हैं कि भगवन् हमें दीक्षा प्रदान करें। साक्षात तीर्थंकर भगवान का निमित्त पाकर बिना उपदेश सुने ही स्वयं दीक्षित हो जाते हैं। यह समवशरण का अतिशय है। वे दीक्षा धारण कर सीधे जंगल चले जाते हैं। उपदेश के बिना समग्यदर्शन भी संभव है। जानकर भी शास्त्र का श्रद्धा नहीं करना शास्त्र का अवर्णवाद है। मोक्ष मार्ग का निरूपरण करते समय स्वयं को संयत कर लेना चाहिए, वरना स्वयं के साथ-साथ मोक्ष मार्ग का भी बिगाड़ हो जाता है। कषाय के रूप अनेक प्रकार के होते हैं। जिस तरह सूर्य, चंद्रमा और दीपक से अलग-अलग रोशनी मिलती है तथा मुझे मोक्ष मार्ग मिला है तो दूसरों को भी प्राप्त हो जाए, ऐसा वात्सल्य भाव ज्ञानी को होता है। जिस तरह गाय अपने बछड़े के प्रति वात्सल्य भाव रखती है। जो केवल ज्ञान का विषय होता है वह उसे मति ज्ञान और श्रुत ज्ञान का विषय नहीं बना सकते हैं। जिनेन्द्र देव की वाणी जिनवाणी को गौरव के साथ रखना चाहिए। अनादि मिथ्या दृष्टि भी सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकता है। एक चोर के लिए सामान्य धर्मी श्रावक प्रेरक बनकर सम्यग्यदर्शन ज्ञान चारित्र की उपलब्धि करा सकता है। मंत्र सिद्धि का सदुपयोग कर एक अंजन चोर भी निरंजन बन जाता है।  

सांसारिक वैभव अस्थिर व अस्थायी होता है : आचार्यश्री

अमरकंटक (छत्तीसगढ़)। प्रसिद्ध दार्शनिक व तपस्वी जैन संत शिरोमणिश्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा है कि सांसारिक वैभव अस्थिर व अस्थायी होता है। यह एक पल में प्राप्त और अगले ही पल समाप्त हो सकता है। यही संसार की लीला है। इसलिए यह वैभव प्राप्त होने पर भी कभी संतोष का त्याग नहीं करें और न ही अहंकार को पास में फटकने दें।   आचार्यश्री ने बताया कि सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही लक्ष्यों पर ध्यान रखते हुए यह भी सदैव याद रखें कि लक्ष्य को प्राप्त करने का रास्ता कठिनाइयोंभरा है। यह याद रखने से तो कठिनाइयां भी कम हो जाती हैं।   आचार्यश्री यहां श्रद्धालुओं की विशाल सभा को संबोधित कर रहे थे। इससे पूर्व यहां ससंघ ने आशीर्वाद प्राप्त किया। पहुंचने पर श्रद्धालुओं ने उनका हार्दिक अभिनंदन करते हुए आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर अमरकंटक के शैल शिखर पर निर्माणाधीन विशाल भव्य जैन मंदिर के सम्मुख 1008 जिन प्रतिमायुक्त सहस्रकूट मान स्तंभ का शिलान्यास संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज के ससंघ सान्निध्य में किया गया। मान स्तंभ का जिन भवन बहुमंजिला व कीर्ति स्तंभ की शैली में होगा। शिलान्यास समारोह में बिलासपुर के जाने-माने व्यवसायी प्रमोद सिंघई व विनोद सिंघई ने परिवार सहित समारोह को सफल बनाने के लिए विशेष योगदान दिया। आचार्यश्री विद्यासागरजी ने कहा कि देवों के पास असीम वैभव होता है, मगर मन पर अंकुश नहीं होता है। सुख तो भोगते हैं किंतु संतोष नहीं होता। संतोष धारण की प्रवृत्ति मानव में होती है, देवों में नहीं। धार्मिक कार्यों में व्यय से मानव संतोष की अनुभूति करता है। मन पर अंकुश लगा व संयम धारण कर संतोष व सुख पा लेता है। हाथी की दिशा ठीक रखने के लिए महावत हाथी के सिर पर अंकुश का प्रयोग करता है। किसी की आवश्यकता की पूर्ति में सहायता करना अनुग्रह है, अनुग्रह से संतोष की अनुभूति होती है। चलने व गतिशीलता को प्रगति का सूचक बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि लगातार चलने वाले विरले ही होते हैं। चलने का अर्थ गतिशील होना है। आपने कुछ हास्य-भावों के साथ कहा कि हमारे गमन की सूचना पाकर कुछ लोग चलने लगते हैं कि महाराज हमारे गांव या नगर आ रहे हैं, साथ में हर्षोल्लास से चलते हैं किंतु कितनी दूर और कब तक? रास्ते में किलोमीटर की गणना करते रहते हैं कि कितनी दूरी शेष है? उन्होंने कहा कि भव्य आत्माओं ने चलते-चलते परम पद पा लिया। पद-पद चले, परम पद पा गए। भव्य आत्माओं के ध्यान से टूट रहा साहस पुन: दृढ़ होकर बल बन जाता है। भक्त न हो, तो भक्ति नहीं हो सकती। भक्ति से भगवान को सरोकार नहीं, अपितु भक्ति का सरोकार भक्त से भक्त के लिए होता है। आचार्यश्री ने कहा कि सहस्रकूट जिनालय का निर्माण विशेष पत्थरों से किया जा रहा है जिससे कि सैकड़ों वर्ष तक ऊपर चढ़ने का पथ प्रशस्त होता रहे। चातुर्मास में एक स्थान पर रुकना होता है लेकिन वह समय अभी दूर है। यह संकेत करते हुए आचार्यश्री विद्यासागरजी ने बच्चों में दान की प्रवृत्ति की सराहना करते हुए कहा कि बच्चों के संस्कार से कभी-कभी बड़ों को भी सीख लेना चाहिए। (साभार : वेदचंद जैन/वीएनआई)

नीम और गाय स्वास्थ्य के लिए अमृत सम : आचार्यश्री

विद्यासागरजी महाराज; (डोंगरगढ़) {10 दिसंबर 2017}   चन्द्रगिरि (डोंगरगढ़) में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि नीम का वृक्ष बहुत योगी होता है। उसकी छाल से बनी जड़ी-बूटियों से बड़े से बड़े रोगों व विभिन्न बीमारियों का उपचार संभव है।   वृक्ष ऑक्सीजन छोड़ते हैं और कार्बन डाई ऑक्साइड ग्रहण करते हैं जिससे हमें प्राणवायु प्राप्त होती है। नीम का फल कड़वा होता है, परंतु उसका स्वास्थ्य के लिए लाभ बहुत है। नीम की शाखाओं एवं टहनी का उपयोग दातुन आदि के लिए भी उपयोग किया जाता है। इस प्रकार नीम का वृक्ष मनुष्य एवं प्रकृति के लिए बहुत लाभकारी है जिसे पहले के लोग अपने आंगन में लगाते थे और स्वस्थ रहते थे। आज आप लोग इस ओर ध्यान नहीं देते हैं और कई छोटी-बड़ी बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं।   गायें बहुत भोले-भाले मुख वाली होती हैं जिसे हम गैया भी कहते हैं। वे हमारे लिए अत्यंत दुर्लभ हैं, क्योंकि वे हमेशा 24 घंटे प्राणवायु ऑक्सीजन ग्रहण करती व छोड़ती हैं। उसके सींग की कीमत सोने से भी ज्यादा है। यदि आज सोना 30,000 रुपए है तो उसकी कीमत 1 लाख रुपए से भी अधिक है। गाय के दूध में स्वर्ण होता है। उसका सेवन अमृत-सम होता है। घर में गायें होने से घर का पूरा वातावरण पवित्र हो जाता है। गायों द्वारा ऐसी क्या रासायनिक क्रिया की जाती है जिससे वे प्राणवायु ऑक्सीजन ग्रहण करती व छोड़ती हैं, यह विचारणीय है।   9 एवं 10 दिसंबर 2017 को चन्द्रगिरि तीर्थ क्षेत्र में नि:शुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया है जिसमें सभी प्रकार के रोगों का बाहर से आए आयुर्वेदिक चिकित्सकों द्वारा इलाज किया जा रहा है एवं मरीजों के लिए नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था की गई है।   रविवार को डोंगरगढ़ से एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के सैकड़ों लोगों ने अपना इलाज करवाकर लाभ लिया जैसे बीपी, शुगर, सिरदर्द, माइग्रेन, खुजली, अस्थमा आदि बीमारियों का इलाज नि:शुल्क आयुर्वेदिक औषधि एवं योग-प्राणायाम द्वारा किया गया।   यह जानकारी चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ से निशांत जैन (निशु) ने दी है।  

मन से करो, मन का मत करो - आचार्यश्री

प्रवचन : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज; (डोंगरगढ़) {9 दिसंबर 2017}   चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागर महाराजजी ने कहा की समन्वय से गुणों में वृद्धि हो तो वह सार्थक है किन्तु यदि समन्वय से गुणों में कमी आये तो वह समन्वय विकृत कहलाता है। उदाहरण के माध्यम से आचार्यश्री ने समझाते हुए कहा की यदि दूध में घी मिलाया जाये तो वह उसके गुणों को बढाता है जबकि दूध में मठा मिलाते हैं (कुछ लोग कहते हैं दूध भी सफ़ेद होता है और मठा भी सफ़ेद होता है) तो वह विकृति उत्पन्न कर देता है।   मठा में यदि घी मिलाया जाये तो वह अपचन कर सकता है परन्तु उसी घी का यदि बघार मठा में मिलाया जाये तो वह पाचक तो होगा ही और उसके स्वाद में भी वृद्धि हो जायेगी। इसी प्रकार सुयोग समन्वय से गुणों में वृद्धि होती है। आप लोग कहते हो डॉक्टर के पास जाना है डॉक्टर तो उपाधि होती है एलोपेथिक चिकित्सा के लिए चिकित्सक होता है और आयुर्वेदिक चिकित्सा के लिए वैद्य या वैदराज होता है जो आज कल कम सुनने को मिलता है। वर्तमान में आपकी तबियत खराब हो जाये या शरीर में कोई तकलीफ आ जाये तो आप लोग दवाइयों का सेवन करते हो जबकि पहले के लोग भोजन को ही औषधि के रूप में सेवन करते थे और उनकी दैनिक चर्या ऐसी होती थी की वे कभी बीमार ही नहीं पड़ते थे। डॉक्टर और बीमारी दोनों उनके पास आने से डरती थी।   आप लोग सभी जगह आने-जाने में वाहन का उपयोग करते हो इसकी जगह यदि आप पैदल चलें तो आपकी आधी बीमारी तो यूँ ही दूर हो जायेगी। आचार्यश्री ने कहा कि ‘मन से करो, मन का मत करो’। आपको यदि स्वादानुसार अच्छा भोजन मिल जाये तो आप उसका सेवन आवश्यकता से अधिक कर लेते हैं जिससे आपका पेट कहता तो नहीं है परन्तु आपको एहसास होता है की पेट अब मना कर रहा है परन्तु आप फिर भी अतिरिक्त सेवन करते हैं तो उसे पचाना मुश्किल होता है और फिर आपको उसे पचाने के लिए पाचक चूर्ण या दवाई आदि का उपयोग करना पड़ता है। आप लोगों से अच्छे तो बच्चे हैं जो पेट भरने पर और खाने से तुरंत मन कर देते हैं। इसलिए दोहराता हूँ कि ‘मन से करो, मन का मत करो’।   गृहस्थ में धर्म, अर्थ और काम होता है जबकि मोक्ष मार्ग में केवल संयम ही होता है। मुमुक्षु की सब क्रियाएं गृहस्थ के विपरीत होती है जैसे आप बैठ के भोजन लेते हैं जबकि मुमुक्षु खड़े होकर आहार लेते हैं, आप थाली में परोस कर लेते हैं, जबकि मुमुक्षु कर पात्र (दोनों हाथ मिलाकर) करपात्र में आहार लेते हैं। आपको सोने के लिए आरामदायक बिस्तर, तकिया आदि की आवश्यकता होती है जबकि मुमुक्षु लकड़ी के चारपाई, भूमि आदि में शयन करते हैं। आप लोग जब मन चाहे चट-पट जितनी बार चाहो खा सकते हो जबकि मुमुक्षु दिन में एक बार ही आहार करता है। इसी प्रकार मोक्ष मार्ग में वीतरागी देव, शास्त्र और गुरु का समन्वय आवश्यक है तभी कल्याण होना संभव है।   दिनांक 09/12/2017 एवं 10/12/2017 को चंद्रगिरी तीर्थ क्षेत्र में निःशुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया है जिसमे सभी प्रकार के रोगों का बाहर से आये आयुर्वेदिक चिकित्सकों द्वारा ईलाज किया जा रहा है एवं मरीजों के लिए निःशुल्क भोजन की व्यवस्था की गयी है। आज डोंगरगढ़ से एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के सैकड़ों लोगों ने अपना इलाज करवाकर लाभ लिया जैसे बी.पी., शुगर, सिरदर्द, माईग्रेन, खुजली, अस्थमा आदि बिमारियों का ईलाज निःशुल्क आयुर्वेदिक औषधि एवं योग प्राणायाम के द्वारा किया गया।   यह जानकारी चंद्रगिरि डोंगरगढ़ से निशांत जैन (निशु) ने दी है।

ऊंची दुकान और फीका पकवान! - आचार्यश्री

प्रवचन : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज; (डोंगरगढ़) {3 दिसंबर 2017}   चन्द्रगिरि (डोंगरगढ़) में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने प्रात:कालीन प्रवचन में कहा कि जब तीर्थंकर भगवान का समवशरण लगता है तो उसमें काफी भीड़ होती है और जगह की कमी कभी नहीं पड़ती है। बहरे के कान ठीक हो जाते हैं, उसे सब सुनाई देने लगता है। अंधे की आंखें ठीक हो जाती हैं और उसे सब दिखाई देने लग जाता है, लंगड़े के पैर ठीक हो जाते हैं और वह चलने लग जाता है। वो भी बिना किसी ऑपरेशन, सर्जरी या बिना किसी नकली पैरों के सब कुछ अपने आप हो जाता है। मंदबुद्धि का दिमाग ठीक हो जाता है।   एक बार एक गांव में 25वें तीर्थंकर कहकर समवशरण लगाया गया। उसमें काफी भीड़ भी इकट्ठी हो गई। वहां बहरे, अंधे, लूले-लंगड़े, मंदबुद्धि लोग भी आए, परंतु उनका वहां जाकर भी कुछ नहीं हुआ। वे जब वापस आए तो अंधा, अंधा ही था, बहरा, बहरा ही था, लंगड़ा, लंगड़ा ही था और मंदबुद्धि, मंदबुद्धि ही था। किसी में कोई परिवर्तन नहीं आया तो लोग समझ गए कि यह समवशरण वीतरागी का नहीं है। यह सब एक वीतरागी के समवशरण में ही संभव हो सकता है और वीतरागी समवशरण में आने वालों का पूर्ण श्रद्धा से सम्यक दर्शन का होना भी अनिवार्य है तभी कुछ परिवर्तन होना संभव है। सम्यक दर्शन के भी 8 भेद बताए जाते हैं जिसका शास्त्रों में उल्लेख पढ़ने को मिलता है।   आचार्यश्री ने कहा कि कपड़े की दुकान वाले बुरा मत मानना। एक बार एक कपड़े की दुकान में एक ग्राहक आता है और कपड़े देखता है। देखते ही देखते उसके सामने पूरे का पूरा कपड़ों का ढेर लग जाता है। दुकान मालिक उससे पूछता है कि आपको किस वैरायटी का कपड़ा चाहिए? तो ग्राहक कहता है कि आप अपनी दुकान का सारा माल दिखाइए और मुझे जो पसंद आएगा, उसे मैं ले लूंगा। कपड़े की दुकान वाले का पसीना छूट जाता है और उसने ग्राहक को चाय भी पिलाई (लोभ दिया) फिर भी ग्राहक संतुष्ट नहीं हुआ।   आचार्यश्री ने कहा कि दुकान कैसी भी हो, क्वालिटी अच्छी हो तो लोग ठेले में भी झूम जाते हैं। वो कहावत है न कि ‘ऊंची दुकान और फीका पकवान’। दुकान बड़ी होने से कुछ नहीं होता, माल अच्छा हो तो दुकान में भीड़ लगी रहती है। इसी प्रकार हमारे भाव भी सम्यक दर्शन के प्रति बने रहना चाहिए और इसमें कभी कोई शंका उत्पन्न नहीं होना चाहिए तभी इसकी सार्थकता है।   यह जानकारी चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ से निशांत जैन (निशु) ने दी है।

अग्नि जलती नहीं जलाती है- आचार्यश्री

प्रवचन : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज; (डोंगरगढ़) {2 दिसंबर 2017}   चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की आप लोग कहते हैं की अग्नि जल रही है जबकि अग्नि जलती नहीं जलाती है, जलता तो ईंधन है। इसी प्रकार गाड़ी अपने आप चलती नहीं है उसे ड्राईवर चलाता है। वैसे ही हमारी आत्मा हमारे शरीर को चलाती है और हमारा शरीर उसी के अनुसार कार्य करता है। इसे ही भेद विज्ञान कहा जाता है जो इसे समझ लिया उसे फिर कुछ और समझने की आवश्यकता नहीं होती है।   यह शरीर उस आत्म तत्व के लिए एक जेल के सामान है वह इसके अन्दर कैदी की भांति कैद है। हम जो भी कार्य करते हैं उठते, बैठते, चलते – फिरते एवं आदि जो भी शरीर के द्वारा दैनिक क्रियाएँ करते हैं वह सब आत्म तत्व के द्वारा ही निर्देशित होता है शरीर तो केवल उसके अनुरूप कार्य करता है। हमें केवल अपने आत्म तत्व की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। आज आचार्य श्री को आहार कराने का सौभाग्य ब्रह्मचारिणी उन्नति   दीदी, नरेश भाई जैन, जयसुख भाई जैन मुंबई  निवासी के यहाँ हुए |   यह जानकारी चंद्रगिरि डोंगरगढ़ से निशांत जैन (निशु) ने दी है।    

सुबह का भूला शाम को वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते -आचार्यश्री

प्रवचन : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज; (डोंगरगढ़) {30 नवंबर 2017}   चन्द्रगिरि, डोंगरगढ़ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने एक दृष्टांत के माध्यम से बताया कि एक पिता अपने बेटे को सही राह (धर्म मार्ग) बताता है, परंतु बेटे को पिता की बात कम ही समझ में आती है। वह केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु प्रयत्न करता है और उसमें सफलता भी प्राप्त करता है। जब उसके पास उसकी इच्छा अनुरूप सभी साधन और सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं तो वह बैठा सोचता है कि उसके पास आज सभी चीजें जो वो अपनी जिंदगी में चाहता है, उपलब्ध हैं किंतु मन मान नहीं रहा है। तब उसे अपने पिता की बात याद आती है और वह अगले दिन देश वापस आता है और अपने देश की मिट्टी को माथे से लगाता है और फिर अपने पिता से मिलता है।   पिता उसे देखकर खुश हो जाते हैं और एक पिता अपने बेटे के कार्यानुसार उसके भविष्य को अच्छी तरह जानता है। उन्हें मालूम था कि एक दिन उनका बेटा सही राह (धर्म की राह) पर जरूर आएगा। यहां पर एक वाक्य चरितार्थ होता है कि ‘सुबह का भूला शाम को लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते।’ आज चन्द्रगिरि में भी जगदलपुर से आप लोग देव बनकर आए हैं। हमें यह देखकर प्रसन्नता हुई कि आप लोग अपनी मातृभूमि से जुड़े हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मातृभूमि से हमेशा जुड़े रहना चाहिए जिससे कि उसके संस्कार हमेशा बने रहें।     जगदलपुर में पंचकल्याणक की भूमिका डोंगरगांव में मात्र 1 दिन में बनी थी। यह वहां के लोगों का पुण्य है और उनका प्रयास भी सराहनीय है, जो इतना बड़ा कार्य कर रहे हैं। जगदलपुर एक आदिवासी इलाका है। वहां जिन मंदिर होना अपने आप में एक अलग बात है। इससे वहां के आस-पास के लोग भी जुड़ सकेंगे, जैसे कोंडागांव, गीदम आदि। यह एक आदिवासी बहुल क्षेत्र प्रकृति की गोद में है, जो कि अपने आप में एक प्राकृतिक सुन्दरता धारण किए हुए है।   यह जानकारी चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ से निशांत जैन (निशु) ने दी है।

मोल का त्याग करोगे तो अनमोल की प्राप्ति होगी- आचार्यश्री

प्रवचन : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज; (डोंगरगढ़) {29 नवंबर 2017}   चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की गायें होती हैं, उसके गले में रस्सी डाली जाती है और वह जब जंगल आदि जगह चरने जाती हैं तो वह रस्सी उसके गले में ही रहती है और वह चरने के बाद अपने यथास्थान पर आ जाती हैं किन्तु बछड़े के गले में रस्सी नहीं होती है, वह अपनी माता (गाय) के इर्द – गिर्द ही घूमता रहता है और दौड़कर दूर भी निकल जाये तो गाय की आवाज के संपर्क में रहता है और भागकर वापस अपनी माँ (गाय) के पास आ जाता है।   इसी प्रकार भगवान् से भी हमारा कनेक्शन ऐसा ही होना चाहिये इसके लिए देव, शास्त्र और गुरु के संपर्क में रहकर उनके कनेक्शन से जुड़े रहना चाहिए। जिस प्रकार बल्ब जब तक तार से जुड़ा हुआ रहता है तो वह करंट मिलने से चालू रहता है और प्रकाश देता रहता है यदि तार का कनेक्शन कट जाये तो उसका प्रकाश खत्म हो जाता है। देव, शास्त्र और गुरु से जुड़े रहने से मन शांत और अंतर्मन में दिव्य प्रकाश एवं अलौकिक सुख की प्राप्ति होती है। जिन लोगों के पास अधिक धन आ जाता है उन्हें उसे संरक्षित रखने का भय सताते रहता है वे लोग कहते हैं महाराज आशीर्वाद दो की हमारी धन-सम्पदा संरक्षित रहे।   आचार्यश्री कहते हैं कि ‘मोल का त्याग करोगे को अनमोल की प्राप्ति होगी’ इसलिये समय-समय पर दान देने से परिग्रह का त्याग होता है और अंतर्मन प्रसन्न और अत्यंत सुख की अनुभूति होती है जो कि सहज ही उपलप्ध हो जाती है इसके लिये ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है।   यह जानकारी चंद्रगिरि डोंगरगढ़ से निशांत जैन (निशु) ने दी है।  

जीवन का निर्वाह नहीं निर्माण करो- आचार्यश्री

प्रवचन : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज; (डोंगरगढ़) {22 नवंबर 2017}   चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागर महाराज ने कहा कि वृक्ष होता है जिसकी शाखाएं होती है उसमें से पहले कली खिलती है फिर फूल खिलता है फिर उसमें फल आता है। यह एक स्वतः होने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसी प्रकार यह प्रतिभास्थली है जिसमें ये छोटी-छोटी बच्चियां पढ़ाई के साथ-साथ संस्कार भी ग्रहण कर रही हैं। आप लोगों की संख्या अभी कम है, आप संख्या की चिंता मत करो, आप अपना काम ईमानदारी से मन लगाकर करो तो आपको सफलता अवश्य ही मिलेगी और आप के नये सखा मतलब आपके नये मित्र भी यहां आएंगे और आपकी संख्या भी बढ़ जायेगी।   यहां इन बच्चों की पढ़ाई और संस्कार के लिए समाज का सहयोग मिलना आवश्यक है और इनकी शिक्षिकाएं भी अपने कर्तव्यों का पालन बहुत अच्छे से कर रही है। यहां पैसों का उतना महत्व नहीं है। आप लोग कहते है न कि पैसा तो हाथ का मैल है, इसे निर्मल करने का इससे अच्छा और कोई उपाय नहीं है। समाज को इसके लिए हमेशा उत्सुक रहना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति को अपने सामर्थ्य के अनुसार यहां अपने पैसों का सदुपयोग करना चाहिये। यहां बच्चों का निर्वाह नहीं निर्माण हो रहा है जो भविष्य में इसे और आगे पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाते रहेंगे। आप लोगो का प्रयास सराहनीय है और आगे भी आप लोग ऐसा ही सहयोग इन बच्चों को देंगे जिससे यह कार्य आगे चलता रहेगा व बढ़ता रहेगा। यह जानकारी चंद्रगिरि डोंगरगढ़ से निशांत जैन (निशु) ने दी है।

बिम्ब और प्रतिबिम्ब में अंतर होता है- आचार्यश्री

विद्यासागरजी महाराज; (डोंगरगढ़) {21 नवंबर 2017}   चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की बिम्ब और प्रतिबिम्ब में अंतर होता है। बिम्ब किसी वस्तु का स्वाभाव व उसके गुण आदि होते हैं परन्तु उसका प्रतिबिम्ब अलग – अलग हो सकता है यह देखने वाले की दृष्टि पर निर्भर करता है की वह उस बिम्ब में क्या देखना चाह रहा है। यदि सामने कोई बिम्ब है और उसे दस लोग देख रहे होंगे तो सबके विचार उस प्रतिबिम्ब के प्रति अलग – अलग हो सकते हैं। किसी को कोई चीज अच्छी लगती है तो वही चीज किसी और को बुरी लग सकती है परन्तु इससे उस बिम्ब के स्वाभाव में कोई फर्क नहीं पड़ता है। जैसी आपकी मानसिकता और विचार उस बिम्ब के प्रति होंगे वैसा ही प्रतिबिम्ब आपको परिलक्षित होगा। यदि आप शान्ति चाहते हो तो दिमाग को कुछ समय के लिए खाली छोड़ दो उसका बिलकुल भी उपयोग मत करो कुछ भी मत सोचो आपको कुछ ही समय में शान्ति की अनुभूति होने लगेगी परन्तु शान्ति को कोई बाज़ार से नहीं खरीद सकता और न ही उसे कोई छू सकता है उसे केवल महसुस किया जा सकता है। मन + चला = मनचला अर्थात मन चलायमान होता है उसे वश में करना, एकाग्र करना बहुत कठिन काम है। इसके लिये काफी प्रयास की आवश्यकता होती है। यदि आपने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया तो आप अपने मन को भी अपने वश में (Control में) कर सकते हो जिससे आपको कभी लोभ नहीं होगा और आप हमेशा संतुष्ट और प्रसन्न रह सकते हैं और अपनी मंजिल और लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। यह जानकारी चंद्रगिरि डोंगरगढ़ से निशांत जैन (निशु) ने दी है।

संघर्ष पक्ष से नहीं विपक्ष से करने से सफलता मिलती है- आचार्य श्री विद्यासागर जी

प्रवचन : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज; (डोंगरगढ़) {20 नवंबर 2017}   चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की बांस काफी लम्बे होते हैं और ऊपर की ओर परस्पर तोरण द्वार की तरह लगते हैं। पंडित जी कहते हैं न की दोनों हांथों को ऊपर उठाओ और हांथ जोड़कर शिखर बनाकर जय कारा लगाओ उसी तरह बांस भी एक – दूसरे से जुड़े हुए रहते हैं, एक – दूसरे से गुथे हुए होते हैं। यदि कोई बांस को नीचे से काटे और खिचे तो उसे ऊपर से निकालना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि बांस एक – दूसरे से मिलकर गुथे हुए रहते हैं। इसी प्रकार यदि आप लोग भी एक – दूसरे के सांथ मिलकर रहेंगे तो कोई बाहर का भीतर घुस भी नहीं सकता और कोई झांक तक नहीं सकता की अन्दर क्या है। यदि संघर्ष विपक्ष से हो तो सफलता मिलना तय है परन्तु यदि संघर्ष पक्ष से हो तो उसकी घर्षण से अग्नि उत्पन्न होती है और सब कुछ जलकर ख़ाक हो जाता है। इसलिए यदि सफलता पाना है तो संघर्ष पक्ष से नहीं विपक्ष से करना चाहिए। इसी प्रकार हमें अपने कर्म को संघर्ष से काटते रहना चाहिये जिससे आप अपनी मंजील की ओर बढ़ सकें और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। यह जानकारी चंद्रगिरि डोंगरगढ़ से निशांत जैन (निशु) ने दी है।

विवकेशील के सांथ संवेदनशील होना जरुरी है समय पर काम करना संयमी की पहचान

प्रवचन : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज; (डोंगरगढ़) {19 नवंबर 2017}   चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा का आकार प्रतिदिन परिवर्तित होता है बढ़ता जाता है और पूर्णिमा के दिन उसकी उषमा से समुद्र की लहरों में उछाल आ जाता है ऐसे ही डोंगरगढ़ वासियों के भावों में भगवान के शमोशरण आने से उत्साह, उल्लास नज़र आ रहा है। आचार्य श्री ने कहा की आगे कब भगवान के समवशरण देखने को मिलेगा पता नहीं परन्तु पिछले 3 दिनों के विहार में भागवान के समवशरण की झलकियाँ देखने को मिली जो की अद्भुत थी। भगवान् की यह प्रतिमा बहुत प्राचीन है और जैसे कुण्डलपुर के भगवान् को आप लोग बड़े बाबा बोलते हो वैसे ही ये चंद्रगिरी के बड़े बाबा हैं। दोपहर के प्रवचन में आचार्य श्री ने खरगोश और कछुवा के एक दृष्टांत के माध्यम से बताया की खरगोश बहुत तेज, फुर्तीला और विवेकशील था परन्तु उसने समय का सदुपयोग नहीं किया और संवेदनशीलता की कमी और आलस्य के कारण उसकी हार हुई। जबकि कछुवे की चाल धीमी थी परन्तु उसने समय का सदुपयोग किया और आलस्य को त्यागा और अपनी मंजील पर जाकर ही रुका। कछुवे के ऊपर का भाग बहुत मजबूत होता है और उसकी एक खासियत यह है की वह अपनी चारों भुजाओं एवं मुख को उसके अन्दर कर लेता है जिससे उसके ऊपर यदि गाड़ी भी चल जाए तो उसको कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसी प्रकार हमें भी अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बिना आलस्य किये चलते रहना चाहिये। दिनांक 19/11/2017 को आचार्य श्री का विहार मुरमुंदा से डोंगरगढ़ के लिए प्रातः 6 बजे हुआ जिसमे देव, शास्त्र और गुरु तीनो के सांथ रत्नों के सामान रथों में प्रतिभास्थली की बचियाँ इंद्र, इन्द्रनियाँ , देव, आदि अति सुन्दर दिखाई दे रहे थे। जो भी व्यक्ति रास्ते में विहार का दृश्य देखता और आचार्यचकित होकर वहीँ रूककर दर्शन करता और अपने मोबाइल के कमरे से इस दृश्य को कैद कर लेता। इस विहार में गाँव के लोगों ने भी उत्साह से भगवान् के समवशरण के दर्शन कर धर्म लाभ लिया जो की काफी अद्भुत था। आचार्य श्री ससंघ की अगुवानी में जनसैलाब उमड़ पड़ा और लोगों ने अपने घरों के सामने रंगोली बनाई और दीपक जलाकर उनका ह्रदय से स्वागत किया। यह जानकारी चंद्रगिरि डोंगरगढ़ से निशांत जैन (निशु) ने दी है।

विवाह धर्म प्रभावना में सहायक

चन्द्रगिरि (डोंगरगढ़) में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि पहले असी, मसि, कृषि, वाणिज्य के हिसाब से कार्य होता था और विवाह में कन्यादान होता था। इस प्रथा में कन्या दी जाती थी। इसमें कन्या का आदान-प्रदान नहीं होता था। आज पाश्चात्य सभ्यता का चलन होने के कारण सब प्रथाओं में परिवर्तन आ रहे हैं, यह विचारणीय है। पहले पिता अपनी बच्ची के लिए योग्य वर ढूंढता था, पर आज बच्चे से पूछे बिना कोई काम नहीं कर सकते हैं। पहले बच्ची अपने पिता की बात को ही अपना भाग्य समझती थी, अब ऐसा देखने और सुनने को नहीं मिलता है। आचार्यश्री ने मैनासुन्दरी और श्रीपाल का उदाहरण देकर बताया कि किस तरह से उन्होंने अपने भाग्य पर भरोसा किया और अंत में उनका भला ही हुआ। आज का दिन आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष दूज छत्तीसगढ़ में बहुत शुभ दिन माना जाता है और ऐसा मानना है कि इस दिन वर्षा अवश्य होती है। आगे अष्टान्हिका पर्व आ रहा है जिसमें सिद्धचक्र विधान का विशेष महत्व माना जाता है। आप लोग अष्टान्हिका, दसलक्षण पर्व को ही विशेष महत्व देते हों, हमारे लिए तो मोक्ष मार्ग में हर दिन ही विशेष भक्ति, स्वाध्याय आदि का होता है। सिद्धचक्र विधान में प्रतिदिन शांतिधारा होती थी और इसके गंदोदक को वह अपने कुष्ठ शरीर पर लगाने से उसका रोग अष्टान्हिका पर्व के अंतिम दिन में पूरा का पूरा ठीक हो जाता है। यह सब सिद्धचक्र विद्वान को श्रद्धा, भक्ति, भाव, विश्वास के साथ करने से हुआ था। आज लोग पुरुषार्थ नहीं करना चाहते हैं और वे आलस के कारण ताजा घर में बना खाने की जगह पैकिंग फूड ले रहे हैं जिसके कारण वे खुद तो बीमार पड़ रहे हैं, साथ में 2-2 साल के बच्चे को शुगर आदि-आदि बीमारियां हो रही हैं। इसके जिम्मेदार माता-पिता खुद हैं। उन्हें अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देना चाहिए। विवाह धर्म प्रभावना के लिए किया जाता है। वर-वधू का विवाह होता है, फिर संतान होती है। वे अपनी संतान को अपने धर्म के अनुरूप संस्कार देते हैं। ऐसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी धर्म की प्रभावना होती रहती है। पहले स्वयंवर होता था जिसमें कन्या अपने लिए वर पसंद करती थी। इसमें कभी वर को कन्या पसंद करने का अवसर नहीं दिया जाता था। यह अधिकार केवल कन्या का ही होता था, परंतु आज बेटियां बेची जा रही हैं, जो धर्म और समाज के लिए घातक है। आज लोग दिन में दर्पण कई बार देखते हैं। और तो और, मोबाइल द्वारा भी दर्पण का इस्तेमाल किया जाता है और उसे जेब में रखते हैं तो उसका उपयोग भी कई बार किया जाता है। जो केवल शरीर को देखता है, उसे आत्मा का चिंतन होना कठिन है। आत्मा के चिंतन के लिए सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र अनिवार्य है। इसमें शरीर का केवल उपयोग किया जाता है, उसे ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता है।

मोह राग और द्वेष आत्मा को किंकर्तव्यविमूढ़ बनाते हैं

चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने मोह, राग और द्वेष की परिभाषा बताते हुए कहा की मोह हमें किसी भी वस्तु या मनुष्य आदि से हो सकता है जैसे दूध में एक बार जामन मिलाने पर वह जम जाता है फिर दोबारा उसी बर्तन पर दूध डालने पर दूध अपने आप जम जाता है उसमे दोबारा जामन नहीं डालना पड़ता। उसी प्रकार मनुष्य भी मोह में जम जाता है। राग और मोह में अंतर होता है। राग के कारण वस्तु का वास्तविक स्वरुप न दिखकर उसका उल्टा स्वरुप दिखने लगता है। जैसे कोई वस्तु है, यदि आपको उससे राग होगा तो आप कहोगे कि यह वस्तु बहुत अच्छी है और उसी वस्तु से किसी को द्वेष होगा तो वह कहेगा की यह वस्तु खराब है। बड़े – बड़े विद्वान्, श्रमण, श्रावक आदि भी इस मोह, राग और द्वेष से नहीं बच पायें हैं। आचार्य श्री ने कहा की वे आज पद्मपुराण पढ़ रहे थे तो उसमे बताया गया है की रावण बहुत विद्वान्, बहुत बड़ा पंडित, बहुत ज्ञानी, धनवान, ताकतवर था परन्तु श्रीराम की धर्म पत्नि सीता से उसे मोह होने के कारण उसका सर्वनाश हो गया एवं उसका भाई विभीषण ने भी उसका साथ छोड़ दिया था। आज बहुत से लोग शास्त्र, ग्रन्थ आदि पढ़कर पंडित, ज्ञानी हो गए हैं उन्हें इस ज्ञान का उपयोग पहले अपने कल्याण के लिए करना चाहिये फिर दूसरों का कल्याण करना तो अच्छी बात है ही।

समझदार मंझधार में नहीं होते

चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की प्रवचन यहाँ पंडाल में बैठे लोगों के लिए भी है और जो किसी माध्यम से इसे समझ रहे हैं उनके लिए भी है। आचार्य श्री ने एक दृष्टान्त के माध्यम से समझाया की एक बार एक जंगली सुवर गुफा के बाहर बैठ कर समायक कर रहा होता है और वहाँ एक सिंह आ जाता है तो जंगली सुवर सिंह को आगे जाने के लिए मना करता है तो इस पर जंगल के राजा सिंह को गुस्सा आ जाता है और इसी बात को लेकर दोनों में युद्ध शुरू हो जाता है। सिंह अपने पंजे से वार करता है और जंगली सुवर अपने नुकीले दांतों से वार करता है दोनों एक दूसरे को घायल कर देते हैं और सिंह पहले गिर कर मृत्यु को प्राप्त होता है फिर जंगली सुवर गिर कर मृत्यु को प्राप्त होता है। सिंह मरकर नरक जाता है जबकि जंगली सुवर मरकर स्वर्ग जाता है क्योंकि जंगली सुवर अपने प्रण के लिए अपने प्राण गंवा देता है जबकि सिंह मारने के मंतव्य के कारण अपनी जान से हाथ धो बैठता है। उस गुफा में ऐसा क्या है जिसके कारण ये द्वन्द युद्ध हुआ – उस गुफा में गुरूजी (साधू) समायक कर रहे थे और जंगली सुवर का प्रण था की गुरूजी (साधू) का समायक निर्विघ्न पूरा हो जाये इसलिए वह भी गुफा के बाहर में बैठकर अपनी समायक कर रहा था और वहाँ नजर रखा हुआ था परन्तु इस बात को सिंह नहीं समझा और मान कसाये के कारण युद्ध करने को आतुर हो गया। सिंह जंगल का राजा होता है इसका उसे मान, स्वाभिमान और अभिमान होता है उसी मान – अभिमान के कारण उसने जंगली सुवर से युद्ध किया और मृत्यु को प्राप्त कर नरक गया जबकि जंगली सुवर का प्राण प्रण को पूरा करने के लिए गया और गुरु जी (साधू) का समायक भी निर्विघ्न पूरा हुआ इसलिए जंगली सुवर मृत्यु उपरांत स्वर्ग गया। जो बुद्धिमान होता है वो मंझधार में नहीं होता है। शतरंज में भी राजा – राजा को नहीं मारता उसी प्रकार युद्ध होने पर जिस राजा की हार होती है वह जितने वाले राजा की अधीन हो जाता है। वह राज्य उसका तो होता है परन्तु वह राजा विजयी राजा के अधीनस्थ हो कर काम करता है। इससे आप लोग समझ गए होंगे की आप लोगों को किस तरह रहना चाहिए। आज रविवार का प्रवचन सफल रहा आप लोग दूर – दूर से आयें हैं आप लोगों ने प्रवचन सूना और इसे अपने जीवन में भी उतारें।
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