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    आचार्यश्री जी और पंचकल्याणक महोत्सव


    पंचकल्याणक क्या और कैसे ?
    प्रत्येक धर्म की अपनी प्राचीन परम्परा और सांस्कृतिक संस्कार होता है, जिससे उसका धर्म फलता-फूलता है और सांस्कृतिक परिवेश का नया निर्माण भी हुआ करता है। पंचकल्याणक महोत्सव प्राचीन सांस्कृतिक परिवेश की पृष्ठभूमि में होता है और नवीन संस्कृति के लिये वह प्रेरणा का कारण बनता है। अपने धर्म की वृद्धि के लिये धर्मात्माओं के लिये अपने शलाका पुरुषों के चरित को सामने रखकर के अपने कल्याण के लिये एवं धर्म के रहस्य को जानने के लिये उनके जीवंत प्रसंग को प्रकट करके कैसे आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा पूर्ण की जाती है ? उसी का प्रतीक है पंचकल्याणक महोत्सव की क्रिया और धर्म संस्कार का संचार जनमानस तक पहुँचाने का माध्यम है। 

    पंचकल्याणक क्या है ?
    संसार के सारे राग-रंग और इन्द्रियों के विषयों के प्रसंगों से ऊपर उठकर जो अपने आत्मकल्याणक के लक्ष्य को प्राप्त कर लेना ही पंचकल्याणक है। संसार के सारे पाप-पंक से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही पंचकल्याणक है। संसार के परिभ्रमण से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही पंचकल्याणक है। जन्म-मरण और संसार के विषय कषायों की प्रवृत्ति से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही पंचकल्याणक है।
    संसारी मानवों ने दस कोड़ा-कोड़ी सागर प्रमाण दीर्घकाल में मात्र २४ ऐसे महापुरुष होते हैं, जो तीर्थकर कहलाते हैं। अपनी अनेक भवों की साधना स्वरूप ही इन्हें तीर्थकर पद प्राप्त होता है। जिन्हें तीर्थकर पद प्राप्त होता है उनके पाँचों कल्याणक अवश्य होते हैं। 

    पाँच कल्याणक का स्वरूप
    गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक, निष्क्रमण या दीक्षा कल्याणक, ज्ञानकल्याणक और मोक्षकल्याणक के पाँच कल्याणक होते हैं। जिन्होंने गर्भ से हमेशा के लिये मुक्ति प्राप्त कर ली है वह गर्भ कल्याणक है। जो संसार के परिभ्रमण करता है, बार-बार जन्म लेता है, उस जन्म से जिसने मुक्ति पा ली है वह जन्मकल्याणक है या संसार के अन्तिम जन्म को जन्म कल्याणक कहते हैं। संसार के राग-द्वेष का, इन्द्रिय विषयों का, मोह और आसक्ति का एवं समस्त आरंभ-परिग्रह का त्याग कर देना ही निष्क्रमण या दीक्षा कल्याणक है। अपने आंशिक ज्ञान, छद्मस्थरूपी ज्ञान, अल्पज्ञान को नष्ट कर संपूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लेना ही केवलज्ञान कल्याणक है। दूसरा सिद्धान्त की दृष्टि से देखें तो जिस समय यह आत्मा अपने ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय कमो को नष्ट कर जिस अवस्था को प्राप्त करता है, वह केवलज्ञान कल्याणक है। संसार एवं समस्त कर्मों से रहित होकर जो अवस्था प्राप्त होती है, उसको मोक्ष कहते हैं। इसी को ही मोक्षकल्याणक कहते हैं। 

    पंचकल्याणक का महत्त्व क्या है?

    पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव की परम्परा ये आज की नहीं, यह बहुत प्राचीन परम्परा है। यह परम्परा अविरल रूप से चली आ रही है। एक विशेष बात है-जिन प्रतिमा पूजन की परम्परा, देव पूजन आवश्यक क्रिया यह आज की नहीं युग के आदि से ये छह आवश्यक कर्तव्य कहे हैं, उसमें देवपूजन को प्रथम स्थान दिया है। देवपूजन आवश्यक करने वाला या तो साक्षात् अरिहंत आदि पंचपरमेष्ठी की पूजन करता है या फिर स्थापना निक्षेप के माध्यम से पूजन होती है। जिन प्रतिमा आदि को निमित्त बनाकर करता है। उन प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा विधि है जिसके माध्यम से पाषाण मूर्ति को परमात्मा बनाया जाता है या फिर सोना, चाँदी, पीतल आदि धातु की और रत्नों की प्रतिमाएँ बनती थीं और उनकी प्रतिष्ठा संस्कार की क्रिया किसी वीतरागी, निलोंभी, सरल, मन्दकषायी व्रती आदि प्रतिष्ठाचार्य के निर्देशों में किसी वीतरागी साधु, मुनि, आचार्य आदि के सानिध्य में पंचकल्याणक महोत्सव की परम्परा आज भी चली आ रही है। बुन्देलखण्ड में पंचकल्याणक के साथ गजरथ महोत्सव की परम्परा बहुत प्राचीन है।

    चंदेरी का गजरथ जो वि० सं० १८९३ में हुआ ऐसा इतिहास मिलता है। वि० सं० १८९३ में बुन्देलखण्ड में अद्भुत चौबीसी का निर्माण चंदेरी में हुआ है। जिसकी प्रतिष्ठा गजरथ महोत्सव के साथ सम्पन्न हुई थी। सोनागिरिजी सिद्धक्षेत्र के पट्ट के भट्टारक श्रीभूषण जी के उपदेश से चंदेरी में पंचकल्याणक जिनबिम्ब प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ था। बुन्देलखण्ड की यह प्राचीन परम्परा अत्यधिक और प्रभावनापूर्ण रही है। धार्मिक समारोह इससे अधिक प्रभावक अभी तक भी देखने में नहीं आते हैं। यही कारण है कि अन्य प्रान्तों के धार्मिक श्रावकों ने जब भी पंचकल्याणक जैसे उत्सवों को देखा और उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहे और यही कारण है कि बुन्देलखण्ड की यह परम्परा अब अन्य सुदूरवर्ती प्रान्तों में प्रारम्भ हुई है। जैसे-ईसरी (बिहार), मदनगंज, किशनगढ़, महावीरजी और बागड़ प्रान्त राजस्थान के अनेक नगरों में एवं कर्नाटक, कोथली, सदलगा और हस्तिनापुर, सूरत (गुजरात) आदि नगरों में गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुए।

    इस प्रभावना पूर्ण और पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव एवं गजरथ महोत्सव को और अधिक प्रभावनापूर्ण बनाया गया। इसी दौरान परम पूज्य आचार्यगुरुवर श्री विद्यासागरजी महाराज का अपने संघ के साथ बुन्देलखण्ड आगमन हुआ। सन् १९७६ में प्रथम चातुमास बुन्देलखण्ड की पावन पुनीत धरा श्रीधर केवली की निर्वाणभूमि एवं अतिशयकारी श्री बड़े बाबा श्री आदिनाथ भगवान् की स्थली श्री कुण्डलपुरजी, जिला-दमोह (म०प्र०) में प्रथम चातुमास सम्पन्न हुआ। इसके बाद पूज्य आचार्यश्री ने यहाँ अपनी धार्मिक परम्पराओं एवं श्रावकों के सद्वचार और संस्कार का प्रभाव आचार्यश्री ने देखा और देखकर यहीं पर अपना धर्म प्रभावना का क्षेत्र बनाया। अपनी साधना एवं धर्म आराधना के साथ अपनी प्रखर वाणी के माध्यम से बुन्देलखण्ड को मुख्य रूप से अपनी धर्म आराधना का केन्द्र बनाया। आचार्यश्री ने अपने संघ के साथ बुन्देलखण्ड के नगर, गाँवों, कस्बों में विहार किया और अपनी चर्या, साधना और प्रवचन शैली के माध्यम से ऐसा प्रभाव डाला की बुन्देलखण्ड के जनमानस के मन में बस गये। सबके आराधक बन गये। ऐसे आचार्यश्री ने बुन्देलखण्ड में सर्वप्रथम पंचकल्याणक और गजरथ महोत्सव १९७७ में सिद्धक्षेत्र द्रोणगिरि जी, जिला-छतरपुर (म० प्र॰) में कराया था। इसके बाद अनेक स्थलों पर आचार्यश्री के ससंघ सानिध्य में पंचकल्याणक गजरथ महोत्सव हुए।


    आचार्यश्री जी के सानिध्य में अब तक हुए पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव का विवरण क्रमशः निम्न है

    १.द्रोणगिरि,जिला-छतरपुर(म०प्र०)-२५ फरवरी से २ मार्च १९७७ (फाल्गुन शुक्ल सप्तमी से त्रयोदशी, वी० नि० सं० -२५०३, विo सं० २०३३) तक चौबीसी के लिए पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव हुआ। इसके प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री गुलाबचंद जी ‘पुष्प', टीकमगढ़ थे तथा सहायक प्रतिष्ठाचार्य पं. श्री बाबूलाल जी ‘आकुल', दुर्ग थे। इसमें मुनि अार्यनन्दि जी महाराज भी उपस्थित थे। माता-पिता-श्रीमति शांतिबाई-श्री पन्नालाल जैन। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री कोमलचंद-श्रीमति शांतिबाई जैन घुवारा वाले, टीकमगढ़ थे।

    २.बीना बारहा, जिला-सागर(म०प्र०)-१ मार्च से ६ मार्च १९७८ (वी नि० सं०-२५०४, वि० सं० २०३४, फाल्गुन कृष्ण सप्तमी, बुधवार से फाल्गुन शुक्ल द्वादश, सोमवार) तक पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य पं. श्री गुलाबचन्द जी ‘पुष्प', टीकमगढ़, पं० श्री अमृतलालजी दमोह, पं० श्री अमरचन्दजी शाहपुर उपस्थित थे। तप कल्याणक के दिन अखिल भारतीय दिगम्बर जैन विद्वत् परिषद् का तेरहवाँ अधिवेशन सम्पन्न हुआ। माता-पिता—श्रीमति सुन्दरबाई-श्री नन्हेलाल जैन, सौधिया, महाराजपुर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री गुलाबचंद-श्रीमति रामाबाई जैन, भाटिया परिवार, तारादेही थे।

    ३.मुरैना(म०प्र०) में २८ फरवरी १९७९ से ५ मार्च १९७९ (वी. नि० सं०-२५०५, वि० सं० २०३५, फाल्गुन कृष्ण द्वितीया, बुधवार से फाल्गुन कृष्ण सप्तमी, सोमवार) तक बड़े जैन मन्दिर के मानस्तम्भ के लिए पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य पं. श्री शिखरचंद जी भिण्ड रहे। आचार्यश्री जी ससंघ के साथ आचार्यश्री सुमतिसागरजी महाराज भी ससंघ उपस्थित थे। माता-पिता—श्रीमति संतोषबाई-श्रीशांतिलाल जैन, सिधारीपुरा वाले, मुरैना। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी -श्री छोटेलाल जैन-श्रीमति रेवतीबाई जैन, निरधान वाले, मुरैना थे।

    ४.मदनगंज-किशनगढ़, जिला-अजमेर (राजस्थान)-२७ से ३१ मई १९७९ (वी० नि० सं०-२५०५, वि० सं० २०३६, ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया, रविवार से ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी, गुरुवार) तक पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री नाथूलालजी शास्त्री, इन्दौर एवं उनके सहयोगी पं. श्री गुलाबचन्दजी ‘पुष्प', टीकमगढ़ उपस्थित थे। तपकल्याणक के दिन अ० भा० दिग० जैन विद्वत् परिषद का अधिवेशन भी सम्पन्न हुआ था। माता-पिता-श्रीमति सौगनीदेवी-श्री दीपचंद चौधरी, किशनगढ़। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री मूलचन्द लुहाड़िया-श्रीमति जीवनदेवी लुहाड़िया, मदनगंज, किशनगढ़ (अजमेर) थे।

    ५.खजुराहो, जिला-छतरपुर(म०प्र०)-१८ से २५ जनवरी, १९८१ (वी नि० सं०-२५०७, वि० सं० २०३८, पौष शुक्ल त्रयोदशी, रविवार से माघ शुक्ल पंचमी, रविवार) तक आचार्यश्री के ३ मुनि, ३ ऐलक, ३ क्षुल्लक ऐसे कुल मिलाकर आचार्यश्री जी सहित १० साधुगणों के ससंघ सानिध्य में पंचकल्याणक एवं त्रयगजरथ महोत्सव हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री गुलाबचन्द जी ‘पुष्प', श्री बाबूलाल जी जैन ‘पठा वाले', टीकमगढ़ थे। अ० भा० दिग० जैन विद्वत् परिषद्, अ०भा० दिग० जैन परिषद्के अधिवेशन तथा महिलासम्मेलन, अहिंसासम्मेलन आदि कार्यक्रम भी हुए। माता-पिता-श्रीमति चमेली देवी-श्री शांतिलाल जैन, जयपुर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री रतनचन्द-श्रीमति सरोज जैन, छतरपुर (म०प्र०) थे।

    ६.कोनीजी, जिला-जबलपुर(म०प्र०)-२१ से २५ फरवरी १९८२ (वी नि० सं०-२५०८,वि० सं० २०३८, फाल्गुन कृष्ण-त्रयोदशी, रविवार से फाल्गुन शुक्ल द्वितीया, गुरुवार) तक त्रिमूर्ति मन्दिर हेतु पंचकल्याणक हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री शिखरचन्द जी, भिण्ड थे। माता-पिता-श्रीमति नौनीबाई-श्री रतनचंद जैन बजाज, पाटन। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री खूबचंद-श्रीमति पुतीबाई जैन, जबलपुर (म०प्र०) थे।

    ७.शहपुरा-भिटौनी, जिला-जबलपुर(म•प्र०)-२२ से २७ जनवरी, १९८५ (वी, नि० सं०-२५११, वि० सं० २०४१, माघ शुक्लएकम्, मंगलवार से माघ शुक्ल षष्ठी, रविवार) तक पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव हुआ। जिसमें पं. श्री अमरचन्दजी शास्त्री, शाहपुर (सागर) प्रतिष्ठाचार्य थे। माता-पिता-श्रीमति बसंतीबाई-श्री पूरनचंद जैन, शहपुरा। सौधर्म इन्द्र-इन्दाणी-श्री मोतीलाल-श्रीमति कांतिबाई जैन, शहपुरा (म०प्र०) थे।

    ८.गंजबासौदा, जिला-विदिशा(म०प्र०)-८ से १४ फरवरी १९८५ (वी नि० सं०-२५११, वि० सं० २०४१, फाल्गुन कृष्ण-तृतीया, शुक्रवार से फाल्गुन कृष्ण नवमीं, गुरुवार) तक पंचकल्याणक एवं त्रयगजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री गुलाबचंदजी ‘पुष्प', टीकमगढ़ (म०प्र०) थे। माता-पिता-श्रीमति गुलाबबाई-श्री भगवानदास जैन, बामौरा वाले। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री मन्नूलाल जैन (डैडी)-श्रीमति सोनाबाई जैन, गंजबासौदा, जिला-विदिशा (म०प्र०) थे।

    ९.केसली, जिला-सागर(म०प्र०)-७ से ११ मार्च १९८६ (वी० नि० सं०-२५१२, वि० सं० २०४२, फाल्गुन कृष्ण द्वादशी, शुक्रवार से फाल्गुन शुक्ल एकम्, मंगलवार) तक श्री सुखदयालजी देवड़िया द्वारा पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव कराया गया। जिसमें प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री अभिनंदनकुमारजी शास्त्री, खनियांधाना, शिवपुरी (म०प्र०) थे। इस महोत्सव में पं० श्री हुकुमचंद भारिल्ल सहित बहुत से विद्वान् उपस्थित थे। माता-पिता-श्रीमति सुमतरानी-श्री चुन्नीलाल जैन डेवडिया, केसली। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री सुखदयाल-श्रीमति संतोषरानी जैन डेवडिया, केसली, सागर (म०प्र०) थे।

    १०.नैनागिरि, जिला-छतरपुर(म०प्र०)-८ से १२ फरवरी १९८७ (वी, नि० सं०-२५१३,वि० सं० २०४३, माघ शुक्ल दशमी, रविवार से माघ शुक्ल चतुर्दशी, गुरुवार) तक समवसरण मन्दिर हेतु पंचकल्याणक एवं त्रयगजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। तप कल्याणक के दिन आचार्यश्री जी ने ११ आर्यिका और १२ क्षुल्लक दीक्षायें प्रदान की। इस पंचकल्याणक के प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री गुलाबचंद जी ‘पुष्प', टीकमगढ़ (म० प्र०) थे। माता-पिता-श्रीमति गेंदाबाई-श्री नाथूराम जैन, बण्डा, सागर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री बाबूलाल-श्रीमति स्नेहलता जैन थे।
    विशेष-इस पंचकल्याणक में एक विशेष चमत्कार हुआ। पानी की बहुत कमी थी, इस दौरान क्षेत्र कमेटी ने एक छोटा-सा बोर कराया, जिससे पंचकल्याणक के दिनों में सम्पूर्ण पानी मिला और जैसे ही कार्यक्रम सम्पन्न हुआ उस बोर का पानी समाप्त हो गया।

    ११.गोटेगाँव जिला-नरसिंहपुर(म०प्र०)-१५ से २० फरवरी १९९० (वी, नि० सं०-२५१५, विoसं० २०४५, माघ शुक्ल दशमी, बुधवार से माघ शुक्ल पूर्णिमा, सोमवार) तक पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री गुलाबचंद जी ‘पुष्प', टीकमगढ़ (म० प्र०) थे। माता-पिता-श्रीमति परमीदेवी-श्री छिकौड़ीलाल जैन, गोटेगाँव। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-चौधरी श्री नेमीचन्द-श्रीमति सुमतरानी जैन, गोटेगाँव (म० प्र०) थे।

    १२.सिरोंज, जिला-विदिशा(म०प्र०)-८ से १३ दिसम्बर १९८९ (वी, नि० सं०-२५१६, वि० सं० २०४६, मार्गशीर्ष शुक्ल-दशमी, शुक्रवार से पौष कृष्ण एकम्, बुधवार) तक बाहुबली जिनबिम्ब प्रतिष्ठा, नसियां जी हेतु पंचकल्याणक एवं त्रयगजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य पं. श्री मोतीलालजी मार्तण्ड, ऋषभदेव, उदयपुर (राज) थे। माता-पिता-श्रीमति कंचनबाई-श्री लखमीचंद जैन, कोटा। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री श्रेयमल-श्रीमति पुष्पादेवी जैन, सिरोंज (म०प्र०) थे।

    १३.नरसिंहपुर(म०प्र०)-१७ से २२ फरवरी १९९० (वी निo सं०-२५१६, विoसं० २०४६, फाल्गुन कृष्ण-सप्तमी, शनिवार से फाल्गुन कृष्ण द्वादशी, गुरुवार) तक पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव हुआ। तप कल्याणक के पावन दिन आचार्यश्री जी ने ५ आर्यिका दीक्षायें प्रदान कीं। इस पंचकल्याणक के प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री गुलाबचंद जी ‘पुष्प', टीकमगढ़ (म०प्र०) थे। माता-पिता-श्रीमति कस्तूरीबाई-श्री स्वरूपचंद जैन नायक। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री अनिलकुमार-श्रीमति रेखा जैन बड़कुल, रंगमहल वाले, नरसिंहपुर (म०प्र०) थे।

    १४.पथरिया, जिल-दमोह(म०प्र०)-४ से ८ मार्च १९९० (वी० नि० सं०-२५१६, वि० सं० २०४६, फाल्गुन शुक्ल अष्टमी, रविवार से फाल्गुन शुक्ल द्वादशी, गुरुवार) तक पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव हुआ। जिसमें प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री गुलाबचंद जी ‘पुष्प', टीकमगढ़ (म० प्र०) थे। माता-पिता-श्रीमति खिलौनाबाई-श्री कन्छेदीप्रसाद जैन। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री मोतीलाल-श्रीमति सुषमा जैन गोयल,पथरिया, जिलादमोह (म०प्र०)थे।

    १५.सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरि, जिला-बैतूल(म०प्र०)-५ से ७ अक्टूबर १९९० (वी० नि० सं०-२५१६, वि० सं० २०४६, कार्तिक कृष्ण -एकम्, शुक्रवार से कार्तिक कृष्ण तृतीया, रविवार) तक मूलनायक पाश्र्वनाथ भगवान् तथा पद्मप्रभ भगवान् के जिनबिम्बों के बज़लेप के उपरान्त त्रिदिवसीय लघु पंचकल्याणक महोत्सव सम्पन्न हुआ। जिसमें प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री बाहुबली उपाध्ये, कुंभोज (महाराष्ट्र) थे।

    १६.सिवनी(म०प्र०)-२५ से ३० जनवरी १९९१ (वी० नि० संo -२५१७, वि० सं० २०४७, माघ शुक्ल दशमी, शुक्रवार से माघ शुक्ल पूर्णिमा, बुधवार) तक मानस्तम्भ प्रतिष्ठा हेतु पंचकल्याणक एवं त्रयगजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। इसमें पं० श्री अमरचंदजी शास्त्री, शाहपुर, सागर (म० प्र०) प्रतिष्ठाचार्य थे। माता-पिता-श्रीमति कमला-श्री नेमीचंद जैन दिवाकर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री श्रेयांसकुमार-श्रीमति शान्तिबाई जैन दिवाकर, सिवनी (म०प्र०) थे।

    १७.पिसनहारी-मढ़िया जी, जबलपुर(म०प्र०)-२३ से २७ जनवरी १९९३ (वी नि० सं०-२५१९, वि० सं० २०४१, फाल्गुन शुक्ल -एकम्, शनिवारसे फाल्गुन शुक्ल-पंचमी, बुधवार) तक नंदीश्वर जिनालय का पंचकल्याणक एवं पंचगजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री शिखरचंदजी, भिण्ड थे। आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के रजत मुनि दीक्षा वर्ष के दौरान आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा २५ आर्यिका दीक्षाएँ तप कल्याणक के दिन प्रदान की गई। इस प्रकार आचार्यश्री के द्वारा दीक्षित १५ मुनिराज, ६९ आर्यिकायें, १४ ऐलक तथा ८ क्षुल्लक महाराज रूप चतुर्विध संघ के १०६ साधु मंच पर विराजित थे। ये सभी बाल ब्रह्मचारी साधक हैं। इनके अतिरिक्त अन्य आचार्यों से दीक्षित७ मुनि, ३ आर्यिकायें, १ क्षुल्लक तथा २ क्षुल्लिकायें भी आचार्यश्री सहित कुल १२० पिच्छीधारी मंचासीन हुए। माता-पिता-श्रीमति मणिश्री कोमलचंद जैन, पड़रिया वाले। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री अरविन्दकुमारश्रीमति कल्पना जैन, चावल वाले, जबलपुर (म०प्र०) थे।

    १८.देवरी, जिला-सागर(म०प्र०)-१० से १६ फरवरी १९९३ (वी नि० सं०-२५१९, वि• सं २०४९, फाल्गुन कृष्ण-चतुर्थी, बुधवार से फाल्गुन कृष्ण-दशमी, मंगलवार) तक श्री लक्ष्मीचंद जी मोदी, देवरी द्वारा पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न कराया गया। इसमें प्रतिष्ठाचार्य पं. श्री विमलकुमार जी सौंरया, टीकमगढ़ (म०प्र०) थे। माता-पिता-श्रीमति यशोदाबाई-श्री नन्हेलाल जैन पाण्डे, देवरी। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री राजेन्द्र कुमार-श्रीमति विमला जैन, देवरी, जिला-सागर (म०प्र०) थे।

    १९.सागर(म०प्र०)-२० से २६ फरवरी १९९३ (वी० नि० सं० - २५१९, वि• सं २०४९, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी, शनिवार से फाल्गुन शुक्ल पंचमी, शुक्रवार) तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा, ज्ञान-संयम एवं तीर्थरक्षा रथ रूप त्रयगजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री शिखरचन्द जी, भिण्ड थे। इस पंचकल्याणक की यह विशेषता थी कि इस पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव के निमित्त से संकलित १२ लाख रुपयों से भी अधिक की राशि श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र अन्तरिक्ष पाश्र्वनाथ शिरपुर, महाराष्ट्र की रक्षा के लिए प्रदान करायी गयी। यह कार्य किसी समाज ने प्रथम बार किया गया था कि पंचकल्याणक की बची हुई राशि अन्य क्षेत्र के लिए दी गई। माता-पिता-श्रीमति कलावती-श्री कोमल जैन ‘शिक्षक' गोपालगंज, सागर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री ऋषभ कुमार मड़ावरा-श्रीमति कमला जैन मड़ावरा, सागर (म०प्र०) थे।

    २०.रामटेक, जिला-नागपुर(महाराष्ट्र)-१७ से १९ सितम्बर १९९३ (वी० नि० सं०-२५१९, वि० सं० २०४९, भाद्रपद द्वितीया, शुक्रवार से भाद्रपद चतुर्थी, रविवार) तक लघु पंचकल्याणक प्रतिष्ठा मूलनायक भगवान् श्री शांतिनाथ, श्री कुन्थुनाथ एवं श्री अरनाथ जिनबिम्बों तथा चंद्रप्रभ भगवान् की प्रतिमा के बजलेप के उपरांत प्रतिष्ठाचार्य पं. श्री गुलाबचंद जी ‘पुष्प’ द्वारा सम्पन्न करायी गई। तत्पश्चात् पंचमी को महामस्तकाभिषेक सम्पन्न हुआ।

    २१.अतिशय क्षेत्र बीना बारहा, जिला-सागर(म०प्र०)-३ से ६ दिसम्बर १९९५ (वी० नि० सं०-२५२२, वि० सं० २०५२, मार्गशीर्ष शुक्ल द्वादशी, रविवारसे मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा, बुधवार) तक मामा-भांजे के मंदिर में अवस्थित माटी के महादेव के नाम से संज्ञित पद्मासन मूलनायक भगवान् तथा शांतिनाथ जिनालय स्थित कायोत्सर्गस्थ मूलनायक श्री शांतिनाथ भगवान् एवं अन्य जिनबिम्बों पर हुए बज़लेप के पश्चात् लघु पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। उसमें प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री विमलकुमार जी सौंरया, टीकमगढ़ थे।

    २२.आहूरानगर, जिला-सूरत (गुजरात)-६ से १० फरवरी १९९७ (वी० नि० सं०-२५२३, वि० सं० २०५३, माघ कृष्ण चतुर्दशी, गुरुवार से माघ शुक्ल तृतीया, सोमवार) प्रतिष्ठाचार्य पं. फतेहसागरजी जैन, उदयपुर (राज०) द्वारा आहूरानगर, सूरत में अडाजन रोड स्थित नवनिर्मित श्री शांतिनाथ जिनालय हेतु आयोजित श्री शांतिनाथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सानंद सम्पन्न हुआ। इस पंचकल्याणक की विशेषता ये थी कि गुजरात राज्य में पूर्व में कहीं पर भी गजरथ महोत्सव नहीं हुआ था। जो इस पंचकल्याणक में प्रथम बार हुआ। मातापिता-श्रीमति रंजनाबेन-श्री दिलीप साकलचंद गाँधी, आहूरानगर, सूरत। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री कचरालाल-श्रीमति मंगलाबेन मेहता, सूरत (गुजरात) थे।

    २३.सागर(म०प्र०)-२९ अप्रैल से ७ मई १९९८ (वी० नि० सं०२५२४, वि० सं० २०५५, वैशाख शुक्ल तृतीया, बुधवार से वैशाख शुक्ल एकादशी, गुरुवार) तक श्री गौराबाई दिगम्बर जैन मंदिर, कटरा बाजार का पंचकल्याणक एवं त्रयगजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य बा० ब्र० श्री जिनेश जी, सागर (अधिष्ठाता वर्णी दिग०जैन गुरुकुल, जबलपुर) थे। माता-पिता-श्रीमति सुनीता-सिंघई श्री हुकुमचंद जैन ‘पठौन वाले'। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री अजितकुमार-श्रीमति पुष्पादेवी जैन ‘मड़ावरा वाले', सागर (म०प्र०) थे।

    २४.करेली(म०प्र०)-१४ से २१ फरवरी २००० (वी० नि० संo२५२६, वि० सं० २०५६, माघ शुक्ल नवमी, सोमवार से फाल्गुन कृष्णद्वितीया, सोमवार) तक पंचकल्याणक एवं त्रयगजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित ४१ मुनिराजों एवं ३७ आर्यिकाओं एवं १ ऐलकजी के सानिध्य में सम्पन्न हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य बा० ब्र० श्री जिनेशजी (जबलपुर) थे। माता-पिता-श्रीमति संतोषरानी-श्री स्वदेश जैन बड़कुल। सौधर्म इन्द्रइन्द्राणी-सिंघई श्री केवलचंद-श्रीमति संतोषरानी जैन, करेली, जिलानरसिंहपुर (म०प्र०) थे।

    २५.छिन्दवाड़ा(म०प्र०)-६ से १३ मार्च २००० (वी० नि० सं०२५२६, वि० सं० २०५६, फाल्गुन कृष्ण अमावस्या, सोमवार से फाल्गुन शुक्ल अष्टमी, सोमवार) तक पंचकल्याणक महोत्सव (गुलाबरा मंदिर का) सम्पन्न हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य बा० ब्र० श्री जिनेश जी (जबलपुर) थे। माता-पिता-श्रीमति सरोज-श्री प्रकाशचंद जैन, सौधर्म इन्द्रइन्द्राणी-श्री अरुण कुमार-श्रीमति प्रमिला पाटनी, छिन्दवाड़ा (म०प्र०) થે

    २६.कुण्डलपुर, जिला-दमोह(म०प्र०)-२१ से २७ फरवरी २००१ (वी नि० सं०-२५२७, वि० सं० २०५७, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी, बुधवार से फाल्गुन शुक्ल पंचमी, मंगलवार) तक सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर के बड़े बाबा का महामस्तकाभिषेक एवं समवसरण मंदिर का पंचकल्याणक एवं पंचगजरथ महोत्सव आचार्यश्री के विशाल चतुर्विध संघ के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। जिसके प्रतिष्ठाचार्य पं० श्री अमरचंद जी शास्त्री (शाहपुर) थे। माता-पिता-श्रीमति चैनाबाई-श्री कस्तूरचंद जैन ‘खजुरिया वाले', दमोह। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री अशोकपाटनी–श्रीमति सुशीला पाटनी, आर० के० मार्बल, मदनगंज-किशनगढ़, जिला-अजमेर (राजस्थान) थे। 

    २७.छपारा(म०प्र०)-१५ से २१ जनवरी २००२ (वी० नि० सं० - २५२५, वि० सं० २०५८, पौष शुक्ल द्वितीया, मंगलवार से पौष शुक्लसप्तमी, सोमवार) तक बड़े मंदिर की त्रिमूर्ति जिनालय का पंचकल्याणक एवं त्रयगजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित ३८ मुनि, दृढ़मति माताजी आदि १७ आर्यिकाओं के सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति सोनाबाई-श्री विमलचंद जैन, छपारा। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री जिनेशकुमार-श्रीमति राजुल जैन, छपारा, जिला-सिवनी (म०प्र०) थे।

    २८.बण्डा, बेलई, जिला-सागर(म०प्र०)-२२से २७ फरवरी २००२ (वी० नि० सं०-२५२५, वि० सं० २०५८, माघ शुक्ल-दशमी, शुक्रवार से माघ शुक्ल पूर्णिमा, बुधवार) तक तीनों मंदिर के संयुक्त पंचकल्याणक एवं त्रयगजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित ३८ मुनि, ४७ आर्यिकाओं एवं ३ ऐलक जी के सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) एवं बा० ब्र० प्रदीप भैया ‘सुयश' (अशोकनगर) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति माया-चौधरी श्री संतोषकुमार जैन। सौधर्म इन्द्रइन्द्राणी-श्री टेकचंद-श्रीमति भावना जैन 'उल्दन वाले', बण्डा, जिला-सागर (म०प्र०) थे।

    २९.भोपाल(म०प्र०)-२१ से २५ जनवरी २००३ (वी० नि० सं० -२५२६, वि० सं० २०५९, माघ कृष्ण तृतीया, मंगलवार से माघ कृष्ण सप्तमी, शनिवार) तक चौक मंदिर की चौबीसी जिनालय का पंचकल्याणक एवं पंचगजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित ३५ मुनिराजों एवं १६ आर्यिकाओं के सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति पुष्पा-एडवोकेट श्री रमेशचंद जैन। सौधर्म इन्द्रः—इन्द्राणी-चक्रवतीं श्री प्रकाशचंद-श्रीमति दिव्या जैन, भोपाल (म०प्र०) थे।

    ३०.सागर(म०प्र०)-१४ से २१ फरवरी २००३ (वी० नि० सं०२५२६, वि० सं० २०५९, माघ शुक्ल द्वादशी, शुक्रवार से फाल्गुन कृष्ण पंचमी, शुक्रवार) तक वर्णी कॉलोनी मंदिर का आचार्यश्री जी एवं ३६ मुनिराज, .आर्यिकायें, २ ऐलक के सानिध्य में पंचकल्याणक महोत्सव भाग्योदय, सागर में बा० ब्र० जिनेश भैया (जबलपुर) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति कांता-श्री रमेशचंद जैन 'बिलहरा वाले'। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री राजकुमार-श्रीमति कमलाबाई जैन ‘टड़ा वाले', सागर (म०प्र०) थे।

    ३१.बिलासपुर (छत्तीसगढ़)-२० से २५ जनवरी २००४ (वी॰ नि० सं०-२५२७, वि० सं० २०६०, माघ कृष्ण त्रयोदशी, मंगलवार से माघ शुक्ल चतुर्थी, रविवार) तक श्री दिग० जैन मंदिर (प्रमोदजी कोयला वालों के परिवार द्वारा बनाये हुए मंदिर) का पंचकल्याणक एवं पंचगजरथ महोत्सव बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति शकुन-सिंघई श्री प्रवीणकुमार जैन, देवरी, सागर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-सिंघई श्री विनोदकुमार-श्रीमती रंजना जैन, बिलासपुर (छ० ग०) थे।

    ३२.कुण्डलपुर, जिला-दमोह(म०प्र०)-१७ से १९ जनवरी २००६ तक बड़े बाबा मूर्ति स्थापना एवं लघु पंचकल्याणक एवं महामस्तकाभिषेक का आयोजन आचार्यश्री एवं चतुर्विध संघ के सान्निध्य में एवं ब्र० प्रदीप भैया'सुयश' (अशोकनगर), ब्र० श्रीजिनेश भैया (जबलपुर) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ।

    ३३.जबलपुर(म०प्र०)-२५ से १ फरवरी २००७ (वी० नि० सं०२५३०, वि० सं० २०६३, माघ शुक्ल सप्तमी, गुरुवार से माघ शुक्ल चतुर्दशी, गुरुवार) तक शिवनगर कॉलोनी मंदिर का पंचकल्याणक एवं पंचगजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित ४३ मुनि, ६८ आर्यिकाओं के सानिध्य में एवं बा० ब्र० प्रदीप भैया'सुयश' (अशोकनगर) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति संध्या-श्री अजयकुमार जैन (मुना लमेठा), जबलपुर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री संतोष जैन ‘ठेकेदार'-श्रीमति आशा जैन, जबलपुर (म०प्र०) थे।

    ३४.सागर(म०प्र०)-१९ से २५ फरवरी २००७ (वी० नि० सं० २५३०, वि० सं० २०६३, फाल्गुन शुक्ल द्वितीया, सोमवार से फाल्गुन शुक्ल नवमी, रविवार) तक बाहुबली कॉलोनी मंदिर का पंचकल्याणक आचार्यश्री सहित ४८ मुनि, ८७ आर्यिकाओं के सानिध्य में एवं बा० ब्र० जिनेश भैया (जबलपुर) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। मातापिता-श्रीमति विमलादेवी-श्री छोटेलाल जैन ‘बमाना वाले', बण्डा। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री मुकेश जैन ‘ढाना वाले'-श्रीमति पूजा जैन, सागर (म०प्र०) थे।

    ३५.पथरिया, जिल-दमोह(म०प्र०)-४ से १० मार्च २००७ (वी० नि० सं०-२५३०, वि० सं० २०६३, फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, रविवार से चैत्र कृष्ण षष्ठी, शनिवार) तक श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन चौबीसी जिनालय के पंचकल्याणक एवं त्रयगजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित ५१ मुनिराजों के सानिध्य में एवं बा० ब्र० प्रदीप भैया'सुयश' (अशोकनगर) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति अंगूरीबाई-श्री मनोहरलाल फट्टा। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री प्रमोदकुमार–श्रीमति कीर्ति जैन ‘लखरौनी वाले', पथरिया, दमोह (म०प्र०) थे।

    ३६.बेगमगंज, जिला-रायसेन(म०प्र०)-२० से २७ जनवरी २००८ (वी० नि० सं०-२५३१, वि० सं० २०६४, पौष शुक्ल द्वादशी, रविवार से माघ कृष्ण पंचमी, रविवार) तक श्री दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर का पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित ४१ मुनिराजों के सानिध्य में एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति सुलोचना-श्री विपत जैन, बेगमगंज। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री पदमचंद (पी० एस० परिवार)-श्रीमति दयाबाई जैन, बेगमगंज, जिला-रायसेन (म०प्र०) थे।

    ३७.गंजबासौदा, जिला-विदिशा(म०प्र०)-११से १८ फरवरी २००८ (वी निoसं-२५३१,विoसं, २०६४, माघ शुक्ल-पंचमी, सोमवार से माघ शुक्ल द्वादशी, सोमवार) तक पंचकल्याणक एवं तीन गजरथ, मानवरथ, विज्ञानरथ इस प्रकार पंचरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित ४० मुनि, ३ ऐलक श्री के सानिध्य में एवं बा० ब्र० प्रदीप भैया ‘सुयश' (अशोकनगर) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-सेसिं॰ श्रीमति चंदा-श्री श्रेयमल जैन। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री अनिलकुमारश्रीमति मंजूलता जैन ‘हार्डवेयर वाले', गंजबासौदा, जिला-विदिशा (म०प्र०) थे।

    ३८.विदिशा(म०प्र०) - १५ से २१ अप्रैल २००८ (वी० नि० सं० - २५३१, वि० सं० २०६५, चैत्र शुक्ल दशमी, मंगलवार से वैशाख कृष्ण -प्रतिपदा, सोमवार) तक श्री पाश्र्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, अरिहन्त विहार कॉलोनी का पंचकल्यणक शीतलधाम में आचार्यश्री सहित ४० मुनि, १ऐलक के सानिध्य में एवं बा० ब्र० जिनेश भैया (जबलपुर), बा० ब्र० प्रदीप भैया ‘सुयश' (अशोकनगर) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति इन्दु-श्री अशोक कुमार जैन (एस० ई०) । सौधर्म इन्द्रइन्द्राणी-श्री अशोक सिंघई-श्रीमति ज्योति सिंघई ‘सागर वाले', विदिशा (म०प्र०) थे।

    ३९.नागपुर (महाराष्ट्र)-३ से ९ दिसम्बर २००८ (वी० नि० सं० - २५३१, वि. सं २०६५, मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी, बुधवार से मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, मंगलवार) तक तुलसीनगर दिगम्बर जैन मंदिर का पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित ३७ मुनिराजों के सानिध्य में एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति ज्योति-श्री मुकेश जैन (बहेरिया वाले), नागपुर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री संतोषकुमार-श्रीमति प्रमिला जैन वैशाखिया, नागपुर (महाराष्ट्र) थे।

    ४०.जबलपुर(म०प्र०) -२२ फरवरी से १ मार्च, २००९ (वी. नि० सं०-२५३२, वि० सं० २०६५, फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी, रविवार से फाल्गुन शुक्ल पंचमी, रविवार) तक मढिया जी के मंदिर का पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित ३९ मुनिराजों एवं ७२ आर्यिकाओं के सानिध्य में एवं बा० ब्र० प्रदीप भैया ‘सुयश' (अशोकनगर) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति सुषमा-श्री विजय कुमार जैन (विजय साड़ी), जबलपुर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री आशीष श्रीमति प्रिंसी जैन (लखनऊ एम्पोरियम), जबलपुर (म०प्र०) थे।

    ४१.सागर(म०प्र०)-(अंकुर कॉलोनी, मकरोनिया)-२ से ७ मई २००९ (वि० सं० २०६६, वैशाख शुक्ल अष्टमी, शनिवार से वैशाख शुक्ल त्रयोदशी, गुरुवार) तक समवसरण जिनबिम्ब चौबीसी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव आचार्यश्री एवं ४५ मुनिराजों के ससंघ सानिध्य में एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में भाग्योदय तीर्थ सागर में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति छाया-श्री मुन्नालाल जैन, सागर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री महेशकुमार-श्रीमति ऊषा जैन (बिलहरा वाले), सागर (म०प्र०) थे।

    ४२.शहडोल(म०प्र०)-२२ से २९ नवम्बर २००९ (वी० नि० सं० -२५३२, वि• सं २०६५, मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी, रविवार से मार्गशीर्ष शुक्ल द्वादशी, रविवार) तक नवीन जिनालय का पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित २५ मुनिराजों एवं २७ आर्यिकाओं के सानिध्य में एवं बा० ब्र० प्रदीप भैया ‘सुयश' (अशोकनगर) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति बबीता-श्री दिलीप जैन नायक, शहडोल। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री चौधरी संतोष-श्रीमति सविता जैन, शहडोल (म०प्र०) थे।

    ४३:सतना(म०प्र०)-१५ से २१ जनवरी २०१० (वी० नि० सं० - २५३३, वि० सं० २०६६, माघ कृष्ण अमावस्या, शुक्रवार से माघ शुक्ल षष्ठी, गुरुवार) तक पंचकल्याणक एवं पंचगजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित २८ मुनिराजों एवं २० आर्यिकाओं के सानिध्य में एवं बा० ब्र० प्रदीप भैया ‘सुयश' (अशोकनगर) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। मातापिता-श्रीमति रश्मि-श्री विजयकुमार जैन, सतना । सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री देवेन्द्र कुमार-श्रीमति राजमति जैन, सतना (म०प्र०) थे।

    ४४.महाराजपुर, जिला-सागर(म०प्र०)-२२ से २७ नवंबर २०१० (वी० नि० सं०-२५३६, वि० सं० २०६७, मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा, सोमवार से मार्गशीर्ष कृष्ण षष्ठी, शनिवार) तक श्री दिगम्बर जैन सौधिया जी के मंदिर का पंचकल्याणक एवं त्रयगजरथ महोत्सव आचार्यश्री सहित २६ मुनिराजों के सानिध्य में एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति अनीता-श्री राजीव जैन सौधिया, महाराजपुर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री राजेन्द्र-श्रीमति उर्मिला जैन सौधिया, महाराजपुर, जिला-सागर (म०प्र०) थे।

    ४५.दुर्ग (छत्तीसगढ़)-२४ से २९ दिसम्बर २०१२ (वी० नि० सं० - २५३८, वि० सं० २०६८ माघ शुक्ल एकम, मंगलवार से माघ शुक्ल षष्ठी, रविवार) तक पदमनाभपुर कॉलोनी के पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव का कार्यक्रम आचार्यश्री एवं २६ मुनिराजों के सानिध्य में बा० ब्र० प्रदीप भैया'सुयश'अशोकनगर के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। मातापिता-श्रीमति सुनीता-श्री अनिलकुमार जैन। सौधर्म इन्द्राणी-श्री राजेशकुमार-श्रीमति संगीता जैन (बोरिंग वाले), दुर्ग (छत्तीसगढ़) थे।

    ४६.अतिशय क्षेत्र रामटेकजी, जिला-नागपुर (महाराष्ट्र)- २५ फरवरी से २ मार्च २०१२ (वी० नि० सं०-२५३८,वि० सं० २०६८, फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी, शनिवार से फाल्गुन शुक्ल नवमी, शुक्रवार) तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव बा० ब्र० विनय भैया (बण्ड) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति प्रमिला-श्री संतोषकुमार जैन वैशाखिया, नागपुर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री विमलकुमार-श्रीमति चन्द्रकला जैन डेवढ़िया, नागपुर थे।
    विशेष-पंचकल्याणक के १ दिन पूर्व ही परमपूज्य आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज एवं पूज्यमुनि श्री सुधासागरजी महाराज का लगभग २० वर्ष बाद गुरु-शिष्य मिलन हुआ।

    ४७:सर्वोदय तीर्थ अमरकंटक, जिला-अनूपपुर (म•प्र०)- १२ से १५ मई २०१३, (वी० नि० सं०-२५३९, वि० सं० २०७०, वैशाख शुक्ल द्वितीय, रविवार से वैशाख शुक्ल पंचमी, बुधवार) तक श्री दिगम्बर जैन सर्वोदय तीर्थ अमरकंटक में प्राचीन प्रतिमाओं का सुधार हुआ जिसके लघुपंचकल्याणक आचार्यश्री के सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्ड) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति मीना-श्री अमृतलाल जैन (लुहारी वाले)। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-सिंघई श्री मुकेश जैन-श्रीमति संगीता जैन, बुढ़ार थे।

    ४८.खातेगाँव, जिला-देवास(म०प्र०)-१८ से २४ जनवरी २०१५ (वी० नि० सं०-२५४१, वि० सं० २०७१, माघ कृष्ण-त्रयोदशी, रविवार से माघ शुक्ल चतुर्थी, शनिवार) तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव परम पूज्य आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज सहित ५७ पिच्छीधारी बालयति मुनि/आर्यिका चतुर्विध संघ के सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति कान्ताश्री महेन्द्र कुमार जैन पट्ठा (बाकलीवाल), खातेगाँव। सौधर्म इन्द्रइन्द्राणी-श्री कुशलकुमार–श्रीमति मधुपट्टा (बाकलीवाल) थे।

    ४९:गौरझामर, जिला-सागर(म०प्र०)-६ से १२ फरवरी २०१५ (वी नि० सं०-२५४१, वि० सं० २०७१, फाल्गुन कृष्ण द्वितीया, शुक्रवार से फाल्गुन कृष्ण अष्टमी, गुरुवार) तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव परम पूज्य आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज के बालयति ३८ मुनिराजों के ससंघ सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। माता-पिता-श्रीमति वीणा-श्री चौधरी संतोषकुमार जैन, गौरझामर। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री ऋषभकुमार-श्रीमति ममता जैन (बांदरी वाले), सागर (म०प्र०) थे।

    ५०.गढ़ाकोटा, जिला-सागर(म०प्र०)-३० नवम्बर से ६ दिसम्बर २०१५ (वी० नि० सं०-२५४२, वि० सं० २०७२, मार्गशीर्ष कृष्ण - पंचमी, सोमवारसे मार्गशीर्ष कृष्ण दसमीं,रविवार) तक परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के ४० मुनि, २ ऐलक, १ क्षुल्लक = ४३ पिच्छीधारी बालयति के ससंघ सान्निध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के दौरान २ दिसम्बर २०१५ को जैन युवा संगम और ५ दिसम्बर, २०१५ को राष्ट्रीय जैन विद्वत् संगोष्ठी का विशेष आयोजन हुआ। माता-पिता-श्रीमति माया-श्री जिनेशकुमार सौधिया, गढ़ाकोटा। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री राकेशकुमार-श्रीमति अंजू जैन (हरदी वाले परिवार), गढ़ाकोटा थे।

    ५१.रहली, जिला-सागर(म०प्र०)-८ से १४ दिसम्बर, २०१५ (वी० नि० सं०-२५४२, वि० सं० २०७२, मार्गशीर्ष कृष्ण द्वादश, मंगलवार से मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया, सोमवार) तक परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के ४१ मुनि, १ ऐलक=४२ पिच्छीधारी बालयति के ससंघ सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। मातापिता-श्रीमति अंजना जैन-श्री वीरेन्द्र कुमार जैन (सिमरिया वाले), रहली। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री राजकुमार-श्रीमति प्रभा जैन (अनंतपुरा वाले), रहली थे।

    ५२.तारादेही, जिल-दमोह(म०प्र०)-१५ से २१ जनवरी २०१६ (वी नि० सं०-२५४२,वि० सं० २०७२, पौष शुक्ल षष्ठी, शुक्रवार से पौष शुक्ल द्वादशी, गुरुवार) तक परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के ४१ मुनि, १ऐलक=४२ पिच्छीधारी साधुओं के ससंघ सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। जिसमे माता-पिता-श्रीमति कान्ता-श्री देवेन्द्रकुमार जैन ‘दुबे", तारादेही। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री अरविन्दकुमार-श्रीमति मधु जैन ‘दुबे'(ब्लाऊज वाले), तारादेही थे।

    ५३.कटंगी, जिला-जबलुपर(म०प्र०)-१७ से २३ मार्च २०१६ (वी० नि० सं०-२५४२, वि० सं० २०७२, फाल्गुन शुक्ल नवमीं, गुरुवार से फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, बुधवार) तक परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के साथ ३९ मुनि=४० पिच्छीधारी साधुओं के ससंघ सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। जिसमें मातापिता-श्रीमति माला-श्री श्रेयांसकुमार जैन, कटंगी। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री डॉ. निर्मलकुमार-श्रीमति विशल्या जैन, कटंगी थे।

    ५४.भानपुर, भोपाल(म०प्र०)-२९ नवम्बर से ५ दिसम्बर २०१७ (वी, निष्ठ सं०-२५४३, वि, सं २०७३, मार्गशीर्ष कृष्ण-अमावस्या, मंगलवार से मार्गशीर्ष कृष्ण षष्ठी, सोमवार) तक परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज सहित ३७ पिच्छीधारी साधुओं के ससंघ सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। जिसमें माता-पिता-श्रीमति शीलरानी-श्री संतोषकुमार जैन, बंसिया वाले। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-श्री अशोक कुमार-श्रीमति आशा जैन, शांति सीड्स, भानपुर, भोपाल थे।

    ५५.सिलवानी, जिला-रायसेन(म०प्र०)- १३ से १८ जनवरी २०१७ (वी० नि० सं०-२५४३, वि० सं० २०७३, माघकृष्ण प्रतिपदा, शुक्रवार से माघ कृष्ण षष्ठी, बुधवार) तक परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज सहित ३८ मुनिराज एवं १ क्षुल्लक जी के ससंघ सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्डा) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। जिसमें माता-पिता-श्रीमति कान्तासिं० श्री देवेन्द्र कुमार जैन। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-सिं॰ श्री अमित जैनश्रीमति श्वेता जैन, सिलवानी थे।

    ५६.टड़ा, जिला-सागर(म०प्र०)-३ फरवरी से ८ फरवरी २०१७ (वी० नि० सं०-२५४३, वि० सं० २०७३, माघ शुक्ल सप्तमी, शुक्रवार से माघ शुक्ल द्वादशी, बुधवार) तक परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज सहित ३७ मुनियों के ससंघ सानिध्य एवं बा० ब्र० विनय भैया (बण्ड) के प्रतिष्ठाचार्यत्व में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। जिसमें माता-पिता-श्रीमति कुमुद मोदी-श्री जिनेन्द्र कुमार जी मोदी टड़ा वाले। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी-सिं॰ श्री विनीत मोदी जैनश्रीमति प्रियंका मोदी जैन, टड़ा वाले थे।

    ५७.डोंगरगाँव (छत्तीसगढ़)-९ नवम्बर से १५ नवम्बर २०१७ (वी० नि० सं०- २५४४, वि० सं० २०७४ , मार्गशीर्ष क्रष्ण छट, गुरूवार से मार्गशीर्ष क्रष्ण बारस, बुधवार)तक परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज सहित ३८ मुनियों के ससंघ सानिध्य एंव श्री जय कुमार जी शास्त्री प्रतिष्ठाचार्यत्व में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। जिसमें माता-पिता - श्रेष्ठि श्री सुजीत जी, ममता जी जैन, डोंगरगांव। सौधर्म इन्द्र - श्रेष्ठि श्री संदीप जैन डोंगरगांव वाले थे |

    ५८.रुआबंधा भिलाई छत्तीसगढ़ - २२ जनबरी से २८ जनबरी २०१८ तक रुआबंधा भिलाई छत्तीसगढ़ में पंचकल्याणक हुए आचार्य श्री के सानिध्य में सम्पन्न हुआ।

    ५९.रायपुर (छत्तीसगढ़) ०५ फरवरी २०१८ से ११ फरवरी २०१८ तक परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज सहित मुनियों के ससंघ सानिध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ।

    ६०. ललितपुर - २४ नवम्बर से ३० नवम्बर २०१८ वि. सं.- २०७५, कृष्ण - पक्ष, तक दयोदय गौशाला ललितपुर (उ.प्र) मे आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज सहित मुनियों के ससंघ सानिध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न हुआ। जिसमें  सौधर्म इंद्र- श्रेष्ठि श्री विनोद कामरा परिवार कुवेर- श्रेष्ठि श्री ज्ञान चंद जी जैन इमलिया, अध्यक्ष गौशाला। महायज्ञनायक - श्रेष्ठि शिखरचंद सराफ परिवार राजा श्रेयांस - श्री वीर चन्द्र जी सर्र्राफ जी के परिवार वाले थे |

     

    पंचकल्याणक-राज्यवार

    1. (१)राजस्थान    - १ - मदनगंज, किशनगढ़ - १ 
    2. (२)महाराष्ट्र      - ३ - रामटेक - २, नागपुर - १ 
    3. (३)छत्तीसगढ़   - ४ - बिलासपुर - १, दुर्ग - १, डोंगरगांव - १ , रुआबंधा - १  ,रायपुर - १
    4. (४)गुजरात      - १ - सूरत - १
    5. (५)उत्तरप्रदेश - १ - ललितपुर
    6. (६)मध्यप्रदेश  - ४८ 

    जिला छतरपुर - ३(१) द्रोणगिरि-सन् १९९७
                              (२) खजुराहो-सन् १९८१
                              (३) नैनागिरि जी—सन् १९८७ 
    जिला मुरैना    -१  (१) मुरैना-सन् १९७९ 
    जिला सागर   -१५(१) 
                              सागर-सन् १९९३, सन् १९९८ सन् २००३, सन् २००७, सन् २००९ 
                              (२) बीना बारहा जी-सन् १९७८, १९९५ 
                              (३) केसली-सन् १९८५ 
                              (४) देवरी-सन् १९९३ 
                              (५) बण्डा-सन् २००२ 
                              (६) महाराजपुर-सन् २०१० 
                              (७) गौरझामर-सन् २०१५ 
                              (८) गढ़ाकोटा-सन् २०१५ 
                              (९) रहली-सन् २०१६ 
                              (१०) टड़ा-सन् २०१७
    जिला जबलपुर-६ (१) जबलपुर-सन् १९९३ सन् २००७, सन् २००९ 
                              (२) कोनी जी-सन् १९८२ 
                              (३) शहपुरा-सन् १९८५ 
                              (४) कटंगी-सन् २०१६ 
    जिला दमोह    -५ (१) पथरिया-सन् १९९०, सन् २००७
                              (२) कुण्डलपुर जी-सन् २००१, सन् २००६
                              (३) तारादेही-सन् २०१६ 
    जिला विदिशा -४ (१) गंजबासौदा-सन् १९८५, सन् २००७
                              (२) सिरोंज-सन् १९८९ 
                              (३) विदिशा-सन् २००८ 
    जिला नरसिंहपुर-३(१) नरसिंहपुर-सन् १९९०
                                (२) गोटेगाँव-सन् १९८९ 
                                (३) करेली-सन् २००० 
    जिला बैतूल       -१ (१) सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरि जी-सन् १९९० 
    जिला सिवनी     -२ (१) सिवनी—सन् १९९१ 
                                (२) छपारा-सन् २००२

    जिला छिन्दवाड़ा -१(१) छिन्दवाड़ा-सन् २००० 
    जिला भोपाल      -२(१) भोपाल-सन् २००३
                                (२) भानपुर, भोपाल-सन् २०१६ 
    जिला रायसेन     -२(१) बेगमगंज-सन् २००८ 
                                (२) सिलवानी-सन् २०१७
    जिला शहडोल   -१(१) शहडोल-सन् २००९ 
    जिला सतना      -१(१) सतना—सन् २०१० 
    जिला अनूपपुर  -१(१) सर्वोदय तीर्थ अमरकंटक-सन् २०१३ 
    जिला देवास      -१(१) खातेगाँव-सन् २०१५

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    22 जनबरी से 28 जनबरी 2018 तक रुआबंधा भिलाई छत्तीसगढ़ में पंचकल्याणक हुए आचार्य श्री के सानिध्य में

     

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