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अहिंसा का महात्म्य


संयम स्वर्ण महोत्सव

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अहिंसा का महात्म्य

 

जो किसी को भी कभी नहीं मारना चाहता उसे भी कोई क्यों मार सकता है। जिसकी आन्तरिक भावना निरन्तर यही रहती है कि किसी को भी कोई तरह का कष्ट कभी भी न होवे तथा इसी विचारानुसार जिसकी बाहरी चेष्टा भी परिशुद्ध होती है उसकी उस पुनीत परिणति का प्रभाव होता है कि उसके सम्मुख में आ उपस्थिति हुआ एक खूख्वार प्राणी भी जरासी देर में शान्त हो जाता है। उसके ऊपर आयी हुई आपत्ति भी उसके आत्मबल से क्षण भर में सम्पत्ति के रूप में परिणत हो जाती है। इस बात के उदाहरण हमारे पुरातन में भरे हुए हैं।

 

वारिषेण पर चलाया हआ खड्ग उसका कुछ भी बिगाड़ न कर सका, सोमासती को मारने के लिये लाया हुआ काला नाग उसके छूते ही फूलमाला बन गया और एक गठरिया में बांधकर तालाब में डाले गये राजकुमार और यमदण्ड चाण्डाल, इन दोनों में से राजकुमार तो मगरमच्छ द्वारा भक्षण कर लिया गया किन्तु यमदण्ड चाण्डाल बाल-बाल बच गया, इत्यादि ये सब अहिंसा के ही प्रभाव हैं।

 

सुना जाता है कि दिग्विजय के लिए प्रस्तुत हुआ सिकन्दर जब भारत से वापस लौट चला तो रास्ते में उसकी एक परमहंस महात्मा से भेंट हुयी। उन्हें देखते ही सिकन्दर के रोष का ठिकाना न रहा। वह बोला अबे बे अदब! तू इस प्रकार लापरवाह होकर कैसे खड़ा है? तुझे मालूम नहीं कि सामने से कौन आ रहा है? खबरदार हो, संभल जा वरना तो फिर देख यह तलवार आती है। इस प्रकार कहते हुए तलवार निकालकर वह उनके ऊपर लपका। महात्मा तो अपने ध्यान में मस्त थे। परमात्मा से प्रार्थना कर रहे थे कि भगवान् सबको सुबुद्धि दे। वे क्यों उसकी बात सुनने लगे। अतः उसी प्रकार नि:शक खड़े रहे। तब सिकन्दर के मन में एकाएक परिवर्तन हो गया कि आहे! यह तो खुदा का रूप है, प्रकृति की देन है, अपने सहजभाव से खड़ा है, मैं क्यों व्यर्थ ही इस पर रोष कर रहा हूं?

 

एवं वह अपनी तलवार को वापिस म्यान में रखकर उनके चरणों में गिर पड़ा और बोला- कि प्रभो ! मैं समझता था कि मुझे कोई नहीं जीत सकता परन्तु आपने मुझे जीत लिया है। फिर भी मै इस पराजय को अपना सौभाग्य समझता हूं। इसी प्रकार ईसा के पूर्व छठी शताब्दी में एक लुटेरा हो गया है, वह जिसे भी पाता था उसकी हाथों का अंगुलियों को जला दिया करता था और उसके पास के माल को छीन लिया करता था। इसलिये लोग उसे अंगुलिमाल कहते थे। वह किसी भी राजा महाराजा से नहीं पकड़ा जा सकता था। एक बार महात्मा बुद्ध उधर होकर जाने लगे तो लोग बोले महात्मन् इधर को मत जाइये, इधर में तो अंगुलिमाल है जो कि बड़ा भयंकर है।

 

परन्तु उन्होंने लोगों के कहने को नहीं सुना और चले ही गये। जब अंगुलिमाल ने देखा तो बोला अबे! कौन है? खड़ा रह, कहां जा रहा है? बुद्ध ने चलते-चलते जवाब दिया मैं तो खड़ा ही हूं, तू चलता है, सो तू खड़ा रह। अंगुलिमाल ने कहा, बड़ा विचित्र आदमी है। चला जा रहा है और बोलता है कि खड़ा तो हूं? बुद्ध ने कहा- भाई मैं ठीक तो कह रहा हूं, दुनिया के लोगों को ठहरने के लिए जो बात होनी चाहिये मैं तो उसी बात पर स्थित हूं परन्तु तू इसके इधर-उधर जा रहा है अत: तुझे उसको सम्भालना चाहिये। बस इतना सुनना था कि अंगुलिमाल के विचारों में बिल्कुल परिवर्तन हो गया। अहो ! मैं शरीर से मानव होकर भी मानवता से बिल्कुल दूर हूं। मुझे इन महात्मा के निकट रहकर मनुष्यता का पाठ पढ़ना चाहिये। इस तरह सोचकर उनका परम शिष्य बन गया।

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