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लेखक - महाकवि वाणीभूषण बा. ब्र. पं. भूरामल शास्त्री 

(आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज)

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ज्ञानाष्टक

ज्ञानाष्टक   इस भद्र भारतवर्ष में, थे ज्ञान में नेता गुरू। इस लोक में सबसे अधिक, स्वाधीनता रखते गुरू॥ स्वाधीनता ही सन्त का, भूषण बना इस लोक में। इस लोक में परलोक में, सब लोक में दिखते गुरू ॥१॥   थे ज्ञानासागर पूज्य गुरुवर, आन जिनकी ज्ञान थी। उन ज्ञान ने उस ज्ञान से, ज्योति जगायी ज्ञान थी। जिस ज्योति ने लाखों जगायी, ज्योतियाँ अब ज्ञान की। जलती रहेगी ज्योति नित, अब ज्ञान की उर ध्यान की ॥ २ ॥   जिनके न मन में राग था, न द्वेष रखते थे कभी। उनके चरण में ढोक देते, आर्य जन तो आज भी॥  आजाद थे आजाद वे कल आज भी आजाद हैं। मैं भी करूं बन्दन उन्हीं का, ज्ञानधारी ज्ञान हैं॥ ३ ॥   फैली जगत की भ्रान्तियों का, आप हो निरसन किये। भारत में सोये ज्ञान की, ज्योति जगाकर चल दिये। | होते कहीं जो आज गुरुवर, देश के भू-भाग में । तो देश का कुछ और का कुछ और होता वेश था॥ ४॥   वे सौम्य मुद्रा ज्ञान गुरुवर, ज्ञानधारी ये रहे। कोई विषय उनसे छिपा हो, बात ऐसी न कहे ।| हस्तामलक वत ही उन्हें, सारा विषय प्रत्यक्ष था। कोई कहीं से पूछ जाये, पर न पारावार था॥५॥   ऐसे गुरु की ज्ञान महिमा, वाणी कहे थकती नहीं। महिमा कहूं कहता चलू, कहता रहूं, गुरु आपकी॥ मेरे हृदय में बसे रहे, वो ज्ञान के सागर गुरु। जग में तुम्हारा नाम होवे, काम होवे मम गुरु ॥ ६ ॥   साधु तुम्हारी लोक में करते प्रशंसा नित्य है। जो ज्ञान में उर ध्यान में, तल्लीन तत्पर नित्य हैं। इस लोक में परलोक में, जयवन्त गुरुवर ज्ञान हो। ऐसी हमारी भावना, शिव लोक में जयवन्त हो ॥ ७ ॥   वे ही चरण हैं वास करते, नित्य ही इस दास में। उस वास से इस 'दास' में आती नयी है चेतना ॥ हे ज्ञानासागर मम गुरुवर, आये थे तारण तरण। जय हो तुम्हारी प्राण प्यारे, ज्ञानासागर, ज्ञानासागर ॥ ८ ॥

महाराजा रामसिंह

महाराजा रामसिंह   महाराजा रामसिंह जयपुर स्टेट के एक प्रसिद्ध भूपाल हो गये हैं। जो कि एक बार घोड़े पर बैठकर अकेले ही घूमने को निकल पड़े। घूमते-घूमते बहुत दूर जंगल में पहुँच गये तो दोपहर की गर्मी से उन्हें प्यास लग आई। एक कुटिया के समीप पहुँचे जिसमें बुढ़िया अपनी टूटी सी चारपाई पर लेटी हुयी थी। बुढ़िया ने जब उन्हें अपने द्वार पर आया हुआ देखा तो वह उनके स्वागत के लिए उठ बैठी और उन्हें आदर के साथ चारपाई पर बैठाया। राजा बोले कि माताजी मुझे बड़ी जोर से प्यास लग रही है अत: थोड़ा पानी हो तो पिलाइये। बुढिया ने अतिथि सत्कार को दृष्टि में रखते हुए उन्हें निरा पानी पिलाना उचित न समझा।   इसलिये अपनी कुटिया के पीछे होने वाले अनार के पेड़ पर से दो अनार तोड़कर लायी और उन्हें निचोड़ कर रस निकाला तो एक डबल गिलास भर गया जिसे पीकर राजा साहब तृप्त हो गये। कुछ देर बाद उन्होंने बुढ़िया से पूछा- तुम इस जंगल में क्यों रहती हो तथा तुम्हारे कुटुम्ब में और कौन हैं? जवाब मिला कि यहां जंगल में भगवान भजन अच्छी तरह से हो जाता है। मैं हूं और मेरे एक लड़का है जो कि जलाने के लिये जंगल में लकड़ियां काट लाने को गया हुआ है। यह जमीन जो मेरे पास बहुत दिनों से है पहले ऊसर थी अतः सरकार से दो आने बीघे पर मुझे मिल गई थी। जिसको भगवान के भरोसे पर परिश्रम करके हमने उपजाऊ बना ली है। अब इसमें खेती कर लेते हैं जिससे हम दोनों मां बेटों का गुजर बसर हो जाता है एवं आए हुए आप सरीखे पाहुणे का अतिथि सत्कार बन जाता है। यह सुन राजा का मन बदल गया। सोचने लगे ऐसी उपजाऊ जमीन क्यों दो आने बीघे पर छोड़ दी जाये। बस फिर क्या था उठकर चल दिये और जाकर दो रुपये बीघे का परवाना लिखकर भेज दिया। अब थोड़े ही दिनों में अनार के जो पेड़ उस खेत में लगाये हुए थे वे सब सूखे से हो गये और वहां पर अब खेती की उपज भी बहुत थोड़ी होने लगी। बुढ़िया बेचारी क्या करें लाचार थी।   कुछ दिन बाद महाराज रामसिंह फिर उसी घोड़े पर सवार होकर उधर से आ निकले। बुढ़िया बेचारी क्या करें लाचार थी। कुछ दिन बाद महाराज रामसिंह फिर उसी घोड़े पर सवार होकर उधर से आ निकले। बुढ़िया की कुटिया के पास आ ठहरे तो बुढ़िया उनका सत्कार करने के लिये पेड़ पर से अनार तोड़कर लाई परन्तु उन्हें बिंदाकर देखा तो बिल्कुल शुष्क, काने कीड़ोंदार थी। अतः उन्हें फेंक कर और अच्छे से फल तोड़कर लाई तो उनमें से भी कितने ही तो सड़े गले निकल गये। तीन चार फल जरा ठीक थे। उन्हें निचोड़ा तो मुश्किल से आधा गिलास रस निकल पाया। यह देखकर महराज रामसिंह झट से बोल उठे कि माताजी ! दो तीन वर्ष पहले जब मैं यहां आया था तो तुम्हारे अनार बहुत अच्छे थे, दो अनारों में से ही भरा गिलास रस का निकल आया था। अब की बार यह क्या हो गया? बुढ़िया ने जवाब दिया कि असवारजी! क्या कहूं? निगोड़े राजा की नीयत में फर्क आ गया, उसी का यह परिणाम है। उसे क्या पता था कि जिससे मैं बात कर रही हूं वह राजा ही तो है। वह तो उन्हें एक साधारण घुड़सवार समझकर सरल भाव से ऐसा कह गई ।   राजा समझ गये कि बुढ़िया ने अपने परिश्रम से जिस जमीन को उपजाऊ बनाया था उस पर तुमने अपने स्वार्थवश हो अनुचित कर थोप दिया, यह बहुत बुरा किया। बन्धुओ! जहां सिर्फ जमीनदार की बुरी नियत का यह परिणाम हुआ वहां आज जमीनदार और काश्तकार दोनों ही प्राय: स्वार्थवश हो रहे हैं। ऐसी हालत में जमीन यदि अन्न उत्पन्न करने से मुंह मोड़ रही है तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? हम देख रहे हैं कि हमारे बाल्यजीवन में जिस जमीन में पच्चीस-तीस मन बीघे का अन्न पैदा हुआ करता था वही आज प्रयत्न करने पर भी पांच छ: मन बीघे से अधिक नहीं हो पाता है। जिस पर भी आये दिन कोई न कोई उपद्रव आता हुआ सुना जाता है। कहीं पर टिड्डियां आकर खेत को खा गई तो कहीं पानी की बाढ़ आ गई या पाला पड़कर फसल नष्ट हो गई इत्यादि यह सब हम लोगों की ही दुर्भावनाओं का ही फल है। यदि हम अपने स्वार्थ को गौण करके सिर्फ कर्तव्य समझकर परिश्रम करते रहे तो ऐसा कभी नहीं सकता।

मौत क्या चीज है?

मौत क्या चीज है?   एक सेठ था जिसके पूर्वोपार्जित पुण्य के उदय से ऐहिक सुख की सब तरह की साधन-सामग्री मौजूद थी। अतः उसे यह भी पता नहीं था कि कष्ट क्या चीज होती है? उसका प्रत्येक क्षण अमन चैन से बीत रहा था। अब एक रोज उसके पड़ोसी के यहां पुत्र जन्म की खुशी में गीत गाये जाने लगे जो कि बड़े ही सुहावने थे, जिन्हें सुनकर उस सेठ का दिल भी बड़ा खुश हुआ। परन्तु संयोगवंश थोड़ी देर बाद ही वह बच्चा मर गया तो वहां पर गाने के स्थान पर छाती और मूड कूट-कूट कर रोया जाने लगा। जिसे सुनकर सेठ के मन में आश्चर्य हुआ। अतः उसने अपनी माता से पूछा कि मैया यह क्या बात है? थोड़ा देर पहिले जो गाना-गाया जा रहा था वह तो बहुत ही सुरीली आवाज में था मगर अब जो गाना गाया जा रहा है वह तो सुनने में बुरा प्रतीत हो रहा है। | माता ने कहा, बेटा! यह गाना नहीं किन्तु रोना है। थोड़ी देर पहिले जिस बच्चे के जन्म की खुशी में गीत गाये जा रहे थे वही बच्चा अब मर गया है जिसे देखकर उसके घर वाले अब रो रहे हैं सेठ दोड़ा और जहां वह बच्चा मरा हुआ पड़ा था तथा लोग रो रहे थे वहां गया। उसने उस मरे हुए बालक को देखा और खूब गौर से देखा। देखकर वह बोला कि क्या मरा है? इसका मुंह, कान, नाक, हाथ, आंखे और पैर आदि सभी तो ज्यों का त्यों है फिर आप लोग रो क्यों रहे हैं ? तब उन रोने वालों में से एक आदमी कहने लगा कि सेठ साहब आप समझते नहीं हो, तुमने दुनिया देखी नहीं है इसीलिये ऐसा कहते हो। देखो अपने लोगों का पेट कभी ऊंचा होता है और कभी नीचा लेकिन इसका नहीं हो रहा है। अपनी छाती धड़क रही है परन्तु इसकी छाती में धड़कन बिल्कुल नहीं है। मतलब कि हम लोगों के इन जिन्दा शरीरों में एक प्रकार की शक्ति है। जिससे कि जीवन के सब कार्य सम्पन्न होते हैं जिसका कि नाम है आत्मा। वह आत्मा इसके शरीर में नहीं रही है अत: यह मुर्दा यानी बेकार हो गया है। हम लोगों के शरीर में से वह निकल जाने वाली है सो किसी की दो दिन पहले और किसी की दो दिन पीछे अवश्य निकल जावेगी एवं हमारे ये शरीर भी इसी प्रकार मुर्दा बन जावेंगे, मौत पा जावेंगे।   आत्मा जिसका कि वर्णन ऊपर आ चुका है जिसके कि रहने पर शरीर जिन्दा और न रहने पर मुर्दा बन जाता है और वह आत्मा अपने मूल रूप में सास्वत है, कभी भी नष्ट होने वाली है और अमूर्तिक है उसमें न तो किसी प्रकार का काला पीला आदि रूप है, न खट्टा मीठा, चरपरा आदि कोई रस है। न हलका भारी, रूखा, चिकना, ठण्डा गरम और कड़ा या नरम ही है। न खुशबूदार या बदबूदार ही है। हां सिर्फ चेतनावान है, हरेक चीज के गुण दोषों पर निगाह करने वाला है। जिसमें अवगुण समझता है उनसे दूर रहकर गुणवान के पीछे लगे रहना चाहता है। यह इसकी अनादि की टेव है जिसकी वजह से नाना तरह की चेष्टाएं करने लग रहा है। उन चेष्टाओं का नाम ही कर्म हे। उन कर्मों की वजह से ही शरीर से शरीरान्तर धारण करता हुआ चला आ रहा है, इसी का नाम संसार चक्र है।   संसार चक्र में परिभ्रमण करता हुआ आत्मा इतर जीवात्मा को कष्ट देने वाला बनकर नरक में जन्म लेता है तो वहाँ स्वयं अनेक प्रकार के घोर कष्ट सहन करता है। अपने ऐश आराम की सोचते रहकर छल वृत्ति करने वाला पशु या पक्षी बनता है तो वहां अपने से अधिक बलशाली अन्य प्राणियों द्वारा बञ्चना पूर्वक कष्ट उठाता है। हां, अगर औरों के भले की सोचता है तो उसके फलस्वरूप स्वर्ग में जन्म लेकर सुख साता का अनुभव करने वाला बनता है। परन्तु संतोष भाव से अपना समय बिताने वाला मानव बनता है। इस मानव जन्म में अपने आपके उद्धार का मार्ग यदि वह चाहे तो ढूंढ निकाल सकता है। लेकिन अधिकांश जीवात्मा तो मानव जन्म पाकर भी मोह माया में ही फंसे रहते है। इस शरीर के संबंधियों को अपना संबंधी मानकर मानकर उनमें मेरामेरा करने वाला और बाकी के दूसरों को पराये मानकर उनसे नफरत करने वाला होकर रहता है।   कोई विरला ही जीव ऐसा होता है जो कि शरीर से भी अपने आप (आत्मा) को भिन्न मानता है एवं जब कि आप इस शरीर से तथा इतर सब पदार्थों से भी भिन्न है। ऐसी हालत में पराये गुण दोषों पर लुभाने से क्या हानि लाभ होने वाला है। पराये गुण दोष पर में होते हैं उनसे इसका क्या सुधार बिगाड़ हो सकता है? क्यों व्यर्थ ही उनके बारे में संकल्प विकल करके अपने उपयोग को भी दूषित बनावे? तटस्थ हो रहता है। उसके लिये फिर इस संसार में न कोई भी सम्पत्ति ही होती है और न कोई विपत्ति ही, वह तो सहज तथा सच्चिदानन्द भाव को प्राप्त हो रहता है।   समता के द्वारा ममता को मिटा डालता है। क्षमा से क्रोध का अभाव कर देता है। विनीत वृत्ति के द्वारा मान का मूलोच्छेद कर फेंकता है। अपना तन, मन और वचन से प्राप्त किये हुये सरल भाव से कपट को पास में भी नहीं आने देता है और निरीहता के द्वारा लोभ पर विजय प्राप्त कर्म निजयी बन कर आत्मा से परमात्मा हो लेता है फिर सूके हुये घाव पर खरूंट की भांति उसका यह शरीर भी अपने समय पर उससे अपने आप दूर हो जाता है। आगे लिये फिर कभी शरीर धारण नहीं करना पड़ता।   ॥ ॐ शान्ति॥ यही एक कर्त्तव्य है सुखी बने सब लोग। रोग शोक दुर्भोग का कभी न होवे योग । यही एक कर्तव्य है कहीं न हो संत्रास। किसी जीव के चित्त में, सब ले सुख की सांस ।  यही एक कर्तव्य है कभी न हो दुष्काल। भूप और अनुरूप भी सभी रहें खुशहाल। इति शुभं भूयात्

बड़ा दान

बड़ा दान   यद्यपि आमतौर पर लोग एक रूपया देने वाले की अपेक्षा पांच रूपये देने वाले को और पांच देने वाले की अपेक्षा पचास तथा पांच सौ देने वाले को महान दानी कहकर उसके दान की बड़ाई किया करते हैं। मगर समझदार लोगों की निगाह में ऐसी बात नहीं है क्योंकि एक आदमी करोड़पति, अरबपति जिसकी अपने खर्च के बाद भी हजारों रूपये रोजाना की आमदनी है वह आड़े हाथ भी किसी को यदि सौ रूपये दे देता है तो उसके लिए ऐसा करना कौनसी बड़ी बात है। हां, कोई गरीब भाई दिन भर मेहनत मजदूरी करके बड़ी मुश्किल से कही अपना पेट पाल पाता है वह आदमी अपनी उन दो रोटियों में से आधी रोटी भी किसी भूखे को देता है तो वह उसका दान बड़ा दान है उसकी बड़ी महिमा है। वह महाफल का दाता होता है।   एक समय की बात है, मैं कलकत्ते में काम किया करता था, वहां कांग्रेस का सालाना जलसा हुआ, जिसके अन्त में महात्मा गांधीजी ने कांग्रेस की सहायता करने के लिये आम जन के सम्मुख अपील रखी। जिसको लेकर किसी मकानदार ने अपना एक मकान कांग्रेस को दिया तो किसी धनवान ने लाख रूपये , किसी ने पचास हजार रूपये इत्यादि। इतने में एक खोचा मटिया आया और बोला कि महात्मा जी! मैं भी ये आठ आने पैसे जो कि दिन भर मुटिया मजूदरी करने से मुझे प्राप्त हुये हैं, देश सेवार्थ कांग्रेस के लिये अर्पण करता हूं। क्या करूं अधिक देने में असमर्थ हूं रोज मजदूरी करता हूं। और पेट पालता हूं मगर मैंने यह सोचकर कि देश सेवा के कार्य में मुझे भी शामिल होना चाहिये, यह आज की कमाई कांग्रेस की भेंट कर रहा हूं। मैं आज उपवास से रह लूंगा और क्या कर सकता हूँ?   इस पर गांधीजी ने उस भाई की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी और कहा था कि हमारे देश में जब ऐसे त्यागी पुरुष विद्यमान हैं तो फिर हमारे देश के स्वतंत्र होने में अब देर नहीं समझना चाहिये हमारे पुराने साहित्य में भी एक कथा आती है कि एक मेहनतिया था जो कि मेहनत करके उसके फलस्वरूप कुछ अनाज लाया और लाकर उसने उसे अपनी घरवाली को दिया ताकि वह उसे साफ सुथरा करके पीस कर उसकी रोटियां बना ले। औरत ने भी ऐसा ही किया। उसने उसकी मोटी-मोटी तीन रोटियां बनाई क्योंकि उसके एक छोटा बच्चा भी था। अत: उसने सोचा कि हम तीनों एक-एक रोटी खाकर पानी पी लेंवेगे। रोटियां बन कर जब तैयार हुई तो मरद के दिल में विचार आया कि यह कमाना और खाना तो सदा से लगा ही हुआ है और जब तक जिन्दगी है लगा ही रहेगा। हमारे बुजुर्गों ने बताया है कि कमा खाने वाले को कुछ परार्थ भी देना चाहिये तो आज तो फिर यह मेरे हिस्से की रोटी किसी अन्य भूखे को ही दे लू, मैं आज भूखा ही रह लूंगा। इतने ही में उसे एक मासोपवासी क्षीणकाय दिगम्बर परमहंस साधु दिखाई दिये। तो उन्हें देखकर वह बोला कि साधु जी ! प्रणाम, मेरे पास रूखी सूखी और बिना नोन की जौ की रोटी है मैं मनसा वाचा कर्मणा आपके लिए देना चाहता हूं। आइये और आप इसे खा लीजिये। साधु तो मन और इन्द्रियों के जीतने वाले होते हैं। सिर्फ इस शरीर से भगवद्भभजन बन जावे इस विचार को लेकर इसे चलाने के लिये कुछ खुराक दिया करते हैं। जिस पर भी उन के तो आज ऐसा ही अभिग्रह भी था। अत: उन्होंने उसकी दी हुई रोटी को अपने हाथों में ली और खड़े-खड़े ही मौनपूर्वक खा गये। इतने में औरत ने भी विचार किया कि ऐसे साधुओं के दर्शन कहां रखे हैं। हम लोगों का बड़ा भाग्य है ताकि हमारा रूखा-सूखा अन्न आज इनके उपयोग में आ रहा है। लड़के ने भी सोचा कि आहे! ये तो हम लोगों से भी गरीब दीख रहे हैं।   जिनके शरीर पर बिल्कुल कपड़ा नहीं, खाने के लिये कोई पात्र नहीं, रहने को जिनका कोई घर नहीं, इनके काम में मेरी रोटी आ गई इससे भली बात और क्या होगी? इस पर देवताओं ने भी अहो! यह दान महादान है ऐसा कहते हुए आकाश में से फूल बरसाये तथा जय-जय कार किया, सो ठीक ही है। परमार्थ के लिये अपना सर्वस्व अर्पण कर देना ही मनुष्य जन्म पाने का फल है अन्यथा तो फिर स्वार्थ के कीच में तो सारा संसार ही फंसा हुआ दीख रहा है।

समाधिकरण

समाधिकरण   जिसने भी जन्म पाया है, जो भी पैदा हुआ है उसे मरना अवश्य होगा, यह एक अटल नियम है। बड़े-बड़े वैज्ञानिक लोग इस पर परिश्रम कर के थक लिये कि कोई भी जन्म लेता है तो ठीक, मगर मरता क्यों हैं? मरना नहीं चाहिये। फिर भी इस में सफल हुआ हो ऐसा एक भी आदमी इस भूतल पर नहीं दिख पड़ा रहा है। धन्वन्तरिजी वैष्णवों के चौबीस अवतारों में से एक अवतार माने गये हैं। कहा जाता है कि जहां वे खड़े हो जाते थे, वहां की जड़ी बूटियां भी पुकार-पुकारकर कहने लगती थीं कि मैं इस बीमारी में काम आती हूं, मैं अमुक रोग को जड़ से उखाड़ डालती हूं। मगर एक दिन आया कि धन्वन्तरि खुद ही इस भूतल पर से चल बसे । जड़ी बूटिया यहीं पड़ी रहीं और धन्वन्तरि शरीर त्याग कर चले गये, उनका औषधिज्ञान इस विषय में कुछ भी काम नहीं आया।   मुसलमानों में भी लुकमान जैसे हकीम हुए हैं जो कि चौदह पीरों में से एक पीर कहे जाते हैं। मगर मौत आकर उनका भी लुकमा कर देगी। जैसे सिंह हिरण को और बाज तीतर को धर दबाता है, वैसे ही मौत मनुष्यों को एवं सभी शरीरधारियों को हड़प लेती है। वह कब किसको अपना ग्रास बनायेगी यह निश्चित रूप से हम तुम सरीखा नहीं जान सकता है। अनेक लोग मौत से बचने के लिए टोणा-टामण, जन्तर-मन्तर करते हैं। ताबीज बनाकर गले में बांधते हैं। फिर भी मौत अपना दाव नहीं चूकती, समय पर आ ही दबाती है। उससे बचने के लिए शरीरधारी के पास कोई चारा है ही नहीं। ऐसी हालत में समझदार आदमी मौत से डर कर क्यों भागे; और भाग कर जावे भी कहां, उसके लिए जगह भी कहां तथा कौन-सी है जहां कि वह उससे बचा रहे?    हां, तो इसका क्या यह अर्थ है कि गले में अंगुली डाल कर मर जाना चाहिये? सो नहीं, क्योंकि ऐसा करना तो नर से नारायण बना देने वाले इस मानव शरीर के साथ विद्रोह करना है, चिन्तामणि रत्न को हथोड़े की चोट से बरबाद करना है। यह पहले दर्जे की बेसमझी है। परन्तु इसको किराये की कोठरी के समान समझते हुए रहना चाहिये। जैसे किसी को कुछ अभीष्ट करना हो और उसके पास अपना नियत स्थान न हो वह किसी किराये के मकान में रह कर अपने उस कार्य का साधन किया करता है। सिर्फ वहां पर रहकर अपना कार्य कर बताने पर दृष्टि रखता है, न कि उस मकान का मालिक ही बन बैठता है। मकान को तो मकानदार जब भी खाली करवाना चाहे करवा सकता है। यह उसे बेउजर खाली कर देने को तैयार रहता है। क्योंकि मकान उसका है। हां जब तक उसमें रहे यथा शक्य झाड़-पौंछ कर साफ-सुथरा किये रहे, यह उसकी समझदारी है। | जीवात्मा ने भी भगवान का भजन कर अपना कल्याण करने को इस शरीर रूपी कुटिया को अपना स्थान बनाया है तो इसमें रहते हुए इसके सम्मुख अनेक तरह के भले और बुरे प्रसंग आ उपस्थित होते हैं। उनमें से बुरे को बुरा मानकर उनसे दूर भागने की चेष्टा करना और भलों को भला मानकर उसके पीछे ही लगा रहना- उस उलझन में फंस जाना ठीक नहीं। किन्तु उन दोनों तरह के प्रसंगों में तटस्थ रूप से सुप्रसन्न होकर निरन्तर परम परमात्मा का स्मरण करते रहना चाहिये। फिर यह शरीर यदि कुछ दिन टिका रहे तो ठीक और आज ही नष्ट हो जावे तो भी कोई हानि नहीं, ऐसे सुप्रसिद्ध पुरुष के लिए मौत का कोई डर नहीं रह जाता, जिस मौत के नाम को सुन कर भी संसारी जीव थर-थर कांपा करते हैं।

दान का सही तरीका

दान का सही तरीका   आपने ‘‘राजस्थान इतिहास' देखा होगा। वहां महान उदयन का वृत्तांत लिखा हुआ है। वह मननशील विद्वान था, परन्तु दरिद्रता के कारण उसके पैर जमीन पर नहीं जम सके थे। अत: वह नंगे पैर मारवाड़ के रेतीले मैदान को पार करते हुए बड़े कष्ट के साथ सिद्ध पुर पाटन तक पहुंच पाया। उसने दो दिन से कुछ भी नहीं खाया था और शरीर पर मैले तथा फटे कपड़ों को पहने हुए था। उसका नाते रिश्तेदार या परिचित तो था ही नहीं जो कि उसके सुख-दुःख की उसे पूछता। थोड़ी देर बाद वह एक जैन धर्मस्थान के द्वार पर जा बैठा। यद्यपि वहां पर धर्म साधन करने के लिए अनेक लोग आते थे और ईश्वरोपासना तथा धर्मोपदेश सुनकर के जा रहे थे जिनमें कितने ही श्रीमान लोग भी थे जिनके गले में सोने के आभूषण और शीश पर सुनहरे काम की पगड़ियाँ चमक रही थीं, जो कि अपनी नामवरी के लिये तिजोरी खोल कर पैसे को पानी की भांति बहाने वाले थे मगर गरीब मुसाफिर की तरफ कौन देखने वाला था? हाँ, थोड़ी देर बाद एक बहन जी आयीं, जिनका नाम लक्ष्मीबाई था। वह यथा नाम तथा गुण वाली थी। उसने उसी दिन उदयन को विकल दशा में बैठे देखा तो पूछा कि यहां पर किस लिये आये हो? जवाब मिला कि रोजी की तलाश में। बहनजी ने फिर पूछा कि क्या तुम्हारी जान पहचान का यहां पर कोई है? जवाब मिला कि नहीं। क्षण भर विचार कर बहनजी ने कहा कि भाई जी फिर कैसे काम चलेगा? बिना जान-पहचान के तो कोई पास में भी नहीं बैठने देता है, उदयन ने कहा बहनजी। कोई बात नहीं, मैं तो अपने पुरुषार्थ और भाग्य पर भरोसा करके यहां पर आ गया हूं। अगर कोई अच्छा काम मिल गया तब तो अपने दो हाथ बताऊंगा, नहीं तो भूखा रहकर मर मिटूगा। इतना सुनते ही लक्ष्मीबाई बोली कि अभी भोजन किया है या नहीं? इस पर उदयन बोला कि बहनजी मुझे भोजन किये हुए दो रोज हो लिए हैं और न जाने कितने दिन ऐस ही निकल जावेंगे। परन्तु भूख की चिन्ता नहीं है अगर भूख की परवाह करता तो फिर मैं मेरे गाँव से इतनी दूर चलकर भी कैसे आ पाता?   यह सुनते ही लक्ष्मीबाई का हृदय हिल गया, वह बोली कि तुम मेरे साथ चलो, भाई ! भोजन तो करो फिर जैसा कुछ होगा देखा जावेगा। उदयन ने कहा बहनजी आप तो ठीक ही कह रही हैं, मगर मैं आपके साथ कैसे चलूं? मैंनें आपके यहां का कोई भी कार्य तो किया नहीं, फिर आपके साथ मुफ्त रोटी खाने को कैसे चल सकता हूं? लक्ष्मी बाई बोली तुम ठीक कह रहे हो, मगर तुमने मुझे बहन कहा है और मैंने तुम को भाई, फिर भाई के लिए बहन की रोटी मुफ्त की नहीं होती किन्तु अभूतपूर्व भ्रातृ-स्नेह के उपहार स्वरूप होती है। अतः उसके खाने में कोई दोष नहीं है। तुम भले ही किसी भी कोम के, कोई भी क्यों न हो मगर धार्मिकता के नाते से जबकि तुम मेरे भाई हो और मैं तुम्हारी बहन फिर संकोच कैसा? तुम को तो सहर्ष मेरा कहना स्वीकार कर लेना चाहिये, अन्यथा तो फिर मेरे दिल को बड़ी ठेस लगेगी। भाई साहब! कृपा कर मेरा कहना स्वीकार कीजिये और मेरे साथ चलिये।   लक्ष्मीबाई के इस तरह के स्वाभाविक सरल विनिवेदन का उदयन के हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा। अतः वह उसके साथ हो लिया। घर जाकर लक्ष्मीबाई ने उदयन को प्रेम और आदर के साथ भोजन कराया तथा अपने पतिदेव से कह कर उसके योग्य कुछ समुचित काम भी उसे दिलवा दिया, जिसे पाकर उन्नति करते हुए वह धीरे-धीरे चल कर एक दिन वही सिद्धपुर पाटन के महाराज का महामंत्री बन गया। जिसने प्रजा के नैतिक स्तर को ऊँचा उठा कर उसे सन्मार्गगामिनी बनाया। मतलब यह कि वही सच्चा दान होता है जो कि दाता के सात्विक भावों से ओतप्रोत हो एवं जिसको दिया जावे उसकी आत्मा को भी उन्नत बनाने वाला हो तथा विश्वभर के लिए आदर्श मार्ग का सूचक हो।

दान अपनी कमाई में से देना

दान अपनी कमाई में से देना   किसी एक गांव का राजा मर जाने से उसकी एवज में उसके बेटे का राजतिलक होने लगा। जिसकी खुशी में वही उसने दान देना शुरू किया जिसे सुनकर बहुत से आशावान लोग वहां पर जमा हो गये। उन्हीं में एक पढ़ालिखा समझदार पण्डित भी था जिसने होनहार राजा की प्रशंसा में कुछ श्लोक सुनाए। राजा बड़ा खुश हुआ और बोला कि तुमको जो चाहिये सो लो। पण्डित ने कहा मैं अभी आप से क्या लू? फिर कभी देखा जावेगा। राजा ने कहा कि कुछ तो अभी भी तुमको मुझ से लेना ही चाहिये। पण्डित बोला कि यदि आप देना ही चाहते हैं तो एक रुपया मुझे दे दीजिये मगर वह आपका अपनी कमाई का होना चाहिये। इसको सुनकर और सब लोग तो कहने लगे कि इसने राजा से क्या मांगा? कुछ नहीं मांगा। परन्तु राजा ने सोचा कि इसने तो मुझसे बहुत बड़ा दान मांग लिया क्योंकि मेरे पास इस समय मेरा कमाया हुआ तो कुछ भी नहीं है। यह तो राज्य सम्पत्ति है वह तो या तो पिताजी की देन है या यों कहो कि इस पर आम प्रजा का अधिकार है। मेरा इसमें क्या है? अतः मैं मेरी मेहनत से कमाकर लाकर एक रुपया इसे दूं मैं उसके बाद ही इस राज्य- सिंहासन पर बेटुंगा। ऐसा कह कर कोई काम करने की तलाश में गांव से चला गया।   इसे राजपुत्र या होनहार राजा समझ कर जिसके भी पास में गया तो उसका सम्मान खूब ही हुआ मगर उससे कोई भी काम कैसे लेवे और क्या काम लेवे? अत: बहुत देर तक चक्कर काटते-काटते वह एक लुहार की दुकान पर पहुंचा। लुहार लोहा गरम करके उसे घन से कूटने को था जो कि अकेला था, दूसरे किसी सहकारी की प्रतिक्षा में था। उसके पास जाकर बोला- कुछ काम हो तो बताओ? तब लुहार बोला- आओ मेरे साथ इस लोहे पर घन बजाओ और शाम तक ऐसा करो तो तुम्हें एक रूपया मिल जावेगा। राजपुत्र ने सोचा ठीक है परन्तु जहां उसने घन को उठाकर एक दो बार चलाया तो उसका शरीर पसीने में तर-बर हो गया। राजपुत्र बोला कि बाबा यह काम तो बड़ा कठिन है, जवाब मिला कि नहीं तो फिर रूपया कहीं ऐसे ही थोड़े ही मिल जाता है। खून का पानी हो जाता है तो कहीं पैसा देखने को मिलता है। राजपुत्र सुनकर दंग रह गया परन्तु और करता ही क्या? लाचार था।   जैसे-तैसे करके दिन भर घन बजाकर रूपया लिया तथापि समझ जरूर गया कि आम गरीब जनता किस प्रकार परिश्रम कर पेट पालती है। हम सरीखे राजघराने वालें को इसका बिल्कुल भी पता नहीं है। अगर वह पण्डित ऐसा दान देने को न कहता तो मुझे भी क्या पता था कि प्रजा के लोगों का अपना, अपने कुटुम्ब का भरण-पोषण करने के लिए किस प्रकार कष्ट सहन करना पड़ता है? अस्तु, राजपुत्र वह रूपया ले जाकर पण्डित को देते हुए कहने लगा कि महाशय जी धन्य हैं, आपने मेरी आंखे खोल दी। पण्डित बोला, प्रभो! मुझे यह एक रूपया देकर उसके फलस्वरूप अब आप सच्चे राजा हो रहेंगे।

दान करना

दान करना   दान का सीधा-सा मतलब है अपने तन मन और धन से औरों की सहायता करना। मनुष्य जीवन ही ऐसा है कि किसी न किसी रूप में दूसरे से सहायता लिए बिना उसका कुछ भी काम नहीं बन सकता है। जब कि औरों से सहायता लिए बिना निर्वाह नहीं तो फिर औरों की सहायता करना भी उचित ही है। अत: दान करना परमावश्यक है। परन्तु इसके साथ यह बात भी सही है कि मनुष्य लेना तो जानता है और देने में संकोच किया करता है।   आम तौर पर देखने में आता है कि मनुष्य दोनों हाथों से कमाया करता है। मगर खाता एक हाथ से है, इसका मतलब यही कि मनुष्य काम-धन्धे में अपने दोनों हाथों पर भरोसा रखे, अपने कर्तव्य कार्य को दूसरे से करवा लेने का विचार अपने मन में कभी न आने दे। प्रकृति ने जब खुद को दो हाथ दिये हैं तो फिर क्यों व्यर्थ ही दूसरे के सहारे को टटोलता रहे? हरेक समुचित काम को सबसे पहले अपने आप खुद कर बनाने को तैयार रहे। हां, जो अपने दोनों हाथों की कमाई है उसमें से एक हाथ की कमाई को तो अपने शरीर के निर्वाह में और कुटुम्ब के पालन-पोषण में खर्च करे। शेष एक हाथ की कमाई को परमार्थ के लिए बचाकर रखे, उसे परोपकार के कार्यों में खर्च करे। लेने के स्थान पर किसी को कुछ देना सीखें ऐसा हमारे बुजुर्गों का कहना है।   हर एक को चाहिये कि घर पर आये हुए आत्मा को होनहार परमात्मा मानकर उसका सत्कार करे और कुछ नहीं तो कम से कम मिष्ट सम्भाषण पूर्वक अपने पास बैठने को उसे जगह देवे। भूखे को रोटी खिलाकर प्यासे को पानी पिला दे। भूले भटके हुए को सही रास्ता बतला दे।

उपवास का महत्व

उपवास का महत्व   यह कोई नई बात नहीं है कि शरीर को स्थिर करने के लिए आहार की खास आवश्यकता होती है। जो कुछ हम भोजन करते हैं उसका रस रक्तादि बन कर हमारे शरीर को बनाये रखने में सहायक होते हैं। परन्तु वह भोजन भी प्राकृतिक और मितमात्रा में तथा समुचित रीति से खाया जाना चाहिये, नहीं तो वही भोजन लाभ के स्थान पर हानिकारक हो जाता है। भोजन शरीर का साधन है इसीलिये यह शरीरधारी भी भोजन का आदी बना है और इसीलिये हो सके जहां तक अच्छे से अच्छा स्वादिष्ट रूचिकर भोजन बनाकर खाया करता है। भोजन रूचिकर होने से कभी-कभी अत्यधिक मात्रा में भी खा लिया जाता है जिससे कि अजीर्ण होकर शरीर के रोगी बनने का अन्देशा रहता है। अतः उस अजीर्ण को दूर करने के लिए उपवास करने की अर्थात् भोजन न करने की आवश्यकता होती है।   हां, उपवास करने में जिस प्रकार भोजन के त्याग करने की जरूरत होती है उसी प्रकार अपने मन और इन्द्रियों को भी वश में रखने की आवश्यकता पड़ती है, मन को वश में किये बिना जो भोजन त्याग कर दिया जाता अर्थात् खाना नहीं खाया जाता वह लंघन कहलाता है और लंघन से कभी-कभी लाभ के स्थान पर हानि हो जाया करती है।   एक समय एक मोटी बुद्धि का आदमी अपनी औरत को मीलवा लाने के लिए ससुराल में गया। वहां उसके लिए अच्छे पदार्थ खाने के लिए बने तो स्वादिष्ट समझ कर उन्हें वह खूब खा गया। अतः अजीर्ण हो जाने से वैद्य ने उससे कहा, कम से कम आज भर के लिए तुम खाना मत खाओं ताकि तुम्हारा अजीर्ण पच कर ठीक हो जावे। इस पर उसने भोजन नहीं किया, मगर उसका मन भोजन के लिए ललचाता रहा अतः वह दिन भर तो सुसराल वालों की शर्म खाकर बिना खाये रहा। किन्तु जब रात हुयी तो सोचा कि कुछ न कुछ तो खाना ही चाहिये, नहीं तो फिर यह पहाड़ जैसा लम्बी रात कैसे कटेगी? इधरउधर देखा तो अपनी खटिया के नीचे चावलों की भरी थरिया रखी थी, उसमें से एक मुट्ठी भर कर मुंह में ले गया। इतने ही में घर वाली आ गयी तो अब उन्हें चबावे कैसे? उसके सामने शर्म के मारे वह मुंह फुलाये रहा। उसे ऐसी हालत में देख कर उसकी घर वाली ने अपनी मां को आवाज दी। दोनों गौर से देख कर कहने लगीं कि इनके तो कुछ रोग हो गया है जिससे गाल फूल गये हैं और मुंह खोला नहीं जाता है। डॉक्टर को बुलाया गया तो यथार्थ बात को समझते हुए भी अपनी डबल फीस अदा करने के विचार से उसने उसके गाल पर नश्तर लगाया और नखचूटी से एक चावल खून में भिगोकर निकाल तथा दिखाते हुए कहा कि इनके तो अजीर्ण के कोप से मुंह में कीड़े पड़ गये हैं। अतः तुम दोनों बाहर चली जाओ, मुझे इन कीड़ों को धीरे-धीरे निकालने दो। मां बैटी अफसोस करती हुई चली गयी तो डॉक्टर ने कहा कि कम अक्ल ! अब तो इन चावलों को थूक दे, अगर भूखा नहीं रहा जाता है तो अब तुझे दूध  पिला दिया जावेगा। उसने मिट्टी भरे सकोरे में थूक दिया। डॉक्टर ने उन पर और मिट्टी डाल दी और उन दोनों औरतों को बुलाकर कहा- जाओ इन विषैले कीड़ों को गढ़ा खोद कर दबा दो तथा इन्हें दूध पिलाओ। | मतलब इन सबका यह कि बिना मन को वश में किये जो उपवास किया जाता है उससे ऐसा ही दुरुपयोग होता है। हां, मन और इन्द्रियों को वश में रखकर जो उपवास किया जाता है तो उससे आत्मबल बढ़ता है। हमारे भारत के हृदय सम्राट महात्मा गांधीजी ने तो उपवास के बल पर बड़े-बड़े कार्य कर बताये थे। उनके सत्याग्रह, असहयोग और उपवास ये तीन ही खास प्रयोग थे। हमारे अर्थशास्त्रों में भी उपवास की बड़ी ही महिमा बतायी गयी है। साधु महात्मा लोगों के करने योग्य तपश्चरण में तो सबसे पहला नम्बर उपवास का ही रखा गया है किन्तु गृहस्थों को भी कम से कम एक सप्ताह में एक उपवास करने के लिए कहा गया है।

रात्रि में भोजन करने से हानि

रात्रि में भोजन करने से हानि   अकबर बादशाह कौम से मुसलमान थे किन्तु हिन्दुओं के साथ भी उनका अच्छा संपर्क था। उनका प्रधानमंत्री बीरबल भी ब्राह्मण था। उनके पास और भी भले-भले हिन्दू रहते थे। एक दिन, दिन में खाने वाले किसी विचारशील हिन्दू आदमी ने उनसे कहा कि हुजूर! आप रात्रि में खाना खाते हैं यह ठीक नहीं कर रहे हैं। बादशाह बोले क्यों क्या हानि है? जवाब मिला कि हानि तो बहुत है। सबसे पहली हानि तो यही है कि रात्रि में अंधकार की वजह से भोजन में क्या है और क्या नहीं है यही ठीक नहीं पता चला करता है। तब बादशाह बोले कि दीपक के उजाले में अच्छी तरह से देखकर खाया जाये तो फिर क्या बात रह जाती है? जवाब मिला कि बात तो और भी है परन्तु अभी आप इतना ही करें कि दीपक के प्रकाश में अच्छी तरह से देखकर ही खाया करें।   अब बादशाह रोज ऐसा ही करने लगे। एक रोज सजा हुआ थाल बादशाह के आगे टेबिल पर लाकर रखा गया तो बादशाह बोले कि दीपक लाओ तब देखकर खाया जायेगा। दीपक आया और देखा गया तो भोजन में घी और मीठे की वजह से जहरीली कीड़ियों का नाल लगा हुआ है। बादशाह को विचार आ गया तो नियम किया कि आगे के लिए रात्रि को न खाकर दिन में ही खाया जाये यही बात अच्छी है। | हाँ! यह कहा जा सकता है कि वह समय कुछ और था। आज तो स्थान-स्थान पर बिजली की रोशनी होती है जिसमें अच्छी तरह देखकर खा लिया जा सकता है, परन्तु ऐसा कहने वालों को इतना भी तो सोचना चाहिये। कि बिजली के प्रकाश में भी पंतगे, मच्छर वगैरह आकर भोजन में पड़ेंगे। जिनमें कितने ही मच्छर ऐसे भी होते हैं जिनके कि खाने में आ जाने से अनेक प्रकार के भयंकर रोग हो जाते है।

पर्यालोचन

पर्यालोचन   मनुष्य विस्मरणशील होता है और उसके जुम्मे अपने शरीर को संभाल कर रखना, बाल बच्चों का लालन-पालन करना, अभ्यागतों का सत्कार करना, बुजुर्गों का टहल करना, दीन-दु:खियों की सेवा करना, मित्र दोस्तों के साथ प्रेम से सम्भाषण करना, भगवद्भभजन करना आदि अनेक तरह के कार्य लगे हुए होते हैं। उनमें से कौन-सा कार्य किस प्रकार से आज मुझे सम्पादित करना चाहिये, कौन से कार्य सम्पादित करने में मैंने क्या गलती खाई है, कहीं मैंने मेरे तन-मन-वचन और धन के घमण्ड में आकर कोई न करने योग्य अनुचित बर्ताव तो नहीं कर डाला है, मेरे रहन-सहन में किसी गरीब भाई का किसी भी प्रकार का कोई नुकसान तो नहीं हुआ है, तथा किसी भी बुजुर्ग का मेरे से कोई अविनय तो नहीं बन पड़ा है, इस प्रकार से सोच कर देखना।   अगर कोई भी तरह की कुचेष्टा बन गयी हो तो भगवान को स्मरण कर उनके सम्मुख पश्चाताप करना और आगे के लिए कभी नहीं होने देने का दृढ़ संकल्प करना चाहिये। प्रतिदिन सुबह और सांयकाल को इस प्रकार संभाल करते रहने से मनुष्य की बुद्धि निर्मल बनी रहती है और वह सान पर चढ़ा कर तैयार की हुई तलवार के समान तीखी बनकर अपने करने योग्य कार्य को आसानी के साथ कर पा सकती है।

रात्रि में भोजन करना मनुष्य के लिए अप्राकृतिक है

रात्रि में भोजन करना मनुष्य के लिए अप्राकृतिक है   शारीरिक शास्त्र जो कि मनुष्य स्वास्थ्य को दृष्टि में रख कर बना उसका कहना है कि दिन में पित्त प्रधान रहता है तो रात्रि में कफ। एवं भोजन को पचाना पित्त का कार्य है अतः मनुष्य को दिन में ही भोजन करना चाहिये। इसलिये वैद्य लोग अपने रोगी को लंघन कराने के अनन्तर जो पथ्य देते हैं वह कर्तव्य पथ प्रदर्शन रात्रि में कभी भी न देकर दिन में ही देते हैं। दिन में भी सूर्योदय से एक डेढ़ घण्टे बाद से लगातार मध्यान्ह के बारह बजे से पहले ही पथ्य देने का आदेश करते हैं क्योंकि पित्त का समुत्तम काल यही है। हां एक बार का योग्य रीति से खाया हुआ अन्न अधिक से अधिक छः घण्टे में पचकर फिर दुबारा खाने की प्रेरणा देता है। यानी दस बारह बजे के बीच में जिस आदमी ने भोजन किया है। उसे चार छ: बजे के बीच में फिर खाने की आवश्यकता हो जाती है। परन्तु अपरान्ह में जो किया जाये वह स्वल्प मात्रा में होना चाहिये ताकि वह कफ का काल आने से पहले पचा लिया जा सके। ऐसी हमें हमारे वैद्यक शास्त्र की आज्ञा है।   रात्रि में कफ प्रधान, काम सेवन का और शयन का समय आ जाता है सो काम सेवन भी भोजनानन्तर में नहीं किन्तु भोजन का परिपाक होने पर करना ठीक होता है तथा शयन करना, नींद लेना तो भोजनानन्तर में बिल्कुल ही विरुद्ध कहा गया है। दिन में भी जब किसी रोगी को पथ्य दिया जाता है तो उसे उस अन्न के गहल से नींद आने लगती है फिर भी हमारे प्राणाचार्यों का कहना होता है कि अभी इसे नींद नहीं लेने देना अन्यथा तो यह खाया हुआ अन्न जहर बन जायेगा।   दिनभर काम करके थे कुएं मनुष्य को अपनी थकान दूर करने के लिए कम से कम छ:घण्टे नींद लेना भी जरूरी माना गया है। अतः सूर्यास्त के समय सन्ध्या वन्दन करने के अनन्तर कुछ समय हास्यविनोद में बिताकर फिर रात्रि के दस बजे से लेकर चार बजे रात तक नींद लेनी चाहिये। चार बजे के बाद प्रातः काल में अपने शरीर रूप यंत्र के पुरजों को संशोधन कर साफ सुथरा बनाने के लिए भगवद्भजन पूर्वक शौच जाना और स्नान करना भी जरूरी हो जाता है।   फलितार्थ यह निकला कि दिन के नौ दस बजे से लेकर दिन के चार पांच बजे तक का समय मनुष्य के लिए भोजन के योग्य होता है। उसमें त्यागी, ब्रह्मचारियों के लिए तो महर्षियों ने एक ही बार भोजन करने का आदेश दिया है। गृहस्थ लोग पूर्वान्ह में और अपरान्ह में इस तरह दो बार भोजन कर सकते हैं किन्तु जो लोग रात दिन में कई बार भोजन करते हैं, जब चाहा तभी खा लिया ऐसी आदत वाले होते हैं, वे लोग अपने मनचलेपन की वजह से मनुष्यता को भूले हुए हैं ऐसा हमारे महापुरुषों का कहना है। एवं जो लोग रात में भी खाने से ही धंधा रखते हैं उनमें और निशाचरों में तो फिर कोई भी अन्तर नहीं रह जाता है।

नशेबाजी से दूर हो

नशेबाजी से दूर हो   दुनिया की चीजों में से कुछ अन्न आदि चीजें तो ऐसी हैं जिनका संबंध मनुष्य की बुद्धि के साथ में नहीं होकर वे सब केवल शरीर के सम्पोषण के लिये ही खाये जाते हैं। ब्राह्मी, शंख पुष्पी आदि जड़ी बूटियां ऐसी हैं जो मनुष्य की बुद्धि को ठिकाने पर रखकर उसके बढ़ाने में सहायक होती है परन्तु भांग, तम्बाकू, चरस, गांजा, सुलफा वगैरह वस्तुएं ऐसी भी हैं जो उत्तेजना देकर मनुष्य की बुद्धि को विकृत बना डालती हैं। जिनके सेवन करने से काम वासना उद्दीप्त होती है। अतः ऐस चीजों को कामुक लोग पहले तो शौकिया रूप से सेवन करने लगते हैं मगर जिस चीज का उन्हें नशा करने की आदत हो जाती है वह चीज यदि नहीं मिले तो विकल हो उठते हैं। बाज-बाज आदमी तो नशे का इतना आदी हो जाता है कि उस नशे की धुन में अपने आपको भी भूलकर न करने लायक घोर अनर्थ करने को उतारू हो जाता है।   एक बार की बात है कि एक अफीमची अपनी औरत को ले आने के लिए सुसराल को गया। वहां से अपनी प्राणप्यारी को लेकर वापस लौटा तो अपनी अफीम की डिबिया को वहीं भूल कर आ गया। रास्ते में जब उसके अफीम खाने का समय आया, देखे तो अफीम की डिबिया तो है नहीं। यह देखकर वह बड़ी चिन्ता में पड़ गया और वहीं पर एक वृक्ष के नीचे बैठ गया।   औरत बोली कोई बात नहीं, गांव अब थोड़ी ही दूर रहा है अभी चले चलते हैं। मर्द ने कहा मेरे से तो अब बिना अफीम के एक पैंड भी नहीं चला जावेगा। स्त्री ने कहा यहां जंगल में अफीम कहां रखी है? फिर भी अफीमची ने नहीं माना। स्त्री बड़ी उलझन में पड़ी और इधर-दधर देखने लगी तो एक कुटिया दीख पड़ी, वहां गई तो उसमें एक आदमी बैठा पाया। जाकर बोली कि महाशय! क्या आपके पास में कुछ अफीम मिल सकती है? मेरे स्वामी अफीम खाया करते हैं, उनके पास अफीम नहीं रही है। वह बोला अफीम है। तो सही मगर वह मुफ्त में थोड़े ही मिलती है। स्त्री ने कहा आप जो उचित समझें वह मूल्य ले लीजिये और एक खुराक की दे दीजिये। कुटीचर ने कहा अफीम की एक खुराक का मूल्य एक बार एकान्तवा । यह सुनते ही स्त्री दंग रह गयी और अपने स्वामी के पास लौटकर आयी तो स्वामी ने फिर यही बात कहीं कि मैं क्या करूं? मैं तो अफीम के पीछे विवश हूं अतः जैसे हो वैसे ही मुझे अफीम लाकर दे तभी कुछ आगे की सूझेगी।   बन्धुओ ! देखा आपने अफीमची का हाल ! अफीमची का ही नहीं सभी तरह के नशेबाजों का ऐसा ही हिसाब है! कोई कैसा भी नशा करने वाला क्यों न हो उसकी चेतना तो उस नशे के आधीन हुआ करती है। कम से कम तम्बाकू बीड़ी पीने वाले को ही ले लीजिये। उनके पास भी समय पर तम्बाकू न होगा तो वह भी चाहे जिससे तम्बाकू मांगकर पीना चाहेगा। इसीलिए कहावत भी प्रसिद्ध है कि - "अगर नहीं मांगना जानता भीख, तो तम्बाकू पीना सीख' तम्बाकू पीने वाला स्वयं यह अनुभव करता है कि इसकी ही वजह से मुझे खांसी, श्वासादि अनेक रोग हो रहे हैं, फिर भी वह उसे छोड़ने के लिये लाचार हो रहता है। मतलब यह कि नशेबाज आदमी धर्म, धन और शरीर तीनों का ही खो डालता है इसीलिये हमारे महर्षियों ने इसे दुर्व्यसन बताया है। उन सब नशों में शराब का नशा सबसे अधिक बुरा है। गुड़, महुआ आदि चीजों को सड़ाकर उनसे शराब बनायी जाती है जो कि बहुत से त्रस जीवों को कलेवरमय हुआ करती है अतः उसका पीने वाला प्रथम तो बहुत से त्रस जीवों की हिंसा का पातकी बनता है फिर शराब की लत भी ऐसी बुरी होती है कि जिसमें भी वह पड़ गई , छूटना दुश्वार हो जाता है, शराब के नशे में चूर हुआ मनुष्य पागल ही क्या बाज-बाज मौंके पर तो बिल्कुल बे-भाव ही हो रहता है। इस शराबखोरी में पड़कर कितने ही भले घराने भी बिगड़कर बरबाद हो गये हैं। शराब पीये हुए के मुंह से ऐसी बुरी दुर्गन्ध आती है कि कोई भी भला आदमी उसके पास बैठना नहीं चाहता है। शराब पीना या और भी किसी प्रकार का नशा करना व्यभिचार का तो मूल सूत्र है। साथ ही वह मांस खाने की प्रेरणा देता है, मांस खाने वाला शिकार करने को बाध्य होता है। शिकार करना चोरी या दगेबाजी से खाली नहीं है। हठात् किसी के प्राणधन को अपहरण करना तो सबसे बड़ी चोरी है। इस प्रकार शराबखोरी सब तरह के अनर्थों का प्रधान कारण है ऐसा सोचकर समझदारों को इससे सर्वथा दूर ही रहना चाहिए।

दूध का उपयोग

दूध का उपयोग   भोले भाई ही नहीं बल्कि कुछ पढ़े लिखे लोग भी ऐसा कहते हुए पाये जाते हैं कि जो दूध पीता है वह भी तो एक प्रकार से मांस खाने वाला है,  क्योंकि दूध मांस से ही होकर आता है, फिर दूध तो पिया जाये और मांस खाना छोड़ा जाए यह व्यर्थ की बात है। उन ऐसा कहने वाले भले आदमियों को जरा सोचना चाहिये कि अन्न भी तो खाद में से पैदा होता है सो क्या अनाज को खाने वाला खाद को भी लेता है? नहीं, क्योंकि खाद के गुण -धर्म कुछ और हैं तो अन्न के गुण -धर्म कुछ और ही। अत: खाद जुदी चीज है तो अन्न उससे जुदी चीज। इसी प्रकार मांस जुदी चीज है और उसी जगह पैदा होने वाला दुध उससे जुदी चीज। मांस तमोगुण समुत्पादक है तो दूध सतोगुण सम्पादक। किसी के मांस को नोचा जावे तो कष्ट देने वाला हो रहता है। किन्तु दुध को अगर न निकाला जावे तो कष्ट देने वाला हो रहता है। मांस उस-उस प्राणी के शरीर का आधारभूत होता है तो दूध किसी के किसी समय कुछ काल तक के लिये। मांस हर समय हर हालत में कीटाणुओं का समुत्पत्ति स्थान होता है। तो ताजा दूध कीटाणुओं से रहित, इत्यादि कारणों से मांस अग्राह्य है किन्तु दूध ग्रहण करने योग्य।   यहां पर एक तर्क और भी उठाया जा सकता है कि गाय का दूध निकालने वाला आदमी उसके बच्चे के हक को छीन लेता है। अत: वह ठीक नहीं करता, परन्तु इस ऐसा कहने वाले को जरा सोचना चाहिये कि अगर गाय के दूध पर सर्वथा उसके बच्चे का ही अधिकार है, वह उसी के हक की चीज है तो फिर जो उस गाय को पालता पोषता है उसका भी कोई हक है या नहीं। यदि कहा जावे कि कुछ नहीं, तो फिर वह उसे क्यों पालता-पोषता है? हां, जब तक कि बच्चा घास खाना न सीख जावे तब तक उसका ध्यान अवश्य रखना चाहिये। बाद में भी सारा का सारा ही न निकालकर कुछ दूध उसके लिये भी छोड़ते रहना चाहिए।

शाकाहारी बनना चाहिये

शाकाहारी बनना चाहिये   जिससे शरीर पुष्टि को प्राप्त हो या भूख मिटे उसे आहार कहते हैं। वह मुख्यतया दो भागों में विभक्त होता है। शाकपात और मांस। जब हम पशुओं की ओर निगाह डालते हैं तो दोनों ही तरह के जीव उनमें पाते हैं। गाय, बैल, भैंस, ऊँट, घोड़ा, हाथी, हिरण आदि पशु शाकाहारी हैं जो कि उपयोगी तथा शान्त होते हैं परन्तु सिंह, चीता, भालू, भेड़िया आदि पशु मांसाहारी होते हैं जो कि क्रूर एवं अनुपयोगी होते हैं। इनसे मनुष्य सहज में ही दूर रहना चाहता है।    इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मांसाहार क्रूरता को उत्पन्न करने वाला है किन्तु शाकाहार सौम्यता का सम्पादक। मनुष्य जबकि स्वयं शान्तिप्रिय है अतः उसे मांसाहार से दूर रहकर शाकाहार से ही अपना निर्वाह करना चाहिये। आज हम देख रहे हैं कि हमारे देशवासियों की प्रवृत्ति शाकाहार से उपेक्षित होकर मांसाहार की ओर बढ़ती जा रही है। आज से कुछ दिन पहले जिन जातियों में मांसाहारी व्यक्ति देखने को नहीं मिल रहा था वहीं पर आज बीस पच्चीस फीसदी आदमी मांस के आने वाले मिल जावेंगे। यह भी हमारे देश के लिए दुर्भाग्य का चिन्ह है जिससे कि लोग अन्नोत्पादन की तरफ विशेष ध्यान न देकर मछलियों के तथा मुर्गियों के अण्डों के उत्पादन की ही कोशिश में लगे हुए हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि जो देश अन्नोत्पादन का नाम नहीं जानते थे उन देशों में तो अन्न अब कसरत के साथ में उत्पन्न होने लग गया है। तो जो भारत सदा से अन्नोत्पादन का अभ्यासी रहा है उसी देश के वासी आज यह कहने लगे हैं कि खाने के लिये अन्न की कमी है अत: मछलियां पैदा की जावें । मैं तो कहता हूं कि इस बेढंगे प्रचार से कहीं ऐसा न हो जावे कि हम लोग अन्नोत्पादन का रहा सहा महत्व भी भूल जावें।   सुना जाता है कि एक बार अरब देश में बहुत भयंकर दुष्काल पड़ा। अन्न मिलना दुर्लभ हो गया अत: वहां के उस समय के देश नेता मुहम्मद साहब ने अपनी प्रजा को आपात्काल में मांस खाने के आदी बन गये तो उनकी निगाह में अब वह मांस खाना एक सिद्धान्त सा ही हो गया। मतलब यह कि एक बार मांस खाने की लत पड़ जाने से मनुष्य उसे छोड़ने के लिये लाचार हो रहता है। और अपनी आदतवश वह धीरे-धीरे मनुष्य के मांस को भी खाने लगा सकता है। एवं इस दुर्व्यसन का परिणाम बहुत विप्लवकारक हो रहता है। मानव को ही घोर दानवता पर पहुँचा देता है। अतः समझदार को चाहिये कि वह शुरू से ही इससे दूर रहे, केवल शाकाहार पर ही अपना जीवन निर्वाह करे।

मानवपन नपा तुला होना चाहिये

मानवपन नपा तुला होना चाहिये   मनुष्य जीवन पानी की तरह होता है। पानी बहता न होकर अगर एक ही जगह पड़ा रहे तो सड़ जाये। हां, वही बहता होकर भी बगल के दोनों तटों को तोड़-फोड़ कर इधर-उधर तितर बितर हो जाये तो भी शीघ्र ही नष्ट हो रहे। मनुष्य भी निकम्मा हो कर पड़ा रहे तो शोभा नहीं पा सकता। उसे भी कुछ न कुछ करते ही रहना चाहिये। उचितार्जन और त्यागरूप दोनों तटों के बीच में होकर नदी की भांति बहते रहना चाहिये। यह तो मानी हुई बात है कि खाने के लिये कमाना भी पड़ता ही है परन्तु कोई यदि विष ही कमाने लगे और उसे ही खाने लगे तो मरेगा ही, जीवित कैसे रह सकेगा।   अत: विष का कमाना और खाना छोड़कर इस तरह से कमाया खाया जाय जिससे कि जीवित रहा जा सके। मतलब यह कि कमाते खाते हुए मनुष्य को भी कम से कम इस बात का ध्यान तो रखना ही चाहिये कि ऐसा करने में उसकी आत्मा प्रत्युत तामसता की ओर तो नहीं लुढ़कती जा रही है? बल्कि प्रशंसा योग्य बात तो यही कही जावेगी कि कमाना खाना आदि हमारे सभी काम हमें सात्विकता की ओर बढ़ा ले जाने वाले होने चाहिये। हमारे भारत देश के वर्तमान समय के नेता श्रीमान बिनोबा भावे महाशय अपनी बुढापे की अवस्था में भी लोगों को खेती का महत्व बताने के लिये स्वयं कार्य करते थे, उसमें उत्पन्न हुए अन्न से निर्वाह करना कर्तव्य समझ कर सादगी से अपना जीवन बिता रहे थे। अगर वे बैठना चाहते तो उनके लिये मोटरों पर मोटरें आकर खड़ी हो सकती थीं मगर फिर भी उनहें जहां जाना होता है पैदल ही जाते थे। वल्लभ भाई पटेल एक रोज अपने कमरे में बैठे हुए कुछ आगन्तुक लोगों से आवश्यक बातें कर रहे थे। इतने में समय हो जाने पर वल्लभ भाई पटेल साहब की लड़की चाय लेकर आई जिसकी कि साड़ी कई जगह से फटी और सिली हुयी थी। अतः उन आगन्तुकों में से एक बोल उठा कि बहिन जी आप इस प्रकार फटी हुई साड़ी कैसे पहन रही हैं? जवाब मिला नई साड़ी किसकी कहां से ले आऊँ? आगन्तुक ने कहा कि बहिनजी! आप यह क्या कह रही हैं? कुछ समझ में नहीं आता।   आप कहें तो कि साड़ी क्या आवे बल्कि यहां आकर साड़ियों की टाल लग सकती है। इस पर बहिनजी तो क्या बोलती ! सुना अनसुना कर चली गयी। पीछे से पटेल साहब ने कहा कि हमारे यहां हाथ से सूत काता जाता है और उसका हाथ से बुना हुआ कपड़ा ही काम में लिया जाता है। वह इतना ही बन पाता है जिससे कि सारे कटम्ब का काम किफायतसारी के साथ में चला लिया जासके। ऐसा सनकर आगन्तुक महाशय दंग रह गया। सोचने लगा कि ओह। ऐसा रईस घराने का ऐसा रहन रहन। घर में मनचाही चीजें होते हुए भी सिर्फ सादा खाना और सादा पहिनना और सब कांग्रेस के लिये, पदार्थ जनता की सेवा के लिये। इसी को कहते हैं अमीरी में गरीबी का अनुभव करते हुए रहना। मानव जीवन हो तो ऐसा ही संतोषमय नपा-तुला होना चाहिये। फैशनबाजी में फंसकर मानव जीवन को बरबाद करना तो अमृत को पैर धाने में खोना है।

व्यर्थ का पाप पाखण्ड

व्यर्थ का पाप पाखण्ड   कहते हुए सुना जाता है कि पेट पापी है इसी के लिए अनेक तरह के अनर्थ करने पड़ते हैं। जब हाथ-पैर हिला डुला कर भी मनुष्य पेट नहीं भरपाता है तो वह चोरी-चकोरी करके भी अपने पेट की ज्वाला को शान्त करना चाहता है, यह ठीक हे। इसी बात को लक्ष्य में रखकर हमारे महर्षियों ने स्थितिकरण अंग का निर्देश किया है। यानी समर्थ धर्मात्माओं को चाहिये कि आजीविका भ्रष्ट लोगों को उनके योग्य आजीविका बताकर उन्हें उत्पथ में जाने से रोकें ताकि देश में विप्लव न होने पावे।   कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि अपने पास में खाने के लिये अन्न तथा पहनने के लिए कपड़ा अच्छी तादाद में होने पर भी धनवान कहलाना चाहते हैं अतः धन के बटोरने के लिए अनेक प्रकार का पापारम्भ करते हुए देखे जा रहे हैं। इस रोग की दवा संतोष है, जो कि परिग्रह परिणाम रूप दवाखाने से प्राप्त होती है, परन्तु अधिकांश पाप पाखण्ड तो प्रजा में ऐसे फैले हुए हैं जिनका हेतु सिर्फ मनोविनोद के और कुछ नहीं है अतः उन्हें हमारे महर्षियों की भाषा में अनर्थदण्ड कहा गया है। जिनको कि रोकने के लिये मन पर थोड़ा सा अंकुश लगाने की जरूरत है एवं उनके रोकने से देश को हानि के बदले बड़ा भारी लाभ है। उन अनर्थदण्डों का न करना और न होने देना भी उपासक का कर्तव्य है।

अनर्थदण्ड के प्रकार

अनर्थदण्ड के प्रकार   बात ही बात में यदि ऐसा कहा जाता है कि देखो हमारे भारत वर्ष में गेहूं बीस रुपये मन है और सोना सौ रुपये तोले से बिक रहा है परन्तु हम से पन्द्रह बीस कोस दूर पर ही पाकिस्तान आ जाता है जहां कि गेहूं तीस रुपये मन में बिक रहे हैं तो सोना पचहत्तर रुपये तोला पर मिल जाता है। यदि कोई भी व्यक्ति यहां से वहां तक यातायात की दक्षता प्राप्त कर ले तो उसे कितना लाभ हो। इस बात को सुनते ही कार-व्यापार करने वाले का या किसान को सहसा अनुचित प्रोत्साहन मिल जाता है जिससे कि वह ऐसा करने में प्रवृत्त होकर दोनों देशों में परस्पर विप्लव करने वाला बन सकता है, अत: कथन पापोदश नाम के अनर्थदण्ड में गिना जाता है। सट्टा फटका करने वालों को लक्ष्य करके तेजी, मन्दी बताना भी इसी में सम्मिलित होता है।   । छुरी, कटारी, बरछी, तलवार वगैरह हथियार बना कर हिंसक पारधी सांसी, बावरिया आदिको देना सो हिंसा दान नाम का अनर्थदण्ड है। क्योंकि ऐसा करने से वे लोग सहज में ही प्राणियों को मारने लग जा सकते हैं। कसाई, खटीक, कलार, जुवारी आदि को उधार देना भी इसी में गिना जा सकता है। | बेमतलब के बुरे विचारों को अपने मन में स्थान देना, किसी की हार और किसी की जीत हो जाने आदि के बार में सोचते रहना; मान लो कि आप की जीत हो जाने आदि के बारे में सोचते रहना; मान लो कि आप घूमने को निकले, रास्ते में दो मल्लो की परस्पर कुस्ती होती देख कर खड़े रह गये और मन में कहने लगे कि इसमें से यह लाल लंगोट वाला जीतेगा और पीली लंगोटी वाला हारेगा। अब संयोगवश पीली लंगोटी वाले ने उसे पछाड़ लगा दी तो आपके मन को आघात पहुंचेगा। कहोगे कि अरे यह तो उल्टा होने लग रहा है। इत्यादि रूप से व्यर्थ की मन की चपलनता का नाम अपध्यान अनर्थदण्ड है।   जिन बातों में फंस कर मन खुदगर्जी को अपना सकता हो, ऐसी बातों के पढ़ने-सुनने में दिलचस्पी लेना दु:क्षुति नाम का अनर्थ दण्ड है। जल वगैरह किसी भी चीज को व्यर्थ बरबाद करना प्रमादचर्या नाम का अनर्थदण्ड है। जैसे कि आप जा रहे हैं, चलते-चलते पानी की जरूरत हो गई तो सड़क पर की नल को खोल कर जितना पानी चाहिये ले लिया किन्तु जाते समय नल को खुला छोड़ गये जिससे पानी बिखरता ही रहा। गर्मी का मौसम है, रेलगाड़ी में सफर कर रहे हैं बिजली का पंखा लगा हुआ है, हवा खाने के लिये खोल लिया, स्टेशन आया, आप लापरवाही से उतर पड़े, पंखे को खुला रहने दिया यद्यपि डिब्बे में और कोई भी नहीं बैठा है तो पंखा व्यर्थ ही चलता रहेगा इसका कुछ विचार नहीं किया। आप एक गांव से दूसरे गांव को जारहे हैं। रास्ते के इधर उधर घास खड़ी है किन्तु रास्ता साफ है फिर भी आप घास के ऊपर से उसे कुचलते हुए जा रहे हैं, इसका अर्थ है कि आप लापरवाही से पशुओं की खुराक को बरबाद कर रहे हैं। इत्यादि सब प्रमोदचर्या नाम का अनर्थदण्ड कहलाता है।

साधक का कार्य क्षेत्र

साधक का कार्य क्षेत्र   भूमितल बहुत विशाल है और इसमें नाना विचारों के आदमी निवास करते हैं, कोई बुरी आदत वाला आदमी है तो कोई कुछ अच्छी आदत वाला। एवं मनुष्य का हिसाब ही कुछ ऐसा है कि यह जैसे की संगति में रहता है तो प्रायः आप भी वैसा ही हो रहता है जिसमें भी अच्छे के पास में रह कर अच्छाई को बहुत कम पकड़ पाता है किन्तु बुरे के पास में होकर बुराई को बहुत शीघ्र ले लेता है जैसे कि उजला कपड़ा कोयलों पर गिरते ही मैला हो जाता है परन्तु फिर वही साबुन पर गिर कर उजला बन जाता है, सो बात नहीं कर्तव्य पथ प्रदर्शन उसे उजला बनाने के लिए उसके ऊपर साबुन चुपड़ना होगा और फिर पानी से उसे धोना होगा फिर कहीं वह उजला बन सकेगा।   अत: अपने आपको बुराइयों से बचाये रखने के लिए और भलाई को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को चाहिये कि वह अपना निवास भले आदमियों के सहवास में बनावे। उन्हीं के साथ में अपने लेन-देन का संसगई स्थापित करे। ऐसे ही स्थानों में अपना आना-जाना भी रखे जहां पर कि अधिकतर भले आदमी निवास करते हों नशेबाज, मांसखोर, व्यसनी, दुराचारी आदमियों का अधिपत्य होने से जहां जाने पर अपने भले आचार-विचार में शिथिलता आती दीखे ऐस स्थानों में जाने आने पर परित्याग कर दें।  

कर्त्तव्य और कार्य

कर्त्तव्य और कार्य   शरीर के भरण-पोषण के लिये जो किया जाता है ऐसा खाना पीना, सोना, उठना वगैरह कार्य कहलाता है जिससे संसारी प्राणी चाह पूर्वक अनायास रूप से किया करता है। जो आत्मोन्नति के लिए प्रयत्नपूर्वक किया जाता है ऐसा भगवद्भजन, परोपकार आदि कर्तव्य होता है। कार्य तो इतर प्राणियों की भांति नामधारी मानव भी लगन के साथ करता है मगर वह कर्त्तव्य को सर्वथा भूले हुये रहता है। उसके विचार में कर्तव्य का कोई मूल्य नहीं होता परन्तु वही जब मानवता की ओर ढलता है तो कर्तव्य को भी पहिचानने लगता है। यद्यपि उसका चंचल मन कर्तव्यों की ओर न जाकर उसे कार्यों में लगे रहने के लिए बाध्य करता है फिर भी वह समय निकालकर हठात् अपने मन को कर्तव्य के साथ में जोड़ता है। भले ही उसका मन रस्से से बन्धे हुए भूखे बैल की तरह छटपटाता है और वहां से भागना चाहता है तो भी उसे रोक कर रखता है। इस तरह धीरे-धीरे अभ्यास करके वह अपने मन को कर्तव्यों पर जमाता है तो फिर कर्तव्य तो उसके लिए कार्यरूप हो जाते हैं और कार्य कहलाने वाली बातें कर्तव्य समझ कर करने योग्य ठहरती हैं।   मान लीजिये कि एक चिरकाल का बना हुआ सच्चा साधु है। वह समता वन्दना स्तवनादि आवश्यकों के नित्य ठीक समय पर सरलता के साथ करता रहता है, दिन में एक बार खाना और ऊपर रात्रि में जमीन पर सो लेना भी उसके लिए बताया गया है। किन्तु वह तो कभी उपवास, कभी बेला, कभी तेला आदि कर जाया करता है। जब देखता है। कि अब तो शरीर बिना भोजनादि दिये काम नहीं देता, इसे अब भोजन देना ही होगा, तब कभी देता है। शयन का भी यही हाल होता है कभी कुछ देर के लिए नींद ली तो ली, नहीं तो फिर सारी ही रात्रि भजन-भाव में बिता दी गयी। मतलब कहने का यह कि भोजनादि के बिना भले ही रहा जा सकता है परन्तु भगवद्भजन के बिना रहना किसी भी देश में ठीक नहीं। इस प्रकार इन्द्रिय एवं मनोनिग्रह रूप वृत्ति जहां हो रहती है वहां फिर खाना, पीना, सोना, उठना, चलना फिरना आदि सभी क्रियाएं आत्मोन्नति के पथ में साधनरूप से स्वीकार्य होकर आदर्शरूप बन जाती हैं।

पशु पालन

पशु पालन   सुना जाता है कि एक न्यायालय में न्यायाधीश के आगे पशुओं में और मनुष्यों में परस्पर में विवाद छिड़ गया। मनुष्यों का दावा था कि पशुओं की अपेक्षा से हम लोगों का जीवन बहुमूल्य है। पशुओं ने कहा कि ऐसा कैसे माना जा सकता है बल्कि कितनी ही बातों को लेकर हम सब पशुओं का जीवन ही तुम्हारी अपेक्षा से अच्छा है। देखो कि गजमुक्ता सरीखी कितनी ही बेशकीमती चीजें, तुम्हें पशुओं से ही प्राप्त होती है। इसी तरह कवि लोग जब कभी तुम्हारी प्रेयसी के रूप का वर्णन करते हैं तो मृगनयनी, गजगामिनी इत्यादि रूप से पशुओं की ही उपमा देकर बताते हैं। बल पराक्रम भी तुम्हारी अपेक्षा से हम पशुओं में ही प्रशंसा योग्य माना गया हुआ है। इसीलिये जब तुम्हें बलवान बताया जाता है तो पुरुषसिंह नरशार्दूल वगैरह कह कर पुकारा जाया करता है।   और तो क्या, पशु का मृत शरीर भी प्राय: कुछ न कुछ तुम्हारे काम में आता ही है। जैसे कि मृतक पशु के चमड़े के जूते बनते हैं जिन्हें पहन कर तुम आसानी से अपना मार्ग तय कर पाते हो। तुम्हारा शरीर तो किसी के कुछ भी काम नहीं आता बल्कि साथ में दस बारह मन लक्कड़ और दस बारह गज कपड़ा और ले जाता है। इस पर मनुष्य लोग बहुत झेपे और अपना दावा वापिस उठाने को तैयार हो गये। तब न्यायाधीश बोला कि भाई ! तुम कहते हो सो तो सब ठीक है परन्तु एक बात खास है जिसकी वजह से मनुष्य बड़ा और भला गिना जाता है और वह यह कि पशुवर्ग परिश्रमशील होकर भी वह अपने आपकी रक्षा का प्रबन्ध खुद नहीं कर सकता किन्तु मनुष्य में इस प्रकार की विचारशीलता है कि वह अपनी रक्षा का तथा पशु की रक्षा का भी प्रबन्ध करने में समर्थ होता है।   देखो एक बुढ़िया थी, जिसके पास एक गाय भी रहती थी। चौमासे के दिन आये तो वर्षा होना शुरू हुई । एक दिन वर्षा ऐसी हुई कि मूसलाधार पानी पड़ने लगा । झड़ी लग गयी जिससे लोग घर के बाहर निकलने में असमर्थ थे। रोज बाजार में हरी घास आया करती थी जिसे कि मोल लेकर बुढ़िया अपनी गाय को चरा लिया करती थी। मगर उस दिन बाजार में जब घास ही नहीं आई। तो क्या हो? पशु को क्या डाला जावे? बुढ़िया के पास दैव गति से सूखी घास, भूसा भी न थी ताकि वही डाल कर पशु को थोड़ा संतोष दे लिया जावे। अतः गाय भूखी ही खड़ी रही। उसे भूखी खड़ी देखकर बुढ़िया सोच में पड़ गई। कहने लगी कि हे भगवान! क्या करू? गौ भूखी है, यह भी तो मेरे ही भरोसे पर है। यह पहले खाले तो बाद में मैं खाऊंगी ऐसा संकल्प कर वह भगवन् भवगन् करने लगी। इतने में ही एक घसियारा आया उस बरसते हुए मेंह में, और बोला कि मांजी ! क्या तुम्हे अपनी गाय के लिए घास चाहिए? अगर हां तो यह लो, इतना कहकर घास गाय के आगे डाल दी। बुढ़िया बहुत खुश हुई और बोली बेटा। बहुत अच्छा किया, ले अपने घास के पैसे ले जा। माजी पैसे फिर कभी ले जाऊंगा ऐसा कहते हुऐ घसियारा दौड़ गया तो आज तक नहीं आया। आता भी भी कैसे? वह कोई घसियारा थोड़े ही था वह तो उस बुढ़िया की पवित्र भावना का ही रूप था।   मतलब यह कि आश्रित के खान-पान का प्रबन्ध करके स्वयं भोजन करना ही मनुष्य का कर्तव्य जिसमें भी वह आश्रित भी यदि मनुष्य हैं तो वह तो अपना खाना आप कह कर भी हम से ले सकता है, पशु तो बेचारा स्वयं मूक होता है उसकी तो फिक्र हमें ही करना चाहिए तभी हम मनुष्य कहलाने के अधिकारी हो सकते है। उसके करने योग्य परिश्रम तो उससे हम करा लेवें और खाना खिलाने के समय उसे हम भूल जावें यह तो घोर अपराध है।

अन्याय के धन का दुष्परिणाम

अन्याय के धन का दुष्परिणाम   एक दर्जी के दो लड़के थे जो कि एक-एक टोपी रोजाना बनाया करते थे, उनमें से एक जो संतोषी था वह तो अपनी टोपी के दो पैसों में से एक पैसा तो खुद खाता था और एक पैसा किसी गरीब को दे देता था। एक रोज दो दिन का भूखा एक आदमी उसके आगे आ खड़ा हुआ उस दर्जी ने जो टोपी तैयार की थी उसके दो पैसे उसके पास आये तो उनमें के एक पैसा उसने उस पास में खड़े गरीब को दे दिया। गरीब ने उस पैसे के चने लेकर खा लिये और पानी पी लिया। अब उसके दिल में विचार आया कि देखों यह दर्जी का लड़का एक टोपी रोज बना लेता है जिससे दो पैसे रोजाना लेकर अपनी जीवन बड़े आनन्द से बिता रहा है। मैं भी ऐसा ही करने लगें तो क्यों भूखा मरूंगा ऐसा सोचकर उसके पास टोपी बनाना सीख गया और फिर अपना गुजर अपने आप करने लगा। उसके दिन अच्छी तरह से कटने लगे।   इधर उसी दर्जी का दूसरा लड़का टोपी तैयार कर रोजाना जो दो पैसे कमाता था उनमें से एक पैसा तो खुद खा जाता और एक पैसा रोज बचाकर रखता था उससे चौसठ दिन में उसके पास एक रुपया जुड़ गया। उसने उसे चिट्ठी खेल में लगा दिया। संयोगवश चिट्ठी उसी के नाम से उठ गयी जिससे उसके एक लाख रुपये ही आमद हुई। अब तो उसने सोचा दिन भर परिश्रम करना और दो पैसे रोजाना कमाना इस दर्जी के मनहूस धन्धे में क्या धरा है। छोड़ो इसे और आराम से जीवन बीतने दो। उसके पड़ोस की जमीन में एक गरीब भाई झोंपड़ी बना कर रह रहा था। इसने सरकार से उसे खरीद कर वहां एक सुन्दर कमरा बनाया और अपने बाप-भाई से अलहदा रहने लगा, शराब पीने लगा, वेश्यायें नचाने लगा, अपने आप घमण्ड में चूर होकर औरों को तुच्छ समझने लगा। एक रोज वह अपने भाई दर्जी के पास खड़ा था तो उसे अपनी टोपी के दो पैसों में से एक पैसा किसी गरीब को देते देख कर इसके विचार आया कि देखो इसने अपने दो पैसों में से ही एक पैसा दे दिया किन्तु मेरे पास इतना पैसा होकर भी मैं किसी को कुछ नहीं दे रहा हूं। मुझे भी कुछ तो दान करना चाहिए। इतने में इसके सम्मुख एक मस्टण्डा आ खड़ा हुआ जिसे इसने अपने पाकेट में से निकाल कर पांच असर्फियां दे दीं। उन्हें लेकर वह फूल गया कि देखो आज मेरी बड़ी तकदीर चेती। चलो आज तो शराब पीयेंगे और सिनेमा में चलेंगे। वहां जाते समय रास्ते में किसी की बहू-बेटी से मजाक करने लगा तो पुलिस ने पकड़ लिया और थाने भेज दिया जिससे कि कैद कर लिया गया। ठीक है जैसी कमाई का पैसा होता है वैसे ही रास्ते में लगा करता है और उससे मनुष्य की बुद्धि भी वैसी ही हो जाया करती है।

उदारता का फल सुमधुर होता है

उदारता का फल सुमधुर होता है   रामपुर नाम के नगर में एक रधुवरदयाल नाम के बोहराजी रहते थे। जिनके यहां कृषकों को अन्न देना, जिसे खाकर वे खेती का काम करें और फसल पककर तैयार होने मन भर अन्न के बदले में पांच सेर, मन अन्न के हिसाब से बोहराजी को दे दिया करें बस यही धन्धा होता है। बोहराजी के दो  107 लड़के थे, एक गौरीशंकर दूसरा राधाकृष्ण बोहराजी के मरने पर दोनों भाई पृथक-पृथक हो गये और अपने-अपने कृषकों को उसी प्रकार अन्न देकर रहने लगे। विक्रम सम्वत् उन्नीस सौ छप्पन की साल में भयंकर दुष्काल पड़ा। बिल्कुल पानी नहीं बरसा। जिससे अन्न का भाव जो बाहर आने या दस आने मन का था वह बढ़ कर पांच रुपये मन हो गया। गौरीशंकर ने सोचा अब किसानों को बाढ़ी पर अन्न देकर क्यों खोया जावे? बेच कर रुपये कर लिए जावें। किसानों ने कहा बोहराजी ऐसा न कीजिये, इस दुष्काल के समय में हम लोग खाने के लिये दूसरी जगह कहां से लावेंगे? परन्तु गौरी शंकर ने इस पर कोई विचार नहीं किया। इधर राधाकृष्ण ने विचार किया कि यह अकाल का समय है, लोग अन्न के बिना भूखे मर रहे हैं, मेरे पास अन्न है यह फिर किस काम में आवेगा? अतः उसे ढिंढोरा पिटवा दिया कि चाहे वह मेरा किसान हो या कोई और हो, जिसको भी खाने के लिए अन्न चाहिए मेरे यहां से ले जावे। यह देखकर गौरीशंकर ने कहा कि राधाकृष्ण बेसमझ है जो कि इस समय अपने बेशकीमती अन्न को इस तरह लुटा रहा है।   गौरीशंकर ने अपने अन्न को बेच कर रुपये खड़े करना शुरू किया। किन्तु उसके यहां एक दिन चोरी हो गई तो उसने अपने रुपयों को जमीन में गाड़ रखा। छपनिया अकाल धीरे-धीरे समाप्त हो लिया। सत्तावन की साल में प्रकृति की कुछ ऐसी कृपा हुई कि समय-समय पर उचित वर्षा होकर खेती में अनाप-सनाप अन्न पैदा हुआ, जिससे आठ सेर के भाव से बढ़ते-बढ़ते अन्न का भाव रुपये का डेढ़मन हो लिया। गौरीशंकर ने इस समय अन्न खरीद कर रखने का मौका यह सोचकर जमीन में से अपने रुपयों को निकालकर देखा तो रुपयों के पैसे बन गये हुए थे। तब क्या करे अपने भाग्य पर रोने लगा। उधर राधाकृष्ण का अन्न जिन्होंने खाया था, प्रसन्न मन से मन की एवज में दो मन अन्न ले जाकर उसके यहां जमा कराने लगे जिससे अन्न की टाल लग गई।

व्यापार

व्यापार   व्यापार शब्द का अर्थ होता है किसी चीज को व्यापकता देना यानी आवश्यकताओं से अधिक होने वाली एक जगह की चीज को जहां पर उसकी आवश्यकता हो वहां पर पहुंचा देना एवं सब जगह के लोगों के लिए सब चीजों की सहूलियत कर देना ही व्यापार कहलाता है। व्यापार का मतलब जैसा कि आजकल लिया जाने लगा है धन बटोरना, सो कभी नहीं हो सकता है। किन्तु जनसाधारण के सम्मुख उसकी आवश्यक चीज को एक सरीखी दर पर उपस्थिति करना और उसमें जो कुछ उचित कमीशन कटौती मिले उस पर अपना निर्वाह करना ही व्यापार का सच्चा प्रयोजन है। उदाहरण के लिए जैसे हिन्दुस्तान टाईम्स वगैरह दैनिक समाचार-पत्रों के बेचने वाले लोग घूम-घूम कर बेचते हैं। डेढ़ आना या पांच पैसे जो उन पत्रों का मूल्य निश्चित किया हुआ है ठीक उसी मूल्य पर सबको देते हैं। शाम तक जितने पत्र उनके द्वारा  बिके, प्रति पत्र एक पैसे के हिसाब से उनका कमीशन मिल जाया करता है। जिससे उन बेचने वालों का गुजारा हो जाता है और पढ़ने वालों को घर बैठे पढ़ने के लिए पत्र मिल जाता है। सीधा पत्रालय से भी पत्र लिया जावे तो भी उन्हें उतने में ही मिलेगा। अत: उसकी विशेष हानि नहीं होती ताकि लेने वाले और बेचने वाले दोनों का सुभीता होता है।   आढ़तिया अपने साहूकार के माल को बाजार भाव से बेचता है या अपने ग्राहक को बाजार से परिश्रम कर माल दिलवाता हैं एवं लेने वाले और मालदार के बीच में विश्वास का सूत्रधार बनकर रहता है तथा उसने उचित आढ़तिया लेकर उस पर अपना निर्वाह करता है तो यह व्यापार है। मगर वही आढ़तिया कहलाने वाला व्यक्ति लोभवश होकर किसी प्रकार का बीच बचाव कर खाने लगता है तो ऐसा करना पाप है, और फिर वह व्यापारी न रह कर चोर कहलाने लायक हो जाता है।   बाजार के माल को हठात् अधिक दर में खरीद कर अपने यहां ही इकट्ठा कर खाना, किसी प्रकार की धौंस दिखा कर अपने माल को ऊँची दर से बेचना एवं दूसरे के माल को नीची दर से खरीदने की विचारधारा रखना, किसी एक को वही माल कम दर पर देना, किन्तु भोले भाई से उसी के अधिक दाम ले लेना इत्यादि चोरबाजारी पर व्यापार का कलंक है। हां, बाजार में जो माल बिकते-बिकते शेष बच रहा है और माल मालिक उसे बेचकर अपना पल्ला खलास करना चाहता है ऐसे माल को कुछ साधारण से कम दर में खरीद कर अपने पास संग्रह कर रखना बुरा नहीं बल्कि अच्छा ही है, ताकि यदि कोई कल को भी उस माल को लेने वाला आवे तो उसे भी आसानी से वह माल उसी साधारण दर पर दिया जा सके। इस प्रकार बाजार की सम्पन्नता बनी रहे।

हमारी आँखों देखी बात

हमारी आँखों देखी बात   एक बहिनजी थीं जिनके विचार बड़े उदार थे। उनके यहां खेती का। धंधा होता था। सभी आवश्यक चीजें प्रायः खेती से प्राप्त हो जाया करती थीं। अतः प्रथम तो किसी सो चीज लेने की वहां जरूरत ही नहीं होती थी, फिर भी कोई चीज किसी से लेनी हो तो बदले में उससे भी अधिक परिणाम की कोई दूसरी चीज अपने यहां की उसे दिये बिना नहीं लेती थी। वह सोचती थी कि मेरी यहां की चीज मुझे जिस तरह से प्यारी है उसी प्रकार दूसरे को भी उसकी अपनी चीज मुझसे भी कहीं अधिक प्यारी लगती है। हां, जब कोई भी भाई आकर उसके पास मांगता था कि बहिनजी क्या आपके पास गेहूं हैं? यदि हो तो दे रुपये के मुझे दे दीजिये, इस पर बड़ी प्रसन्नता के साथ गेहूं उसे दे देती मगर रुपये नहीं लेती थी। कहती थी भाईजी रुपये देने की क्या जरूरत है, ये गेहूं आपके और मैं आपकी बहिन।   आज आप मुझसे ले जाते हैं तो कभी यदि मुझे जरूरत हुई तो मैं आप से ले आ सकती हूं। मैं रुपये तो आप से नहीं लेऊंगी आप गेहूं ले जाइये और अपना काम निकालिये। आप मुझे रुपये दे रहे हैं इसका तो मतलब यह कि अपना आपस का भाईचारा ही आज से समाप्त करना चाहते हैं, मैं इसको अच्छी बात नहीं समझती, इत्यादि रूप से वह सभी के साथ वात्सल्यपूर्ण व्यवहार रखती थी। अब एक बार माघ के महीने की बात है कि बादल होकर वर्षा होने लगी। आसपास के सब खेत बरबाद हो गये मगर उपर्युक्त बहिन जी के चार खेत थे उनमें किसी में कुछ भी नुकसान नहीं हुआ, इसलिये मानना पड़ता है कि हमें जो कुछ भला या बुरा भोगना पड़ रहा है, वह सब हमारी ही करनी का फल है। 
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