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    कल्याणमन्दिर स्तोत्र (1971)

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    कल्याणमन्दिर स्तोत्र

    (1971)

     

    ‘कल्याणमंदिर स्तोत्र' आचार्य कुमुदचन्द्र, अपरनाम श्री सिद्धसेन दिवाकर द्वारा विरचित है। इसका पद्यानुवाद आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने मदनगंज-किशनगढ़, अजमेर (राज.) में सन् १९७१ के वर्षायोग में किया। इस स्तोत्र को पार्श्वनाथ स्तोत्र भी कहते हैं। मूल स्तोत्र एवं अनुवाद दोनों ही वसन्ततिलका छन्द में निबद्ध हैं।

     

    इस कृति में उन कल्याणनिधि, उदार, अघनाशक तथा विश्वसार जिन-पद-नीरज को नमन किया गया है जो संसारवारिधि से स्व-पर का सन्तरण करने के लिए स्वयम् पोत स्वरूप हैं। जिस मद को ब्रह्मा और महेश भी नहीं जीत सके, उसे इन जिनेन्द्रों ने क्षण भर में जलाकर खाक कर दिया। यहाँ ऐसा जल है जो आग को पी जाता है। क्या वड़वाग्नि से जल नहीं पिया गया है?

     

    स्वामी! महान गरिमायुत आपको वे,

    संसारि जीव गह, धार स्व-वक्ष मेंऔ।

    कैसे सु आशु भवसागर पार होते;

    आश्चर्य! साधुजन की महिमा अचिन्त्य ॥१२॥

    Edited by संयम स्वर्ण महोत्सव

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