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  1. 5 points
    पु. आचार्य श्री मूकमाटी महाकाव्य में कहा है मिट्टी पानी और हवा, सौ रोगों की एक दवा प्रकृति से जुड़े अध्यात्मिक संत आचार्य श्री का आशीष व प्रेरणा दे आपको स्वस्थ तन, स्वस्थ मन अपनाएँ : प्राकृतिक चिकित्सा "लपेट" स्वस्थ हो, भोजन कर सको भरपेट साफा लपेट : तनाव दूर करे विधि : 6 इंच चौड़ी व 2 मीटर लंबी सूती पट्टी, इस प्रकार की 2-3 पट्टियों को गोल घड़ी कर, पानी में गीला कर निचोड़ लें। इस पट्टी को (नाक का हिस्सा छोड़कर) समस्त चेहरे पर लपेट लें। लाभ : इस पट्टी के प्रयोग से मस्तिष्क की अनावश्यक गर्मी कम होकर मस्तिष्क में अदभुत ठंडक व शांति का अनुभव होता है, साथ ही सिरदर्द व कान के रोग दूर होते हैं, मन व हृदय भी शांत बना रहता है। गले की लपेट : गले के रोगों में चमत्कारिक लाभ गले रोगों में चमत्कारिक परिणाम देने वाली यह लपेट है इसे करने से तुरन्त लाभ होना प्रारंभ हो जाता है। गले में हो रही खराश, स्वर यंत्र की सूजन (टांसिल) में इसके प्रयोग से लाभ होता है। वास्तव में गले की लपेट पेडू की लपेट व वास्ति प्रदेश की लपेट व अन्य लपेट एक तरह से गर्म ठण्डी पट्टी के ही समान है। विशेष तौर पर खाँसी व गला दुखने की अवस्था में इसे करने से तुरन्त लाभ हो जाता है और जब ये विकार खासतौर पर रोगी में जब उपद्रव मचाते हैं तो इस लपेट को करने से तुरन्त लाभ मिलता है व नींद भी अच्छी आ जाती है क्योंकि उक्त विकार की वजह से बैचेनी से जो हमें मुक्ति मिल जाती है। विधि : 6 इंच चौड़ा व करीब डेढ़ मीटर लम्बा सूती कपड़ा गीला कर अच्छी तरह निचोड़ दें। इसे गले पर लपेट दें। इस गीली लपेट पर गर्म कपड़ा (मफलर) अच्छी तरह से लपेट कर अच्छी तरह पेक कर दें ताकि गीला कपड़ा अच्छी तरह से ढंक जाए। इस लपेट को 1 से डेढ़ घंटे तक किया जा सकता है किन्तु रोग की बढ़ी हुई अवस्था में इसे अधिक समय तक भी कर सकते हैं। लपेट की समाप्ति पर गले को गीले तौलिये से अच्छी तरह स्वच्छ कर लें। छाती की लपेट : कफ ढीला करे किसी भी अंग को ठंडक प्रदान करने के लिए पट्टी का प्रयोग किया जाता है। इस पट्टी के प्रयोग से रोग ग्रस्त अंग पर रक्त का संचार व्यवस्थित होता है। इसके साथ ही श्वेत रक्त कणिकाओं की संख्या में वृद्धि होती है। इस पट्टी के प्रयोग से छाती में जमा कफ ढीला होता है। हृदय को बल प्राप्त होता है। विधि : 7-10 इंच चौड़ा, 3/2 मीटर लंबा गीला सूती कपड़ा निचोड़ कर छाती पर लपेटे। इसके ऊपर गर्म कपड़ा (बुलन/फलालेन) लपेट दें। लाभ : इससे हृदय की तीव्र धड़कन सामान्य हो जाती है, क्योंकि ठंडे पानी की पट्टी हृदय पर लपेटने से इस क्षेत्र का रक्त संचार व्यवस्थित हो जाता है। साथ ही विजातीय द्रव्य पसीने के माध्यम से बाहर हो जाते हैं। इस प्रयोग द्वारा हृदय की धड़कन सामान्य हो जाती है। छाती में जमा कफ ढीला हो जाता है। यह प्रयोग कफ रोग में लाभकारी है। विशेष सावधानी : पट्टी के पश्चात् हथेलियों से छाती की हल्की मसाज कर उसे गर्म कर लेना चाहिए, ताकि शरीर का उक्त अंग अपने सामान्य तापमान पर आ जाए। पेडू की लपेट : पेट रोग में चमत्कारी लाभ पेडू की पट्टी समस्त रोगों के निदान में सहायक है। विशेषकर पाचन संस्थान के रोगों के निदान में रामबाण सिद्ध होती है। इससे पेट के समस्त रोग, पेट की नई पुरानी सूजन, पुरानी पेचिश, अनिद्रा, ज्वर, अल्सर, रीढ़ का दर्द व स्त्रियों के प्रजनन अंगों के उपचार में भी सहायक है। इसके अतिरिक्त यह किडनी व लीवर के उपचार में विशेष लाभ पहुँचाती है। विधि : एक फीट चौड़ी व 1 से 1.5 मीटर लंबी पतले सूती कपड़े की पट्टी को पानी में भिगोकर निचोड़े व पूरे पेडू व नाभि के दो इंच ऊपर तक लपेटकर ऊपर से गर्म कपड़ा लपेट लेवें। समयावधि : उक्त पट्टी खाली पेट सुबह शाम 2-2 घंटे तक लगा सकते हैं। रात्रि को सोने के पूर्व लगा सकते हैं। रात-भर पट्टी लगी रहने दें। भोजन के 2 घंटे बाद भी पट्टी लगा सकते हैं। इस पट्टी को लगाकर ऊपर से कपड़े पहनकर अपने नियमित कार्य भी कर सकते हैं। पट्टी लगाने के बाद जब पट्टी हटाएँ तो गीले तौलिए अथवा हथेली से पेडू की हल्की मसाज कर गर्म कर लें। विशेष सावधानी : शीत प्रकृति के रोगी इस पट्टी के पहले पेडू को हाथों से अथवा गर्म पानी की थैली से गर्म कर पट्टी लपेटें। शीत प्रकृति के व्यक्ति सिर्फ 2 घंटे के लिए इस पट्टी का प्रयोग कर सकते हैं। वस्ति प्रदेश की लपेट : जननांगों में चमत्कारिक लाभ पेडू के विभिन्न रोग, पुरानी कब्ज, मासिक धर्म में अनियमितता, प्रजजन अंगों के रोग, जननेंद्रीय की दुर्बलता व अक्षमता में चमत्कारिक लाभ देने वाली लपेट वस्ति प्रदेश की लपेट है। इसके नियमित प्रयोग से उक्त रोग ही नहीं वरन् अनेक रोगों में लाभ होता है। विधि : एक भीगा कपड़ा निचोड़कर वस्ति प्रदेश पर लपेट दें। यदि वस्ति प्रदेश पर ठंडक का अहसास हो रहा हो तो गर्म पानी की थैली से उक्त अंग को गर्म अवश्य करें। अब इस लपेट पर गर्म कपड़ा लपेट दें। उक्त प्रयोग को एक से डेढ़ घंटा किया जा सकता है। मुख्य सावधानी : इस पट्टी को एक बार उपयोग करने के पश्चात साबुन अच्छी तरह से लगाकर धोकर धूप में सुखाकर पुनः इस पट्टी का प्रयोग किया जा सकता है। चूंकि पट्टी विजातीय द्रव्यों को सोख लेती है, अतः ठीक प्रकार से पट्टी की सफाई नहीं होने से चर्म रोग हो सकता है। उक्त पट्टी को सामान्य स्वस्थ व्यक्ति सप्ताह में एक दिन कर सकते हैं। लाभ : पेट के रोगों में चमत्कारिक लाभ होता है। पैरों की लपेट : खाँसी में तुरन्त लाभ पहुंचाने वाली पट्टी इस लपेट के प्रयोग से सारे शरीर का दूषित रक्त पैरों की तरफ खींच जाता है। फलस्वरुप ऊपरी अंगों का रक्ताधिक्य समाप्त हो जाता है। इस वजह से शरीर के ऊपरी अंगों पर रोगों द्वारा किया आक्रमण पैरों की ओर चला जाता है। अतः मेनिनजाईटिस, न्यूयोनिया, ब्रोंकाइटीज, यकृत की सूजन व गर्भाशय के रोग की यह सर्वप्रथम चिकित्सा पद्धति है। विधि : एक भीगे हुए और अच्छी तरह निचोड़े कपड़े की पट्टी को रोल बना लें, एड़ी से लेकर जंघा तक इस कपड़े को लपेट दें। इस पट्टी पर गर्म कपड़ा अच्छी तरह लपेट दें ताकि सूती कपड़ा अच्छी तरह से ढंक जाये। यदि पैरों में ठंडक हो तो गर्म पानी की थैली से पैरों को गर्म कर लें। ध्यान रहें रोगी के सिर पर ठंडे पानी की नैपकीन से सिर ठंडा रहे। इस प्रयोग को एक घंटे तक करें। किन्तु रोगी को आराम महसूस हो तो इस प्रयोग को अधिक समय तक किया जा सकता है। इस प्रयोग को रोगों के समय गला दुखने, खाँसी की तीव्रता की अवस्था में कर चमत्कारिक लाभ पाया जा सकता है। इस प्रयोग को करने के पश्चात अन्त में तौलिये से सम्पूर्ण शरीर को घर्षण स्नान द्वारा स्वच्छ कर लें। पूर्ण चादर लपेट : मोटापा दूर करें सामग्री : अच्छा मुलायम कम्बल जिसमें हवा का प्रवेश न हो सके एक डबल बेड की चादर, जिसमें सारा शरीर लपेटा जा सके, आवश्यकतानुसार मोटा या पतला एक तौलिया छाती से कमर तक लपेटने के लिए। विधि : बंद कमरे में एक खाट पर गद्दी बिछा लें तथा उसके ऊपर दोनों कम्बल बिछायें सूती चादर खूब ठंडे पानी में भिगोकर निचोड़ने के बाद कम्बल के ऊपर बिछा दें। सूती चादर के ऊपर तौलिया या उसी नाप का दूसरा कपड़ा गीला करके पीठ के निचले स्थान पर बिछा दें। यह लपेट पूर्ण नग्न अवस्था में होना चाहिए। लेटते समय यह ध्यान रखें कि भीगी चादर को गले तक लपेटे। अब मरीज के सब कपड़े उतारकर उसे बिस्तर पर लिटा दें। लेटने के बाद तुरन्त सबसे पहले तौलिए को दोनों बगल में से लेकर कमर तक पूरे हिस्से को लपेट देना चाहिए। हाथ तौलिए के बाहर रहे, यह नहीं भूलना चाहिए। दाहिनी ओर लटकती हुई चादर से सिर की दाहिनी ओर, दाहिना कान, हाथ व पैर पूरी तरह ढंक देने चाहिए। इसी तरह बायीं ओर सिर, कान, हाथ तथा पैर चादर के बाएँ छोर से ढंकने चाहिए। चादर लपेटने के बाद नाक तथा मुँह को छोड़कर कोई भी भाग बाहर नहीं रहना चाहिए। अब चादर के ठीक ऊपर पूरी तरह ढंकते हुए पहला कम्बल और बाद में सबसे ऊपर वाला कम्बल लपेटा जाए। इस स्थिति में रोगी को 30-45 मिनिट रखें। ठंड ज्यादा लगे तो रोगी को बगल में गर्म पानी की बॉटल रख सकते हैं। चादर लपेट की अवधि रोगी की अवस्था के अनुसार घटा-बढ़ा सकते हैं। लाभ : चादर लपेट के प्रयोग से रोगी विजातीय द्रव्य के जमाव से मुक्त होकर आरोग्य प्राप्त करता है। पेट की गर्म-ठंडा सेक : अम्लता (एसीडिटी) दूर करे सामग्री : एक बर्तन में गर्म पानी, दूसरे बर्तन में ठंडा पानी व दो नेपकीन। विधि : गर्म पानी के बर्तन में नेपकीन को गीला कर पेडू पर तीन मिनिट तक रखे। अब गर्म पानी का नेपकीन हटा दें। अब ठंडे पानी में गीला किया नेपकीन रखें। इस प्रकार क्रमशः तीन मिनिट गर्म व एक मिनिट ठंडा नेपकीन रखें। इस प्रक्रिया को 15 से 20 मिनिट तक करें। ध्यान रहे कि इस प्रक्रिया का प्रारंभ गर्म पानी की पट्टी से करें व क्रिया की समाप्ति ठंडे पानी की पट्टी से करें। लाभ : इस पट्टी के प्रयोग से पेडू का रक्त का संचार तेज होगा व गर्म-ठंडे के प्रयोग से आँतों का मल ढीला होकर पेडू मल के अनावश्यक भार से मुक्त हो जाएगा। सावधानी : पेट में छाले, हायपर एसिडिटी व उच्च रक्तचाप की स्थिति में इसे कदापि न करें। विशेष टीप : गर्म पानी के नेपकीन के स्थान पर गर्म पानी की बॉटल अथवा रबर की थैली का प्रयोग किया जा सकता है। साभार :- 125 स्वस्थ व निरोगी रहेने का रहस्य डॉ. जगदीश जोशी एवं सुनीता जोशी
  2. 4 points
    उत्तर whatspp पर दे - यहाँ नहीं लिखें - वेबसाइट से पढ़ के उत्तर दे - नकल न करें दी हुई HINT - संकेत को पढ़े
  3. 4 points
    ८-११-२०१५ भीलवाड़ा (राजः) अनेकान्त के पनघट श्रुतधर परमपूज्य गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में ज्ञान पिपासु का नमोस्तु-नमोस्तु-नमोस्तु… हे समाधान गुरुवर! आज आपको इस पत्र के माध्यम से विद्याधर की जन्म स्थली सदलगा की भौगोलिक स्थिति एवं सांस्कृतिक विरासत से परिचित करवा रहा हूँ वह इसलिए कि वर्तमान में आपके इस अलबेले शिष्य ने सम्पूर्ण भूगोल को एक-सा कर रखा है अर्थात् इन्होंने अपनी संयममय ज्ञान की किरणों से सम्पूर्ण विश्व को अनेकान्तमयी प्रकाश से आलोकित कर रखा है। जिससे सीमातीत विश्व में धर्म तत्त्व विस्तरित हो रहा है। सदलगा के भाई महावीर अष्टगे जी ने बताया- भौगोलिक - सांस्कृतिक संस्कारों ने जगाया महापुरुषत्व ‘‘सदलगा एक छोटा सा ग्राम है जो कर्नाटक प्रान्त के बेलगाँव जिलान्तर्गत चिक्कौड़ी तहसील में स्थित है। महाराष्ट्र और कर्नाटक प्रान्त की सीमा रेखा पर बसा हैं बीच में एक नदी के द्वारा दोनों प्रान्तों का विभाजन हुआ है। यह नदी भी सदलगा के ही मध्य से बहती है जिसका नाम 'दूधगंगा' है। इस नदी ने पूर्व में भोज ग्राम के पास वेदगंगा को अपने में शरण दी है। उस नदी के किनारे विद्याधर का जन्म हुआ और दूध के समान धवल यश प्राप्त किया तथा वेदगंगा के समान ज्ञानगंगा गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में शरण प्राप्त की। सदलगा ग्राम से साँगली होते हुए लगभग ८० कि.मी. की दूरी पर कुण्डल तीर्थक्षेत्र है और २२५ कि.मी. की दूरी पर कुलभूषण, देशभूषण महाराज की निर्वाण स्थली एवं चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागर जी महाराज की समाधिस्थली कुन्थलगिरि सिद्धक्षेत्र है। कुम्भोज बाहुबलि अतिशयक्षेत्र सदलगा से ३० कि.मी पर तथा अतिशयक्षेत्र स्तवनिधी भी २८ कि.मी. की दूरी पर ही है। सदलगा से १५ कि.मी. की दूरी पर ही आचार्य शान्तिसागर जी महाराज की जन्मभूमि भोजग्राम है तथा १९ कि.मी. की दूरी पर कोथली ग्राम है जो आचार्य देशभूषण जी महाराज का जन्म स्थान है वह आज शान्तिगिरि के नाम से प्रसिद्ध हो गया है। उसके समीप ही वर्तमान के आचार्य विद्यानन्द जी महाराज का जन्मस्थान शेड़वाल ग्राम है। शेडवाल में ही चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागर जी महाराज की प्रेरणा से त्यागी आश्रम बनाया गया है। सदलगा से मात्र ३० कि.मी. की दूरी पर ही अक्कि वाट ग्राम है। यह वही अक्किवाट है जहाँ महातपोनिधि मुनि श्री विद्यासागर जी की समाधिस्थली बनी हुई है। यहाँ से ७-८ कि.मी. की दूरी पर कागवाड़ की गुफा है और ४५ कि.मी. की दूरी पर कोल्हापुर शहर है जहाँ महाराज शिवाजी के पिताजी राज्य किया करते थे। जिला बेलगाँव वर्तमान में पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है तथा हवाई यातायात के लिए हवाई अड्डा भी बना हुआ है।” सदलगा में धर्म श्रद्धालु निवास करते हैं। सभी धर्म श्रद्धालुओं ने अपने-अपने धर्मायतन बना रखे हैं। ग्राम में तीन दिगम्बर जैन मंदिर हैं। जो पाषाण से निर्मित हैं। प्रथम कलबसदि (छोटा जैन मंदिर) १000 वर्ष प्राचीन है। द्वितीय दोडुबसदि (बड़ा जैन मंदिर) हैं और तृतीय शिखरबसदि (जमींदारों का जैन मंदिर) २०० वर्ष प्राचीन हैं। इस तरह यह सदलगा ग्राम महापुरुषों की पवित्र भूमियों से चहुओर घिरा हुआ है। ऐसी पवित्र भौगोलिक-सांस्कृतिक भूमि के मध्य पूर्व पुण्य के प्रभाव से ही विद्याधर जन्मे। किसी महापुरुष का निर्माण अनेकों जन्म के पुण्य परमाणुओं से ही तो हुआ करता है। ऐसे पुण्यार्जन कराने वाले धर्म को नमन करता हूँ। आपका शिष्यानुशिष्य
  4. 3 points
    आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के 'संयम स्वर्ण महोत्सव' के मौके पर अजमेर स्थित दीक्षास्थली के मुहाने पर ६५ फीट ऊंचे कीर्तिस्तंभ ने पूरा आकार ले लिया है। 🗼मार्बल व्यवसायी श्री अशोक जी पाटनी के अर्थ सहयोग से तैयार इस 'दीक्षायतन' पर ३० जून को मुनि सुधासागर महाराज के पहुंचने की संभावना है।करीब एक करोड़ की लागत से तैयार इस कीर्तिस्तंभ पर आचार्य श्री के दीक्षा पूर्व के चित्रों को उकेरा गया है। 🗼यह कीर्तिस्तंभ, पिच्छी व कमंडल राजस्थान के बयाना समीपस्थ पहाड़ी के लाल पत्थर से तैयार कराया गया है, जिस पर अब सामान्य कामों के अलावा पॉलिश का काम बाकी है। यह दीक्षायतन अजमेर के महावीर सर्किल स्थित पार्श्वनाथ कॉलोनी के शुरू मे स्थापित किया गया है।
  5. 3 points
    भारत में श्रीकृष्ण जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया, जिन्होंने मानव ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों के भी प्राणों की रक्षा की है। नारायण श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी को लोग पर्व के समान मानते हैं। उन्होंने संकट के क्षणों में प्राणियों की रक्षार्थ गोवर्धन पर्वत को उठाकर अपने बाहुओं पर उसको स्थित रखकर नीचे प्राणियों को शरण दी और दया धर्म का पालन किया था। उन्हीं के भारत में आज जीवों की हिंसा हो रही है जो घृणास्पद तथा शोचनीय है गाय, बैल, भैंस, बकरी आदि पशुओं को बूचड़खाना में एक साथ लाखों की संख्या में समाप्त कर उनकी हड्डी, मांस, चर्बी आदि निर्यात करके विदेशी मुद्रा को इस राष्ट्र के कर्णधार शासक कमाना चाहते हैं। विचार कीजिये यह कैसा व्यापार है? गौवंश को समाप्त करके देश की कभी भी उन्नति नहीं की जा सकती। अर्थ नीति को समझने संभालने वाले शासकों को अर्थ उत्पति के साधन जुटाने वालों को आदर्शकारी भारतीय संस्कृति से शिक्षा लेनी चाहिए उसके लिए और भी अन्य साधन हो सकते हैं। क्या किसी भी विकसित राष्ट्र ने गाय-बैलों को समाप्त करके उन्नति पाई है ? कृषि प्रधान कहलाने वाला देश आज पशु धन से कृषकाय क्षीण होता जा रहा है इस कारण हमारी संस्कृति भी क्रमश: समाप्त होती जा रही है। विदेशों से आयातित खाद्य आदि रसायनों से यहाँ की धरती भी बंजर होती जा रही है। मांस बेचकर, गायों को समाप्त कर कमाये जाने वाली मुद्रा की अपेक्षा उन मूकप्राणियों की मुद्राओं की ओर भी देखो। मुद्रा संग्रह अर्थ धनार्जन के नाम पर निरपराध जीवों का वध करके मांस बेचने वाला यह भारत देश कहाँ तक अपनी उन्नति कर पायेगा। यह विचारणीय तथ्य है। आज के राजनेता साधु संतों के पास जाकर जहाँ इन मूकप्राणियों की रक्षा करने का वचन देते हैं, बाद में वे ही वचनों से मुकर भी जाते हैं। इस कारण से भारतीय संस्कृति के अध्ययन से वंचित, ऐसे राजनेता मात्र स्वार्थ सिद्धि के लिए देश को अंधकार की ओर ले जाते हैं। चोरी छिपे इन मूकप्राणियों को ट्रकों, रेलों में भर भरकर अन्यत्र कई मीलों दूर तक फैले आधुनिक मशीनीकृत बूचड़खाना तक ले जाया जाता है। जहाँ जानवरों को कई दिनों तक भूखा-प्यासा रखकर महीनों तक स्टाक विभिन्न प्रकार से कष्ट देते हुए निर्दयता पूर्वक दिन-प्रतिदिन समाप्त किया जाता है। गोमाता के दुग्ध सम, भारत का साहित्य। शेष देश के क्या कहें, कहने में लालित्य। यह सरकार एक तरफ तो मोर, सिंह, चीते आदि की रक्षा के लिये कानून बनाती, शिकार करने पर प्रतिबंध लगाती है। वहीं दूसरी ओर इन मूक प्राणियों के वध हत्या के लिए खुल्लम-खुल्ला लाइसेंस दे रही है। ऐसा अंधेर क्यों ? आचार्य श्री ने लोगों को जागृत करते हुए कहा कि सरकार को आप चुनते हैं। अत: उस व्यक्ति को चुने जो योग्य, न्यायप्रिय तथा अहिंसक नीति का पालक हो, तभी देश से हिंसा के वातावरण की समाप्ति होगी। आप अपने-अपने परिवार के हित के बारे में सोचते हैं। उसकी सुख-सुविधा की आपूर्ति हेतु सरकार के समक्ष माँग रखते, हड़ताल, आन्दोलन आदि करते हैं तब क्या इन मूक पशुओं की रक्षा हेतु सरकार से माँग नहीं कर सकते हैं। श्रीकृष्ण जैसे शलाका पुरुष, जिन्हें 'गोपाल' कहते थे अर्थात् जो गौवंश के पालनहार कहलाते थे। वे भी इनकी रक्षा हेतु प्रतिपल तत्पर रहते थे तब आप भी सरकार से आग्रह करें। ताकि वह लाखों की संख्या में होने वाले पशुसंहार (हत्या) को बंद कराएँ जो प्रजातंत्र के नाम से नरकुण्ड जैसा घृणित कार्य कर रही है। शास्त्रों में 'गौवत्स' को समप्रीति कहा गया है 'वत्स' शब्द से ही वात्सल्य शब्द बना है। अजीव वस्तु से राग तो हो सकता पर प्रेम, वात्सल्य, स्नेह जड़ पदार्थों से नहीं बल्कि सचेतन जीवित प्राणियों से होता है। जब बैल वत्सरूपी गाय का बछड़ा समाप्त हो जावेगा, तब वात्सल्य किससे करेंगे? धर्म शब्दों तक ही सीमित न रह जावे। महत्व तब है जब शब्दों से अर्थ एवं भाव स्पष्ट हो तब ही उसकी सार्थकता होती है। आपका नाम 'गोपाल” है। अत: शब्द का अर्थ गौ यानी गौवंश का पालनकर्ता और आप विध्वंश करने वालों को सम्मान दे रहे हैं। पशु-पक्षी तो निरपराधी है, उनका विध्वंस नहीं बल्कि उनके उत्थान के साधन जुटाने चाहिए। अपने जीवन में देखें, मात्र प्रचार-प्रसार में ही न उलझे। क्योंकि अहिंसा धर्म ही पूज्य है। भारतीय संस्कृति में हिंसा का स्थान नहीं है इसलिये इसका समूल नाश अनिवार्य है। आचार्यश्री ने कहा कि - सुनते-सुनते शास्त्र को, बधिर हो गए कान। तो भी तृष्णा नामिटी,प्रयाण-पथपरप्राण॥ आप संसार में अपने स्वार्थ के बारे में सोचते रहते हैं लेकिन जिसके कारण आपके जीवन का लालन-पालन एवं संवर्धन हुआ, उसके साथ क्रूरता पूर्ण किये जाने वाले कार्य-व्यवहार क्या सत्कार्य के योग्य है? इनका मूल्यांकन आप भले ही न कर सके परन्तु जानवर तो इसका मूल्यांकन कर लेते हैं इसीलिये तो वे हमारे कष्ट को दूर करने हेतु स्वयं कष्ट सहन करते रहते हैं। आपको बाहुबल मिला उसकी सार्थकता इसी में है कि उसका प्रयोग दूसरों की रक्षा करने में हो किन्तु जो निर्बल-असहाय निरपराध जनों की रक्षा में ही सक्षम नहीं वे जीवन में दया को अंगीकार करने वालों की रक्षा क्या करेंगे? भगवान् महावीर, श्रीकृष्ण, राम आदि शलाकापुरुष कहलाते हैं। जिनका जीवन आदि से अंत तक कल्याण से जुड़ा होता वे ही शलाका पुरुष हैं। वे संख्या में ६३ माने गए यह संख्या भी महत्वपूर्ण है। छह के सामने तीन रखने से ६३ बनता जो मांगलिक महोत्सव तथा सुख-साधन जुटाने वाला होता किन्तु आज ६३ का नहीं बल्कि ३ की ओर पीठ करके बैठने वाले ३६ का युग आ गया है। अत: कलिकाल में धर्म कर्म उलटता ही जा रहा आज राजनीति में धर्म के नाम से काम लिया जा रहा है। ये ही दुखदायी है जिससे बचने का प्रयास कर भारत राष्ट्र की आदर्शपूर्ण संस्कृति की रक्षा हो सकती | "अहिंसा परमो धर्म की जय !"
  6. 2 points
    यह जो संत है साक्षात अरिहंत है मेरे भगवन मेरे गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के चरणो में मेरा कोटी कोटी नमनं नमोस्तु भगवन नमोस्तु गुरुवर नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु आचार्य विद्यासागर जी महाराज को मेरा शत शत नमन |
  7. 2 points
    जल्द शुरू हो रही हैं - *संयम स्वर्ण महोत्सव प्रतियोगिता* विद्यासागर.गुरु वेबसाइट पर 30 दिन चलने वाली प्रतियोगीता में प्रत्येक दिन एक नई प्रश्नावली होगी, और हर दिन मिलेंगे उपहार | https://vidyasagar.guru/quizzes/category/2-1 *इस के अतिरिक्त* आप अपने समाज के नाम से / प्रतिष्ठान के नाम से भी इस वेबसाइट पर एक प्रतियोगिता रख सकते हैं - जिसमे पूरा भारत ही नहीं अपितु विश्व का जैन समाज भाग ले सकेगा आप खुद चुने प्रश्न और आप स्वयं दे इनाम | जैसे जैन समाज अशोक नगर की तरफ से आयोजित एक प्रतियोगिता, जैन समाज गुना की तरफ से आयोजित संयम स्वर्ण महोत्सव प्रतियोगिता | आप अगर कोई समूह चलाते हो जैसे श्री न्यूज़, AB न्यूज़, प्रतियोगिता अहिंसा न्यूज़, प्रतियोगिता, जिनवाणी चैनल प्रतियोगिता , पारस चैनल प्रतियोगिता , जिन साशन प्रतियोगिता , नमोस्तु शासन प्रतियोगिता | मुनि दीक्षा की ५० वर्ष में तो उपहारों की बरसात होनी चाहिए - ऐसा हमारा सोचना हैं | *यह प्रतियोगिता एक प्रयास हैं गुरु प्रभावना करने का - और विद्यासागर.गुरु वेबसाइट को जन जन तक पहुचाने का* - जिसके माध्यम से हम सभी प्रतिदिन स्वाध्याय कर पाएं, और अपने जीवन को उत्कर्ष पथ पर अग्रसर कर सकें | *आप दे सकते हैं सहयोग*, बन सकते हैं पुण्यार्जक, आप अपने मंदिर में इस वेबसाइट की और प्रतियोगिता की सुचना लगा सकते हैं , सभी को वेबसाइट मोबाइल में खोलके दिखाए और साथ ही उनका अकाउंट बनादे | आपके पास कोई सुझाव हो तो हमे जरूर भेजे - हम चाहते हैं यह प्रयास सफल हो | हमारा प्रयास आपका सहयोग www.Vidyasagar.Guru नोट - रूपरेखा अभी फाइनल नहीं हुई हैं - बदलवा संभव
  8. 2 points
    प्रतिभा मंडल वह समूह है जिसमें आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को अपना जीवन समर्पित करने वाली एवं उनके मार्गदर्शन में चलने वाली ब्रह्मचारिणी बहने प्रतिभास्थली कन्या आवासीय विद्यालय, महिला- हथकरघा प्रशिक्षण केन्द्र आदि का संचालन करती हैं वर्तमान में 5 जगहों पर प्रतिभास्थली कन्या आवासीय विद्यालय चल रहा है 1 जबलपुर (मध्य प्रदेश) 2 डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़) 3 रामटेक (नागपुर, महाराष्ट्र) 4 पपौरा जी (टीकमगढ़, मध्य प्रदेश) 5 इंदौर (मध्य प्रदेश)
  9. 2 points
    मेरे गुरुवर धरा पर हैं आए,सभी जीवों का उद्धार करने। मोक्ष पथ पर स्वयं चल रहे हैं, और सब को भी चला रहे हैं। जैसा गुरु ने कहा है दिखाया, संघ को देखो गुरुकुल बनाया। कम समय के लिए गुरु को पाया, फिर भी गुरु को सदा साथ पाया ।। ऐसा हम भी समर्पण को चाहें, गुरु आज्ञा में जीवन बिताना। कितनी सुन्दर है गुरुवर की सूरत, मेरे गुरुवर हैं ममता की मूरत।। आँखों में इनके करुणा झलकती, सभी जीवों में दिन रैन बरसती ॥ हम भी करुणा दया धर्म पालें, मैत्री के फूल हम भी लगा लें। हर समय का सदुपयोग करते, शास्त्र जीवन को सदा रचते।। प्रतिभामंडल गुरु ने दिया है, सबको कर्तव्य बतला दिया है। साथ मिलकर कदम सब बढ़ाएँ और, प्रतिभामय भारत बनाएँ। (तर्ज-इतनी शक्ति हमें)
  10. 2 points
    View this quiz अभ्यास प्रश्नोत्तरी हम जल्द ही संयम स्वर्ण महोत्सव प्रतियोगिता शुरू करेंगे - यह एक अभ्यास प्रश्नोत्तरी हैं इस अभ्यास का उद्देश्य हैं की आप सभी वेबसाइट पर काउंट बना के इसमें भाग लेना सीख ले ताकि जब अगले हफ्ते से प्रतियोगिता शुरू हो तो आप सभी आसानी से तुर्रंत उत्तर देकर आकर्षक उपहार के दावेदार बन सके | निवेदन - सभी को भाग लेना सिखाएं, जिससे हम प्रतियोगिता शीग्र शुरू कर सके Submitter संयम स्वर्ण महोत्सव Type Graded Mode Time 5 minutes Total Questions 4 Category संयम स्वर्ण महोत्सव प्रतियोगिता Submitted 06/04/2018  
  11. 2 points
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  12. 2 points
    टीकमगढ़ - आचार्य श्री ने कहा कि 2 मित्र बहुत दिन बाद मिलते हैं वे दोनों मित्र कुशल कुशलता उनमें प्राय बनी रहती थी दोनों ने मिलने के बाद ठान लिया कि जो बचपन के दिनों में जो तत्व चर्चा होती है उस पर बात करेंगे एक मित्र ने कहा मैंने राजा के बारे मे आंखों के द्वारा देखा दूसरे मित्र ने पूछा क्या देखा भाई देखना तो पड़ेगा भाई आप बतला दो भाई मैंने वह दृश्य देखा एक राजा को पहले घोड़ी पर बैठा दिया जाता है फिर राजा को घोड़े से हाथी पर बैठा दिया हाथी पर बैठकर राजा अपने नगर में भ्रमण कर रहा था राजा अपने नगर में भ्रमण कर रहा था ऊपर नीचे का दृश्य देख रहा था हाथी से उतारकर राजा को पालकी में बैठा दिया पालकी सुंदर थी जो राजा पालकी पर आराम से बैठा हुआ था ऊपर की ओर ऊपर का दृश्य देख रहे थे। अब राजा की यात्रा का समय पूरा हुआ राजा को पालकी से नीचे उतारा गया नीचे उतरते ही राजा के सेवक हाथ पैर दबाने लग जाते हैं। आचार्य श्री ने कहा कि दूसरा मित्र कहता है वह कहता है राजन हाथी पर बैठे घोड़े पर बैठे पालकी पर बैठे और राजन को नीचे उतारा तो सेवक पैर दबाने लग जाते हैं। वह कहता है राजन पैदल तो एक कदम भी नहीं चले फिर थके कैसे ? आचार्य श्री जी कहते हैं यह व्यक्ति का स्वयं का पुण्य होता है जो व्यक्ति को इस प्रकार वैभव की प्राप्ति होती है यह उसके कर्मों का प्रतिफल है हम अध्यात्म की बात करते हैं कर्म आत्मा का परीगमन सामने आता है। हमें परिश्रम करना चाहिए तभी हम दुख से बच सकते हैं आचार्य श्री जी ने कहा हर पदार्थ की क्रिया अखंड है आचार्य श्री जी ने कहा कोई पूछता है सात तत्व हैं जब तक हम भ्रम मुक्त नहीं रहेंगे तब तक हमें मुक्ति नहीं मिलेगी आचार्य श्री जी ने कहा हम भगवान के दर्शन करते है तो हमेशा हमें 7 तत्व दिखना चाहिए नहीं तो वह दर्शन पूर्ण नहीं माना जाता है आचार्य श्री ने कहा कि बरसों बीत जाते हैं आचार्य श्री ने कहा कोई राजा होता है तो कोई रकं होता है हमें परिश्रम करना चाहिए तभी हम दुख से बच सकते हैं आचार्य श्री जी ने कहा प्राथमिक दशा में कुछ कर्म तकलीफ देते हैं तो उसको दवाई के द्वारा इंजेक्शन के द्वारा ठीक किया जा सकता है रोगों का बाहर आना निश्चित हो जाता है आचार्य श्री जी ने कहा बहुत दिन हो गए है मोक्ष मार्ग पर चलते चलते अज्ञान की दशा में ज्ञानी व्यक्ति भी अपने पथ से भटक जाता है। संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
  13. 2 points
    द्रष्टि विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/parmarth-deshna/drashti/
  14. 2 points
    दोष विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/parmarth-deshna/dosh/
  15. 2 points
    तप, तपस्या विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/parmarth-deshna/tap-tapasya/
  16. 2 points
    ख्याति विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/parmarth-deshna/khyati/
  17. 2 points
    जैन श्रावक प्रतिदिन देवदर्शन करने मन्दिर जाता है। अत: मन्दिर जाने की विधि का वर्णन इस अध्याय में है। 1. मन्दिर जाने की विधि क्या है ? देवदर्शन हेतु प्रात:काल स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर शुद्ध धुले हुए स्वच्छ वस्त्र (धोती-दुपट्टा अथवा कुर्ता-पायजामा) पहनकर तथा हाथ में धुली हुई स्वच्छ अष्ट द्रव्य लेकर मन में प्रभुदर्शन की तीव्र भावना से युक्त, नंगे पैर नीचे देखकर जीवों को बचाते हुए घर से निकलकर मन्दिर की ओर जाना चाहिए। रास्ते में अन्य किसी कार्य का विकल्प नहीं करना चाहिए । दूर से ही मन्दिर जी का शिखर दिखने पर सिर झुकाकर जिन मन्दिर को नमस्कार करना चाहिए, फिर मन्दिर के द्वार पर पहुँचकर शुद्ध छने जल से दोनों पैर धोना चाहिए । मन्दिर के दरवाजे में प्रवेश करते ही हैं जय जय जय, निस्सही निस्सही निस्सही, नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु बोलना चाहिए, फिर मन्दिर जी में लगे घंटे को बजाना चाहिए। इसके पश्चात् भगवान के सामने जाते ही हाथ जोड़कर सिर झुकावें, एवं बैठकर गवासन से तीन बार नमस्कार कर तथा खड़े होकर णमोकार मंत्र पढ़कर कोई स्तुति, स्तोत्र पाठ पढ़कर भगवान् की मूर्ति को एकटक होकर देखकर भावना से निर्लिप्त हैं, वैसे ही मैं भी संसार से निर्लिप्त रहूँ, साथ में लाए पुञ्ज बंधी मुट्ठी से अंगूठा भीतर करके अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु, ऐसे पाँच पदों को बोलते हुए बीच में, ऊपर, दाहिने, नीचे, बाएँ तरफ ऐसे पाँच पुञ्ज चढ़ावें। फिर जमीन पर गवासन से बैठकर, जुड़े हुए हाथों को तथा मस्तक को जमीन से लगावें तीन बार नमस्कार कर तत्पश्चात् हाथ जोड़कर खड़े हो जावें और मधुर स्वर में स्पष्ट उच्चारण के साथ स्तुति आदि पढ़ते हुए अपनी बाई ओर से चलकर वेदी की तीन परिक्रमा करें। तदनन्तर स्तोत्र पूरा होने पर बैठकर गवासन से तीन बार नमस्कार करें। परिक्रमा देते समय ख्याल रखें कोई नमस्कार कर रहा हो तो उसके आगे से न निकलकर, पीछे की ओर से निकलें। दर्शन करने इस तरह खड़े हों तथा इस तरह पाठ करें जिससे अन्य किसी को बाधा न हो। दर्शन कर लेने के बाद अपने दाहिने हाथ की मध्यमा और अनामिका अर्जुलियों को गंधोदक के पास रखे शुद्ध जल से शुद्ध कर लेने पर अर्जुलियों से गंधोदक लेकर उत्तमाङ्ग पर लगाएं फिर गंधोदक वाली अर्जुलियों को पास में रखे जल में धो लेवें। गंधोदक लेते समय निम्न पंक्तियाँ बोलें - निर्मलं निर्मलीकरण, पवित्र पाप नाशनम्। जिन गंधोदकं वंदे, अष्टकर्म विनाशनम्॥ इसके पश्चात् नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए कायोत्सर्ग करें। फिर जिनवाणी के समक्ष ‘प्रथमं करण चरण द्रव्यं नम:।' ऐसा बोलते हुए चार पुञ्ज चढ़ावें। तथा गुरु के समक्ष ‘सम्यक् दर्शन-सम्यक् ज्ञान-सम्यक् चारित्रेभ्यो नम:', ऐसा बोलकर तीन पुञ्ज चढ़ावें। तदुपरान्त शास्त्र स्वाध्याय करें एवं मंत्र जाप करें, फिर भगवान् को पीठ न पड़े ऐसे विनय पूर्वक अस्सहि, अस्सहि, अस्सहि बोलते हुए मन्दिर से बाहर निकलें। 2. देवदर्शन किसे कहते हैं ? देव का अर्थ वीतरागी 18 दोषों से रहित देव और दर्शन का सामान्य अर्थ होता है देखना, किन्तु यहाँ पूज्यता के साथ देखने का नाम दर्शन है। अत: पूज्य दृष्टि से देव को देखने का नाम देवदर्शन है। 3. मन्दिर जी आने से पहले स्नान क्यों आवश्यक है ? गृहस्थ जीवन में पञ्च पाप होते रहते हैं, जिससे शरीर अशुद्ध हो जाता है। अत: शरीर की शुद्धि के लिए स्नान आवश्यक है। 4. मन्दिर जी में प्रवेश करते समय पैर धोना क्यों आवश्यक है ? पैरों का सम्बन्ध सीधा मस्तिष्क से होता है, आँखों में दर्द, पेट में दर्द, अधिक थकावट से विश्राम पाने के लिए पैर के तलवे दबाये जाते हैं। जिन्हें रात्रि में स्वप्न आते हैं, उन्हें पैर धोकर सोना चाहिए। श्रावक जब मुनि महाराज की वैयावृत्ति करना चाहता है, तब अनेक मुनि महाराज कहते हैं कि तुम्हें घी, तेल लगाना हो तो मात्र पैर के तलवे में लगा दो वह मस्तिष्क तक आ जाता है। इन सब बातों से सिद्ध होता है कि पैरों का सम्बन्ध मस्तिष्क से है। यदि पैरों में अशुद्धि रहेगी तब मन में भी अशुद्धि रहेगी। अत: मन्दिर जी प्रवेश से पूर्व पैर धोना आवश्यक है। 5. मन्दिर जी में प्रवेश करते समय निस्सहि-निस्सहि-निस्सहि क्यों बोलना चाहिए ? प्रथम कारण तो यह है कि मैं दर्शन करने आ रहा हूँ, अत: वहाँ कोई श्रावक या अदृश्य देव, दर्शन कर रहे हैं, वे मुझे दर्शन करने के लिए स्थान दें। दूसरा कारण यह है कि मैं शरीर पर वस्त्रों के अलावा शेष परिग्रह का निस्सहि अर्थात् निषिद्ध करके या ममत्व छोड़ करके पवित्र स्थान में प्रवेश कर रहा हूँ। तीसरा कारण यह है कि इस जिनालय को नमस्कार हो। 6. मन्दिर जी में घंटा क्यों बजाते हैं ? मन्दिर जी में घंटा बजाने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं - घंटा समवसरण में बजने वाली देव बुंदुभि का प्रतीक है। जैसे ही घंटा बजाते हैं और घंटे के नीचे खड़े हो जाते हैं जिससे उसकी ध्वनि तरंगें एकत्रित हो जाती हैं, जिससे मन में शांति मिलती है एवं मन में अपने आप सात्विक विचार आने लगते हैं। घंटा पिरामिड के आकार का होता है। आज मन को शांत करने के लिए पिरामिड का बहुत प्रयोग किया जा रहा है। अभिषेक करते समय घंटा बजाते हैं जो आस-पास के लोगों को जगाने का कार्य भी करता है कि अभिषेक प्रारम्भ हो गया है। मुझे मन्दिर जी जाना है। अत: घंटा समय का सूचक है। 7. मन्दिर जी में चावल ही क्यों चढ़ाते हैं ? चावल ऊगता नहीं है, धान (छिलका सहित चावल) ऊगता है। अत: आगे हम भी न ऊगे अर्थात् हमारा भी जन्म न हो इसलिए चावल चढ़ाते हैं। 8. प्रदक्षिणा किसकी दी जाती है एवं कितनी दी जाती है ? वीतरागी देव, तीर्थक्षेत्र, सिद्धक्षेत्र, अतिशय क्षेत्र एवं निग्रंथ गुरु की तीन-तीन प्रदक्षिणा दी जाती हैं। 9. प्रदक्षिणा क्यों देते हैं ? वेदी में विराजमान भगवान समवसरण का प्रतीक है। समवसरण में भगवान के मुख चार दिशाओं में अलग-अलग दिखते हैं। अत: चार दिशाओं में भगवान के दर्शन के उद्देश्य से प्रदक्षिणा (परिक्रमा) देते हैं। तीन रत्नत्रय का प्रतीक है, अत: रत्नत्रय की प्राप्ति हो, इसलिए तीन प्रदक्षिणा देते हैं। 10. प्रदक्षिणा बाई (Left) ओर से क्यों लगाते हैं ? हमारे जो आराध्य हैं, पूज्य हैं, बड़े हैं, उन्हें सम्मान की दृष्टि से अपने दाहिने (Right) हाथ की ओर रखा जाता है। इसलिए प्रदक्षिणा बाई ओर से लगाते हैं। 11. मन्दिर जी से वापस आते समय अस्सहि-अस्सहि-अस्सहि क्यों बोलते हैं ? अस्सहि का अर्थ है कि अब मैं दर्शन करके वापस जा रहा हूँ देव आदि जिनने दर्शन करने के लिए स्थान दिया था वे अब अपना स्थान ग्रहण कर लें। 12. भगवान के दर्शन करते समय किन-किन भावनाओं को भाना चाहिए ? भगवान के दर्शन करते समय निम्न भावनाओं को भाना चाहिए मैं भी आप जैसा बनूँ। मेरे पाप कर्म शीघ्र नष्ट हों। मुझे मोक्ष सुख की प्राप्ति हो। संसार के सारे जीव सुखी रहें। संसार के सभी जीव धम्र्यध्यान करें। सारे नरक खाली हो जाएँ, सारे अस्पताल बंद हो जाएँ अर्थात् कोई बीमार ही न पड़े। सारे जेल बंद हो जाएँ अर्थात् कोई ऐसा कार्य न करे जिससे जेल जाना पड़े। ओम् नम: सबसे क्षमा, सबको क्षमा, सभी आत्मा परमात्मा बनें। 13.भगवान के दर्शन करते समय किस प्रकार के भावों का त्याग करना चाहिए ? भगवान के दर्शन करते समय निम्न प्रकार के भावों का त्याग करना चाहिए धन-वैभव, पद आदि की प्राप्ति के भावों का त्याग करना चाहिए। स्त्री, पुत्र, आदि की प्राप्ति के भावों का त्याग करना चाहिए। उसका मरण हो जाए, वह चुनाव में हार जाए, उसकी दुकान नष्ट हो जाए, उसकी नौकरी छूट जाए,वह परीक्षा में फेल हो जाए आदि बुरे भावों का त्याग करना चाहिए। 14. पाषाण या धातु की मूर्ति में पूज्यता कैसे आती है ? पञ्चम काल में भरत और ऐरावत क्षेत्रों में अरिहंत परमेष्ठी नहीं होते हैं। उन अरिहंतों के गुणों की स्थापना पञ्चकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में आचार्य अथवा उपाध्याय, साधु परमेष्ठी सूरि मंत्र देकर करते हैं। अत: इससे मूर्ति में पूज्यता आ जाती है। जैसे-178 से.मी. लंबे, 73 से.मी.चौड़े कागज का मूल्य अधिकतम 50 पैसा होगा उसी कागज में गर्वनर (GOVERNOR) के हस्ताक्षर (SIGN) होने से उसका मूल्य 1000 रुपए हो जाता है वैसे ही कम मूल्य की धातु या पाषाण की मूर्ति, सूरि मंत्र पाते ही अमूल्य हो जाती है, अर्थात् पूज्य हो जाती है। 15. मन्दिर जी में कौन-कौन से कार्य नहीं करना चाहिए ? मन्दिर जी में निम्न कार्य नहीं करना चाहिए - देव-शास्त्र-गुरु से ऊँचे स्थान पर नहीं बैठना चाहिए। कोई श्रावक दर्शन कर रहा हो तो उसके सामने से नहीं निकलना चाहिए। पूजन, भजन, मंत्र इतनी जोर से नहीं पढ़ना चाहिए कि दूसरा जो पूजन, भजन, मंत्र कर रहा है वह अपना पाठ ही भूल जाए। नाक, कान, आँख आदि का मैल नहीं निकालना चाहिए। शौच आदि को पहनकर गए हुए वस्त्र पहनकर नहीं जाना चाहिए। अशुद्ध पदार्थ लिपिस्टिक, नेलपालिश, क्रीम, सेन्ट आदि लगाकर नहीं जाना चाहिए। क्रोध, अहंकार नहीं करना चाहिए। किसी को गाली नहीं देना चाहिए। सगाई, विवाह, खाने, पीने आदि की चर्चा नहीं करना चाहिए। दुकान, आफिस, राजनीति आदि की चर्चा नहीं करना चाहिए। जूठे मुख नहीं जाना चाहिए। चमड़े तथा रेशम की वस्तुएँ पहनकर नहीं जाना चाहिए। काले, नीले, लाल, भड़कीले वस्त्र पहनकर नहीं जाना चाहिए। मोबाइल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। 16. दर्शन करने से कौन-कौन से लाभ होते हैं ? दर्शन करने से निम्न लाभ होते हैं - सम्यक् दर्शन की प्राप्ति होती है, यदि सम्यक् दर्शन है तो वह और दृढ़ होता है। अनेक उपवासों का फल मिलता है। असंख्यात गुणी कर्मों की निर्जरा होती है। पुण्य का आस्रव होता है। मन के अशुभ भाव नष्ट हो जाते हैं। प्रात:काल दर्शन-पूजन करने से दिन अच्छी तरह व्यतीत होता है। 17. देवदर्शन करने से कितने उपवास का फल मिलता है ? देवदर्शन करने का फल निम्न प्रकार है जिन प्रतिमा के दर्शन का विचार करने से 2 उपवास का दर्शन करने की तैयारी की इच्छा से 3 उपवास का जाने की तैयारी करने से 4 उपवास का घर से जाने लगता उसे 5 उपवास का जो कुछ दूर पहुँच जाता है उसे 12 उपवास का जो बीच में पहुँच जाता है उस 15 उपवास का जो मन्दिर के दर्शन करता है उसे 1 माह के उपवास का जो मन्दिर के अाँगन में प्रवेश करता है उसे 6 माह के उपवासका जो द्वार में प्रवेश करता है उसे 1 वर्ष के उपवासका जो प्रदक्षिणा देता है उसे 1oo वर्ष के उपवास का जो जिनेन्द्र देव के मुख का दर्शन करता है उसे 1000 वर्ष के उपवास का और जो स्वभाव से अर्थात् निष्कामभाव से स्तुति करता है उसे अनन्त उपवास का फल मिलता है।
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  19. 1 point
    छोटा भले हो, दर्पण मिले साफ़, खुद को देखूँ। हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। आओ करे हायकू स्वाध्याय आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं। आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं। आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं। लिखिए हमे आपके विचार क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं। इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
  20. 1 point
    सुनते हो क्या नहीं? कर्ण तो ठीक हैं तुम्हारे! फिर वर्ण-संकर की चर्चा कौन करे? सम-वर्ण शंकर की अर्चा मौन करें हम!” और कंकर मौन हो जाते हैं। इस पर भी शिल्पी का भाव ताव नहीं पकड़ता जरा-सा भी। धरा-सा ही सहज साम्य भाव प्रस्तुत होता है उससे ...कि इस प्रसंग में वर्ण का आशय न ही रंग से है। न ही अंग से वरन् चाल-चरण, ढंग से है। यानी! जिसे अपनाया है उसे जिसने अपनाया है उसके अनुरूप अपने गुण-धर्म- ...रूप-स्वरूप को परिवर्तित करना होगा Do you hear ? Are your ‘ears’ in order ! Who should then talk about The admixture of castes ? We should adore silently Šańkara, full of the hue of equanimity !” And... The pebbles become quiet. Hereupon too, the mood of the Artisan Doesn't get heated Even for a short while. Through it is reflected thus The natural sense Of earth-like equilibrium ...That By this reference, The purport of the Word ‘Varna’ Neither indicates a colour Nor it symbolizes a ‘Social section’ But, It means character, conduct, manners. That is to say The one, Who is befriended Will have to adjust His attributes and functions- ... His image and identity, According to the other Who has taken him under his roof.
  21. 1 point
    देव - दर्शन का स्वरूप - जिनेन्द्र देव का दर्शन श्रावकों का प्रथम एवं प्रमुख कर्तव्य कहा गया है। साक्षात् जिनेन्द्र देव का अभाव होने पर उनकी वीतराग प्रतिमा या जिनबिम्ब में उनके गुणों का आरोपण करके श्रद्धा पूर्वक अरिहन्त, सिद्ध या जिनदेव मानकर, निर्मल परिणामों से उनके जैसे गुणों की प्राप्ति की भावना से नमस्कार करना देव-दर्शन कहलाता है। देव - दर्शन का फल - देव-दर्शन से पूर्व जन्म में संचित पाप-समूह नष्ट हो जाता हैं, जन्म-जरा-मृत्यु रूपी रोग मिट जाता है एवं स्वर्ग सुख तथा सहज मोक्षसुख की भी उपलब्धि देव-दर्शन से सहज हो जाती है। देव – प्रतिमा का रूप - जिनेन्द्र देव की प्रतिमा समचतुरस्त्र संस्थान वाली खड्गासन अथवा पद्मासन में होती है। प्रतिमा के लटकते हुए दोनों हाथ अथवा हाथ पर हाथ धरी हुई मुद्रा कृतकृत्यता का प्रतीक है। अर्थात् सभी करने योग्य कार्य वे कर चुके, अब कुछ भी करना शेष नहीं रहा। अर्धान्मीलित नेत्र अन्तर्दूष्टि का प्रतीक है अर्थात् जिन्होंने पर पदार्थों की ओर से दृष्टि को हटाकर अपने आत्म तत्व की ओर कर दी है। उनकी वीतराग मुख मुद्रा समत्व परिणति का प्रतीक है अर्थात् वे कभी प्रसन्न अथवा उदास नहीं होते हैं। देव प्रतिमा देव प्रतिमा का प्रभाव - जिनेन्द्र प्रतिमा जहाँ विराजित होती है, उसे जिनालय, जिनमंदिर अथवा चैत्यालय कहते हैं। जिनेन्द्र प्रतिमा एक आदर्श (दर्पण) के समान है, जिसे देखकर हमें अपने मूल स्वरूप का ज्ञान होता है। जैसे दर्पण में अपना चेहरा (मुख) देखने पर, चेहरे पर लगे दाग-धब्बे हम देख पाते हैं, उसी प्रकार वीतराग भगवान का दर्शन हमें अपने भीतर के राग-द्वेष, विषय-कषाय, अज्ञान रुपी धब्बों के देखने में निमित्त बनता है। जिस प्रकार किसी पहलवान को देखने से पहलवान बनने के, डॉक्टर को देखने से डॉक्टर बनने के भाव मन में उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार वीतरागता से सहित, सौम्य मुद्राधारी जिनेन्द्र भगवान के बिम्ब के दर्शन से हमारे भाव भी वीतरागी बनने के होते हैं/ होना चाहिए। देव प्रतिमा की महिमा - जिनबिम्ब के दर्शन से मनुष्य एवं तिर्यज्यों को सम्यग्दर्शन तक प्राप्त हो जाता है, पूर्व में बाँधे हुए निधति, निकाचित कर्म भी क्षय को प्राप्त हो जाते हैं। जिन प्रतिमा मंदिर की आवश्यकता - जिन्होने घर गृहस्थी सम्बन्धी सभी कार्य, पाँच पाप छोड़ दिये हैं ऐसे साधक तो अपने मन में ही परमात्मा की वंदना, पूजन कर सकते हैं। किन्तु गृहस्थ श्रावक के लिए सर्वत्र राग-द्वेष मय वातावरण ही मिलता है वह पाँच पापों में लिप्त रहता है। उसके लिए ऐसा कोई स्थान चाहिए जहाँ वह कुछ समय पापों से दूर रहकर परमात्मा का दर्शन, पूजन, ध्यान कर सके, जीवन संसार के सत्य को जान सके, जहाँ का वातावरण राग-द्वेष, विषय कषायों से दूर हो अत: ऐसा स्थान मंदिर ही हो सकता है। इसलिए अकृत्रिम जिनालयों के अनुरूप बड़े - बड़े राजाओं ने, सेठों ने एवं सुधी श्रावकों ने भव्य जिन मंदिरों का निर्माण कराया, उनमें जिनबिम्ब प्रतिष्ठित कराया और आवश्यकतानुसार आज भी कर रहे हैं। अत: गृहस्थ के लिए जिनालय की नितांत आवश्यकता है। जिन मंदिर/देव दर्शन की विधी - देव दर्शन हेतु प्रात:काल स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर शुद्ध धुले हुए साफ वस्त्र (धोती दुपट्टा अथवा कुर्ता पायजामा) पहनकर तथा हाथ में धुली हुई स्वच्छ अष्टद्रव्य लेकर मन में प्रभु दर्शन की तीव्र भावना से युक्त, नङ्ग पैर नीचे देखकर जीवों को बचाते हुए घर से निकलकर मंदिर की ओर जाना चाहिए। रास्ते में अन्य किसी कार्य का विकल्प नहीं करना चाहिए। दूर से ही मंदिर जी का शिखर दिखने पर सिर झुकाकर जिन मंदिर को नमस्कार करना चाहिए, फिर मन्दिर के द्वार पर पहुँचकर शुद्ध छने जल से दोनों पैर धोना चाहिए। अर्ध चढ़ाते समय की भावना - मंदिर के दरवाजे में प्रवेश करते ही ऊँजय जय जय, निस्सही निस्सही निस्सही नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु बोलना चाहिए फिर मंदिर जी में लगे घण्टे को बजाना चाहिए। इसके पश्चात् भगवान के सामने जाते ही हाथ जोड़कर सिर झुकावें, णमोकार मंत्र पढ़कर कोई स्तुति स्तोत्र पाठ पढ़कर 'भगवान की मूर्ति को एक टक होकर देखें भावना करें जैसी आपकी छवि हैं वैसी ही वीतरागता मुझे प्राप्त होवे जैसे आप सिंहासन आदि अष्ट प्रातिहार्यों से निलिप्त हैं वैसे ही मैं भी संसार में निर्लिप्त रहूं" साथ में लाए पुंज बंधी मुट्ठी से अँगूठा भीतर करके अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु ऐसे पाँच पुंज चढ़ावे। फिर जमीन पर गवासन से बैठकर, जुड़े हुए हाथों को तथा मस्तक को जमीन से लगावें तीन बार धोंक देवे तत्पश्चात् हाथ जोड़कर खड़े हो जावे और मधुर स्वर में स्पष्ट उच्चारण के साथ स्तुति आदि पढ़ते हुए अपनी बाँयी ओर से चलकर वेदी की तीन परिक्रमा करें। तदनन्तर स्तोत्र पूरा होने पर फिर बैठकर नमस्कार करें। परिक्रमा देते समय ख्याल रखे कोई धोक दे रहा हो तो उसके आगे से न निकलकर, पीछे की ओर से निकले। दर्शन करने इस तरह खड़े हो तथा पाठ करे जिससे अन्य किसी को बाधा न हो। गन्धोदक लेने की विधी - दर्शन कर लेने के बाद अपने दाहिने हाथ की मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को गन्धोदक के पास रखे अन्य जल में डुबोकर शुद्ध कर लेने पर अंगुलियों से गन्धोदक लेकर उत्तमांग पर लगायें फिर गंधोदक वाली अंगुलियों को पास में रखे जल में धो लेवें। गन्धोदक लेते समय निम्न पंक्तियाँ बोलें - निर्मलं निर्मलीकरण, पवित्र पाप नाशनम्। जिन गन्धोदकं वंदे, अष्ट कर्म विनाशकम्॥ इसके पश्चात् नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए कायोत्सर्ग करें। फिर जिनवाणी के समक्ष 'प्रथमं करण चरण द्रव्यं नम:' ऐसा बोलते हुए क्रम से चार पुंज लाइन से चढ़ावें तथा गुरु के समक्ष 'सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्रेभ्यो नम:।' ऐसा बोलकर क्रम से तीन पुंज लाइन से चढ़ावे। कायोत्सर्ग करें, फिर भगवान को पीठ न पड़े ऐसा विनय पूर्वक दरवाजे से बाहर अस्सहि, अस्सहि, अस्सहि बोलते हुए निकलें। दर्शन करते समय चढ़ाने योग्य सामग्री - मदिर जाते समय प्रभु चरणों में चढ़ाने हेतु अपनी सामथ्र्य के अनुसार उत्कृष्ट, जीव जन्तु रहित, स्वच्छ सामग्री ले जाना चाहिए। स्वर्ग के देव दिव्य पुष्प, दिव्य फलादि सामग्री ले जाते हैं। चक्रवर्ती आदि राजा महाराजा हीरे मोती जवाहारात आदि भगवान के चरणों में चढ़ाने के लिए ले जाते हैं। मनोवती कन्या का दृष्टान्त आगम में आता है उसने गज मोती चढ़ाकर ही भगवान के दर्शन करने के पश्चात् ही भोजन करने का नियम लिया था। सामान्य श्रावक श्रीफल, अक्षत, बादाम आदि फल लेकर भगवान के चरणों में जाता है। अत: भगवान के पास क्या लेकर जाएँ इसका कोई विशेष नियम नहीं है, सामान्य रूप से सभी अखंड चावल लेकर देव दर्शन हेतु जाते हैं पर अपनी सामथ्र्य के अनुसार अन्य बहुमूल्य श्रेष्ठ वस्तु भी चढ़ा सकते हैं। वह सामग्री हमारे राग भाव की कमी, त्याग का प्रतीक है। अनेक क्षेत्रों में जहाँ जैसी सामग्री उपलब्ध हो अखरोट, बादाम, काजू, किसमिस, नारियल आदि भी ले जा सकते हैं। द्रव्य ले जाने का कारण - चावल आदि सामग्री ले जाने के कारण हमें रास्ते में ध्यान रहता है कि हम कहाँ जा रहे हैं ? मंदिर जा रहे हैं। बाजार से गुजरते हुए भी मन बाजार में नहीं भटकता। दूसरा कारण जब लौकिक व्यवहार में साधारण से सम्राट आदि से मिलने जाते समय, रिश्तेदारों के यहाँ जाते समय कुछ न कुछ भेंट लेकर अवश्य जाते हैं खाली हाथ नहीं जाते। तब तीन लोक के नाथ अकारण बन्धु जहाँ विराजमान है ऐसे मंदिर में खाली हाथ कैसे जा सकते हैं अत: भगवान के पास नियम से कुछ न कुछ लेकर अवश्य जाना चाहिए।
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    मनुष्य गति नामकर्म के उदय से 'मैं मनुष्य हूँ" ऐसा अनुभव करते हैं वे जीव मनुष्य कहलाते हैं। क्षेत्र की अपेक्षा मनुष्य दो प्रकार के हैं। कर्मभूमिज मनुष्य और भोगभूमिज मनुष्य। कर्मभूमिज मनुष्य - जो मनुष्य कर्मभूमि में उत्पन्न होते है, शुभ-अशुभ कर्म करते हुए सद्गति-दुर्गति को प्राप्त होते है। असि, मसि, कृषि, शिल्प, सेवा और वाणिज्य रूप षट्कर्मों के द्वारा अपनी आजीविका चलाते हैं। जो जीव कर्म काट कर मोक्ष सुख को प्राप्त कर सकते है, कर्मभूमिज मनुष्य कहलाते हैं। भोगभूमिज मनुष्य - जो मनुष्य दस प्रकार के कल्पवृक्षों से प्राप्त सामग्री का भोग करते हैं। सदा भोगों में लीन सुखमय जीव व्यतीत करते हैं तथा मरणकर नियम से देवगति में ही जन्म लेते हैं। भोग भूमिज मनुष्य कहलाते हैं। आर्य व म्लेच्छ के भेद से भी मनुष्य दो प्रकार के होते हैं। जो गुणों से सहित हो अथवा गुणवान लोग जिनकी सेवा करें उन्हें आर्य कहते हैं। इसके विपरीत, गुणों से रहित, धर्महीन आचरण करने वाले, निर्लज वचन बोलने वाले म्लेच्छ होते हैं। कर्मभूमिज मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु एक करोड़ पूर्व वर्ष प्रमाण है एवं जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त है। भोग भूमिज मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु तीन पल्य एवं जघन्य आयु एक पूर्व कोटी है। भद्र मिथ्यात्व, विनीत स्वभाव, अल्प आरम्भ अल्प परिग्रह के परिणाम, सरल व्यवहार, हिंसादिक दुष्ट कार्यों से निवृत्ति, स्वागत तत्परता, कम बोलना, ईर्षारहित परिणाम, अल्प संक्लेश, देवता तथा अतिथि पूजा में रुचि, दान शीलता, कापोत पीत लेश्या रूप परिणाम, मरण काल में संक्लेश रूप परिणति का नहीं होना आदि मनुष्य आयु के आस्रव तथा मनुष्य गति में ले जाने के कारण है। मनवांछित वस्तु को देने वाले कल्पवृक्ष कहलाते हैं। वे दस प्रकार के होते हैं पानाङ्ग - मधुर, सुस्वादु छ: रसों से युक्त बतीस प्रकार के पेय को दिया करते हैं। तूर्याडू - अनेक प्रकार के वाद्य यंत्र देने वाले होते हैं। भूषणाङ्ग - कंगन, कटिसूत्र, हार, मुकुट आदि आभूषण प्रदान करते हैं। वस्त्राङ्ग - अच्छी किस्म (सुपर क्वालिटी) के वस्त्र देने वाले हैं। भोजनाङ्ग - अनेक रसों से युक्त अनेक व्यञ्जनों को प्रदान करते हैं। आलयाङ्ग - रमणीय दिव्य भवन प्रदान करते हैं। दीपाङ्ग - प्रकाश देने वाले होते हैं। भाजनाङ्ग - सुवर्ण एवं रत्नों से निर्मित भाजन और आसनादि प्रदान करते हैं। मालाङ्ग - अच्छी-अच्छी पुष्पों की माला प्रदान करते हैं। तेजाङ्ग - मध्य दिन के करोड़ों सूर्य से भी अधिक प्रकाश देने वाले इनके प्रकाश से सूर्य, चन्द्र का प्रकाश कांतिहीन हो जाता है। पानाङ्ग जाति के कल्पवृक्ष को मद्याङ्ग भी कहते हैं। ये अमृत के समान मीठे रस देते हैं। वास्तव में ये वृक्षों का एक प्रकार का रस है, जिन्हें भोगभूमि में उत्पन्न होने वाले आर्य पुरुष सेवन करते हैं, किन्तु यहाँ पर अर्थात् कर्मभूमि में जो मद्य पायी लोग जिस मद्य का पान करते हैं, वह नशीला होता है और अन्त:करण को मोहित करने वाला है, इसलिए आर्य पुरुषों के लिए सर्वथा त्याज्य है। सुपात्र की आहार दान देते समय की जाने वाली नवधा भक्ति १. पडुगाहन २. उच्चासन ३. पाद-प्रक्षालन ४. पूजन ५. नमोस्तु६. मन शुद्धि७. वचन शुद्धि८. काय शुद्धि९. आहार-जल शुद्धि
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    देवाधिदेव चरणे परिचरणं सर्व दुःख निर्हरणम्। कामदुहि कामदाहिनि, परिचिनुया दादूतो नित्यम। श्रावकों के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए आचार्य श्री समन्तभद्र जी ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार में लिखा है - देवों के भी देव ऐसे जिनेन्द्र देव के चरणों की नित्य ही पूजा करना चाहिए। कैसी है वह पूजा? सभी दु:खों को हरण/नष्ट करने वाली, मनवांछित फल को देने वाली एवं तृष्णा को जलाने वाली है। ऐसी परमोपकारी जिन-पूजा के अंग, जिन-पूजा की विधी, प्रकार, जिन पूजक आदि के विषय की इस अध्याय में जानकारी प्राप्त करेंगे। पूजा शब्द का अर्थ होता है आराधना करना, अर्चना, स्वागत-सम्मान करना। अत:पूज्य की आराधना में मन, वचन और काय पूर्वक समर्पित होना पूजा है। जैन दर्शन में व्यक्ति की पूजा नहीं बल्कि व्यक्तित्व (गुणों) की पूजा की जाती है अर्थात् जिनके पास वीतरागता हो ऐसे पंचपरमेष्ठी जिनधर्म, जिनगम, जिनचैत्य और जिनचैत्यालय ये नव देवता ही अष्ट द्रव्य से पूजनीय है अन्य कोई नहीं। सम्यक्र दृष्टि देवी-देवता सम्मान, जय जिनेन्द्र आदि व्यवहार करने योग्य तो हो सकते हैं किन्तु पूज्यनीय नहीं। पूजा के मुख्यत: दो भेद हैं - द्रव्य पूजा और भाव पूजा। जल, चन्दनादि अष्ट द्रव्यों से भक्ति पूर्वक जिनेन्द्र देव की पूजा करना 'द्रव्य पूजा' है। बिना द्रव्य के मात्र निर्मल भावों के द्वारा जिनेन्द्र देव की स्तुति, भक्ति करना 'भाव पूजा' है। द्रव्य पूजा में भाव सहित मन-वचन-काय की प्रवृत्ति की मुख्यता होती है, बाह्य पदार्थों का अवलम्बन होता है जबकि भाव पूजा में निवृत्ति की मुख्यता के साथ-साथ निरालम्बता रहती है। कुछ व्यक्ति धर्म के अर्थ हिंसा करने से तो महापाप होता है, अन्यत्र करने से थोड़ा पाप लगता है ऐसा कहते है सो यह आगम का/सिद्धान्त का वचन नहीं है। गृहस्थ की भूमिका में मात्र संकल्पी हिंसा का त्याग होता है, आरंभी, विरोधी और उद्योगी हिंसा का नहीं। दीपक जलाते समय, धूप खेते समय सावधानी रखें तो त्रस जीवों के घात से बच सकते हैं। आचार्यों ने जिन पूजा आदि में होने वाले सावद्य को अल्पदोष कारक एवं बहुपुण्य राशि को देने वाला माना है। मधुर जल से भरे तालाब में नमक की कणिका के समान ही पूजा आदि कार्यों में पाप कर अल्प बन्ध होता है। आचार्यों ने पूजन के छह अंग कहे हैं- १. अभिषेक, २. आहवानन, ३. स्थापन, ४. सन्निधीकरण, ५. पूजन ६ विसर्जन। किन्ही किन्ही आचार्यों ने अभिषेक की क्रिया का पृथक वर्णन करते हुए पूजा के पाँच अंग भी माने हैं। अभिषेक पूरी जिन-प्रतिमा जल से सिंचित हो इस प्रकार जल की धारा भगवान के ऊपर करना 'अभिषेक' है। अभिषेक पूजा का अनिवार्य अंग है इसके बिना पूजा अधूरी अथवा गलत है। अभिषेक प्रतिमा की स्वच्छता के उद्देश्य से नहीं अपितु साक्षात् प्रभु का स्पर्शन, परिणामों की विशुद्धता, पापों के क्षय के लिए किया जाता है। जिनबिम्ब से स्पर्शित जल 'गन्धोदक' कहा जाता है। यह गंधोदक विश्व की आधि - व्याधि समूह का हर्ता, विष एवं ज्वरों का विनाशक एवं मोक्ष लक्ष्मी का प्रदाता है। आहवानन, स्थापन एवं सन्निधीकरण पूजन के अंग रूप आहवानन, स्थापन एवं सन्निधीकरण क्रिया वीतरागी अहन्त प्रभु के प्रति भावनात्मक समर्पण की क्रिया है। आहवानन का अर्थ - भाव सहित उल्लास पूर्वक त्रिलोकी नाथ को आमन्त्रित (अवतरित) करने का विनय भाव। यद्यपि जिन्होंने सिद्ध दशा को प्राप्त कर लिया वे प्रभु कभी लौटकर आते नहीं। फिर भी पूजक विनय प्रदर्शन हेतु मंत्र और मुद्रा के द्वारा आहवानन क्रिया को संपन्न करता है। दोनों हाथों को जोड़कर एक साथ मिलाकर फैलाना, फिर दोनों अंगूठे, दोनों अनामिकाओं के मूल स्थान में रखना, इससे जो आकृति बनती है, वह आहवानन मुद्रा कहलाती है। इसे आकर्षणी मुद्रा भी कहते हैं। स्थापन का अर्थ - सजग/ सतर्क होकर भगवान से ठहरने का आग्रह भाव यहाँ स्थापना का अर्थ पीले चावल आदि में भगवान की स्थापना करने का नहीं है। स्थापनी मुद्रा के द्वारा यह क्रिया संपन्न की जाती है। आकर्षिणी मुद्रा में जो दोनो हथेली उध्र्वमुख थी उन्हे अधोमुख कर देने पर, जो आकृति होती है उसे स्थापनी मुद्रा कहते हैं। सन्निधीकरण का अर्थ भगवान को हृदय कमल पर विराजमान होने का अनुरोध/श्रद्धा पूर्वक साक्षात् जिनेन्द्र भगवान से निकटता प्राप्त करने का भाव / समर्पण का भाव। सन्निधीकरण मुद्रा के द्वारा यह क्रिया संपन्न की जाती है। दोनो हाथों की मुट्ठी बांधकर रखने से सन्निधीकरण मुद्रा होती है। सन्निधीकरण मुद्रा से हृदय स्पर्श और नमस्कार करना चाहिए। आहवानन, स्थापन एवं सन्निधीकरण करने के पूर्व दृष्टि जिन प्रतिमा की ओर रहे एवं मन्त्र पढ़ने तक हाथ जोड़े तत्पश्चात् मुद्रा बनाते हुए क्रिया का भाव करें। अर्थात् क्रमश: प्रत्येक क्रिया पूर्ण करने के पश्चात् पुन: हाथ जोड़कर अगली क्रिया, मन्त्र पढ़ते हुए प्रारम्भ करें। आह्वानन – ॐ ह्रीं श्री देव शास्त्र गुरु समूहः (सम्बोधनं) अत्र अवतर अवतर संवौषट्र (आकर्षण मन्त्र) आहूवान्मू (आह्वानन मुद्रा) स्थापन — ऊँ हीं श्री देव शास्त्र गुरु समूह (सम्बोधन) अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: (स्तम्भन मंत्र) स्थापनम् (स्थापनी मुद्रा) सन्निधीकरण - ऊँहीं श्री देव शास्त्र गुरु समूह (सम्बोधन) अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (वशीकरण मन्त्र) सन्निधिकरणम् (सन्निधी करण मुद्रा) इसके बाद पूजा करने का संकल्प करने हेतु ठोने में 'संकल्प पुष्प' क्षेपण करना चाहिए। तीन, पाँच, सात आदि पुष्पों की संख्या का कोई विकल्प नहीं करना चाहिए। क्योंकि हम भगवान की पूजा का संकल्प करके संकल्प पुष्प ठोने पर क्षेपण कर रहे हैं, भगवान को नहीं। बैठकर के पूजन करने वालो को भी आहवानन आदि क्रिया खड़े होकर करनी चाहिए। पूजन जिनेन्द्र भगवान के अनन्त गुणों का स्मरण करके (गुणानुवाद) अष्ट द्रव्य को संकल्प पूर्वक जिनेन्द्र चरणों में समर्पित करना पूजा कहलाती है। पूजन में प्रयोग की जाने वाली अष्ट द्रव्य एवं उसका प्रयोजन क्रमश: निम्न प्रकार है जल - संसार में परिभ्रमण कराने वाले जन्म-जरा-मृत्यु के क्षय के लिए। चन्दन - संसार का आताप / दुःख मिटाने के लिए। अक्षत - कभी नष्ट न होने वाले ऐसे अक्षय पद की प्राप्ति के लिए। पुष्प - कामवासना के नष्ट करने हेतु। नैवेद्य - क्षुधा रोग के क्षय / विनाश के लिए। दीप - महा मोह रूपी अन्धकार के विनाश हेतु। धूप - अष्ट कर्म के दहन हेतु। फल - महा मोक्ष फल की प्राप्ति हेतु । आठों द्रव्य को मिलाने से अर्घ बन जाता है। जिसे अमूल्य शिव पद की प्राप्ति हेतु जिनेन्द्र देव के चरणों के समक्ष चढ़ाया जाता है। द्रव्य चढ़ाने का मन्त्र -ॐ हीं श्री..................निर्वपामीति स्वाहा। बीजाक्षरों का अर्थ - ऊँ - पञ्च परमेष्ठी का वाचक हीं - चौबीस तीर्थकर का वाचक श्री - लक्ष्मी, अनन्त चतुष्टय का वाचक निर्वपामीति - सम्पूर्ण रूप से समर्पित करना स्वाहा - पाप नाशक, मंगल कारक, आत्मा की आन्तरिक शक्ति उद्घाटित करने वाला बीजाक्षर। भावार्थ - पञ्च परमेष्ठी, चौबीस तीर्थकरों को साक्षी मानकर अनन्त चतुष्टय की प्राप्ति के लिए, संसार परिभ्रमण के कारण दुष्कर्मों को नष्ट करने के लिए मैं यह द्रव्य सम्पूर्ण रूप से समर्पित करता हूँ। इस प्रकार जिनेन्द्र गुणों की प्राप्ति ही पूजा का उद्देश्य है। पूजा ही परम्परा से मोक्ष का कारण है। विसर्जन विश्व शान्ति की मंगल कामना के साथ शान्ति पाठ पढ़कर, पूजा में होने वाली अशुद्धियों, ज्ञाताज्ञात त्रुटियों की क्षमा याचना पूर्वक पूजा कार्य की समाप्ति करना विसर्जन है। विसर्जन का तात्पर्य पूजा संकल्प के विसर्जन से है न कि देवताओं के विसर्जन से। विनय पूर्वक हाथ जोड़कर भगवान की ओर दृष्टि करते हुए जितने पुष्प हाथ में आये उन्हें ठोने में क्षेपण करना चाहिए। तत्पश्चात् ठोने के संकल्प पुष्पों को निर्माल्य की थाली में ही डाल देना चाहिए। उन्हें अग्नि में नहीं जलाना चाहिए।
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    कषाय विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार कषाय और इन्द्रियों को वश में करो, कायक्लेश तप के द्वारा शरीर का शोषण करना चाहिए। बहुत समय तक घोर से घोर तप मत करो, लेकिन कषाय तो मत करो। दुनियाँ की चीजों में स्पर्धा न करके कषाय को जीतने की स्पर्धा करो, फिर मुक्ति तुमसे दूर नहीं। अपनी शक्ति का उपयोग कषाय को जीतने में ही करना चाहिए। ज्ञानी, विवेकी वही है, जो कषाय का शमन करता है। कषाय करने से कषाय की फौज (सेना) और बढ़ती जाती है। जैसे युद्ध में रावण का एक सिर कटता है तो दस सिर और पैदा हो जाते हैं। कषायों का शमन करना बच्चों का खेल नहीं बन सकता, इसलिए इस मार्ग पर चलना चाहते हो तो कषाय को जीतो, परिग्रह का त्याग करो। कषाय की प्रचुरता के कारण ही यह जीव निगोद से नहीं निकल पाता। ईष्र्या, स्पर्धा आदि कषाय के ही अंश हैं, ये मान कषाय को ठेस पहुँचाते हैं। कषायों का आवेग आत्मा को अंधा बना देता है। क्रोधादि चारों कषायों का एक साथ उदय नहीं हो सकता, वरन् संसार में हंगामा मच जायेगा। कषाय आपके पास हैं तो आप कसाई हैं, फिर कोई आपसे कसाई कहता है तो आप आगबबूला क्यों होते हो ? क्रोध, मान, माया, लोभ हमारा स्वभाव नहीं है, जिन्हें ऐसा श्रद्धान हो जाता है, इनकी ओर अपना उपयोग नहीं ले जाता। कषाय से बचना चाहते हो तो सबसे अच्छा सूत्र है, दूसरे के बारे में मत सोचो, अपने बारे में चिंतन करो, दूसरे के बारे में सोचो तो उसकी अच्छाई के बारे में सोचो। कषाय के वशीभूत होकर धर्मात्मा को नीचा दिखाने का अर्थ है, अपने धर्म को ही अपमानित करना । हमारी कषाय शरीरादि नो कर्म को देखकर उद्वेलित हो जाती है। अंदर कर्मों का बारूद भरा है जो नो कर्म रूपी आग का सम्पर्क पाकर फूट पड़ता है। कषाय का सहारा लेने वाला ज्ञान खतरनाक है, वह संसार का कारण बनता है। अनन्तानुबन्धी कषाय के उदय में आते ही सम्यकदर्शन और सम्यकचारित्र दोनों नष्ट हो जाते हैं। मद, अभिमान मान कषाय की उदीरणा के बिना नहीं हो सकता। हम कषायों के माध्यम से ऊर्जा को विपरीत दिशा में ले जाते हैं तो हमारा विकास पतन को प्राप्त हो जाता है। कषायों का वमन (त्याग) करते ही मन शांत हो जाता है, मन में हल्कापन आ जाता है। जो कषाय वश मोक्षमार्ग को दूषित करता है, कषाय की प्रचुरता रखता है, वह निगोद में जाता है। कषाय करने वाला स्वयं दु:खित है, क्योंकि प्रतिकार के भाव हुए हैं, लेकिन जिसे असाता का उदय है वह समता से सह लेता है तो वह दु:खी नहीं है। कषाय करने वाला उस मुर्गे के समान है, जो दर्पण में अपने बिम्ब से ही लड़ता है। कषाय रखना फटाके की दुकान के समान है। आग्रह रूपी अग्नि का संयोग मिलते ही दुकान तक जलकर समाप्त हो जाती है। प्रतिकार में भाव करना कषाय की मौजूदगी बताते हैं। यदि कषायें शांत हैं तो अपने घर में आ सकते हो वरन् नहीं। कषाय स्वयं अपनी आत्मा को कसती है। कषाय को शमन करने की स्पर्धा करो। जिस स्पर्धा से कषाय उत्पन्न हो, ऐसी स्पर्धा छोड़ दो |
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