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  1. Vidyasagar.Guru

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  2. संयम स्वर्ण महोत्सव

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  3. srajal jain

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  4. Nayana Patil

    Nayana Patil

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Popular Content

Showing content with the highest reputation since 11/14/2018 in all areas

  1. 18 points
    आचार्य श्री की हुई मुंगावली में भव्य आगवानी moongavli_Medium.mp4 moongavli 2_Medium.mp4 ४ दिसंबर 2018 आज दोपहर उपरान्त मुंगावली में भव्य अगवानी संभावित 3 दिसंबर 2018 आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी महामुनिराज का अभी अभी देवगढ़ (जिला - ललितपुर) से हुआ विहार संभावित दिशा - नदियों के रास्ते(कच्चा मार्ग)..मुगरौली होते हुवे मुंगावली 2 दिसंबर 2018 *आचार्य गुरुवर 108 विद्यासागर जी महाराज का मंगल विहार जाखलौन (जिला ललितपुर) से हुआ* *विहार दिशा - देवो के गढ़ देवगढ़ तीर्थ* *४ बजे होगा मंगल प्रवेश* आचार्य श्री ससंघ का हुआ मंगल प्रवेश अतिशय क्षेत्र देवगढ़ जी,में दिनांक - 1 दिसम्बर 2018 1:30 P.M. पंचकल्याणक महोत्सव के उपरान्त हुआ मंगल विहार संभावित दिशा - देवगढ़ आचार्य श्री ससंघ, समय सागर जी ससंघ (नव दीक्षित मुनिराज ) का ●आज रात्रिविश्राम- *ग्राम- बछलापुर 10km* ●कल की आहारचर्या- *ग्राम- जाखलौन(बछलापुर से 13km)* ■ जाखलौन से देवगढ़ जी 15km■
  2. 6 points
    आचार्य श्री के प्रवचनांश - परम्परा को निर्मल व अक्षुण्ण बनाये रखने हेतु प्रवचन सार में आचार्य कुंद कुंद देव ने निर्यापक शब्द की स्पष्ट व्याख्या की है| - जब संघ में अनुभवी साधुओं का समूह तैयार हो जाता है तब संघ में नवदीक्षित मुनिराजों के निर्वाह के लिए निर्यापक श्रमण की व्यवस्था होती है जिससे संघ में श्रमणों का निर्वाह होता है और सम्पूर्ण संघ को इसका लाभ प्राप्त होता है| - मूलाचार में संघ में दीक्षित अर्यिकाओं के निर्वाह के लिए (शिक्षा, दीक्षा, प्रायश्चित इत्यादि) जो उनका गणधर होगा उसके व्यक्तित्व योग्यता गुण की अलग व्याख्या की गई है| -आवश्यकता अनुसार निर्यापकों की संख्या बढ़ाई भी जा सकती है|
  3. 5 points
    आज श्री क्षेत्रपाल मंदिर जी से दयोदय पशु संरक्षण केंद्र गौशाला ललितपुर पंचकल्याणक स्थल पर जाते समय आचार्य भगवंत अचानक एक स्थान पर विश्राम हेतु रुक गए वह स्थान एक बहुत ही गरीब व्यक्ति की झोपड़ी थी वहां आचार्य भगवंत ने थोड़ी देर विश्राम किया उसी घर में एक 16 वर्षीय बालक जोकि विगत कई वर्षों से लकवा का शिकार था दयानी हालत में जमीन पर लेटा हुआ था आचार्य भगवान जैसे ही उसके समीप गए उसने आचार्य भगवंत के चरण पकड़ लिए आचार्य श्री ने उसे संबोधन और ओम की ध्वनि का जाप करने का आशीर्वाद दिया गुरुदेव ने उसके साथ परिवार को आशीर्वाद दिया बा उसकी झोपड़ी पर नजर डाली और पुणे आशीर्वाद देकर दयोदय गौशाला के लिए बिहार कर दिया गुरुदेव ने उस व्यक्ति की झोपड़ी में लगभग 20 मिनट का समय व्यतीत किया
  4. 3 points
    पंचकल्याणक महोत्सव खुशखबरी एक ही भूमि पर एक ही आचार्य की सन्निधि में छठवीं बार पंचकल्याणक महोत्सव म.प्र. की धर्म नगरी सागर में पांच पंचकल्याणकों की गवाह और विश्व के सबसे बड़े प्रस्तावित जिनालय की पावन भूमि, मंगल स्थान “भाग्योदय तीर्थ परिसर” में पंचम युग के महावीर, संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से धर्म नगरी सागर के पांच जिनालयों के ऐतिहासिक पंचकल्याणक महोत्सव 08 से 14 दिसंबर 2018 तक होने जा रहे हैं जिसमे प्रतिष्ठित होंगे श्री दि. जैन मंदिर ग़ोपालगंज श्री दि. जैन मंदिर रामपुरा श्री दि. जैन मंदिर काकागंज श्री दि. जैन मंदिर दीनदयाल नगर श्री दि. जैन मंदिर गीतांजलि ग्रीनसिटी ये क्रम बढ़ भी सकता है आइये आप और हम सभी इस ऐतिहासिक महोत्सव में सक्रिय भागीदारी देकर गौरवपूर्ण आयोजन के साक्षी बनें और धर्म प्रभावना का अंग बनते हुए धर्मार्जन करें।..... जय जिनेन्द्र विशेष- जानकारी लेने के लिए और भव्य आयोजन में सहयोग देने के लिए आप भाग्योदय तीर्थ उपासना केंद्र में शाम 7 से 9 बजे तक संपर्क कर सकते हैं। *ऐतिहासिक पंचकल्याणक महोत्सव 2018* भाग्योदय तीर्थ सागर (मध्यप्रदेश) 8 से 14 दिसंबर 2018* *आशीर्वाद* *सर्वश्रेष्ठ साधक आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज* *सानिध्य* ज्येष्ठ मुनि श्री योग सागर जी, मुनि श्री पवित्र सागर जी, मुनि श्री अभय सागर जी, मुनि श्री प्रयोग सागर जी, मुनि श्री प्रभात सागर जी, मुनि श्री संभव सागर जी, मुनि श्री पूज्य सागर जी, मुनि श्री विमल सागर जी , मुनि श्री अनंत सागर जी, मुनि श्री धर्म सागर जी , मुनि श्री शैल सागर जी, मुनि श्री अचल सागर जी , मुनि श्री अतुल सागर जी , मुनि श्री भाव सागर जी , मुनि श्री निरीह सागर जी, मुनि श्री निस्सीम सागर जी , मुनि श्री शाश्वत सागर जी एवं आर्यिका श्री ऋजुमति माता जी (11माताजी) आर्यिका श्री गुण मति माताजी (4माताजी) आर्यिका श्री अनंत मति माताजी (22माताजी) आर्यिका श्री उप शांत मति माताजी( 4माताजी) आर्यिका श्री अकम्प मति माताजी (8माताजी)। कुल 17मुनिराज एवं 49 माताजी का सानिध्य प्राप्त होगा
  5. 3 points
    Namastu Gurudev🙏🙏🙏
  6. 3 points
    deeksha vidhi 1_Medium.mp4 नवदीक्षित मुनि महाराजों के नाम- ब्र.श्रेयांश भैया बुढ़ार - परम पूज्य मुनि श्रीनिर्ग्रन्थसागर जी महाराज ब्र.मोनू भैया पनागर - परम पूज्य मुनि श्रीनिर्भ्रांतसागर जी महाराज ब्र.मोनू भैया पथरिया - परम पूज्य मुनि श्रीनिरालससागर जी महाराज ब्र.नितेन्द्र भैया नरसिंहपुर - परम पूज्य मुनि श्रीनिराश्रवसागर जी महाराज ब्र.पिंकेश भैया हाटपिपल्या - परम पूज्य मुनि श्रीनिराकारसागर जी महाराज ब्र.आकाश भैया सागर - परम पूज्य मुनि श्रीनिश्चिंतसागर जी महाराज ब्र.दीपक भैया संदलपुर - परम पूज्य मुनि श्रीनिर्माणसागर जी महाराज ब्र.सतीश भैया खुरई - परम पूज्य मुनि श्रीनिशंकसागर जी महाराज ब्र.मनीष भैया इंदौर - परम पूज्य मुनि श्रीनिरंजनसागर जी महाराज ब्र.अर्पित भैया इंदौर - परम पूज्य मुनि श्रीनिर्लेपसागर जी महाराज
  7. 2 points
    विद्यासागर डॉट गुरु वेबसाइट की स्टाल भाग्योदय तीर्थ सागर में *क्या आप सागर आ रहे हैं, तो अब आप वेबसाइट के अनुभव हमसे साझा स्टाल पर आकर कर सकते हैं | अगर आप से वेबसाइट पर अकाउंट नहीं बन रहा हैं तो आप इस स्टाल पर आकर सीख सकते हैं | स्थान - संत भवन के पास, भाग्योदय तीर्थ सागर दिनांक 11 दिसम्बर से 13 दिसम्बर 2018 *गुरु प्रभावन प्रतियोगिता, भाग्योदय तीर्थ सागर में* - जरूर भाग लें *उपहार स्वरुप* हथकरघा निर्मित श्रमदान की साड़ी, कुर्ता एवं 10 सांत्वना पुरस्कार दिए जायेंगे|
  8. 2 points
    ऐतिहासिक पंचकल्याणक सागर (भाग्योदय) 8 दिसंबर से 14 दिसंबर पंचकल्याणक पात्र चयन 04/12/18 भगवान के माता-पिता समाज श्रेष्ठी श्रीमान राकेश जी पिड़रुआ ध्वजारोहण कर्ता समाज श्रेष्ठी श्रीमान रमेश महेश संतोष बिलहरा परिवार सौधर्म इंद्र समाज श्रेष्ठी श्रीमान आनंद जी,अजित जी आनंद स्टील परिवार
  9. 2 points
  10. 2 points
    🇮🇳इंडिया नहीं भारत बोलो 🇮🇳 मेरे भगवन मेरे गुरुवर आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज के चरणो में मेरा कोटी कोटी नमन नमोस्तु भगवन नमोस्तु गुरूदेव नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु *जैनम् जयतु शासनम्* *वंदे विघा सागरम्* 🇮🇳इंडिया नहीं भारत बोलो🇮🇳
  11. 2 points
    आज आचार्य श्री ने जीव दया के केंद्र महावीर नेत्र चिकित्सालय का अवलोकन किया
  12. 2 points
    आचार्यश्री ने कहा धन को गाड़ना नहीं उगारना उन्होंने कहा ललितपुर में आज बहुत बदलाब आ गया है पंचकल्याणक के पात्रों का हुआ चयन विनोद कामरा सौधर्मेन्द्र और ज्ञानचंद्र इमलिया बने कुबेर आचार्यश्री के बुंदेली भाषा में प्रवचन सुन श्रोता हुए लोटपोट नगर में बह रही है धर्म की बयार ललितपुर- नगर के स्टेशन रोड स्थित क्षेत्रपाल मंदिर में विराजमान संत शिरोमणि राष्ट्र संत आचार्य श्री विद्यासागर जी मुनिराज के दर्शनों के लिए निरंतर तांता लगा रहता है। हजारों की संख्या में जहां नगर के श्रद्धालु क्षेत्रपाल मंदिर में मौजूद रहते हैं वहीं देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उनके दर्शनों के लिए पहुँच रहे हैं। गुरुवार को प्रातः विशाल धर्म सभा का आयोजन किया गया जिसमें सर्वप्रथम मंचासीन त्यागी व्रतियों ब्रह्मचारी भैयागणों ने आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्ज्वलन किया। इसके बाद आचार्यश्री की पूजन भक्ति संगीत के साथ की गई। पूजन करने का सौभाग्य जैन पंचायत समिति और पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव समिति के सभी पदाधिकारियों को प्राप्त हुआ। आचार्यश्री के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य बड़ा जैन मंदिर के प्रबंधक वीरेंद्र जैन प्रेस परिवार और अटा जैन मंदिर के प्रबंधक भगवानदास संतोष जैन राजेश जैन कैलगुवा परिवार को प्राप्त हुआ वहीं शास्त्र भेंट करने का सुअवसर प्रदीप कुमार प्रसन्न जैन नौहरकला परिवार तथा जैन पंचायत के अध्यक्ष अनिल अंचल परिवार को प्राप्त हुआ। आचार्यश्री ने आज के अपने मंगल प्रवचन की शुरुआत बुंदेली भाषा से जैसे ही की धर्मसभा में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं ने तालियों की आवाज गुंजायमान कर दी। आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने कहा की तनक-सो का अर्थ क्या होता है? पता है न आपको। इसका अर्थ होता है थोड़ा-सा। अपने स्वभाव की ओर देखना है वह न तनक सा है न मनक सा। उसकी जिसको भनक होती है वही देख सकता है। लोहा और स्वर्ण का उदाहरण देकर समझाते हुए उन्होंने कहा कि लोहा एक धातु है और स्वर्ण भी एक धातु है, लेकिन दोनों में अंतर बहुत है। लोहा कीचड़ में गिर गया तो गया। वैसे ही हमें जैसा हवा पानी मिल जाय तो सब अपना रूप बदलना प्रारंभ कर देते हैं। कीचड़ में गिरा वह लोहा जंग खा जाता है। उसके बाद उसकी दशा बुरी हो जाती है क्योंकि वह पर को अपनाता है। जो मोह के साथ रहता है वह न तो स्वयं में रहता है न ही पर में रहता है। सोना गाड़ के रख देते हो तो उसे कुछ भी नहीं होता है। क्योंकि वह दूसरों को पकड़ता नहीं है। लोहे की दशा विपरीत है इसलिए उसमें जंग लग जाती है और अंततः वह नष्ट हो जाता है। अब आप ही बताओ कि सोने के हो या और किसी धातु के। भगवान के ऊपर आप धारा पीतल के कलश से करो , चांदी से करो या तनक सी सोने की लुटिया से करो। सभी दर्शक यह सुनकर मुस्करा उठते हैं। उन्होंने दर्शकों से पूछा भगवान को खुश करना बहुत कठिन है न। हम यह समझते हैं भगवान हम से राजी हो जाएं , वह किसी से न राजी होते हैं न नाराज । ललितपुर मैं 32 वर्ष पूर्व अपने प्रवास का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज बहुत बदलाब आ गया है। पहचान मुश्किल है। क्षेत्रपाल मंदिर में विराजमान अभिनन्दन भगवान का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनके सामने पहुँचने पर ऐसा लगता है जैसे कोई पंचकल्याणक हो रहा हो। उन्होंने कहा कि आगे के लिए कमाई हो रही है।उन्होंने चंचला लक्ष्मी (धन) की ओर इशारा करते हुए कहा कि गाड़ना नहीं उगारना। उन्होंने कहा इससे भक्त तो बन जाओगे लेकिन भगवान नहीं बन पाओगे। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से मुस्कराते हुए पूछा कि आप लोगों को भगवान बनना है न। तो एक स्वर में आवाज आई हां। इस पर आचार्यश्री ने मंद-मंद मुस्कराते हुए बुंदेली भाषा में पूंछा-ऊसई-ऊसई की सई में। तो जनसमुदाय ने जबाब दिया सई में यानी सही में भगवान बनना है। इस अवसर पर अपर जिलाधिकारी योगेन्द्र बहादुर एवं सपा जिलाध्यक्ष ज्योति कल्पनीत भी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। नगर के पत्रकार बंधुओं ने भी बड़ी संख्या में अग्रिम पंक्ति में बैठकर धर्मलाभ लिया। इस दौरान दानवीर, भामाशाह आर. के.मार्बल समूह के मुखिया अशोक पाटनी मदनगंज-किशनगढ़ राजस्थान, अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी के नव निर्वाचित अध्यक्ष प्रभात जैन, राजा भाई सूरत, पारस चेनल के चेयरमैन पंकज जैन , दिल्ली, विनोद बड़जात्या, कवि चन्द्रसेन भोपाल, केलिफोर्निया से आये प्रदीप कुमार, प्रदीप छतरपुर, मुकेश जैन ढाना सागर और जिनवाणी चेनल के चेयरमैन आदि बाहर से आये समाज श्रेष्ठियों ने आचार्यश्री के चरणों में श्रीफ़ल समर्पित कर आशीर्वाद लिया। संचालन प्रतिष्ठाचार्य ब्र. विनय भैया जी व ब्र. सुनील भैया जी ने किया। आहारचर्या के दौरान चौका लगाने वालों में भारी उत्साह देखा गया। नगर में आज 320 चौके लगाए गए थे जो एक रिकार्ड है।आज आचार्यश्री के आहार कराने का सौभाग्य नरेंद्र जैन छोटे पहलवान परिवार को प्राप्त हुआ। अतिथियों का स्वागत स्वागत अध्यक्ष नरेन्द्र कड़ंकी, संयोजक प्रदीप सतरवांस, क्षेत्रपाल मंदिर के प्रबंधक द्वय मोदी पंकज जैन पार्षद, राजेन्द्र जैन, कैप्टन राजकुमार जैन आदि ने किया। श्रीजी का वार्षिक विमानोत्सव शुक्रवार को : जैन पंचायत के अध्यक्ष अनिल अंचल व महामंत्री डॉ. अक्षय टडैया ने बताया कि 23 नवंबर को प्रति बर्ष की भांति इस वर्ष भी श्रीजी की वार्षिक विमान यात्रा भव्य रूप में आचार्य श्री विद्यासागर जी के ससंघ सान्निध्य में प्रातः 6 बजे से निकाली जाएगी। नगर के सभी मंदिरों से श्रीजी के विमान अपने स्थान से प्रारंभ होंगे। श्रीजी की शोभा यात्रा घंटाघर, तुवन चौराहा, वर्णी चौराहा होते हुए क्षेत्रपाल जैन मंदिर पहुँचेगी। आयोजन को लेकर भव्य तैयारी की गई है। पंचकल्याणक के पात्रों का हुआ चयन : आचार्यश्री के सान्निध्य में ब्र. विनय भैया के निर्देशन में 24 नवम्बर से दयोदय गौशाला मसौरा परिसर में होने जा रहे पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव के पात्रों का चयन दोपहर में किया गया । जिसमें सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य विनोद कुमार, देवेंद्र कुमार, मुकेश, राकेश, सुनील कामरा परिवार को प्राप्त हुआ। कुबेर बनने का सौभाग्य ज्ञानचंद्र, संतोष कुमार, सुनील कुमार समस्त इमलिया परिवार को मिलेगा। महायज्ञनायक सेठ शिखरचंद्र , सुभाष, सुरेन्द्र , लोकेश कुमार सराफ किसलवास परिवार व राजा श्रेयांस वीरचन्द्र , विपिन कुमार सराफ न्यू नूतन ज्वेलर्स परिवार को प्राप्त हुआ। मूलनायक मुनिसुव्रतनाथ की प्रतिमा पहुँची क्षेत्रपाल मंदिर : गौ शाला में नव निर्मित मंदिर में प्रतिष्ठित होकर विराजमान होने वाली मूलनायक मुनिसुव्रतनाथ की प्रतिमा आज क्षेत्रपाल मंदिर पहुँची, जहां भगवान को निहारने, दर्शन के लिये भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। प्रतिमा की प्रतिष्ठा पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में होगी।
  13. 2 points
    धन्य हो गई आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ के आगमन से लालित्य नगरी आचार्यश्री के पदविहार में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, ऐतिहासिक रूप में हुआ नगर प्रवेश पगडण्डी कहाँ चली गयी जो पहले थी : आचार्य श्री विद्यासागर जी बुंदेलखंडी 'हओ' पर श्रद्धालुओं को खूब गुदगुदाया आचार्यश्री ने कई किलोमीटर की लंबाई थी अगुवानी के जनसैलाव की ललितपुर। जिस घड़ी का इंतजार ललितपुर वासियों को तीन दशक से अधिक समय से था वह इंतजार 21 नवम्बर को पूरा हो गया जब साधना के सुमेरु भारतीय संस्कृति के संवाहक संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज अपने विशाल संघ के साथ ललितपुर नगर में प्रवेश किया। आचार्यश्री का पदविहार वांसी से ललितपुर की ओर प्रातःकाल 6 बजे शुरू हुआ।जैसे ही लोंगो ने आचार्य श्रेष्ठ के नगर आगमन की सुनी तो खुशियों का ठिकाना नहीं रहा।कोई पैदल तो कोई गाडी से पदविहार में सम्मिलित होने के लिए पहुंचा। इतनी सुबह सुबह भारी जनसैलाव उमड़ा देख रास्ते में पड़ने वाले गांवों के लोग भी उमड़ पड़े और आचार्यश्री की एक झलक पाने को लालायित देखे गए। जन सैलाव इतना था कि पुलिस प्रशासन लोगों से दूर से ही दर्शन करने की अपील कर रहे थे। बांसी से (ललितपुर से दूरी 20 किलोमीटर) ही हजारों की संख्या में बिना जूते-चप्पल के श्रद्धालु चल रहे थे। जैसे-जैसे आचार्यश्री के पग आगे बढ़ रहे थे श्रद्धालुओं का जन सैलाव बढ़ता ही जा रहा था। हाइवे पर दूर-दूर तक अपार भीड़ ही भीड़ दिख रही थी। आलम यह था कि रोड की दूसरी ओर चलने वाले वाहनों को भी रुक-रुक चलना पड़ रहा था। इस दौरान आगे-पीछे और बीच में बड़ी संख्या में पुलिस प्रशासन व्यवस्था को सुचारू करने में लगे थे। आचार्यश्री के आगे आगे बैंड बाजे चल रहे थे इसके बाद पचरंगा झंडे लेकर कार्यकर्ता चल रहे थे इसके बाद पुलिस के पदाधिकारी चल रहे थे जो आचार्यश्री के दर्शन लोगों से दूर से करने की अपील कर रहे थे ताकि पद विहार में बाधा उत्पन्न न हो। इसके बाद आचार्यश्री संघ सहित चल रहे थे पश्चात उनसे कुछ दूरी पर जन सैलाब चल रहा था। नगर में पूर्व से विराजमान मुनि श्री अविचल सागर जी ने नदनवारा पहुँचकर आचार्यश्री के चरणों में नमोस्तु पूर्वक नमन किया। रास्ते में रंग-बिरंगे गुब्बारे आकाश में छोड़े जा रहे थे। आचार्यश्री पदविहार करते हुए महर्रा ग्राम स्थित आदिनाथ कालेज प्रांगण में पहुंचे जहाँ पर मुख्य द्वार पर कालेज प्रबन्धन ने आचार्यश्री का वंदन किया। इसके पूर्व जैन पंचायत समिति और पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव समिति के पदाधिकारियों ने आचार्यश्री के चरणों में श्रीफ़ल समर्पित कर आरती की। आदिनाथ कॉलेज में सबसे पहले आचार्यश्री की पूजन भक्ति भाव से की गई। इस अवसर पर उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि हमारी एक चीज गुम गयी है। मैं आ रहा था, आप लोग भी आ रहे थे। मैं पूछना चाहता हूं कि क्या वह चीज आप लोगों को मिल गयी? इस पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने कहा 'हओ'। इस पर चुटकी लेते हुए आचार्यश्री ने कहा कि ललितपुर में भी 'हव' चलता कि नहीं। इस पर जन समुदाय ने कहा 'हओ'। उन्होंने कहा कि जो मतलब आप लोग समझ रहे हैं वह नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि मैं सोच रहा था कि भूल गए हैं आप लोग। उन्होंने कहा कि अब पगडण्डी जीवित है कि नहीं। अब शायद पगडण्डी जीवित नहीं रह पाएगी क्योंकि पगडंडियों पर चलाना तो चाहते हैं लेकिन चलना नहीं चाहते। अंत में उन्होंने कहा कि वाहनों पर लिखा रहता है 'फिरमिलेंगे'। संचालन संघस्थ ब्र. सुनील भैया जी ने किया। एसडीएम सदर घनश्याम वर्मा ने महर्रा पहुँचकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया और अधिकारियों को समुचित दिशा निर्देश दिए। आचार्यश्री की आहारचर्या महर्रा स्थित आदिनाथ कॉलेज परिसर में हुई। सामायिक के बाद महर्रा से ललितपुर नगर की ओर विहार हुआ जिसमें पूरा नगर उमड़ पड़ा। आज ललितपुर के इतिहास में एक नया इतिहास जुड़ गया। लोग कह रहे थे उन्होंने आज तक किसी संत के नगर आगमन पर इतना जनसैलाव उमड़ते नहीं देखा है। प्रवेश के दौरान पूरे रास्ते में पड़ने वाले व्यापारिक प्रतिष्ठानों के मालिकों द्वारा अपने द्वार पर स्वयं सजावट और स्वागत की गई थी। आचार्यश्री के नगर में प्रवेश करते ही ऐसा लग रहा था जैसे पूरा शहर थम गया हो, एकमात्र आचार्यश्री के दर्शनों को लाखों आँखे निहार रही थी। सभी समुदाय के लोग आचार्यश्री को नमन कर रहे थे और स्वागत वंदन के लिए खड़े हुए थे। नगर प्रवेश का दृश्य अपने आप में देखने योग्य था। पुलिस अधीक्षक ओपी सिंह , अपर पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में सुरक्षा व्यवस्था में लगे हुए पुलिस अधिकारी और सिपाही बड़े ही आनंद के साथ आचार्यश्री के आगे और पीछे दौड़ते भागते चल रहे थे। प्रशासन की ओर से सुरक्षा के समुचित प्रबंध किए गए थे। पंचायत समिति ने नगर की सीमा चंदेरा पर भव्य अगुवानी की। इसके बाद विशाल जनसैलाब गल्लामंडी, इलाइट चौराहा, जेल चौराहा, तुवन चौराहा होते हुए विशाल शोभायात्रा स्टेशन रोड स्थित क्षेत्रपाल मंदिरजी पहुँची। रास्ते में लोगों ने श्रद्धालुओं को जल, मिठाई, फल देकर उनका खूब स्वागत किया। रास्ते में जहॉ नवयुवक करतब दिखाते हुए चल रहे थे वहीं अनेक बग्गियां, घोड़े पर ध्वज लेकर चल रहे थे। विभिन्न स्वयंसेवी संगठन अपनी सेवाएं दे रहे थे। जिसने भी आज का यह नजारा देखा कह उठा अद्भुत, अकल्पनीय, ऐतिहासिक, भूतो न भविष्यति। नगर में जब जुलूस चल रहा था तो जिसको जहॉ जगह मिली वहॉ से इन अमूल्य पलों को देखने को आतुर थे। ऐसी कोई छत नहीं थी जिस पर बड़ी संख्या में नगरवासी न हो। कई लोग जब जगह नहीं मिली तो अन्य साधनों पर चढ़कर देख रहे थे। अनेक लोग तो वृक्षों पर चढ़कर इन पलों के साक्षी बन रहे थे। सचमुच अद्भुत नजारा। शब्द ही नहीं है आज के इस भव्यता से पूर्ण मंगल प्रवेश के वर्णन के लिए। क्षेत्रपाल मंदिर पहुँचने पर आचार्यश्री की भव्य अगुवानी की गई । इस दौरान तैयार विशेष मंच से जब आचार्यश्री संघ सहित चल रहे थे वह दृश्य अपने आपमें देखने योग्य, ऐतिहासिक और दर्शनीय था। चारों ओर से इस दौरान आवाज आचार्यश्री नमोस्तु की आवाज गुंजायमान हो रही थी। यह पल सभी अपने मोबाइल में भी कैद कर रहे थे। बैरिकेट लगे होने के बाद भी उसके अंदर पुलिस प्रशासन और स्वयंसेवी संगठनों के कार्यकर्ताओं को हाथ से हाथ पकड़कर सुरक्षा जंजीर बनानी पड़ी। मैं भी इस व्यवस्था में शामिल होकर इन अद्भुत नजरों को करीब से देखकर पुलकित हो रहा था। आज नगर वासियों की भक्ति देख सचमुच लग रहा था कि नगर में चलते-फिरते भगवान आये हैं। अनेक हमारे जैनेतर भाई कह भी रहे थे ये तो धरती के देवता हैं। इनका दर्शन आखिर कौन नहीं करना चाहेगा। नगर में उत्सव जैसा माहौल था। पाठशाला के बच्चे आचार्यश्री के अभियान हथकरघा, इंडिया नहीं भारत बोलो आदि की तख्तियां लेकर चल रहे थे। कई किलो मीटर की लंबाई में अगुवानी जुलूस देखने योग्य था। आचार्यश्री के नगर आगमन पर स्वागत के लिये पूरा शहर सजाया गया था। सड़क के ऊपर किनारों में झिलमिल चमकनी तो नीचे रंगोली बनाई गई थी। अनेक स्वागत द्वार बनाये गए थे। शहर के लोग धरती के देवता को अपने बीच पाकर धन्य हो रहे थे। जयकारों से आकाश गुंजायमान हो रहा था। विभिन्न परिधानों में महिलाएं स्वागत के लिए खड़ी थी।उल्लेखनीय है कि जहां बतौर राज्य अतिथि उनका प्रथम नगर बार नगर आगमन हो रहा था तो वहीं वह 31 वर्ष बाद नगर में आ रहे थे। उधर जैन शिक्षक सामाजिक समूह के सदस्यों ने आचार्यश्री के नगर आगमन की ख़ुशी में जिला अस्पताल में फल वितरण किया। नगर सजाने में वीर क्लब का योगदान रहा। इस अवसर पर राज्यसभा सासंद चंद्रपाल यादव, विधायक रामरतन कुशवाहा, सपा जिलाध्यक्ष ज्योति कल्पनीत, नगर पालिका अध्यक्षा रजनी साहू आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। नगर पालिका के पार्षदगण उपस्थित रहे। गोलाकोट, खनियाधाना से बड़ी संख्या में लोग बसों से आये हुए थे साथ ही में गुरुकुल के बच्चे गुरुवर गोलाकोट चलो की तख्तियां लेकर चल रहे थे। इस दौरान ललितपुर के साथ ही बार, बांसी, कैलगुवा, गदयाना, महरौनी, मड़ावरा, पाली, तालबेहट, बबीना,जखौरा, बिरधा, टीकमगढ़, सागर, शिवपुरी, झाँसी, ग्वालियर,बीना, खिमलासा, दिल्ली, दमोह, ग्वालियर, छतरपुर, बरुआसागर आदि अनेक स्थानों के बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल रहे। नगर के सभी पत्रकार बंधु भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। जैन पंचायत समिति , पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव समिति, नगर की सभी स्वयंसेवी संस्थाओं, उप समितियों का योगदान उल्लेखनीय रहा। आचार्यश्री के देश-विदेश में लाखों की संख्या में भक्तों को देखते हुए इस भव्य मंगल प्रवेश का जिनवाणी चैनल पर लाइव प्रसारण भी किया गया, जिसे देश -विदेश में देखा देखा गया। उल्लेखनीय है कि आचार्यश्री के सान्निध्य में मसौरा स्थित दयोदय गौशाला परिसर में श्री मज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव 24 नवम्बर से 30 नवंबर तक बड़े ही उत्साह से होने जा रहा है। अनियत विहारी का विहार : आचार्य विद्यासागर जी महाराज कभी किसी को बता के विहार नहीं करते इसलिए उनके आगे अनियत विहारी संत लिखा जाता है। ललितपुर नगर प्रवेश को लेकर यह देखने भी मिला है। नगरवासी 22 नवम्बर को उनके नगर प्रवेश की पूर्ण संभावना मानकर चल रहे थे। 22 नवम्बर के हिसाब से ही लोग तैयारी में जुटे थे। बाहर से आने वाले इष्ट मित्र, रिश्तेदारों को भी यही सूचना दी गयी थी। लेकिन अचानक ही 21 तारीख को आचार्यश्री का मङ्गल पदार्पण नगर में हो गया। आज जब इतना जनसैलाव उमड़ पड़ा था यदि निर्धारित तिथि 22 नबम्बर को प्रवेश होता तो न जाने कितना जनसैलाव उमड़ता। जिलाधिकारी, एसपी पहुँचे आशीर्वाद लेने : शाम को क्षेत्रपाल मंदिर पहुंच कर जिलाधिकारी श्री मानवेन्द्र सिंह, पुलिस अधीक्षक श्री ओपी सिंह, अपर पुलिस अधीक्षक श्री अवधेश विजेता ने आचार्य श्री विद्या सागर जी मुनिराज के दर्शन कर आशीर्वाद लिया और नगर आगमन पर उनको वंदन करते हुए नगरवासियों का सौभाग्य बताया। -डॉ. सुनील जैन संचय,ललितपुर मीडिया प्रभारी
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    *🇮🇳भारत बोलो आंदोलन🇮🇳* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻 *‼आहारचर्या‼* *मुंगावली* _दिनाँक :१२/१२/१८ *आगम की पर्याय महाश्रमण युगशिरोमणि १०८ आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज* को आहार दान का सौभाग्य *ब्र. सुषमा दीदी जी,(जबलपुर प्रतिभास्थली)श्रीमान ऋषभ जी,शंशाक,गोलू जी सिंघई परिवार मुंगावली उनके परिवार वालो* को प्राप्त हुआ है।_ इनके पूण्य की अनुमोदना करते है। 💐🌸💐🌸 *भक्त के घर भगवान आ गये* *_सूचना प्रदाता-:श्री रीतेश जैन मिडला_* 🌷🌷🌷 *अंकुश जैन बहेरिया *प्रशांत जैन सानोधा
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    गुरुजी ने कल जो लीला दिखलाई उसे देखकर मेरा मन प्रफुल्लित हो उठा और उठी कलम✒ लिख डाली कुछ पंक्तियां।। *डॉ ० विद्या मैडम🖊 (इटारसी)* आज पुनः रामायण दुहराई, बिन मांगे नाव🛶 शरण में आई, चौदह 💰करोड़💵 का लालच छोडा , हुआ अहिंसक 🐄मन को मोड़ा, राम ने अहिल्या 🛶उपल की कीनी, तुमने 🙏नाव अहिंसक किनी।। दोहा:- देवगढ़ में चरण👣 पखारे आपके फिर बैठाया 🛶नाव, नदी 🚤नाव संयोग है आए मुंगावली गांव।। लेखिका:- डॉ ० *विद्या जैन* (रेट. प्रोफेसर) इटारसी(म. प्र) *निवेदन* :- 🙏यह कविता *मुंगावली जैन समाज* के लिए है एवम् अगर आप चाहे तो यह बात गुरुजी तक पहुंचाए।। यह कविता में संशोधन करके गुरु के प्रति मेरी भावना को ठेस न पहुचाएं।।
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    Namostu Namostu Namostu gurudev ji
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    Namostu Bhagvan🙏🙏🙏
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    नमोस्तु भगवन नमोस्तु ***जैनम जयतु शासनम्*** ***वंदे विद्या सागरम्*** 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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    जय हो, बड़े पुण्य से अवसर आता है ऐसे स्वर्णिम दृश्यों के साक्षी बनने का। कितने बड़े बड़े कार्य गुरुजी त्वरित कर देते हैं। पहले से कोई प्रोपेगेंडा नही करते। पूज्य आचार्य भगवन के चरणों में बारंबार नमोस्तु।
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    GURUVAR ke pavitra charno me mere aur mere parivar ke aur se koti koti namostu namostu namostu kya guruvar charno ko sparsh karne ka adhikar dete aur ashiwarvad dete hai kya
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    "एक साधक ने अपने लक्ष्य के अनुकूल पुरुषार्थ कर प्राप्त की कालजयी सफलता।" उन महान साधक की साधना से जुड़े विस्मयकारी प्रसंगों को, जिनसे जिनशासन हुआ गौरवान्वित, उन प्रसंगों को ही इस लेख का विषय बनाया जा रहा है। गुरुवाणी के साथ-साथ विषय की पूर्णता हेतु अन्य स्रोतों से भी विषय वस्तु को ग्रहण किया गया है। आगामी 25 नवम्बर 18 को हैं आचार्य पदारोहण दिवस आचार्य श्री ज्ञानसागर द्वारा मुनिश्री विद्यासागर को आचार्य पद प्रदान करने की घोषणा एवं संस्कार २२ नवम्बर १९७२, माघ शीर्ष कृष्ण द्वितीया, नसीराबाद, राजस्थान आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज का सन् १९७२ में नसीराबाद में चातुर्मास चल रहा था। चातुर्मास के पूर्व जब वह अजमेर में विराजमान थे, तभी से उनका स्वास्थ्य गिरने लगा। चातुर्मास समाप्ति की ओर था। आचार्य महाराज शारीरिक रूप से काफी अस्वस्थ एवं क्षीण हो चुके थे। साइटिका का दर्द कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। दर्द की भयंकर पीड़ा के कारण आचार्य महाराज चलने-फिरने में असमर्थ होते जा रहे थे। आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज का विस्मयकारी निर्णय ऐसी शारीरिक प्रतिकूलता की स्थिति में ज्ञानमूर्ति आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने सल्लेखना व्रत ग्रहण करने का निर्णय लिया। समाधि हेतु आचार्य पद का परित्याग तथा किसी अन्य आचार्य के सान्निध्य में जाने का आगम में विधान है। आचार्य महाराज के लिए इस भयंकर शारीरिक पीड़ा की स्थिति में किसी अन्य आचार्य के पास जाकर समाधि लेना भी संभव नहीं था। अत: उन्होंने स्वयं आचार्य पद का त्याग करके अपने सुयोग्य शिष्य मुनि श्री विद्यासागरजी महाराज को आचार्य पद पर आसीन करने का मानस बनाया। चातुर्मास निष्ठापन के दूसरे ही दिन आचार्य ज्ञानसागरजी ने संघ के समक्ष अपनी इस भावना को रखा। यह बात सुनकर संघ में सभी लोग सन्तुष्ट थे, सिर्फ मुनि श्री विद्यासागरजी को छोड़कर। मुनि श्री विद्यासागरजी की अस्वीकृति जब आचार्य महाराज ने मुनि विद्यासागरजी से आचार्यपद ग्रहण करने हेतु कहा, तब मुनिश्री बोले- "गुरुदेव! आप मुझे मुनि पद में ही साधना करने देंगे तो मुझ पर आपकी महती कृपा होगी।", मुनि विवेकसागरजी महाराज को आचार्य पद देगे तो अच्छा होगा (उस समय विवेकसागरजी महाराज वहाँ पर नहीं थे, उनका चातुर्मास कुचामन सिटी में था) अथवा क्षुल्लक श्री विजयसागरजी महाराज को मुनि दीक्षा देकर उन्हें आचार्यपद दे दीजिए। पद त्याग नहीं तो समाधि कैसे... जब मुनि श्री विद्यासागरजी ने मुनि पद पर रहते हुए अपनी साधना करने की भावना एवं आचार्य पद के प्रति अपनी निरीहता प्रकट कर दी तो आचार्य महाराज के सामने यह समस्या खड़ी हो गई कि अब मैं समाधि के लिए कहाँ जाऊँ...? मुनि श्री विद्यासागर जी ने दी गुरुदक्षिणा अनेक मूर्धन्य विद्वान ज्ञानार्जन एवं दर्शनार्थ उनके पास आते रहते थे। एक दिन आचार्य महाराज ने छगनलाल पाटनी, अजमेर वालों से कहा-"छगन जी! मेरी समाधि बिगड़ जाएगी।" पाटनी जी - "महाराज! ऐसा क्यों ?" ज्ञानसागरजी महाराज - "मुनि विद्यासागर आचार्य पद लेने से इंकार कर रहा है।" पाटनी जी - "आचार्य पद उनको लेना पड़ेगा। वो इंकार नहीं कर सकते।" महाराज - "वो तो साफ इनकार कर रहा है।" तब फिर छगनलाल पाटनी, ताराचंद जी गंगवाल व माधोलाल जी गदिया बीरवाले जहाँ मुनि विद्यासागरजी महाराज नसिया में ऊपर सामायिक कर रहे थे, वहाँ पहुँच गये। छगनलालजी ने महाराज से निवेदन किया - "महाराज श्री! क्या गुरु की समाधि बिगाड़नी है जो कि आप आचार्य पद नहीं ले रहे हैं।" मुनि विद्यासागरजी बोले - "मैं परिग्रह में नहीं फँसना चाहता, यह मेरे ऊपर बहुत भारी बोझ आ जाएगा।" उसी समय शान्तिलाल पाटनी, नसीराबाद वाले भी वहाँ पहुँचे और उन्होंने मुनि श्री विद्यासागर जी से कहा -"आपको यह पद स्वीकार करने में क्या तकलीफ है ?" तब मुनि श्री बोले -"मुझे विनाशीक पद नहीं चाहिये अविनाशी पद चाहिये |" छगनलाल पाटनी पुनः बोले - "आप गुरु को गुरु दक्षिणा में क्या दोगे ? क्योंकि आपके पास और कोई परिग्रह है ही नहीं, जो आप अपने गुरु को गुरु दक्षिणा में दे सको।" महाराजश्री कुछ देर मौन रहकर बोले - "चलो, गुरु की समाधि तो बिगड़ने नहीं दूँगा, चाहे मेरे ऊपर कितनी भी विपत्तियाँ आवें उनको मैं सहर्ष सह लूगा।" फिर मुनिश्री विद्यासागर जी ने आचार्य महाराज के पास आकर निवेदन किया, "हे गुरुदेव! मेरे लिए आज्ञा प्रदान कीजिए।" आचार्य महाराज ने उन्हें अपने कर्तव्य, गुरु सेवा और आगम की आज्ञा का स्मरण कराया और कहा कि - "गुरु दक्षिणा तो आपको देनी ही होगी।" इतना सुनते ही मुनिश्री अपने भावों को रोक न सके और एक बालक की भाँति विचलित हो उठे। शिष्य पर गुरु संग्रह, अनुग्रह आदि के माध्यम से कई प्रकार के उपकार करते हैं, पर शिष्य का गुरु पर क्या उपकार है ? गुरु के अनुकूल वृत्ति करके गुरु पर शिष्य उपकार कर सकता है। ऐसा विचार कर मुनि श्री विद्यासागर गुरु चरणों में नतमस्तक हो गए। तब इच्छा नहीं होते हुए भी दस दिनों के लम्बे अंतराल के पश्चात् उनको अपने ही दीक्षा-शिक्षा गुरु महाराज को आचार्य पद ग्रहण करने की "मौन स्वीकृति देकर गुरु दक्षिणा समर्पित करनी ही पड़ी।" मौन स्वीकृति मिलने पर आचार्य महाराज अत्यन्त आह्वादित हुए और उन्होंने तत्काल ही मुहूर्त देखने का संकेत किया। आचार्य पदारोहण मुहूर्त निर्धारण उसी समय वहाँ अन्य संघस्थ एक क्षुल्लक पद्मसागरजी महाराज विराजमान थे, जो ज्योतिष के बड़े विद्वान थे। उनसे आचार्य पद का मुहूर्त निकलवाया। क्षुल्लक जी मुहूर्त देखकर बोले - "मैंने मेरी जिंदगी में ऐसा बढ़िया मुहूर्त नहीं देखा, जो आचार्य पद दीक्षा लेने वाले के लिए और देने वाले के लिए निकला हो। बहुत ही उत्तम मुहूर्त है।" वह दिन था मगसिर कृष्ण दोज, वीर निर्वाण संवत् २४९९, विक्रम संवत् २०२९, दिनांक २२ नवम्बर १९७२, स्थान-श्री दिगम्बर जैन नसिया जी मंदिर, नसीराबाद, जिलाअजमेर, समय- प्रात: काल लगभग ९ बजे का। आचार्य श्री ज्ञानसागर जी का आचार्यपद से अंतिम प्रवचन जैसे कोई श्रावक (पिता) जब तक अपनी योग्य कन्या का विवाह समय पर नहीं कर देता तब तक उसे चैन नहीं रहता। उसी प्रकार आचार्य श्री ज्ञानसागरजी को पद देने से पूर्व तक चैन नहीं रहा, अत: उन्होंने उचित समय पर कन्यादान के समान अपने पद का दान किया और सब कुछ त्याग कर, समाधि जो मुख्य लक्ष्य था, उसकी ओर बढ़ गए। विशाल जनसमूह इस विस्मयकारी उत्सव को देखने के लिए उपस्थित था। आचार्य आसन पर आचार्य श्री ज्ञानसागरजी विराजमान हैं। उनके पास ही मुनि आसन पर श्रमण विद्यासागरजी विराजमान हैं। उस दिन मुनि श्री विद्यासागर जी ने उपवास किया था। आचार्य पद से आचार्यश्री ज्ञानसागरजी ने अंतिम उपदेश दिया, उन्होंने बहुत ही मार्मिक शब्दों में कहा - "यह नश्वर शरीर धीरे-धीरे गिरता जा रहा है और मैं अब इस पद का मोह छोड़ कर आत्म-कल्याण में पूर्णरूपेण लगना चाहता हूँ। जैनागम के अनुसार यह करना अत्यन्त आवश्यक और उचित भी है।" आचार्य पद त्याग प्रवचन के पश्चात् जैसे ही मुहूर्त का समय हुआ, वैसे ही आचार्य श्री ज्ञानसागरजी अपने आचार्य आसन से उठे और मुनि आसन पर विराजमान मुनि श्री विद्यासागर को उठाकर अपने आचार्य आसन पर बिठाया। वे स्वयं मुनि आसन पर विराजमान हो गए। तत्पश्चात् उन्होंने आगमानुसार भक्तिपाठ आदि करते हुए, मुनि श्री विद्यासागर जी के ऊपर आचार्य पद के संस्कार किए। संस्कार करने के बाद आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने अपनी आचार्य पिच्छी मुनि श्री विद्यासागर जी को प्रदान की। स्वयं अपने मुनि आसन से नीचे उतरे और नवोदित आचार्य श्री विद्यासागर को त्रयभक्ति पूर्वक नमोस्तु किया। आचार्य श्री विद्यासागर जी ने अत्यन्त विनम्र भाव से नग्रीभूत होकर मुनि श्री ज्ञानसागर जी को प्रति नमोस्तु निवेदित किया। उसी समय मुनिश्री ज्ञानसागर जी ने नवोदित आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की तीन प्रदक्षिणा लगाई। यह दृश्य देखने लायक था। उसके बाद आचार्य श्री विद्यासागर जी का आचार्य पद से प्रथम प्रवचन हुआ उन्होंने एकत्व विभक्त के ऊपर बहुत अच्छा प्रवचन दिया। आचार्य आसन पर किया प्रतिष्ठित आचार्य पद प्राप्त करने के पश्चात् आचार्य विद्यासागरजी अपने पूर्व स्थान पर बैठने लगे, तो मुनि श्री ज्ञानसागरजी आचार्य आसन की ओर संकेत करते हुए बोले "विद्यासागरजी ! क्या आचार्य आसन रिक्त रहेगा ? मैं अपना पद परित्याग कर चुका हूँ, आप यथास्थान बैठिएगा।" इस प्रकार उन्होंने विद्यासागरजी को आचार्य आसन पर बैठाया और स्वयं विद्यासागरजी के स्थान पर जाकर बैठ गए। ....और वे गदगद हो गए मुनि आसन पर बैठकर आचार्य महाराज (मुनिश्री ज्ञानसागर जी) गदगद हो गए। उनके चेहरे पर मुस्कान थी, क्योंकि वे आत्मसंस्कार के साथ सल्लेखना काल को स्वीकार कर रहे थे। उसके लिए वे निश्चिन्त हो गए थे। उन्हें हँसते हुए देख हम भी कुछ सोचकर हँसने लगे, तब गुरु महाराज ने मुझसे पूछा-"आप क्यों हँस रहे हैं ?" हमने कहा "जैसे आपने हँसते-हँसते आचार्य पद का त्याग किया है, वैसे ही मैं भी एक दिन हँसते हॅसते इस आचार्य पद का त्याग करूंगा, और ऐसे ही विकल्प रहित, उत्साह पूर्वक जीवन का उपसंहार करूंगा, यह विचार कर हँस रहा हूँ।" नवोदित आचार्य को बनाया अपना नियपिकाचार्य आचार्य श्री विद्यासागर जी गंभीर मुद्रा में आचार्य आसन में विराजमान थे। उनके हृदय में तरंगित भावनाओं को अभिव्यक्त करना कल्पनातिरेक होगा। कुछ क्षण पश्चात् मुनि श्री ज्ञानसागर जी उठे और आचार्य श्री विद्यासागरजी को नमन करते हुए बोले- "हे आचार्यश्री! मैं आपके आचार्यत्व में सल्लेखना लेना चाहता हूँ मुझे समाधिमरण की अनुमति प्रदान कीजिए।" मैं आपको निर्यापकाचार्य के रूप में स्वीकार करता हूँ। आप मुझे अपना क्षपक बना लीजिए। मुनि श्री ज्ञानसागर जी द्वारा समाधिमरण की भावना व्यक्त करने पर उपस्थित विद्वानों, श्रेष्ठी, साधकों एवं श्रावकों की आँखें अश्रुपूरित हो उठीं। गुरु की वाणी सुनकर आचार्य श्री विद्यासागरजी विस्मित थे, उनका हृदय करुणा से विगलित हो उठा। इस तरह २२ नवम्बर, १९७२ को नसीराबाद स्थित सेठ जी की नसिया में प्रात:काल ९ बजे बड़ी शालीनता और विनम्रता से गुरु ने शिष्य को आचार्य पद प्रदान किया। ८२ वर्षीय गुरुदेव आचार्य ज्ञानसागर ने २६ वर्षीय अपने सुयोग्य शिष्य को आचार्य पद एवं निर्यापकाचार्य का दायित्व सौंपा ॥ यह सब देखकर जन समूह स्तब्ध रह गया। उन्होंने अपने जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था। नवोदित आचार्य श्री विद्यासागरजी उस दिन से लेकर फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तक अर्थात् चार माह तक मात्र दूध, गेहूँ और जल ये तीन चीजें ही आहार में ग्रहण करते थे। कथनी-करनी में एकरूपता कार्यक्रम समापन के पश्चात् सर सेठ भागचंद्र जी सोनी, अजमेर (राजस्थान) ने लौटते समय आचार्य ज्ञानसागरजी से अजमेर पधारने की प्रार्थना की, तो गुरुवर मुस्कराने लगे। उनकी भक्ति और भोलेपन पर। और बोले - "भागचंद्रजी ! आप किससे अनुरोध कर रहे हैं। मैं अब संघ में मुनि हूँ, आचार्य नहीं। आप आचार्य विद्यासागरजी से चर्चा कीजिए।" मान मर्दन का अनूठा उदाहरण आचार्य पदारोहण देखने के बाद छगनलाल पाटनी जब अजमेर आए, तब अजमेर नसिया में विराजमान आर्यिका श्री विशुद्धमति माता जी ने श्रावक श्रेष्ठी पाटनी जी से आचार्य पद त्याग का आँखों देखा प्रसंग सुना। तब माता जी बोलीं - "ऐसा रिकॉर्ड हजारों वर्षों में नहीं मिलता, जो अपने शिष्य को आचार्य बनाकर स्वयं शिष्य बन जाए। इतना मान मर्दन करना बहुत ही कठिन है, जो कि अपने शिष्य को नमस्कार करे। धन्य हैं महाराज ज्ञानसागरजी।" दायित्व सौंपने की अनूठी कला काल का क्रम कभी रुकता नहीं। वह निरंतर प्रवाहमान है। चतुर्दशी का पावन पर्व आया। पूरे संघ ने उपवास के साथ पाक्षिक प्रतिक्रमण किया। प्रतिक्रमण के बाद आचार्य भक्ति करके नवोदित आचार्य की चरण वंदना की गई। यह दृश्य आश्चर्यकारी होने के साथ ही आनन्ददायक भी था। क्षपक मुनि श्री ज्ञानसागरजी ने अपने स्थान से उठकर आचार्य श्री विद्यासागरजी के चरणों में अपना मस्तक रख दिया। दोनों हाथों से नियपिकाचार्य जी के दोनों चरण कमलों को तीन बार स्पर्श किया और नवोदित आचार्य के चरण स्पर्श से पवित्रित अपने दोनों हाथों को प्रत्येक बार अपने सिर पर लगाते रहे। फिर आचार्य गुरुदेव के सामने नीचे धरती पर बैठकर गवासन की मुद्रा में प्रायश्चित हेतु प्रार्थना की। संस्कृत भाषा में ही प्राय: गुरु शिष्य की बातें होती थीं। वह बोले - "भी गुरुदेव! अस्मिन् पक्षे मम अष्टाविंशति - मूलगुणेषु.मा प्रायश्चितं दत्त्वा शुद्धि कुरुकुरु।" इस प्रकार प्रायश्चित का निवेदन करते हुए उन्होंने निर्यापकाचार्य श्री विद्यासागरजी के दोनों हाथ पकड़कर अपने सिर पर रख लिये, आचार्य विद्यासागर मौन मध्यस्थ बने रहे। संघस्थ साधु मुनि श्री विवेकसागरजी महाराज कुचामन सिटी, राजस्थान से चातुर्मास वर्षायोग सम्पन्न करके विहार करते हुए अपने दीक्षा गुरु क्षपक श्री ज्ञानसागरजी एवं नवोदित आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के दर्शनार्थ नसीराबाद, अजमेर, राजस्थान पधारे थे। वह भी अपने स्थान से उठकर खड़े हुए और दोनों गुरुओं के श्रीचरणों में बैठकर विनयपूर्वक नमोऽस्तु निवेदन किया। उन्होंने भी अपने दीक्षा गुरु ज्ञानसागरजी का अनुकरण करते हुए पहले आचार्य विद्यासागरजी का चरणवंदन किया। पश्चात् स्वगुरु ज्ञानसागरजी के चरणों का वंदन किया। फिर हिन्दी भाषा में ही अपने गुरु से प्रायश्चित का निवेदन किया कि दीक्षा के बाद से अब तक जो भी अट्ठाईस मूलगुणों में दोष लगे हों, आप प्रायश्चित देकर मुझे शुद्ध करने की कृपा करें। तब क्षपक श्री ज्ञानसागरजी ने अपने ही द्वारा दीक्षित शिष्य मुनि विवेकसागरजी से कहा - "मैंने भी आपके सामने ही इन्हीं आचार्य महाराज से प्रायश्चित देने हेतु प्रार्थना की है। अब आप भी इन्हीं से निवेदन कीजिये।" तब श्री विवेकसागरजी महाराज ने नवोदित आचार्य महाराज से विनयपूर्वक निवेदन किया कि मुझे भी प्रायश्चित प्रदान करने की अनुकम्पा करें। ऐसा निवेदन करने पर आचार्य श्री ने पहले क्षपक श्री ज्ञानसागरजी को पाक्षिक प्रतिक्रमण के प्रायश्चित के रूप में ११ मालाएँ जपने का और श्री विवेकसागरजी को पाँच उपवास और ५१ मालाएँ जपने का प्रायश्चित सबके सामने दिया। फिर संघ के ऐलक जी, क्षुल्लक जी आदि अन्य त्यागीगण ने भी पाक्षिक प्रायश्चित नवोदित आचार्य महाराज से ग्रहण किया। सबको सात सात मालाएँ जपने का प्रायश्चित मिला। उपसंहार गुरु जी के बारे में सुनाना औपचारिकता जैसा लगता है। गुरु के बारे में कहना है तो उसका कोई अंत है ही नहीं। वह अनंत को कहना है। उनके विषय में कैसे स्तुति मैं कर सकता हूँ परन्तु कहने से आस्था बलवती हो जाती है। चाँद को देखूँ परिवार से घिरा सूर्य संत सा। रात को चाँद अकेला नहीं रहता, तारामंडल उसके चारों ओर बिखरा हुआ रहता है। ताराओं में चंद्रमा को ताराचंद भी कहते हैं। किन्तु दिन में जब सूर्य को देखते हैं तो वह किसी से भी नहीं घिरा रहता है। सूर्य के सिवाय और कोई परिग्रह से, परिवार से रहित नजर नहीं आता। इसी तरह गुरुजी को मैं सूर्य की तरह मानता हूँ, पर आपको चंद्रमा पसंद है इसलिए गुरुजी को चंद्रमा कहता हूँ। यदि सूर्य धरती को न तपाये अपने तेज से, तो वर्षा प्रारंभ नहीं होती। सूर्य नारायण की बदौलत हम सब आज खा-पी रहे हैं। सूर्य की तरह गुरुजी ने यदि हमको न तपाया होता, तो आज तक हम ठण्डे पड़ जाते। मन का काम नहीं करना। मन से काम करोगे, तो उनको और हमको भी समझ पाओगे। आज के दिन एक उच्च साधक ने अपने जीवन की अंतिम दशा में अपनी यात्रा को पूर्ण करने के लिए पूर्व भूमिका बनाई। "मैं आज के इस दिवस को आचार्य पद त्याग के रूप में स्वीकार करता हूँ, ग्रहण के रूप में नहीं।" आचार्य पद कार्य करने की अपेक्षा से महत्वपूर्ण होता है, आसन पर बैठने की अपेक्षा से नहीं। "गुरु महाराज ने आज आचार्यपद त्याग किया था, यह महत्वपूर्ण है। पद ग्रहण करना महत्वपूर्ण नहीं, क्योंकि ग्रहण करना हमारा स्वभाव नहीं त्याग करना हमारा स्वभाव है।" आचार्य पदारोहण दिवस पर आचार्य श्री के प्रवचन - मेरा लक्ष्य तो मेरे गुरु का अनुकरण करना है। ये तो सब व्यवहार के पद हैं। गुरु और शिष्य आगे पीछे दोनों में अंतर कहाँ
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