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  1. संयम स्वर्ण महोत्सव

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  3. Dhruv

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  4. राजेश जैन भिलाई

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    बुन्देलखंड में आचार्य महाराज का यह पहला चातुर्मास था। एक दिन रात्रि के अँधेरे में कहीं से बिच्छू आ गया और उसने एक बहिन को काट लिया। पंडित जगन्मोहनलाल जी वहीं थे। उन्होंने उस बहिन की पीड़ा देखकर सोचा कि बिस्तर बिछाकर लिटा दूँ, सो जैसे ही बिस्तर खोला उसमें से एक सर्प निकल आया। उसे जैसे-तैसे भगाया गया। दूसरे दिन पंडित जी ने आचार्य महाराज को सारी घटना सुनाई और कहा कि महाराज! यहाँ तो चातुर्मास में आपको बड़ी बाधा आएगी। पंडित जी की बात सुनकर आचार्य महाराज हँसने लगे। बड़ी उन्मुक्त हँसी होती है महाराज की। हँसकर बोले कि-‘पंडित जी, यहाँ हमारे समीप भी कल दो-तीन सर्प खेल रहे थे। यह तो जंगल है। जीव-जन्तु तो जंगल में ही रहते हैं। इससे चातुर्मास में क्या बाधा ? वास्तव में, हमें जंगल में ही रहना चाहिए और सदा परीषह सहन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। कर्म-निर्जरा परीषह-जय से ही होती है।' उपसर्ग और परीषह को जीतने के लिए इतनी निर्भयता व तत्परता ही साधुता की सच्ची निशानी है। कुण्डलपुर(१९७६)
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    अब यह बतलाते हैं कि किस जन्म से कौन-सा शरीर होता है। गर्भसम्मूर्छनजमाद्यम् ॥४५॥ अर्थ - गर्भ जन्म तथा सम्मूर्छन जन्म से जो शरीर उत्पन्न होता है, वह औदारिक शरीर है। English - The first (physical body) is of uterine birth or spontaneous generation.
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    सृष्टि का परिवर्तन अनादिकाल से चला आ रहा है, वह कभी रुकता नहीं है। इसमें परिवर्तन किस प्रकार से होता है। इसका वर्णन इस अध्याय में है। 1. भरत-ऐरावत क्षेत्र में सृष्टि का क्या क्रम चलता है? भरत एवं ऐरावत क्षेत्र के आर्यखण्डों में अवसर्पिणी एवं उत्सर्पिणी काल के दो विभाग होते हैं। जिसमें मनुष्यों एवं तिर्यच्चों की आयु, शरीर की ऊँचाई, बुद्धि, वैभव आदि घटते जाते हैं, वह अवसर्पिणी काल कहलाता है एवं जिसमें आयु, शरीर की ऊँचाई, बुद्धि, वैभव आदि बढ़ते जाते हैं वह उत्सर्पिणी काल कहलाता है। 2. एक कल्पकाल कितने वर्षों का होता है? 20 कोड़ाकोड़ी सागर का एक कल्पकाल होता है। जिसमें 10 कोड़ाकोड़ी सागर का अवसर्पिणी काल एवं 10 कोड़ाकोड़ी सागर का उत्सर्पिणी काल होता है। दोनों मिलाकर एक कल्पकाल कहलाता है। (ति.प.4/319) उदाहरण - यह क्रम ट्रेन के अप, डाउन के समान चलता रहता है। जैसे - ट्रेन बॉम्बे से हावड़ा एवं हावड़ा से बॉम्बे आती-जाती है। 3. अवसर्पिणी एवं उत्सर्पिणी के कितने भेद हैं एवं कौन-कौन से हैं? सुषमा–सुषमा काल, सुषमा काल, सुषमा–दुःषमा काल, दुःषमा–सुषमा काल, दुःषमा काल एवं दुःषमा–दुषमा काल। ये छ: भेद अवसर्पिणी काल के हैं। इससे विपरीत उत्सर्पिणी काल के भी छ: भेद हैं। दुषमा-दुःषमा काल, दुःषमा काल, दुःषमा–सुषमा काल, सुषमा–दुःषमा काल, सुषमा काल एवं सुषमा–सुषमा काल। इन्हें दुखमा-सुखमा भी कहते हैं। 4. सुषमा-दु:षमा का क्या अर्थ है? समा काल के विभाग को कहते हैं। सु और दुर उपसर्ग क्रम से अच्छे और बुरे के अर्थ में आते हैं। सु और दुर उपसर्गों को पृथक्-पृथक् समा के साथ जोड़ देने से व्याकरण के नियमानुसारस का ष हो जाता है। अत: सुषमा और दुषमा की सिद्धि होती है। जिनके अर्थ क्रम से अच्छा काल और बुरा काल होता है।(म.पु. 3/19) 5. अवसर्पिणी के प्रथम तीन कालों में एवं उत्सर्पिणी के अन्त के तीन कालों में कौन सी भूमि रहती है एवं उसकी कौन-कौन सी विशेषताएँ हैं? उनमें भोगभूमि रहती है। विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं भोगभूमि के जीवों का आहार तो होता है किन्तु नीहार (मल-मूत्र) नहीं होता। भोग भूमियाँपुरुष 72 कलाओं सहित और स्त्रियाँ 64 गुणों से समन्वित होती है। (वसु,श्रा., 263) यहाँ के मनुष्य अक्षर, गणित, चित्र आदि64 कलाओं में स्वभाव से ही निपुण होते हैं। यहाँ विकलेन्द्रिय एवं असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीव नहीं होते हैं। यहाँ दिन-रात का भेद नहीं होता एवं शीत, गर्मी की वेदना भी नहीं है। यहाँ सुन्दर-सुन्दर नदियाँ, कमलों से भरी वापिकाएँ, रत्नों से भरी पृथ्वी एवं कोमल घास होती है। युगल संतान (बेटा-बेटी) का जन्म होता है एवं इनके जन्म होते ही पिता को छींक आने से एवं माँ को जम्भाई आने से मरण हो जाता है। युगल संतान ही पति-पत्नी के रूप में रहते हैं, जिन्हें वे आपस में आर्य और आर्या कहकर पुकारते हैं। मृत्यु के बाद इनका शरीर कपूरवत उड़ जाता है। यहाँ नपुंसक वेद वाले नहीं होते हैं। मात्र स्त्री तथा पुरुष वेद होते हैं। इन्हें भोगोपभोग सामग्री कल्पवृक्षों से ही मिलती है। यहाँ के मनुष्यों में 9000 हाथियों के बराबर बल पाया जाता है। (ति.प., 4/324-381) यहाँ के मनुष्य एवं तिर्यञ्चों का वज़ऋषभनाराचसंहनन एवं समचतुरस्र संस्थान होता है। सुषमा-सुषमा काल की विशेषताएँ इस काल में सुख ही सुख होता है। यह भोगप्रधान काल है, इसे उत्कृष्ट भोगभूमि का काल कहते हैं। इस काल में जन्मे युगल 21 दिनों में पूर्ण वृद्धि को प्राप्त हो जाते हैं। जिसका क्रम इस प्रकार है। शय्या पर आँगूठा चूसते हुए 3 दिन, उपवेशन (बैठना) 3 दिन, अस्थिर गमन 3 दिन, स्थिर गमन 3 दिन, कलागुण प्राप्ति 3 दिन, तारुण्य 3 दिन और सम्यक्र गुण प्राप्ति की योग्यता 3 दिन। यहाँ के जीव 21 दिन के बाद सम्यग्दर्शन प्राप्त करने की योग्यता प्राप्त कर लेते हैं। तीन दिन के बाद चौथे दिन बेर के बराबर आहार लेते हैं । इस काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 6000 धनुष एवं आयु 3 पल्य की होती है एवं अन्त में घटते-घटते ऊँचाई 4000 धनुष एवं आयु 2 पल्य रह जाती है। यह काल 4 कोड़ाकोड़ी सागर का होता है। इसमें शरीर का वर्ण स्वर्ण (रा.वा.3/29/2) के समान होता है। (ति.प.4/324-398) सुषमा काल की विशेषताएँ प्रथम काल की अपेक्षा सुख में हीनता होती जाती है। इसे मध्यम भोगभूमिका काल कहा जाता है। इस काल में जन्मे युगल 35 दिनों में पूर्ण वृद्धि को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे- प्रथम काल में सात प्रकार की वृद्धियों में 3-3 दिन लगते हैं तो यहाँ 5-5 दिन लगते हैं। 3.2 दिन के बाद तीसरे दिन बहेड़ा के बराबर आहार लेते हैं। इस काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 4000 धनुष एवं आयु 2 पल्य की होती है एवं अन्त में घटते घटते ऊँचाई 2000 धनुष एवं आयु एक पल्य की रह जाती है। यह काल3 कोड़ाकोड़ी सागर का होता है। इसमें शरीर का वर्ण श्वेत रंग के समान रहता है। (तप4/399-406) सुषमा-दुषमा काल की विशेषताएँ द्वितीय काल की अपेक्षा सुख में हीनता होती जाती है। इसे जघन्य भोगभूमिका काल कहते हैं। इस काल में जन्मे युगल 49 दिनों में पूर्ण वृद्धि को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे -द्वितीयकाल में 7 प्रकार की वृद्धियों में 5-5 दिन लगते हैं तो यहाँ 7-7 दिन लगते हैं। 1 दिन के बाद दूसरे दिन आंवले के बराबर आहार लेते हैं। इस काल में प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 2000 धनुष एवं आयु 1 पल्य की होती है एवं अन्त में घटते घटते ऊँचाई 500 धनुष (त्रि.सा.783) एवं आयु 1 पूर्व कोटि की रह जाती है। यह काल 2 कोड़ाकोड़ी सागर का होता है, इसमें शरीर का वर्ण नीले रङ्ग (रा.वा.3/29/2) के समान रहता है। कुछ कम पल्य का आठवां भाग शेष रहने पर कुलकरों का जन्म प्रारम्भ हो जाता है। वे तब भोगभूमि के समापन से आक्रान्त मनुष्यों को जीवन जीने की कला का उपाय बताते हैं। इन्हें मनु भी कहते हैं। अन्तिम कुलकर से प्रथम तीर्थंकर की उत्पति होती है। (ति.प.4/407-516) दु:षमा-सुषमा की विशेषताएँ यह काल अधिक दु:ख एवं अल्प सुख वाला है तथा इस काल के प्रारम्भ से ही कर्मभूमि प्रारम्भ हो जाती है। कल्पवृक्षों की समाप्ति होने से अब जीवन यापन के लिए षट्कर्म प्रारम्भ हो जाते हैं। असि, मसि, कृषि, विद्या, शिल्प और वाणिज्य ये षट्कर्म हैं। शलाका पुरुषों का जन्म एवं मोक्ष भी इसी काल में होता है। चतुर्थ काल का जन्मा पञ्चम काल में मोक्ष जा सकता है, किन्तु पञ्चम काल का जन्मा पञ्चम काल में मोक्ष नहीं जा सकता। युगल सन्तान के जन्म का नियम नहीं होना एवं माता-पिता के द्वारा बच्चों का पालन किया जाना प्रारम्भ हो जाता है। इस काल के मनुष्य प्रतिदिन (एक बार) आहार करते हैं। इस काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 500 धनुष एवं आयु 1 पूर्व कोटि की होती है एवं अन्त में घटते-घटते ऊँचाई 7 हाथ एवं आयु 120 वर्ष की रह जाती है। यह काल 42,000 वर्ष कम 1 कोड़ाकोड़ी सागर का होता है, इसमें पाँच वर्ण वाले मनुष्य होते हैं। छ: संहनन एवं छ: संस्थान वाले मनुष्य एवं तिर्यञ्च होते हैं। (त्रि.सा.,783-85) नोट - 84 लाख * 84 लाख * 1 करोड़ वर्ष = एक पूर्व कोटि वर्ष दु:षमा काल की विशेषताएँ यह काल दु:ख वाला है तथा इस काल के मनुष्य मंदबुद्धि वाले होते हैं। इस काल में मनुष्य अनेक बार (न एक इति अनेक अर्थात् दो बार को भी अनेक बार कह सकते हैं) भोजन करते हैं। इस काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 7 हाथ एवं आयु 120 वर्ष की होती है एवं अन्त में घटते घटते ऊँचाई 3 हाथ या 3.5 हाथ एवं आयु 20 वर्ष की रह जाती है। यह काल 21,000 वर्ष का होता है। इसमें पाँच वर्ण वाले किन्तु कान्ति से हीन युक्त शरीर होते हैं। अन्तिम तीन संहननधारी मनुष्य एवं तिर्यञ्च होते हैं। पाँच सौ वर्ष बाद उपकल्की राजा व हजार वर्ष बाद एक कल्की राजा उत्पन्न होता है। इक्कीसवाँ अन्तिम कल्की राजा जलमंथन, मुनिराज से टैक्स माँगेगा पर मुनि महाराज क्या दें? राजा कहता है प्रथम ग्रास दीजिए, मुनि महाराज दे देते हैं और जिससे पिण्डहरण नामक अन्तराय करके वापस आ जाते हैं। वे अवधिज्ञान से जानलेते हैं कि अब पञ्चम काल का अन्त है। तीन दिन की आयु शेष है। चारों (वीरांगज मुनि, सर्वश्री आर्यिका, अग्निल श्रावक, पंगुश्री श्राविका) सल्लेखना ग्रहण कर लेते हैं। कार्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रात:काल शरीर त्यागकर सौधर्मस्वर्ग में देव होते हैं, मध्याह्न में असुरकुमारदेव धर्म द्रोही कल्की को समाप्त कर देता है और सूर्यास्त के समय अग्नि नष्ट हो जाती है। इस प्रकार पञ्चम काल का अन्त होता है। (ति.प.,4/1486-1552) नोट- प्रत्येक कल्की के समय एक अवधिज्ञानी मुनि नियम से होते हैं। दु:षमा-दु:षमा काल की विशेषताएँ यह काल दु:ख ही दु:ख वाला है तथा इस काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 3 हाथ या 3.5 हाथ एवं आयु 20 वर्ष की होती है एवं अन्त में घटते-घटते ऊँचाई 1 हाथ एवं आयु 15 या 16 वर्ष रह जाती है। यह काल भी 21,000 वर्ष का होता है। इसमें शरीर का रङ्ग धुएँ के समान काला होता है। इस काल के मनुष्यों का आहार बारम्बार कंदमूल फल आदि होता है। सब नग्न और भवनों से रहित होकर वनों में घूमते हैं। इस काल के मनुष्य प्राय: पशुओं जैसा आचरण करने वाले क्रूर, बहरे, अंधे, गूंगे, बन्दर जैसे रूप वाले और कुबड़े बौने शरीर वाले अनेक रोगों से सहित होते हैं। इस काल में जन्म लेने वाले नरक व तिर्यञ्चगति से आते हैं एवं मरण कर वहीं जाते हैं। इस काल के अन्त में संवर्तक (लवा) नाम की वायु, पर्वत, वृक्ष और भूमि आदि को चूर्ण करती हुई दिशाओं के अन्त पर्यन्त भ्रमण करती है, जिससे वहाँ स्थित जीव मूछिंत हो जाते हैं और कुछ मर भी जाते हैं। इससे व्याकुलित मनुष्य और तिर्यञ्च शरण के लिए विजयार्ध पर्वत और गङ्गा-सिंधु की वेदी में स्वयं प्रवेश कर जाते हैं तथा दयावान् विद्याधर और देव,मनुष्य एवं तिर्यञ्चों में से बहुत से जीवों को वहाँ ले जाकर सुरक्षित रख देते हैं। (त्रि सा., 865) इसके पश्चात् क्रमश: 7-7 दिन तक 7 प्रकार की कुवृष्टि होती है। उस समय गंभीर गर्जना से सहित मेघ तुहिन (ओला), क्षार जल,विष, धूम, धूलि, वज़ एवं जलती हुई दुष्प्रेक्ष्य ज्वाला की 7-7 दिन वर्षा होती है अर्थात्कुल 49 दिन तक वर्षा होती है। अवशेष रहे मनुष्य उन वर्षाओं से नष्ट हो जाते हैं। विष एवं अग्नि की वर्षा से दग्ध हुई पृथ्वी 1 योजन तक (मोटाई में) चूर्ण हो जाती है। इस प्रकार 10 कोड़ाकोड़ी सागर का यह अवसर्पिणी काल समाप्त हो जाता है। उसके बाद उत्सर्पिणी काल के प्रारम्भ में सुवृष्टि प्रारम्भ होने से नया युग प्रारम्भ हो जाता है। उत्सर्पिणी के प्रथम काल में मेघों द्वारा क्रमश: जल, दूध, घी, अमृत, रस (त्रि सा. 868) आदि की वर्षा 7-7 दिन होती है। यह भी 49 दिन तक होती है। इस वर्षा से पृथ्वी स्निग्धता, धान्य तथा औषधियों को धारण कर लेती है। बेल,लता, गुल्म और वृक्ष वृद्धि को प्राप्त होते हैं। शीतल गंध को ग्रहण कर वे मनुष्य और तिर्यञ्च गुफाओं से बाहर निकलते हैं। उस समय मनुष्य पशुओं जैसा आचरण करते हुए क्षुधित होकर वृक्षों के फल, मूल व पते आदि को खाते हैं। इस काल में आयु, ऊँचाई, बुद्धि बल आदि क्रमश: बढ़ने लगते हैं। इसका नाम भी दुषमा-दुषमा काल है। (ति.प.4/1588-1575) दु:षमा काल- इस काल में भी क्रमश: आयु, ऊँचाई, बुद्धि आदि बढ़ते रहते हैं। इस काल में 1000 वर्ष शेष रहने पर क्रमशः 14 कुलकर होते हैं, जो कुलानुरूप आचरण और अग्नि आदि से भोजन पकाना आदि सिखाते हैं। (ति.प.4/1588-1590) दु:षमा-सुषमा काल- इस काल में आयु, ऊँचाई, बल आदि में क्रमश: वृद्धि होती हुई अन्तिम कुलकर से प्रथम तीर्थंकर महापद्म (राजा श्रेणिक का जीव) होंगेबाद में 23 तीर्थंकर और होंगे। अन्तिमतीर्थंकर अनन्तवीर्य होंगे जिनकी आयु एक पूर्व कोटि एवं ऊँचाई 500 धनुष होगी। आगे सुषमा-दुषमा चौथाकाल, सुषमा पाँचवाँ काल एवं सुषमा-सुषमा छठा काल होता है। इन तीनों कालों में क्रमश: जघन्य, मध्यम और उत्तम भोगभूमि होगी। इनमें आयु, ऊँचाई क्रमश: बढ़ती रहती है। छठा काल सुषमा-सुषमा समाप्त होने पर एक कल्प काल पूरा होता है। विशेष - कल्पकाल का प्रारम्भ उत्सर्पिणी से होता है एवं समापन अवसर्पिणी में। ऐसे असंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणीकाल बीत जाने पर एक हुण्डावसर्पिणी काल आता है। जिसमें कुछ अनहोनी (विचित्र) घटनाएँ घटती हैं। वर्तमान में हुण्डावसर्पिणी काल चल रहा है, जिसमें कुछ विचित्र घटनाएँ घट रही हैं। जैसे - तृतीय काल सुषमा-दुषमा के कुछ समय शेष रहने पर ही वर्षा होने लगी एवं विकलचतुष्क जीवों की उत्पत्ति होने लगी एवं इसी काल में कल्पवृक्षों का अन्त एवं कर्मभूमि का प्रारम्भ होना। तृतीय काल में प्रथम तीर्थंकर का जन्म एवं निर्वाण होना। भरत चक्रवती की हार होना। भरत चक्रवर्ती द्वारा की गयी ब्राह्मण वंश की उत्पति का होना। नौवें तीर्थंकर से सोलहवें तीर्थंकर पर्यन्त, जिनधर्म का विच्छेद होना। (9वें-10वें तीर्थंकर के बीच में 1/4 पल्य, 10वें-11वें के बीच में 1/2 पल्य, 11वें-12वें के बीच में 3/4 पल्य, 12वें 13वें के बीच में 1 पल्य, 13वें-14वें के बीच में 3/4 पल्य, 14वें-15वें के बीच में 1/2 पल्य एवं 15वें - 16वें के बीच में 1/4 पल्य अर्थात् कुल 4 पल्य तक मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका कोई भी नहीं थे ) विशेष : असंख्यात वर्षों का एक पल्य होता है। तीर्थंकर ऋषभदेव ने तीसरे काल में जन्म लिया और इसी काल में मोक्षगए, 3 तीर्थंकर चक्रवर्तीपद के धारी भी थे एवं त्रिपृष्ठ (प्रथम नारायण) यही जीव तीर्थंकर महावीर हुआ। इस प्रकार 63 शलाका पुरुषों में से 5 शलाका पुरुष कम हुए। अर्थात् दुषमा-सुषमा काल में 58 शलाका पुरुष हुए। 11 रुद्र और 9 कलह प्रिय नारद हुए। तीन तीर्थंकरों पर मुनि अवस्था में उपसर्ग होना। (7वें, 23वें एवं 24वें) कल्की उपकल्कियों का होना। तृतीय, चतुर्थ एवं पञ्चमकाल में धर्म को नाश करने वाले कुदेव और कुलिंगी भी होते हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, वज्राग्नि आदि का गिरना। तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या के अलावा अन्य स्थानों से होना एवं मोक्ष भी सम्मेदशिखरजी के अलावा अन्य स्थानों से होना। (ति.प.,4/1637-1645) 6. क्या सम्पूर्ण भरत-ऐरावत क्षेत्रों में काल का प्रभाव पड़ता है? नहीं। भरत ऐरावत क्षेत्रों में स्थित 5 5 म्लेच्छ खण्डों में तथा विजयार्ध की विद्याधर श्रेणियों में दुषमा सुषमा काल के आदि से लेकर अन्त पर्यन्त के समान ही हानि-वृद्धि होती है। (ति.प.4/1607) 7. भोगभूमि के अन्त में दण्ड व्यवस्था क्या रहती है ? आदि के पाँच कुलकर अपराधी को ‘हा’ अर्थात् हाय तुमने यह बुरा किया मात्र इतना ही दण्डदेते थे। आगे के पाँच 'हा–मा' अर्थात् हायतुमने यह बुरा किया अब नहींकरना तथा शेषकुलकर 'हा–मा–धिक् अर्थात् हाय तुमने यह बुरा किया अब नहीं करना, धिक्कार है, इस प्रकार का दण्ड देते थे। 8. विदेह क्षेत्र एवं स्वयंभूरमण द्वीप व स्वयंभूरमण समुद्र में काल व्यवस्था कैसी रहती है ? विदेहक्षेत्र में सदैव चतुर्थकाल के प्रारम्भवत् तथा स्वयंभूरमणद्वीप के परभाग में एवं स्वयंभूरमण समुद्र में दुषमा काल सदृश वर्तना होती है। देवगति में निरन्तर प्रथम काल सदृश और नरकगति में निरन्तर छठवें काल सदृश वर्तना होती है (यहाँ अत्यन्तसुख एवं अत्यन्त दु:ख की विवक्षा है आयु आदि की नहीं) (त्रि.सा.884) 9. क्या इतनी विशाल- विशाल अवगाहना होती है, यह तो आश्चर्यकारी लगती है ? वर्तमान में कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिससे ये अवगाहना आश्चर्यकारी नहीं लगती है, बल्कि सही लगती है। कुछ प्रमाण निम्नलिखित हैं द्वारिका के समुद्रतल के अन्दर खोज करने वाले राष्ट्रीय समुद्र विज्ञानसंस्थान के समुद्रपुरातत्व विभाग के द्वारा किए गए उत्खनन की रिपोर्ट के अनुसार समुद्र में डूबे मकानों की ऊँचाई 200 से 600 मीटर है। इनके कमरे के दरवाजे 20 मीटर ऊँचे हैं। विशेष यह अवशेष द्वारिका के अशुभ तैजस पुतले के द्वारा जल जाने के बाद के बचे हुए हैं। यदि दरवाजे 20 मीटर ऊँचे (लगभग 70 फीट) हैं तो इनमें रहने वाले व्यक्ति 50-60 फीट से कम ऊँचे नहीं होंगे,जैन आगम के अनुसार तीर्थंकर नेमिनाथ की अवगाहना 10 धनुष अर्थात् 60 फीट थी। अत: यह सिद्ध होता है कि इतनी अवगाहना होती थी। वर्तमान में जिसे विज्ञान 30 से 50 फीट लम्बा डायनासोर मानता है, वह आज से कई करोड़ वर्ष पूर्व छिपकली का ही रूप है। मास्को में 1993 में एक ग्लेशियर सरका था। उसके अन्दर एक नरकंकाल मिला जो 23 फीट लम्बा था। वैज्ञानिक इसे 2 से 4 लाख वर्ष पूर्व का मानते हैं। यह नरकंकाल श्रीराजमल जी देहली के अनुसार आज भी मास्को के म्यूजियम में रखा हुआ है। बड़ौदा (गुजरात) के म्यूजियम में कई लाख वर्ष पूर्व का छिपकली का अस्थिपंजर रखा है। जो 10–12 फीट लम्बा है। तिब्बत की गुफाओं में कई लाख वर्ष पूर्व के चमड़े के जूते मिले हैं, जिनकी लम्बाई कई फीट है। भारत और मानव संस्कृति (लेखक श्री विशंबरनाथ पांडे, पृष्ठ 112-115) के अनुसार मोहनजोदड़ो हड़प्पा की खुदाई से यह सिद्ध हो गया है कि मानवों के अस्थिपंजर के आधार से पूर्वकाल में मनुष्यों की आयु अधिक व लम्बाई भी अधिक होती थी। फ्लोरिडा में एक दस लाख वर्ष पुराना बिल्ली का धड़ मिला है, जिसमें बिल्ली के दांत 7 इंच लम्बे हैं। अमेरिका में 5.5 करोड़ वर्ष पूर्व का कॉकरोच का ढाँचा मिला है। ये कॉकरोच चूहे के बराबर बड़े होते थे। रोम के पास कैसल दी गुड़ों में तीन लाख वर्ष पुरानी हाथियों की हड़ी मिली है, इनमें से कुछ हाथी के दाँत 10 फीट लम्बाई के हैं।
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    खजुराहो में आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज जी को समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता शफीक खान और डा अर्चना जैन की पुस्तक "बस्तर में अहिंसा की महिमा" का विमोचन आचार्य श्री के ससंघ सानिध्य में हुआ।पुस्तक में बस्तर के वनवासी अंचल में अहिंसा और शाकाहार का वर्णन है, पुस्तक की ई-प्रति सादर संलग्न प्रेषित है | खजुराहो - आचार्य श्री को बस्तर में अहिंसा की महिमा पुस्तक की प्रथम प्रति समर्पित करते हुए लेखक शफीक खान
  6. 1 point
    प्रस्तुत सूत्रग्रन्थ जैन साहित्य का आद्य सूत्रग्रन्थ तो है ही, संस्कृत जैन साहित्य का भी यह आद्य ग्रन्थ है। उस समय तक जैन साहित्य प्राकृत भाषा में ही पाया जाता था तथा उसी में नये साहित्य का सृजन होता था। इस ग्रन्थ के रचयिता ने संस्कृत भाषा में रचना करने का ओंकार किया और समस्त जैनसिद्धान्त को सूत्रों में निबद्ध करके गागर में सागर को भरने की कहावत को चरितार्थ कर दिखाया। यह संकलन इतना सुसम्बद्ध और प्रामाणिक साबित हुआ कि भगवान् महावीर की द्वादशाङ्ग वाणी की तरह ही यह जैनदर्शन का आधार स्तम्भ बन गया। न्यायदर्शन में न्याय सूत्रों को, वैशेषिक दर्शन में वैशेषिक सूत्रों को मीमांसा दर्शन में जैमिनी सूत्रों को, वेदान्त दर्शन में वादरायण सूत्रों को और योग दर्शन में योग सूत्रों को जो स्थान प्राप्त है, वही स्थान जैनदर्शन में इस सूत्रग्रन्थ को प्राप्त है। जैन धर्म के दोनों सम्प्रदायों में इसकी एक-सी मान्यता और आदर है। दोनों सम्प्रदायों के प्रमुख आचार्यों ने इस पर महत्त्वपूर्ण टीकाग्रन्थ रचे हैं। इसके ‘प्रमाणनयैरधिगमः' सूत्र को आधार बनाकर अनेक दार्शनिकों ने प्रमाणशास्त्र का विवेचन किया है। दिगम्बर जैनों में तो इसके पाठमात्र से एक उपवास का फल बतलाया है। यथा "दशाध्याये परिच्छिन्ने तत्त्वार्थे पठिते सति। फलं स्यादुपवासस्य भाषितं मुनिपुङ्गवैः।'' अर्थात् दस अध्याय प्रमाण तत्त्वार्थ का पाठ करने पर उपवास का फल होता है, ऐसा मुनिश्रेष्ठों ने कहा है। १. नाम - इस ग्रन्थ का प्रथम सूत्र ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः' है, जिसके द्वारा इसमें मोक्ष का मार्ग बतलाया गया है, यही इसका प्रधान विषय है। इसी से इसको मोक्षशास्त्र भी कहते हैं। तथा दूसरा सूत्र है- ‘तत्त्वार्थ श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्।' इसमें तत्त्वार्थ के श्रद्धान को सम्यग्दर्शन बतलाकर आगे दसों अध्यायों में सात तत्त्वों का ही विवेचन क्रमवार किया है। प्रथम चार अध्यायों में जीव तत्त्व का, पाँचवें अध्याय में अजीव तत्त्व का, छठे और सातवें अध्याय में आस्रव तत्त्व का, आठवें अध्याय में बन्ध तत्त्व का, नौवें अध्याय में संवर और निर्जरा तत्त्व का तथा दसवें अध्याय में मोक्ष तत्त्व का वर्णन है। इस पर से इस ग्रन्थ का वास्तविक नाम तत्त्वार्थ है। यही इसका मूल नाम है; क्योंकि इस ग्रन्थ की सबसे महत्त्वपूर्ण तीन टीकाओं में से पहली टीका सर्वार्थसिद्धि को तत्त्वार्थवृत्ति, दूसरी टीका को तत्त्वार्थवार्तिक, तीसरी को तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक नाम उनके रचयिताओं ने ही दिया है। तथा तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक के रचयिता आचार्य विद्यानन्दि जी ने तो अपनी आप्तपरीक्षा के अन्त में ‘तत्त्वार्थशास्त्र' नाम से ही इस ग्रन्थ का उल्लेख किया है। चूंकि यह ग्रन्थ सूत्ररूप में है इसलिए ‘तत्त्वार्थसूत्र' नाम से ही इसकी ख्याति है। श्वेताम्बर सम्प्रदाय में भी इसी नाम से इसकी ख्याति है। इस सम्प्रदाय में जो सूत्र पाठ प्रचलित है, उस पर एक भाष्य भी है, जिसे स्वोपज्ञ कहा जाता है। उस भाष्य के आरम्भिक श्लोकों में तथा प्रशस्ति में भी उसका नाम ‘तत्त्वार्थाधिगम' दिया हुआ है। इससे इसे तत्त्वार्थाधिगमसूत्र भी कहते हैं। २ - दो तरह के सूत्रपाठ - इस सूत्रग्रन्थ के दो प्रकार के सूत्रपाठ उपलब्ध हैं - एक सूत्रपाठ दिगम्बर मान्य है और दूसरा सूत्रपाठ श्वेताम्बर मान्य प्रस्तुत संस्करण में जो सूत्रपाठ है वह दिगम्बर मान्य है। इस सूत्रपाठ के दसों अध्यायों में सूत्रसंख्या क्रमशः इस प्रकार है- ३३+५३+३९+४२+४२+२७+३९+२६+४७+९=३५७ कुल संख्या। श्वेताम्बर सूत्रपाठ के दसों अध्यायों में सूत्रसंख्या क्रमशः इस प्रकार है- ३५+५२+१८+५३+४४+२६+३४+२६+४९+७=३४४। प्रत्येक अध्याय के बहुत से सूत्रों में जहाँ अत्यधिक साम्यता है, वहाँ कुछ अन्तर भी है। वह अन्तर कहीं तो शाब्दिक है और कहीं सैद्धान्तिक। किन्तु सैद्धान्तिक अन्तर कम है और शाब्दिक अन्तर अधिक है। दोनों सूत्रपाठों में ऐसे भी अनेक सूत्र हैं जो एक में हैं और दूसरे में नहीं हैं। इस दृष्टि से तीसरा अध्याय उल्लेखनीय है। क्योंकि दिगम्बर सूत्र पाठ में इस अध्याय में ३९ सूत्र हैं जबकि श्वेताम्बर सूत्रपाठ में १८ ही सूत्र हैं, जो कि अपूर्ण से जान पड़ते हैं। किन्तु श्वेताम्बर सूत्रपाठ पर जो एक भाष्य है, जिसे सूत्रकार का ही कहा जाता है, उसके द्वारा सूत्रों की कमी की पूर्ति हो जाती है। ३. दोनों सूत्रपाठों पर कुछ उल्लेखनीय टीकाएँ - दिगम्बर सूत्रपाठ पर सबसे पहली टीका आचार्य पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि है। यह टीका सबसे प्राचीन है। आचार्य पूज्यपाद का समय ईसा की पाँचवीं शती है। इसके बाद की दूसरी उल्लेखनीय टीका अकलंक देव का तत्त्वार्थवार्तिक है। इसके अवलोकन से पता चलता है कि इस वार्तिकग्रन्थ में पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि का अच्छा उपयोग हुआ है। अकलंक देव का समय मैंने ई० ६२० से ६८० तक निर्धारित किया था। किन्तु न्यायाचार्य पं० महेन्द्रकुमारजी ने उसमें एक शताब्दी बढ़कर ७२० से ७८० तक निर्धारित किया। अब न्यायाचार्य जी को अपनी भूल ज्ञात हो गयी है और आशा है वे भी उसी निर्णय पर पहुँचेंगे जिस पर मैं पहुँच चुका हूँ। तीसरी महत्त्वपूर्ण टीका विद्यानन्द की तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक है। पं० दरबारीलालजी कोठिया ने इनका समय ई० ७७५ से ८४० तक निर्धारित किया है। श्वेताम्बर सूत्रपाठ की सबसे प्रथम टीका तो वह भाष्य ही है, जिसे सूत्रकारकृत कहा जाता है। श्वेताम्बराचार्यों ने इस पर जो टीकाएँ रची हैं, वे केवल सूत्रपाठ पर नहीं रचीं, बल्कि सूत्रपाठ और भाष्य को एक ग्रन्थ मानकर उसी पर अपनी टीकाएँ रची हैं। सबसे प्रथम टीका आचार्य सिद्धसेनगणी की है। यह बहुत विस्तृत है। इनका समय आठवीं शताब्दी माना जाता है। अपनी इस टीका में गणी जी ने अकलंकदेव के सिद्धिविनिश्चय नामक ग्रंथ का उल्लेख किया है। अतः यह निश्चित है कि गणी जी की उक्त टीका तत्त्वार्थवार्तिक के बाद ही बनी है। ४. कर्ता श्वेताम्बर सम्प्रदाय मान्य तत्त्वार्थाधिगम भाष्य को स्वयं सूत्रकारकृत कहा जाता है। उसके अन्त में जो प्रशस्ति है, उसमें रचयिता का नाम उमास्वाति लिखा है। यथा- इदमुच्चैर्नागरवाचकेन सत्त्वानुकम्पया दृब्धम्। तत्त्वार्थाधिगमाख्यं स्पष्टमुमास्वातिना शास्त्रम् ॥५॥ अर्थात् उच्च नागर शाखा के उमास्वाति वाचक ने जीवों पर दया करके तत्त्वार्थाधिगम नाम के शास्त्र को रचा। दिगम्बर सम्प्रदाय में मूल तत्त्वार्थसूत्र की प्रतियों के अन्त में जो दो-तीन श्लोक जोड़ दिये गये हैं, उनमें से एक इस प्रकार है- तत्त्वार्थसूत्रकर्तारं गृद्धपिच्छोपलक्षितम्। वन्दे गणीन्द्रसंजातमुमास्वामी मुनीश्वरम्॥ अर्थात्-तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता, गृद्धपिच्छ से युक्त, गणीन्द्र संजात, उमास्वामी मुनीश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ। नगर ताल्लुके के एक दिगम्बर शिलालेख संख्या ४६ में लिखा है| तत्त्वार्थसूत्रकर्तारमुमास्वातिमुनीश्वरम्। श्रुतकेवलिदेशीयं वन्देऽहं गुणमन्दिरम्॥ इसमें तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता का नाम उमास्वाति बतलाया है और उन्हें श्रुतकेवलिदेशीय लिखा है। सम्भवतः ‘गणीन्द्र संजात' का मतलब भी श्रुतकेवलीदेशीय ही जान पड़ता है। श्रवण बेलगोला के शिलालेखों में यह श्लोक पाया जाता है- अभूदुमास्वातिमुनीश्वरोऽसावाचार्यशब्दोत्तरगृद्धपिच्छः । तदन्वये तत्सदृशोऽस्ति नान्यस्तात्कालिकाशेषपदार्थवेदी॥ अर्थात् कुन्दकुन्द के वंश में गृद्धपिच्छाचार्य उमास्वाति मुनीश्वर हुए। उस समय समस्त पदार्थों का ज्ञाता उनके समान दूसरा नहीं। शिलालेख संख्या १०८ में लिखा है- अभूदुमास्वाति मुनिः पवित्रे वंशे तदीये सकलार्थवेदी। सूत्रीकृतं येन जिनप्रणीतं शास्त्रार्थजातं मुनिपुंगवेन॥ अर्थात् - आचार्य कुन्दकुन्द के पवित्र वंश में सकलार्थ के जानने वाले उमास्वाति मुनि हुए जिन्होंने जिन प्रणीत द्वादशांग वाणी को सूत्रों में निबद्ध किया। इस तरह दिगम्बर परम्परा के उक्त उल्लेखों में तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता का नाम उमास्वामी अथवा उमास्वाति बतलाया है और उन्हें गृद्धपिच्छाचार्य तथा श्रुतकेवलीदेशीय लिखा है तथा कुन्दकुन्दाचार्य के वंश में हुआ कहा है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि दिगम्बर परम्परा के उक्त उल्लेख प्रायः ११ वी, १२ वीं शताब्दी के बाद के हैं। अतः यह जानना जरूरी हो जाता है कि उससे पूर्व का भी कोई उल्लेख है या नहीं ? आचार्य विद्यानन्दजी ने तत्त्वार्थसूत्र पर तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक रचते हुए आरम्भ में एक वाक्य दिया है- “एतेन गृद्धपिच्छाचार्य पर्यन्त मुनि सूत्रेण व्यभिचारिता निरस्ता।'' यहाँ गृद्धपिच्छाचार्य मुनिसूत्र से मतलब तत्त्वार्थसूत्र से है। अतः आचार्य विद्यानन्दि गृद्धपिच्छाचार्य को तत्त्वार्थसूत्र का रचयिता बतलाते हैं तथा आचार्य वीरसेन स्वामी भी अपनी धवला टीका में तत्त्वार्थसूत्र को गृद्धपिच्छाचार्य की कृति कहते हैं। ये दोनों ही विद्वान् लगभग समकालीन हैं। आचार्य वीरसेन स्वामी ने शक सम्वत् ७३८ (सन् ८१६ ई०) में अपनी जयधवला टीका समाप्त की है और लगभग यही समय विद्यानन्द का है। अतः आठवीं-नौवीं शताब्दी का यह उल्लेख उक्त उल्लेखों से प्राचीन है। यद्यपि उक्त उल्लेखों में भी तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता को गृद्धपिच्छाचार्य लिखा है, किन्तु उसमें उसका नाम उमास्वाति अथवा उमास्वामी बतलाया है, जबकि इन दोनों आचार्यों ने इस विषय में कुछ भी नहीं लिखा। जहाँ तक हम जानते हैं, इन दोनों प्रामाणिक उल्लेखों के सिवा अन्य कोई प्राचीन दिगम्बर उल्लेख तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता के विषय में अभी तक हमारे देखने में नहीं आया। अत: इनके आधार पर हम इतना ही कह सकते हैं कि आठवीं नौंवी शताब्दी में दिगम्बर सम्मत तत्त्वार्थसूत्र के रचयिता गृद्धपिच्छाचार्य माने जाते थे। उमास्वाति नाम के साथ जो गृद्धपिच्छाचार्य शब्द का उल्लेख शिलालेखों आदि में पाया जाता है, वह बाद का है। इस विषय पर और भी प्रकाश डालने के लिये तत्त्वार्थवार्तिक के अन्तरंग पर दृष्टि डालना आवश्यक है। उससे पहले यहाँ हम दिगम्बर और श्वेताम्बर सूत्रपाठ के कुछ सूत्रों का भेद दिखला देना आवश्यक समझते हैं, क्योंकि आगे की चर्चा से उनका सम्बन्ध है। १.तत्त्वार्थवार्तिक (पृ० ५५) में यह शंका उठायी गयी है कि नारक शब्द का पूर्व निपात होना चाहिए। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह शंका श्वेताम्बर सूत्रपाठ के ‘नारक देवानाम्’ पद को लक्ष्य में रखकर उठायी गयी है। २.तत्त्वार्थवार्तिक (पृ० ७९) में शंका उठायी गयी है कि ‘जीवभव्याभव्यत्वानि' सूत्र में आदि पर होना चाहिये। यह शंका भी श्वेताम्बर सूत्रपाठ को लक्ष्य में रखकर उठायी गयी जान पड़ती है। ३.तत्त्वार्थवार्तिक (पृ. ९२) में शंका उठायी गयी है कि ‘तदर्थाः यहाँ समास नहीं हो सकता। यह शंका भी ‘तेषामर्थाः' इस श्वेताम्बर सूत्रपाठ को लक्ष्य में रखकर उठायी गयी जान पड़ती है। इसी तरह ऊपर जो सूत्र दिये गये हैं, उन सभी को लक्ष्य करके तत्त्वार्थवार्तिक में शंका उठाकर दिगम्बर सूत्रपाठ को ही ठीक ठहराया गया है। किन्तु इससे भी इस बात की पूर्ण पुष्टि नहीं होती कि ये शंकाएँ श्वेताम्बर सूत्रपाठ को लक्ष्य में रखकर ही उठायी गयी हैं, क्योंकि वार्तिककार ने यह शंकाएँ उठाते हुए पाठभेद का उल्लेख नहीं किया है। अतः नीचे दो तीन ऐसे प्रमाण दिये जाते हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि श्वेताम्बर पाठभेद को लक्ष्य में रखकर ही ये शंकाएँ की गयी हैं। १. तत्त्वार्थवार्तिक (पृ० १०१, सूत्र ३३) में लिखा है - “केचित् पोतजा इति पठन्ति।" अर्थात् कोई लोग पोत के स्थान में ‘पोतज' पढ़ते हैं। यह स्पष्ट ही श्वेताम्बर सूत्रपाठ की ओर संकेत है, क्योंकि उसी में ‘जराय्वण्डपोतजानां गर्भः' यह पाठ है। २. तत्त्वार्थवार्तिक (पृ० ११३) में तीसरे अध्याय के प्रथम सूत्र के विषय में शंका की गयी है - “केचिदत्र पृथुतरा इति पठन्ति।" अर्थात् कुछ लोग इस सूत्र में ‘सप्ताधोऽधः' के बाद ‘पृथुतरा:' पढ़ते हैं। यह स्पष्ट ही श्वेताम्बर पाठ ‘सप्ताधोऽधः पृथुतरा' पर आपत्ति की गयी है। ३. तत्त्वार्थवार्तिक (पृ०२४२) पर पाँचवें अध्याय के ‘‘बन्धेऽधिकौ परिणामिकौ" सूत्र का व्याख्यान करते हुए अकलंकदेव ने लिखा है बंधे समाधिकौ पारिणामिकौ इति अपरे सूत्रं पठन्ति' अर्थात् दूसरे लोग इस सूत्र को इस प्रकार से पढ़ते हैं। यह पाठभेद एक मौलिक मतभेद को लिए हुए है। वह मतभेद यह है कि दिगम्बर परम्परा में तो सजातीय परमाणु हो या विजातीय परमाणु हो, बँधने वाले परमाणुओं में दो गुण का अन्तर होना जरूरी है। अर्थात् एक परमाणु दो गुण वाला हो और दूसरा चार गुण वाला हो, तभी उनमें बन्ध हो सकता है। किन्तु श्वेताम्बर परम्परा में यदि सजातीय परमाणु हों, तब तो दो गुण हीनाधिक होना जरूरी है। किन्तु यदि परमाणु विजातीय हों तो समान गुण होने पर ही उनमें बन्ध हो जाता है। जैसे, यदि स्निग्ध स्निग्ध का या रूक्ष रूक्ष का बन्ध हो तो एक में दो गुण और दूसरे में चार गुण होने चाहिए। किन्तु स्निग्ध रूक्ष का बन्ध हो तो दोनों में दो-दो चार-चार गुण होना चाहिये तभी बन्ध होता है। इसी मतभेद के कारण जब दिगम्बर सूत्रपाठ "बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ" है, तब श्वेताम्बर सूत्रपाठबन्धे समाधिकौ-पारिणामिकौ" है। अतः तत्त्वार्थ वार्तिक के उक्त उद्धरणों से यह स्पष्ट है कि अकलंक देव के सामने एक सूत्रपाठ और भी था। किन्तु वह सूत्रपाठ श्वेताम्बर सम्मत वही सूत्रपाठ था। जो वर्तमान में प्रचलित है या उसका कोई पूर्वज था ? यह प्रश्न विचारणीय है। तत्त्वार्थवार्तिक में प्रथम सूत्र ‘‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:" की कई उत्थानिकाएँ दी हैं। उनमें से सबसे प्रथम उत्थानिका, जो सूत्र से पहले दी गई है, वह तो सर्वार्थसिद्धि को लक्ष्य में रखकर दी गयी है। किन्तु सूत्र के बाद में भी उसका व्याख्यान करने से पहले उत्थानिका दी गयी है, जो इस प्रकार है। “अपरे आरातीयपुरुषशक्त्यपेक्षत्वात् सिद्धान्तप्रक्रियाऽऽ-विष्करणार्थ मोक्षकारणनिर्देशसम्बन्धेन शास्त्रानुपूर्वी रचयितुमन्विच्छन्नि-दमवोचददिति आचक्षते।'' अर्थात् - दूसरों का कहना है कि शास्त्र रचना आरातीय पुरुषों की शक्ति की अपेक्षा रखती है। अतः सिद्धान्त की प्रक्रिया को प्रकट करने के लिये मोक्ष के कारणों का निर्देश करते हुए शास्त्र की आनुपूर्वी को रचने की इच्छा करने वाले सूत्रकार ने यह सूत्र कहा। आशय यह है कि अकलंकदेव प्रथम सूत्र का व्याख्यान करने से पहले यह बतलाना चाहते हैं कि यह सूत्र क्यों कहा? तत्त्वार्थसूत्र की प्राचीन टीका सर्वार्थसिद्धि में तो यह कहा है कि मोक्ष की प्राप्ति के उपायों को लेकर विभिन्न मतों में विवाद है। कोई ज्ञान से ही मुक्ति मानता है तो कोई चारित्र से ही मुक्ति मानता है। अतः तीनों को ही मुक्ति का मार्ग बतलाने के लिए सूत्रकार ने प्रथम सूत्र कहा है। यही बात अकलंक देव ने भी कही है। किन्तु ‘अपरे' करके जो दूसरी उत्थानिका दी गयी वह किसकी है? श्वेताम्बर सम्मत सूत्रपाठ पर जो भाष्य है, उसे सूत्रकार रचित ही कहा जाता है। उसमें प्रथम सूत्र से पहले कुछ कारिकाएँ हैं। उन कारिकाओं में से २१ में तो वीर प्रभु को वर्णन पूर्वक नमस्कार किया है। २२ वीं कारिका में शिष्यों के हित के लिए अर्हद्वचनैकदेश लघुग्रन्थ तत्त्वार्थाधिगम को कहने की प्रतिज्ञा की है। आगे कुछ कारिकाओं में जिनवचन महादधि की महत्ता बतलायी है। ३० वीं कारिका में श्रेय का उपदेश करना चाहिये ऐसा कहा है। अन्तिम कारिका इस प्रकार है नर्ते च मोक्षमार्गाद् हितोपदेशोऽस्ति जगति कृत्स्नेऽस्मिन्। तस्मात् परमिदमेवेति मोक्षमार्ग प्रवक्ष्यामि ॥३१॥ अर्थात् “इस समस्त जगत् में मोक्षमार्ग को छोड़कर अन्य कोई हितोपदेश नहीं है, अतः उत्कृष्ट हितोपदेश जो मोक्षमार्ग है, उसे कहता हूँ।" अतः तत्त्वार्थ वार्तिककार ने ‘अपरे' करके जो उत्थानिका दी है, वह तत्त्वार्थभाष्य में भी नहीं मिलती। उक्त उत्थानिका के बाद ‘आचक्षत से आगे अकलंकदेव लिखते हैं- "नात्र शिष्याचार्यसम्बन्धो विवक्षितः। किन्तु संसारसागरनिमग्नानेकप्राणिगणाभ्युज्जिहीर्षा प्रत्यागूर्णोऽन्तरेण मोक्ष-मार्गोपदेशं हितोपदेशो दुःप्राप इति निश्चित्य मोक्षमार्गव्याख्यासुरिदमाह।'' अर्थात् यहाँ शिष्य और आचार्य का सम्बन्ध विवक्षित नहीं है। किन्तु संसार सागर में निमग्न अनेक प्राणिगणों के उद्धार के लिये उद्यत आचार्य ने मोक्षमार्ग के उपदेश के बिना हितोपदेश दुष्प्राप्य है, ऐसा निश्चय करके यह सूत्र कहा है। यहाँ ‘‘अन्तरेण मोक्ष मार्गोपदेशं हितोपदेशो दु:पापः" यद्यपि यह वाक्य भाष्य कारिका के ‘‘नर्ते च मोक्षमार्गाद् हितोपदेशोऽस्ति'' इस अंश का स्मरण करा देता है। किन्तु प्रथम तो भाष्य में इसके पूर्व का भाग नहीं है, दूसरे भाष्यकार ने इस ग्रन्थ को शिष्य हित के लिए बनाने का निर्देश किया है। अतः यदि जरा देर के लिये मान भी लिया जाय कि उत्थानिका के अन्तिम शब्द भाष्य की ओर संकेत करते हैं फिर भी यह जिज्ञासा तो बनी ही रहती है कि उक्त ‘अपरे' इत्यादि उत्थानिका का संकेत किस ओर है? क्या तत्त्वार्थसूत्र की कोई दूसरी वृत्ति अकलंक देव के सामने थी ? हमारी इस आशंका की पुष्टि तत्त्वार्थ वार्तिक के एक दूसरे स्थल से भी होती है। पाँचवें अध्याय के चौथे सूत्र का व्याख्यान करते हुए (पृष्ठ १९७) अकलंकदेव लिखते हैं- “स्यान्मतं वृत्तावुक्तमवस्थितानि धर्मादीनि न हि कदाचित्पंचत्वं व्यभिचरन्तीति ततः षड् द्रव्याणीत्युपदेशस्य व्याघातः।” अर्थात् ‘‘वृत्ति में कहा है धर्म आदि द्रव्य अवस्थित हैं अर्थात् कभी भी पाँचपने को नहीं छोड़ते हैं। कुछ विद्वानों का विचार है कि यह वृत्ति तत्त्वार्थ भाष्य है; क्योंकि उसमें इसी सूत्र के व्याख्यान में लिखा है "अवस्थितानि च न कदाचित्पञ्चत्वं भूतार्थत्वं च व्यभिचरन्ति।'' किन्तु हमारा विचार है कि यह वृत्ति तत्त्वार्थभाष्य से भिन्न कोई दूसरी ही होनी चाहिए और प्रथम सूत्र की उक्त उत्थानिका भी उसी की होगी। यहाँ तत्त्वार्थ भाष्य और उसकी सिद्धसेन गणिकृत टीका के सम्बन्ध में भी थोड़ा प्रकाश डालना आवश्यक है। तत्त्वार्थभाष्य की आरम्भिक कारिकाओं में एक कारिका इस प्रकार महतोऽति महाविषयस्य दुर्गमग्रन्थभाष्यपारस्य। कः शक्तः प्रत्यासं जिनवचनमहोदधेः कर्तुम् ॥२३॥ इसमें जिनवचन रूपी महोदधि की महत्ता बतलाते हुए उसे ‘दुर्गम ग्रन्थ भाष्य पार' बतलाया है। टीकाकार ने इस पद का व्याख्यान इस प्रकार किया है- “दुर्गमो ग्रन्थभाष्ययोः पारो निष्ठाऽस्य। तत्रानुपूर्व्या पदवाक्य सन्निवेशो ग्रन्थः। तस्य महत्त्वादध्ययन-मात्रेणापि दुर्गमः पारः, तस्यैवार्थविवरणं भाष्यं, तस्यापि नयवादानुगमत्वादलब्धपारः॥'' अर्थात् उस जिनवचन रूपी महोदधि के ग्रन्थों और उन ग्रन्थों के अर्थ को बतलाने वाले जो उनके भाष्य हैं, उनका पार पाना कठिन है। यहाँ तत्त्वार्थ भाष्यकार ने आगम ग्रन्थों के साथ उनके भाष्यों का भी उल्लेख किया है। अतः यह स्पष्ट है कि तत्त्वार्थ भाष्य की रचना भाष्यों के बाद में ही हुई। भाष्यों का रचनाकाल विक्रम की ७ वीं शती है। अतः तत्त्वार्थ भाष्य सातवीं शती के पहले की रचना नहीं हो सकती। तत्त्वार्थ भाष्य की आद्य टीका सिद्धसेन गणिकृत है। सिद्धसेन गणि ने अपनी इस टीका में सिद्धिविनिश्चय नामक ग्रंथ के सृष्टि परीक्षा नामक प्रकरण को देखने का उल्लेख किया है। अकलंक देवकृत सिद्धि-विनिश्चय ग्रन्थ उपलब्ध है। अतः यह निश्चित है कि सिद्धिसेन गणी अकलंक के बाद में हुए हैं तथा उनकी टीका के कुछ स्थलों के देखने से यह भी पता चलता है कि उन्होंने अकलंकदेव का तत्त्वार्थ वार्तिक देखा था। उदाहरण के लिए १. तत्त्वार्थवार्तिक को प्रारम्भ करते हुए शंका की गयी है कि मोक्ष का उपदेश पहले क्यों नहीं किया, वह सब पुरुषार्थों में प्रधान है? इसका उत्तर दिया गया कि मोक्ष में किसी को विवाद नहीं है, विवाद कारण में है। और इतना कहकर पाटलीपुत्र मार्ग का उदाहरण दिया है। यथा "मोक्षोपदेशः पुरुषार्थ प्रधानत्वात्. मोक्षमेव करमान्नाप्राक्षीत् इति चेन्न कार्यविशेष सम्प्रतिपत्तेः कारणं तु प्रति विप्रतिपत्तिः पाटलीपुत्र मार्ग विप्रतिपत्तिवत्॥" गणी जी ने भी प्रथम सूत्र का व्याख्यान करते हुए यही शंका उठाई है और उसका समाधान भी इन्हीं शब्दों में किया है। यथा- “कस्मात् हेतव एव मोक्षस्य कथ्यन्ते न पुनः स एव प्रधानत्वादादौ प्रदर्श्यते...सत्यमसौ प्रधानः तथापि तु तत्र प्रायो वादिनां नास्ति विप्रतिपत्तिः...तद्धेतुषु प्रायो विसंवादः'' इतना ही नहीं, इसी सूत्र के व्याख्यान में ‘‘पाटलीपुत्रगामि मार्गवत्" दृष्टान्त का भी प्रकारान्तर से उपयोग किया है। २. तत्त्वार्थवार्तिक में दो वार्तिक इस प्रकार हैं- "एषां पूर्वस्य लाभे भजनीयमुत्तरम्। उत्तरलाभे तु नियतः पूर्वलाभः॥" ये ही वाक्य तत्त्वार्थ भाष्य में भी हैं। गणीजी ने इनका जो व्याख्यान किया है तथा 'अपरे' करके जिस व्याख्यान्तर का निर्देश किया है उन्हें देखने से तत्त्वार्थ वार्तिक का स्मरण बरबस हो आता है। अतः यह निश्चित है कि सिद्धसेन गणी विक्रम की आठवीं शताब्दी से पहले नहीं हुए। तथा दसवीं शताब्दी के विद्वान् शीलांक और अभयदेव ने उनकी तत्त्वार्थ टीका से उद्धरण दिये हैं। अतः वे विक्रम की आठवीं और दसवीं शताब्दी के मध्यवर्ती समय में हुए हैं। अतः विक्रम की सातवीं शती के बाद में रचे हुए भाष्य पर सिद्धसेन को टीका रचे जाने में कोई अनुपपत्ति खड़ी नहीं होती। इसके विपरीत यदि भाष्य को मूल ग्रंथकार की रचना माना जाता है तो दिगम्बर सम्मत सूत्रपाठ पर सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिक जैसी महत्त्वपूर्ण टीकाओं के रचे जाने पर भी भाष्य पर एक भी तत्कालीन टीका का न मिलना उसकी स्थिति में सन्देह पैदा करता है। कहा जा सकता है कि तत्त्वार्थवार्तिक के अन्त में ‘उक्तं च' करके जो कारिकाएँ पायी जाती हैं, वे तत्त्वार्थभाष्य की हैं, तथा अन्य भी कुछ ऐसे वाक्य मिलते हैं, जो तत्त्वार्थभाष्य के हो सकते हैं ? किन्तु इन सबकी स्थिति सन्देहजनक है; क्योंकि अकलंक देव के सामने जो एक अन्य वृत्ति होने का आभास मिलता है, सम्भव है ये सब उससे लिया गया हो। तत्त्वार्थवार्तिक का एक और भी उल्लेख ध्यान देने योग्य है। पाँचवें अध्याय के “द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः" सूत्र का व्याख्यान करते हुए अकलंक देव ने लिखा है- “उतं हि अर्हत्प्रवचने, द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः।'' यह ‘अर्हत्प्रवचन' नामक ग्रन्थ कौन-सा है जो सूत्र रूप है तथा जिसके सूत्र तत्त्वार्थसूत्र के ही समान हैं ? यह एक विचारणीय प्रश्न है। कहा जा सकता है कि सिद्धसेन गणी ने अपनी टीका की पुष्पिकाओं में तत्त्वार्थाधिगम को ‘अर्हत्प्रवचन संग्रह' लिखा है, तथा भाष्यकार ने अपनी कारिकाओं में ‘अर्हद्वचनैकदेशस्य संग्रह' लिखा है। अतः ‘अर्हत्प्रवचन' से अकलंक ने तत्त्वार्थभाष्य का ही उल्लेख किया है। किन्तु यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि अर्हत्प्रवचन में और अर्हत्प्रवचनसंग्रह में बहुत अन्तर है। प्रत्युत इन उल्लेखों से मेरे मन में एक सन्देह पैदा हुआ है और वह यह है कि यह तत्त्वार्थभाष्य कहीं उस ‘अर्हत्प्रवचन' से ही तो संकलित नहीं है, जिसका उल्लेख अकलंक देव ने किया है ? क्योंकि भाष्य की प्रशस्ति में भाष्यकार ने लिखा है- “अर्हद्वचनं सम्यक्गु रुक्रमेणागतं समवधार्य" अर्थात् गुरुपरम्परा से चले आये हुए ‘अर्हत्वचन' को भले प्रकार अवधारण करके यह ग्रन्थ रचा। तथा आरम्भ में इसे अर्हत्वचन के एक देश का संग्रह बतलाया है। और ‘अर्हद्वचन और ‘अर्हत्प्रवचन' में कोई अन्तर नहीं है। इस पर से इसे ‘अर्हत्प्रवचन संग्रह' कहना भी उचित प्रतीत होता है। अकलंकदेव के द्वारा उल्लिखित ‘अर्हत्प्रवचन' अथवा 'अर्हत्प्रवचन हृदय' नामक ग्रन्थ दिगम्बर सम्मत ही जान पड़ता है। यह भी सम्भव है कि वह उभय सम्प्रदाय को सम्मत हो और दिगम्बर तथा श्वेताम्बर सूत्रपाठों का वही उद्गम स्थान हो । सम्भवतया इसी से सूत्रकार को कोई दिगम्बर सिद्ध करता है तो कोई श्वेताम्बर सिद्ध करता है और कोई यापनीय सिद्ध करता है; जब कि उभय सम्प्रदाय सम्मत कुछ उल्लेखनीय सूत्रों की स्थिति दिगम्बर परम्परा के अधिक अनुकूल है। उदाहरण के लिये सोलहकारण भावना और २२ परीषहों को बतलाने वाले सूत्र उपस्थित किये जा सकते हैं। अस्तु, इतना प्रासंगिक कथन करने के बाद हम पुनः उसी चर्चा पर आते यह स्पष्ट है कि प्रारम्भ से ही तत्त्वार्थसूत्र का जितना समादर दिगम्बर सम्प्रदाय में रहा है, उतना श्वेताम्बर सम्प्रदाय में नहीं रहा। श्वेताम्बर सम्प्रदाय में तो वह पीछे से प्रविष्ट हुआ प्रतीत होता है, जिसका श्रेय सम्भवतः तत्त्वार्थभाष्य के कर्ता को है। भाष्यकार ने अपनी प्रशस्ति में अपना नाम उमास्वाति दिया है। श्वेताम्बर सम्प्रदाय की प्राचीन माने जाने वाली कल्पसूत्र स्थविरावली और नन्दिसूत्र पट्टावली में उमास्वाति का नाम तक नहीं है। शेष जिन पट्टावलियों में यह नाम है वे सब प्रायः १३ वीं शताब्दी के बाद की हैं। दिगम्बर परम्परा में भी उमास्वामी या उमास्वाति का उल्लेख ११ वी, १२ वीं शताब्दी के बाद ही शिलालेखों में मिलता है। इससे पहले का कोई उल्लेख हमारे देखने में नहीं आया। तत्त्वार्थसूत्र के आद्य टीकाकार पूज्यपाद देवनंदी ने और अकलंकदेव ने उसके कर्ता का उल्लेख नहीं किया। हाँ, विद्यानन्दिी ने अपने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक में चर्चा करते हुए तत्त्वार्थसूत्र को गृद्धपिच्छाचार्य मुनि का अवश्य बतलाया है, किन्तु उन्होंने भी ग्रन्थ के आरम्भ में या अन्त में कहीं भी उसके कर्ता का उल्लेख नहीं किया है। ईसा की ११वीं शताब्दी के विद्वान् प्रभाचन्द्राचार्य ने सर्वार्थसिद्धि पर तत्त्वार्थवृतिपद नाम से जो टिप्पणी लिखी है, उसमें भी सूत्रकार का उल्लेख नहीं है। १३ वीं शताब्दी के श्री भास्करनन्दी की सुखबोध नाम की वृत्ति में भी सूत्रकार का उल्लेख नहीं है। हाँ, विक्रम की १३ वीं शती के विद्वान बालचन्द्र मुनि की बनायी हुई, कन्नड़ी टीका में उमास्वाति नाम दिया है और साथ ही गृद्धपिच्छाचार्य नाम भी दिया है। इस टीका में तत्त्वार्थसूत्र की उत्पत्ति जिस प्रकार से बतलाई है, उसका सार ‘अनेकान्त' से दिया जाता है सौराष्ट्र देश के मध्य उर्जयंत गिरि के निकट गिरि नगर नाम के पत्तन में आसन्न भव्य, स्वहितार्थी, द्विजकुलोत्पन्न, श्वेताम्बर भक्त सिद्धय्य नाम का एक विद्वान् श्वेताम्बर शास्त्रों का जानने वाला था। उसने ‘दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्ग:' यह सूत्र बनाकर एक पाटिये पर लिख दिया। एक दिन चर्या के लिए श्री गृद्धपिच्छाचार्य उमास्वाति मुनि वहाँ आये और उन्होंने उस सूत्र के पहले ‘सम्यक् पद जोड़ दिया। जब वह विद्वान् बाहर से लौटा और उसने पाटिये पर ‘सम्यक्' शब्द लगा देखा तो वह अपनी माता से मुनिराज के आने का समाचार मालूम करके, खोजता हुआ उनके पास पहुँचा और पूछने लगा- “आत्मा का हित क्या है?'' इसके बाद के प्रश्नोत्तर प्रायः सब वही हैं जो सर्वार्थसिद्धि के आरम्भ में आचार्य पूज्यपाद ने दिये हैं।' प्रभाचन्द्राचार्य ने अपने टिप्पण में प्रश्नकर्ता भव्य का नाम तो सम्भवतः ‘सिद्धय्य' ही दिया है। किन्तु यह कथा नहीं दी। अतः नहीं कहा जा सकता कि यह कथा कहाँ तक ठीक है और इसका आधार क्या है ? फिर भी हमारे जानने में तत्त्वार्थसूत्र का यही एक ऐसा टीकाकार है, जिसने गृद्धपिच्छाचार्य उमास्वाति को सूत्र का कर्ता बतलाया है। श्रवणबेलगोला के जिन शिलालेखों में गृद्धपिच्छाचार्य उमास्वाति का उल्लेख है अथवा उमास्वाति को तत्त्वार्थसूत्र का कर्ता बतलाया है वे भी लगभग इसी काल के हैं। लगभग इसी समय के आस-पास की रची हुई एक तत्त्वार्थसूत्र की टीका और है जिसका नाम अर्हत्सूत्रवृत्ति है। उसमें आचार्य कुन्दकुन्द को तत्त्वार्थसूत्र का कर्ता बतलाया है। इतना ही नहीं, तत्त्वार्थसूत्र के एक श्वेताम्बर टिप्पणकार ने भी ऐसा उल्लेख किया है। उसने अपनी टिप्पणी के अन्त में तत्त्वार्थसूत्र के विषय में ‘दुर्वादापहर' नाम से कुछ पद्य देते हुए अपने सम्प्रदाय वालों को दो शिक्षाएँ दी हैं-“एक तो तत्त्वार्थसूत्र के विधाता वाचक उमास्वाति को कोई दिगम्बर अथवा निह्नव न कहने पाये ऐसा यत्न करना चाहिये। दूसरे, कुन्दकुन्द, इडाचार्य (ऐलाचार्य) पद्मनन्दि और उमास्वाति, ये एक ही व्यक्ति के नाम कल्पित करके जो लोग इस ग्रन्थ का आद्यकर्ता कुन्दकुन्द को बतलाते हैं, वह ठीक नहीं है। वह कुन्दकुन्द इस तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता प्रसिद्ध उमास्वाति से भिन्न ही है।'' इस तरह १३ वीं, १४ वीं शती में भी तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता को लेकर मतभेद के उल्लेख मिलते हैं। किन्तु इस मतभेद का कारण ‘गृद्धपिच्छाचार्य नाम ही प्रतीत होता है; क्योंकि आचार्य कुन्दकुन्द की भी गृद्धपिच्छाचार्य नाम से ख्याति थी। इसकी चर्चा डॉ० ए० एन० उपाध्ये ने प्रवचनसार की प्रस्तावना में की है। इसी की वजह से आचार्य कुन्दकुन्द को भी तत्त्वार्थसूत्र का रचयिता किन्हीं ने मान लिया प्रतीत होता है। अतः इस पर से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि दिगम्बर परम्परा के सूत्रपाठ के रचयिता गृद्धपिच्छाचार्य नाम के कोई आचार्य थे। यही प्राचीन उल्लेख है जिसकी चर्चा ऊपर की है। श्वेताम्बर सूत्रपाठ सहित उमास्वाति के भाष्य का प्रचलन होने पर कालान्तर में गृद्धपिच्छाचार्य और उमास्वाति नाम को भ्रमवश मिला दिया गया हो यह सम्भव है जैसा कि सिद्धान्तशास्त्री पं० फूलचन्द जी का भी मत है। ४. आद्य मंगलश्लोक - यद्यपि पूज्यपाद, अकलंकदेव और विद्यानन्द ने ‘मोक्षमार्गस्य नेतारं' आदि मंगलश्लोक का अपनी टीका के आरम्भ में व्याख्यान नहीं किया। फिर भी विद्यानन्द उसे सूत्रकार का ही मानते हैं जैसा कि आप्तपरीक्षा के "इति तत्त्वार्थशास्त्रादौ मुनीन्द्रस्तोत्रगोचरा" इस उल्लेख से स्पष्ट है। तथा तत्त्वार्थसूत्र के उत्तरकालीन टीकाकार भास्करनन्दि श्रुतसागर आदि ने उसे सूत्रकारकृत मान कर उसका व्याख्यान भी किया है। इसी से हमने भी सूत्रकारकृत मानकर ही ग्रन्थ के आदि में उसे स्थान दिया है। कैलाशचन्द्र शास्त्री
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    जय जिनेन्द्र श्री महावीर स्वास्थ सेवा संस्था नागपुर की ओरसे अविस्मरणीय कार्यक्रम स्वराज्य सम्मान को बहुत सारी बधाइयाँ और शुभकामनाएं । आचार्यश्री के दर्शनारथ नागपुर लखनादौन नरसिगपुर से 2 बसेस भरकर दर्शनार्थी 2 अक्तूबर को ही आये थे । आप ने की सभी व्यवस्था से संतुष्ट हो गये अरविंद जैन अध्यक्ष स्वराज्य सम्मान कार्यक्रम मे जरुर आयेंगे
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    अमिट, अमित अरु अतुल, अतीन्द्रिय, अरहन्त पद को धरूँगा सज, धज निजको दश धर्मों से - सविनय सहजता भजूँगा ।। अब मैं ।। विषय - विषम - विष को जकर उस - समरस पान मैं करूँगा। जनम, मरण अरु जरा जनित दुख - फिर क्यों वृथा मैं सहूँगा? ।। अब मैं । । दुख दात्री है इसीलिए अब - न माया - गणिका रखूँगा।। निसंग बनकर शिवांगना संग - सानन्द चिर मैं रहूँगा ।।अब मैं । । भूला, परमें फूला, झूला - भावी भूल ना करूँगा। निजमें निजका अहो! निरन्तर - निरंजन स्वरूप लखूँगा ।। अब मैं । । समय, समय पर समयसार मय - मम आतम को प्रनमुँगा। साहुकार जब मैं हूँ, फिर क्यों - सेवक का कार्य करूँगा ? ।।अब मैं । । - महाकवि आचार्य विद्यासागर
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    पुण्यशाली भव्य आत्मा का वंदन करते हुए भावना भाते हैं कि हमारी भी गुरु चरणों में ऐसी समाधि हो.धन्य हो वसानी जी क्या भाग्य संवारा है,वर्तमान के महावीर के चरण सानिध्य में समाधि आपके पुण्य की जितनी भी अनुमोदना की जाये कम है।
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    भारत की दूसरी फांसी सरेआम हांसी, हरियाणा में लाला हुक्म चंद जैन और उनके नाबालिग भतीजे को दी गयी थी। इनकी लाश को जलाने के स्थान पर अपमान करने के लिए दफनाया गया था। जैन स्वतंत्रता सेनानियों का भी सम्मान होना चाहिए
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    अब यह बताते हैं कि जीव और पुद्गलों का गमन किस क्रम से होता है- अनुश्रेणि गतिः ॥२६॥ अर्थ - लोक के मध्य से लेकर ऊपर, नीचे और तिर्यक् दिशा में आकाश के प्रदेशों की सीधी कतार को श्रेणी कहते हैं। जीवों और पुद्गलों की गति आकाश के प्रदेशों की पंक्ति के अनुसार ही होती है, पंक्ति को लाँघ कर विदिशाओं में गमन नहीं होता। English - Transit takes place in rows (straight lines) in space. शंका - यहाँ तो जीव का अधिकार है, पुद्गल का ग्रहण यहाँ कैसे किया ? समाधान - यहाँ ‘विग्रहगतौ कर्मयोगः' सूत्र से गति का अधिकार है। फिर इस सूत्र में ‘गति' पद का ग्रहण पुद्गल का ग्रहण करने के लिए ही किया गया है। तथा आगे ‘अविग्रहा जीवस्य' इस सूत्र में जीव का अधिकार होते हुए जो जीव का ग्रहण किया है, उससे भी यही अर्थ निकलता है कि यहाँ पुद्गल की गति भी बतलायी गयी है। विशेषार्थ - यद्यपि यहाँ जीव और पुद्गल की गति श्रेणी के अनुसार बतलायी है, किन्तु इतना विशेष है कि सभी जीव पुद्गलों की गति श्रेणी के अनुसार नहीं होती। जिस समय जीव मर कर नया शरीर धारण करने के लिए जाता है, उस समय उसकी गति श्रेणी के अनुसार ही होती है। तथा पुद्गल का शुद्ध परमाणु जो एक समय में चौदह राजु गमन करता है, वह भी श्रेणी के अनुसार ही गमन करता है। शेष गतियों के लिए कोई नियम नहीं है।
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    ‘समन्तभद्र की भद्रता' ग्रन्थ आचार्य समन्तभद्र द्वारा विरचित 'स्वयंभू स्तोत्र' का हिन्दी अनुवाद है। इस रचना की पृष्ठभूमि यह है कि सन् १९७७ में आचार्यश्री जब सिद्धक्षेत्र कुण्डलगिरि से पटेरा, दमोह (म० प्र०) पधारे तो वहाँ की जनता ने उनका श्रद्धा भक्तिपर्वक भव्य स्वागत किया। प्रतिदिन की भाँति जब एक दिन आचार्यश्री ने अत्यन्त भक्ति-प्रवणता के साथ प्रातः सस्वर ‘स्वयंभू स्तोत्र का पाठ किया, जिसे सुनकर सागर से दर्शनार्थ पहुँचे श्रोता मंत्रमुग्ध हो गये। उन्होंने उनके चरणों में निवेदन किया कि अधिकांश लोग संस्कृत नहीं जानते, अतः आप इसका पद्यानुवाद कर दीजिए, ताकि उसे कण्ठस्थ कर सकें और सस्वर पढ़ भी सकें। सागर की जैन समाज की यह प्रार्थना स्वीकृत तो हुई, परन्तु देर से, सिद्धक्षेत्र द्रोणगिरि, छतरपुर (म० प्र०) पर इसे प्रारम्भ किया और २९ मार्च, १९८० को महावीर जयन्ती के पुण्य अवसर पर इसे समाप्त किया और नाम रखा गया ‘समन्तभद्र की भद्रता'।
  16. 1 point
    पुराण ग्रन्थों में परिणामों के फल के वैचित्य (विविधता) के बारे में पढ़ने को मिलता है कि वस्तु एक ही रहती है, लेकिन व्यक्ति के भावों के अनुसार सभी को अलग-अलग फल देती है। दुर्भावना वाले को फूल की माला भी काला नाग बन जाती है और सद्भावना वाले को कालानाग भी फूलों की माला बन जाती है। जीव का पुण्य और शुभ परिणाम ही है जो मिट्टी को सोना बना देता है और वह जीव का पाप और अशुभ परिणाम ही हैं जो सोने को भी कोयला बना देते हैं। एक दिन आचार्य श्री जी बता रहे थे कि- परिणामों के माध्यम से कर्मों में भी परिवर्तन किया जा सकता है। पवित्र, प्रासुक भोजन भी क्रोध की दशा में ग्रहण किया जाए तो जहर का काम करता है और वही भोजन समता के साथ ग्रहण किया जाता है तो अमृत का काम करता है। इसलिए हमें अपने कर्मों और परिणामों पर श्रद्धान रखना चाहिए फिर अपने आप कर्मों में परिवर्तन आने लगेगा, असाता साता में परिवर्तित हो जावेगी। यही तो है परिणाम-प्रत्यय। आचार्य श्री जी ने अपने ही जीवन का संस्मरण सुनाते हुए कहा है की एक बार एक वृद्ध श्रावक हमारे पास आये थे। उन्हें केंसर था। उन्हें डॉक्टर ने मना कर दिया था। उन्होंने निराश होकर मुझसे। निवेदन किया कि- हे गुरुवर! आप ही हमें कुछ इलाज बताइये। तब आचार्य श्री जी ने कहा कि हमारे पास कोई भी ग्रहण करने की नहीं बल्कि त्याग करने की दवाई है, लेना हो तो ले लो। उन्होंने कहा- आप जो कहेंगे उसके लिए मैं तैयार हूँ। तब मैंने कहा कि रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग कर दो। तब उन्होंने कहा आचार्य श्री जी रात्रि में दवाई लेनी पढ़ती है। तब मैंने कहा- जब डॉक्टर ने मना कर दिया है तो दवाई लेने से क्या लाभ ? तो वह बोले ठीक है आचार्य श्री जी हम आजीवन रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग करते हैं। कुछ दिन बाद वह वृद्ध श्रावक दर्शन करने आए तो मैंने उनसे पूछा कि- नियम अच्छी तरह चल रहे हैं। तब उन्होंने कहा- जी आचार्य श्री जी मेरा तो आपकी कृपा से केंसर ही केन्सिल हो गया अर्थात् रोग ठीक हो गया। आचार्य श्री जी ने कहा- यह है परिणाम-प्रत्यय का फल। परिणामों से चेतन–अचेतन सभी में परिवर्तन लाया जा सकता है। गरीब भी इस चिकित्सा को अपना सकता है बस धैर्य और श्रद्धान होना चाहिए।
  17. 1 point
    अनुवादित ‘समणसुत्तं' का ही नाम ‘जैन गीता' है। इसकी रचना के सम्बन्ध में आचार्यश्री स्वयं इसकी ‘मनोभावना' नामक भूमिका में लिखते हैं-“विगत बीस मास पूर्व की बात है, राजस्थान स्थित अतिशयक्षेत्र श्री महावीरजी में महावीर-जयन्ती के सुअवसर पर ससंघ मैं उपस्थित था। उस समय ‘समणसुत्तं' का जो सर्व सेवा संघ, वाराणसी से प्रकाशित है, विमोचन हुआ। यह एक सर्वमान्य संकलित ग्रन्थ है। इसके संकलनकर्ता ब्र. जिनेन्द्र वर्णी हैं। (आपने सन् १९८३ में ईसरी (गिरिडीह) बिहार में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण करके क्षुल्लक श्री सिद्धान्तसागर महाराज के रूप में सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण प्राप्त किया था, आपने जैन-सिद्धान्त का आलोडन करके यह नवनीत समाज के सामने प्रस्तुत किया है।)” इस ग्रंथ में चारों अनुयोगों के विषय यथास्थान चित्रित हैं। अध्यात्म रस से गोम्मटसार आदि ग्रंथों की गाथाएँ इसमें प्रचुर मात्रा में संकलित हैं। इसी का पद्यानुवाद आचार्यश्री ने 'जैन गीता' नाम से किया। ‘समणसुत्तं' के प्रेरणास्रोत के सम्बन्ध में उन्होंने सन्त विनोबा का उल्लेख किया है। इसके समाधान में आचार्य विनोबा ने लिखा है कि उन्होंने कई बार जैनों से प्रार्थना की थी कि जैनों का एक ऐसा ग्रन्थ हो, जो सभी जैन सम्प्रदायों को मान्य हो, जैसे कि वैदिक धर्मानुयायियों का 'गीता' और बौद्धों का ‘धम्मपद' है। विनोबाजी के इस आह्वान पर ‘जैनधर्म सार' नामक एक पुस्तक प्रकाशित की। पुनः विद्वानों के सुझाव पर इसमें से कुछ गाथाएँ हटाकर और कुछ जोड़कर ‘जिणधम्म' नाम से पुस्तक प्रकाशित हुई। फिर इसकी चर्चा के लिए बाबा के आग्रह से ही एक संगीति बैठी, जिसमें मुनि, आचार्य और दूसरे विद्वान्, श्रावक मिलकर लगभग तीन सौ लोग इकट्ठे हुए। बार-बार चर्चा के पश्चात् उसका नाम भी बदला, रूप भी बदला, जो सर्व सम्मति से श्रमणसूक्तम्'-जिसे अर्धमागधी में 'समणसुत्तं' कहते हैं, बना। ७५६ गाथाओं वाला ‘समणसुत्तं' संज्ञक ग्रन्थ का यह अनुवादित रूप है। इसमें चार खण्ड हैं। इसके प्रथम खण्ड ज्योतिर्मुख, द्वितीय खण्ड मोक्षमार्ग, तृतीय खण्ड तत्त्व दर्शन तथा चतुर्थ खण्ड‘स्याद्वाद' है।
  18. 1 point
    मैं ज्ञानधारा हूँ- प्रतिपल प्रवाहमान ध्रुव धावमान सतत गतिमान रहती हूँ प्रत्येक आत्मा में, बहती हूँ... निःशब्द मैं...।। विकारों की सघन चट्टानों से ढक देते अज्ञानी मुझे, कल-कल करती कर्मधारा का ही तब संवेदन करते हैं वे, विरला कोई ज्ञानी ही जान पाता है मुझे। मैंने आँखों से अगम और बुद्धि से दुर्गम गूढ़ रहस्यों को जाना है, अतीत के भूगर्भ को अनागत के गोद की अतलांत गहराइयों को और वर्तमान की धरा को पहचाना है। आने वाले समय की पदचाप सुनने की क्षमता । सामान्य मनुष्य में कहाँ? नियति के खेल से सब अपरिचित थे, लेकिन मैं परिचित थी मेरी ही कोख में तो समायी थी नियति की परिणति और उसका नियन्ता… जो ध्रुव अडिग दृढ़ संकल्पी चैतन्य चिन्मयी सहज निर्विकल्पी। जिनके परिचय से स्वयं का सहज परिचय होने लगता है, जिनके दर्शन से स्वयं का दर्शन कर निज को निज में ही खोने लगता है। जो नाम, काम और जगत के धाम से परे आप्तकाम, कृतकाम, पूर्णकाम होने को लालायित है..." जो अपने ही पूर्वकृत् पुण्य कर्मों से ‘माँ श्रीमंति' की कोख में अवतरित है। प्रकृति भी आज अत्यधिक पुलकित है; मानो स्वर्ग से चयकर किसी पवित्र आत्मा के आने का दे रही है संकेत… कि अचानक कुछ हल्का-सा, झलका-सा, अपूर्व-सा। सुखद अनुभूत हुआ कुछ अदभुत हुआ पर दृश्य कुछ नहीं। गर्भ के रहस्य में समा गया चेतनात्मा...! गर्भस्थ के गर्भ में ज्ञान और ज्ञान में समाया भगवान... प्रगट नहीं, किंतु इसमें बहुत कुछ अप्रगट सत्य निहित है। अंतर्मुहूर्त में आहार, शरीरादि छहों पर्याप्तियाँ पूर्णकर गर्भ में ही जगत कल्याण की कामना से मानो प्राणियों को संकेत दे रहा हो, भगवान होने की भावना ले। पर्याप्त सुख-शांति का आश्वासन दे रहा हो। कौन जानता था कि ब्रह्मचारी, मुनि, आचार्य बन मोक्षमार्ग की दूरी तय करेंगे और एक दिन अपना गंतव्य पा लेंगे।
  19. 1 point
    शंका - परमपूज्य गुरुवर के चरणों में नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु! गुरुवर! आचार्यश्री को आचार्य पद हमारे नसीराबाद में मिला एवं गुरु श्री ज्ञानसागर जी महाराज की समाधि-स्थली भी नसीराबाद में है। यह हमारे नसीराबाद का परम सौभाग्य है कि आचार्यश्री को आचार्य पद व गुरुजी की समाधि दोनों नसीराबाद में है। गुरुवर! जिस प्रकार से आपने कई प्रसंग बताए, क्या कोई इस प्रकार का प्रसंग है, जिसमें नसीराबाद की कोई चर्चा आई हो या गुरूणां गुरु श्री ज्ञानसागर जी महाराज की कोई चर्चा आई हो? - श्री सुजीत जैन, नसीराबाद समाधान - देखो, आचार्यश्री के साथ चर्चा में नसीराबाद का उल्लेख कई बार आया और गुरूणां गुरु ज्ञानसागर जी महाराज के बारे में भी कई बार चर्चा हुई। एक चर्चा जिसे कल ही उन्होंने अपने प्रवचन में सुनाया, ज्ञानसागर जी महाराज के व्यक्तित्व को रेखांकित स्वर्णिम यात्रा करती हुई बात है। एक बात और मैं बता रहा हूँ कि गुरुदेव जब भी चर्चा करते हैं अपनी बढ़ाई की बात कभी नहीं करते और गुरूणां गुरु ज्ञानसागर जी महाराज की बात आती है तो कभी चूकते नहीं। वह गुरूणां गुरु ज्ञानसागर जी महाराज की नि:स्पृहता का उल्लेख करते हुए कह रहे थे कि एक सज्जन, एक विद्वान् जो वाराणसी के विद्वान् थे, प्रतिष्ठित विद्वान् थे, उन्होंने ज्ञानसागर जी महाराज से पूछा कि महाराज आपको दीक्षा लिए कितना समय हो गया है? तो ज्ञानसागर जी महाराज ने कहा कि अभी-अभी दीक्षा लेकर ही बाहर आया हूँ, भीतर प्रतिक्रमण करके ही बाहर आया हूँ। यही मेरी दीक्षा है, यही मेरी उम्र है, यही मेरी जीवन की वास्तविकता है। वे ज्ञानसागर जी महाराज के विषय में बताते थे कि ज्ञानसागर जी महाराज बड़े ही नि:स्पृह, ज्ञान-आराधक साधक थे। उन्होंने अपनी दयोदय आदि कृतियों को भी लिखकर ऐसे ही छोड़ रखा था और जब किसी ने उनसे कुछ कहा तो उन्होंने कहा मैं साधक हूँ, प्रकाशक नहीं। नसीराबाद के सन्दर्भ में ऐसा कोई संस्मरण मेरे ध्यान में नहीं आ रहा, जो सीधा हमारे गुरुदेव से जुड़ा हो परन्तु ज्ञान सागर जी महाराज के बारे में कई बातें हैं।
  20. 1 point
    शंका - गुरुदेव! नमोऽस्तु! मेरी जिज्ञासा है कि आचार्यश्री बहुत करुणामय हैं, फिर भी ऐसा क्यों बोला जाता है कि गुरुवर जी कच्चे कान के हैं ? कृपया समाधान कीजिए। समाधान - देखिए, जो ऐसा बोलते हैं वे वही लोग हैं जिन्होंने आचार्यश्री को ठीक ढंग से समझा नहीं। महापुरुषों के सन्दर्भ में एक बात ध्यान रखना, उन तक सब बातें सीधी नहीं पहुँचती। जो बातें उन तक पहुँचती हैं, वे उन पर भी विचार करके उनका अर्थ निकालते हैं। हर किसी की अप्रोच ही नहीं तो कई बार देखने वाले को अनुभव में आने लगता है कि है तो कुछ और, वहाँ पहुँचा कुछ और एवं उनकी धारणा कुछ और। इसे लेकर ऐसा कह देते हैं। पर मैंने एक बात गुरुदेव में देखी है, वह कभी भी किसी की आलोचना नहीं करते और कभी किसी की आलोचना सुनते नहीं। यह उनकी बहुत बड़ी विशेषता है। अगर किसी के बारे में कभी कोई कहने भी जाए तो कहते हैं। अपनी बात करो, दूसरों की नहीं। एक बार एक ऐसा प्रसंग आया कि जब किसी की आलोचना कर रहे थे तो गुरुदेव ने एक ही बात कही दूसरे के घर में बुहारी लगाने की आदत छोड़ो यह शब्द थे दूसरे के घर में बुहारी लगाओगे तो अपने घर का कचरा साफ नहीं होगा। कभी किसी की निन्दा, कभी किसी की आलोचना, बुराई वे सुनते नहीं थे। इसलिए जो लोग यह कहते हैं कि वह आधी सुनी सुनाई बात पर धारणा बनाते हैं तो जो बात उनके सुनने में आएगी उसी पर तो वे धारणा बनाएंगे। लेकिन वह हर बात में जोड़ घटाव लगाते रहते हैं। वह सभी बातों का अपने हिसाब से आकलन करते हैं और जो सही होता है उसी के अनुरूप निर्णय लेते हैं। कभी कोई ऐसी बात उनके पास आ जाए जो वास्तविक न हो और जब उन्हें सच्चाई का पता पड़ता है तो अपनी धारणा को बदलने में एक पल का विलम्ब नहीं करते।
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    शंका - गुरुवर! नमोऽस्तु! महाराज जी! गुरु भगवन्तों के साथ में सबसे ज्यादा आनन्द भक्तों को जो आता है, वह उनके साथ विहार में चलने में आता है। आपने कई वर्षों तक आचार्यश्री के साथ विहार किया है। विहार से जुड़ा हुआ कोई संस्मरण यदि आपको याद है, तो हम सुनना चाहते हैं। - श्री अभिनन्दन जैन, पिडावा समाधान - देखो, गुरुदेव के साथ विहार करने का योग तो कई बार मिला, काफी लम्बे समय तक मिला। पाँच साल तक तो लगातार संघ के साथ ही विहार करने का सौभाग्य मिला। गुरुचरणों में ही रहने का अवसर मिला। विहार में कई तरह के अनुभव होते हैं लम्बी थकान, ऊबड़-खाबड़ सड़क और कभी-कभी सेवकों द्वारा दी गई गलत सूचना बड़ी उलझन पैदा कर देती है। उस घड़ी में मैंने गुरुदेव की जिस समता व सहजता को देखा, आज मैं अगर सिर्फ विहार के संस्मरण सुनाऊँ तो हो सकता है पूरा सत्र इसी में निकल जाए। इतनी सारी बातें आज मेरे मानस-पटल पर तैरने लगी हैं, मैं सुनाना शुरु करता हूँ। दो-तीन प्रसंग जरूर सुनाऊँगा जो बड़े प्रेरक एक बार चौबीस किलोमीटर चलना था। मेरे पाँव में फफोले थे, गुरुदेव के पाँव कट गए थे, खून की धारा बह रही थी। चर्चा-चर्चा में मुँह से निकल गया कि कैसी सड़क से ले आए, कितने कंकड़ हैं। गुरुदेव ने बात को काटते हुए कहा कि नाराज मत हो। उस पथिक की क्या परीक्षा जिसके पथ में शूल न हों। उस नाविक की क्या परीक्षा जिसमें धारा प्रतिकूल न हो। उसे मत कोसो, जिसने तुम्हें निर्जरा करने का मौका दिया है। मुस्कुराते चलो, आगे बढ़ो। सन् 1993 में जब बीनाबारहा से रामटेक की ओर विहार हो रहा था उसके मध्य सिवनी और खबासा के बीच में एक गाँव था। कुरई। घाटी पड़ती है, वहाँ चल रहे थे। सड़क नई बन रही थी। वहाँ मोटी-मोटी गिट्टियाँ थी। जून का महीना था और जो गिट्टियाँ थी वह नस्तर की तरह चुभ रही थीं। काफी लम्बा विहार करके वहाँ तक पहुँचे थे। आचार्य गुरुदेव, हमारे, समयसागर जी और कुछ मुनिराजों के पाँव छलनी हो गए थे। एक-एक कदम पर खून गिर रहा था। मैंने उस चुभन युक्त रास्ते पर चलते-चलते गुरुदेव से कहा कि तीर्थंकरों के लिए बहुत अच्छा सिस्टम है। उन्होंने पूछा क्या? हमने कहा उनके लिए फूल बिछ जाते हैं। उन्होंने कहा- चार अंगुल ऊपर चलने की क्षमता ले आओ, तुम्हारे लिए भी बिछ जाएँगे। सन् 1986 की बात है। मैं उन दिनों क्षुल्लक था। मड़ावरा से एक गाँव नैकोरा जाना था, सड़क मार्ग से दूरी 12 किलोमीटर बताई थी। गुरुदेव चले, 3-4 किलोमीटर चले कि कुछ भाई लोग मिले। वह बोले महाराज! इस तरफ से 3 किलोमीटर शॉर्ट है। उनकी बात सुनकर मूल रास्ते को छोड़कर साइड के रास्ते को पकड़ लिया। 3 किलोमीटर चलने के बाद एक गाँव आया 'लोहरा' उसके बाद 2 किलोमीटर और चले तो आया 'डोंगरा' दोनों जगह मंदिर के दर्शन किए, फिर वहाँ से चले, चलते ही जा रहे हैं नैकोरा का कोई पता ही नहीं। 12 किलोमीटर चलना था, 16 किलोमीटर से ज्यादा विहार हो गया। नैकोरा का पता नहीं, गुरुदेव देखें कि अब दिन अस्त होने वाला है, स्थान का कोई ठिकाना नहीं। वहाँ एक मैदान जैसा था, वहाँ जाकर बिना पाटा व चटाई के बैठ गए। मुर्मिला इलाका था, कंकड़ थे और बिना पाटा व बिना चटाई के बैठ गए। अप्रैल का पहला सप्ताह था, गर्मी बहुत थी, हल्की-फुल्की लू चल रही थी तो सभी लोगों ने घी लगा दिया। रातभर चीटियाँ उनके शरीर पर चढ़ गईं। सुबह होने पर सभी लोगों ने सोचा कि गुरुदेव 7-8 किलोमीटर दूर क्षेत्र है ‘नवागढ़ वहाँ आहार करेंगे और गुरुदेव सीधे चले तो 21-22 किलोमीटर चलकर सीधे अजनौर पहुँच गए। रात में इतनी थकान, पहले दिन इतने चले कि सो नहीं पाए, चीटियों ने कष्ट दिया। सब लोग कहने लगे कि किन लोगों ने रास्ता बता दिया? जिन लोगों ने रास्ता बताया उन्हें गालियाँ देने लगे। हम साधुओं में से भी कुछ को गुस्सा आ रहा था, कोस रहे थे, पर क्या करें। गुरुदेव ने कहा किसी को मत कोसो, उनको धन्यवाद दो कि उन्होंने हमें तपस्या करने का एक अवसर दे दिया। मैंने उन्हें देखा है कि वे सदा प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रसन्नता। रखने का स्वभाव रखते हैं, जब कभी कोई ऐसी बात होती है तो कभी भी उल्टी प्रतिक्रिया नहीं देते। सन् 1993 की बात है, बेलखेड़ा से तारादेही जाना था। एक सीधा रास्ता जो मुझे बताया कि लगभग 30 किलोमीटर का पड़ता है, बोले पहाड़ी के रास्ते से चलेंगे तो 18 किलोमीटर में हो जाएगा। फरवरी का महीना था, हमने पता किया और सोचा 30 किलोमीटर का रास्ता 18 किलोमीटर में होता है तो 1 दिन बचेगा। हमने वह रास्ता गुरुदेव का आशीर्वाद लेकर फाइनल कर दिया। अब चले तो एक पहाड़ चढ़े, उतरे, फिर एक और पहाड़ चढ़े, उतरे। वह 18 किलोमीटर नहीं लगभग 25-26 किलोमीटर हो गया। उस दिन पूरा संघ कई हिस्सों में बँट गया। तीन महाराज ही तारादेही पहुँच पाए। गुरुदेव, हम और छह अन्य मुनिराज तारादेही से तीन किलोमीटर पहले एक गाँव में रुक गए, शाम होने को थी। एक सरकारी स्कूल मिला, जिसके दरवाजे खिड़कियाँ अन्दर से लगाने की व्यवस्था नहीं थी। बड़े-बड़े सेंध थे, रोशनदान टूटे हुए थे, अंग्रेजी खप्पर वाला मकान था और पाँच-सात खप्पर भी टूटे हुए थे। शीत लहर प्रचण्ड थी। हम छह महाराज थे, चारों के चारों ही बिना चटाई वाले। इधर सारे महाराज हमें कोसे कि हमने कैसा रूट तय किया। अब हम क्या बोलें? भाई गलती है, हमें मालूम तो था नहीं। समय बचे, शार्ट रास्ता है इस भाव से हमने बात कर ली। सुबह हुई गुरुदेव के चरणों में गए, उनको नमोऽस्तु किया। वैसे एक ही कमरा था, उसी में सब लोग थे तो गुरुदेव को थोड़ी सी ओट कर दी थी। उन्होंने पूछा कैसी कटी रात? मैंने कहा, सुबह की प्रतीक्षा में। उन्होंने एक शब्द कहा कि रास्ता बताने वाले पर गुस्सा तो नहीं आया? हमने कहा गुस्सा हमें तो नहीं आया पर यह मुनिराज हम पर गुस्सा कर रहे हैं, आप समझाइए इन्हें। उन्होंने कहा- देखो यहाँ तो अभावकाश योग है। हमें अच्छी भावना रखनी चाहिए, अभ्रावकाश योग यानी शीतकाल में खुले चौपाल पर रहना चाहिए। अरे इतना नहीं कर सकते हम, संहनन के निमित्त से कम से कम इन निमित्तों को स्वीकार करके योग धारण कर लिया करो। इसी में आनन्द है, जब भोगना ही है तो आनन्द से क्यों न भोगो? स्वर्णिम यात्रा ऐसे कितने प्रसंग मैं सुनाऊँ, बहुत सारे प्रसंग हैं। जब-जब ऐसे प्रसंग घटे, उनके प्रति हमारा मस्तक श्रद्धा से नम्रीभूत हुआ, क्योंकि वास्तव में वे एक महान् आध्यात्मिक पुरुष हैं, सन्त हैं। अध्यात्म को भी जीते हैं, उन्होंने अध्यात्म को आत्मसात किया है। कभी मैंने उनके मुख से ऐसी प्रतिक्रिया नहीं देखी जो कहें कि ऐसा क्यों हुआ। बल्कि हमारी तरफ से उन्होंने तरफदारी की। महाराजों को कहा कि इसमें इनका क्या दोष। हमें ऐसा नहीं कहना चाहिए, सहन करना चाहिए। हम जितना सहन करेंगे, हम उतना समर्थ बनेंगे।
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    ब्रह्मचर्य से अर्थ वस्तुत:, सही-सही मायने में है- चेतन का भोग। ब्रह्मचर्य का अर्थ भोग से निवृत्ति नहीं है, भोग के साथ एकीकरण और रोग-निवृत्ति है। जड़ के पीछे पड़ा हुआ व्यक्ति, चेतन द्रव्य होते हुए भी जड़ माना जायेगा। जिस व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य आत्मा नहीं है वह गुलाम है। बोध की चरम सीमा होने के उपरान्त ही शोध हुआ करता है। उस बोध को ही शोध समझ लें तो गलत है और आज यही गलती हो रही है। शोध का अर्थ है - अनुभूति होना। मणिमय मन हर निज अनुभव से, झग-झग झग-झग करती है, तमो - रजो अरु सतो गुणों के, गण को क्षण में हरती है। समय – समय पर समयसार मय, चिन्मय निज ध्रुव मणिका को, नमता मम निर्मम मस्तक तज, मृणमय जड़मय मणिका को || (निजामृतपान) धर्म प्रेमी बन्धुओ! भगवान् महावीर ने जो सूत्र हमें दिये, उनमें पाँच सूत्र प्रमुख हैं, उनमें से चौथा सूत्र है ब्रह्मचर्य जो अत्यन्त महत्वपूर्ण है। पतित से पावन बनने का यह एक अवसर है। यदि हम इस सूत्र का आलम्बन लेते हैं तो अपने आपको पवित्र बना सकते हैं। ब्रह्मचर्य की व्याख्या आप लोगों के लिए नई नहीं है, किन्तु पुरानी होते हुए भी उसमें नयेपन के दर्शन अवश्य मिलेंगे। ब्रह्मचर्य का अर्थ है-अपनी परोन्मुखी उपयोग धारा को स्व की ओर मोड़ना, बहिर्दूष्टि-अन्तर्दूष्टि बन जाये, बाहरी पथ-अन्तर पथ बन जाये। बहिर्जगत् शून्य हो जाये, अन्तर्जगत् का उद्धाटन हो। यह ध्यान रहे कि ब्रह्मचर्य का अर्थ वस्तुत: सही-सही मायने में है - 'चेतन का भोग।' ब्रह्मचर्य का अर्थ भोग से निवृत्ति नहीं, भोग के साथ एकीकरण और रोग निवृत्ति है। जिसको आप लोगों ने भोग समझ रखा है वह है रोग का मूल और ब्रह्मचर्य है जीवन का एकमात्र स्त्रोत। दस साल विगत प्राचीन बात है, एक विदेशी आया था, वह कह रहा था कि ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना कठिन है, आप इसे न अपनायें क्योंकि आज के जितने भी वैज्ञानिक हैं उन सबने यह सिद्ध किया है कि भोग के बिना जीवन नहीं है। मैंने भी उन्हें यही समझाया कि भोग जहाँ पर है वहीं पर तो मैं रोग समझता हूँ। आपके भोग का केन्द्र भौतिक सामग्री है और मेरे भोग की सामग्री बनेगी ‘चैतन्य शक्ति'। विषय वासना मृत्यु का कारण है, मृत्यु दुख है, दुख का कूप है और ब्रह्मचर्य जीवन है, आनन्द है, सुख का कूप है। आप सुख चाहते हैं, दुख से निवृत्ति चाहते हैं तो चाहे आज अपनायें, चाहे कल अपनायें, कभी भी अपनायें किन्तु आपको अपनाना यही होगा। रोग की निवृत्ति के लिए औषधपान परमावश्यक होता है। बिना औषधपान के रोग ठीक नहीं हो सकेगा। भगवान् महावीर ने जो चौथा सूत्र ब्रह्मचर्य का दिया है वह बहुत महत्वपूर्ण है, अपने में पूर्ण है। आज तक जितने भी अनन्त सुख के भोक्ता बने हैं उन सबने इसका समादर किया है और जीवन में अपनाया है, अपने जीवन में इसको स्थान दिया है, मुख्य सिंहासन पर विराजमान कराया है इसे, भोग-सामग्री को नहीं। ब्रह्मचर्य पूज्य बना किन्तु भोग सामग्री आज तक पूज्य नहीं बनी। हाँ ब्रह्मचर्य पूज्य तो आपकी दृष्टि में भी बना किन्तु पूजा तो भोग-सामग्री की हो रही है आप लोगों के द्वारा, यह एक दयनीय बात है, दुख की बात है। जैन साहित्य या अन्य कोई दार्शनिक-साहित्य देखने से विदित होता है कि आत्मा को सही-सही रास्ता तभी मिल सकता है जब कि हम उस साहित्य का अध्ययन, मनन, चिन्तन व मन्थन करें। हम मात्र उसे सुनते हैं। सुनने से पहले यह सोचना होगा कि हम क्यों सुन रहे हैं ? दवाई लेने से पूर्व हम यह निर्णय अवश्य करते हैं कि दवा क्यों ली जाये? एक घंटे यदि श्रवण करते हैं तो मैं समझता हूँ कि इसके लिए कम से कम आठ घन्टे चिन्तन-मननमन्थन आवश्यक है। मैं कैसे खिलाऊँ। आप लोगों को कैसे पिलाऊँ आप लोगों को, जबकि आप लोगों की पाचन की ओर दृष्टि ही नहीं है। वह पचेगा नहीं तो दुबारा खिलाना ही बेकार चला जायेगा। उस खाये हुए अन्न को मात्र विष्ठा नहीं बनाना है, उसमें से सारभूत तत्व को अपनी जठराग्नि के माध्यम से पकड़ना है। जठराग्नि ही नहीं तो फिर क्या होगा? संग्रहणी के रोगी को जैसे होता है कि ऊपर से डालते हैं वह वैसे ही निकल जाता है, उसी प्रकार आपकी स्थिति है। पर फिर भी कुछ गुंजाइश है, जठराग्नि कुछ उत्तेजित हो जाये और कुछ हजम हो जाये तो ठीक ही है। उपयोग की धारा को बाहर से अन्दर की ओर लाना है, तभी ब्रह्मचर्य व्रत पालन हो सकता है अथवा यूँ कहिये कि उपयोग की धारा जिस पदार्थ में अटक रही है उस पदार्थ से वह स्थानान्तरित (Transfer) हो जाये और गहराई तक उतरने लग जाये। चाहे अपनी आत्मा में भी जाये, चाहे दूसरे की आत्मा में भी जाये पर उपयोग को खुराक मिलनी चाहिए ‘आत्मतत्व' की, जड़ नहीं अपितु चैतन्य की! जहाँ पर बहुत सारी निधियाँ हैं, बहुत सारी संख्या बिछी हुई है। वह सम्पदा उस उपयोग की खुराक बन सकती है, सही-सही मायने में वही खुराक है और इसके लिए हमारे आचार्यों ने ब्रह्मचर्य व्रत पर जोर दिया है, क्योंकि उस आत्मा को एक बार तृप्त करना है जो अनादिकाल से तप्त है। ब्रह्मचर्य का विरोधी धर्म है ‘काम’, इस काम के ऊपर विजय प्राप्त करनी है। यह काम और कोई चीज नहीं है, ध्यान रखिये वही उपयोग है जो कि बहिवृत्ति को अपनाता जा रहा है उसी का नाम है काम। वही उपयोग, जो कि भौतिक सामग्री में अटका हुआ है, वही काम है महाकाम है, यह अग्नि अनादिकाल से जला रही है उस आत्मा को। कामाग्नि बुझे और आत्मा शांत हो। उस कामाग्नि को बुझाने में दुनियाँ का कोई पदार्थ समर्थ नहीं है, बल्कि यह ध्यान रहे कि उस कामाग्नि को प्रदीप्त करने के लिए भौतिक सामग्री घासलेट-तेल का काम करती है। आपको यह आग बुझानी है, या उदीप्त करनी है ? नहीं, नहीं! बुझानी है, ये चारों ओर जो लपटें धधक रही हैं उसमें से अपने को निकालना है और वहाँ पर पहुँचना है जहाँ चारों ओर लपटें आ रही हैं शान्ति की, आनन्द की, सुख की। हम यहाँ एक समय के लिए भी आनन्द की श्वास नहीं ले रहे हैं। ऐसे दीर्घ श्वास तो निकल रहे हैं जो कि दुख के, परिश्रम के प्रतीक हैं श्वाँस की गति अवरूद्ध नहीं है, चल रही है, अनाहत चल रही है किन्तु आनन्द के साथ नहीं क्योंकि मृत्यु की स्मृति या मृत्यु का वार्तालाप भी सुनते ही हृदय की गति में परिवर्तन आ जाता है और विषय की, वासनाओं की जो लहर चल रही है उसमें आप रात दिन आपाद कण्ठलीन हैं, उसी का परिणाम दुख के साथ श्वास है, सुख के साथ नहीं। इस काम के ऊपर विजय प्राप्त करना है अर्थात् अपने बाहर की ओर जा रहे उपयोग को जो कि भौतिक सामग्री में अटक रहा है उसे आत्मा में लगाना है। आत्मा में नहीं लगा पाते इसीलिए कामाग्नि धधक रही है। काम पुरुषार्थ का उल्लेख मिलता है भारतीय साहित्य में। कई लोगों की इस काम-पुरुषार्थ के बारे में यह दृष्टि रह सकती है कि काम-पुरुषार्थ का अर्थ भोग है, पर लौकिक नहीं चैतन्य का। सही-सही मायने में वह काम-पुरुषार्थ से ही मोक्ष-पुरुषार्थ की ओर जाना है। वह काम-पुरुषार्थ की ओर देखते हुए, उसका अध्ययन करते हुए क्या मोक्ष-पुरुषार्थ में जा सकता है क्योंकि वहाँ से जाने का कोई रास्ता नहीं है? लेकिन काम-पुरुषार्थ का अर्थ बाह्य वातावरण में घूमते रहना ही नहीं लेना चाहिए, काम-पुरुषार्थ का अर्थ ही है गहरे उतरना। काम+पुरुष+अर्थ, इन तीन शब्दों के योग से ‘काम-पुरुषार्थ' यह पद निष्पन्न हुआ है। काम-पुरुष-अर्थ, काम अर्थात् भोग, पुरुष अर्थात् प्रयोजन। पुरुष के लिए काम आवश्यक है, पुरुष के दर्शन के लिए नितान्त आवश्यक है, इसके बिना वहाँ पहुँच नहीं सकते हम। अर्थात् चैतन्य भोग के बिना हम आत्मा तक पहुँच ही नहीं सकते। पहुँचना वहीं पर हैं-पुरुष तक पहुँचने के लिए यह काम (चैतन्य भोग) सहायक तत्व है। आप लोग अटकने वाला गुलाम होता है। आप तो गुलाम हैं आप मानो या न मानो, क्योंकि जिस व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य पुरुष (आत्मा) नहीं है वह गुलाम तो है ही। जड़ के पीछे पड़ा हुआ व्यक्ति चेतन द्रव्य होते हुए भी जड़ माना जायेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है और जो लक्ष्य से पतित हैं वे भटके हुए माने जायेंगे इसमें कोई सन्देह नहीं है। काम-पुरुषार्थ से धीरे-धीरे उन्नत करने के लिये यह भारतीय आचार संहिता है जो कि विवाह के ऊपर जोर देता है। कई लोगों की दृष्टि हो सकती है कि विवाह अर्थात् ब्रह्मचर्य से स्खलित करना, किन्तु नहीं! ब्रह्मचर्य के और निकट जाना है यह शार्टकट है, घुमावदार रास्ता है वहाँ पर जाने के लिये, क्योंकि विवाह की डोरी में बंधने के बाद वह आत्मा फिर चारों ओर से अपने आप को छुड़ा लेता है और उस डोरी के माध्यम से वह आत्मा तक पहुँचने का प्रयास करता है। कोई किसी बहाव को देश से देशान्तर ले जाना चाहते हैं तो उसे रास्ता देना होगा तभी वह बहाव वहाँ तक पहुँच पायेगा अन्यथा बह मरुभूमि में समाप्त हो जायेगा। आप लोगों का उपयोग भी आज तक पुरुष के पास इसलिये नहीं पहुँच रहा है कि इस तक बहने के लिये कोई रास्ता आपके पास नहीं है और अनन्तों में जब बह बहने लग जाता है तो वह उपयोग सूख जाता है क्योंकि छद्मस्थों का ही तो उपयोग है। उस उपयोग के लिये, उस झरने के लिये कुछ रास्ता आवश्यक है, अनन्तों से वह रास्ता बन्द हो जाता है। इसके लिये सही-सही रास्ता आवश्यक है और वही है काम, वही है असली विवाह, जिसके माध्यम से वह वहाँ तक जा सके। आपने विवाह के बारे में सोचा है कुछ आज तक? जहाँ तक मैं समझता हूँ इस सभा में ऐसा कोई भी नहीं होगा जो विवाह से परिचित न होगा, लेकिन विवाह के उपरान्त भी वह पुरुष (आत्मा) के पास गया नहीं, इसलिए विवाह केवल एक रुढ़िवाद रह गया है। विवाह से अर्थ काम-पुरुषार्थ है और यह आवश्यक है, किन्तु इस विवाह के दो रास्ते हैं एक गृहस्थ आश्रम सम्बन्धी व दूसरा मुनि आश्रम सम्बन्धी। आप लोगों ने उचित यही समझा कि गृहस्थाश्रम का विवाह ही अच्छा है। अनन्त भोग सामग्रियों से आपको मुक्ति मिलनी चाहिए थी किन्तु नहीं मिल पाई। जिस समय विवाह-संस्कार होता है उस समय उस उपयोगवान आत्मा में संकल्प दिया जाता है पंडितजी के माध्यम से कि अब तुम्हारे लिये संसार में जो स्त्रियाँ हैं वे सब माँ बहिन और पुत्री के समान हैं। आपके लिए एकमात्र रास्ता है, इसके माध्यम से चैतन्य तक पहुँचने का। प्रयोगशाला में एक विज्ञान का विद्यार्थी जाता है, प्रयोग करना प्रारम्भ करता है जिस पर प्रयोग किया जाता है उसकी दृष्टि उसी में रुक जाती है और वह अपने आपको भूल जाता है पासपड़ोस को तो भूल ही जाता है, स्वयं को भी भूल जाता है। एकमात्र उपयोग काम करता है तब वह विज्ञान का विद्यार्थी सफलता प्राप्त करता है, प्रयोग सिद्ध कर लेता है प्रेक्टीकल के माध्यम से वह विश्वास को दृढ़ बना लेता है ऐसी ही प्रयोगशाला है विवाह। विवाह का अर्थ है दो विज्ञान के विद्यार्थी पति और पत्नि। पत्नी के लिये प्रयोगशाला है पति और पति के लिये प्रयोगशाला है पत्नी, पत्नी का शरीर नहीं आत्मा! यह ध्यान रहे कि वे ऊपर से स्त्री व पुरुष हैं पर अन्दर से दोनों पुरुष हैं (अर्थात् आत्मा हैं)। स्त्रियाँ भी पुरुष के पास जा रही हैं और पुरुष भी पुरुष के पास जा रहे हैं। दोनों पुरुष हैं पर ऊपर स्त्री पुरुष के वेद के भेद हैं। किन्तु वेद के भेद ही वहाँ पर अभेद के रूप में परिणत हो रहे हैं और अभेद की यात्रा प्रारम्भ हो रही है, यह है विवाह की पृष्ठ-भूमि! अभी तक आप लोगों ने विवाह तो किया होगा पर पति सोचता है पत्नी मेरे लिये भोग-सामग्री है और पत्नी सोचती है कि पुरुष-पति मेरे लिये भोग-सामग्री है, बस इतना ही समझकर ग्रन्थि बन जाती है, विवाह हो जाता है बंधन में बंध जाते हैं, इसलिये आनन्द नहीं आता। इसीलिये जैसे-जैसे भौतिक कायायें सूखने लगती हैं, बेल सूखने लगती है, समाप्त प्राय: होने लग जाती है तो दोनों एक दूसरे के लिये घृणा के पात्र बन जाते हैं। पति से पत्नी की नहीं बनती और पत्नी से पति की नहीं बनती और बस बीच में दीवार खिंच जाती है। वह तो लोक नाता है जिसे निभाते चले जाते हैं निभता नहीं निभाना पड़ता है क्योंकि अग्नि के समक्ष संकल्प किया था। दो बैल थे, वे एक गाड़ी में जोत दिये गये। एक किसान गाड़ी को हांकने लगा। एक बैल पूर्व की ओर जाता है तो एक बैल पश्चिम की ओर, बस परेशानी हो जाती है। बैलों को तो पसीना आता ही है, किसान को भी पसीना आना प्रारम्भ हो जाता, वह सोचता है कि अब गाड़ी आगे नहीं चल पायेगी। यही स्थिति गृहस्थाश्रम की है। आप लोगों का रथ प्राय: ऐसा ही हो जाता है। पत्नी एक तरफ खींच रही है तो पति दूसरी ओर, अन्दर का आत्मा सोच रहा है कि यह क्या मामला हो रहा हैं ? आप लोग आदर्श विवाह तो करना चाहते हैं दहेज से परहेज करने के लिए किन्तु आदर्श विवाह के माध्यम से अपने जीवन को आदर्श नहीं बना पाये। इसलिए आपका वह आदर्श विवाह एकमात्र आर्थिक विकास के लिए कारण बन सकता है किन्तु पारमार्थिक विकास के लिए कारण नहीं बनता। आदर्श विवाह था राम और सीता का। दोनों ने किस प्रकार उस विवाह के माध्यम से, डोरी के माध्यम से, सम्बन्ध के माध्यम से अपने जीवन को सफलीभूत बनाया। आपको याद रहे कि वह सीता भोग सामग्री थी राम के लिए, राम भोग सामग्री थे सीता के लिए। पर उनकी दृष्टि में अनन्त जो सामग्री बिछी थी चारों ओर वह भोग सामग्री नहीं थी, उस प्रयोगशाला में जो कोई भी पदार्थ इधर-उधर बिखरा हुआ है, विद्यार्थी को उनका कोई ध्यान नहीं रहता उसी प्रकार उन्हें बाहर की वस्तुओं से कोई मतलब नहीं था। उनकी यात्रा अनाहत चल रही थी। इसी बीच हजारों स्त्रियों के साथ जीने वाला रावण, एक भूमिगोचरी सीता के ऊपर दृष्टिपात करता है किन्तु सीता की आत्मा के ऊपर दृष्टिपात नहीं करता, सीता की आत्मा तक उसकी दृष्टि नहीं पहुँचती अपितु गोरी-गोरी उस काया की माया में डूब जाता है और अपने जीवन को भी वह धो देता है। यह ध्यान रहे कि उसकी दृष्टि सीता की आत्मा तक पहुँच जाती तो उसे अवश्य मार्ग मिल जाता, उसका जीवन सुधर जाता। सीता की चर्या के माध्यम से राम का जीवन सुधरा और राम के जीवन के माध्यम से सीता का जीवन सुधरा। वे एक दूसरे के पूरक थे। जैसे कि राह में दो विद्यार्थी परस्पर एक दूसरे के सहयोग से चलते जाते हैं, गिरते नहीं हैं। इस प्रकार वे दोनों भी चले जा रहे थे। इधर-उधर उपयोग न भटके इसलिए दृढ़ निश्चय करके एक ही विषय में दो विद्यार्थी जुटे हुए थे, वे राम और सीता। ज्यों ही रावण बीच में आया, तो राम सोचते हैं कि इसके लिए यहाँ पर स्थान नहीं है, हमारे जीवन के बीच में कोई नहीं आ सकता। कोई आता है तो वह व्यवधान सिद्ध होगा और उस व्यवधान को हम सर्वप्रथम दूर करेंगे। जब तक यह रहेगा तब तक हम दोनों का जीवन एक साथ चल नहीं सकता। फिर भी रावण आता है तो राम को कुछ प्रबन्ध करना ही पड़ता है। रावण को मारने का इरादा नहीं किया राम ने, मात्र अपने प्रशस्त मार्ग में आने वाले व्यवधान को हटाने का प्रयास किया और सीता के पास जाने का प्रयास किया उन्होंने। सीता ने जिस संकल्प के साथ इस ओर कदम बढ़ाया था, उसकी रक्षा करना, समर्थन करना राम का परम धर्म था और राम का समर्थन करना सीता का परम धर्म था। उन दोनों ने धर्म का अनुपालन किया। भोग का (सांसारिकता का) अनुपालन नहीं, योग (चैतन्य) का सहारा लिया, उसके बिना चल नहीं सकते थे, चलना अनिवार्य था, मंजिल तक पहुँचना था, इसलिए साथी को अपनाया यह ध्यान रहे कि विवाह पद्धति का अर्थ मोक्ष-मार्ग में साथी बनाना है। विवाह का अर्थ संसार-मार्ग की सामग्री नहीं है। विवाह तो पाश्चात्य शहरों में भी होते हैं पर वहाँ के विवाह, विवाह नहीं कहलाते । वहाँ पर पहले राग होता है और तब बन्धन होता है, यहाँ पहले बन्धन होता है, पीछे राग होता है, और वह राग, राग नहीं आत्मानुराग प्रारम्भ होता है। पहले संकल्प दिये जाते हैं फिर बाद में उनके साथ सम्बन्ध होता है, अन्यथा नहीं। इसका अर्थ क्या? इसका अर्थ बहुत गूढ़ है। जब तक उनका (राम व सीता का) सांसारिक गृहस्थ धर्म चलता रहा तब तक उन्होंने एक दूसरे के पूरक होने के नाते अपने आप के जीवन को चलाया। अन्त में सीता कहती है कि हमने एम. ए. तो कर लिया अब पीएच. डी. करना है स्वयं का शोध करना है। शोध के लिए पर्याप्त बोध मिल चुका है, बोध की चरम सीमा हो चुकी है। बोध की चरम सीमा होने के उपरान्त ही शोध हुआ करता है। एम. ए. का विद्याध्ययन शोध के लिए आवश्यक है, उसके बिना शोध नहीं हो सकता उस बोध को ही शोध समझ लें तो गलत हो जायेगा, आज यही हो रहा है। शोध करना तो दूर रह जाता है मात्र इतना ही पर्याप्त समझ लेते हैं कि सोलहवीं कक्षा पास कर ली तो हमने बहुत कुछ कर लिया, पर वस्तुत: किया कुछ नहीं। शोध अब प्रारम्भ होगा अपनी तरफ से अनुभूति अब प्रारम्भ होगी। अभी तक अनुभूति नहीं, मात्र Guideline (दिशानिर्देश) मिली है। एम. ए. का अर्थ है दूसरे के Guidance (मार्गदर्शन) के माध्यम से अपने आप के बोध को समीचीन बनाना और फिर इसके उपरान्त अनुभूति का अर्थ-अब किसी प्रकार की Taxt BOOK नहीं है, कोई बन्धन नहीं है, अब शोध करना है। सीता के पास अब इतनी शक्ति आ चुकी थी कि वह राम से कहती है अब मुझमें इतनी शक्ति आ चुकी है कि आपकी आवश्यकता नहीं है। अब तीन लोक में जो कोई भी पदार्थ बिखरे हुए हैं, उनमें से किसी भी पदार्थ को निकाल कर उनमें से आत्मा को चुन सकती हूँ और बोध का विषय बना सकती हूँ। (जैसे कि सामान्य शोध छात्र पुस्तकालय में से अपने विषय की पुस्तक चुन लेता है) उसके माध्यम से मैं अपनी यात्रा बढ़ा सकती हूँ। अब राम, तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं है। अब स्वावलम्बी जीवन आ गया। अब विवाह की डोरी को तोड़ना चाहती हूँ ध्यान रखना पहले नहीं तोड़ी। वह कहती है अब मैं इस पाठशाला में नहीं रहूँगी। ऊपर उढूँगी और पंचमुष्टि केशलुचन कर लेती है। राम अभी शोध छात्र नहीं थे, अत: वे प्रणिपात हो गये उसके चरणों में। जिन्होंने विषय चुन लिया, शोध छात्र बन गया, ऊपर उठ गया वह अब विद्यार्थी नहीं, छात्र तो इसलिए मान लिया जाता है कि अभी भी कुछ कर रहा है। अब वह स्नातक से भी ऊपर उठ चुका है, अब वह विद्यार्थी नहीं है, भले ही उसे विद्यार्थी कहो पर वह अब मास्टर बन गया है। राम ने अभी इतना साहस नहीं किया था इसलिए उन्होंने सीता के चरणों में प्रणिपात किया और अपने आप को कमजोर महसूस करने लगे कि देखो यह एक अबला होकर भी शोध छात्रा बन गई। अब यह विश्व में बिखरी चैतन्य सत्ताओं के बारे में विचार करेगी, अध्ययन करेगी और उनके पास पहुँचने का प्रयास करेगी । अब सीता को राम की आवश्यकता नहीं है। राम-राम, श्याम... श्याम, रटन्त से विश्राम। रहे न काम से काम, तब मिले आतम राम॥ अब राम, राम न रहे सीता की दृष्टि में, अब दृष्टि में था आतमराम। प्रत्येक काया में छिपे हुए आतमराम को वह टटोलेगी, उन सब के साथ सम्बन्ध रखेगी, विश्व के साथ एक प्रकार से भोग यात्रा प्रारम्भ हो गई लेकिन ध्यान रहे अब आतमराम के साथ भोग है, राम के साथ नहीं। राम उस काया का नाम था, आतमराम काया का नाम नहीं है। उस अन्तर्यामी चैतन्य सत्ता में न पुरुष है, न स्त्री है, न नपुंसक है, न वृद्ध है, न बालक है, न जवान है, वह देव नहीं, नारकी नहीं, तिर्यञ्च नहीं, पशु नहीं, वह केवल आतमराम । चारों ओर आतमराम । वह सीता चल पड़ी, अकेली चल पड़ी। सीता की आत्मा कितने जबरदस्त बल को प्राप्त कर चुकी । अब वह किसी की परवाह नहीं करती। अब वह अबला नहीं है, सबला है। उसके चरणों में अब राम प्रणिपात कर रहे हैं, इस समय वे अबला थे और सीता सबला थी। वह ऊपर उठ चुकी थी। राम उससे कहते हैं कि ठहरो, मैं भी आ जाऊँ। सीता पूछती है, कहाँ आ जाऊँ? तुम्हारे साथ! किसलिए ? दोनों घर में रहें बाद में मार्ग चुन लेंगे। सीता कहती है - अरे! अब घर में रहने की कोई आवश्यकता ही नहीं है, मैं जब विद्यार्थी थी तब तक ठीक था, अब मैं विद्यार्थी से ऊपर उठ चुकी हूँ, अब आपकी कोई आवश्यकता नहीं, आपको धन्यवाद देती हूँ कि आप ने एम. ए. तक मेरा साथ नहीं छोड़ा, धन्यवाद बहुत धन्यवाद, पर अब पैरों में बहुत बल आ चुका है, आँखों को दृष्टि मिल चुकी है, अब मैं अनाहत जा सकती हूँ अब कोई परवाह नहीं, राह मिल चुकी है। राम ने अग्नि परीक्षा के बाद कहा था कि चलो प्रिये, घर चलो। वह अग्नि परीक्षा ही सीता के लिए मैं समझता हूँ स्नातक परीक्षा थी, वह उसमें सफल हो जाती है। वह राम से आगे निकल गई। राम ने बहुत कहा अभी मत जाओ। सीता कहती है-तुम पीछे आ जाओ, पर मैं अब नहीं रुक सकती, साथ नहीं रह सकती। साथ रहने पर बिखरे हुए विषय का संग्रह नहीं कर सकूंगी। इसलिए आप अपना विषय अपनायें और मैं अपना विषय अपनाती हूँ। अब आप मेरी दृष्टि में राम नहीं हैं आतमराम हैं। इस प्रकार लिंग का विच्छेद करके, वेद का विच्छेद करके, वह अभेद यात्रा में चली गई, यह घड़ी उसकी आत्मा की अपनी घड़ी थी। उसी दिन उसके लिए मोक्ष-पुरुषार्थ की भूमिका बन गई। यह काम पुरुषार्थ का ही सुफल था कि वह मोक्ष-पुरुषार्थ में लीन थी, अब वह मोक्ष पुरुषार्थी थी, काम पुरुषार्थी नहीं। राम ने सोचा कि - क्या मैं कमजोर हूँ ? उन्हें अबला से शिक्षण मिल गया। वे भी शोधछात्र बन गये। सीता को मालूम न था कि ये मुझसे भी आगे बढ़ जायेंगे। स्पर्धा ऐसी बातों में करनी चाहिए। आप लोग कमाने में, भौतिक सामग्री जुटाने में स्पर्धा करते हैं, ये आविष्कार हुआ, ये परिष्कार हुआ, लेकिन अन्दर क्या आविष्कार हुआ, यह तो देखो, अपने आपके ऊपर डॉक्टरेट की उपाधि तो प्राप्त कर लो। स्वयं पर नियन्त्रण नहीं है स्वयं के बारे में गहरा ज्ञान नहीं है तो मैं समझता हूँकि भौतिक ज्ञान भी आपका सीमित है। मात्र दूसरे ने जो कुछ कहा उसी को नोट कर लिया, पढ़ लिया। अन्दर ज्ञान के स्रोत हैं- वहाँ पर देखो, चिन्तन के माध्यम से देखो कितने-कितने खजाने भरे हुए हैं वहाँ पर, घुसते चले जाओ, अनन्त सम्पदा भरी पड़ी है, वह अनन्तकालीन सम्पदा लुप्त है, गुप्त है, आप सोये हुए हैं, अत: वह सम्पदा नजर नहीं आ रही। जब राम को सीता से प्रेरणा मिल जाती है, तब राम ने निश्चय कर लिया कि मुझे भी अब कॉलेज की कोई आवश्यकता नहीं, अब तो मैं भी ऊपर उठ जाऊँ। आप लोगों का जीवन कॉलेज में ही व्यतीत हो जाता है। शिक्षण जब लेते हो जब भी कॉलेज की आवश्यकता है और उसके उपरान्त अर्थ-प्रलोभन आपके ऊपर ऐसा हावी हो जाता है कि पुन: उस कॉलेज में आप को नौकरी कर लेनी पड़ती है। पहले विद्यार्थी के रूप में, अब विद्यार्थियों को पढ़ाने के रूप में, स्वयं के लिए कुछ नहीं है। उसी कॉलेज में जन्म और उसी कॉलेज में अन्त, यही मुश्किल है। डॉक्टरेट कर ही नहीं पाते एक बार स्वयं पर, अब दूसरे पर नहीं, अपने आप पर अध्ययन करो। राम ने संकल्प ले लिया और दिगम्बर दीक्षा ले ली। अब राम की दृष्टि में कोई सीता नहीं रही न कोई लक्ष्मण रहा। वे भी आतमराम में लीन हो गये। यह काम (आत्मा के लिए चैतन्य का भोग, काम पुरुषार्थ) की ही देन थी। मोक्ष-पुरुषार्थ में भर्ती कराने का साहस काम पुरुषार्थ की ही देन है। वह काम-पुरुषार्थ भारतीय परम्परा के अनुरूप हो तो मोक्ष-पुरुषार्थ की ओर दृष्टि जा सकती है, आपके कदम उस ओर उठ सकते हैं। जब दृष्टि नहीं जायेगी तो कदम उठ नहीं पायेंगे। विवाह तो आप कर लेते हैं किन्तु आपको अभी वह राह नहीं मिल पाई। भारत में पहले बन्धन है फिर राग है, वह राग वीतराग बनने के लिए है। इसमें एक के ही साथ सम्बन्ध रहा है। अनन्त के साथ नहीं, अनन्त के साथ तो बाद में, सर्वज्ञ होने पर। पहले सीमित विषय, फिर अनन्त। जो प्रारम्भ से ही अनन्त में अधिक उलझता है उसका किसी विषय पर अधिकार नहीं हो पाता। आज पाश्चात्य समाज की स्थिति है कि एक व्यक्ति दूसरे पर विश्वास नहीं करता, प्रेम नहीं करता, वात्सल्य नहीं करता। एक दूसरे की सुरक्षा के भाव वहाँ पर नहीं हैं। भौतिक सम्पदा में सुरक्षा नहीं हुआ करती, आत्मिक सम्पदा में ही सुरक्षा हुआ करती है। विवाह के पश्चात् यहाँ आपका (भारतीय परम्परानुसार) विकास प्रारम्भ होता है और वहाँ (पाश्चात्य देशों में) विनाश। वह धारा इधर भी बहकर आ रही है। राम और सीता ने विवाह को, काम-पुरुषार्थ को अपनाया, उसे निभाया, उसी का फल मानता हूँ कि राम तो मुक्ति का वरण कर चुके और स्व आनन्द का अनुभव कर रहे हैं और सीता सोलहवें स्वर्ग में विराजमान हैं वह भी गणधर परमेष्ठी बनेगी और मुक्तिगामी होगी। हम इस कथा को सुनते मात्र हैं इसकी गहराई तक नहीं पहुँचते। काम पुरुषार्थ–काम-सम्बन्ध भले किन्तु पुरुष के लिए आत्मा के लिए, भोग चैतन्य का। आप पुरुष तक नहीं पहुँचते, शरीर में ही अटक जाते हैं, रंग में ही दंग रह जाते हैं, बहिरंग में ही रह जाते, हैं, अन्तरंग में नहीं उतरते। आत्मा के साथ भोग करो, आत्मा के साथ मिलन करो, आत्मा के साथ सम्बन्ध करो। अभी कुछ देर पूर्व यहाँ मेरा परिचय दिया पर वह मेरा परिचय कहाँ था, आत्मा का कहाँ था ? मेरा परिचय देने वाला वही हो सकता है जो मेरे अन्दर आ जाये जहाँ मैं बैठा हूँ. सिंहासन पर नहीं, सिंहासन पर शरीर बैठा है। आप की दृष्टि वहीं तक जा सकती है, आपकी पहुँच भौतिक काया तक ही जा पाती है। मेरा सही परिचय है-मैं चैतन्य पुञ्ज हूँ जो इस भौतिक शरीर में बैठा हुआ है। यह ऊपर जो अज्ञान दशा में अर्जित मल चिपक गया है उसको हटाने में मैं रत हूँ, उद्यत हूँ मैं चाहता हूँ कि मेरे ऊपर का कवच निकल जाये और साक्षात्कार हो जाये इस आत्मा का, परमात्मा का, अन्तरात्मा का। आपके पास कैमरे हैं फोटो उतारने के, मेरे पास एक्सरे हैं, कैमरे के माध्यम से ऊपर की शक्ल ही आयेगी और एक्सरे के माध्यम से अन्तरंग आयेगा क्योंकि अन्तरंग को पकड़ने की शक्ति एक्सरे में है और बाह्य रूप को पकड़ने की शक्ति कैमरे में है। आप कैमरे के शौकीन हैं, मैं एक्सरे का शौकीन हूँ। अपनी-अपनी अभिरुचि है। एक बार एक्सरे के शौकीन बनकर देखो, एक बार बन जाओगे तो लक्ष्य तक पहुँच जाओगे। मैं चाहता हूँकि हम उस यन्त्र को पहचानें, ग्रहण करें, उसके माध्यम से अन्दर जो तेजोमय आत्मा अनादिकाल से बैठी है, विद्यमान है, वह पकड़ में आ जाये। लेकिन ध्यान रखना एक्सरे की कीमत बहुत होती है। प्रत्येक व्यक्ति गले में कैमरा लटका सकता है पर एक्सरे यन्त्र नहीं। एक बार एक्सरे से आत्मा को पकड़ लें बस, कैमरे से उतारा गया ढांचा बदल सकता है, शरीर बदल सकते हैं पर एक्सरे से उतारी गई आत्मा नहीं बदल सकती। अनन्तकाल व्यतीत हो चुका है व्यर्थ में, हम लक्ष्य पर नहीं पहुँचे। दिपे चाम चादर मढ़ी हाड़ पिंजरा देह | भीतर या सम जगत में और नहीं घिनगेह || (बारह भावना) आपके पास तो घिनावने पदार्थ पकड़ने की मशीन है किन्तु सुगन्धित, जहाँ किसी प्रकार के घिनावने पदार्थ नहीं हैं, वह एक आत्मा है वह हमें मिल सकती है जब हमारी दृष्टि अन्तर्दूष्टि हो जाये। जब राम ने मुनि दीक्षा धारण कर ली, घोर तपस्या में लीन हो गये तो इतनी अन्तर्दूष्टि बन चुकी थी कि बाहर क्या हो रहा है उन्हें पता ही नहीं। प्रतीन्द्र के रूप में सीता का जीव सोचता है किअरे इन्होंने तो सीधा मोक्ष का रास्ता अपना लिया मुझे तो स्टेशन पर रुकना पड़ा ये लक्ष्य तक पहुँचने वाले हैं। सीता ने सोचा कि राम डिगते हैं कि नहीं, उसने डिगाने का प्रयास किया पर राम डिगे नहीं। उन्हें फिर बाहरी पदार्थों ने प्रभावित नहीं किया, इसी को कहते हैं ब्रह्मचर्य। अपनी आत्मा में रमण करना ही ब्रह्मचर्य है। इस ब्रह्मचर्य के सामने विश्व का मस्तक नत-मस्तक हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं। उस दिव्य तत्व के सामने सांसारिक कोई भी चीज मौलिकता नहीं रखती, उनका कोई मूल्य नहीं है। इसलिये मैं उस दिव्य ब्रह्मचर्य धर्म की वन्दना करते हुए आप लोगों को यही कहूँगा कि आप लोग कैमरे को छोड़ दें और एक्सरे के पीछे लग जायें, अन्दर घुस जायें, कोई परवाह नहीं कि बाहर क्या हो रहा है ? बाहर कुछ भी नहीं होगा। अन्दर जो होगा उसे देखोगे तो बाहर कुछ घट भी जाये तो उसका प्रभाव आपके ऊपर नहीं पड़ेगा क्योंकि वह सुरक्षित आत्मद्रव्य है। बाहर कुछ भी कर लो, आत्मा इस प्रकार का Tank है कि जिसके ऊपर किसी भी प्रकार का गोला-बारूद असर नहीं करता वह अन्दर का व्यक्ति सुरक्षित रहता है किंतु वह बाहर आ जाये तो स्थिति बिगड़ जाती है। बाहर लू चलती है पर अन्दर शान्ति की लहरें चल रही हैं। उस अन्तरात्मा में लीन होने वाले व्यक्ति के चरणों में कौन नत-मस्तक नहीं होगा ? अवश्य नमस्कार करेंगे। लेकिन हम नमस्कार करके भी अपना उद्देश्य वह नहीं बना पाते कि हमें भी उस शान्त लहर का अनुभव करना है, उस शान्ति की अनुभूति अनन्तकाल में नहीं हुई है। आगे भी हो नहीं सकती, ऐसा नहीं है, हो सकती है लेकिन दृष्टि अन्दर जाये तो। काम-पुरुषार्थ को आप मात्र भोग मत मानो, वह भोग पुरुष के लिए है, आत्मा के लिए है। वास्तविक भोग वही है जो चैतन्य के साथ हुआ करता है। जब सर्वज्ञ बन जाते हैं, उस समय अनन्त चैतन्य के साथ मेल हो जाता है। उस मेल में कितनी अनुभूति, कितनी शान्ति मिलती होगी, यह वे ही कह सकते हैं, हम नहीं कह सकते। मात्र कुछ बिन्दु हमें उसके मिल जाते हैं ध्यान के समय तो हम आनन्द विभोर हो जाते हैं उस अनन्त सिंधु में गोता मारने वाले के सुख की कोई सीमा नहीं है। असीम है उसका सुख, असीम है वह शान्ति, असीम है वह आनन्द। वह आनन्द अपने को मिले इसलिए पुरुषार्थ करना है। मुनिराज भी निभोंगी नहीं होते, वे भी भोगी होते हैं किन्तु वे चैतन्य के भोक्ता बनते हैं, पाँच इन्द्रियों के लिये यथोचित विषय देते हैं किन्तु रागपूर्वक नहीं, भोग की दृष्टि से नहीं, अपितु योग की साधना की दृष्टि से- ले तप बढ़ावन हेतु नहीं, तन पोसतें तजि रसन को। (छहढाला-६वीं ढाल) विषय और भोग (काम) मात्र संपोषण की दृष्टि से माने गये हैं, किन्तु जब वह दृष्टि हट जाती है वे ही पदार्थ हमें मोक्ष-पुरुषार्थ की साधना करने में कार्यकारी हो जाते हैं। मुनिराज के द्वारा इन्द्रिय विषय (निद्रा भोजन आदि) ग्रहण किये जाते हैं पर वे विषय-पोषण की दृष्टि से नहीं होते, योग दृष्टि उनके पास रहती है, जिसमें शरीर के साथ सम्बन्ध छूटता भी नहीं है, हटता भी नहीं है और मात्र शरीर के साथ भी सम्बन्ध नहीं रहता। किन्तु चैतन्य के साथ सम्बन्ध रहता है। मुनिराज का शरीर के साथ सम्बन्ध चैतन्य खुराक के साथ रहता है। सवारी तभी आगे बढ़ेगी जब उसमें पेट्रोल डालेंगे। आप लोग भी इस काम पुरुषार्थ के माध्यम से मोक्ष-पुरुषार्थ की ओर बढ़ें और अनन्त सुख की उपलब्धि करें यही कामना है । मुझे जो यह इस प्रकार ज्ञान की, साधना की थोड़ी सी ज्योति मिली है वह पूर्वाचार्यों से (पूज्य गुरुवर श्री ज्ञानसागरजी महाराज से) मिली है। हम पूर्वाचार्यों के उपकार को भुला नहीं सकते। वैषयिक दृष्टि को भूलकर विवेक दृष्टि से इनके उपकारों को देखो, इनके द्वारा बताये कर्तव्यों की ओर दृष्टिपात करो और देखो, कि इनके सन्देश किसलिए हैं ? स्व-आत्म पुरुषार्थ के साथ उनके उपदेश आप लोगों के उत्थान के लिए हैं किन्तु उनका अपनी आत्मा में रमण स्वयं के कल्याण के लिए था। कोई भी व्यक्ति जब स्वहित चाहता है और उसका हित हो जाता है तो उसकी दृष्टि अवश्य दूसरे की ओर जाती है, इसमें कोई सन्देह नहीं। उन्होंने सोचा कि ये भी मेरे जैसे दुखी हैं, इनको भी रास्ता मिल जाये। आचार्यों को जब ऐसा विकल्प हुआ तो उन्होंने उसके वशीभूत होकर प्राणियों के कल्याण के लिए मार्ग सुझाया। महान् अध्यात्म साहित्य का सृजन किया और आज हमारे जैसे भौतिक चकाचौंध के युग में रहते हुए भी कुछ कदम उस ओर उठ रहे हैं तो मैं समझता हूँ कि बाह्य निमित से वे आचार्य कुन्दकुन्द और आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज आदि जो पूर्वाचार्य हुए उनका ऋण हम पर है और उनके प्रति हमारा यही परम कर्तव्य है कि उस दिशा के माध्यम से अपनी दिशा बदलें और दशा बदलें, अपने जीवन में उन्नति का मार्ग प्राप्त करें, सुख का भाजन बनें और इस परम्परा को अक्षुण्ण बनाये रखें ताकि आगे आने वाले प्राणियों के लिए भी यह उपलब्ध हो सके। आचार्य कुन्दकुन्द की स्मृति के साथ मैं आज का वक्तव्य समाप्त करता हूँ कुन्दकुन्द को नित नमूं , हृदय कुन्द खिल जाय | परम सुगन्धित महक में, जीवन मम घुल जाय || (दोहा दोहन)
  23. 1 point
    तीर्थंकरों को केवल ज्ञान होते ही उनके सातिशय पुण्य से समवसरण की रचना होती है। ऐसे समवसरण की विशेषताओं का वर्णन इस अध्याय में है। 1. समवसरण क्या है ? तीर्थंकरों के धर्मोपदेश देने की सभा का नाम समवसरण है। 2. समवसरण की विशेषताएँ बताइए? तीर्थंकरों को केवल ज्ञान उत्पन्न होने के बाद सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर विशेष रत्न एवं मणियों से समवसरण की रचना करता है। यह समवसरण भूतल से 5000 धनुष ऊपर आकाश के अधर में बारह योजन विस्तृत एक गोलाकार इन्द्र नीलमणि की शिला होती है। इस शिला पर समवसरण की रचना बनाई जाती है। (1धनुष = 4 हाथ अर्थात् 6 फीट) अत: यह समवसरण 30,000 फीट ऊपर रहता है। (ति.प.4/724-725) चारों दिशाओं में 20000-20000 सीढ़ियाँ होती हैं, इन सीढ़ियों से बिना परिश्रम के चढ़ जाते हैं। जैसे—आज लिफ्ट से ऊपर चढ़ जाते हैं एवं एसकेलेटर में मात्र खड़े हो जाते हैं और सीढ़ियाँ चलती रहती हैं। प्रत्येक दिशा में सीढ़ियों से लगा एक मार्ग होता है, जो समवसरण के केन्द्र में स्थित गंधकुटी के प्रथम पीठ तक जाता है। समवसरण में आठ भूमियाँ होती हैं- 1. चैत्य प्रासाद भूमि, 2. जल खातिका भूमि, 3. लतावन भूमि, 4. उपवन भूमि, 5. ध्वज भूमि, 6. कल्पवृक्ष भूमि, 7. भवन भूमि, 8. श्रीमण्डप भूमि एवं इसके आगे स्फटिक मणिमय वेदी है। इस वेदी के आगे एक के ऊपर एक क्रमश: तीन पीठ होती हैं। प्रथम पीठ, द्वितीय पीठ, तृतीय पीठ के ऊपर ही गंधकुटी होती है। इस गंधकुटी में स्थित सिंहासन में रचे हुए कमल से 4 अङ्गल ऊपर तीर्थंकर अष्ट प्रातिहार्यों के साथ आकाश में विराजमान रहते हैं। समवसरण के बाहरी भाग में मार्ग के दोनों तरफ दो-दो नाट्यशालायें अर्थात् कुल 16 नाट्यशालाएँ होती हैं, जिनमें 32-32 देवांगनाएँ नृत्य करती रहती हैं। इन द्वारों के भीतर प्रविष्ट होने पर कुछ आगे चारों दिशाओं में चार मान स्तम्भ होते हैं, जिन्हें देखने से मानी व्यक्तियों का मान गलित हो जाता है। श्री मण्डप भूमि में स्फटिक मणिमय '16 दीवारों' से विभाजित बारह कोठे होते हैं जिनमें बारह सभाएँ होती हैं। तीर्थंकर की दाई ओर से क्रमश: 1. गणधर एवं समस्त मुनि, 2. कल्पवासी देवियाँ, 3. आर्यिकाएँ एवं श्राविकाएँ, 4. ज्योतिषी देवियाँ 5. व्यन्तर देवियाँ, 6. भवनवासी देवियाँ, 7. भवनवासी देव, 8. व्यन्तर देव, 9. ज्योतिषी देव, 10. कल्पवासी देव, 11. चक्रवर्ती एवं मनुष्य, 12. पशु-पक्षी बैठते हैं। (ति.प.4/866-872) योजनों विस्तार वाले समवसरण में प्रवेश करने व निकलने में मात्र अन्तर्मुहूर्त का ही समय लगता है। समवसरण में मात्र संज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीव ही आते हैं। समवसरण में तीन लोक के जीव आते हैं,क्योंकि अधोलोक से भवनवासी और व्यन्तर देव भी वहाँ आते हैं। समवसरण में तीर्थंकर के महात्म्य से आतंक, रोग, मरण, भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी नहीं लगती है एवं हमेशा बैर रखने वाले सर्प नेवला, मृग-मृगेन्द्र भी एक साथ बैठते हैं और तीर्थंकर का उपदेश सुनते हैं। गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने इससे सम्बन्धित एक दोहा लिखा है:- पानी भरते देव हैं, वैभव होता दास। मृग-मृगेन्द्र मिल बैठते, देख दया का वास। (सर्वोदय शतक, 29) 3. समवसरण व्रत के कितने उपवास होते हैं एवं कब से प्रारम्भ होते हैं? एक वर्ष पर्यन्त प्रत्येक चतुर्दशी को एक उपवास करें। इस प्रकार 24 उपवास करें। यह व्रत किसी भी चतुर्दशी से प्रारम्भ कर सकते है तथा "ओं ह्रीं जगदापद्विनाशाये सकलगुड करडय श्रीसर्वज्ञाय अर्हत्परमेष्टिने नम:" इस मन्त्र का त्रिकाल जाप करें।
  24. 1 point
    सत्य अहिंसा जहाँ लस रही, मृषा, हिंसा को स्थान नहीं। मधुर रसमय जीवन वही, फिर स्वर्ग मोक्ष तो यही मही ।। कितनी पर हत्या हो रही, गायें कितनी रे! कट रहीं । तभी तो अरे! भारत मही, म्लेच्छ खण्ड होती जा रही ।। लालच-लता लसित लहलहा, मनुज-विटप से लिपटी अहा। भयंकर कर्म यहाँ से हो रहा, मानव दानव है बन रहा ।। केवल धुन लगी धन, धन, धन, चाहे कि धनिक हो या निर्धन । लिखते लेकिन वे साधु जन, वह धन तो केवल पुद्गल कण।। एकता नहीं मात्सर्य भाव, जग में है प्रेम का अभाव । प्रसारित जहाँ तामस भाव, घर किया इनमें मनमुटाव ।। याचना जिनका मुख्य काम, बिना परिश्रम चाहते दाम । सत्पुरुष कहें वे श्रीराम, पुरुषार्थो को मिले आराम ।। कहाँ तक कहें यह कहानी, कहते कहते थकती वाणी । रह गई दूर वीर वाणी, विस्मरित हुई, हुई पुराणी।। रसातल जा मत दुःख भोगो, मुधा पाप बीज मत बोओ। हाय! अवसर वृथा मत खोओ, मोह नींद में कब तक सोओ ।। युगवीर का यही सन्देश, कभी किसी से करो न द्वेष । गरीब हो या धनी नरेश, नीच उच्च का अन्तर न लेष ।। वीर नर तो वही कहाता, कदापि पर को नहीं सताता । रहता भूखा खुद न खाता, भूखे को रोटी खिलाता ।। क्लव यह, करे सद् “विद्याभ्यास” रहे वीर चरणों में खास । बस मुक्ति रमा आये पास, प्रेम करेगी हास विलास।। - महाकवि आचार्य विद्यासागर
  25. 1 point
    आत्मानुभवसे नियमसे होती सकल करम निर्जरा दुखकी शृंखला मिटे भव फेरी मिट जाय जनन जरा परमें सुख कहीं है नहीं जगमें सुखतो निज में भरा मद ममतादि तज धार शम, दम, यम मिले शिव सौख्यखरा यदि भव परम्परा से हुआ घबरा तज देह नेह बुरा तज विषमता झट, भज सहजता तू मिल जाय मोक्ष पुरा देह त्यों बंधन इस जीवको ज्यों तोते को पिंजरा बिन ज्ञान निशिदिन तन धार भव, वन तू कई बार मरा भटक, भटक जिया सुख हेतु भवमें दुख सहता मर्मरा चम चम चमकता निजातम हीरा काय काच कचरा - महाकवि आचार्य विद्यासागर
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