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  1. संयम स्वर्ण महोत्सव

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  2. Vidyasagar.Guru

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  3. Saurabh Jain

    Saurabh Jain

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  4. Pushpendra Jain Naindhara

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Showing content with the highest reputation since 01/23/2019 in all areas

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    केशलोंचअपडेट - श्री बीना बारह जी दिनाँक - 22 फरवरी 2019, शुक्रवार आज श्री अतिशय क्षेत्र बीना बारह जी में विश्व वंदनीय आचार्य भगवन श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज एवं मुनि श्री श्रमण सागर जी मुनि श्री निश्छल सागर जी मुनि श्री सन्धान सागर जी के केशलोंच हुए |
  2. 1 point
    विश्व वंदनीय आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज (ससंघ), बीना बारहा में विराजमान हैं। बीना बारहा सागर (Railway Station Code : SGO) से 45 किमी की दूरी पर है। विहार अपडेट दिनांक : 20 फरवरी 2019 2:00 p.m. संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ससंघ का विहार गौरझामर से देवरी की ओर हुआ| ◆रात्रि विश्राम - देवरी से 8 किलोमीटर पहले गोपालपुरा स्कूल में होगा | 21 फरवरी को देवरी में आहार चर्या होगी| दिनांक : 19 फरवरी 2019 1:35 p.m. आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का विहार गौरझामर की ओर हुआ। (दूरी 15 कि.मी.) ◆ रात्रि विश्राम - बरकोटी तिग्गड़ा (दूरी - 11 कि.मी. गौरझामर) (5 कि.मी. बरकोटी से) दिनांक : 18 फरवरी 2019 1:50 p.m. आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी ससंघ का भाग्योदय तीर्थ सागर से अभी अभी विहार हुआ | ◆ रात्रिविश्राम- ग्राम-दून 18km ◆ कल की आहरचर्या- ग्राम- चितौरा 05km संभावित
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    डाउनलोड करें आचार्य श्री की आरती, पूजन , विधान, नारे एवं ध्वज गीत
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    Vandamimata ji jai jai ho gurudev ji ke jai ho
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    संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज ससंघ भाग्योदय तीर्थ सागर में विराजमान हैं | सागर का स्टेशन कोड SGO (Saugor) हैं आवास व्यवस्था - श्री देवेंद्र जैन संपर्क सूत्र - 9406557744, 9589076916, ‎7582244369 25 जनवरी 2019 संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज का ससंघ मंगल प्रवेश सागर शहर मे आज शाम 4 बजे (संभावित) होगा | 24 जनवरी 2019 समय दोपहर 1.45 बजे संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज का ससंघ मंगल विहार सागर की ओर हुआ। रात्रि विश्राम सागर के निकटवर्ती ग्राम में होने की संभावना है। आज रात्रि विश्राम स्थल से भाग्योदय तीर्थ परिसर सागर की दूरी सिर्फ 10 किमी है | 25 जनवरी की शाम को गुरुदेव के भाग्योदय तीर्थ में प्रवेश की संभावना है 23 जनवरी 2019 समय दोपहर 1.45 बजे संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार ईशुरबारा से सागर की ओर हुआ। रात्रि विश्राम - नरयावली में होने की संभावना है। भाग्योदय तीर्थ परिसर सागर से नरयावली की दूरी सिर्फ 18 किमी है | 22 जनवरी 2019 ईसरबारा मे हुआ मंगल प्रवेश आचार्य संघ का ईशुरबारा मे आगमन हुआ ईशुरबारा मुनि श्री सुधा सागर जी महाराज की जन्मस्थली है| 22 जनवरी 2019 परम् पूज्य आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ। जरुआखेड़ा से हुआ मंगल विहार। संभावित दिशा- पूज्य मुनिश्री सुधासागर जी महाराज की जन्मभूमि इसुरवाडा की ओर। 21 जनवरी 2019 समय दोपहर 3.30 बजे संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज जरुआखेड़ा (सागर-बीना रोड पर सागर से 36 किमी और खुरई से 18 किमी दूर ) में विराजमान है। आज विहार नही हुआ। 20 जनवरी 2019 समय दोपहर 2.15 बजे संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज का मंगल बिहार बनहट (खुरई) से जरुआखेड़ा (सागर) की ओर हुआ । दूरी 7 किमी आज आहार चर्या बंट में ही होगी दोपहर में विहार होने की सम्भावना 19 जनवरी 2019 रात्री विश्राम - बंट कल आहार चर्या जरुआखेड़ा में ही संभावित 4 PM पूज्य गुरुदेव ने बढ़ाये अपने कदम सिमरिया से भी आगे बंट की ओर। 1 45 PM परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज का खुरई से सागर की ओर हुआ विहार।
  8. 1 point
    भारती विद्यापीठ (अभिमत विश्वविद्यालय), पुणे भारत द्वारा परम मनीषी, महाकवि, आचार्य गुरुवर श्री विद्यासागर जी महाराज को डॉक्टर ऑफ लेटर्स (डी लिट) की मानद उपाधि प्रदान की जानी है 🔅शनिवार 2 फरवरी 2019, समय 11:00🔅 अत्यंत गौरव एवं हर्ष का विषय है की शनिवार 2 फरवरी 2019 को भारती विद्यापीठ (अभिमत विश्वविद्यालय), पुणे का 20 वा पदवीप्रदान समारंभ आयोजित होने जा रहा है | इस आयोजन में संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज (जैनाचार्य, महान विद्वान) को डॉक्टर ऑफ लेटर्स (डी. लिट.) की मानद पदवी प्रदान की जाएगी | आचार्यश्री द्वारा रचित साहित्य https://vidyasagar.guru/articles.html/jeewan-parichay/acharya-shri-dvara-rachit-sahitya/ निमंत्रण पत्रिका संलग्न
  9. 1 point
    जब पैर में कांटा चुभता है तो वह अंदर की ओर चला जाता है और दर्द बढ़ता जाता है जब उसको निकालने का प्रयास करते हैं तो दर्द और बढ़ जाता है यह दर्द मन के कारण ज्यादा होता है क्योंकि मन हमारा उस कांटे की ओर ही लगा हुआ है यह बात आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने भाग्योदय तीर्थ परिसर में धर्म सभा के दौरान कही। आचार्य श्री ने कहा दानदाताओं को बताना चाहिए मोह के कारण धन आपके यहां है थोड़ा सा निकाल दो और यह सोचकर यह मेरा नहीं है तो वह निकल आएगा मोक्ष जाने के लिए तन और धन कि नहीं बल्कि मन की आवश्यकता होती है यदि मन में स्थिरता आती है तो सारे काम बगैर दर्द के हो जाते हैं आचार्य श्री ने कहा मतवाले नहीं मन वाले बनो, मन को मना लोगे तो तुम मनमानी नहीं कर पाओगे। उन्होंने कहा दर्द का मूल कारण तनाव है और मन के कारण कभी कभी आंखों में आंसू आने लगते हैं। दर्द भूलने का प्रयास करोगे तो निश्चित रूप से आपका मन कभी नहीं भटकेगा। जिसको कांटा लगता है दर्द उसी को पता होता है दूसरे को नहीं, दूसरा तो सिर्फ महसूस करता है आचार्य श्री के पाद प्रक्षालन मुंबई निवासी सचिन जैन और महेंद्र जैन शनिचरी ने किया मिला। भाग्योदय में तीसरे दिन सोमवार को सहस्त्र कूट जिनालय के लिए 20 से अधिक श्रद्धालुओं ने अपने परिवार की ओर से 1.51 लाख की राशि देकर प्रतिमा विराजमान कराने की घोषणा की। उपकार परिवार पूरा सहस्त्रकूट जिनालय का निर्माण कराएगा आहारचर्या के बाद उपकार परिवार ने भाग्योदय परिसर में बनने जा रहे सर्वतोभद्र जिनालय के सामने बनने बाले सहस्त्रकूट जिनालय के निर्माण की घोषणा अपनी ओर से कराने की घोषणा की।
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    आचार्य श्री 16 को करेंगे जेल में बने हथकरघा प्रशिक्षण केंद्र का शुभारंभ केंद्रीय जेल सागर में जैन समाज के एक करोड़ रुपए की दान की राशि से हथकरघा प्रशिक्षण केंद्र बनकर तैयार हो गया है। शुभारंभ 16 फरवरी को आचार्यश्री विद्यासागर महाराज करेंगे। इस गरिमामय कार्यक्रम में पांडिचेरी की उपराज्यपाल किरण बेदी, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ, तीन राज्यों के जेल मंत्री, 10 डीजीपी सहित देश के प्रखर विद्वान शामिल होंगे। सौ साल पुराने सागर जेल में बंदियों के उत्थान की एक और कड़ी 16 फरवरी को जुड़ जाएगी। प्रशिक्षण केंद्र जेल परिसर में 10 हजार 260 वर्ग फीट एरिया में बनाया गया है। हॉल में 108 हथकरघा लगाए जाना है 54 हथकरघा लग चुके हैं। प्रत्येक हथकरघा पर एक साथ चार से पांच बंदी साड़ी, कालीन, व खादी का कपड़ा बुनने का प्रशिक्षण ले सकेंगे। उद्घाटन होने से पहले आचार्य विद्यासागर महाराज एक बार प्रशिक्षण केंद्र का निरीक्षण करेंगे। हॉल की मुख्य दीवार पर रायसेन के कलाकार ने आचार्य श्री की आदमकद छायाचित्र बनाया है। प्रशिक्षण केंद्र का नामकरण दिगंबराचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज हथकरघा प्रशिक्षण केंद्र रखा गया है। एक पारी में 250 से 300 बंदी प्रशिक्षण ले सकेंगे। ट्रस्ट करेगा केंद्र का संचालन जेल अधीक्षक राकेश बांगरे ने बताया कि आचार्य श्री ने उद्धाटन की तिथि तय कर दी है। 16 एवं 17 फरवरी को दो दिन कार्यक्रम चलेगा। उन्होंने बताया कार्यक्रम में पांडिचेरी की उप राज्यपाल किरण बेदीं, म.प्र. के मुख्यमंत्री कमलनाथ, जेल एवं परिवहन मंत्री बाला बच्चन, दिल्ली के जेल मंत्री सतेंद्र जैन और छत्तीसगढ़ के जेल मंत्री की कार्यक्रम में आने की स्वीकृति मिल चुकी है। प्रशिक्षण केंद्र का संचालन सक्रिय सम्यक दर्शन सहकारी संघ ट्रस्ट द्वारा किया जाएगा। संस्था की ओर से पूर्व डीएसपी डॉ. रेखा जैन, डॉ. नीलम जैन और डॉ. अमित जैन को संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। खजुराहो में हुई थी पहल बंदियों के लिए हथकरघा प्रशिक्षण केंद्र खोले जाने की पहल 6 माह पहले खजुराहो में की गई थी। वहां आचार्य श्री चातुर्मास के लिए संसघ विराजमान थे। उन्होंने जेल में रहने वाले बंदियों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने की पहल की थी। जेल अधीक्षक बागरे ने सागर जेल में हथकरघा प्रशिक्षण केंद्र शुरू करने की जानकारी दी थी। आचार्य श्री ने यह काम वृहद रूप से करने की पहल की, लेकिन जेल अधीक्षक ने बजट की कमी का हवाला दिया और बताया शासन स्तर पर इनती राशि मिलना संभव नहीं है। खजुराहो में आचार्य श्री की प्ररेणा से देखते-देखते दान देने वालों में होड़ लग गई। प्रशिक्षण केंद्र तीन माह में बनकर चिन्हित बंदियों को प्रशिक्षण साड़ी, कालीन और खादी का कपड़ा बनाने का प्रशिक्षण देने बंदियों को चिन्हत किया जाएगा। ऐसे बंदी जो हत्या व गंभीर किस्म के अपराधों में सजा काट रहे है। उनकी सजा दो से तीन साल रह गई है। ऐसे बंदियों को चिनहित कर प्रशिक्षण दिया जाएगा। सागर संभाग के अलावा प्रदेश की अन्य जेलों से बंदियों को प्रशिक्षण लेने बुलाया जाएगा।
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    आचार्य विद्यासागर जी पूजा - रचियत्री आर्यिका आराध्यमति माताजी
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    नंदीश्वरभक्ति जय-जय-जय जयवन्त जिनालय नाश रहित हैं शाश्वत हैं। जिनमें जिनमहिमा से मण्डित जैन बिम्ब हैं भास्वत हैं॥ सुरपति के मुकुटों की मणियाँ झिलमिल झिलमिल करती हैं। जिनबिम्बों के चरण-कमल को धोती हैं, मन हरती हैं ॥१॥ सदा-सदा से सहज रूप से शुचितम प्राकृत छवि वाले। रहें जिनालय धरती पर ये श्रमणों की संस्कृति धारे॥ तीनों संध्याओं में इनको तन से मन से वचनों से। नमन करूं धोऊँ अघ-रज को छूटू भव-वन भ्रमणों से ॥२॥ भवनवासियों के भवनों में तथा जिनालय बने हुये। तेज कान्ति से दमक रहे हैं और तेज सब हने हुये ॥ जिनकी संख्या जिन आगम में सात कोटि की मानी है। साठ-लाख दस लाख और दो लाख बताते ज्ञानी हैं ॥३॥ अगणित द्वीपों में अगणित हैं अगणित गुण गण मण्डित हैं। व्यन्तर देवों से नियमित जो पूजित संस्तुत वन्दित हैं॥ त्रिभुवन के सब भविकजनों के नयन मनोहर सुन प्यारे। तीन लोक के नाथ जिनेश्वर मन्दिर हैं शिवपुर द्वारे ॥४॥ सूर्य चन्द्र ग्रह नक्षत्रादिक तारक दल गगनांगन में। कौन गिने वह अनगिन हैं ये अनगिन जिनगृह हैं जिनमें ॥ जिन के वन्दन प्रतिदिन करते शिव सुख के वे अभिलाषी। दिव्य देह ले देव-देवियाँ ज्योतिर्मण्डल अधिवासी ॥५॥ नभ-नभ स्वर-रस केशव-सेना मद हो सोलह कल्पों में। आगे पीछे तीन बीच दो शुभतर कल्पातीतों में ॥ इस विधि शाश्वत ऊर्ध्वलोक में सुखकर ये जिनधाम रहें। अहो भाग्य हो नित्य निरन्तर होठों पर जिन नाम रहे ॥६॥ अलोक का फैलाव कहाँ तक लोक कहाँ तक फैला है? जाने जो जिन हैं जय-भाजन मिटा उन्हीं का फेरा है॥ कही उन्हीं ने मनुज लोक के चैत्यालय की गिनती है। चार शतक अट्ठावन ऊपर जिन में मन रम विनती है ॥७॥ आतम-मद-सेना-स्वर-केशव-अंग-रंग फिर याम कहे। ऊर्ध्वमध्य औ अधोलोक में यूँ सब मिल जिन-धाम रहे ॥८॥ किसी ईश से निर्मित ना हैं शाश्वत हैं स्वयमेव सदा। दिव्य भव्य जिन मन्दिर देखो छोड़ो मन अहमेव मुधा ॥ जिनमें आर्हत प्रतिभा-मण्डित प्रतिमा न्यारी प्यारी हैं। सुरासुरों से सुरपतियों से पूजी जाती सारी हैं ॥९॥ रुचक-कुण्डलों-कुलाचलों पर क्रमशः चउ चउ तीस रहें। वक्षारों-गिरि विजयाद्घ पर शत शत-सत्तर ईश कहें ॥ गिरि इषुकारों उत्तरगिरियों कुरुओं में चउ चउ दश हैं। तीन शतक छह बीस जिनालय गाते इनके हम यश हैं ॥१०॥ द्वीप रहा हो अष्टम जिसने ‘नन्दीश्वर' वर नाम धरा। नन्दीश्वर सागर से पूरण आप घिरा अभिराम खरा ॥ शशि-समशीतल जिसके अतिशय यश से बस! दशदिशा खिली। भूमण्डल भी हुआ प्रभावित इस ऋषि को भी दिशा मिली ॥११॥ किस किस को ना दिशा मिली! इसी द्वीप में चउ दिशियों में चउ गुरु अञ्जन गिरिवर हैं। इक-इक अञ्जनगिरि सम्बन्धित चउ-चउ दधिमुख गिरिवर हैं॥ फिर प्रति दधिमुख कोनों में दो-दो रतिकर-गिरि चर्चित हैं। पावन बावन गिरि पर बावन जिनगृह हैं सुर अर्चित हैं ॥१२॥ एक वर्ष में तीन बार शुभ अष्टाह्निक उत्सव आते। एक प्रथम आषाढ़ मास में कार्तिक फाल्गुन फिर आते ॥ इन मासों के शुक्ल पक्ष में अष्ट दिवस अष्टम तिथि से। प्रमुख बना सौधर्म इन्द्र को भूपर उतरे सुर गति से ॥१३॥ पूज्य द्वीप नन्दीश्वर जाकर प्रथम जिनालय वन्दन ले। प्रचुर पुष्प मणिदीप धूप ले दिव्याक्षत ले चन्दन ले ॥ अनुपम अद्भुत जिन प्रतिमा की जग-कल्याणी गुरुपूजा। भक्ति-भाव से करते हे मन! पूजा में खो-जा तू जा ॥१४॥ बिम्बों के अभिषेक कार्यरत हुआ इन्द्र सौधर्म महा। ‘दृश्य बना उसका क्या वर्णन भाव-भक्ति सो धर्म रहा ॥ सहयोगी बन उसी कार्य में शेष इन्द्र जयगान करें। पूर्णचन्द्र-सम निर्मल यश ले प्रसाद गुण का पान करें ॥१५॥ इन्द्रों की इन्द्राणी मंगल कलशादिक लेकर सर पै। समुचित शोभा और बढ़ातीं गुणवन्ती इस अवसर पै ॥ छां-छुम छां-छुम नाच नाचतीं सुर-नटियाँ हैं सस्मित हो। सुनो! शेष अनिमेष सुरासुर दृश्य देखते विस्मित हो ॥१६॥ वैभवशाली सुरपतियों के भावों का परिणाम रहा। पूजन का यह सुखद महोत्सव दृश्य बना अभिराम रहा ॥ इसके वर्णन करने में जब सुनो! बृहस्पति विफल रहा। मानव में फिर शक्ति कहाँ वह? वर्णन करने मचल रहा ॥१७॥ जिन-पूजन अभिषेक पूर्णकर अक्षत केसर चन्दन से। बाहर आये देव दिख रहे रंगे-रंगे से तन-मन से ॥ तथा दे रहे प्रदक्षिणा हैं नन्दीश्वर जिनभवनों की। पूज्य पर्व को पूर्ण मनाते स्तुति करते जिन-श्रमणों की ॥१८॥ सुनो! वहाँ से मनुज-लोक में सब मिलकर सुर आते हैं। जहाँ पाँच शुभ मन्दरगिरि हैं शाश्वत चिर से भाते हैं। भद्रशाल नन्दन सुमनस औ पाण्डुक वन ये चार जहाँ। प्रति-मन्दर पर रहे तथा प्रतिवन में जिनगृह चार महा ॥१९॥ मन्दर पर भी प्रदक्षिणा दे करें जिनालय वन्दन हैं। जिन-पूजन अभिषेक तथा कर करें शुभाशय नन्दन हैं॥ सुखद पुण्य का वेतन लेकर जो इस उत्सव का फल है। जाते निज-निज स्वर्गों को सुर यहाँ धर्म ही सम्बल है ॥२०॥ तरह-तरह के तोरण-द्वारे दिव्य वेदिका और रहें। मानस्तम्भों यागवृक्ष औ उपवन चारों ओर रहें ॥ तीन-तीन प्राकार बने हैं विशाल मण्डप ताने हैं। ध्वजा पंक्ति का दशक लसे चउ-गोपुर गाते गाने हैं ॥२१॥ देख सकें अभिषेक बैठकर धाम बने नाटक गृह हैं। जहाँ सदन संगीत साध के क्रीड़ागृह कौतुकगृह हैं॥ सहज बनीं इन कृतियों को लख शिल्पी होते अविकल्पी। समझदार भी नहीं समझते सूझ-बूझ सब हो चुप्पी ॥२२॥ थाली-सी है गोल वापिका पुष्कर हैं चउ-कोन रहे। भरे लबालब जल से इतने कितने गहरे कौन कहे? पूर्ण खिले हैं महक रहे हैं जिन में बहुविध कमल लसे। शरद काल में जिसविध नभ में शशि ग्रह तारक विपुल लसें ॥२३॥ झारी लोटे घट कलशादिक उपकरणों की कमी नहीं। प्रति जिनगृह में शत-वसुशत-वसु शाश्वत मिटते कभी नहीं ॥ वर्णाकृति भी निरी-निरी है जिन की छवि प्रतिछवि भाती। जहाँ घंटियाँ झन-झन-झन-झन बजती रहती ध्वनि आती॥२४॥ स्वर्णमयी ये जिन मन्दिर यूँ युगों-युगों से शोभित हैं। गन्धकुटी में सिंहासन भी सुन्दर-सुन्दर द्योतित हैं॥ नाना दुर्लभ वैभव से ये परिपूरित हैं रचित हुये। सुनो! यहीं त्रिभुवन के वैभव जिनपद में आ प्रणत हुये ॥२५॥ इन जिनभवनों में जिनप्रतिमा ये हैं पद्मासन वाली। धनुष पञ्चशत प्रमाणवाली प्रति-प्रतिमा शुभ छवि वाली ॥ कोटि-कोटि दिनकर आभा तक मन्द-मन्द पड़ जाती है। कनक रजत मणि निर्मित सारी झग-झगझग-झग भाती हैं॥२६॥ दिशा-दिशा में अतिशय शोभा महातेज यश धार रहें। पाप मात्र के भंजक हैं ये भवसागर के पार रहें ॥ और और फिर भानुतुल्य इन जिनभवनों को नमन करूं। स्वरूप इनका कहा न जाता मात्र मौन हो नमन करूं ॥२७॥ धर्मक्षेत्र ये एक शतक औ सत्तर हैं षट् कर्म जहाँ। धर्मचक्रधर तीर्थकरों से दर्शित है जिनधर्म यहाँ ॥ हुये हो रहे होंगे उन सब तीर्थकरों को नमन करूं। भाव यही है 'ज्ञानोदय' में रमण करूँ भव-भ्रमण हरूँ ॥२८॥ इस अवसर्पिण में इस भूपर वृषभनाथ अवतार लिया। भर्ता बन युग का पालन कर धर्म-तीर्थ का भार लिया ॥ अन्त-अन्त में अष्टापद पर तप का उपसंहार किया। पापमुक्त हो मुक्ति सम्पदा प्राप्त किया उपहार जिया ॥२९॥ बारहवें जिन 'वासुपूज्य' हैं परम पुण्य के पुञ्ज हुये। पाँचों कल्याणों में जिनको सुरपति पूजक पूज गये ॥ ‘चम्पापुर' में पूर्ण रूप से कर्मों पर बहु मार किये। परमोत्तम पद प्राप्त किये औ विपदाओं के पार गये ॥३०॥ प्रमुदित मति के राम-श्याम से ‘नेमिनाथ' जिन पूजित हैं। कषाय-रिपु को जीत लिए हैं प्रशमभाव से पूरित हैं। ‘ऊर्जयन्त गिरनार शिखर' पर जाकर योगातीत हुये। त्रिभुवन के फिर चूड़ामणि हो मुक्तिवधू के प्रीत हुये ॥३१॥ ‘वीर' दिगम्बर श्रमण गुणों को पाल बने पूरण ज्ञानी। मेघनाद-सम दिव्य नाद से जगा दिया जग सद्ध्यानी ॥ ‘पावापुर' वर सरोवरों के मध्य तपों में लीन हुये। विधिगुण विगलित करअगणित गुण शिवपद पास्वाधीनहुये ॥३२॥ जिसके चारों ओर वनों में मद वाले गज बहु रहते। ‘सम्मेदाचल' पूज्य वही है पूजो इसको गुरु कहते ॥ शेष रहे ‘जिन बीस तीर्थकर' इसी अचल पर अचल हुये। अतिशय यश को शाश्वत सुख को पाने में वे सफल हुये ॥३३॥ मूक तथा उपसर्ग अन्तकृत अनेक विध केवलज्ञानी। हुये विगत में यति मुनि गणधर कु-सुमत ज्ञानी विज्ञानी ॥ गिरि वन तरुओं गुफा कंदरों सरिता सागर तीरों में। तप साधन कर मोक्ष पधारे अनल शिखा मरु टीलों में ॥३४॥ मोक्ष साध्य के हेतुभूत ये स्थान रहें पावन सारे। सुरपतियों से पूजित हैं सो इनकी रज शिर पर धारें ॥ तपोभूमि ये पुण्य-क्षेत्र ये तीर्थ-क्षेत्र ये अघहारी। धर्मकार्य में लगे हुये हम सबके हों मंगलकारी ॥३५॥ दोष रहित हैं विजितमना हैं जग में जितने जिनवर हैं। जितनी जिनवर की प्रतिमाएँ तथा जिनालय मनहर हैं॥ समाधि साधित भूमि जहाँ मुनि-साधक के हो चरण पड़े। हेतु बने ये भविकजनों के भव-लय में हम चरण पड़े ॥३६॥ उत्तम यशधर जिनपतियों का स्तोत्र पढ़े निजभावों में। तन से मन से और वचन से तीनों संध्या कालों में ॥ श्रुतसागर के पार गए उन मुनियों से जो संस्तुत है। यथाशीघ्र वह अमित पूर्ण पद पाता सम्मुख प्रस्तुत है ॥३७॥ मलमूत्रों का कभी न होना रुधिर क्षीर-सम श्वेत रहे। सर्वांगों में सामुद्रिकता सदा - सदा ना स्वेद रहे। रूप सलोना सुरभित होना तन-मन में शुभ लक्षणता। हित-मित-मिश्री मिश्रितवाणी सुन लो! और विलक्षणता॥३८॥ अतुल-वीर्य का सम्बल होना प्राप्त आद्य संहननपना। ज्ञात तुम्हें हो ख्यात रहे हैं स्वतिशय दश ये गुणनपना ॥ जन्म-काल से मरण-काल तक ये दश अतिशय ‘सुनते हैं। तीर्थकरों के तन में मिलते अमितगुणों को गुनते हैं ॥३९॥ कोश चार शत सुभिक्षता हो अधर गगन में गमन सही। चउ विध कवलाहार नहीं हो किसी जीव का हनन नहीं ॥ केवलता या श्रुतकारकता उपसर्गों का नाम नहीं। चतुर्मुखी का होना तन की छाया का भी काम नहीं ॥४०॥ बिना बढ़े वह सुचारुता से नख केशों का रह जाना। दोनों नयनों के पलकों का स्पन्दन ही चिर मिट जाना ॥ घातिकर्म के क्षय के कारण अर्हन्तों में होते हैं। ये दश अतिशय इन्हें देख बुध पल भर सुध-बुध खोते हैं ॥४१॥ अर्धमागधी भाषा सुख की सहज समझ में आती है। समवसरण में सब जीवों में मैत्री घुल-मिल जाती है॥ एक साथ सब ऋतुएँ फलती ‘क्रम' के सब पथ रुक जाते। लघुतर गुरुतर बहुतर तरुवर फूल फलों से झुक जाते ॥४२॥ दर्पण-सम शुचि रत्नमयी हो झग-झग करती धरती है। सुरपति नरपति यतिपतियों के जन-जन के मन हरती है ॥ जिनवर का जब विहार होता पवन सदा अनुकूल बहे। जन-जन परमानन्द गन्ध में डूबे दुख-सुख भूल रहे ॥४३॥ संकटदा विषकंटक कीटों कंकर तिनकों शूलों से। रहित बनाता पथ को गुरुतर उपलों से अतिधूलों से ॥ योजन तक भूतल को समतल करता बहता वह साता। मन्द-मन्द मकरन्द गन्ध से पवन मही को महकाता ॥४४॥ तुरत इन्द्र की आज्ञा से बस नभ मण्डल में छा जाते। सघन मेघ के कुमार गर्जन करते बिजली चमकाते ॥ रिम-झिम रिम-झिम गन्धोदक की वर्षा होती हर्षाती। जिस सौरभ से सब की नासा सुर-सुर करती दर्शाती ॥४५॥ आगे पीछे सात-सात इक पदतल में तीर्थंकर के। पंक्तिबद्ध यों अष्टदिशाओं और उन्हीं के अन्तर में ॥ पद्म बिछाते सुर माणिक-सम केशर से जो भरे हुये। अतुल परस है सुखकर जिनका स्वर्ण दलों से खिले हुये ॥४६॥ पकी फसल ले शाली आदिक धरती पर सर धरती है। सुन लो फलतः रोम-रोम से रोमाञ्चित सी धरती है॥ ऐसी लगती त्रिभुवनपति के वैभव को ही निरख रही। और स्वयं को भाग्यशालिनी कहती-कहती हरख रही ॥४७॥ शरदकाल में विमल सलिल से सरवर जिस विध लसता है। बादल-दल से रहित हुआ नभमण्डल उस विध हँसता है॥ दशों दिशायें धूम्र-धूलियाँ शामभाव को तजती हैं। सहज रूप से निरावरणता उज्ज्वलता को भजती हैं ॥४८॥ इन्द्राज्ञा में चलने वाले देव चतुर्विध वे सारे। भविक जनों को सदा बुलाते समवसरण में उजियारे॥ उच्चस्वरों में दे दे करके आमन्त्रण की ध्वनि 'ओ जी! “देवों के भी देव यहाँ हैं'' शीघ्र पधारो आओ जी! ॥४९॥ जिसने धारे हजार आरे स्फुरणशील मन हरता है। उज्ज्वल मौलिक मणि-किरणों से झर-झुर झर-झुर करता है। जिसके आगे तेज भानु भी अपनी आभा खोता है। आगे-आगे सबसे आगे धर्मचक्र वह होता है ॥५०॥ वैभवशाली होकर भी ये इन्द्र लोग सब सीधे हैं। धर्म राग से रंगे हुये हैं भाव भक्ति में भीगे हैं॥ इन्हीं जनों से इस विध अनुपम अतिशय चौदह किये गये। वसुविध मंगल पात्रादिक भी समवसरण में लिये गये ॥५१॥ नील-नील वैडूर्य दीप्ति से जिसकी शाखायें भाती। लाल-लाल मृदु प्रवाल आभा जिनमें शोभा औ लाती ॥ मरकत मणि के पत्र बने हैं जिसकी छाया शाम घनी। अशोक तरु यह अहो शोभता यहाँ शोक की शाम नहीं ॥५२॥ पुष्पवृष्टि हो नभ से जिसमें पुष्प अलौकिक विपुल मिले। नील-कमल हैं लाल-धवल हैं कुन्द बहुल हैं बकुल खुले ॥ गन्धदार मन्दार मालती पारिजात मकरन्द झरे। जिन पर अलिगण गुन-गुन गाते निशिगन्धा अरविन्द खिले॥५३॥ जिनकी कटि में कनक करधनी कलाइयों में कनक कड़े। हीरक के केयूर हार हैं पुष्ट कण्ठ में दमक पड़े। सालंकृत दो यक्ष खड़े जिन-कर्मों में कुण्डल डोलें। चमर दुराते हौले-हौले प्रभु की जो जय-जय बोलें ॥५४॥ यहाँ यकायक घटित हुआ जो कोई सकता बता नहीं। दिवस रात का भला भेद वह कहाँ गया कुछ पता नहीं ॥ दूर हुये व्यवधान हजारों रवियों के वह आप कहीं। भामण्डल की यह सब महिमा आँखों को कुछ ताप नहीं ॥५५॥ प्रबल पवन का घात हुआ जो विचलित होकर तुरत मथा। हर-हर-हर-हर सागर करता हर मन हरता मुदित यथा ॥ वीणा मुरली दुम-दुम दुंदुभि ताल-ताल करताल तथा। कोटि कोटियों वाद्य बज रहे समवसरण में सार कथा ॥५६॥ महादीर्घ वैडूर्य रत्न का बना दण्ड है जिस पर हैं। तीन चन्द्र-सम तीन छत्र ये गुरु-लघु-लघुतम ऊपर हैं॥ तीन भुवन के स्वामीपन की स्थिति जिससे अति प्रकट रही। सुन्दरतम हैं मुक्ताफल की लड़ियाँ जिस पर लटक रहीं ॥५७॥ जिनवर की गम्भीर भारती श्रोताओं के दिल हरती। योजन तक जो सुनी जा रही अनुगुंजित हो नभ धरती ॥ जैसे जल से भरे मेघदल नभ-मण्डल में डोल रहे। ध्वनि में डूबे दिगन्तरों में घुमड़-घुमड़ कर बोल रहे ॥५८॥ रंग-विरंगी मणि-किरणों से इन्द्रधनुष की सुषमा ले। शोभित होता अनुपम जिस पर ईश विराजे गरिमा ले ॥ सिंहों में वर बहु सिंहों ने निजी पीठ पर लिया जिसे। स्फटिक शिला का बना हुआ है सिंहासन है जिया!लसे ॥५९॥ अतिशय गुण चउतीस रहें ये जिस जीवन में प्राप्त हुये। प्रातिहार्य का वसुविध वैभव जिन्हें प्राप्त हैं आप्त हुये ॥ त्रिभुवन के वे परमेश्वर हैं महागुणी भगवन्त रहे। नमूं उन्हें अरहन्त सन्त हैं सदा-सदा जयवन्त रहें ॥६०॥ अञ्चलिका (दोहा) नन्दीश्वर वर भक्ति का करके कायोत्सर्ग। आलोचन उसका करूँ ले प्रभु! तव संसर्ग ॥६१॥ नन्दीश्वर के चउ दिशियों में चउ गुरु अंजन गिरिवर हैं। इक-इक अंजनगिरि सम्बन्धित चउ-चउ दधिमुख गिरिवर हैं॥ फिर प्रति दधिमुख कोनों में दो-दो रतिकर गिरि चर्चित हैं। पावन बावनगिरि पर बावन जिनगृह हैं सुर अर्चित हैं ॥६२॥ देव चतुर्विध कुटुम्ब ले सब इसी द्वीप में हैं आते। कार्तिक फागुन आषाढ़ों के अन्तिम वसु-दिन जब आते ॥ शाश्वत जिनगृह जिनबिम्बों से मोहित होते बस तातें। तीनों अष्टाह्निक पर्यों में यहीं आठ दिन बस जाते ॥६३॥ दिव्य गन्ध ले दिव्य दीप ले दिव्य-दिव्य ले सुमन तथा। दिव्य चूर्ण ले दिव्य न्हवन ले दिव्य-दिव्य ले वसन तथा ॥ अर्चन पूजन वन्दन करते नियमित करते नमन सभी। नन्दीश्वर का पर्व मनाकर करते निजघर गमन सभी ॥६४॥ मैं भी उन सब जिनालयों का भरतखण्ड में रहकर भी। अर्चन पूजन वन्दन करता प्रणाम करता झुककर ही ॥ कष्ट दूर हो कर्मचूर हो बोधिलाभ हो सद्गति हो। वीर मरण हो जिनपद मुझको मिले सामने सन्मति ओ! ॥६५॥
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    पु. आचार्य श्री मूकमाटी महाकाव्य में कहा है मिट्टी पानी और हवा, सौ रोगों की एक दवा प्रकृति से जुड़े अध्यात्मिक संत आचार्य श्री का आशीष व प्रेरणा दे आपको स्वस्थ तन, स्वस्थ मन अपनाएँ : प्राकृतिक चिकित्सा "लपेट" स्वस्थ हो, भोजन कर सको भरपेट साफा लपेट : तनाव दूर करे विधि : 6 इंच चौड़ी व 2 मीटर लंबी सूती पट्टी, इस प्रकार की 2-3 पट्टियों को गोल घड़ी कर, पानी में गीला कर निचोड़ लें। इस पट्टी को (नाक का हिस्सा छोड़कर) समस्त चेहरे पर लपेट लें। लाभ : इस पट्टी के प्रयोग से मस्तिष्क की अनावश्यक गर्मी कम होकर मस्तिष्क में अदभुत ठंडक व शांति का अनुभव होता है, साथ ही सिरदर्द व कान के रोग दूर होते हैं, मन व हृदय भी शांत बना रहता है। गले की लपेट : गले के रोगों में चमत्कारिक लाभ गले रोगों में चमत्कारिक परिणाम देने वाली यह लपेट है इसे करने से तुरन्त लाभ होना प्रारंभ हो जाता है। गले में हो रही खराश, स्वर यंत्र की सूजन (टांसिल) में इसके प्रयोग से लाभ होता है। वास्तव में गले की लपेट पेडू की लपेट व वास्ति प्रदेश की लपेट व अन्य लपेट एक तरह से गर्म ठण्डी पट्टी के ही समान है। विशेष तौर पर खाँसी व गला दुखने की अवस्था में इसे करने से तुरन्त लाभ हो जाता है और जब ये विकार खासतौर पर रोगी में जब उपद्रव मचाते हैं तो इस लपेट को करने से तुरन्त लाभ मिलता है व नींद भी अच्छी आ जाती है क्योंकि उक्त विकार की वजह से बैचेनी से जो हमें मुक्ति मिल जाती है। विधि : 6 इंच चौड़ा व करीब डेढ़ मीटर लम्बा सूती कपड़ा गीला कर अच्छी तरह निचोड़ दें। इसे गले पर लपेट दें। इस गीली लपेट पर गर्म कपड़ा (मफलर) अच्छी तरह से लपेट कर अच्छी तरह पेक कर दें ताकि गीला कपड़ा अच्छी तरह से ढंक जाए। इस लपेट को 1 से डेढ़ घंटे तक किया जा सकता है किन्तु रोग की बढ़ी हुई अवस्था में इसे अधिक समय तक भी कर सकते हैं। लपेट की समाप्ति पर गले को गीले तौलिये से अच्छी तरह स्वच्छ कर लें। छाती की लपेट : कफ ढीला करे किसी भी अंग को ठंडक प्रदान करने के लिए पट्टी का प्रयोग किया जाता है। इस पट्टी के प्रयोग से रोग ग्रस्त अंग पर रक्त का संचार व्यवस्थित होता है। इसके साथ ही श्वेत रक्त कणिकाओं की संख्या में वृद्धि होती है। इस पट्टी के प्रयोग से छाती में जमा कफ ढीला होता है। हृदय को बल प्राप्त होता है। विधि : 7-10 इंच चौड़ा, 3/2 मीटर लंबा गीला सूती कपड़ा निचोड़ कर छाती पर लपेटे। इसके ऊपर गर्म कपड़ा (बुलन/फलालेन) लपेट दें। लाभ : इससे हृदय की तीव्र धड़कन सामान्य हो जाती है, क्योंकि ठंडे पानी की पट्टी हृदय पर लपेटने से इस क्षेत्र का रक्त संचार व्यवस्थित हो जाता है। साथ ही विजातीय द्रव्य पसीने के माध्यम से बाहर हो जाते हैं। इस प्रयोग द्वारा हृदय की धड़कन सामान्य हो जाती है। छाती में जमा कफ ढीला हो जाता है। यह प्रयोग कफ रोग में लाभकारी है। विशेष सावधानी : पट्टी के पश्चात् हथेलियों से छाती की हल्की मसाज कर उसे गर्म कर लेना चाहिए, ताकि शरीर का उक्त अंग अपने सामान्य तापमान पर आ जाए। पेडू की लपेट : पेट रोग में चमत्कारी लाभ पेडू की पट्टी समस्त रोगों के निदान में सहायक है। विशेषकर पाचन संस्थान के रोगों के निदान में रामबाण सिद्ध होती है। इससे पेट के समस्त रोग, पेट की नई पुरानी सूजन, पुरानी पेचिश, अनिद्रा, ज्वर, अल्सर, रीढ़ का दर्द व स्त्रियों के प्रजनन अंगों के उपचार में भी सहायक है। इसके अतिरिक्त यह किडनी व लीवर के उपचार में विशेष लाभ पहुँचाती है। विधि : एक फीट चौड़ी व 1 से 1.5 मीटर लंबी पतले सूती कपड़े की पट्टी को पानी में भिगोकर निचोड़े व पूरे पेडू व नाभि के दो इंच ऊपर तक लपेटकर ऊपर से गर्म कपड़ा लपेट लेवें। समयावधि : उक्त पट्टी खाली पेट सुबह शाम 2-2 घंटे तक लगा सकते हैं। रात्रि को सोने के पूर्व लगा सकते हैं। रात-भर पट्टी लगी रहने दें। भोजन के 2 घंटे बाद भी पट्टी लगा सकते हैं। इस पट्टी को लगाकर ऊपर से कपड़े पहनकर अपने नियमित कार्य भी कर सकते हैं। पट्टी लगाने के बाद जब पट्टी हटाएँ तो गीले तौलिए अथवा हथेली से पेडू की हल्की मसाज कर गर्म कर लें। विशेष सावधानी : शीत प्रकृति के रोगी इस पट्टी के पहले पेडू को हाथों से अथवा गर्म पानी की थैली से गर्म कर पट्टी लपेटें। शीत प्रकृति के व्यक्ति सिर्फ 2 घंटे के लिए इस पट्टी का प्रयोग कर सकते हैं। वस्ति प्रदेश की लपेट : जननांगों में चमत्कारिक लाभ पेडू के विभिन्न रोग, पुरानी कब्ज, मासिक धर्म में अनियमितता, प्रजजन अंगों के रोग, जननेंद्रीय की दुर्बलता व अक्षमता में चमत्कारिक लाभ देने वाली लपेट वस्ति प्रदेश की लपेट है। इसके नियमित प्रयोग से उक्त रोग ही नहीं वरन् अनेक रोगों में लाभ होता है। विधि : एक भीगा कपड़ा निचोड़कर वस्ति प्रदेश पर लपेट दें। यदि वस्ति प्रदेश पर ठंडक का अहसास हो रहा हो तो गर्म पानी की थैली से उक्त अंग को गर्म अवश्य करें। अब इस लपेट पर गर्म कपड़ा लपेट दें। उक्त प्रयोग को एक से डेढ़ घंटा किया जा सकता है। मुख्य सावधानी : इस पट्टी को एक बार उपयोग करने के पश्चात साबुन अच्छी तरह से लगाकर धोकर धूप में सुखाकर पुनः इस पट्टी का प्रयोग किया जा सकता है। चूंकि पट्टी विजातीय द्रव्यों को सोख लेती है, अतः ठीक प्रकार से पट्टी की सफाई नहीं होने से चर्म रोग हो सकता है। उक्त पट्टी को सामान्य स्वस्थ व्यक्ति सप्ताह में एक दिन कर सकते हैं। लाभ : पेट के रोगों में चमत्कारिक लाभ होता है। पैरों की लपेट : खाँसी में तुरन्त लाभ पहुंचाने वाली पट्टी इस लपेट के प्रयोग से सारे शरीर का दूषित रक्त पैरों की तरफ खींच जाता है। फलस्वरुप ऊपरी अंगों का रक्ताधिक्य समाप्त हो जाता है। इस वजह से शरीर के ऊपरी अंगों पर रोगों द्वारा किया आक्रमण पैरों की ओर चला जाता है। अतः मेनिनजाईटिस, न्यूयोनिया, ब्रोंकाइटीज, यकृत की सूजन व गर्भाशय के रोग की यह सर्वप्रथम चिकित्सा पद्धति है। विधि : एक भीगे हुए और अच्छी तरह निचोड़े कपड़े की पट्टी को रोल बना लें, एड़ी से लेकर जंघा तक इस कपड़े को लपेट दें। इस पट्टी पर गर्म कपड़ा अच्छी तरह लपेट दें ताकि सूती कपड़ा अच्छी तरह से ढंक जाये। यदि पैरों में ठंडक हो तो गर्म पानी की थैली से पैरों को गर्म कर लें। ध्यान रहें रोगी के सिर पर ठंडे पानी की नैपकीन से सिर ठंडा रहे। इस प्रयोग को एक घंटे तक करें। किन्तु रोगी को आराम महसूस हो तो इस प्रयोग को अधिक समय तक किया जा सकता है। इस प्रयोग को रोगों के समय गला दुखने, खाँसी की तीव्रता की अवस्था में कर चमत्कारिक लाभ पाया जा सकता है। इस प्रयोग को करने के पश्चात अन्त में तौलिये से सम्पूर्ण शरीर को घर्षण स्नान द्वारा स्वच्छ कर लें। पूर्ण चादर लपेट : मोटापा दूर करें सामग्री : अच्छा मुलायम कम्बल जिसमें हवा का प्रवेश न हो सके एक डबल बेड की चादर, जिसमें सारा शरीर लपेटा जा सके, आवश्यकतानुसार मोटा या पतला एक तौलिया छाती से कमर तक लपेटने के लिए। विधि : बंद कमरे में एक खाट पर गद्दी बिछा लें तथा उसके ऊपर दोनों कम्बल बिछायें सूती चादर खूब ठंडे पानी में भिगोकर निचोड़ने के बाद कम्बल के ऊपर बिछा दें। सूती चादर के ऊपर तौलिया या उसी नाप का दूसरा कपड़ा गीला करके पीठ के निचले स्थान पर बिछा दें। यह लपेट पूर्ण नग्न अवस्था में होना चाहिए। लेटते समय यह ध्यान रखें कि भीगी चादर को गले तक लपेटे। अब मरीज के सब कपड़े उतारकर उसे बिस्तर पर लिटा दें। लेटने के बाद तुरन्त सबसे पहले तौलिए को दोनों बगल में से लेकर कमर तक पूरे हिस्से को लपेट देना चाहिए। हाथ तौलिए के बाहर रहे, यह नहीं भूलना चाहिए। दाहिनी ओर लटकती हुई चादर से सिर की दाहिनी ओर, दाहिना कान, हाथ व पैर पूरी तरह ढंक देने चाहिए। इसी तरह बायीं ओर सिर, कान, हाथ तथा पैर चादर के बाएँ छोर से ढंकने चाहिए। चादर लपेटने के बाद नाक तथा मुँह को छोड़कर कोई भी भाग बाहर नहीं रहना चाहिए। अब चादर के ठीक ऊपर पूरी तरह ढंकते हुए पहला कम्बल और बाद में सबसे ऊपर वाला कम्बल लपेटा जाए। इस स्थिति में रोगी को 30-45 मिनिट रखें। ठंड ज्यादा लगे तो रोगी को बगल में गर्म पानी की बॉटल रख सकते हैं। चादर लपेट की अवधि रोगी की अवस्था के अनुसार घटा-बढ़ा सकते हैं। लाभ : चादर लपेट के प्रयोग से रोगी विजातीय द्रव्य के जमाव से मुक्त होकर आरोग्य प्राप्त करता है। पेट की गर्म-ठंडा सेक : अम्लता (एसीडिटी) दूर करे सामग्री : एक बर्तन में गर्म पानी, दूसरे बर्तन में ठंडा पानी व दो नेपकीन। विधि : गर्म पानी के बर्तन में नेपकीन को गीला कर पेडू पर तीन मिनिट तक रखे। अब गर्म पानी का नेपकीन हटा दें। अब ठंडे पानी में गीला किया नेपकीन रखें। इस प्रकार क्रमशः तीन मिनिट गर्म व एक मिनिट ठंडा नेपकीन रखें। इस प्रक्रिया को 15 से 20 मिनिट तक करें। ध्यान रहे कि इस प्रक्रिया का प्रारंभ गर्म पानी की पट्टी से करें व क्रिया की समाप्ति ठंडे पानी की पट्टी से करें। लाभ : इस पट्टी के प्रयोग से पेडू का रक्त का संचार तेज होगा व गर्म-ठंडे के प्रयोग से आँतों का मल ढीला होकर पेडू मल के अनावश्यक भार से मुक्त हो जाएगा। सावधानी : पेट में छाले, हायपर एसिडिटी व उच्च रक्तचाप की स्थिति में इसे कदापि न करें। विशेष टीप : गर्म पानी के नेपकीन के स्थान पर गर्म पानी की बॉटल अथवा रबर की थैली का प्रयोग किया जा सकता है। साभार :- 125 स्वस्थ व निरोगी रहेने का रहस्य डॉ. जगदीश जोशी एवं सुनीता जोशी
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    भाव विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/parmarth-deshna/bhaav/
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    दिगम्बर साधु सन्त परम्परा में वर्तमान युग में अनेक तपस्वी, ज्ञानी ध्यानी सन्त हुए। उनमें आचार्य शान्तिसागरजी महाराज एक ऐसे प्रमुख साधु श्रेष्ठ तपस्वी रत्न हुए हैं, जिनकी अगाध विद्वता, कठोर तपश्चर्या, प्रगाढ़ धर्म श्रद्धा, आदर्श चरित्र और अनुपम त्याग ने धर्म की यथार्थ ज्योति प्रज्वलित की। आपने लुप्तप्राय, शिथिलाचारग्रस्त मुनि परम्परा का पुनरुद्धार कर उसे जीवन्त किया, यह निग्रन्थ श्रमण परम्परा आपकी ही कृपा से अनवरत रूप से आज तक प्रवाहमान है। जन्म - दक्षिण भारत के प्रसिद्ध नगर बेलगाँव जिला चिकोड़ी तालुका (तहसील) में भोजग्राम है। भोजग्राम के समीप लगभग चार मील की दूरी पर विद्यमान येलगुल गाँव में नाना के घर आषाढ़ कृष्णा 6, विक्रम संवत् 1929 सन् 1872 बुधवार की रात्रि में शुभ लक्षणों से युक्त बालक सातगौड़ा का जन्म हुआ था। गौड़ा शब्द भूमिपति-पाटिल का द्योतक है। पिता भीमगौड़ा और माता सत्यवती के आप तीसरे पुत्र थे इसी से मानो प्रकृति ने आपको रत्नत्रय और तृतीय रत्न सम्यकू चारित्र का अनुपम आराधक बनाया । बचपन - सातगौड़ा बचपन से ही वैरागी थे। बच्चों के समान गन्दें खेलों में उनकी कोई रूचि नहीं थी। वे व्यर्थ की बात नहीं करते थे। पूछने पर संक्षेप में उत्तर देते थे। लौकिक आमोद-प्रमोद से सदा दूर रहते थे, धार्मिक उत्सवों में जाते थे। बाल्यकाल से ही वे शान्ति के सागर थे। छोटी सी उम्र में ही आपके दीक्षा लेने के परिणाम थे परन्तु माता-पिता ने आग्रह किया कि बेटा! जब तक हमारा जीवन है तब तक तुम दीक्षा न लेकर घर में धर्मसाधना करो। इसलिए आप घर में रहे। व्यवसाय - मुनियों के प्रति उनकी अटूट भक्ति थी। वे अपने कन्धे पर बैठाकर मुनिराज को दूधगंगा तथा वेदगंगा नदियों के संगम के पार ले जाते थे। वे कपड़े की दुकान पर बैठते थे, तो ग्राहक आने पर उसी से कहते थे कि-कपड़ा लेना है तो मन से चुन लो, अपने हाथ से नाप कर फाड़ लो और बही में लिख दी। इस प्रकार उनकी निस्पृहता थी। आप कभी भी अपने खेतों में से पक्षियों को नहीं भगाते थे। बल्कि खेतों के पास पीने का पानी रखकर स्वयं पीठ करके बैठ जाते थे। फिर भी आपके खेतों में सबसे अधिक धान्य होता था। वे कुटुम्ब के झंझटों में नहीं पड़ते थे। उन्होंने माता-पिता की खूब सेवा की और उनका समाधिमरण कराया। संयम पथ - माता-पिता के स्वर्गस्थ होते ही आप गृह विरत हो गये एवं मुनिश्री देवप्पा स्वामी से 41 वर्ष की आयु में कर्नाटक के उत्तूर ग्राम में ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी सन् 1913 को क्षुल्लक के व्रत अंगीकार किए। आपका नाम शांतिसागर रखा गया। क्षुल्लक अवस्था में आपको कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, क्योंकि तब मुनिचर्या शिथिलताओं से परिपूर्ण थी। साधु आहार के लिए उपाध्याय द्वारा पूर्व निश्चित गृह में जाते थे। मार्ग में एक चादर लपेटकर जाते थे आहार के समय उस वस्त्र को अलग कर देते थे आहार के समय घण्टा बजता रहता था जिससे कोई विध्न न आए। महाराज ने इस प्रक्रिया को नहीं अपनाया और आगम की आज्ञानुसार चर्या पर निकलना प्रारम्भ किया। गृहस्थों को पड़गाहन की विधि ज्ञात न होने से वे वापस मंदिर में आकर विराज जाते इस प्रकार निराहार 4 दिन व्यतीत होने पर ग्राम में तहलका मच गया तथा ग्राम के प्रमुख पाटील ने कठोर शब्दों में उपाध्याय को कहा-शास्त्रोक्त विधि क्यों नहीं बताते ? क्या साधु को निराहार भूखा मार दोगे! तब उपाध्याय ने आगमोक्त विधि बतलाई एवं पड़गाहन हुआ। नेमिनाथ भगवान के निर्माण स्थान गिरनार जी की वंदना के पश्चात् इसकी स्थायी स्मृति रूप अपने ऐलक दीक्षा ग्रहण की ऐलक रूप में आपने नसलापुर में चतुर्मास किया वहाँ से चलकर ऐनापुर ग्राम में रहे। उस समय यरनाल में पञ्चकल्याणक महोत्सव (सन् 1920) होने वाला था वहाँ जिनेन्द्र भगवान के दीक्षा कल्याणक दिवस पर आपेन अपने गुरुदेव देवेन्द्रकीर्ति जी से मुनिदीक्षा ग्रहण की। समडोली में नेमिसागर जी की ऐलक दीक्षा व वीरसागर जी की मुनि दीक्षा के अवसर पर समस्त संघ ने महाराज को आचार्य पद (सन् 1924) से अलंकृत कर अपने आप को कृतार्थ किया। गजपंथा में चतुर्मास के बाद सन् (1934) पञ्चकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इस अवसर पर उपस्थित धार्मिक संघ ने महाराज को चारित्र चक्रवर्ती पद से अलंकृत किया। सल्लेखना - जीवन पर्यन्त मुनिचर्या का निर्दोष पालन करते हुए 84 वर्ष की आयु में दृष्टि मंद होने के कारण सल्लेखना की भावना से आचार्य श्री सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी जी पहुँचे। वहाँ पर उन्होंने 13 जून को विशाल धर्मसभा के मध्य आपने सल्लेखना धारण करने के विचारों को अभिव्यक्त किया। 15 अगस्त को महाराज ने आठ दिन की नियम-सल्लेखना का व्रत लिया जिसमें केवल पानी लेने की छूट रखी। 17 अगस्त को उन्होंने यम सल्लेखना या समाधिमरण की घोषणा की तथा 24 अगस्त को अपना आचार्य पद अपने प्रमुख शिष्य श्री १०८ वीरसागर जी महाराज को प्रदान कर घोषणा पत्र लिखवाकर जयपुर (जहाँ मुनिराज विराजमान थे) पहुँचाया। आचार्य श्री ने ३६ दिन की सल्लेखना में केवल १२ दिन जल ग्रहण किया। १८ सितम्बर १९५५ को प्रातः ६.५० पर ॐ सिद्धोऽहं का ध्यान करते हुए युगप्रवर्तक आचार्यं श्री शान्तिसागर जी ने नश्वर देह का त्याग कर दिया। संयम-पथ पर कदम रखते ही आपके जीवन में अनके उपसर्ग आये जिन्हें समता पूर्वक सहन करते हुए आपने शान्तिसागर नाम को सार्थक किया। कुछ उपसर्गों एवं परीषहों की संक्षिप्त झलकियाँ इस प्रकार हैं - क्षुल्लक दशा मे कोगनोली के मंदिर में ध्यानस्थ शान्तिसागर जी के शरीर से विशाल विषधर लिपट गया। बहुत देर तक क्रीड़ा करने के पश्चात् शांत भाव से वापस चला गया। मध्याह्न का समय था कोन्नूर की गुफा में महाराज सामायिक कर रहे थे एक उड़ने वाला सर्प आया और महाराज की जंघाओं के बीच छिप गया। वह लगभग तीन घंटे तक उपद्रव करता रहा। लेकिन आचार्य श्री ने अपनी स्थिर मुद्रा को भंग नहीं किया। द्रोणगिरी के पर्वत पर रात्रि में महाराज जब ध्यान करने बैठे तभी एक सिंह आ गया वह प्रात: लगभग 8-9 बजे तक महाराज के सामने ही बैठा रहा। इस प्रकार मुक्तागिरी पर्वत पर भी जब महाराज ध्यान में रहते थे, शेर झरने पर पानी पीने आ जाता था। आचार्यश्री का कहना था कि भय किस बात का? यदि वह पूर्व का बैरी न हो और हमारी ओर से कोई बाधा या आक्रमण न हो तो वह क्यों आक्रमण करेगा? बिना किसी भय के आत्मलीन रहते थे। कोन्नूर के जंगल में महाराज धूप में बैठकर सामायिक कर रहे थे, इतने में एक बड़ा सा कीड़ा उनके पास आया और उनके पुरुष चिह्न से चिपट कर वहाँ का रक्त-चूसने लगता है। खून बहने लगा किन्तु महाराज डेढ़ घण्टे तक अविचल ध्यान में बैठे रहे। जंगल के मंदिर में ध्यान करते वक्त असंख्य चीटियाँ उनके शरीर पर चढ़ गई एवं देह के कोमल अंग-उपांग को एक-दो घंटे ही नहीं सारी रात खाती रहीं तब वे महापुरुष साम्य भाव से परीषह सहन करते रहे। एक अविवेकी श्रावक जो कपड़े से गर्म दूध का बर्तन पकड़े हुए था उसने वह उबलता दूध महाराज की अंजुलि में डाल दिया। उष्णता की असह्य पीड़ा से महाराज की अंजुलि छूट गई और वे नीचे बैठ गये, किन्तु उनकी मुख मुद्रा पर क्रोध की एक रेखा तक नहीं उभरी। श्रावक की अज्ञानता के कारण नौ दिन तक पर्याप्त जल नहीं मिला। जिसके कारण उनकी छाती पर फफोले पड़ गए पर वे गंभीर और शांत बने रहे। दसवें दिन मात्र जल लेकर ही बैठ गए। दस-बारह वर्ष तक महाराज दूध और चावल ही मात्र लेते रहे। एक दिन किसी श्रावक ने पूछा-महाराज आप और कुछ आहार में क्यों नहीं लेते, तब महाराज बोले-जो आप देते हैं वही मैं लेता हूँ। दूसरे दिन श्रावकों ने दाल रोटी आदि सामग्री देनी चाही तो भी महाराज ने नहीं ली। पुन: पूछने पर बताया कि आटा, मसाला कब पिसा हुआ था? रात्रि में पिसा हुआ अन्न रात्रि भोजन के दोष का कारण बनता है। अत: पुन: मर्यादित भोजन प्राप्त होने पर ग्रहण करने लगे। आचार्य श्री ने गृहस्थ अवस्था में ही 38 वर्ष की आयु में घी-तेल का आजीवन त्याग कर दिया था, उनके नमक, शक्कर, छाछ आदि का भी त्याग था तथा उन्होंने 35 वर्ष के मुनि जीवन में 27 वर्ष 3 माह 23 दिन (9938) तक उपवास धारण किये। बम्बई सरकार ने हरिजनों के उद्धार के लिए एक हरिजन मंदिर प्रवेश कानून सन् 1947 में बनाया। जिसके बल पर हरिजनों को जबरदस्ती जैन मंदिरों में प्रवेश कराया जाने लगा। जब आचार्य श्री को यह समाचार ज्ञात हुआ तो उन्होंने इसे जैन संस्कृति, जैन धर्म पर आया उपसर्ग जानकर, जब तक यह उपसर्ग दूर नहीं होगा तब तक के लिए अन्नाहार का त्याग कर दिया। आचार्य श्री की श्रद्धा एवं त्याग के परिणाम स्वरूप लगभग तीन वर्ष पश्चात् इस कानून को हटा दिया गया। तभी आचार्य श्री ने 1105 दिन के बाद 16 अगस्त 1951 रक्षाबन्धन के दिन अन्नाहार को ग्रहण किया। दिल्ली में दिगम्बर मुनियों के उन्मुक्त विहार की सरकारी आज्ञा नहीं थी। अत: 10-20 आदमी हमेशा महाराज के विहार के वक्त साथ ही रहते थे। आचार्य महाराज को चतुर्मास के दो माह व्यतीत होने पर जब यह बात ज्ञात हुई तो महाराज ने स्वयं एक फोटोग्राफर को बुलवाया और ज्ञात समय के पूर्व अकेले ही शहर में निकल गये तथा जामामस्जिद, लालकिया, इंडिया गेट, संसद भवन आदि प्रमुख स्थानों पर खड़े होकर उन्होंने अपना फोटो खिचवाया। समाज में अपवाद होने लगा कि महाराज को फोटो खिचवाने का शौक है। इस विषय में महाराज से पूछे जाने पर उन्होंने ने कहा-हमारे शरीर की स्थिति तो जीर्ण अधजले काठ के समान है इसके चित्र की हमें क्या आवश्यकता और वह चित्र हम कहाँ रखेंगे। श्रावकों का कर्तव्य है कि इन चित्रों को सम्हाल कर रखें जिससे भविष्य में मुनि विहार की स्वतंत्रता का प्रमाण सिद्ध हो सके। हमारे इस उद्योग से सभी दिगम्बर जैन मुनियों में साहस आवेगा, दिगम्बर जैनधर्म की प्रभावना होगी। हमारे ऊपर उपसर्ग भी आए तो हमें कोई चिन्ता नहीं। अच्छे कार्य करते हुए भी यदि अपवाद आये तो उसे सहना मुनि धर्म है न कि उसका प्रतिवाद करना। आगम ग्रन्थों की सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए आचार्य श्री के आशीर्वाद एवं प्ररेणा से सिद्धान्त ग्रन्थों को ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण कराया गया। अनेकों भव्य आत्माओं ने आचार्य श्री से व्रत-संयम ग्रहण कर अपने जीवन का उद्धार किया।
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    और माटी श्वास का शमन कर अपने भार को लघु करती-सी… उपाश्रम की और निहारती है प्रतीक्षा की मुद्रा में | रजत-पालकी में विराजती पर, ऊबी-सी… लज्जा-संकोचवती-सी राजा की रानी यात्रा के समय रणवास की और निहारती-सी ! यहाँ पर मिलता है। पूरा ऊपर उठा हुआ सुकृत का सर। और माटी को प्राप्त हुआ है। प्रथम अवसर ! यह उपाश्रम का परिसर है यहाँ पर, कसकर परिश्रम किया जाता है निशि-वासर ! यहाँ पर योग शाला है प्रयोग शाला भी जोरदार ! जहाँ पर शिल्पी से मिलती है शिक्षण-प्रशिक्षण क्षण प्रतिक्षण And the Soil Having pacified her breathing As if minimizing her burden... Stares at the hermitage In a posture of expectation; Like a King's better half, at the time of journey Beholding her harem, While seated in a silver palanquin, But, feeling tedious... With a sense of modesty and diffidence ! Here one finds The pond of Virtuousness Fully elevated. And The Soil has achieved A first chance for her ! It Is the campus of the hermitage Here, the exertions are undertaken With full force Day in and day out ! Here, There is an apartment for ‘Yoga’ The laboratory too is Vigorous ! Where one gets From the Artisan The disciplines and training At every minute,
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    इन गालों पर पड़ी है ऐसी दशा में गालों का सछिद्र होना स्वाभाविक ही है। और प्यार और पीड़ा के घावों में अन्तर भी तो होता है, रति और विरति के भाव एक से होते हैं क्या ?” माटी का इतिहास माटी के मुख से सुन शिल्पी सहज कह उठा कि वास्तविक जीवन यही है। सात्विक जीवन यही है। धन्यं ! और, यह भी एक अकाट्य नियम है कि अति के बिना इति से साक्षात्कार सम्भव नहीं और इति के बिना अथ का दर्शन असम्भव ! अर्थ यह हुआ कि पीड़ा की अति ही पीड़ा की इति है और पीड़ा की इति ही सुख का अथ...। Has rolled down upon these cheeks, In such a condition It's but natural that The cheeks bear boils And There remains some difference too Between the Sores of love and those of the sufferings ! Are the Sentiments of Amorousness and renunciation uniform ?" On hearing the history of Soil From the mouth of the Soil Herself The Artisan simply spoke out That It is the real life, indeed, It is the pious life, indeed How fortunate ! And, This too is an unfailing rule That Without the culmination point There is no access to the finis And Without the end It is impossible to Visualize the beginning ! The sum and Substance is that The climax of Suffering, indeed, Is the conclusion of Suffering And The conclusion of Suffering Is the commencement of happiness...
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: NandKumar
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: NandKumar
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: NandKumar
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: NandKumar
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: NandKumar
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