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  1. Vidyasagar.Guru

    Vidyasagar.Guru

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    अनेक नामो को धारण करने वाले वर्तमान शासन नायक अन्तिम तीर्थंकर भगवान् महावीर का जीवन परिचय एवं चारित्र के विकास का वर्णन इस अध्याय में है। 1. बालक महावीर का जन्म कहाँ हुआ था ? बालक महावीर का जन्म कुण्डग्राम (वैशाली) विहार में हुआ था। 2. तीर्थंकर महावीर के पाँच कल्याणक किस-किस तिथि में हुए थे? गर्भकल्याणक - आषाढ़ शुक्ल षष्ठी, शुक्रवार, 17 जून, ई.पू. 599 में। जन्मकल्याणक - चैत्र शुक्ल त्रयोदशी, सोमवार, 27 मार्च, ई.पू. 598 में। दीक्षाकल्याणक - मगसिर कृष्ण दशमी, सोमवार, 29 दिसम्बर, ई.पू.569 में। ज्ञानकल्याणक - वैशाख शुक्ल दशमी, रविवार, 23 अप्रैल, ई.पू.557 में। मोक्षकल्याणक - कार्तिककृष्ण अमावस्या, मङ्गलवार 15 अक्टूबर ई.पू. 527 में विक्रम सं.पूर्व 470 एवं शक पूर्व 605 में । (तीर्थ महा.और उनकी आचार्य परम्परा, भाग-1) 3. बालक महावीर कहाँ से आए थे? बालक महावीर अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान से आए थे। 4. बालक महावीर के माता-पिता एवं दादा-दादी का क्या नाम था ? बालक महावीर की माता का नाम त्रिशला, पिता का नाम राजा सिद्धार्थ तथा दादा का नाम सर्वार्थ, दादी का नाम श्रीमती था। 5. त्रिशला के माता-पिता एवं दादा-दादी का क्या नाम था ? त्रिशला की माता का नाम सुभद्रादेवी, पिताका नाम राजा चेटक, दादा का नाम राजा केक तथा दादी का नाम यशोमति था। 6. राजा चेटक के कितने पुत्र एवं पुत्रियाँ थीं? राजा चेतक के दस पुत्र - धनदत्त, धनभद्र, उपेंद्र, सुदत्त, सिहद्त्त, सुकुम्भोज, अकम्पन, पतंगक, प्रभंजन और प्रभास तथा पुत्रियाँ- त्रिशला, मृगावती, सुप्रभा, प्रभावति, चेलना, ज्येष्ठा और चंदना। चेलना का अपर नाम वसुमति भी था। 7. चेटक का अर्थ क्या होता है? अनेक शत्रुओं को चेटी या दास बना लेने के कारण वह चेटक कहलाने लगे। 8. राजकुमार महावीर की दीक्षा स्थली, दीक्षा वन एवं दीक्षा वृक्ष का क्या नाम था ? राजकुमार महावीर की दीक्षा स्थली कुण्डलपुर, दीक्षा वन-षण्डवन एवं दीक्षा वृक्ष-शालवृक्ष था। 9. राजकुमार महावीर को वैराग्य कैसे हुआ था ? राजकुमार महावीर को वैराग्य जातिस्मरण के कारण हुआ। 10. मुनि महावीर की पारणा कहाँ एवं किसके यहाँ हुई थी ? मुनि महावीर की पारणा राजा कूल के यहाँ कूलग्राम में हुई थी। 11. महावीर का वंश एवं गोत्र कौन-सा था ? महावीर का वंश- नाथ एवं गोत्र - काश्यप था। 12. किस पालकी में बैठकर दीक्षा लेने गए थे? चन्द्रप्रभा पालकी में बैठकर दीक्षा लेने गए थे। 13. मुनि महावीर को केवलज्ञान कहाँ कौन से वृक्ष के नीचे हुआ था ? मुनि महावीर को केवलज्ञान षण्डवन/मनोहर वन (ऋजुकूला नदी) एवं शाल वृक्ष के नीचे हुआ था। 14. तीर्थंकर महावीर के समवसरण में मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ कितनी थीं? तीर्थंकर महावीर के समवसरण में 14,000 मुनि, 36,000 आर्यिकाएँ 1 लाख श्रावक और 3 लाख श्राविकाएँ थीं। 15. तीर्थंकर महावीर के मुख्य गणधर एवं मुख्य गणिनी एवं मुख्य श्रोता कौन थे? तीर्थंकर महावीर के मुख्य गणधर गौतम, गणिनी चंदना, श्रोता राजा श्रेणिक थे। 16. तीर्थंकर महावीर के यक्ष-यक्षिणी का क्या नाम था ? तीर्थंकर महावीर के यक्ष गुहाक, यक्षिणी सिद्धायनी। 17. तीर्थंकर महावीर के कितने गणधर थे। नाम बताइए? तीर्थंकर महावीर के11 गणधर थे। इन्द्रभूत (गौतम), वायुभूति, अग्निभूति, सुधर्मास्वामी, मौर्य, मौन्द्र, पुत्र, मैत्रेय, अकम्पन, अंधवेला तथा प्रभास थे। 18. तीर्थंकर महावीर का प्रथम समवसरण कहाँ लगा था? तीर्थंकर महावीर का प्रथम समवसरण विपुलाचल पर्वत पर लगा था। 19. तीर्थंकर महावीर की देशना कितने दिन तक और क्यों नहीं खिरी ? तीर्थंकर महावीर की देशना 66 दिन तक नहीं खिरी क्योंकि गणधर का अभाव था। 20. तीर्थंकर महावीर की देशना कब खिरी थी? तीर्थंकर महावीर की देशना श्रावण कृष्ण प्रतिपदा, शनिवार 1 जुलाई, ई.पू. 557 में खिरी थी। 21. तीर्थंकर महावीर के समवसरण में राजा श्रेणिक ने कितने प्रश्न किए थे? तीर्थंकर महावीर के समवसरण में राजा श्रेणिक ने 60 हजार प्रश्न किए थे। 22. तीर्थंकर महावीर ने योग निरोध करने के लिए कितने दिन पहले समवसरण छोड़ा था ? तीर्थंकर महावीर ने योग निरोध करने के लिए दो दिन पहले समवसरण छोड़ा था। 23. तीर्थंकर महावीर को सम्यग्दर्शन किस पर्याय में हुआ था ? तीर्थंकर महावीर को सम्यग्दर्शन सिंह की पर्याय में हुआ था। 24. तीर्थंकर महावीर का तीर्थकाल कितने वर्षों का है? तीर्थंकर महावीर का तीर्थकाल 21 हजार 42 वर्षों का है। (ति.प.4/1285) 25. सिंह से महावीर तक के भव बताइए? सिंह, सौधर्मस्वर्ग में देव, कनकोज्वल राजा, लान्तव स्वर्ग में देव, हरिषेण राजा, महाशुक्र स्वर्ग में देव, प्रिय मित्र नामक राजपुत्र, बारहवें स्वर्ग में देव, नंदराजा, अच्युत स्वर्ग में इन्द्र और तीर्थंकर महावीर। 26. तीर्थंकर महावीर ने तीर्थंकर प्रकृति का बंध कब एवं कहाँ किया था? तीर्थंकर महावीर ने नंदराजा की पर्याय में जब संयम धारण किया था, तब प्रोष्ठिल गुरु के पादमूल में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। 27. सिंह को उपदेश देने वाले मुनियों के क्या नाम थे ? सिंह को उपदेश देने वाले मुनियों के नाम अमितकीर्ति एवं अमितप्रभ मुनि थे। 28. तीर्थंकर पार्श्वनाथ के निर्वाण पश्चात् कितने वर्षों के बाद बालक महावीर का जन्म हुआ था ? तीर्थंकर पार्श्वनाथ के निर्वाण के 178 वर्ष बाद बालक महावीर का जन्म हुआ था। 29.तीर्थंकर महावीर के कितने नाम थे, नाम बताइए? 1.वीर—जन्माभिषेक के समय इन्द्र को शंका हुई कि बालकइतने जलप्रवाहको कैसे सहनकोरेगा। बालक ने अवधिज्ञान से जानकर पैर के अंगूठे से मेरुपर्वत को थोड़ा-सा दबाया, तब इन्द्र को ज्ञात हुआ इनके पास बहुत बल है। इन्द्र ने क्षमा माँगी एवं कहा कि ये तो वीर जिनेन्द्र हैं। 2.वद्धमान-राजा सिद्धार्थ ने कहा जब से बालक प्रियकारिणी के गर्भ में आया उसी दिन से घर, नगर और राज्य में धन-धान्य की समृद्धि प्रारम्भ हो गई, अतएव इस बालक का नाम वर्द्धमान रखा जाए। 3.सन्मति - एक समय संजय और विजय नाम के दो चारण ऋद्धिधारी मुनियों को तत्व सम्बन्धी कुछ जिज्ञासा थी। वर्द्धमान पर दृष्टि पड़ते ही उनकी जिज्ञासा का समाधान हो गया तब मुनियों ने वर्द्धमान का नाम सन्मति रखा। 4.महावीर-वर्द्धमान मित्रों के साथ एक वृक्ष पर क्रीड़ा (खेल) कर रहे थे, तब संगमदेव ने भयभीत करने के लिए एक विशाल सर्प का रूप धारण कर वृक्ष के तने से लिपट गया। सब मित्र डर गए, डाली से कूदे और भाग गए, किन्तु वर्द्धमान सर्प के ऊपर चढ़कर ही उससे क्रीड़ा करने लगे थे। ऐसा देख संगमदेव ने अपने रूप में आकर वर्द्धमान की प्रशंसा कर महावीर नाम दिया। 5.अतिवीर-एक हाथी मदोन्मत्त हो किसी के वश में नहीं हो रहा था। उत्पात मचा रहा था। महावीर को ज्ञात हुआ तो वे जाने लगे, तब लोगों ने मना किया किन्तु वे नहीं माने और चले गए। हाथी महावीर को देख नतमस्तक हो सूंड उठाकर नमस्कार करने लगा। तब जनसमूह ने कुमार की प्रशंसा की और उनका नाम अतिवीर रख दिया। 30. मुनि महावीर पर किसने उपसर्ग किया था ? मुनि महावीर पर उपसर्ग भव नामक यक्ष अथवा स्थाणु नाम रुद्र ने किया। ऐसे दो नाम पुराणों में आते हैं।
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    *नेमावर से गौरझामर के बिहार के समय, बापौली धाम, फरवरी 2015* VID-20190327-WA0060.mp4 *आहार चर्या के लिए यह स्थान निश्चित किया गया था, महंत जी के विशेष आग्रह पर संघ सहित गुरु जी ने उस आश्रम के अंतरंग परिसर में प्रवेश किया एवं आहार हेतु उठने के पहले की जाने वाली भक्तियॉ वहीं पर बैठ कर सभी मुनि महाराजों ने की, इसी दौरान महंत जी सहित सभी शिष्यों ने आचार्य महाराज का पाद प्रक्षालन एवं पुष्पमाला आदि से भक्ति पूजन संपन्न किया।* *लाल वस्त्रों में जो स्वामी जी हैं उनका 12 वर्ष से मौन था एवं आश्रम परिसर से बाहर भी नहीं निकले थे परंतु गुरु जी से उन्होंने चर्चा की एवं छोड़ने आश्रम परिसर से बाहर भी निकले थे।* इस आश्रम में 50 गिर गाय हैं एवं उन कि सेवा में 12 व्यक्ति (4 व्यक्ति 8 घंटे के लिए) सेवा में रहते हैं (ताकि गोबर आदि के हो जाने पर तुरंत ही उसकी सफाई की जा सके) एवं ये स्वामी जी रात्रि 11:00 बजे से सुबह 3:00 बजे तक यहां ध्यान मुद्रा में स्वयं बैठते हैं। उस परिसर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। *वीतरागी संत के आगे सभी साधक गण नतमस्तक होते हैं* यह उस क्षण का एक दुर्लभतम वीडियो है (2:55 मिनट)।
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    ”सत्य” ”अहिंसा” धर्म हमारा, ”नवकार” हमारी शान है, ”महावीर” जैसा नायक पाया…. ”जैन हमारी पहचान है.” महावीर भगवान के जन्म कल्याण दिवस की शुभकामनाएँ एवं बधाई
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    अनुवादित ‘समणसुत्तं' का ही नाम ‘जैन गीता' है। इसकी रचना के सम्बन्ध में आचार्यश्री स्वयं इसकी ‘मनोभावना' नामक भूमिका में लिखते हैं-“विगत बीस मास पूर्व की बात है, राजस्थान स्थित अतिशयक्षेत्र श्री महावीरजी में महावीर-जयन्ती के सुअवसर पर ससंघ मैं उपस्थित था। उस समय ‘समणसुत्तं' का जो सर्व सेवा संघ, वाराणसी से प्रकाशित है, विमोचन हुआ। यह एक सर्वमान्य संकलित ग्रन्थ है। इसके संकलनकर्ता ब्र. जिनेन्द्र वर्णी हैं। (आपने सन् १९८३ में ईसरी (गिरिडीह) बिहार में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण करके क्षुल्लक श्री सिद्धान्तसागर महाराज के रूप में सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण प्राप्त किया था, आपने जैन-सिद्धान्त का आलोडन करके यह नवनीत समाज के सामने प्रस्तुत किया है।)” इस ग्रंथ में चारों अनुयोगों के विषय यथास्थान चित्रित हैं। अध्यात्म रस से गोम्मटसार आदि ग्रंथों की गाथाएँ इसमें प्रचुर मात्रा में संकलित हैं। इसी का पद्यानुवाद आचार्यश्री ने 'जैन गीता' नाम से किया। ‘समणसुत्तं' के प्रेरणास्रोत के सम्बन्ध में उन्होंने सन्त विनोबा का उल्लेख किया है। इसके समाधान में आचार्य विनोबा ने लिखा है कि उन्होंने कई बार जैनों से प्रार्थना की थी कि जैनों का एक ऐसा ग्रन्थ हो, जो सभी जैन सम्प्रदायों को मान्य हो, जैसे कि वैदिक धर्मानुयायियों का 'गीता' और बौद्धों का ‘धम्मपद' है। विनोबाजी के इस आह्वान पर ‘जैनधर्म सार' नामक एक पुस्तक प्रकाशित की। पुनः विद्वानों के सुझाव पर इसमें से कुछ गाथाएँ हटाकर और कुछ जोड़कर ‘जिणधम्म' नाम से पुस्तक प्रकाशित हुई। फिर इसकी चर्चा के लिए बाबा के आग्रह से ही एक संगीति बैठी, जिसमें मुनि, आचार्य और दूसरे विद्वान्, श्रावक मिलकर लगभग तीन सौ लोग इकट्ठे हुए। बार-बार चर्चा के पश्चात् उसका नाम भी बदला, रूप भी बदला, जो सर्व सम्मति से श्रमणसूक्तम्'-जिसे अर्धमागधी में 'समणसुत्तं' कहते हैं, बना। ७५६ गाथाओं वाला ‘समणसुत्तं' संज्ञक ग्रन्थ का यह अनुवादित रूप है। इसमें चार खण्ड हैं। इसके प्रथम खण्ड ज्योतिर्मुख, द्वितीय खण्ड मोक्षमार्ग, तृतीय खण्ड तत्त्व दर्शन तथा चतुर्थ खण्ड‘स्याद्वाद' है।
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    *‼आहारचर्या‼* *प्रतिभास्थली दयोदय जबलपुर* _दिनाँक :३०/०३/२०१९_ *आगम की पर्याय महाश्रमण युगशिरोमणि १०८ आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज* को आहार दान का सौभाग्य *श्रीमान कमलेश जी जैन वर्धमान टैक्सटाइल जबलपुर* को प्राप्त हुआ है।_ इनके पूण्य की अनुमोदना करते है। 💐🌸💐🌸 *भक्त के घर भगवान आ गये* 🌹🌹🌹🌹 *_सूचना प्रदाता-:ब्र.सुनील भैया जी_* 🌷🌷🌷 *अंकुश जैन बहेरिया *प्रशांत जैन सानोधा VID-20190330-WA0012.mp4
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    *‼आहारचर्या‼* *प्रतिभास्थली दयोदय जबलपुर* _दिनाँक :२८/०३/२०१९_ *आगम की पर्याय महाश्रमण युगशिरोमणि १०८ आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज* को आहार दान का सौभाग्य *प्रतिभास्थली जबलपुर की बहनों* को प्राप्त हुआ है।_ इनके पूण्य की अनुमोदना करते है। 💐🌸💐🌸 *भक्त के घर भगवान आ गये* 🌹🌹🌹🌹 *_सूचना प्रदाता-:श्री अमित जी जैन पड़रिया मुकुल (सेतु )जैन जबलपुर_* 🌷🌷🌷 *अंकुश जैन बहेरिया *प्रशांत जैन सानोधा
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    ■◆◆◆■◆◆◆■◆◆◆■◆◆◆ *खितौला* *22-03-2019* सभी के कष्ट दूर हो ऐसी भावना भाये:-मुनि श्री खितौला सिहोरा जबलपुर ( मध्यप्रदेश) मे सर्व श्रेष्ठ साधक आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य *मुनि श्री विमल सागर जी महाराज ससंघ* के सानिध्य मे 21 मार्च को दोपहर में श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर खितौला में सम्मान समारोह में धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री भाव सागर जी ने कहा कि मंदिर बहुत सुंदर है और प्रतिमा भी अष्टधातु की विशाल प्रतिमा है।पंचकल्याणक भी अद्वितीय हुआ है।छोटी समाज होकर भी यह बड़ा कार्य किया है।आप प्रशंसा के पात्र हैं। सभी ने तन मन धन से सहयोग किया है। यह मंदिर गरीब और अमीर सभी का है। इसलिए पंचायती मंदिर बनाए जाते हैं। प्रतिमा विराजमान करवाने वाले वेदी आदि बनवाने वाले एवं मंदिर को वस्तु दान करने वाले अपना स्वामित्व नहीं रखें। दान देने के बाद यदि समय के अंदर नहीं देते हैं तो निर्माल्य का दोष लगता है और बहुत सी बीमारियां होती हैऔर बहुत सी परेशानियां आती हैं।आगे की पीढ़ी पूजन अभिषेक करेंगी तो आपको भी उसका पुण्यार्जन होगा अच्छे कार्यों में विघ्न तो आते है। णमोकार मंत्र विश्व का शक्तिशाली मंत्र है जिनेवा में 1997 मे विश्व शांति मंत्र की उपाधि मिली है। इसके प्रभाव से कैंसर जैसे रोग भी ठीक हो गए भक्तामर स्त्रोत के प्रभाव से भी विभिन्न परेशानियां दूर हो गई मुनि श्री विमल सागर जी ने कहा कि गुणवान व्यक्ति वही होता है जो विवेक बान होता है आप लोगों ने बहुत अच्छी शुरुआत की है। आज होली का दिन है आप लोग मंदिर में होली मना रहे हैं। मंदिर धार्मिक अनुष्ठानों से सुशोभित होते हैं। भक्ति आराधना करने से अतिशय घटित होते हैं। भक्तों की भक्ति में अतिशय होते हैं। जीवन का कोई भरोसा नहीं है कब क्या हो जाए और हमारे अरमान रह जाए होली को विवेक पूर्वक मनाएं।दौड़ना है तो सिंह की दौड़ में दौड़ो। हे भगवन आपकी श्रद्धा के बिना मुझे बहुत ही संपदा भी मिल जाए तो वह व्यर्थ है।जो भगवान के करीब होता है वह गरीब नहीं होता है।जीवन भर के लिए जो ब्रह्मचर्य व्रत धारण करता है ऐसी भावना करता है वह अतुल बलशाली होता है। मैंने पूर्व में जीवो का सम्मान नहीं किया होगा इसलिए आज सम्मान नहीं मिल रहा है। सभी के कष्ट दूर हो ऐसी भावना करना चाहिए जैसे भाव होते हैं वैसा पूण्य का अर्जन होता है। श्रद्धा के केसर से होली खेले बिना शांति के धार्मिक अनुष्ठानों का आनंद नहीं आता है।पंचकल्याणक में पात्र बनने वालों का सम्मान किया गया चित्र अनावरण अजित कुमार जैन (मझौली वालों)सिहोरा विनोद कुमार जैन सौधर्म इंद्र के द्वारा दीप प्रज्वलन किया गया संचालन राहुल सिंघई ने किया सम्मान मंदिर कमेटी पंचकल्याणक कमेटी ने किया।
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    आचार्य श्री १०८ विद्यासागर महाराज जी के प्रवचनो को मुनि श्री १०८ संधान सागर जी महाराज ने हस्त लिखत किया है | यहाँ पर उसका बारहवां भाव उपलब्ध है | बारहवें भाग में दिनांक 25.11.2018 से 21.01.2019 तक के प्रवचन है |
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    व्यर्थवादी की दुर्दशा जंगल में एक तालाब था, उसका जल ज्येष्ठ माह की प्रखर धूप से सूखकर नाम मात्र रह गया। उनके किनारे पर रहने वाले दो हंसों ने आपस में सलाह की कि अब यहां से किसी भी अन्य जलाशय पर चलना चाहिए, जिसको सुनकर उनके मित्र कछुवे ने कहा कि, “तुम लोग तो आकाश मार्ग से उड़कर चले जाओगे, परन्तु मैं कैसे चल सकता हूँ?" हंसों ने सोचा बात तो ठीक ही है और एक अपने मित्र को इस प्रकार विपत्ति में छोड़कर जाना भी भलमनसाहत नहीं है, अतः अपनी बुद्धिमता से एक उपाय सोच निकाला। एक लम्बी सरल लकड़ी लाये ओर कछुवे से कहा कि तुम अपने मुँह से इसे बीच में पकड़ लो, हम दोनों इसके इधर-उधर के अन्त भागों को अपनी चोंचो से पकड़ कर ले उड़ते हैं, यह ठीक होगा।'' इस प्रकार तीनों आसमान में चलने लगे। चलते-चलते धरातल पर मध्य में एक गांव आया। गाँव के लोग नया दृश्य देखकर अचम्भे में पड़े और आपस में कहने लगे कि “देखो यह कैसा विचित्र खेल है।” यों कल-कल मचा देखकर कछुवे से न रहा गया, वह बोल बड़ा कि क्यों चक-चक करते हो, बस फिर क्या था, धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा और पकड़ा गया। मतलब यह कि मनुष्यों में अपने भले के लिए शारीरिक संयम के साथ-साथ वाणी का भी संयम होना चाहिए। शारीरिक संयम उतना कठिन नहीं है जितना कि मनुष्य के लिए वाक् संयम एवं मानसिक संयम तो उससे भी कहीं अधिक कठिन है। वाणी का संयम तो मुंह बन्द किया और हो सकता है, किन्तु मन तो फिर भी चलता ही रहेगा। मनुष्य का मन इतना चंचल है कि वह क्षण भर में कहीं का कहीं दौड़ जाता है। इसके नियंत्रण के लिए तो सतत साधु-संगति और सत्साहित्यावलोकन के सिवाय और कोई भी उपाय नहीं है। यद्यपि साधुओं का समागम हरेक के लिए सुलभ नहीं है फिर भी उनकी लिखी पुस्तकों को पढ़कर अपना जीवन सुधारा जा सकता है।
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    रात्रि में भोजन करने से हानि अकबर बादशाह कौम से मुसलमान थे किन्तु हिन्दुओं के साथ भी उनका अच्छा संपर्क था। उनका प्रधानमंत्री बीरबल भी ब्राह्मण था। उनके पास और भी भले-भले हिन्दू रहते थे। एक दिन, दिन में खाने वाले किसी विचारशील हिन्दू आदमी ने उनसे कहा कि हुजूर! आप रात्रि में खाना खाते हैं यह ठीक नहीं कर रहे हैं। बादशाह बोले क्यों क्या हानि है? जवाब मिला कि हानि तो बहुत है। सबसे पहली हानि तो यही है कि रात्रि में अंधकार की वजह से भोजन में क्या है और क्या नहीं है यही ठीक नहीं पता चला करता है। तब बादशाह बोले कि दीपक के उजाले में अच्छी तरह से देखकर खाया जाये तो फिर क्या बात रह जाती है? जवाब मिला कि बात तो और भी है परन्तु अभी आप इतना ही करें कि दीपक के प्रकाश में अच्छी तरह से देखकर ही खाया करें। अब बादशाह रोज ऐसा ही करने लगे। एक रोज सजा हुआ थाल बादशाह के आगे टेबिल पर लाकर रखा गया तो बादशाह बोले कि दीपक लाओ तब देखकर खाया जायेगा। दीपक आया और देखा गया तो भोजन में घी और मीठे की वजह से जहरीली कीड़ियों का नाल लगा हुआ है। बादशाह को विचार आ गया तो नियम किया कि आगे के लिए रात्रि को न खाकर दिन में ही खाया जाये यही बात अच्छी है। | हाँ! यह कहा जा सकता है कि वह समय कुछ और था। आज तो स्थान-स्थान पर बिजली की रोशनी होती है जिसमें अच्छी तरह देखकर खा लिया जा सकता है, परन्तु ऐसा कहने वालों को इतना भी तो सोचना चाहिये। कि बिजली के प्रकाश में भी पंतगे, मच्छर वगैरह आकर भोजन में पड़ेंगे। जिनमें कितने ही मच्छर ऐसे भी होते हैं जिनके कि खाने में आ जाने से अनेक प्रकार के भयंकर रोग हो जाते है।
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    गुरु-स्मृति-स्तुति मैं आपकी सदुपदेश सुधा न पीता, जाती लिखी न मुझसे यह जैन-गीता'। दो ‘ज्ञानसागर गुरो!' मुझको सुविद्या, ‘विद्यादिसागर' बनँ तज दूँ अविद्या ॥१॥ भूल-क्षम्य लेखक कवि मैं हूँ नहीं, मुझमें कुछ नहिं ज्ञान। त्रुटियाँ होवें यदि यहाँ, शोध पढ़ें धीमान ॥२॥ मंगल-कामना यही प्रार्थना ‘वीर' से अनुनय से कर जोर। हरी-भरी दिखती रहे, धरती चारों ओर ॥३॥ मरहम पट्टी बाँध के, वृण का कर उपचार। ऐसा यदि ना बन सके, डंडा तो मत मार ॥४॥ फूल बिछाकर पंथ में, पर प्रति बन अनुकूल। शूल बिछाकर भूल से, मत बन तू प्रतिकूल ॥५॥ तजो रजोगुण, साम्य को-सजो, भजो निज-धर्म। शम मिले, भव दुःख मिटे, आशु मिटें वसु कर्म ॥६॥ रचना स्थान एवं समय परिचय ‘श्रीधर-केवलि' शिव गये, कुण्डलगिरि से हर्ष। धारा वर्षायोग उन, चरणन में इस वर्ष ॥७॥ ‘बड़े बाबा' बड़ी कृपा, की मुझ पै आदीश। पूर्ण हुई मम कामना, पाकर जिन आशीष ॥८॥ ‘संग-गगन-गति-गंध' की भादु पदी सित तीज। पूर्ण हुआ यह ग्रंथ है, भुक्ति-मुक्ति का बीज ॥९॥
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    जब पुराण पढ़ने की बात आती थी, तब आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज ग्रन्थ के चयन की ओर चले जाते थे। चयन करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि पुराणों में श्रृंगार रस का भी वर्णन है। नये-नये वैरागी का, स्वाध्यायी का, अध्येता का कहीं वैराग्य घट न जाये श्रृंगार रस में बह न जाये। ऐसा ही एक बार विद्याधर के शुरुआत के दिनों में जब पुराण पढ़ने की बात आई तो आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज तत्त्व के मर्म को समझने वाले साधु परमेष्ठी ने विद्याधर को आदेश की भाषा में बुलाकर कहा उस समय ब्र. विद्याधर हाथ जोड़कर गुरु के सम्मुख बैठ गए फिर उन्हें गुरुदेव से आदेश प्राप्त हुआ कि आदिपुराण के पूर्वार्द्ध को एवं जयोदय को अभी तुम्हें नहीं पढ़ना तब शिष्य अपनी छोटी/अल्प बुद्धि से बड़ी बातें समझ गये और सिर झुकाकर अपने गुरुवर को स्वीकारता प्रदान कर दी। ऐसे आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज अनोखी प्रतिभा के धनी थे, जो पात्र को देखकर ग्रन्थ का चयन करते थे, जिससे पात्र में परिपक्वता आ जाती थी। मूलाचार प्रदीप वाचना पर ३०.०५.१९९९, रविवार,नेमावर
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    (दोहा) सीधे सीझे शीत हैं, शरीर बिन जीवन्त। सिद्धों को शुभ नमन हो, सिद्ध बनूँ श्रीमन्त ॥१॥ अमर उमर भर भ्रमर बन, जिन-पद में हो लीन। उन पद में पद-चाह बिन, बनने नमूँ नवीन ॥२॥ शिव-पथ-नेता जितमना, इन्द्रिय-जेता धीश। तथा प्रणेता शास्त्र के, जय जय जय जगदीश ॥३॥ सन्त पूज्य अरहन्त हो, यथाजात निर्ग्रन्थ। अन्त-हीन-गुणवन्त हो, अजेय हो जयवन्त ॥४॥ सार-सार दे शारदे, बनूँ विशारद धीर। सहार दे, दे तार, दे उतार, दे उस तीर ॥५॥ बनूँ निरापद शारदे! वर दे, ना कर देर। देर खड़ा कर-जोड़ के, मन से बनूँ सुमेर ॥६॥ ज्ञानोदधि के मथन से, करूँ निजामृत-पान। पार, भवोदधि जा करूँ, निराकार का मान ॥७॥ ज्ञायक बन गायक नहीं, पाना है विश्राम। लायक बन नायक नहीं, जाना है शिव-धाम ॥८॥ जीवन समझे मोल है, ना समझे तो खेल। खेल-खेल में युग गये, वही खिलाड़ी खेल ॥९॥ खेल सको तो खेल लो, एक अनोखा खेल। आप खिलाड़ी आप ही, बनो खिलौना खेल ॥१०॥ दूर दिख रही लाल-सी, पास पहुँचते आग। अनुभव होता पास का, ज्ञान दूर का दाग ॥११॥ यथा-काल करता गृही, कन्या का है दान। सूरि, सूरिपद का करे, त्याग जिनागम जान ॥१२॥ प्रतिदिन दिनकर दिन करे, फिर भी दुर्दिन आय। दिवस रात, या रात दिन, करनी का फल पाय ॥१३॥ खिड़की से क्यों देखता? दिखे दुखद् संसार। खिड़की में अब देख ले, दिखे सुखद साकार ॥१४॥ राजा ही जब ना रहा, राजनीति क्यों आज? लोकतन्त्र में क्या बची, लोकनीति की लाज ॥१५॥ वचन-सिद्धि हो नियम से, वचन-शुद्धि पल जायें। लद्ध-सिद्धि-परसिद्रिय, अनायास फल जायें ॥१६॥ सूक्ष्म वस्तु यदि न दिखे, उनका नहीं अभाव। तारा-राजी रात में, दिन में नहीं दिखाया ॥१७॥ दूर दुराशय से रहो, सदा सदाशय पूर। आश्रय दो धन अभय दो, आश्रय से जो दूर ॥१८॥ भूल नहीं पर भूलना, शिव-पथ में वरदान। नदी भूल गिरि को करे, सागर का संधान ॥१९॥ प्रभु दिखते तब और ना, और समय संसार। रवि दिखता तो एक ही, चन्द्र साथ परिवार ॥२०॥ सुर-पुर भी नीरस रहा, रस का नहीं सवाल। क्षार रसातल और हैं, देती ‘रसा रसाल ॥२१॥ रसाल सुरभित सूंध, छू रस का हो अनुमान। विषय-संग बिन सन्त में, विरागता को मान ॥२२॥ प्रभु को लख हम जागते, वरना सोते घोर। सूर्योदय प्रभु आप हैं, चन्द्रोदय हैं और ॥२३॥ कार्य देखकर हो हमें, कारण का अनुमान। दिशा दिशान्तर में दिखा, सूर्य तभी गतिमान ॥२४॥ अनुभव ना शिव-पंथ में, आतम का अविकार। लवण मिला जल शुचि दिखे, किन्तु स्वाद तो खार॥२५॥ वतन दिखे ना प्रभु उन्हें, धनान्ध मन-आधीन। उल्लू को रवि कब दिखा, दिवान्ध दिन में दीन ॥२६॥ विषय-वित्त के वश हुए, ना पाते शिव-सार। फँसे कीच क्या? चल सके, शिर पर भारी भार ॥२७॥ भांति-भांति की भ्रान्तियां, तरह-तरह की चाल। नाना नारद-नीतियां, ले जार्ती पाताल ॥२८॥ लोकतन्त्र का भेष है, लोभ-तन्त्र ही शेष। देश-भक्त क्या देश में, कहीं हुए निश्शेष? ॥२९॥ सत्ता का ना साथ दो, सदा सत्य के साथ। बिना सत्य सत्ता सुनो, दे न सम्पदा साथ ॥३०॥ अनाथ नर हो धर्म बिन, धर्म-धार हो नाथ। पुजता उगता सूर्य ही, नहीं डूबता भ्रात! ॥३१॥ मानी में क्षमता कहाँ?, मिला सके गुणमेल। पानी में क्षमता कहाँ?, मिला सके घृत, तैल ॥३२॥ घूँघट ना हो राग का, मरघट जब लाँ होय। जमघट, पनघट पर रहे, पर ना दल-दल होय ॥३३॥ ठोकर खा-खा फिर रहा, दर-दर दूर दरार। स्व-पर दया कर, दान कर, कहते दीन-दयाल ॥३४॥ यकीन किन-किन पर करो, किन-किन के हो दास। उदास क्यों हो? एक ही, उपास्य के दो पास ॥३५॥ दूर, सहज में डूब हो, दूर रहे सब धूल। आगत तो अभिभूत हो, और भूत हो भूल ॥३६॥ न, मन नमन परिणमन हो, नहीं श्रमण में खेद। जब तब अब कब सब नहीं, और काल के भेद ॥३७॥ धन जब आता बीच में, वतन सहज हो गौण। तन जब आता बीच में, चेतन होता मौन ॥३८॥ फूल राग का घर रहा, काँटा रहा विराग। तभी फूल का पतन हो, राग त्याग, तू जाग ॥३९॥ दुबला-पतला हूँ नहीं, सबल समल ना मूढ़। रूढ़ नहीं हूँ प्रौढ़ ना, व्यक्त नहीं हैं गूढ. ॥४०॥ नहीं नपुंसक पुरुष हूँ, अबला नहीं बबाल। जरा जरा से ग्रसित भी, नहीं युवा हूँ बाल ॥४१॥ काया, माया से तथा, छायाँ से हैं हीन। राजा राणा हूँ नहीं, जाया के आधीन ॥४२॥ तुलना उपमा की हवा, मुझे न लगती धूप। स्वरूप मेरा रूप ना, कुरूप हो या रूप ॥४३॥ क्रोध काँपता, बिचकता, मान भूल निज भाव। लाभ लौटता दूर से, मेरे देख स्वभाव ॥४४॥ जीव जिलाना जालना, दिया जलाना कार्य। भूल भुलाना भूलना, शिव-पथ में अनिवार्य ॥४५॥ राग बिना आतम दिखे, आतम बिन ना राग। धूम बिना तो आग हो, धूम नहीं बिन आग ॥४६॥ लौकिकता से हो परे, धरे अलौकिक शील। कर्म करे ना फल चखे, प्रभु तो ज्यों नभ नील ॥४७॥ स्वर्गों में ना भेजते, पटके ना पाताल। हम तुम सब को जानते, प्रभु तो जाननहार ॥४८॥ ना दे अपने पुण्य को, पर के ना ले पाप। पाप-पुण्य से हैं परे, प्रभु अपने में आप ॥४९॥ थक जाना ना हार है, पर लेना है श्वास। रवि निशि में विश्राम ले, दिन में करे प्रकाश ॥५०॥ चेतन का जब जतन हो, सो तन की हो धूल। मिले सनातन धाम सो, मिटे तनातन भूल ॥५१॥ मोह दुःख का मूल है, धर्म सुखों का स्रोत। मूल्य तभी पीयूष का, जब हो विष से मौत ॥५२॥ चिन्तन से चिन्ता मिटे, मिटे मनो मल-मार। प्रसाद मानस में भरे, उभरें भले विचार ॥५३॥ भले-बुरे दो ध्यान हो, समाधि इक हो, दो न। लहर झाग तट में रहे, नदी मध्य में मौन ॥५४॥ रही सम्पदा, आपदा, प्रभु से हमें बचाय। रही आपदा सम्पदा, प्रभु में हमें रचाय ॥५५॥ कटुक मधुर गुरु वचन भी, भविक-चित्त हुलसाय। तरुण अरुण की किरण भी, सहज कमल विकसाय ॥५६॥ सत्ता का सातत्य सो, सत्य रहा है तथ्य। सत्ता का आश्रय रहा, शिवपथ में है पथ्य ॥५७॥ ज्ञेय बने उपयोग ही, ध्येय बने उपयोग। शिव-पथ में उपयोग का, सदा करो उपयोग ॥५८॥ योग, भोग, उपयोग में, प्रधान हो उपयोग। शिव-पथ में उपयोग का, सुधी करे उपयोग ॥५९॥ रसना रस गुण को कभी, ना चख सकती भ्रात! मधुरादिक पर्याय को, चख पाती हो ज्ञात ॥६०॥ तथा नासिका सूँघती, सुगन्ध या दुर्गन्ध। अविनश्वर गुण गन्ध से, होता ना सम्बन्ध ॥६१॥ इसी भाँति सब इन्द्रियाँ, ना जानें गुण-शील । इसीलिए उपयोग में, रमते सुधी सलील ॥६२॥ मूर्तिक इन्द्रिय विषय भी, मूर्तिक हैं पर्याय। तभी सुधी उपयोग का, करते हैं स्वाध्याय ॥६३॥ सर परिसर ज्यों शीत हो, सर परिसर हो शीत। वरना अध्यातम रहा, स्वप्नों का संगीत ॥६४॥ खोया जो है अहम में, खोया उसने मोल । खोया जिसने अहम को, खोजा धन अनमोल ॥६५॥ प्रतिभा की इच्छा नहीं, आभा मिले अपार। प्रतिभा परदे की प्रथा, आभा सीधी पार ॥६६॥ वेग बढ़े इस बुद्धि में, नहीं बढ़े आवेग। कष्ट-दायिनी बुद्धि है, जिसमें ना संवेग ॥६७॥ कल्प काल से चल रहे, विकल्प ये संकल्प। अल्प काल भी मौन लूँ, चलता अन्तर्जल्प ॥६८॥ पर घर में क्यों घुस रही, निज घर तज यह भीड़। पर नीड़ों में कब घुसा, पंछी तज निज नीड़ ॥६९॥ कहीं कभी भी ना हुआ, नदियों का संघर्ष। मनुजों में संघर्ष क्यों? दुर्लभ क्यों? है हर्ष ॥७०॥ शास्त्र पठन ना, गुणन से, निज में हम खो जायें। कटि पर ना, पर अंक में, मां के शिशु सो जायें ॥७१॥ दृश्य नहीं दर्शन भला, ज्ञेय नहीं है ज्ञान। और नहीं आतम भला, भरा सुधामृत-पान ॥७२॥ समरस अब तो चख जरा, सब रस सम बन जाय। नयनों पर उपनयन हो, हरा, हरा दिख जाय ॥७३॥ सुधी पहिनता वस्त्र को, दोष छुपाने भ्रात! किन्तु पहिन यदि मद करे, लज्जा की है बात ॥७४॥ हित-मित-नियमित-मिष्ट ही, बोल वचन मुख खोल। वरना सब सम्पर्क तज, समता में जा ‘खोल' ॥७५॥ भार उठा दायित्व का, लिखा भाल पर सार। उदार उर हो फिर भला, क्यों ना? हो उद्धार ॥७६॥ आगम का संगम हुआ, महापुण्य का योग। आगम हृदयंगम तभी, निश्छल हो उपयोग ॥७७॥ अर्थ नहीं परमार्थ की, ओर बढ़े भूपाल। पालक जनता के बनें, बनें नहीं भूचाल ॥७८॥ दूषण ना भूषण बनो, बनो देश के भक्त। उम्र बढे बस देश की, देश रहे अविभक्त ॥७९॥ नहीं गुणों की ग्राहिका, रहीं इन्द्रियाँ और। तभी जितेन्द्रिय जिन बने, लखते गुण की ओर ॥८०॥ सब सारों में सार है, समयसार उर धार। सारा सारासार सो, विसार तू संसार ॥८१॥ विवेक हो ये एक से, जीते जीव अनेक। अनेक दीपक जल रहे, प्रकाश देखो एक ॥८२॥ दिन का हो या रात का, सपना सपना होय। सपना अपना सा लगे, किन्तु न अपना होय ॥८३॥ जो कुछ अपने आप है, नहीं किसी पर रूढ़। अनेकान्त से ज्ञात हो, जिसे न जाने मूढ़ ॥८४॥ अपने अपने धर्म को, छोड़े नहीं पदार्थ। रक्षक-भक्षक जनक सो, कोई नहीं यथार्थ ॥८५॥ खण्डन मण्डन में लगा, निज का ना ले स्वाद। फूल महकता नीम का, किन्तु कटुक हो स्वाद ॥८६॥ नीर-नीर को छोड़ कर, क्षीर-क्षीर का पान। हंसा करता, भविक भी, गुण लेता गुणगान ॥८७॥ पक्षपात बिन रवि यथा, देता सदा प्रकाश। सबके प्रति मुनि एक हो, रिपु हो या हो दास ॥८८॥ घने वनों में वास सो, विविध तपों को धार। उपसर्गों का सहन भी, समता बिन निस्सार ॥८९॥ चिन्तन मन्थन मनन जो, आगम के अनुसार। तथा निरन्तर मौन भी, समता बिन निस्सार ॥९०॥ विजितमना हो फिर हुए, महामना जिनराज। हिम्मतवाला बन अरे ! मतवाला मत आज ॥९१॥ रसना रस की ओर ना, जा जीवन अनमोल । गुरु - गुण गरिमा गा अरी! इसे न रस से तोल ॥१२॥ चमक दमक की ओर तू, मत जा नयना मान। दुर्लभ जिनवर रूप का, निशि-दिन करना पान ॥९३॥ पके पत्र फल डाल पर, टिक ना सकते देर। मुमुक्षु क्यों ना? निकलता, घर से देर सबेर ॥९४॥ नीरस हो पर कटुक ना, उलटी सौ बच जाय। सूखा हो, रुखा नहीं, बिगड़ी सो बन जाय ॥९५॥ छुआछूत की बात क्या? सुनो और तो और। फरस रूप से शून्य हूँ, देखूँ, दिखूं, विभोर ॥९६॥ दास-दास ही न रहे, सदा-सदा का दास। कनक, कनकपाषाण हो, ताप मिले प्रभु पास ॥९७॥ आत्म-तोष में जी रहा, जिसके यश का नाप। शरद जलद की धवलिमा, लज्जित होती आप ॥९८॥ रस से रीता हूँ, रहा, ममता की ना गन्ध। सौरभ पीता हूँ सदा, समता का मकरन्द ॥९९॥ तव-मम तव-मम कब मिटे, तरतमता का नाश। अन्धकार गहरा रहा, सूर्योदय ना पास ॥१००॥ समय व स्थान परिचय बीना बारह क्षेत्र में, नदी बही सुख-चैन। ग्रीष्मकाल का योग है, मन लगता दिन-रैन ॥१०१॥ गगन गन्ध गति गोत्र के, रंग पंचमी संग। सूर्योदय के उदय से, मम हो प्रभु सम रंग ॥१०२॥
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    निगोद में रचा पचा, कोई भी भव न बचा, तथापि सुख का न शोध, हुआ रहा मैं अबोध ।।१।। प्रभो! सुकृत उदित हुआ, फलतः मैं मनुज हुआ, दुर्लभ सत्संग मिला, मानो यही सिद्धशिला ।।२।। फिर गुरु उपदेश सुना, जागृत हुआ सुन गुना, ज्ञात हुआ स्व - पर भेद, व्यर्थ करता था खेद ।।३।। विदित हुआ मैं चेतन, ज्ञान - गुण का निकेतन, किन्तु तन, मन अचेतन, जिन्हें न निज का सम्वेदन ।।४।। चेत चेतन चकित हो, स्वचिन्तन वश मुदित हो, यों कहता मैं भूला, अब तक पर में फूला ।।५।। अब सर्वत्र उजाला, शिव - पथ मिला निराला, किस बात का मुझे डर, जब जा रहा स्वीय घर ।।६।। यह है समकित प्रभात, न रही अब मोह रात, बोध - रवि - किरण फूटी, टली भ्रम - निशा झूठी ।।७।। समता अरुणिमा बढ़ी, उन्नत शिखर पर चढ़ी, निज - दृष्टि निज में गड़ी, धन्यतम है यह घड़ी ।।८।। अनुकम्पा - पवन भला सुखद पावन बह चला, विषमता - कण्टक नहीं, शिव - पथ अब स्वच्छ सही ।।९।। यह सुख की परिभाषा, रहे न मन में आशा, ऐसी हो प्रतिभासा, परितः पूर्ण प्रकाशा ।।१०।। कुछ नहीं अब परवाह, जब मिटी सब कुछ चाह, दुख टला, निज - सुख मिला, मम उर दृगपद्य खिला।।११।। "विद्या" अविद्या छोड़, कषाय कुम्भ को फोड़, कर रहा उससे प्यार, भजो सचेतना नार।।१२।। मुनि वशी निरभिमानी, निरत निज में विज्ञानी, जिसे नहिं निज का ज्ञान, वह करता मुधा मान ।।१३।। सुन - सुन मानापमान, दुखदायक अध्यवसान, सुधी बस उन्हें तजकर, निजानुभव करें सुखकर।।१४।। विषय - कषाय वश सदा, दुःख सहता मूढ़ मुधा, निज निजानुभव का स्वाद, बुधजन लेते अबाध ।।१५।। यह योगी का विचार, हैं ज्ञान के भण्डार, सभी संसारी जीव, द्रव्य - दृष्टि से सदीव ।।१६।। रखें नहिं सुधी परिग्रह, करें सदा गुण - संग्रह, नमें निज निरञ्जन को, तजे विषय - रजन को ।।१७।। पर - परिणति को लखकर, जड़मति बिलख - हरख कर। कर्मो से है बंधता, वृथा भव - वन भटकता।।१८।। मुनि ज्ञानी का विश्वास, मम हो न कभी विनाश, और हूँ नहीं रोगी, फिर व्यथा किसे होगी ।।१९।। मैं वृद्ध, युवा न बाल, ये हैं जड़ के बबाल, इस विधि सुधी जानता, सहज निज सुख साधता ।।२०।। पुष्पहार से नहिं तोष, करे न विषधर से रोष, पीता निशिदिन ज्ञानी, शुचिमय समरस पानी ।।२१।। अबला सबला नहिं नर, ना मैं नपुंसक वानर। नहिं हृष्ट, पुष्ट, कुरूप, हूँ इन्द्रियातीत अरूप ।।२२।। ललित लता सी जाया, है संध्या की छाया। औ सुभग यह काया, केवल जड़ की माया ।।२३।। पावन ज्ञान - धन • धाम, अनन्त गुणों का ग्राम। स्फटिक सम निर्विकार, नित निज में मम विहार ।।२४।। पर - द्रव्य पर अधिकार, नहिं हो इस विध विचार, जानना तेरा काम, कर तू निज में विश्राम ।।२५।। योग - मार्ग बहुत सरल, भोगमार्ग निश्चय, गरल। स्वानुभावामृत तज कर, विषय-विष-पान मत कर।।२६।। क्यों भटकता तू मुधा, क्यों दुख सहता बहुधा। तब मिटेगी यह क्षुधा जब मिलेगी निज सुधा ।।२७ ।। क्यों बनता तू बावला, सोच अब निज का भला। यह मनुज में ही कला, अतः उर में समभाव ला ।।२८ ।। यदि पर संग सम्बन्ध, रखता, तो करम बन्ध, फिर भवकूल, किनारा, न मिले तुझे सहारा ।।२९।। परन्तु मूढ भूल कर, स्व को नहिं मूल्य कर। पर को हि अपना रहा, मृषा दुःख उठा रहा ।।३० ।। तू तजकर मोह - तृषा, अरे! कर निज पर कृपा। होगा न सुखी अन्यथा, यह बात सत्य सर्वथा ।।३१।। अरे! लक्ष्यहीन तव प्रवास, तुझको दे रहा त्रास। मति सुधारनी होगी, चाल बदलनी होगी।।३२।। राग नहीं मम स्वभाव, द्वेष है विकार भाव। यों समझ उनको त्याग, बन जिन - सम वीतराग ।।३३।। कर अब आतम अनुभव, फलतः हो सुख सम्भव। मिट जाये दुख सारा मिल जाये शिव प्यारा।।३४ || दृग - विद्या - व्रत, रत्नत्रय। करे प्रकाशित जगत्त्रय। जो इनका ले आश्रय, अमर बनता है अभय ।।३५।। आत्मा कभी न घटता, मिटता, कभी न बढ़ता। परन्तु खेद, यह बात, मूढ़ को नहिं है ज्ञात ।।३६।। मूढ गूढ स्वतत्व भूल, पर में दिन - रात फूल। दुःख का वह सूत्रपात, कर रहा निज का घात ।।३७।। मुख से निकले न बोल, मन में अनेक कल्लोल। नित मूर्ख करता रोष, निन्द्यतम अघ का कोष ।।३८।। स्मरण - शक्ति चली गई, लोचन - ज्योति भी गई। पर जिसकी विषय - चाह भभक - भभक उठी दाह ।।३९।। देह जरा - वश जर्जरित, हुआ मुख - कमल मुकुलित। तथा समस्त मस्तक पलित, जड़ की तृष्णा द्विगुणित ||४०।। यह सब जड़ का बबाल, मैं तो नियमित निहाल। जिसको पर विदित नहीं कि यह मम परिणति नहीं ।।४१।। मोह - कर्दम में फँसा, उल्टी मूढ़ की दशा। रखता न स्व - पर विवेक, सहता कष्टातिरेक ।।४२।। है स्व - पर की पहिचान, शिवसदन का सोपान। पर को अपना कहना, केवल भव - दुःख सहना ।।४३।। यदि हो स्व - पर बोध, फिर उठे नहिं उर क्रोध। मूर्ख ही क्रोध करता, पुनि - पुनि तन गह; मरता ।।४४ ।। जब हो आत्मानुभूति, निश्चिन्त सुख की चिन्मूर्ति, मिलती सहज चिन्मूर्ति, धुतिमय शुचिमय विभूति ।।४५।। स्वयं से परिचित नहीं, भटकता भव में वही। पग - पग दुःख उठाता, पाप - परिपाक पाता ।।४६।। विद्या बिन, चारित्र वृथा, जिससे न मिटती व्यथा। फिर सहज शुद्ध समयसार, क्यों मिले फिर विश्वास ।।४७।। कभी मिला सुर - विलास, तो कभी नरक - निवास पुण्य - पाप का परिणाम, न कभी मिलता विश्राम ।।४८।। मूढ़ पाप से डरता, अतः पुण्य सदा करता। तो संसार बढ़ाता, भव - वन चक्कर खाता ||४९।। पाप तज पुण्य करोगे, तो क्या नहीं मरोगे। भले हि स्वर्ग मिलेगा, भव - दुख नहीं मिटेगा ।।५०।। प्रवृत्ति का फल संसार, निवृत्ति सुख का भण्डार। पहली अहो पराश्रिता, दूजी पूज्य निजाश्रिता ।।५१।। मत बन किसी का दास, पर बन; पर से उदास। फलतः कर्मों का नाश, उदित हो बोध - प्रकाश।।५२।। अतः मेरा सौभाग्य, मुझको हुआ वैराग्य। पुण्य - पाप है नश्वर, शुद्धातम वर ईश्वर ।।५३।। सुख - दुःख में समान मुख, रहे; तब मिले शिव - सुख। अन्यथा बस दुस्सह दुख, ऊर्ध्व, अधो, पार्श्व, सम्मुख ।।५४।। स्नान स्वानुभव सर में, यदि हो, तो पल भर में। तन - मन निर्मलतम बने, अमर बने मोद घने ।।५५।। सब पर भव - परम्परा, यों लख तू स्वयं जरा। निज में धन अमित भरा, जो है अविनश्वर और खरा ।।५६।। आलोकित लोकालोक, करता नहीं आलोक। जो तुझ में अव्यक्त रूप, व्यक्त हो, तो सुख अनूप ।।५७।। क्यों करता व्यर्थ शोक, निज को जान, मन रोक। बाहर दिखती पर्याय, आभ्यन्तर द्रव्य सुहाये ||५८|| विद्या - रथ पर बैठकर, मनोवेग निरोध कर। अब शिवपुर है जाना, लौट कभी नहिं आना ।।५९।। झर - झर झरता झरना, कहता चल - चल चलना। उस सत्ता से मिलना, पुनि - पुनि पड़े न चलना ।।६०।। लता पर मुकुलित कली, कभी - कभी खुली, खिली। कभी गिरी, परी मिली, सब में वही सत् ढली ।।६१।। सकल पदार्थ अबाधित, पल - पल तरल प्रवाहित। होकर भी ध्रुव त्रिकाल, जीवित शाश्वत निहाल ।।६२।। रवि से जन, जल जलता, वही वाष्प में ढलता। जलद बन, पुनि पिघलता, सतत है सत् बदलता ।।६३।। गुण वश प्रभु, तुम - हम सम, पर पृथक्, हम भिन्नतम। दर्पण में कब दर्पण, करता निजपन अर्पण ।।६४।। राम - राम, श्याम - श्याम, इस रटन से विश्राम। रहे न काम से काम, बन जाऊँ मैं निष्काम ।।६५।। क्षणिक सत्ता को मिटा, महासत्ता में मिला। आर - पार तदाकार, निराकार मात्र सार ।।६६।। मन पर लगा लगाम, निज दीप जला ललाम। सकल परमार्थ पदार्थ, प्रतिभासित हो यथार्थ ।।६७।। बन्द कर नयन - पुट को, लखता अन्तर्घट को। दिखती फैली लाली, न निशा मैली काली ।।६८।। इच्छा नहिं कि कुछ लिखें। जड़ार्थ मुनि हो बिकूँ। जो कुछ होता लखना, लेखक बन नहिं लिखना।।६९।। स्मृति में कुछ भी लाना, ज्ञान को बस सताना। लेखनी लिखती रहे, आत्मा लखती रहे ।।७०।। दृग, चरण गुण अनमोल, निस्पन्द अचल अलोल। मत इन्हें जड़ पर तोल, अमृत में विष मत घोल ।।७१।। अमूर्त की मृदुता में, सिमिट - सिमिट रहता मैं। धवल कमल की मृदुता, नहिं रुचती अब जड़ता ।।७२।। सरस - विरस से ऊपर, उठकर, रसगुण चखकर। मम रसना जीवित है, प्रमुदित उन्मीलित है ।I७३।। लाल लाल युगलगाल, साम्य के सरस रसाल। चूस - चूस तुष्ट हुई, रसना सम्पुष्ट हुई ।।७४।। मति - मती मम नासिका, ध्रुव गुण की उपासिका। न दुर्गन्ध - सुगन्ध से, प्रभावित है गन्ध से ।।७५।। रूप विरूप को लखा, चिर तृषित नयनों चखा। पर अनुपम रूप यहाँ, जग में सुख - कूप कहाँ? ।।७६।। सप्त - स्वरों से अतीत, सुन रहा हूँ संगीत। मनो वीणा का तार, तुन - तुन ध्वनित अपार ।।७७।। अमूर्त के आकाश में, विलीन ज्यों प्रकाश में। प्रकाश नाश विकास में, सत् चिन्मय विलास में ।।७८।। आलोक की इक किरण, पर्याप्त चलते चरण। पथिक! सुदूर भले ही, गन्तव्य पर मिले ही ।।७६।। आसीन सहज मानस, तट पर यह मम मानस। हंस सानन्द क्रीड़ा, कर रहा भूल पीड़ा ।।८०।। विगत सब विस्मरण में, अनागत कब मरण में - ढल चुका, विदित नहिं है, स्व - संवेदन बस यही है ।।८१।। विमल समकित विहंगम, दृश्य का हुआ संगम। नयनों से हृदयंगम, किया मम मन विहंगम ।।८२।। समकित सुमन की महक, गुण - विहंगम की चहक। मिली, साम्य उपवन में, नहिं! नहिं! नन्दन वन में ।।८३।। भय नहीं विषय - विष से, नहिं प्रीति पीयूष से। अजर अमर अविनाशी, हूँ चूँकि ध्रुव विकासी ।।८४।। हर सत् में अवगाहित, हूँ प्रतिष्ठित अबाधित। समर्पित सम्मिलित हूँ, हूँ तभी शुचि मुदित हूँ ।।८५।। ज्ञात तथ्य सत्य हुआ, जीवन कृतकृत्य हुआ। हुआ आनन्द अपार, हुआ वसन्त संचार ||८६।। फलतः परितः प्लावित, पुलकित पुष्पित फुल्लित। मृदु शुचि चेतन - लतिका, गा रही गुण - गीतिका ||८७।। जलद की कुछ पीलिमा, मिश्रित सघन नीलिमा। चीर, तरुण अरुण भाँति, बोध - रवि मिटा भ्रान्ति ।।८८।। हुआ जब से वह उदित, खिली लहलहा प्रमुदित। सचेतना सरोजिनी, मोदिनी मनमोहिनी ।।८९।। उद्योत इन्दु प्रभु सिन्धु, खद्योत मैं लघु बिन्दु। तुम जानते सकल को, मैं स्व-पर के शकल को ।।९०।। मैं. पराश्रित, निजाश्रित, तुम हो, पै तुम आश्रित - हो, यह रहस्य सूंघा, सम्प्रति अवश्य गूंगा ।।९१।। प्रकृति से ही रही प्रकृति भोग्या जड़मती कृति। भोक्ता पुरुष सनात, नव - नवीन अधुनातन ।।९२।। पुरुष पुरुष से न प्रभावित, हुआ, प्रकृति से बाधित। हुआ, पुरुषार्थ वंचित, विवेक रखे न किंचित् ।।९३।। रहा प्रकृति से सुमेल, रखता, खेलता खेल। स्वभाव से दूर रहा, विभाव से पूर रहा ।।१४।। सुधाकर सम सदा से, पूरित बोध - सुधा से। होकर भी राग केतू, भरित है चित् सुधा से तू ।।९५।। उस ओर मौन तोड़ा, विवाद से मन जोड़ा। पुरुष नहीं बोलेंगे, मौन नहीं खोलेंगे ।।९६।। प्रमाद की इन तानें - बाने सुन सम ताने। मौन मुझे जब लखकर, चिड़कर खुलकर मुड़कर ।।९७।। प्रेम क्षेत्र में अब तक, चला किन्तु यह कब तक। मेरे साथ ए नाथ! होगा विश्वासघात ।।९८।। समता से मम ममता, जब से तन क्षमता। अनन्त ज्वलन्त प्रकटी, प्रमाद - प्रमदा पलटी ।।९९।। कुछ - कुछ रिपुता रखती, रहती मुझको लखती। अरुचिकर दृष्टि ऐसी, प्रेमी आप ! प्रेयसी ।।१००।। मुझ पर हुआ पविपात, कि आपद माथ, गात। विकल पीड़ित दिन - रात, चेतन जड़ एक साथ ।।१०१।। अब चिरकाल अकेली, पुरुष के साथ केली। पिलापिला अमृतधार, मिलामिला सस्मित प्यार ।। करूँगी खुश करूंगी, उन्हें जीवित नित लखूंगी ।।१०२।।
  42. 1 point
    प्रण लेना चाहिए कि हम समस्त लेखन कार्य मातृ भाषा हिंदी में ही करेंगे
  43. 1 point
    लगभग २६०० वर्ष पूर्व इस भारत भूमि पर एक महापुरुष का जन्म हुआ। जिसने इस धरती पर फैले अज्ञान को दूर कर सत्य, अहिंसा और प्रेम का प्रकाश फैलाया। उन महापुरुष को जन-जन अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर के नाम से जानते हैं। भगवान महावीर संक्षिप्त जीवन-दर्शन इस प्रकार है :- मधु नाम के वन में एक पुरुरवा नाम का भील रहता था। कालिका उसकी पत्नी का नाम था। एक दिन रास्ता भूलकर सागरसेन नाम के मुनिराज उस वन में भटक रहे थे, कि पुरुरवा हिरण समझकर उन्हें मारने के लिए उद्यत हुआ, तब उसकी पत्नी ने कहा कि स्वामी! ये वन के अधिष्ठाता देव हैं। इन्हें मारने से तुम संकट में पड़ जाओगे, कहकर रोका। तब दोंनो प्रसन्नचित्त हो मुनिराज के पास पहुँचे तथा उपदेश सुनकर शक्त्यानुसार मांस का त्याग किया। आयु के अंत में निर्दोष व्रतों का पालन करते हुए, शान्त परिणामों से मरण प्राप्त कर वह भील सौधर्म स्वर्ग में देव हुआ। स्वर्ग सुख भोगकर भरत चक्रवर्ती की अनन्तमति नामक रानी से मारीचि नाम का पुत्र हुआ तथा प्रथम तीर्थकर वृषभनाथ जी के साथ देखा-देखी दीक्षित हो गया। भूख प्यास की बाधा सहन न कर सकने के कारण भ्रष्ट हो, अहंकार के वशीभूत होकर तापसी बन सांख्य मत का प्रवर्तक बन गया। तथा अनेक भवों तक पुण्य-पाप के फलों को भोगता हुआ, सिंह की पर्याय को प्राप्त हुआ। एक समय वह हिरण का भक्षण कर रहा था, तभी अजितञ्जय और अमितदेव नाम के दो मुनिराजों के उपदेश सुन जातिस्मरण होने पर व्रतों को धारण किया तथा सन्यास धारण किया जिसके प्रभाव से सौधर्म स्वर्ग में सिंह केतु नाम का देव हुआ। आगे आने वाले भवों में चक्रवर्ती आदि की विभूति का उपभोग कर जम्बूद्वीप में नंद नाम का राजपुत्र हुआ। प्रोष्ठिल नाम के मुनिराज से दीक्षा ले सोलह कारण भावना भाते हुए महापुण्य तीर्थकर प्रकृति का बंध किया फिर आयु के अंत में आराधना पूर्वक मरण कर अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में इन्द्र हुआ। वहां से च्युत होकर अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर हुआ। भगवान महावीर का जन्म वैशाली गणतंत्र के कुण्डलपुर राज्य के काश्यप गोत्रीय नाथ वंश के क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ और त्रिशला रानी के आँगन में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के शुभ दिन हुआ। बालक सौभाग्यशाली, अत्यन्त सुन्दर, बलवान, तेजस्वी, मुक्तिगामी जीव था। सौधर्म इन्द्र ने सुमेरू पर्वत पर भगवान बालक का अभिषेक करने के बाद 'वीर' नाम रखा। जन्म समय से ही पिता सिद्धार्थ का वैभव, यश, प्रताप, पराक्रम और अधिक बढ़ने लगा। इस कारण उस बालक का नाम वर्द्धमान भी पड़ा। राजकुमार वर्द्धमान असाधारण ज्ञान के धारी थे। संजयन्त और विजयन्त नामक दो मुनि अपनी तत्व विषयक कुछ शंकाओं को लिए आकाश मार्ग से गमन कर रहे थे तभी बालक वर्द्धमान को देखते ही उनको समाधान प्राप्त हो जाने से उन्होंने उस बालक का नाम 'सन्मति' रखा। एक दिन कुण्डलपुर में एक बड़ा हाथी मदोन्मत्त होकर गजशाला से बाहर निकल भागा। वह मार्ग में आने वाले स्त्री पुरुषों को कुचलता हुआ नगर में उथल-पुथल मचाते हुए घूम रहा था। जिससे जनता भयभीत हो प्राण बचाने हेतु इधर-उधर भागने लगी। तब वर्द्धमान ने निर्भय हो हाथी को वश में कर मुट्ठियों के प्रहार से उसे निर्मद बना दिया। तब जनता ने बालक की वीरता से प्रसन्न हो बालक को 'अतिवीर' नाम से सम्मानित किया। वर्द्धमान एक बार मित्रों के साथ खेल रहे थे तभी संगम नामक देव विषधर का रूप धरकर आया। जिसे देखकर सभी मित्र डर के मारे भाग गये। परन्तु वर्द्धमान सर्प को देख रंच मात्र भी नहीं डरे, अपितु निर्भयता से उसी के साथ खेलने लगे। तब देव प्रकट होकर भगवान की स्तुति करने लगा एवं उनका नाम 'महावीर' रखा। जब वर्द्धमान यौवन अवस्था को प्राप्त हुए। तब माता-पिता ने वर्द्धमान का विवाह राजकुमारी यशोदा के साथ करने का निर्णय लिया। अपने विवाह की बात जब महावीर को ज्ञात हुई तो उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। गृहस्थ जीवन के बंधन में न फंसते हुए तीस (30) वर्ष की यौवनावस्था में स्वयं ही दिगम्बर दीक्षा अंगीकार की। बारह वर्ष तक मौन पूर्वक साधना करते हुए व्यालीस (42) वर्ष की अवस्था में केवलज्ञान प्राप्त किया फिर लगभग तीस (30) वर्ष तक भव्य जीवों को धर्मोपदेश देते हुए बहात्तर (72) वर्ष की आयु में कार्तिक वदी अमावस्या के ब्रह्ममुहूर्त में (सूर्योदय से कुछ समय पहले) पावापुर ग्राम के सरोवर के मध्य से निवाण को प्राप्त किया। भगवान महावीर का शेष परिचय गर्भ - तिथी - आषाढ़ शुक्ल ६ जन्म - तिथी - चैत्र शुक्ल १३ दीक्षा - तिथी - मार्ग कृष्ण १० केवलज्ञान - तिथी वैशाख शुक्ल १० उत्सेध/वर्ण - ७ हाथ/ स्वर्ण वैराग्य कारण - जाति स्मरण दीक्षोपवास - बेला दीक्षावन/वृक्ष - नाथवन/साल वृक्ष सहदीक्षित - अकेले सर्वऋषि संख्या - २४,००० गणधर संख्या - ११ मुख्य गणधर - इन्द्रभूत आर्यिका संख्या - ३६,००० तीर्थकाल - २९,०४२ वर्ष यक्ष - गुहयक यक्षिणी - सिद्धायिनी योग निवृत्तिकाल - दो दिन पूर्व केवलज्ञान स्थान - ऋजुकूला चिहन - सिंह समवशरण में श्रावक संख्या - १ लाख श्राविका - ३ लाख मुख्य श्रोता - श्रेणिक विशेष - केवलज्ञान उत्पन्न होने के पश्चात् गणधर के अभाव में छयासठ (६६) दिन तक भगवान महावीर की दिव्य ध्वनि नहीं हुई। जिस दिन भगवान महावीर की प्रथम देशना हुई भी उसे वीर शासन जयन्ती के रूप में (श्रावण कृ. १) मनाते हैं।
  44. 1 point
    देवाधिदेव प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ पर अध्ययन
  45. 1 point
    अद्भुत संकलन है, क्या इसकी प्रिंटेड बुक मिल सकती है?
  46. 1 point
    किसी भी समुदाय की स्वतंत्रता का प्रतीक है उसकी संस्कृति, और संस्कृति की रक्षा में महत्वपूर्ण योगदान मातृभाषा का है। आज भारत की जो भी दुर्दशा हो रही है वो मात्र अपनी संस्कृति को नजरअंदाज करने के कारण हो रही है। भारत की असली सम्पदा उसकी संस्कृति है, और हम सब को चाहिए की उसकी रक्षा हम अपने स्तर पर करें। और मेरा सुझाव है की हम देवनागरी को बढ़ावा देने के लिए प्रत्येक माह के अंतिम 10 दिन कम से कमअपना सारा अनौपचारिक कार्य देवनागरी में करेंगे।
  47. 1 point
    उपगूहन अंग विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार जो धर्म पालन में असमर्थ हैं और जिनके निमित्त से धर्म की अप्रभावना हो रही है, उनके दोषों को ढ़कना या उनका निराकरण करना उपगूहन अंग है। उपगूहन अंग वाला इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि धर्मात्मा की निंदा सो धर्म की ही निंदा है। उपगूहन का अर्थ दूसरों के दोषों का समर्थन करना नहीं है, बल्कि धर्म की अप्रभावना से बचाकर दूसरे के दोषों का निराकरण करना है। दूसरों के दोषों को ढ़कने से अपना सम्यक दर्शन शुद्ध (दृढ़) होता है। दूसरे के दोष ढ़कने से दूसरे को क्या मिलेगा, उसे कुछ मिले या न मिले लेकिन अपने गुणों का तो विकास होता ही है। दूसरे के दोषों को ढ़कना यानि अपने गुणों को विकसित करना है। यदि उपगूहन अंग का पालन करने से हमारे गुणों में वृद्धि होती है तो आत्म-हितैषी को इसका पालन अच्छी तरह से करना चाहिए। जो निरंजन आत्मा को ढ़कने वाले राग-द्वेष मिथ्यात्व रूप परिणाम है उनको नष्ट करना निश्चिय उपगूहन अंग है। अपनी आत्मा में जो दुर्भाव उत्पन्न हो रहे हैं, उन्हें उत्पन्न न होने देने करने का प्रयास करना स्वयं का उपगूहन करना है। व्यवहार उपगूहन अंग श्रावकों की अपेक्षा से है और निश्चय उपगूहन अंग मुनियों के लिए है। उपगूहन अंग में जिनेन्द्र भक्त सेठ प्रसिद्ध हुए।
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    प्राणीमात्र के कल्याण की भावना एवं सोलहकारण भावना भाने से संसार अवस्था में सर्वोच्च पद तीर्थंकर का प्राप्त होता है। उनके पाँच कल्याणक होते हैं। किस कल्याणक में क्या - क्या होता है, इसका वर्णन इस अध्याय में है। 1. कल्याणक किसे कहते हैं? तीथङ्करों के गर्भ, जन्म, तप (दीक्षा), ज्ञान एवं निर्वाण के समय इन्द्रों, देवों एवं मनुष्यों के द्वारा विशेष रूप से जो उत्सव मनाया जाता है, उसे कल्याणक कहते हैं। 2. पाँच कल्याणक कौन-कौन से होते हैं ? गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक, तपकल्याणक (दीक्षाकल्याणक), ज्ञानकल्याणक एवं मोक्षकल्याणक | 3. गर्भ कल्याणक किसे कहते हैं? सौधर्म इन्द्र अपने दिव्य अवधिज्ञान से तीर्थंकर के गर्भावतरण को निकट जानकर कुबेर को तीर्थंकर के माता - पिता के लिए नगरी का निर्माण करने एवं घर के ऑगन में प्रतिदिन तीन बार साढ़े तीन करोड़ की संख्या का परिमाण लिए हुए धन की धारा (रत्नों की वर्षा) करने की आज्ञा प्रदान करता है। इस प्रकार रत्नों की वर्षा गर्भ में आने से 6 माह पूर्व से जन्म होने तक अर्थात् लगभग 15 माह तक निरन्तर होती है। तीर्थंकर की माता गर्भ धारण के पूर्व रात्रि के अन्तिम पहर में अत्यन्त सुहावने, मनभावन और आह्वादकारी क्रमश: 16 स्वप्नों को देखती है, ये स्वप्न तीर्थंकर के गर्भावतरण के सूचक होते हैं। जैसे ही तीर्थंकर का गर्भावतरण होता है, स्वर्ग से सौधर्म इन्द्र सहित अनेक देव उस नगर की तीन परिक्रमा कर माता - पिता को नमस्कार करते हैं। गर्भ स्थित तीर्थंकर की स्तुति कर महान् उत्सव मनाते हैं। गर्भकल्याणक का उत्सव पूर्ण कर सौधर्म इन्द्र श्री आदि देवकुमारियों को जिन माता के गर्भ शोधन के लिए नियुक्त करता है। ये देवकुमारियाँ जिनमाता की सेवा करती हैं एवं माता का मन धर्मचर्चा में लगाए रखती हैं और सौधर्म इन्द्रदेवों सहित अपने स्थान को वापस चला जाता है। 4. जन्मकल्याणक किसे कहते हैं ? गर्भावधिपूर्ण होते ही जिनमाता तीर्थंकर बालक को जन्म देती है। जन्म होते ही तीनों लोक में आनन्द और सुख का प्रसार होता है। यहाँ तक कि जहाँ चौबीसों घटमार-काट चल रही है, वहाँ नरकों में भी नारकी जीवों को एक क्षण के लिए अपूर्वसुख की प्राप्ति होती है एवं स्वर्ग के इन्द्रों के आसन कम्पायमान हो जाते हैं तथा कल्पवासी, लगते हैं। इन सब कारणों से इन्द्रों एवं देवों को तीर्थंकर के जन्म का निश्चय हो जाता है और तत्काल ही वे अपने आसन से नीचे उतर कर सात कदम आगे चलकर परोक्षरूप से तीर्थंकर (बालक) को नमस्कार कर उनकी स्तुति करते हैं। तदनन्तर सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से सात प्रकार की देव सेना जय-जय करती हुई जन्म नगरी की (1.हरिवंशपुराण, 37/2,3/471) ओर गमन करती है। सौधर्म इन्द्र भी अपनी इन्द्राणी के साथ ऐरावत हाथी पर सवार होकर जन्म नगरी को गमन करते हैं। सौधर्म इन्द्र के साथ सारे देवगण जन्म नगरी की तीन प्रदक्षिणा देते हैं। तदनन्तर शची प्रसूतिगृह में प्रच्छन्न रूप से पहुँचकर जिन माता की तीन प्रदक्षिणा देकर, जिनमाता को मायामयी निद्रा से निद्रित कर, अत्यन्तहर्षऔर उल्लास के साथ जिन बालक की छवि को निहारती हुई बालक को लाकर सौधर्म इन्द्रको सौंप देती है एवं वहाँ एक मायामयी बालक को सुला देती है। सौधर्म इन्द्र तीर्थंकर बालक का दर्शन कर भावविभोर हो जाता है एवं 1000 नेत्र बनाकर तीर्थंकर बालक का रूप देखता है। तत्पश्चात् ऐरा वत हाथी पर आरूढ़ होकर जिन बालक को अपनी गोद में बिठाकर सुमेरु पर्वत पर जाकर पाण्डुकशिला पर क्षीरसागर के जल से तीर्थंकर बालक का 1008 कलशों से अभिषेक करता है, शचीबालक को वस्त्राभूषणों से सुशोभित करती है। पश्चात् इन्द्र बालक के दाहिने पैर के अंगूठे पर जो चिह्न देखता है वही चिह्न उन तीर्थंकर का घोषित कर तीर्थंकर का नामकरण करता है। तत्पश्चात् सौधर्म इन्द्र ऐरावत हाथी पर बालक को विराजमान कर वापस जन्म नगरी को आता है। इन्द्राणी, माता के पास जाकर मायामयी बालक को उठा लेती है और माता की मायामयी निद्रा को दूर कर जिन बालक को माता के पास रखती है। जिनमाता अत्यन्त प्रसन्न होकर बालक का दर्शन करती है। इन्द्र एवं देवगण तीर्थंकर के माता-पिता का विशेष सत्कार कर वापस अपने इन्द्रलोक आ जाते हैं। 5. तपकल्याणक किसे कहते हैं ? जन्मकल्याणक के बाद तीर्थंकर का बाल्यकाल व्यतीत होता है एवं युवा होने पर राज्यपद को स्वीकार करते हैं। (वर्तमान चौबीसी में 5 तीर्थंकरों राज्यपद स्वीकार नहीं किया) किसी निमित से उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो जाता है तब उसी समय ब्रह्मस्वर्ग से लोकान्तिक देव आकर तीर्थंकर के वैराग्य की प्रशंसा करते हुए स्तुति करते हैं। तत्पश्चात् सौधर्म इन्द्र क्षीर सागर के जल से वैरागी तीर्थंकर का अभिषेक करता है, जिसे दीक्षाभिषेक कहते हैं। तत्पश्चात् कुबेर द्वारा लायी गई पालकी में तीर्थंकर स्वयं बैठ जाते हैं, उस पालकी को मनुष्य एवं विद्याधर 7-7 कदम तक ले जाते हैं, इसके बाद देवतागण उस पालकी को आकाश मार्ग से दीक्षावन तक ले जाते हैं। वहाँ देवों द्वारा रखी हुई चन्द्रकान्तमणि की शिला पर विराजमान हो पद्मासन मुद्रा में पूर्वाभिमुख होकर सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार करके पञ्चमुष्ठी केशलोंच करके वस्त्राभूषण का त्यागकर जिनमुद्रा को धारण करते हुए समस्त पापों को त्याग कर महाव्रतों का संकल्प करते हैं। सौधर्म इन्द्र केशों (बालों) को रत्न के पिटारे में रखकर क्षीरसागर में विसर्जित करता है। दीक्षोपरांत तीर्थंकर (मुनि) की विशेष पूजा-भक्ति कर देवगण अपनेअपने स्थान को चले जाते हैं। (प.पु.3/263-265) 6. ज्ञानकल्याणक किसे कहते हैं ? तीर्थंकर (मुनि) दीक्षा लेने के बाद मौन होकर घोर तपस्या करते हुए धम्र्यध्यान को बढ़ाते हुए क्षपक श्रेणी चढ़ते हुए, 10वें गुणस्थान के अन्त में मोहनीयकर्म का पूर्ण क्षय करते हुए 12 वें गुणस्थान के अन्तिम समय में ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायकर्म का क्षय होते ही केवलज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। जिससे जगत् के समस्त चराचर द्रव्यों को और उनकी अनन्त पर्यायों को युगपत्जानने लगते हैं। केवलज्ञान उत्पन्न होते ही देव अपनेअपने यहाँ प्रकट होने वाले चिहों से एवं सौधर्म इन्द्र का आसन कम्पायमान होने से अवधिज्ञान से जान लेते हैं कि तीर्थंकर (मुनि) को केवलज्ञान प्राप्त हो गया है, अतः इन्द्र एवं देव अपने स्थान से उठकर सात कदम आगे बढ़कर तीर्थंकर को नमस्कार करते हैं। सौधर्म इन्द्र सभी देवों के साथ तीर्थंकर के दर्शन-पूजन करने आते हैं एवं सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर समवसरण की रचना करता है। जिसमें तीर्थंकर विराजमान होते हैं, इन्द्र, देव, मनुष्य तथा तिर्यञ्च तीर्थंकर के दर्शन-पूजन करते एवं धर्मोपदेश सुनते हैं। 7. तीर्थंकरों देशना दिन में कितने बार होती है एवं कितने समय तक होती है? तीर्थंकरों की देशना दिन में चार बार होती है-प्रात:, मध्याह्न, सायंकाल एवं मध्यरात्रि में तथा चक्रवर्ती आदि विशेष पुरुष के आने से अकाल में भी देशना हो जाती है। एक बार में 3 मुहूर्त अर्थात् 2 घंटा 24 मिनट तक देशना होती है, जिसे दिव्यध्वनि कहते हैं। (गो.जी.जी. 356) 8. मोक्षकल्याणक किसे कहते हैं? तीर्थंकर का जब मोक्ष का समय निकट आ जाता हैं, तब वे समवसरण को छोड़कर जहाँ से निर्वाण (मोक्ष) होना है, वहाँ जाकर योग निरोध कर 14 वें गुणस्थान में आते ही पाँच हृस्व अक्षर (अ, इ, उ, ऋ,लू) के उच्चारण में जितना समय लगता है उसके अन्त में ही चार अघातिया कर्मो का क्षय कर निर्वाण को प्राप्त हो जाते हैं। उसी समय इन्द्र एवं देव तीर्थंकर की निर्वाण भूमि में आते हैं और तीर्थंकर के परम पवित्र शरीर को रत्नमयी पालकी में विराजमान कर नमस्कार करते हैं। तदनन्तर अग्निकुमार देव अपने मुकुट से उत्पन्न अग्नि के द्वारा तीर्थंकर के शरीर का अन्तिम संस्कार करते हैं। पश्चात् उस भस्म को मस्तक पर लगाकर उन जैसा बनने की भावना भाते हैं। फिर समस्त इन्द्र मिलकर आनन्द नाटक करते हैं। इस प्रकार सभी देव विधिपूर्वक तीर्थंकर के निर्वाणकल्याणक की पूजन कर एवं उस स्थान पर वज़सूची से चरण चिह्न बनाकर अपने-अपने स्थान वापस चले जाते हैं। (म.पु.47/343-354)
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: Unknown
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