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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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Showing content with the highest reputation since 05/22/2021 in all areas

  1. वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: आचार्य विद्यासागर जी
    2000 वर्ष पूर्व स्वामी समन्तभद्र महाराज जी द्वारा रचित स्वयंभू स्तोत्र जो कि चौबीस तीर्थंकर भगवान की स्तुति है जो अनंत पापों का क्षय करने वाली है इस पवित्र स्तोत्र का पाठ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज प्रतिदिन 3 बार करते हैं
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  2. दिनांक 9 जून 2021 दीक्षा प्रदाता : आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज (1) खातेगांव - ब्र.फूलचंद लुहाड़िया 10 प्रतिमाधारी क्षुल्लक - स्वाध्याय सागर जी (2) ब्र. शांतिलाल जी बांसबाड़ा क्षुल्लक प्रशांतसागर जी (३) मंडीबामोरा - ताराचंद जी 10 प्रातिमाधारी क्षुल्लक मोन सागर जी (4) रेबाड़ी - ब्र. सतेन्द्र जी 10 प्रतिमा धारी क्षुल्लक चिंतसंसागर जी (५) अशोक पांड्या बानापुरा बाले 10 प्रतिमाधारी क्षुल्लक अगम्य सागर जी (6) ब्र. राजेश जैसीनगर - क्षुल्लक अटल सागर जी (7) भागचंद जी किशनगढ़ क्षुल्लक वैराग्य सागर जी (8) संतोष पांड्या इंदौर (गया) क्षुल्लक निकट सागर जी (9) बसंत जी बागीदौरा क्षुल्लक परीत सागर जी
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  3. *पूज्य आचार्य संघ मंगल विहार अपडेट* 22 जनवरी 2021 ÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷ ● *आज रात्रि विश्राम-* संत सिंघा जी कॉलेज (नेमावर जी से 9 किमी) ● *कल की आहार चर्या-* पीपल्या नानकर में सम्भावित। (प्रातः कालीन विहार 5.5 किमी) * ÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷ परम पूज्य आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार, सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र श्री नेमावर से हुआ। विशेष- पूज्य मुनिश्री संभवसागर जी महाराज जी सहित 9 महाराज जी नेमावर जी रुक रहे हैं यहाँ बेदी प्रतिष्ठा आदि कुछ मांगलिक कार्यक्रम होना है। पूज्य आचार्य भगवन के चरण ज्यों ज्यों आगे बढ़ते जाएंगे रास्ते मे कुछ नए उपसंघों के विहार नई दिशाओं की ओर होते जाएंगे। 22 जून प्रातः स्मरणीय संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर महाराज का मंगल विहार नेमावर से अभी-अभी 3.40 बजे हुआ आचार्य श्री जी नेमावर तीर्थक्षेत्र में पिछले 27 नवम्बर 21 से विराजमान थे। अभी अभी --- WhatsApp Video 2021-06-22 at 3.04.43 PM.mp4
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  4. *विहार सूचना* आज दोपहर 3 बजे होगा 19 मुनिराजो का अपने आराध्य के श्री चरणो से पृथक विहार पठारी पूज्य मुनि श्री निर्दोष सागर जी महाराज पूज्य मुनि श्री निर्लोभ सागर जी महाराज गंजबासौदा पूज्य मुनि श्री निरुपम सागर जी महाराज पूज्य मुनि श्री निरापद सागर जी महाराज इटारसी पूज्य मुनि श्री विसद सागर जी महाराज पूज्य मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज बिदिशा पूज्य मुनि श्री सौम्य सागर जी पूज्य विनम्र सागर जी आदि (10 मुनिराज) मंडी बामोरा पूज्य मुनि श्री दुर्लभ सागर जी महाराज पूज्य मुनि श्री संधान सागर जी महाराज पूज्य मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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  5. *आहारचर्या* *🗓 १५,जून,२०२१ मंगलवार 🗓* *सिद्धोदय_सिद्ध_क्षेत्र #नेमावर*,जिला देवास (म.प्र.) *✨आज परम पूज्य संत शिरोमणि १०८ आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज✨* को आहार कराने का सौभाग्य *पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के प्रमुख पात्र धनपति कुवेर परिवार श्री मति निर्मला जी जैन श्रेष्ठी श्रीमान राजेन्द्र कुमार जी जैन ( राजा भैया सूरत ) - श्री मति रेखा जी जैन , श्री मान धर्मेश जी , ऋषि जी जैन सूरत, पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के प्रमुख पात्र भरत- चक्रवती श्री मान आनंद जी जैन स्टील परिवार सागर, श्री मान संदेश जी जैन जबलपुर मध्यप्रदेश* निवासी एवं उनके समस्त परिवार को प्राप्त हुआ *👏🏽आहार दान देने वालों की अनुमोदना👏🏽*
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  6. until
    प्रसिद्ध जैन तीर्थ क्षेत्र नर्मदा नदी के किनारे बसे नेमावर जिला देवास में श्री विश्व शांति पंचकल्याणक महामहोत्सव आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर महाराज के ससंघ सानिध्य में 15 जून से 21 जून तक होंगे प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी विनय भैया बंडा होंगे और महोत्सव के अध्यक्ष श्रावक श्रेष्ठि राजा भैया सूरत और कार्यअध्यक्ष राजीव जैन बंटी भैया बीड़ी परिवार इंदौर होंगे *नेमावर पंचकल्याणक महा महोत्सव में भगवान के माता पिता- श्री सलील जी बड़जात्या नेमी नगर जैन कॉलोनी इंदौर,सौधर्म श्री इन्द्र-प्रभात जी मुम्बई,कुवेर- श्री राजा भाई जी सूरत, ...महायज्ञ... नायक बनने का परम सौभाग्य दिगंबर जैन परवार समाज गौरव पूर्व अध्यक्ष भाई श्री राजीव,बंटी भैया ने यह सौभाग्य प्राप्त किया बहुत बहुत अनुमोदना बंधाई* *सभी पात्रों को बहुत-बहुत बधाइयां एवं उनके पुण्य की बहुत बहुत अनुमोदना*
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  7. बुन्देलखंड में आचार्य महाराज का यह पहला चातुर्मास था। एक दिन रात्रि के अँधेरे में कहीं से बिच्छू आ गया और उसने एक बहिन को काट लिया। पंडित जगन्मोहनलाल जी वहीं थे। उन्होंने उस बहिन की पीड़ा देखकर सोचा कि बिस्तर बिछाकर लिटा दूँ, सो जैसे ही बिस्तर खोला उसमें से एक सर्प निकल आया। उसे जैसे-तैसे भगाया गया। दूसरे दिन पंडित जी ने आचार्य महाराज को सारी घटना सुनाई और कहा कि महाराज! यहाँ तो चातुर्मास में आपको बड़ी बाधा आएगी। पंडित जी की बात सुनकर आचार्य महाराज हँसने लगे। बड़ी उन्मुक्त हँसी होती है महाराज की। हँसकर बोले कि-‘पंडित जी, यहाँ हमारे समीप भी कल दो-तीन सर्प खेल रहे थे। यह तो जंगल है। जीव-जन्तु तो जंगल में ही रहते हैं। इससे चातुर्मास में क्या बाधा ? वास्तव में, हमें जंगल में ही रहना चाहिए और सदा परीषह सहन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। कर्म-निर्जरा परीषह-जय से ही होती है।' उपसर्ग और परीषह को जीतने के लिए इतनी निर्भयता व तत्परता ही साधुता की सच्ची निशानी है। कुण्डलपुर(१९७६)
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  8. https://vidyasagar.guru/haiku गागर में सागर - आचार्य विद्यासागर जी द्वारा रचित हायकू (हाइकू) छन्द hayku haiku
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  9. धार्मिकदूष्टि से, वैज्ञानिक द्रष्टि से जल छानकर पीना चाहिए। अत: हृस अध्याय में जल छानने की विधि का वर्णन है। 1. जल क्यों छाना जाता है ? जल में जो अनेक सूक्ष्म (त्रस) जीव रहते हैं, उनकी रक्षा के लिए जल को छाना जाता है। बिना छने जल का प्रयोग करने से उसमें रहने वाले जीवों का अवसान (मरण) होता है एवं जीव पेट में जाकर रोग भी उत्पन्न करते हैं। इससे छने पानी का प्रयोग करना चाहिए। 2. पानी स्वयं जीव है, तो छानने से जीव कैसे बचेंगे ? पानी छानने से त्रस जीवों की रक्षा होती है। जलकायिक की नहीं। 3. एक बूंद जल में जैनधर्म के अनुसार कितने जीव हैं ? एक बूंद जल में जैनधर्म के अनुसार संख्यात त्रस जीव एवं असंख्यात जलकायिक जीव हैं, जो कबूतर के बराबर होकर उड़ें तो पूरा जम्बूद्वीप भर जाएगा | 4. वैज्ञानिक कैप्टन स्ववोर्सवी के अनुसार एक बूंद जल में कितने जीव हैं ? वैज्ञानिक कैप्टन स्ववोर्सवी के अनुसार 36,450 त्रस जीव हैं। 5. जल छानने की विधि क्या है ? कुएँ में बालटी या कोई भी बरतन जोर से नहीं पटकते हुए पानी खीचें। वह बालटी फूटी भी न हो, और पानी गिरे भी नहीं। बालटी ऊपर लाने के बाद एक सूती छन्ने से छानना, वह छन्ना इतना मोटा हो कि उसमें से सूर्य की किरणें आर-पार न हो सकें। छन्ना इतना बड़ा हो कि जिस बरतन में पानी छाना जा रहा है,उसके मुख से बड़ा हो। इतनी सावधानी अवश्य रहे कि अनछना एक भी बूंद जल जमीन पर न गिरे। पानी छानने के बाद जिवानी को छने जल से धोकर ही, जहाँ की जिवानी हो उसी जगह डालना चाहिए। जिवानी ऊपर से नहीं फेंकना चाहिए, बल्कि बालटी में नीचे कड़ा होना चाहिए। जिससे जल की सतह पर जाकर जिवानी पहुँचे। अत: कड़े वाली बालटी का प्रयोग करना चाहिए। 6. जेट, हैंडपप आदि से पानी आने में घर्षण से जीव मर जाते हैं। फिर पानी छानने से क्या लाभ है ? जेट, हैंडपंप से पानी आता है तो घर्षण से जीव मर तो जाते हैं किन्तु बिना छने जल में प्रतिसमय जीव उत्पन्न होते रहते हैं। अत: पानी छानना चाहिए। 7. हैंडपंप की जिवानी कहाँ डालना चाहिए ? हैंडपंप में जिवानी तो जा नहीं सकती। घर में टंकी, हौज आदि में जल हो तो उसमें डाल सकते हैं। जब तक उसमें जल रहेगा, तब तक जीव सुरक्षित रहेंगे। यह विधि ठीक नहीं है फिर भी जितनी रक्षा हो सके उतनी करें, जिससे पानी छानने के संस्कार बने रहेंगे। 8. छने जल की मर्यादा कितनी है ? एक मुहूर्त अर्थात् 48 मिनट। इसके बाद उसमें पुनः त्रस जीवों की उत्पत्ति होने लगती है। अत: पुनः छानना चाहिए। 9. छने जल को लौंग, सौंफ आदि से प्रासुक किया जाता है तो उसकी मर्यादा कितनी है ? छने जल को लौंग, सौंफ आदि से प्रासुक किया जाता है तो उसकी मर्यादा छः घंटे हो जाती है, किन्तु छ: घंटे के बाद वह अमर्यादित हो जाता है। अर्थात् उसमें त्रस जीवों की उत्पत्ति प्रारम्भ हो जाती है। 10. उबले (Boiled) जल की मर्यादा कितनी है ? 24 घंटे। इसके बाद वह अमर्यादित हो जाता है। इसे दुबारा गर्म भी नहीं करना चाहिए। 11. नल में कपड़े की थैली दिन भर लगी रहती है, क्या यह उचित है ? नहीं। थैली नल में लगी-लगी ही सूख जाती है तो उसमें रहने वाले जीव मर जाते हैं। 12. वर्षा का जल क्या शुद्ध है ? वर्षा का जल अन्तर्मुहूर्त तक तो शुद्ध है, उसमें जीव नहीं रहते हैं। अन्तर्मुहूर्त के बाद उसमें जीव उत्पन्न हो जाते हैं। 13. जैनधर्म के अलावा और कहीं भी पानी छानने के बारे में कहा है ? हाँ। मनुस्मृति में लिखा है - अपनी दृष्टि से धरती को अच्छी तरह देखकर पैर रखे तथा जल को वस्त्र से छानकर पीना चाहिए। यथा- दृष्टि पूतं न्यसेत् पादं, वस्त्र पूर्त जलम् पिबेत्। 14. पानी छानने के बारे में आज विज्ञान क्या कहता है ? पानी को छानकर फिर उबालकर (Boiled)ही पीना चाहिए। 15. छना पानी पीने से क्या लाभ हैं ? छना पानी पीने से मुख्य लाभ हैं - अहिंसा धर्म का पालन होता है। अनेक प्रकार की बीमारियों से स्वत: बच जाते हैं। 16. गुरुवर आचार्य विद्यासागर जी महाराज के शब्दों में अनछना जल पीने से क्या होता है ? जिस प्रकार स्टोव में बिना छना तेल डालते हैं तो वह भभकता है, जिससे उसमें पिन करना पड़ती है। उसी प्रकार पेट में बिना छना जल डालते हैं तो उसमें पिन करना पड़ती है अर्थात् इंजेक्शन लगवाना पड़ता है, क्योंकि बीमार पड़ जाते हैं। 17. भगवान् महावीर जैनी किसे कह गए ? महावीर कह गए सभी से जैनी वह कहलाएगा। दिन में भोजन, छान के पानी, नित्य जिनालय जाएगा।
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  10. From the album: श्रुत पंचमी के लिए श्रुतस्कंध यंत्र

    श्रुत पञ्चमी - जैन पर्व भगवान् महावीर के मुक्त हो जाने के लगभग 600 वर्ष पश्चात् जब श्रुतज्ञान लोप हो गया। तब गिरनार पर्वत की गुफा में निवास करने वाले धरसेनाचार्य महाराज के मन में श्रुत संरक्षण का विचार आया। निमित्तज्ञान से उन्होंने जाना कि मेरी आयु अल्प रह गई है, मेरे बाद इसअंग ज्ञान का लोप हो जायेगा। अत: योग्य शिष्यों को मुझे अंग आदिश्रुत का ज्ञान करा देना चाहिए। ऐसा विचार कर उन्होंने महिमानगरी में अर्हबलि आचार्य के पास पत्र भेजा तब उन्होंने नरवाहन और सुबुद्धि नामक मुनिराज को उनके पास भेजा। परीक्षण के लिये दोनों को दो विद्याएँ सिद्ध करने के लिए दीं। गुरु आज्ञानुसार, गिरनार पर्वत पर भगवान् नेमिनाथ की निर्वाण शिला पर पवित्र मन से विद्या सिद्ध करने बैठ गये और मन्त्र सिद्ध कर लिया। परीक्षा में उत्तीर्ण शिष्यों को सब तरह योग्य पा उन्हें खूब शास्त्राभ्यास कराया तथा ग्रन्थ समाप्ति पर भूत जाति के देवों द्वारा मुनियों की पूजा करने पर नरवाहन मुनि का नाम भूतबलि तथा सुबुद्धि मुनि की अस्त-व्यस्त दंत पक्ति सुव्यवस्थित हो जाने से उनका नाम पुष्पदन्त रखा। कुछ समय पश्चात् उन मुनिराजों ने षट्खण्डागम नामक सिद्धान्त ग्रन्थ को लिपिबद्ध कर ज्येष्ठ शुक्ला पञ्चमी को पूर्ण किया। उस दिन बहुत उत्सव मनाया गया। तभी से प्रतिवर्ष ज्येष्ठ सुदी पञ्चमी को श्रुतपञ्चमी का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन शास्त्रों की पूजा की जाती है।
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  11. हम उन्न्नत कैसे बनें? पानी से पूछा गया कि तुम्हारा रंग कैसा है? उत्तर मिला कि जैसा रंग का सम्पर्क मिल जावे वैसा। अर्थात् पानी पीले रंग के साथ में घुलकर पीला, तो हरे रंग के साथ में घुलकर हरा बन जाता है। ऐसा ही हाल इस मनुष्य का भी है। इसको प्रारम्भ से जैसे भले या बुरे की संगति प्राप्त होती है वैसा ही वह खुद हो जाया करता है। अभी कुछ वर्षों पहले की बात है- लखनऊ के अस्पताल में एक प्राणी लाया गया था जो कि अपनी चाल-ढाल से भेड़िया बना हुआ था, परन्तु वस्तुत वह मनुष्य था। जो कि कच्चे मांस के सिवा कुछ नहीं खाता था। भेड़िये की आवाज में बोलता था। वैसे ही अपनी शारीरिक चेष्टा-झपटना मारना वगैरह करता था। बात ऐसी थी कि एक नन्हें बालक को भेड़िया उठा ले गया। बालक के माँ-बाप ने सोचा कि उसे तो भेड़िया खा गया होगा परन्तु भेड़िये ने उसे अपने बच्चे के समान पाला-पोषा। जैसा मांस आप खाता था वैसा कुछ मांस इस बच्चे को भी दे दिया करता था एवं अपने पास उसे प्रेम पूर्वक रखा। करीब १२-१४ वर्ष की अवस्था में वह उन अस्पताल वालों की निगाह में आ गया और चिकित्सा के लिए लाया गया। धीरे-धीरे अब वह कच्चा मांस खाने की अपेक्षा पकाया हुआ मांस खाने लगा और कोई-कोई जवान मनुष्य की सी बोलने लग गया। मतलब यही कि मनुष्य जैसी सोहबत संगत में रहता है वैसा ही बन जाता है। बुरों के साथ में रहने से अपने आप बुरा बनते हुए और का भी बुरा करने वाला होता है। तो अच्छों के साथ में रहकर खुद अच्छा होता चला जाता है एवं समाज का भी भला करने वाला होता है। अतः हमें चाहिये कि हम भले लोगो की संगति में रहें और भले बनें, यही हमारी उन्नति है। लेखक - महाकवि वाणीभूषण बा. ब्र. पं. भूरामल शास्त्री (आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज)
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  12. मैं उस दिन पहली बार आचार्य महाराज के दर्शन करने कुण्डलपुर गया था। आचार्य महाराज छोटे से कमरे में बैठे थे। इतना बड़ा व्यक्तित्व इतने छोटे से स्थान में समा गया, इस बात ने मुझे चकित ही किया। आकाश उस दिन पहली बार बहुत अच्छा लगा। खिड़की से आती रोशनी में दमकती आचार्य-महाराज की निरावरित देह से निरन्तर झरते वीतरागसौन्दर्य ने मेरा मन मोह लिया। क्षण भर के लिए मैं वीतरागता के आकर्षण में खो गया और कमरे के बाहर ही ठिठक कर खड़ा रह गया। फिर लगा कि भीतर जाना चाहिए। दर्शन तो भीतर से ही संभव है। बाहर से दर्शन नहीं हो पाता, पर भीतर पहुँचना आसान भी नहीं था। दरवाजे पर तो भीड़ बहुत थी ही पर मैं स्वयं भी तो भीड़ से घिरा था। यह सोचकर कि कभी संभव हुआ तो एकाकी होकर आऊँगा, मैं वापस लौट आया। कहने को तो उस दिन में वापस लौट आया, लेकिन सचमुच मैं आज तक लौट नहीं पाया। अब तो यही चाहता हूँ कि जीवन भर उन श्री-चरणों में बना रहूँ, वहाँ से कभी दूर न होऊँ। उनके दर्शन करके मुझे वीतरागता के जीवन्त सौंदर्य की जो अनुभूति हुई है वह सदा बनी रहे, यही मेरे प्रथम दर्शन की उपलब्धि है। कुण्डलपुर (१९७६)
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  13. सत् शिव सुन्दर 1 - न्याय/नीति विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/sagar-boond-samaye/sat-shiv-sundar-nyaay-niti/
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  14. चाहे वह साधक हो, या श्रावक हो, प्रत्येक की भावना यही रहती है कि जब हम अपने गुरूवर को नमोस्तु निवेदित करें तभी गुरू महाराज की दृष्टि हमारी ओर हो और उनका आशीर्वाद का हाथ उठा हुआ हो। जब तक आचार्य श्री की दृष्टि नहीं उठती और आशीर्वाद का हाथ नहीं उठता तब तक किसी भी शिष्य व भक्त को आत्मसंतुष्टि नहीं होती और यदि गुरूवर की दृष्टि आशीर्वाद का हाथ उठ जाता है तो वह गद्गद् हो उठता है एवं अपने को धन्य मानता है। कई भक्त तो तब तक नमोस्तु-नमोस्तु बोलते रहते हैं कि जब तक आचार्य श्री आशीर्वाद का हाथ न उठा दें। एक बार किसी भव्यात्मा को नमोस्तु करने के उपरान्त आचार्य श्री का आशीर्वाद नहीं मिला, तब उन्होंने आचार्य भगवंत से कहा कि - आचार्य श्री कई बार आपका आशीर्वाद नहीं मिलता तो आकुलता होती है। आचार्य श्री ने सहजता से उत्तर दिया कि नमोस्तु करते समय आप लोगों का सिर नीचे रहता है, इसलिए आशीर्वाद का हाथ उठता भी होगा तो आप लोगों को दिखता नहीं है। अपने श्रद्धान को मजबूत बनाईये, गुरु का आशीर्वाद तो चाहे प्रत्यक्ष या परोक्ष हो वह हमेशा रहता है। आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए समझाया कि जब आपकी अच्छी, जैसा आप चाहते थे वैसी फोटो खिंच गई हो तो आप अपने पास रख लेते हैं, वैसे ही आशीर्वाद की एक बार की मुद्रा को अपनी धारणा में रख लो और उसी को स्मृति में लाते रहें।
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  15. जहाँ तक आभा की बात है वह निश्चित प्रकृति की गन्ध है, जो... पुरुष की पकड़ में इन्द्रियों के आधार से आज तक आई है, चाहे नीलाभ हो या हीराभ! चाहे हरिताभ हो या रक्ताभ, किन्तु आज यह इस पुरुष को पकड़ना चाहती है जो सब अभावों से अतीत हो जी रहा है ।
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  16. प्रभु के प्रति किस में ? इस में... प्रीति का वास है प्रतीति पास है पर्याप्त है यह, अब इसकी नयन-ज्योति चली भी जाय कोई चिन्ता नहीं, किन्तु कहीं ऐसा न हो, ........कि प्रभु-स्तुति से पूर्व प्रभु-नुति से पूर्व इसके करुण-नयनों में नीर कम पड़ जाय |
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  17. सागर से विहार करके आचार्य महाराज संघ-सहित नैनागिरि आ गए। वर्षाकाल निकट था, पर अभी बारिश आई नहीं थी। पानी के अभाव में गाँव के लोग दुखी थे। एक दिन सुबह-सुबह जैसे ही आचार्य महाराज शौच-क्रिया के लिए मन्दिर से बाहर आए, हमने देखा कि गाँव के सरपंच ने आकर अत्यन्त श्रद्धा के साथ उनके चरणों में अपना माथा रख दिया और विनत भाव से बुन्देलखण्डी भाषा में कहा कि-‘हजूर! आप खों चार मईना इतई रेने हैं और पानू ई साल अब लों नई बरसों, सो किरपा करो, पानू जरूर चानें है।” आचार्य महाराज ने मुस्कुराकर उसे आशीष दिया, आगे बढ़ गए। बात आई-गई हो गई, लेकिन उसी दिन शाम होते-होते आकाश में बादल छाने लगे। दूसरे दिन सुबह से बारिश होने लगी। पहली बारिश थी। तीन दिन लगातार पानी बरसता रहा। सब भीग गया। जल मन्दिर वाला तालाब भी खूब भर गया। चौथे दिन सरपंच ने फिर आकर आचार्य महाराज के चरणों में माथा टेक दिया और गद्गद् कंठ से बोला कि-‘हजूर! इतनो नोई कई ती, भोत हो गओ, खूब किरपा करी।” आचार्य महाराज ने सहज भाव से उसे आशीष दिया और अपने आत्मचिन्तन में लीन हो गए। मैं सोचता रहा कि, इसे मात्र संयोग मानूँ या आचार्य महाराज की अनुकम्पा का फल मानूँ। जो भी हुआ, वह मन को प्रभावित करता है। नैनागिरि (१९८२)
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  18. मैंने सुना है एक दिन आचार्य महाराज रोज की तरह स्वाध्याय में लीन थे। लोग दर्शन करने आ-जा रहे थे, सभी चावल चढ़ाते जा रहे थे। इतने में अचानक सभी को चावल चढ़ाते देखकर एक बच्चे ने अपने हाथ में रखी हुई चाकलेट चढ़ा दी। बच्चे के भोलेपन पर सभी हँसने लगे। बात आई-गई हो गई। इस घटना के स्मरण से आज भी मन उद्वेलित हो उठता है। यदि हम भी ऐसे वीतरागी गुरु को पाकर बच्चों के समान सरलता व सहजता से संसार में प्रिय मालूम पड़ने वाली वस्तुओं का त्याग करने के लिए तत्पर हो जाएँ तो मुक्ति के मार्ग पर चलना कठिन कहाँ है?
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  19. उस दिन शाम का समय था। आचार्य महाराज मन्दिर के बाहर खुली दालान में विराजे थे। थोड़ी देर तत्व-चर्चा होती रही। उस पवित्र और शान्त वातावरण में आचार्य महाराज का सामीप्य पाकर हम सभी बहुत खुश थे। फिर सामायिक का समय हो गया। आचार्य महाराज वहाँ से उठकर भीतर मन्दिर में चले गए। बाहर किसी ने मुझसे कहा कि भीतर की बिजली जला आओ। आचार्य श्री ने यह बात सुन ली। मैंने जैसे ही भीतर कदम रखा कि भीतर से वे बोल उठे - ‘हाँ भाई, भीतर की बिजली जला लो।' उनका आशय आन्तरिक आत्म-ज्योति के प्रकाश से था। मैं अवाक् खड़ा रह गया। उनके द्वारा कही गई वह बात बोध-वाक्य बन गई, जो हमें आज भी आत्म-ज्योति जलाए रखने के लिए निरन्तर प्रेरित करती है। कुण्डलपुर(१९७७)
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  20. आचार्य महाराज का उन दिनों बुन्देलखण्ड में प्रवेश हुआ था। उनकी निर्दोष मुनि-चर्या और अध्यात्म का सुलझा हुआ ज्ञान देखकर सभी प्रभावित हुए। कटनी में आए कुछ दिन ही हुए थे कि महाराज को तीव्र ज्वर हो गया। पं० जगन्मोहनलाल जी की देखरेख में उपचार होने लगा। सतना से आकर नीरज जी भी सेवा में संलग्न थे। एक दिन मच्छरों की बहुलता देखकर पंडित जी ने रात्रि के समय महाराज के चारों ओर पूरे कमरे में मच्छरदानी लगवा दी। सुबह जब महाराज ने मौन खोला तो कहा कि यह सब क्या किया ? पंडित जी! संसारी प्राणी अपने शरीर के प्रति अनुरागवश ऐसे ही तर्क देकर उसकी सुरक्षा में लगा है और निरन्तर दुखी है। मोक्षार्थी के लिए ऐसी शिथिलता से बचना चाहिए और परीषह-जय के लिए तत्पर रहना चाहिए। कर्म-निर्जरा तभी संभव होगी।' पंडित जी क्या कहते ? विनत भाव से आगम के अनुरूप आचरण करने वाले, परीषहविजयी, शिथिलताओं से दूर और कर्म-निर्जरा में तत्पर आचार्य महाराज के चरणों में झुक गए और सदा के लिए उनके भक्त हो गए। कटनी (१९७६)
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  21. रात बहुत बीत गई थी। सभी लोगों के साथ मैं भी इंतजार कर रहा था कि आचार्य महाराज सामायिक से उठे और हमें उनकी सेवा का अवसर मिले। कितना अद्भुत है जैन मुनि का जीवन कि यदि वे आत्मस्थ हो जाते हैं तो स्वयं को पा लेते हैं और आत्म-ध्यान से बाहर आते हैं तो हम उन्हें पाकर अपने आत्मस्वरूप में लीन होने का मार्ग जान लेते हैं। उस दिन दीपक के धीमे-धीमे प्रकाश में उनके श्रीचरणों में बैठकर बहुत अपनापन महसूस हुआ, ऐसा लगा कि मानो अपने को अपने अत्यन्त निकट पा गया हूँ। उनके श्रीचरणों की मृदुता मन को भिगो रही थी। हम भले ही उनकी सेवा में तत्पर थे, पर वे इस सबसे बेभान अपने में खोये थे। अद्भुत लग रहा था इस तरह किसी को शरीर में रहकर भी शरीर के पार हेाते देखना। दूसरे दिन सूरज बहुत सौम्य और उजला लगा। आज मुझे लौटना था। लौटने से पहले जैसे ही उनके श्री-चरणों को छुआ और उनके चेहरे पर आयी मुस्कान को देखा, तो लगा मानो उन्होंने पूछा हो कि क्या सचमुच लौट पाओगे ? मैं क्या कहता ? कुछ कहे बिना ही चुपचाप लौट आया और अनकहे ही मानो कह आया कि अब कभी, कहीं और, जा नहीं जाऊँगा। उनकी आत्मीयता पाकर मेरा हृदय ऐसा भीग गया था जैसे उगते सूरज की किरणों का मृदुल-स्पर्श पाकर धरती भीग जाती है। कुण्डलपुर(१९७६)
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  22. शाम होने को थी। मैंने उन्हें ऊपर पर्वत की ओर जाते देखा। सुना है कि-वे संध्याकालीन प्रतिक्रमण के लिए पर्वत के किसी स्वच्छ शिलातल पर चले जाते हैं। आज उन्हें गहन एकान्त में प्रतिक्रमण करते देखना चाहता था, सो कुछ दूर पीछे चलकर शिलातल पर उन्हें बैठते देखकर ठहर जाता हूँ, ताकि उन्हें मेरे होने का अहसास भी बाधक न बने। मैंने देखा कि सब ओर शांति है। इतनी गहरी शान्ति कि दूर रहकर भी प्रतिक्रमण के धीमे-धीमे स्वरों और हृदय की धड़कन के बीच एक लयात्मकता का अहसास होता है। इन क्षणों में उनके चेहरे पर अतिशय विनम्रता थी। वे क्षमा-भाव से भरकर प्राणी-मात्र के प्रति अनुकंपित होते दिखाई दे रहे थे। प्रतिक्रमण करते-करते वे कायोत्सर्ग में इतने लीन हो जाते थे कि मानों क्षणभर को देह के पार देहातीत शून्य में खो गए हों। इन्द्रिय और मन की गिरफ्त से बाहर निकल गए हों। अपने में ही समा गए हों। उस दिन पहली बार संध्याकाल मुझे अपने-घर लौटने की याद दिला रहा था। गोधूलि की बेला में दिन भर की यात्रा से थका-हारा सूरज अपने घर लौटता दिखाई दिया। पक्षी अपने-अपने नीड़ में लौट रहे थे। साधक बाह्य-यात्रा से विमुख होकर अंतर्यात्रा पर वापस लौट रहे थे। ऐसा लगा मानो सब लौट रहे हैं। प्रतिक्रमण के उपरान्त पर्वत से नीचे उतरते आचार्य महाराज के चेहरे पर झलकती वीतरागता का आनन्द देखकर मेरा जीवन धन्य हो गया। उस दिन आचार्य महाराज के श्रीचरणों में माथा झुकाकर वापस लौटते वक्त ऐसा लगा कि एक वीतरागी महामुनि के चरणों से दूर होने की पीड़ा भी इतनी सौम्य हो सकती है कि व्यक्ति का मन एकाकी होने को आतुर हो उठता है। कुण्डलपुर (१९७६)
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  23. मैंने देखा ईर्यापथ-प्रतिक्रमण का समय होने वाला है। उनके पास हमारी तरह कलाई पर बँधी कोई घड़ी नहीं है, पर लग रहा है कि हर घड़ी उनकी है। समय की नब्ज पर उनका हाथ है। सभी शिष्यगण विनत भाव से आकर बैठते जा रहे हैं। थोड़ी देर में प्रतिक्रमण के स्पष्ट मधुर मंद स्वर गूंजने लगे। सभी साधुजनों का मन आकाश में चमकते सूरज की तरह अत्यन्त उज्ज्वल और निर्मल होकर चमक उठा है। मैं भी सोच रहा हूँ कि मेरे जीवन का प्रतिक्षण इतना ही पवित्र हो सके, ताकि जीने का भरपूर आनन्द मैं भी ले सकूं। उन्हें प्रतिक्रमण से गुजरते और दोपहर की सामायिक में जाते देख रहा हूँ। प्रतिक्रमण, मानो सामायिक के लिए प्रवेश द्वार है। सामायिक से पहले उन्होंने खड़े होकर पूर्व से उत्तर दिशा की ओर क्रमश: चारों दिशाओं में प्रणाम निवेदित किया है। णमोकार महामंत्र पढ़ा है और दो बार जमीन पर बैठकर माथा टेककर नमन किया है। इस बीच अंजुलिपुट चार बार मुकुलित हुए हैं। घड़ी की सुई के घूमने की दिशा में हाथ की अंजुलि को तीन बार घुमाकर तीन आवर्त पूरे किए गए हैं। मनवचन-काय सब एकाकार होने की है। इस बीच उनके होठों पर हल्कीसी मुस्कान के साथ मंद स्वरों में ‘ओम् नम: सिद्धेभ्य:' उच्चरित होते सुन रहा हूँ। पद्मासन में बैठ कर अब वे अपने में अविचल हैं। मैं सोच में डूबा गुमसुम-सा खड़ा रह गया हूँ। पल भर को लगा कि जैसे हम नदी के साथ-साथ/सागर की ओर गए/नदी सागर में मिली/हम किनारे पर खड़े रह गए। सामायिक पूरी होते-होते दोपहर ढल चुकी है। वे अब चिन्तन मनन में लग गए हैं। सुखासीन हैं। बाहर-भीतर सब एक सार मालूम पड़ता है। उनके सब ओर उजलापन है। सुनता आया हूँ कि जब कभी कविता उनके श्रीमुख से बहती है तो हवाओं में रस भर जाता है। आज सभी के साथ मैं भी उनके श्रीमुख से कुछ सुन पाने के लिए उत्सुक हूँ। शायद मेरे मन की पुकार उन तक पहुँच गई है। तभी तो मानो मेरी ओर देखकर वे मुस्कुरा रहे हैं। मुस्कुराना कोई उनसे सीखे। एकदम बच्चों की तरह सरल, तरल और निर्मल। उस दिन पहली बार मैंने किसी साधु के निश्छल हृदय से झरते काव्य-रस का स्वाद लिया। छंदबद्ध होकर भी कविता को मुक्त होते देखा। तब लगा कि स्वरों में राग और भावों में वीतराग, अद्भुत है आत्म-संगीत से उनका यह अनुराग। देखते-देखते वहाँ सब संगीतमय हो गया। तन-मन-प्राण सब विरक्ति के रस में भीग गए। श्रद्धा और भक्ति से विगलित सबके हृदय भर गए। यही उपलब्धि इन क्षणों की थी, जो आज भी अपने होने का एहसास कराती है। सचमुच, यह संगति साधु की, हरे कोटि अपराध।” कुण्डलपुर(१९७६)
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  24. मैंने देखा कि मन्दिर के प्रांगण में बैठकर आचार्य महाराज अपने सामने रखे ग्रन्थ के अबूझ/बंद रहस्यों को उद्घाटित कर रहे हैं। उनका स्वयं निग्रन्थ होना और ग्रन्थ में गुम्फित रहस्यमय गुत्थियों को एक-एक कर अपने ज्ञान व आचरण से सुलझाते जाना मुझे अच्छा लगा। असल में, ग्रन्थ के गूढ़ रहस्यों को समझने की विनम्र कोशिश में कभी धीरे से मुस्कराना, मन ही मन कुछ कहना और क्षण भर में फिर ग्रन्थ की अतल गहराई में खो जाना, मेरे लिए एकदम नया है। सोचता हूँ कि जैन-धर्म और दर्शन का नित-नूतन और अप-टू-डेट रूप ऐसे ही विरले स्वानुभवी साधकों द्वारा संभव है। स्वानुभूति के इन क्षणों में आचार्य महाराज सागर की तरह अपार और अथाह दिखाई दे रहे थे। जैसे सागर की असीम और अतल जलराशि अनजाने ही हमें अपनी ओर आकृष्ट करती है, मानो स्वयं सागर होने का निमंत्रण देती है; ऐसे ही आचार्य महाराज का सानिध्य हमें स्वानुभव के महासागर में प्रवेश पाने को प्रेरित करता है। अपने में सभी को समाकर भी जैसे सागर शान्त है, कितनी भी नदियाँ आकर उसमें समाती जाएँ, वह अपनी मर्यादा में रहता है; ऐसे ही आचार्य महाराज के चरणों में कितनी भी आत्माएँ समर्पित होती जाएँ, वे सबके बीच निलिप्त और शान्त हैं। सीमा में रहकर भी असीम है | अपनी सतह पर पड़े हुए कचरे को जैसे सागर की लहरें उठाकर/ धकेलकर किनारे पर फेंक आती हैं, ऐसे ही वे भी प्रतिक्षण सजग रहकर आने वाले समस्त विकारों को हटाकर सहज ही निर्मल हो जाते हैं। सागर की तरह वे भी रत्नाकर हैं। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र जैसे श्रेष्ठ रत्नों को वे अनन्त आत्म-गहराई में छिपाए हुए हैं। सागर की तरह वे बाहर मानी सतह पर क्षण भर को आहारविहार-निहार में प्रवृत्त होते दिखाई पड़ते हैं, लेकिन भीतर कहीं गहरे में वे अत्यन्त गम्भीर और अपने आत्मस्वरूप में अकम्प हैं। मैंने अनुभव किया कि जैसे सागर के समीप पहुँचकर किसी की प्यास नहीं बुझती, बल्कि और ज्यादा बढ़ जाती है; ऐसे ही उनका सामीप्य पाकर अपने को/अपने आत्म-आनंद को पाने की प्यास बढ़ जाती है। सचमुच, वे आत्मविद्या के अगाध सागर हैं। कुण्डलपुर(१९७६)
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  25. आचार्य-महाराज आहार-चर्या के लिए निकले थे। चलते-चलते निमिषमात्र में मानो उन्होंने सारे परिवेश को देख लिया और धीमे, सधे हुए कदमों से, वे आगे बढ़ रहे थे। मैं उनकी इस सहज सजगता को देखकर चकित था। सब ओर से एक ही आवाज आ रही थी कि, ‘‘भी स्वामिन! यहाँ पधारे, यहीं ठहरें। आहार-जल शुद्ध है।” सोच रहा था कि यह श्रद्धा और प्रेम से दी जाने वाली भिक्षा अनूठी है। देने वाला अपना सर्वस्व देने के लिए उत्सुक है, पर पाने वाला इतना निश्चिंत है कि पाने योग्य जो है, वह उसके पास हमेशा से है। उसे अन्यत्र कहीं और कुछ और नहीं पाना। मात्र इस देह के निर्वाह और तप की वृद्धि के लिए जो मिलना है वह मिलेगा, उसे मिलना नहीं है। प्रासुक आहार की मात्र गवेषणा है, आतुरता नहीं है। देखते-देखते एक अतिथि की तरह, घर के द्वार पर द्वारापेक्षण के लिए खड़े श्रावकों के समीप, उनका ठहर जाना और आनन्द-विभोर होकर लोगों का उन्हें श्रद्धा भक्ति से प्रतिग्रहण कर भीतर ले जाना, उच्च स्थान पर बिठाना, पाद-प्रक्षालन करके चरणोदक सिर-माथे चढ़ाना, पूजा करना और मन, वचन, काय तथा आहार-जल की शुद्धि कहकर उन्हें विश्वस्त करना; झुककर नमोऽस्तु निवेदित करके आहार-जल ग्रहण करने की प्रार्थना करना; यह सब इतने सहज व्यवस्थित ढंग से होता रहा कि मैं मंत्र-मुग्ध सा एक ओर खड़े-खड़े देखता ही रह गया। सुना था कि आहार में वे रस बहुत कम लेते हैं। सो देख रहा था कि ऐसा कौन-सा रस उनके भीतर झर रहा है, जो बाहर के रस को गैरजरूरी किए दे रहा है। एक गहरी आत्म-तृप्ति जो उनके चेहरे पर बरस रही है वही भीतरी-रस की खबर दे रही थी और मैं जान गया कि रस सब भीतर है। ये भ्रम है कि रस बाहर है। तभी तो बाहर से लवण का त्याग होते हुए भी उनका लावण्य अद्भुत है। मधुर रस से विरक्त होते हुए भी उनमें असीम माधुर्य है। देह के दीप में तेल (स्नेह) न पहुँचने पर भी उनमें आत्मस्नेह की ज्योति अमंद है। सारे फल छोड़ देने के बाद भी हम सभी लोगों के लिए, वे सचमुच, बहुत फलदायी हो गए हैं। उनकी संतुलित आहार-चर्या देखकर लगा कि शरीर के प्रति उनके मन में कोई गहन अनुराग नहीं है। वे उसे मात्र सीढ़ी मानकर आत्मा की ऊँचाइयाँ छूना चाहते हैं। शरीर धर्म का साधन है। उनकी कोशिश उसे समर्थ बनाए रखकर शान्तभाव से आत्म-साधना करने की है। सोच रहा था कि शरीर को इस तरह आत्मा से अलग मानकर उसका सम्यक्र उपयोग करना कितना सार्थक, किन्तु कितना दुर्लभ है। मैने देखा कि एक सच्चे साधक की तरह वे आहार ग्रहण के समस्त विधि-विधान का पालन सहज ही कर लेते हैं। गर्तपूरण की तरह जैसे गड्ढे को भरने के लिए किसी विशिष्ट पदार्थ का आग्रह नहीं होता, ऐसे ही शरीर की जरूरत पूरी करने के लिए किसी विशिष्ट/स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ का आग्रह उनके मन में नहीं है। अक्षमृक्षण की तरह जैसे गाड़ी चलते समय आवाज न करे और धुरी ठीक से काम करती रहे, इसलिए कोई चिकना पदार्थ उस पर लगा दिया जाता है, ऐसे ही जीवन की यात्रा निबंध चलती रहे और ठीक काम करती रहे, इसलिए योग्य आहार वे ग्रहण करते हैं। अग्निशमन के लिए जैसा खारा व मीठा कोई भी जल पर्याप्त है, ऐसे ही क्षुधा-तृषा की तपन को शान्त करने के लिए सरस-नीरस जो भी उपलब्ध निर्दोष आहार मिलता है, उसे शान्त भाव से ग्रहण कर लेते हैं। एक गाय की तरह जो बगीचे में जाकर भी विविध फूलों के सौन्दर्य या अपने लिए दाना डालने वाले के रूप-लावण्य को नहीं देखती और चुपचाप घास खाकर लौट जाती है, ऐसे ही वे भी श्रावक के बाह्य वैभव से अप्रभावित रहकर चुपचाप पाणिपात्र में दिए गए प्रासुक आहार का शोधन करके दिन में एक बार खड़े होकर उसे ग्रहण करते हैं। यह गोचरी वृत्ति है। आहार पूरा होने पर लोगों का आनंदित होना और जय-जयकार के बीच उनका इस सबसे निलिप्त रहकर मुस्कराते हुए लौटना, अनायास ही साधु की भ्रामरी वृत्ति का स्मरण करा देता है। भ्रमर जिस तरह गुनगुनाता हुआ आता है और फूल से पराग लेकर जैसे उसे हर्षित करके लौट जाता है, ऐसे ही वे आत्मसंगीत में निमग्न होकर अत्यन्त निलिप्त भाव से आहार ग्रहण करते हैं और श्रावक को हर्षित करके लौट आते हैं। उनके आहार ग्रहण करके लौटने के बाद जाने कितनी देर तक मैं वही सिर झुकाए खड़ा रहा, जब ख्याल आया तो देखा कि वे बहुत आगे/बहुत दूर निकल गए हैं। इतने आगे कि उन तक पहुँचने के लिए मुझे पूरी जिन्दगी उनके पीछे चलना होगा। कुण्डलपुर(१९७६)
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  26. मैंने सुना है, कुण्डलपुर के चातुर्मास में जब बारिश रुक जाती थी तब आचार्य महाराज मन्दिर के बाहर खुले आकाश के नीचे शिला-तल पर बैठ जाते थे। एक दिन आचार्य महाराज जब शिला-तल पर बैठ रहे थे तब एक श्रावक ने झट से लाकर चटाई बिछा दी। आचार्य महाराज ने देख लिया और मुस्कराकर बोले कि- ‘‘जिन्हें वस्त्र गंदे होने का डर है, ये चटाई तो उनके लिए है। हमारे तो वस्त्र हैं नहीं, इसलिए हमें तो कोई डर नहीं है।” सभी लोग महाराज के इस मनोविनोद पर हँसने लगे और प्रकृति के बीच उनके प्रकृतिस्थ/आत्मस्थ रहने की बात सोचकर सभी का मन गद्गद् हो गया। प्रकृति में प्रकृति की तरह निश्छल और निस्पृह होकर विचरण करना एक साधु की सच्ची उपलब्धि है। कुण्डलपुर(१९७६)
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  27. तीर्थंकर की वाणी को जिनवाणी कहते हैं, इसे कितने भागों में विभक्त किया है, इसमें क्या - क्या विषय है| इन सबका वर्णन इन अध्याय में है 1. जिनवाणी किसे कहते हैं एवं जिनवाणी के अपर नाम कौन-कौन से हैं ? ‘जयति इति जिन:' जिन्होंने इन्द्रिय एवं कषायों को जीता है, उन्हें जिन कहते हैं तथा जिन की वाणी (वचन) को जिनवाणी कहते हैं। अपर नाम-आगम, ग्रन्थ, सिद्धान्त, श्रुतज्ञान, प्रवचन, शास्त्र आदि। 2. सच्चे शास्त्र का स्वरूप क्या है ? आप्त अर्थात् वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी का कहा हुआ हो। वादी-प्रतिवादी के खण्डन से रहित हो। प्रत्यक्ष व अनुमान से विरोध को प्राप्त न हो। तत्वों का निरूपण करने वाला हो। प्राणी मात्र का कल्याण करने वाला हो। मिथ्यामार्ग का खण्डन करने वाला हो। अहिंसा का उपदेश देने वाला हो। (र.क.श्रा., 9) 3. शास्त्र सच्चे देव का कहा हुआ ही क्यों होना चाहिए ? अज्ञान और राग-द्वेष के कारण ही तत्वों का मिथ्या कथन होता है। जिन भगवान् अज्ञान और राग-द्वेष से रहित होते हैं। इससे वह जो कुछ भी कहते हैं, सत्य ही कहते हैं। जैसे - आप जंगल से गुजर (निकल) रहे थे, रास्ता भटक गए, आपने किसी से पूछा भाई शहर का रास्ता कौन-सा है, उस सजन को ज्ञात नहीं है तो वह आपको सही रास्ता नहीं बता सकता है और उस व्यक्ति को आपसे राग है तो कहेगा रास्ता यहाँ से नहीं यहाँ से है और वह आपको अपने नगर ले जाएगा एवं आपसे द्वेष है तो आपको विपरीत रास्ता बता देगा भटकने दो इसे। यदि आपसे राग-द्वेष नहीं है और उसे रास्ते का ज्ञान है, तो कहेगा श्रीमान् जी यह शहर का रास्ता है। 4. जिनागम को कितने भागों में विभक्त किया गया है ? जिनागम को 4 भागों में विभक्त किया गया है - प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग एवं द्रव्यानुयोग। 5. प्रथमानुयोग किसे कहते हैं ? जिसमें तिरेसठ शलाका पुरुषों का वर्णन हो। 169 महापुरुषों का वर्णन, उनके आदर्श जीवन एवं पुण्य-पाप के फल को बताने वाला है। यह बोधि अर्थात् रत्नत्रय, समाधि अर्थात् समाधिमरण का निधान (खजाना) है। इसमें कथाओं के माध्यम से कठिन-से-कठिन विषय को भी सरल बनाया जाता है। इस कारण आबाल-वृद्ध सभी समझ जाते हैं। प्रथम का अर्थ प्रधान भी होता है। अत: पहले रखा है। (रक श्रा.43) 6. प्रथमानुयोग में कौन-कौन से ग्रन्थ आते हैं ? प्रथमानुयोग के प्रमुख ग्रन्थ इस प्रकार हैं - हरिवंशपुराण, पद्मपुराण, श्रेणिकचरित्र, उत्तरपुराण, महापुराण अादि । 7. करणानुयोग किसे कहते हैं ? जो लोक - आलोक के विभाग को, कल्पकालों के परिवर्तन को तथा चारों गतियों के जानने में दर्पण के समान है, उसको करणानुयोग कहते हैं। (र.क.श्रा, 44) 8. करणानुयोग के अपर नाम क्या हैं ? करणानुयोग के अपर नाम दो हैं - गणितानुयोग और लोकानुयोग। 9. करणानुयोग में कौन-कौन से ग्रन्थ आते हैं ? करणानुयोग के प्रमुख ग्रन्थ इस प्रकार हैं - तिलोयपण्णति, त्रिलोकसार, लोकविभाग, जम्बूदीवपण्णत्ति अादि । 10. चरणानुयोग किसे कहते हैं ? जिसमें श्रावक व मुनियों के चारित्र की उत्पति एवं वृद्धि कैसे होती है, किन-किन कारणों से होती है एवं चारित्र की रक्षा किन-किन कारणों से होती है एवं कौन-कौन से व्रतों की भावनाएँ कौन-कौन सी हैं, उसका विस्तार से वर्णन मिलता है। (र.क.श्रा, 45) 11. चरणानुयोग में कौन-कौन से ग्रंथ आते हैं ? चरणानुयोग के प्रमुख ग्रन्थ इस प्रकार हैं - मूलाचार, मूलाचारप्रदीप, अनगारधर्मामृत, सागारधर्मामृत, रत्नकरण्ड श्रावकाचार आदि। 12. द्रव्यानुयोग किसे कहते हैं ? जिसमें जीव-अजीव तत्वों का, पुण्य-पाप, बंध-मोक्ष का वर्णन हो एवं जिसमें मात्र आत्मा-आत्मा का कथन हो वह द्रव्यानुयोग है। प्राय: विद्वान् कर्म सिद्धान्त को करणानुयोग का विषय मानते हैं, जबकि वह द्रव्यानुयोग का विषय है। द्रव्यानुयोग को निम्न प्रकार विभक्त कर सकते हैं। (रक श्रा, 46) 13. क्या जिनवाणी को माँ भी कहा है ? हाँ। जिस प्रकार माँ हमेशा-हमेशा बेटे का हित चाहती है, उसे कष्टों से बचाकर सुख प्रदान करती है। उसी प्रकार जिनवाणी माँ भी अपने बेटों अर्थात् मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविकाओं को दु:खों से बचाकर सुख प्रदान करती है, किन्तु कब, जब हम उस माँ की आज्ञा का पालन करें। 14. क्या जिनवाणी को औषध भी कहा है ? हाँ। जैसे औषध के सेवन से रोग नष्ट हो जाते हैं। वैसे ही जिनवाणी के सेवन से अर्थात् जैसा जिनवाणी में कहा है, वैसा आचरण करने से, जन्म, जरा, मृत्यु जो बड़े भयानक रोग हैं, वे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। 15. जिनवाणी स्तुति लिखिए ? जिनवाणी मोक्ष नसैनी है, जिनवाणी ॥ टेक॥ जीव कर्म के जुदा करन को, ये ही पैनी छेनी है। जिनवाणी ॥ 1 ॥ जो जिनवाणी नित अभ्यासे, वो ही सच्चा जैनी है। जिनवाणी ॥ 2॥ जो जिनवाणी उर न धरत है, सैनी हो के असैनी है। जिनवाणी ॥ 3 ॥ पढ़ो लिखो ध्यावो जिनवाणी, यदि सुख शांति लेनी है।॥ जिनवाणी ॥4॥
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  28. मन विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार यह मन दूसरे का स्वामी बनना चाहता है तो इस मन के कान पकड़ लेना चाहिए। स्वामी बनना है तो अपने स्वामी बनो इस प्रकार कह करके मन को समझा देना चाहिए। सबसे ज्यादा खराब यह मन है। इस मन के कारण ही इन्द्रियाँ विषयों की ओर चली जाती हैं। लेकिन ये मन कभी नहीं पिटता है इन्द्रियाँ पिट जाती हैं। मन सबका नियन्ता है। इस मन को नियंत्रण में रख लो तो सारी इंद्रियों को नियंत्रण में रख सकता है। इस मन को वश में रखने के लिए अंधे बन जाओ बहरे बन जाओ, गूंगे बन जाओ, बस इस प्रकार जो करना जानता है वो व्यक्ति साधना कर जाता है। धर्मध्यान सरल है तो बहुत कठिन भी है। ये सब मानसिकता का खेल है। जो मन को जीत लेता है तो वो ४ प्रकार के धर्मध्यान, चार शुक्ल ध्यान को ही करता है। जिसने मन को जीत लिया उसका हर समय धर्मध्यानमय रहता है। मन अपने निर्णय से दूसरे को समझाने का सदा प्रयास करता है लेकिन मोक्षमार्ग में पहले अपने आपको समझाना चाहिए फिर दूसरे को समझाना चाहिए। मन अनुकूलता पसंद करता है प्रतिकूलता नहीं। अपने मन को वश में करने वाले ही महात्मा माने गये हैं। मन को वश में करने का अर्थ मन को दबाना नहीं है, बल्कि मन को समझाना है। मन को समझाना, उसे प्रशिक्षित करना, तत्व के वास्तिविक स्वरूप की ओर जाना ही वास्तव में, मन को अपने वश में करना है। जिसका मन संवेग और वैराग्य से भरा है वही इस संसार से पार हो सकता है। जैसे घोड़े पर लगाम हो तो वह सीधा अपने गन्तव्य पर पहुँच जाता है। ऐसे ही मन पर यदि वैराग्य की लगाम हो तो वह सीधा अपने गन्तव्य मोक्ष तक ले जाने में सहायक होता है। जो मन पर लगाम लगाने का आत्म पुरुषार्थ करता है वही संयमी हो पाता है और वही कर्म के उदय को, उसके आवेग को झेल पाता है। इन्द्रियों को जीतना सेमीफाइनल है। और मन पर विजय पाना फाइनल है। इन्द्रियों को जीतने वाला सेमीफाइनल जीतता है और मन पर विजय पाने वाला फाइनल जीतता है। फाइनल जीतने पर पुरस्कार मिलता है। मन अदृश्य है किन्तु सबको अधीन में रखता है, संसार में नचा रहा है। मन और इन्द्रियों पर अपना अधिकार है तो मोक्षमार्ग पर जा सकते हैं। और इनके अधिकार में हम हैं तो मोह मार्ग पर चल रहे हैं। यह निर्णय स्वयं का है कि हमें अधिपति होना है या दास बने रहना है इनका। मन की आराधना छोड़कर हमें मन को आत्मा की आराधना की ओर लगाना है। धारणा बनाते ही धारण करने की क्रिया आरंभ हो जाती है। इन्द्रियाँ बूढ़ी होने पर भी मन जवान है वह काम कराता रहता है। इन्द्रियाँ और कषाय, ध्यान और गुप्ति से डरती हैं। मन का साथ देने से अविवेक काम करता है विवेक नहीं। मन की प्रतिकूल सोच सारे भावों को प्रतिकूल बनाती है। अत: मन को समझने की बात है, मन को समझाया जाता है। यह व्यवस्था विवेक के ऊपर आधारित है। मन में आई अनुभूति, उद्वेगों को अगर संयम के साथ विवेक से वश में कर लें तो क्रोध रूपी अग्नि मन में नहीं जल सकती और क्षमा भाव का उदय हो सकता है। मन को सन्तुलित करके रखा जाये तो उस पर काबू पाना आसान है। मन के ऊपर नियंत्रण असंयम से नहीं संयम से होता है। मन को वर्तमान की तरफ नहीं, वर्धमान की तरफ ले जाने की आवश्यकता है। जिनके जीवन में घृणा, ईर्ष्या, कलह-क्लेश, दुर्भावनाएँ रहती हैं वह व्यक्ति उतना ही अधिक मन से रुग्ण रोगी होता है। मन को चिकित्सा हेतु आवश्यक है कि आप अपने मन को दुर्भावनाओं से दूर रखें एवं सभी के प्रति मैत्री , प्रमोद, करुणा की भावना से मन को भरना होगा। जिस व्यक्ति का मन जितना अधिक चंचल होता है, उसका मन उतना ही अधिक अस्वस्थ रहता है। बारह सौ भावना भाने से मन नहीं लगता, बारह भावना भाना चालू कर दो अभी मन लग जायेगा। बाहर की ओर यदि मन जा रहा है तो निश्चित रूप से वह मन दूसरों का चाकर बनेगा और आपको वह बार-बार बाध्य करेगा। मन का विषय गौण रूप से बहुत कुछ है लेकिन मुख्य रूप से मन का विषय मान है। दुनिया में संघर्ष मन के माध्यम से हुआ करते हैं और हर्ष भी प्राय: करके मन के माध्यम से हुआ करते हैं। मन कभी भी समझना नहीं चाहता, मन तो हमेशा समझाना चाहता है उसी का नाम मान है। आत्मा समझना चाहती है तो आत्मा को कह दो कि मन की बात मत सुनो। फिर भी वह मन आत्मा को अपने घेराव में ले लेता है। मन आत्मा को अपने घेराव में लाता है और उससे नौकरी-चाकरी कराता रहता है। यदि सुख को प्राप्त करना चाहते हो तो मन को वशीभूत कर लो। मन स्वस्थ है तो सब कुछ स्वस्थ है और मन यदि अस्वस्थ है तो फिर कोई भी स्वस्थ हो ही नहीं सकता। कहते हैं, मन नहीं लग रहा है, ये बड़ी बीमारी है। सब कुछ लग रहा है और मन नहीं लग रहा ये क्या है? राजरोग बोलना चाहिए इसको। आत्मा तो मान लेती है लेकिन मन नहीं मानता है। मन कहाँ पर मानता है बताओ? मान मिलता है तो वह मान लेता है। मन नहीं माना बताओ कितनी मात्रा में चाहिए किलो में या टन में? मन का स्वभाव भूलना है उस भूल-भुलैया के साथ हम रहना नहीं चाहते हैं। जिस व्यक्ति को हम सारी बातें सुना दें, बता दें और वह भूल जाता है तो उस व्यक्ति के साथ रहना नहीं चाहिए। भूलने का स्वभाव मन का है आत्मा का नहीं। सबके ऊपर विश्वास करियो मन के ऊपर कभी भी विश्वास नहीं करियो, क्योंकि आँखों को धूल से बचा लो वो निर्मल रहेंगी, कानों को शब्दों से बचा लो वो निर्मल रहेंगे लेकिन मन को किससे-किससे बचाएँ? कोई न कोई आ जाता है और भूल भी जाता है। मन को काम में ले लेंगे तो वह शांत बैठ जायेगा लेकिन यह होता ही नहीं है। यह साहस की बात है। मन में जितना बल है, वचनों के बल से वह बहुत असीम है। वचनों में जितना बल है तन के बल से वह भी असीम है। तन का बल, धन के बल से असीम है। इसलिए धन से जो काम होता है वह बहुत कमजोर होता है। एक ही नियंत्रित मन चाहे तो वह सब कुछ काम कर सकता है। तन के मल को दूर किया जा सकता है। वाणी के मल को दूर किया जा सकता है, लेकिन मानसिक मल भी है, जिसे दूर करना बहुत कठिन हुआ करता है। उसके लिए साबुन सोड़ा कहाँ से लायें? एक मात्र अध्यात्म ऐसा साधन है जिसके द्वारा चित्तगत सारा का सारा मल दूर हो जाता है। वैज्ञानिकों न इस बात को स्वीकार कर लिया है, कि मन की चिकित्सा पहले अनिवार्य है, तन की चिकित्सा करें न भी करें तो चल सकता है | हमारी जो दूषित मानसिकता है उसको सत्साहित्य के माध्यम से परिमार्जित किया जा सकता है। मन की बात मानोगे तो हमेशा-हमेशा मन आपको नचायेगा। मन की बात मानने वाला महामना नहीं बन सकता। वैसे मन बहुत कमजोर है, वह इस अपेक्षा से कि उसका कोई अंग नहीं है लेकिन वह अंगअंग को हिला देता है। विचलित कर देता है। मन सबका नियन्ता बनकर बैठ जाता है। आत्मा भी इसकी चपेट में आ जाती है और अपने स्वभाव को भूल जाती है। इन्द्रियों को खुराक मिले या न मिले चल जाता है लेकिन मन को खुराक मिलनी चाहिए ऐसा यह मन है। मन भी बहुत कठोर होता है। ये ध्यान रखो मन के ऊपर भी घन पटकने वाले हम ही हैं। आत्मा को तो बचायेंगे लेकिन मन के ऊपर तो घन पटकना होगा हमें क्योंकि मन हिंसक होता है। स्वयं ही मर जाता है तथा दूसरे के लिए मरवा देता है। मन को आप काबू में रखो, आपकी शिक्षा बहुत कीमती होगी यदि मन को अधीन कर लिया तो। ध्यान रखो सबसे ज्यादा कमजोर और अनिष्टकारी कार्य हो सकता है तो वो मन के माध्यम से यहीं शिक्षा सभी ग्रन्थों में दी है। हमें ये चाहिए वो चाहिए इसमें कुछ नहीं रखा, रात दिन लग जाओ, मन को बचाओ, सुरक्षित रखो तथा साथ ही शरीर को भी ये बहुत बड़ा मौलिक धन है, संयमलब्धि स्थान को प्राप्त किया है तो इसी के माध्यम से। हमारा मन किसी न किसी के वशीभूत तो है तभी तो हमें ये चाहिए, ये चाहिए, इस प्रकार ये चाहता ही रहता है। इस चाह को पूर्ण करने की क्षमता किसी के पास नहीं इसे समझना चाहिए।
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  29. बुद्धि, मन विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार आप बुद्धि चलाओ तो समय बचाकर कुछ कर सकते हो। हमारी बुद्धि यदि हमारा साथ नहीं दे रही तो दूसरे की बुद्धि भी साथ नहीं देगी। मन का अर्थ बचपन है। जब बड़े हो जायेंगे तो मन काबू में आ जायेगा। यदि मन काबू में नहीं होता तो पचपन में भी बचपन ही रहता है। बच्चों जैसे ही हो जाते हैं। मन दिखता नहीं उसका नाम अंतरंग है वह भीतर रहता है लेकिन जो बहार दिखता है उस सबको वह वशीभूत कर लेता है। मन को जो वशीभूत कर लेते हैं वही हमारे आराध्य होते हैं। ऐसे आराध्य की आराधना करने वाले भक्त हो जाते हैं इस लिए मन को जिन्होंने जीत लिया है उनके पास जाया करो, गाड़ी मोटर नहीं है तो पैदल ही आया जाया करो। बुद्धि के माध्यम से समझे और पैरों से आचरण की ओर जायें। पैरों से यदि आचरण की ओर कदम नहीं बढ़ेगा तो मात्र बुद्धि से कुछ नहीं होने वाला।
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