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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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  1. संयम स्वर्ण महोत्सव

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Showing content with the highest reputation since 08/18/2020 in all areas

  1. ‼आहारचर्या*‼ *श्री तीर्थोदय प्रतिभास्थली* *रेवती रेंज इंदौर* *उत्तम शौच* _दिनाँक :२६/०८/२०२०_ *आगम की पर्याय,महाश्रमण युगशिरोमणि १०८ आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज* के आहारचर्या कराने का सौभाग्य _🟤 *ब्र. बहन सुष्मा दीदी जी, श्री लक्ष्मी चन्द्र जी जैन सिंघई(बामोरा) श्री विपुल जी जैन सिघंई, श्रीमति सुमन जी जैन सिघंई, प्रतीक जी जैन सिंघई ,सूवी जी जैन सिघंई श्री कुशल जी जैन गांधी श्रीमति बिदुशी जी जैन गांधी (उज्जैन वाले) रामचन्द्र नगर, इंदौर मध्यप्रदेश* 🟤_ वालो को एवं उनके परिवार को प्राप्त हुआ है। इनके पूण्य की अनुमोदना करते है। 💐🌸💐🌸 *भक्
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  2. जब सुयोग्य निम्मित मिलता है तो सभी विपरीत परिस्थितिओं के वावजूद भी अपना मन शांत रहता है....जैसे मंदिर, गुरु और सधर्मी बंधू ........जय जिनेन्द्र
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    आचार्य श्री १०८ विद्यासागर महाराज जी के प्रवचनो को मुनि श्री १०८ संधान सागर जी महाराज ने हस्त लिखत किया है | यहाँ पर उसका बारहवां भाव उपलब्ध है | बारहवें भाग में दिनांक 25.11.2018 से 3.03.2019 तक के प्रवचन है |
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  4. आगे विग्रहगति में आहारक और अनाहारक का नियम बतलाते हैं- एकं द्वौ त्रीन्वाऽनाहारकः ॥३०॥ अर्थ - विग्रह गति में जीव एक समय, दो समय अथवा तीन समय तक अनाहारक रहता है। English - During movement up to the last bend the soul remains non-assimilative for one, two or three instants. औदारिक, वैक्रियिक, आहारक इन तीन शरीरऔर छह पर्याप्तियों के योग्य पुद्गलों के ग्रहण करने को आहार कहते हैं। और शरीर के योग्य पुद्गलों के ग्रहण न करने को अनाहार कहते हैं। जो जीव एक मोड़ा लेकर उत्पन्न होता है, वह जीव एक समय तक अनाहारक रहता है। जो जीव दो मोड़ा लेकर उत्पन्न हो
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  5. दशलक्षण विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/parmarth-deshna/dashalakshan/
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  6. आज का दिन बड़ा महत्वपूर्ण दिन है। प्रारम्भ में जो रस आता है, उससे भी बहुत गुणा रस अन्तिम समय, उपसंहार होते समय भी आता है। आज का यह ब्रह्मचर्य धर्म आत्मा के साथ सम्बन्ध को लिए हुए है। ब्रह्मचर्य का मतलब सिर्फ यही नहीं कि चार संज्ञाओं में से मैथुन संज्ञा पर कंट्रोल करना। कथचित् मैथुन संज्ञा पर कंट्रोल को भी ब्रह्मचर्य का अंग कह सकते हैं। अपने रूप में उस प्रकार लवलीन होना जहाँ पर किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रहता। अपने आप में लीन होना कहो या ब्रह्मचर्य कही एक ही बात है। आत्मा की टेढ़ी चाल होने के कारण बाहर के द्रव्यों की याचना करता हुआ भ्रमण कर रहा है, दुख का अनुभव कर रहा है। जिस प्रकार कस्तूरी
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  7. Version 1.0.0

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    37 समयोंपदेश [Samyopdesh bhag-1.pdf]
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