Jump to content

Leaderboard

  1. Vidyasagar.Guru

    Vidyasagar.Guru

    Members


    • Points

      15

    • Content Count

      6,871


  2. संयम स्वर्ण महोत्सव

    • Points

      12

    • Content Count

      20,173


  3. Aashika jain

    Aashika jain

    Members


    • Points

      12

    • Content Count

      23


  4. shashi jain

    shashi jain

    Members


    • Points

      2

    • Content Count

      30



Popular Content

Showing content with the highest reputation since 09/17/2019 in all areas

  1. 3 points
    तप से गुरु का जीवन खिलता है, वाणी से प्यासो को जल मिलता है।। हमारे जीवन के हर कठिन प्रश्न का, गुरुवर, आपसे ही हल मिलता है।।
  2. 2 points
    खातेगांव! आचार्यश्री विद्यासागर जी और मूकमाटी पर पीएचडी करने वाले 12 शोधार्थियों की किताबों का रविवार को सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर में विमोचन हुआ। कार्यक्रम के संयोजक प्रवेश सेठी, प्रफुल्ल पाटनी ने बताया कि अब तक देश के विभिन्न प्रान्तों के 50 से ज्यादा शोधार्थियों ने आचार्यश्री और उनके द्वारा रचित मूकमाटी महाकाव्य पर पीएचडी की है। इन्ही में से 12 शोधार्थियों द्वारा जमा की गई थीसिस पर आधारित किताबों का विमोचन आचार्यश्री के ससंघ सानिध्य में किया गया। ट्रस्ट कमेटी के कार्याध्यक्ष संजय मेक्स, वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुरेश काला सहित अन्य पदाधिकारियों ने सभी शोधार्थियों को प्रशस्ति पत्र और साहित्य देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन ब्र संजय भैया ने किया नेमावर! आचार्यश्री विद्यासागर जी और मूकमाटी पर पीएचडी करने वाले 12 शोधार्थियों की किताबों का रविवार को सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर में विमोचन हुआ। कार्यक्रम के संयोजक प्रवेश जैन, प्रफुल्ल पाटनी ने बताया कि अब तक देश के विभिन्न प्रान्तों के 50 से ज्यादा शोधार्थियों ने आचार्यश्री और उनके द्वारा रचित मूकमाटी महाकाव्य पर पीएचडी की है। इन्ही में से 12 शोधार्थियों द्वारा जमा की गई थीसिस पर आधारित किताबों का विमोचन आचार्यश्री के ससंघ सानिध्य में किया गया। ट्रस्ट कमेटी के कार्याध्यक्ष संजय मेक्स, वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुरेश काला सहित अन्य पदाधिकारियों ने सभी शोधार्थियों को प्रशस्ति पत्र और साहित्य देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन ब्र संजय भैया ने किया। मुनिश्री संभवसागरजी ने भी आशीर्वचन दिए। जैन समाज के प्रवक्ता नरेंद्र चौधरी, पुनीत जैन (पट्ठा) ने बताया कि 5 अक्टूबर को विश्व शिक्षक दिवस के अवसर पर भी एक विशेष कार्यक्रम होगा, जिसमें देशभर के करीब 500 शिक्षक यहां उपस्थित होंगे। शोधार्थी जिनकी किताबों का विमोचन हुआ- • साधना सेठी कटारिया वस्त्रापुर अहमदाबाद: आचार्यश्री के विचारों का दार्शनिक अनुशीलन • बारेलाल जैन टीकमगढ़: हिंदी साहित्य की संत काव्य परंपरा के परिप्रेक्ष्य में आचार्य विद्यासागर के कर्तव्य का अनुशीलन • शालिनी गुप्ता कुसमी जिला बलरामपुर: भक्ति काव्य के मूल्य और आचार्य विद्यासागर का काव्य • माया जैन उदयपुर: आचार्य विद्यासागर व्यक्तित्व एवं काव्य कला • किरण जैन मनोरमा कॉलोनी सागर: जैन दर्शन के संदर्भ में मुनि श्री विद्यासागर जी के साहित्य का अनुशीलन • सुधीर जैन अरेरा कॉलोनी भोपाल: आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के साहित्य एवं श्रीमद्भगवद्गीता का तुलनात्मक अध्ययन • अनिल सिरवैया भोपाल: आचार्य विद्यासागर का साहित्य एक अनुशीलन • प्रशांत कुमार जैन राघोगढ़ जिला गुना: आधुनिक हिंदी काव्य के विकास में आचार्य विद्यासागर जी का योगदान • निधि गुप्ता गाजियाबाद: आचार्य विद्यासागर के साहित्य में जीवन मूल्य • रमाशंकर दीक्षित कटनी: आचार्य विद्यासागर केंद्रीत प्रमुख शोध ग्रंथों का अनुशीलन • सुनीता दुबे विदिशा: आचार्य विद्यासागर की लोक दृष्टि और उनके काव्य कलागत अनुशीलन • सुदाणी जल्पावी मोटाबारमण जिला अमरेली: मूकमाटी महाकाव्य में व्यक्त लोकोपयोगी विचार दिगम्बर जैनाचार्य सन्त शिरोमणि 108 श्री विद्यासागर महाराज के विपुल वाङ्मय सम्बन्धी शोधकार्य
  3. 2 points
    दिया ज्ञान का भंडार हमें किया सबके लिए तैयार हमें, गुरु की महिमा कैसे बतायुं, जिसने किया कृतज्ञ अपार हमें।।
  4. 2 points
    गुरु से बड़ा कोई वरदान नहीं, गुरु से महान कोई इंसान नही, बस साथ मिल जाये गुरुवर आपका उससे बड़ा और कोई सम्मान नहीं।।
  5. 2 points
    जीवन में जो राह दिखाए, सही तरह से चलना सिखाये, गलती को भी जो समझाये, वह हमारे गुरूवर कहलाये।।।
  6. 1 point
  7. 1 point
  8. 1 point
  9. 1 point
    नया जीवन दिया हमको नयी शक्ति का संचार किया सर झुका है गुरु के आगे, उन्होंने ही हर बेड़ा पार किया।।
  10. 1 point
  11. 1 point
    *‼आहारचर्या*‼ *श्री सिद्धयोदय नेमावर* _दिनाँक :३०/०९/२०१९_ *आगम की पर्याय महाश्रमण युगशिरोमणि १०८ आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज* _को आहार दान का सौभाग्य *श्रीमान विजय जी जैन (भोलू भैया) सागर वाले इंदौर निवासी* वालो को एवं उनके परिवार को प्राप्त हुआ है।_ इनके पूण्य की अनुमोदना करते है। 💐🌸💐🌸 *भक्त के घर भगवान आ गये* 🌹🌹🌹🌹 *_सूचना प्रदाता-:श्री अक्षय जी जैन खातेगांव_* 🌷🌷🌷 *अंकुश जैन बहेरिया *प्रशांत जैन सानोधा
  12. 1 point
    गुरू ज्ञान के प्रकाश से , मन आलोकित कर देता है, विद्या का धन देकर , जीवन सार्थक कर देता है।।
  13. 1 point
    बुरे वक्त में भी जो बनता सहारा है, दुनिया में वह एक ही हमारा है, लाख होंगे साथ खड़े रहने वाले, पर हमे तो हमारा गुरु ही सबसे प्यारा है।।
  14. 1 point
    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: आचार्य विद्यासागर जी, रवीन्द्र जैन
    सिद्ध भक्ति भक्ति पाठ : पूज्यपाद भक्तियाँ (संस्कृत) का आचार्य श्री द्वारा पद्यानुवाद गायन : रवीन्द्र जैन
  15. 1 point
    मोह नींद में सोये हुए संसारी जीवों के लिए यह महान् पर्व पाठ दे रहा है। अगर ये दस दिन ३६५ दिन में से व्यर्थ चले जाते हैं, तो पूरा साल व्यर्थ चला जाता है। दुनियाँ की कोई भी शक्ति आध्यात्म तक नहीं पहुँचा सकती है। पूर्व संस्कार के वश कोई कवि, विद्वान् बन सकता है, पर आत्मानुभवी नहीं हो सकता है, क्योंकि पूर्व में आत्मानुभूति की ही नहीं। आत्मा का अनुभव (Practical) करने पर होता है। ये दस दिन शिक्षा के लिए नहीं हैं, दीक्षा के लिए हैं। इन दस दिनों में दीक्षा लेने का अभ्यास होता है। दीक्षा में मात्र अनुभव की बातें आती हैं। मात्र आत्मचिंतन करना होता है। इस पयुर्षण पर्व में संसार के मूल कारण आठ कर्म छूट जाते हैं, टूट जाते हैं, भस्म हो जाते हैं, कहा भी है - पर्वराज यह आ गया, चला जायेगा काल। परन्तु कुछ भी ना मिला, टेढ़ी हमारी चाल ॥ हमारी चाल टेढ़ी है, पर्वराज न आता है, न जाता है। हम चले जा रहे हैं। हमको सांसारिक सम्बन्धों से छुट्टी लेनी है, परिश्रम से नहीं। व्यवहार की दृष्टि से क्षमा धर्म के लिए आज का दिन नियुक्त किया है आचार्यों ने क्षमा धर्म की बड़ी महत्ता बताई है। इसमें एक पैसा भी नहीं लगता है। कहा है कि करोड़ नारियल चढ़ाने में जितना फल मिलता है, उतना फल एक स्तुति करने में मिलता है, और जितना फल करोड़ स्तुति करने से मिलता है, उतना एक बार जाप करने से मिलता है, जितना फल करोड़ जाप करने से मिलता है, उतना फल एक बार मन, वचन, काय को एकाग्रकर ध्यान करने से होता है। मात्र परिणाम की विशेषता है। शारीरिक, वाचनिक, मानसिक क्रिया जितनी-जितनी निर्मल होती जाती है। उतना-उतना फल मिलता जाता है। कोटि बार ध्यान करने का जितना फल मिलता है, उतना फल एक क्षमा करने से मिल जाता है, वैरी को देखकर आँख में ललाई फूटती है। हमें क्षमा से तो वैर भाव नहीं रखना चाहिए। मोक्ष के लिए कारण भूत साक्षात् कोई है तो वह क्षमा धर्म ही है। आप आधि-व्याधि से तो दूर हो सकते हैं, पर उपाधि से दूर होना मुश्किल है, मैं पना नहीं निकलता। आधि मानसिक चिन्ता और व्याधि शारीरिक बीमारी है, उपाधि बौद्धिक विकार है पर उपाधि को छोड़ना इनसे ऊपर है, समाधि आध्यात्मिक है। क्षमाधारी जीव अनन्तचतुष्टय का अनुभव करते हैं। पर अन्य ? घाति चतुष्टय का। वहाँ सुख अनन्त है, यहाँ दुख अनन्त है। आत्मा के अहित विषय कषाय नहीं करना ? तभी वास्तविक क्षमा है।
  16. 1 point
  17. 1 point
  18. 1 point
    सुबह आहारचर्या से पहले रविवार को दोपहर में भी होते हैं
  19. 1 point
  20. 1 point
  21. 1 point
    दिनांक - 22 अप्रैल 2019 स्थान - प्रतिबहस्थली दयोदय जबलपुर संधान सागर जी के केश लॉच.mp4
  22. 1 point
  23. 1 point
    Namostu gurudev ji Jai Jai Gurudev ji namostu Gurudev ji
  24. 1 point
  25. 1 point
  26. 1 point
    मुनि दीक्षा दीक्षा लेने वाले साधक का नाम एवं तिथि/तारीख/स्थान विशेष की जानकारी 1. दिनांक-८ मार्च, १९८०, शनिवार, चैत्र कृष्ण ६, वि० सं० २०३६, स्थान-सिद्धक्षेत्र द्रौणगिरि जी, जिला-छतरपुर (म० प्र०) में प्रथम बार मुनि दीक्षा प्रदान की मुनिश्री समयसागर जी 2. दिनांक-१५ अप्रैल, १९८०, मंगलवार, वैशाख कृष्ण अमावस्या वि० सं० २०३७, स्थान-मोराजी, सागर (म० प्र०) में २ मुनि दीक्षायें प्रदान की मुनिश्री योगसागर जी मुनिश्री नियमसागर जी 3. दिनांक-२९ अक्टूबर, १९८१, मंगलवार, कार्तिक शुक्ल २, विक सं० २०३८, स्थान-सिद्धक्षेत्र नैनागिरि जी, जिला-छतरपुर (मः प्र०) में २ मुनि दीक्षायें प्रदान कीं मुनिश्री चेतनसागर जी मुनिश्री ओमसागर जी 4. दिनांक-२० अगस्त, १९८२, शुक्रवार, भाद्रपद शुक्ल २, वि० सं० २०३९, स्थान-सिद्धक्षेत्र नैनागिरिजी, जिला-छतरपुर (म० प्र०) में ३ मुनि दीक्षायें प्रदान कीं मुनिश्री क्षमासागर जी* मुनिश्री गुप्तिसागर जी मुनिश्री संयमसागर जी* 5. दिनांक-२५, सितम्बर १९८३, रविवार, आश्विन कृष्ण ३, वि० सं० २०३४, स्थान-ईसरी, जिला-गिरिडीह (बिहार) (वर्तमान-झारखंड) में ५ मुनि दीक्षायें प्रदान कीं मुनिश्री सुधासागर जी मुनिश्री समतासागर जी मुनिश्री स्वभावसागर जी * मुनिश्री समाधिसागर जी मुनिश्री सरलसागर जी 6. दिनांक-१ जुलाई १९८५, सोमवार, आषाढ़ शुक्ल १४, वि० सं० २०४२, स्थान-श्री दिगः जैन अतिशय क्षेत्र अहारजी, जिला टीकमगढ़ (म० प्र०) में १ मुनि दीक्षा प्रदान की मुनिश्री वैराग्यसागर जी* 7. दिनांक-३१ मार्च, १९८८, गुरुवार, चैत्र शुक्ल १३ (महावीर जयंती) वि० सं० २०४५, स्थान-श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र सोनागिरि जी, जिला-दतिया (म० प्र०) में ८ मुनि दीक्षायें प्रदान की मुनिश्री प्रमाणसागर जी मुनिश्री आर्जवसागर जी मुनिश्री मार्दवसागर जी मुनिश्री पवित्रसागर जी मुनिश्री उत्तमसागर जी मुनिश्री चिन्मयसागर जी मुनिश्री पावनसागर जी मुनिश्री सुखसागर जी 8. दिनांक-१६ अक्टूबर १९९७, गुरुवार, आश्विन शुक्ल-१५ (शरद पूर्णिमा), वि० सं० २०५४, स्थान-सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर जी, जिला-देवास (म० प्र०) में १० मुनि दीक्षायें प्रदान कीं मुनिश्री अपूर्वसागर जी* मुनिश्री प्रशांतसागर जी मुनिश्री निर्वेगसागर जी मुनिश्री विनीतसागर जी मुनिश्री निर्णयसागर जी मुनिश्री प्रबुद्धसागर जी मुनिश्री प्रवचनसागर जी* मुनिश्री पुण्यसागर जी मुनिश्री पायसागर जी मुनिश्री प्रसादसागर जी 9. दिनांक-११ फरवरी १९९८, बुधवार, माघ शुक्ल १५ (पूर्णिमा) वि० सं० २०५४, स्थान-मुक्तागिरिजी, जिला-बैतूल (म० प्र०) में ९ मुनि दीक्षायें प्रदान कीं मुनिश्री अभयसागर जी मुनिश्री अक्षयसागर जी मुनिश्री प्रशस्तसागरजी मुनिश्री पुराणसागर जी मुनिश्री प्रयोगसागर जी मुनिश्री प्रबोधसागर जी मुनिश्री प्रणम्यसागरजी मुनिश्री प्रभातसागर जी मुनिश्री चन्द्रसागर जी 10. दिनांक-२२ अप्रैल, १९९९, गुरुवार, वैशाख शुक्ल ७, वि० सं० २०५६, स्थान-सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर जी, जिला-देवास (म० प्र०) में २३ मुनि दीक्षायें प्रदान कीं मुनिश्री ऋषभसागरजी मुनिश्री अजितसागरजी मुनिश्री संभवसागरजी मुनिश्री अभिनंदनसागर जी मुनिश्री सुमतिसागर जी* मुनिश्री पद्मसागर जी मुनिश्री सुपार्श्वसागरजी मुनिश्री चंद्रप्रभसागर जी मुनिश्री पुष्पदंतसागर जी मुनिश्री शीतलसागर जी मुनिश्री श्रेयांससागर जी मुनिश्री पूज्यसागर जी मुनिश्री विमलसागर जी मुनिश्री अनंतसागर जी मुनिश्री धर्मसागर जी मुनिश्री शान्तिसागर जी* मुनिश्री कुन्थुसागर जी मुनिश्री अरहसागर जी मुनिश्री मल्लिसागर जी मुनिश्री सुव्रतसागर जी मुनिश्री नमिसागर जी मुनिश्री नेमीसागर जी मुनिश्री पार्श्वसागर जी 11. दिनांक-२१ अगस्त, २००४, शनिवार, श्रावण शुक्ल ६, वि० सं० २०६१, स्थान-दयोदय तीर्थ तिलवारा घाट, जबलपुर (म० प्र०) में २५ मुनि दीक्षायें प्रदान की मुनिश्री वीरसागर जी मुनिश्री क्षीरसागर जी मुनिश्री धीरसागर जी मुनिश्री उपशमसागर जी मुनिश्री प्रशमसागर जी मुनिश्री आगमसागर जी मुनिश्री महासागर जी मुनिश्री विराटसागर जी मुनिश्री विशालसागर जी मुनिश्री शैलसागर जी मुनिश्री अचलसागर जी मुनिश्री पुनीतसागर जी मुनिश्री वैराग्यसागर जी मुनिश्री अविचलसागर जी मुनिश्री विसदसागर जी मुनिश्री धवलसागर जी मुनिश्री सौम्यसागर जी मुनिश्री अनुभवसागर जी मुनिश्री दुर्लभसागर जी मुनिश्री विनम्रसागर जी मुनिश्री अतुलसागर जी मुनिश्री भावसागर जी मुनिश्री आनंदसागर जी मुनिश्री अगम्यसागर जी मुनिश्री सहजसागर जी 12. दिनांक-१० अगस्त, २०१३, शनिवार, श्रावण शुक्ल ४, वि० सं० २०७०, स्थान-श्री शान्तिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र रामटेक जी, जिला-नागपुर (म० प्र०) में २४ मुनि दीक्षायें प्रदान की मुनिश्री निस्वार्थसागर जी मुनिश्री निर्दोषसागर जी मुनिश्री निर्लोभसागर जी मुनिश्री नीरोगसागर जी मुनिश्री निर्मोहसागर जी मुनिश्री निष्पक्षसागर जी मुनिश्री निष्पृहसागर जी मुनिश्री निश्चलसागर जी मुनिश्री निष्कम्पसागर जी मुनिश्री निष्पन्दसागर जी मुनिश्री निरामयसागर जी मुनिश्री निरापदसागर जी मुनिश्री निराकुलसागर जी मुनिश्री निरुपमसागर जी मुनिश्री निष्कामसागर जी मुनिश्री निरीहसागर जी मुनिश्री निस्सीमसागर जी मुनिश्री निर्भीकसागर जी मुनिश्री नीरागसागर जी मुनिश्री नीरजसागर जी मुनिश्री निकलंकसागर जी मुनिश्री निर्मदसागर जी मुनिश्री निर्सगसागर जी मुनिश्री निस्संगसागर जी 13. दिनांक-१६ अक्टूबर, २०१४, गुरुवार, कार्तिक शुक्ल ८ वि० सं० २०७१, स्थान-श्री दिगम्बर जैन तीर्थ ‘शीतलधाम' विदिशा (म प्र०) में ४ मुनि दीक्षायें प्रदान कीं मुनिश्री शीतलसागर जी मुनिश्री शाश्वतसागर जी मुनिश्री समरससागर जी मुनिश्री श्रमणसागर जी 14. दिनांक-३१ जुलाई, २०१५, शुक्रवार, द्वितीय आषाढ़ शुक्ल ८ वि० सं० २०७२, स्थान-श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र बीनाबारहा, जिला-सागर (म० प्र०) में तीन मुनि दीक्षायें प्रदान कीं मुनिश्री संधानसागर जी मुनिश्री संस्कारसागर जी निश्री ओंकारसागर जी 15. दिनांक - २८नवम्बर २०१८ बुधवार, मार्गशीर्ष, कृष्ण पक्ष, षष्ठी, पुष्य नक्षत्र, कृष्ण पक्ष, ब्रह्म योग, स्थान - दयोदय गौशाला ललितपुर (उ.प्र) मुनिश्री निर्ग्रन्थसागर जी मुनिश्री निर्भ्रान्तसागर जी मुनिश्री निरालससागर जी मुनिश्री निराश्रवसागर जी मुनिश्री निराकारसागर जी मुनिश्री निश्चिन्तसागर जी मुनिश्री निर्माणसागर जी मुनिश्री निशंकसागर जी मुनिश्री निरंजन सागर जी मुनिश्री निर्लेपसागर जी
  27. 1 point
    अन्तिम तीर्थकर भगवान महावीर की दार्शनिक पीठिका पर अनेक जैनाचायों ने समय-समय पर जीवन विज्ञान से सम्बन्धित अनेकविध काव्य, कलाविधाओं से संपोषित साहित्य रचकर भारतीय संस्कृति की विश्व पटल पर विशिष्ट पहचान दी है। प्रेरणा - मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी ससंग प्रसतुति- क्षुल्लक धैर्यसागर उसी परम्परा में २०वीं-२१वीं शताब्दी के साहित्य जगत में एक नये उदीयमान नक्षत्र के रूप में जाने-पहचाने जाने वाले शब्दों के शिल्पकार, अपराजेय साधक, तपस्या की कसौटी, आदर्श योगी, ध्यानध्याता-ध्येय के पर्याय, कुशल काव्य शिल्पी, प्रवचन प्रभाकर, अनुपम मेधावी, नवनवोन्मेषी प्रतिभा के धनी, सिद्धांतागम के पारगामी, वाग्मी, ज्ञानसागर के विद्याहंस, प्रभु महावीर के प्रतिबिंब, महाकवि, दिगम्बराचार्य श्री विद्यासागरजी की आध्यात्मिक छवि के कालजयी दर्शन, दर्शक को आनंद से भर देता है। सम्प्रदाय मुक्त भक्त हो या दर्शक, पाठक हो या विचारक, अबाल-वृद्ध, नर-नारी उनके बहुमुखी चुम्बकीय व्यक्तित्व-कृतित्व को आदर्श मानकर उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारकर अपने आपको धन्य मानते हैं। माता-पिता की द्वितीय सन्तान किन्तु अद्वितीय कन्नड़ भाषी बालक विद्याधर की होनहार छवि को देख पिताजी ने कन्नड़ भाषा के विद्यालय में पढ़ाया। हिन्दीअंग्रेजी भी सीखी, आत्मा के दिव्य आध्यात्मिक संस्कारवयवृद्धि के साथ-साथ स्वयं जागृत होने लगे। ९ वर्ष की उम्र में जैनाचार्य शान्तिसागर जी के कथात्मक प्रवचनों से वैराग्य का बीजारोपण हुआ और धर्म-अध्यात्म में रुचि बढ़ती गई तथा २० वर्ष की उम्र में घर-परिवार के परित्याग का कठिन असिधारा व्रत ले निकल पड़े शाश्वत सत्य का अनुसन्धान करने के लिए। १९९९, गोम्मटगिरी, इन्दौर राजस्थान प्रान्त के अजमेर जिले के उपनगर मदनगंज-किशनगढ़ में सन् १९६७ मई/जून माह में नियति ने भ्रमणशील पगथाम लिए और पुरुषार्थी युवा ब्रह्मचारी गौरवणीं ज्ञानपिपासु विद्याधर अष्टगे को मिला दिया ज्ञानमूर्ति चारित्र विभूषण महाकवि ज्ञानसागर जी महामुनिराज से। गुरुभक्ति-समर्पण से गुरुकृपा का प्रसाद पाकर ३0 जून १९६८ को अजमेर में सर्व पराधीनता को छोड़ दिगम्बर मुनि बनकर शाश्वत सत्य की अनुभूति में तपस्यारत हो गए। जो धरती/काष्ठ के फलक पर आकाश को ओढ़ते हैं। यथाजात बालकवत् निर्विकरी, अनियत विहारी, अयाचक वृत्ति के धनी, भक्तों के द्वारा दिन में एक बार दिया गया बिना नमक-मीठे के, बिना हरी वस्तु के, बिना फलमेवे के सात्विक आहार दान ही लेते हैं, वो भी मात्र ज्ञानध्यान-तप-आराधना के उद्देश्य से। अहिंसा धर्म की रक्षार्थ अहर्निश सजग, करुण हृदयी मुनिवर श्री जी संयम उपकरण के रूप में सदा कोमल मयूर पिच्छी साथ रखते हैं, जिससे अपनी क्रियाओं में मृदु परिमार्जन करके जीवदया पालन से सह-अस्तित्व का आदर्श उपस्थित कर रहे हैं एवं शुचिता हेतु नारियल के कमण्डल के जल का उपयोग करते हैं, इसके अतिरिक्त तृणमात्र परिग्रह भी नहीं रखते। आपकी स्वावलम्बी, निर्मोही,समता ,सरलता सहिष्णुता की पराकाष्ठा के जीवन्त दर्शन प्रत्येक दो माह में दाढ़ी-मूछ-सिर के केशों को हाथों से घास-फ्रेंस के समान उखाड़कर अलग करते हुए होते हैं। आप अस्नानव्रत संकल्पी होने के बावजूद, ब्रह्मचर्य की तपस्या से आपने तन-मनवचन सदा पवित्र-सुगन्धित दैदीप्यमान रहते हैं। १९९९, गोम्मटगिरी इन्दौर-श्रीमान् अटल बिहारी बाजपेयी पूर्व प्रधानमंत्री, भारत सरकार एवं सांसद (वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष) सुमित्रा महाजन आपकी साधना-ज्ञान-ध्यान-चिन्तन गुरु के द्वारा दिए गए नाम-पद के सार्थक संज्ञा के पर्याय बन गए हैं। अलौकिक कृतित्व :- ऐसे दिव्य आचार-विचार-मधुर व्यवहार से आचार्य शिरोमणि की जीवन रूपी किताब का हर पन्ना स्वर्णिम भावों एवं शब्दों से भरा हुआ है, जिसे कभी भी कहीं भी कितना ही पढ़ो व्यक्ति थकता नहीं, उनको पढ़ने वाला यही कहते पाया जाता है कि आचार्य श्री जी के दिव्य दर्शन करते वक्त नजर हटती नहीं-उठने का मन नहीं करता, ऐसा लगता है मानो प्रभु महावीर जीवन्त हो उठे हों। यही कारण है कि आपके दिव्य तेजोमय आभा मण्डल के प्रभाव से उच्च शिक्षित युवा-युवतियाँ जवानी की दहलीज पर आपश्री के चरणों में सर्वस्व समर्पण कर बैठे। जिनमें भारत के १० राज्यों के युवक-युवतियों को १२० दिगम्बर मुनि, १७२ आर्यिकाएँ (साध्वियाँ), ६४ क्षुल्लक (साधक), ३ क्षुल्लिका (साध्वियाँ), ५६ ऐलक (साधक) की दीक्षा देकर मानव जन्म की सार्थक साधना करा रहे हैं। इनके अतिरिक्त आपके निर्देशन में सहस्त्रार्ध बाल ब्रह्मचारी भाई-बहन साधना के क्रमिक सोपानों पर साधना को साध रहे हैं एवं आपश्री के नियपिकाचार्यत्व में ३0 से अधिक साधकों ने जीवन की संध्या बेला में आगमयुक्त विधि से सल्लेखना पूर्वक समाधि धारण कर जीवन के उद्देश्य को सार्थक किया है। महापुरुष का सार्वभौमिक कृतित्व :- ज्ञान-ध्यान-तप के यज्ञ में आपने स्वयं को ऐसा आहूत किया कि अल्पकाल में ही प्राकृत-संस्कृत-अपभ्रंशहिन्दी-अंग्रेजी-मराठी-बंगाली-कन्नड़ भाषा के मर्मज्ञ साहित्यकार के रूप में प्रसिद्ध हो गए। (I)आपने प्राचीन जैनाचायों के २५ प्राकृत-संस्कृत ग्रन्थों का हिन्दी भाषा में पद्यानुवाद कर पाठक को सरसता प्रदान की है १.समयसार (प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामीकृत) पद्यानुवाद २.प्रवचनसार (प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामीकृत) पद्यानुवाद ३.नियमसार (प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामीकृत) पद्यानुवाद ४.पञ्चास्तिकाय (प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामीकृत) पद्यानुवाद ५.अष्टप्पाहुड(प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामी कृत) पद्यानुवाद ६.बारसाणुवेक्खा (प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामी कृत) पद्यानुवाद ७.समयसार कलश (संस्कृत, अमृतचंदाचार्यकृत) पद्यानुवाद ८.इष्टोपदेश प्र.(संस्कृत,आ. पूज्यपादकृत) बसंततिलका पद्यानुवाद ९.इष्टोपदेश द्वि.(संस्कृत,आ. पूज्यपादकृत)ज्ञानोदय पद्यानुवाद १o.समाधिशतक (संस्कृत,आ. पूज्यपादकृत) पद्यानुवाद ११.नव भक्तियाँ(संस्कृत,आ. पूज्यपादकृत) पद्यानुवाद १२.स्वयंभूस्त्रोत(संस्कृत,आ.समन्तभद्रकृत) पद्यानुवाद १३.रत्नकरण्डक श्रावकाचार (संस्कृत,आ.समन्तभद्रकृत) पद्यानुवाद १४.आप्त मीमांसा(संस्कृत,आ. समन्तभद्रकृत) पद्यानुवाद १५.आप्तपरीक्षा (संस्कृत,आ.समन्तभद्रकृत) पद्यानुवाद १६.द्रव्यसंग्रह प्र.(प्राकृत,आ.नेमिचन्द्र कृत) बसंततिलका पद्यानुवाद १७.द्रव्यसंग्रह द्वि.(प्राकृत, आ.नेमिचन्द्रकृत) ज्ञानोदय पद्यानुवाद १८.गोम्मटेश अष्टक(प्राकृत,आ.नेमिचन्द्रकृत) पद्यानुवाद १९.योगसार (अपभ्रंश,आ.योगेन्द्रदेवकृत) पद्यानुवाद २0.समणीसुत (प्राकृत,संस्कृत,जिनेन्द्रवर्णीद्वारा संकलित) पद्यानुवाद २१.कल्याणमन्दिर स्तोत्र (संस्कृत,आ.कुमुदचन्द्रकृत) पद्यानुवाद २२.एकीभाव स्तोत्र (संस्कृत,आ.वादीराज कृत) पद्यानुवाद २३.जिनेन्द्र स्तुति (संस्कृत,पात्र केसरी कृत) पद्यानुवाद २४.आत्मानुशासन (संस्कृत, आ.गुणभद्रकृत) पद्यानुवाद २५.स्वरूप सम्बोधन (संस्कृत,आ. अकलंक कृत) पद्यानुवाद (II)आपने राष्ट्रभाषा हिन्दी में प्रेरणादायक युगप्रवर्तक महाकाव्य 'मूकमाटी' का सर्जन कर साहित्य जगत् में चमत्कार कर दिया है। जिसे साहित्यकार 'फ्यूचर पोयट्री' एवं श्रेष्ठ दिग्दर्शक के रूप में मानते हैं। विद्वानों का मानना है कि भवानी प्रसाद मिश्र को सपाटबयानी, अज्ञेय का शब्द विन्यास, निराला की छान्दसिक छटा, पन्त का प्रकृति व्यवहार, महादेवी की मसृष्ण गीतात्मकता, नागार्जुन का लोक स्पन्दन, केदारनाथ अग्रवाल की बतकही वृत्ति, मुक्तिबोध की फैंटेसी संरचना और धूमिल की तुक संगति आधुनिक काव्य में एक साथ देखनी हो तो वह'मूकमाटी' में देखी जा सकती है। ५ नवंबर, २oo३ अमरकंटक-माननीय भैरोसिंह शेखावत, उपराष्ट्रपति, भारत सरकार १४/१o/२o१६, भोपाल-श्रीमान् नरेन्द्र मोदी जी, वर्तमान प्रधानमंत्री, भारत सरकार सम्प्रति साहित्य जगत् 'मूकमाटी' महाकाव्य को नये युग का महाकाव्य के रूप में समादृत करता है। यही कारण है कि 'मूकमाटी' महाकाव्य के दो अंग्रेजी रूपान्तरण, दो मराठी रूपान्तरण, एक कन्नड़, एक बंगला, एक गुजराती रूपान्तरण हो चुका है एवं उर्दू व जापानी भाषा में अनुवाद का कार्य चल रहा है। प्राकृत महाकाव्य पर अनेकों स्वतन्त्र आलोचनात्मक ग्रन्थों के अतिरिक्त ४ डी.लिट्, २२ पी.एच. डी., ७ एम.फिल के शोधप्रबन्ध तथा २ एम. एड. और ६ एम.ए. के लघु शोध प्रबन्ध लिखे जा चुके/रहे हैं। इस कालजयी कृति पर अब तक भारत के विख्यात ३०० से अधिक समालोचकों ने आलोडन-विलोडन किया है तथा उस अपूर्व साहित्यिक सम्पदा को प्रसिद्ध विद्वान डॉ. प्रभाकर माचवे एवं आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी के सम्पादकत्व में 'मूकमाटी मीमांसा' नामक ग्रन्थ के रूप में पृथक्पृथक् तीन खण्डों में भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन ने प्रकाशित किए हैं। (III)आपने नीति-धर्म-दर्शन-अध्यात्म विषयों पर संस्कृत भाषा में ७ शतकों और हिन्दी भाषा में १२ शतकों का सर्जन किया है, जो पृथक्-पृथक् एवं संयुक्त रूप से प्रकाशित हुए हैं संस्कृत शतकम्- १.श्रमण शतकम् २.निरंजन शतकम् ३.भावना शतकम् ४.परीषहजय शतकम् ५.सुनीति शतकम् ६.चैतन्य चन्द्रोदय शतकम् ७.धीवरोदय शतकम् ९.पूर्णीदय शतक ८.सूर्योदय शतक ९.सर्वोदय शतक १०.जिनस्तुति शतक हिन्दी शतक- १.निजानुभव शतक २.मुक्तक शतक ३.श्रमण शतक ४.निरंजन शतक ५.भावना शतक ६.परीषहजय शतक ७.सुनीति शतक ९.दोहदोहन शतक १०.पूर्णोदय शतक ११.सूर्योदय शतक १२.सर्वोदय शतक १३.जिन्स्तुति शतक (IV)आपके शताधिक अमृत प्रवचनों के ५० संग्रह ग्रन्थ भी पाठकों के लिए उपलब्ध हैं एवं त्रिसहस्राधिक प्रवचनावली अप्रकाशित हैं। (V)आपके द्वारा विरचित हिन्दी भाषा में लघु कविताओं के चार संग्रह ग्रन्थ-"नर्मदा का नरम ककर, तोता क्यों रोता, डूबोमत लगाओ डुबकी, चेतना के गहराव में" ये प्रकाशित कृतियाँ साहित्य जगत् में काव्य सुषमा को विस्तारित कर रही हैं। (VI)आपने संस्कृत, हिन्दी के अतिरिक्त कन्नड़, बंगला, अंग्रेजी, प्राकृत भाषा में भी काव्य रचनाओं का सर्जन किया है। साथ ही 'आचार्य शान्तिसागर जी, आचार्यजी' की परिचयात्मक स्तुतियों की रचना एवं संस्कृत, हिन्दी में शारदा स्तुति की रचना की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र जी मोदी, मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री श्रीमान् शिवराज सिंह जी चौहान एवं रक्षामंत्री श्रीमान् मनोहर पर्रीकर (VII)आपने जापानी छन्द की छायानुसार सहस्राधिक हाईकू (क्षणिकाओं) का सर्जन कर साहित्य क्षेत्र में अपनी अनोखी प्रतिभा के प्रातिभ से परिचय कराया है। राष्ट्रीय विचार सम्प्रेरक और सम्पोषक के रूप में प्रसिद्ध आचार्य श्री जी ने अपने विचारों से, भारती संस्कृति के गौरव को बढ़ाया है। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, गुजरात आदि प्रदेशों की लगभग ५० हजार किलोमीटर की पदयात्रा कर राष्ट्रीयता एवं मानवता की पहरेदारी में कदमदर-कदम आदर्श पदचिहों को स्थापित किया है। आपकी अनेकान्ती स्याद्वादमयी वाणी सम्प्रेरित करती है-(क) भारत में भारतीय शिक्षा पद्धति लागू हो। (ख) अंग्रेजी नहीं भारतीय भाषा में हो व्यवहार। (ग) छात्र-छात्राओं की शिक्षा पृथक्पृथक् हो। (घ) विदेशी गुलामी का प्रतीक 'इण्डिया' नहीं, हमें गौरव का प्रतीक ' भारत' नाम देश का चाहिए। (ड) नौकरी नहीं व्यवसाय करो। (च) चिकित्सा : व्यवसाय नहीं सेवा है। (छ) स्वरोजगार को सम्वद्धित करो। (ज) बैंकों के भ्रमजाल से बचो और बचाओ। (झ) खेतीबाड़ी सर्वश्रेष्ठ। (ज) हथकरघा स्वावलम्बी बनने का सोपान। (ट) भारत की मर्यादा साड़ी। (ठ) गौशालाएँ जीवित कारखाना। (ड) माँस निर्यात देश पर कलंक। (ढ़) शत-प्रतिशत मतदान हो। (ण) भारतीय प्रतिभाओं का निर्यात रोका जाए, आदि। उपरोक्त ज्वलन्त प्रासंगिक विषयों पर जब आपकी दिव्य ओजस्वी वाणी प्रवचन सभा में शंखनाद करती है तब सहस्रों श्रोतागण करतल ध्वनि के साथ विस्तृत पाण्डाल को जयकारों से गुंजायमान कर पूर्ण समर्थन कर परिवर्तन चाहते हैं। अहिंसा के पुजारी आचार्य श्री का दयालु हृदय तब सिसक-सिसक उठा जब उन्होंने देखा कृषि प्रधान अहिंसक देश में गौवंश आदि पशुधन को नष्ट कर माँस निर्यात किया जा रहा है तब उन्होंने हिंसा के ताण्डव के बीच अहिंसा का शंखनाद किया गोदाम नहीं-गौधाम चाहिए। भारत अमर बने- अहिंसा नाम चाहिए। घी-दूध-मावा निर्यात करो। राष्ट्र की पहचान बने ऐसा काम चाहिए। जो हिंसा का विधान करे, वह सच्चा संविधान सार नहीं। जो गौवंश काट माँस निर्यात करे, वह सच्ची सरकार नहीं। (१)अहिंसा के विचारों को साकार रूप देने के लिए आपने प्रेरणा दी-आशीवाद प्रदान किया। फलस्वरूप भारत के पाँच राज्यों में ७२ गौशालाएँ संचालित हुई जिनमें अद्यावधि एक लाख से अधिक गौवंश को कत्लखानों में कटने से बचाया गया। (२)प्रदूषण के युग में बीमारियों का अम्बार और व्यावसायिक चिकित्सा के विकृत स्वरूप के कारण गरीब मध्यम वर्ग चिकित्सा से वंचित रहने लगा तो इस अव्यावहारिक परिस्थिति से आहत-दयाद्र आचार्य श्री की पावन प्रेरणा से सागर (म.प्र.) में ‘‘ भाग्योदय तीर्थ धर्मार्थ चिकित्सालय' की स्थापना हुई। प्रतिभास्थली, जबलपुर (३)सुशासन-प्रशासन के लिए सर्वोदयी राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत आचार्य श्री जी की लोकमंगल दायी प्रेरणा से पिसनहारी मढ़ियाजी जबलपुर एवं दिल्ली में ‘प्रशासनिक प्रशिक्षण केन्द्र" की स्थापना हुई। हथकरधा (४)बालिका शिक्षा ने जोर पकड़ा किन्तु व्यावसायिक संस्कार विहीन शिक्षण ने युवतियों को दिग्भ्रमित कर कुल-परिवार-समाज-संस्कृति के संस्कारों से रहित सा कर दिया। ऐसी दु:खदायी परिस्थिति को देख आचार्य श्री जी की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से देश-समाज के समक्ष आधुनिक एवं संस्कारित शिक्षा के तीन आदर्श विद्यालय स्थापित किए गए-'प्रतिभा स्थली', जबलपुर (म.प्र.), डोंगरगढ़ (छ.ग.), रामटेक (महाराष्ट्र)। इसके अतिरिक्त जगह-जगह छात्रावास स्थापित किए गए जिनमें (५)गरीब एवं विधवाओं की तंगस्थिति देख करुणाशील आचार्य श्री जी की सुप्रेरणा से जबलपुर (म.प्र.) में लघु उद्योग 'पूरी मैत्री'संचालित किया गया। (६)विदेशी कम्पनियों के मकड़जाल ने स्वदेशी उद्योगों को समाप्त किया, फलितार्थ करोड़ों लोग बेरोजगार हुए और उनके समक्ष आजीविका का संकट खड़ा हुआ। देश का जीवन विपत्तीग्रस्त अशांत, दु:खी देख, आचार्य श्री जी द्रवीभूत हो उठे और गाँधी जी के द्वारा सुझाये गये स्वदेशी अहिंसक आजीविका 'हथकरघा' की प्रेरणा दी जिससे समाज ने महाकवि पं. भूरामल समाजिक सहकार न्यास हथकरघा प्रशिक्षण केन्द्र की अनेकों स्थानों पर शाखाएँ अशोकनगर, भोपाल आदि प्रमुख हैं तथा आचार्य ज्ञानविद्या लोक कल्याण हथकरघा केन्द्र मुंगावली के अन्तर्गतः मुंगावली, गुना, आरोन आदि स्थानों पर हथकरघा शाखाएँ खोली गई। सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुरजी दमोह (म.प्र.) में बड़े बाबा का निर्माणाधीन विशाल भव्य मन्दिर 1.आचार्यश्री जी की दूरदर्शिता ने जैन संस्कृति को हजारों-हजार साल के लिए जीवित बनाए रखने हेतु प्राचीन मन्दिरों की पाषाण निर्मित शैली को ही अपनाने की बात कही। आचार्य भगवन् के ऐतिहासिक सांस्कृतिक चिंतन से प्रभावित होकर उनकी प्रेरणा से अनेक स्थानों की समाजों ने पाषाण से भव्य विशाल जिनालयों के निर्माण हेतु आचार्यश्री जी के ही पावन सान्निध्य में शिलान्यास किए १.गोपालगंज, जिला-सागर (म.प्र.) २.सिलवानी, जिला-रायसेन (म.प्र.) ३.टड़ा, जिला-सागर (म.प्र.) नवनिर्मित सर्वोदय तीर्थक्षेत्र, अमरकंटक (म.प्र.) ४.नेमावर, जिला–देवास (म.प्र.) ५.हबीबगंज, भोपाल (म.प्र.) ६.तेंदूखेड़ा,जिला-दमोह (म.प्र.) ७.देवरी कलौं, जिला-सागर (म.प्र.) ८.रामटेक, जिला-नागपुर (महा.) ९.इतवारी,नागपुर (महा.) १०.विदिशा (म.प्र.) ११.नक्षत्र नगर, जबलपुर (म.प्र.) १२.डिंडोरी (म.प्र.) नवनिर्मित सर्वोदय तीर्थक्षेत्र, अमरकंटक (म.प्र.) 2.इसके अतिरिक्त आवश्यकतानुसार समय की माँग को देखते हुए कई नए तीर्थों की परिकल्पना को आचार्यश्री जी ने मूर्तस्वरूप प्रदान करने हेतु प्रेरणा एवं आशीर्वाद प्रदान किया। फलस्वरूप नए तीर्थों का जन्म हुआ १.सर्वोदय तीर्थ, अमरकंटक, जिला-शहडोल (म.प्र.) २.भाग्योदय तीर्थ, सागर (म.प्र.) ३.दयोदय तीर्थ, जबलपुर (म.प्र.) ४.सिद्धक्षेत्र सिद्धोदय, नेमावर, जिला-देवास (म.प्र.) ५.अतिशय क्षेत्रचन्द्रगिरि, डोगरगढ़ (छ.ग.) 3.आचार्य भगवन् ने जिन तीर्थों पर चातुर्मास, ग्रीष्मकालीन या शीतकालीन प्रवास किया। वहाँ पर जीर्णशीर्ण मन्दिरों का जीणों द्वार कराया १.अतिशय तीर्थक्षेत्र कोनी जी, जिला-जबलपुर (म.प्र.) २.सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर,जिला-दमोह (म.प्र.) ३.अतिशय तीर्थक्षेत्र बीना जी बारहा, सागर (म.प्र.) ४.अतिशय तीर्थक्षेत्र पटनागंज, रहली, सागर (म.प्र.) आपकी दिव्य दया के अनेकों सत्कार्य समाज में प्रतिफलित हो रहे है।
  28. 1 point
    कुलरूवजादिबुद्धिसु तवसुदसीलेसु गारवं किंचि। जो ण वि कुव्वदि समणो मद्वधम्मं हवे तस्स ॥ जो मनस्वी पुरुष कुल, रूप, जाति, बुद्धि, तप, शास्त्र और शीलादि के विषय में थोड़ा सा भी घमण्ड नहीं करता, उसके मार्दव धर्म होता है। आज पर्व का दूसरा दिन है। कल उत्तम क्षमा के बारे में आपने सुना, सोचा, समझा और क्षमा भाव धारण भी किया है। वैसे देखा जाए तो ये सब दस धर्म एक में ही गर्भित हो जाते हैं। एक के आने से सभी आ जाते हैं। आचार्यों ने सभी को अलग-अलग व्याख्यायित करके हमें किसी न किसी रूप में धर्म धारण करने की प्रेरणा दी है। जैसे-रोगी के रोग को दूर करने के लिए विभिन्न प्रकार से चिकित्सा की जाती है। दवा अलग-अलग अनुपात के साथ सेवन करायी जाती है। कभी दवा पिलाते हैं, कभी खिलाते हैं और कभी इंजेक्शन के माध्यम से देते हैं। बाह्य उपचार भी करते हैं। वर्तमान में तो सुना है कि रंगों के माध्यम से भी चिकित्सा पद्धति का विकास किया जा रहा है। कुछ दवाएँ सुंघाकर भी इलाज करते हैं। इतना ही नहीं, जब लाभ होता नहीं दिखता तो रोगी के मन को सान्त्वना देने के लिए समझाते हैं कि तुम जल्दी ठीक हो जाओगे। तुम रोगी नहीं हो। तुम तो हमेशा से स्वस्थ हो अजर-अमर हो। रोग आ ही गया है तो चला जायेगा, घबराने की कोई बात नहीं है। ऐसे ही आचार्यों ने अनुग्रह करके विभिन्न धर्मों के माध्यम से आत्म-कल्याण की बात समझायी है। प्रत्येक धर्म के साथ उत्तम विशेषण भी लगाया है। सामान्य क्षमा या मार्दव धर्म की बात नहीं है, जो लौकिक रूप से सभी धारण कर सकते हैं। बल्कि विशिष्ट क्षमा भाव जो संवर और निर्जरा के लिए कारण है, उसकी बात कही गयी है। जिसमें दिखावा नहीं है, जिसमें किसी सांसारिक ख्याति, पूजा, लाभ की आकांक्षा नहीं है। यही उत्तम विशेषण का महत्व है। दूसरी बात यह है कि क्षमा, मार्दव आदि तो हमारा निजी स्वभाव है, इसलिए भी उत्तम धर्म है। इनके प्रकट हुए बिना हमें मुक्ति नहीं मिल सकती। आज विचार इस बात पर भी करना है कि जब मार्दव हमारा स्वभाव है तो वह हमारे जीवन में प्रकट क्यों नहीं है? तो विचार करने पर ज्ञात होगा कि जब तक मार्दव धर्म के विपरीत मान विद्यमान है तब तक वह मार्दव धर्म को प्रकट नहीं होने देगा। केवल मृदुता लाओ, ऐसा कहने से काम नहीं चलेगा किन्तु इसके विपरीत जो मान कषाय है उसे भी हटाना पड़ेगा। जैसे हाथी के ऊपर बंदी का बैठना शोभा नहीं देता, ऐसे ही हमारी आत्मा पर मान का होना शोभा नहीं देता। यह मान कहाँ से आया? यह भी जानना आवश्यक है। जब ऐसा विचार करेंगे तो मालूम पड़ेगा कि अनन्त काल से यह जीव के साथ है और एक तरह से जीव का धर्म जैसा बन बैठा है। इससे छुटकारा पाने के दो ही उपाय है या कहो अपने वास्तविक स्वरूप को पाने के दो ही उपाय हैं। एक विधि रूप है तो दूसरा निषेध रूप है। जैसे रोग होने पर कहा जाए कि आरोग्य लाओ, तो आरोग्य तो रोग के अभाव में ही आयेगा। रोग के अभाव का नाम ही आरोग्य है। इसी प्रकार मृदुता को पाना हो तो यह जो कठोरता आकर छिपकर बैठी है उसे हटाना होगा। जानना होगा कि इसके आने का मार्ग कौन सा है, उसे बुलाने वाला और इसकी व्यवस्था करने वाला कौन है? तो आचार्य कहते हैं कि हम ही सब कुछ कर रहे हैं। जैसे अग्नि राख से दबी हो तो अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती, ऐसे ही मार्दव धर्म का मालिक यह आत्मा कर्मों से दबी हुई है और अपने स्वभाव को भूलकर कठोरता को अपनाती जा रही है। विचार करें, कि कठोरता को लाने वाला प्रमुख कौन है? अभी आप सबकी अपेक्षा ले लें। तो संज्ञी पंचेन्द्रिय के पाँचों इन्द्रियों में से कौन सी इन्द्रिय कठोरता लाने का काम करती है? क्या स्पर्शन इन्द्रिय से कठोरता आती है, या रसना इन्द्रिय से आती है, या घ्राण या चक्षु या श्रोत्र, किस इन्द्रिय से कठोरता आती है? तो कोई भी कह देगा कि इन्द्रियों से कठोरता नहीं आती। यह कठोरता मन की उपज है। एक इन्द्रिय से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक कोई भी जीव ऐसे अभिमानी नहीं मिलेंगे जैसे कि मन वाले और विशेषकर मनुष्य होते हैं। थोड़ा सा भी वित्त-वैभव बढ़ जाए तो चाल में अन्तर आने लगती है। मनमाना तो यह मन ही है। मन के भीतर से ही माँग पैदा हेाती है। वैसे मन बहुत कमजोर है, वह इस अपेक्षा से कि उसका कोई अंग नहीं है लेकिन यह अंग-अंग को हिला देता है। विचलित कर देता है। जीवन का ढाँचा परिवर्तित कर देता है और सभी पाँचों इन्द्रियाँ भी मन की पूर्ति में लगी रहती हैं। मन सबका नियन्ता बनकर बैठ जाता है। आत्मा भी इसकी चपेट में आ जाती है और अपने स्वभाव को भूल जाती है। तब मृदुता के स्थान पर मान और मद आ जाता है। इन्द्रियों को खुराक मिले या न मिले चल जाता है लेकिन मन को खुराक मिलनी चाहिए। ऐसा यह मन है। और इसे खुराक मिल जाये, इसके अनुकूल काम हो जाए तो यह फूला नहीं समाता और नित नयी माँगें पूरी करवाने में चेतना को लगाये रखता है। जैसे आज कल कोई विद्यार्थी College (महाविद्यालय) जाता है। प्रथम वर्ष का ही अभी विद्यार्थी है अभी-अभी College (महाविद्यालय) का मुख देखा है। वह कहता है-पिताजी! हम कल से College (महाविद्यालय) नहीं जायेंगे। तो पिताजी क्या कहें? सोचने लगते हैं कि अभी एक दिन तो हुआ है और नहीं जाने की बात कहाँ से आ गयी? क्या हो गया? तो विद्यार्थी कहता है कि पिताजी आप नहीं समझेंगे नयी पढ़ाई है। College (महाविद्यालय) जाने के योग्य सब सामग्री चाहिए। कपड़े अच्छे चाहिए।Pocket (जेब) में पैसे भी चाहिए और University (विश्वविद्यालय) बहुत दूर है, रास्ता बड़ा चढ़ाव वाला है इसलिए स्कूटर भी चाहिए। उस पर बैठकर जायेंगे इसके बिना पढ़ाई सम्भव नहीं है। यह कौन करवा रहा है? यह सब मन की ही करामात है। यदि इसके अनुरूप मिल जाए तो ठीक अन्यथा गड़बड़ हो जायेगी। जैसे सारा जीवन ही व्यर्थ हो गया, ऐसा लगने लगता है। कपड़े चाहिए ऐसे कि बिल्कुल टिनोपाल में तले हुए हों, हाँ जैसे पूरियाँ तलती है। यह सब मन के भीतर से आया हुआ मान-कषाय का भाव है। सब लोग क्या कहेंगे कि College (महाविद्यालय) का छात्र होकर ठीक कपड़े पहनकर नहीं आता। एक छात्र ने हमसे पूछा था कि सचमुच ऐसी स्थिति आ जाती है तब हमें क्या करना चाहिए? तो हमने कहा कि ऐसा करो टोपी पहन लेना और धोती कुर्ता पहनकर जाना, वह हँसने लगा। बोला यह तो बड़ा कठिन है। टोपी पहनना तो फिर भी सम्भव है लेकिन धोती वगैरह पहनूँगा तो सब गड़बड़ हो जायेगी। सब से अलग हो जाऊँगा। लोग क्या कहेंगे? हमने कहा कि ऐसा मन में विचार ही क्यों लाते हो कि लोग क्या कहेंगे? अपने को प्रतिभा सम्पन्न होकर पढ़ना है। विद्यार्थी को तो विद्या से ही प्रयोजन होना चाहिए। आज यही हो रहा है कि व्यक्ति बाहरी चमक-दमक में ऐसा झूम जाता है कि सारी की सारी शक्ति उसी में व्यर्थ ही व्यय होती चली जाती है और वह लक्ष्य से चूक जाता है। यह सब मन का खेल है। मान कषाय है। मान-सम्मान की आकांक्षा काठिन्य लाती है और सबसे पहले मन में कठोरता आती है, फिर बाद में वचनों में और तदुपरान्त शरीर में भी कठोरता आने लगती है। इस कठोरता का विस्तार अनादिकाल से इसी तरह हो रहा है और आत्मा अपने मार्दव-धर्म को खोता जा रहा है। इस कठोरता का, मान कषाय का परित्याग करना ही मार्दव धर्म के लिए अनिवार्य है। आठ मदों में एक मद ज्ञान का भी है। आचार्यों ने इसी कारण लिख दिया है कि -ज्ञानस्य फल क? उपेक्षा, अज्ञाननाशी वा' उपेक्षा भाव आना और अज्ञान का नाश होना ही ज्ञान का फल है। उपेक्षा का अर्थ है रागद्वेष की हानि होना और गुणों का आदान (ग्रहण) होना। यदि ऐसा नहीं होता तो वह ज्ञान कार्यकारी नहीं है। ‘ले दीपक कुएँ पड़े' वाली कहावत आती है कि उस दीपक के प्रकाश की क्या उपयोगिता जिसे हाथ में लेकर भी यदि कोई कूप में गिर जाता है। स्व-पर का विवेक होना ही ज्ञानी की सार्थकता है। पर को हेय जानकर भी यदि पर के विमोचन का भाव जागृत नहीं होता और ज्ञान का मद आ जाता है कि मैं तो ज्ञानी हूँ, तो हमारा यह ज्ञान एकमात्र बौद्धिक व्यायाम ही कहलायेगा। ज्ञान का अभिमान व्यर्थ है। ज्ञान का प्रयोजन तो मान की हानि करना है, पर अब तो मान की हानि होने पर मानहानि का कोर्ट में दावा होता है। मार्दव धर्म तो ऐसा है कि जिसमें मान की हानि होना आवश्यक है। यदि मान की हानि हो जाती है तो मार्दव धर्म प्रकट होने में देर नहीं लगती। आप शान्तिनाथ भगवान् के चरणों में श्रीफल चढ़ाते हैं तो भगवान् श्रीफल के रूप में आपसे कोई सम्मान नहीं चाहते न ही हर्षित होते हैं, बल्कि वे तो अपनी वीतराग मुद्रा से उपदेश देते हैं कि जो भी मान कषाय है वह सब यहाँ लाकर विसर्जित कर दो। यह जो मन, मान कषाय का Store (भण्डार) बना हुआ है, उसे खाली कर दो। जिसका मन, मान कषाय से खाली है वही वास्तविक ज्ञानी है। उसी के लिए केवलज्ञान रूप प्रमाण-ज्ञान की प्राप्ति हुआ करती है। वही तीनों लोकों में सम्मान पाता है। हम पूछते हैं कि आपको केवलज्ञान चाहिए या मात्र मान-कषाय चाहिए? तो कोई भी कह देगा कि हमें केवलज्ञान चाहिए। लेकिन केवलज्ञान की प्राप्ति तो अपने स्वरूप की ओर, अपने मार्दव धर्म की ओर प्रयाण करने से होगी। अभी तो हम स्वरूप से विपरीत की प्राप्ति होने में ही अभिमान कर रहे हैं। वास्तव में देखा जाए तो इन्द्रिय ज्ञान, ज्ञान नहीं है। इन्द्रिय-ज्ञान तो पराश्रित ज्ञान है। स्वाश्रित ज्ञान तो आत्म-ज्ञान या केवलज्ञान है। जो इन्द्रिय ज्ञान और इन्द्रिय के विषयों में आसक्त नहीं होता, वह नियम से अतीन्द्रिय ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, सर्वज्ञ दशा को प्राप्त कर लेता है। 'मनोरपत्यं पुमान्निति मानवः' कहा गया है कि मनु की संतान मानव है। मनु को अपने यहाँ कुलकर माना गया है। जो मानवों को एक कुल की भाँति एक साथ इकट्ठे रहने का उपदेश देता है, वही कुलकर है। सभी समान भाव से रहें। छोटे-बड़े का भेदभाव न आवे तभी मानव होने की सार्थकता है। अपने मन को वश में करने वाले ही महात्मा माने गये हैं। मन को वश में करने का अर्थ मन को दबाना नहीं है, बल्कि मन को समझाना है। मन को दबाने और समझाने में बड़ा अन्तर है। दबाने से तो मन और अधिक तनाव-ग्रस्त हो जाता है, विक्षिप्त हो जाता है। किन्तु मन को यदि समझाया जाये तो वह शान्त होने लगता है। मन को समझाना, उसे प्रशिक्षित करना, तत्व के वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाना ही वास्तव में, मन को अपने वश में करना है। जिसका मन संवेग और वैराग्य से भरा है वही इस संसार से पार हो पाता है। जैसे घोड़े पर लगाम हो तो वह सीधा अपने गन्तव्य पर पहुँच जाता है। ऐसे ही मन पर यदि वैराग्य की लगाम हो तो वह सीधा अपने गन्तव्य, मोक्ष तक ले जाने में सहायक होता है। सभी दश धर्म आपस में इतने जुड़े हुए हैं कि अलग-अलग होकर भी संबंधित हैं। मार्दव धर्म के अभाव में क्षमा धर्म रह पाना संभव नहीं है और क्षमा धर्म के अभाव में मार्दव धर्म टिकता नहीं है। मान-सम्मान की आकांक्षा पूरी नहीं होने पर ही तो क्रोध उत्पन्न हो जाता है। मृदुता के अभाव में छोटी सी बात से मन को ठेस पहुँच जाती है और मान जागृत हो जाता है। जब मान जागृत होता है तो क्रोध की अग्नि भड़कने में देर नहीं लगती। द्वीपायन मुनि रत्नत्रय को धारण किये हुए थे। वर्षों की तपस्या साथ थी। उस तपस्या का फल, चाहते तो मीठा भी हो सकता था किन्तु वे द्वारिका को जलाने में निमित्त बन गये। दिव्यध्वनि के माध्यम से जब उन्हें ज्ञात हुआ कि मेरे निमित्त से बारह वर्ष के बाद द्वारिका जलेगी तो यह सोचकर वे द्वारिका से दूर चले गये कि कम से कम बारह वर्ष तक अपने को द्वारिका की ओर जाना ही नहीं है। समय बीतता गया और बारह वर्ष बीत गये होंगे- ऐसा सोचकर वे विहार करते हुए द्वारिका के समीप एक बगीचे में आकर ध्यानमग्न हो गये। वहीं यादव लोग आये और द्वारिका के बाहर फेंकी गई शराब को पानी समझकर पीने लगे। मदिरापान का परिणाम यह हुआ कि यादव लोग नशे में पागल होकर द्वीपायन मुनि को देखकर गालियाँ देने लगे, पत्थर फेंकने लगे। जब बहुत देर तक यह प्रक्रिया चलती रही और द्वीपायन मुनि को सहन नहीं हुआ तो तैजस ऋद्धि के प्रभाव से द्वारिका जलकर राख हो गयी। तन तो सहन कर सकता था लेकिन मन सहन नहीं कर सका और क्रोध जागृत हो गया। महाराज जी (आचार्य श्री ज्ञानसागरजी) ने एक बार उदाहरण दिया था। वही आपको सुनाता हूँ। एक गाँव का मुखिया था। सरपंच था। उसी का यह प्रपञ्च है। आप हँसिये मत। उसका प्रपञ्च दिशाबोध देने वाला है। हुआ यह कि एक बार उससे कोई गल्ती हो गयी और उन्हें दंड सुनाया गया। समाज गल्ती सहन नहीं कर सकती ऐसा कह दिया गया और लोगों ने इकट्ठे होकर उसके घर आकर सारी बात कह दो। घर के भीतर उसने भी स्वीकार कर लिया कि गल्ती हो गयी, मजबूरी थी। पर इतने से काम नहीं चलेगा। लोगों ने कहा कि यही बात मञ्च पर आकर सभी के सामने कहना होगी कि मेरी गलती हो गयी और मैं इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। फिर दण्ड के रूप में एक रुपया देना होगा। एक रुपया कोई मायने नहीं रखता। वह व्यक्ति करोड़ रुपया देने के लिए तैयार हो गया लेकिन कहने लगा कि मञ्च पर आकर क्षमा मांगना तो सम्भव नहीं हो सकेगा। मान खण्डित हो जायेगा। प्रतिष्ठा में बट्टा लग जाएगा। आज तक जो सम्मान मिलता आया है वह चला जायेगा। सभी संसारी जीवों की यही स्थिति है। पाप हो जाने पर, गलती हो जाने पर कोई अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है। असल में भीतर मान कषाय बैठा है वह झुकने नहीं देता। पर हम चाहें तो उसकी शक्ति को कम कर सकते हैं और चाहें तो अपने परिणामों से उसे संक्रमित (Transfer) भी कर सकते हैं। उसे अगर पूरी तरह हटाना चाहें तो आचार्य कहते हैं कि एक ही मार्ग है- समता भाव का आश्रय लेना होगा। अपने शांत और मृदु स्वभाव का चिन्तन करना होगा। यही पुरुषार्थ मान-कषाय पर विजय पाने के लिए अनिवार्य है। आत्मा की शक्ति और कर्म की शक्ति इन दोनों के बीच देखा जाये तो आत्मा अपने पुरुषार्थ के बल से आत्म-स्वरूप के चिन्तन से मान कषाय के उदय में होने वाले परिणामों पर विजय प्राप्त कर सकता है। मान को जीत सकता है। इतना संयम तो कषायों को जीतने के लिए आवश्यक ही है। सम्यग्दर्शन तो जीव जन्म से ही लेकर आ सकता है लेकिन मुक्ति पाने के लिए सम्यग्दर्शन के साथ जो विशुद्धि चाहिए वह चारित्र के द्वारा ही आयेगी। वह अपने आप आयेगी, ऐसा भी नहीं समझना चाहिए। आचार्यों ने कहा है कि आठ साल की उम्र होने के उपरान्त कोई चाहे तो सम्यग्दर्शन के साथ चारित्र को अंगीकार कर सकता है। लेकिन चारित्र अंगीकार करना होगा, तभी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा और मुक्ति मिलेगी। कषायों पर विजय पाने रूप परिणाम, चरित्र को अंगीकार किये बिना आना/होना संभव नहीं है। आत्मा की अनन्त शक्ति भी सम्यक्रचारित्र धारण करने पर ही प्रकट होती है। एक बात और कहूँ कि सभी कषायें परस्पर एक दूसरे के लिए कारण भी बन सकती है। जैसे मान को ठेस पहुँचती है तो क्रोध आ जाता है। मायाचारी आ जाती है। अपने मान की सुरक्षा का लोभ भी आ जाता है। एक समय की बात है कि एक व्यक्ति एक सन्त के पास पहुँचा। उसने सुन रक्खा था कि सन्त बहुत पहुँचे हुए हैं। उसने पहुँचते ही पहले उन्हें प्रणाम किया और विनयपूर्वक बैठ गया। चर्चा वार्तालाप के बाद उसने कहा कि आप हमारे यहाँ कल का आतिथ्य स्वीकार करिये। अपने यहाँ हम आपको कल के भोजन के लिए निमन्त्रित करते हैं। सन्त जी निमन्त्रण पाने वाले रहे होंगे, इसलिए निमन्त्रण मान लिया। देखो निमन्त्रण 'मान' लिया, इसमें भी 'मान' लगा है। दूसरे दिन ठीक समय पर वह व्यक्ति आदर के साथ उन्हें घर ले गया, अच्छा आतिथ्य हुआ। मान-सम्मान भी दिया। अन्त में जब सन्त जी लौटने लगे तो उस व्यक्ति ने पूछ लिया कि आपका शुभ नाम मालूम नहीं पड़ सका। आपका शुभ नाम मालूम पड़ जाता तो बडी कृपा होगी। सन्त जी ने बड़े उत्साह से बताया कि हमारा नाम शान्तिप्रसाद है। वह व्यक्ति बोला बहुत अच्छा नाम है। मैं तो सुनकर धन्य हो गया, आज मानों शान्ति मिल गयी। वह उनको भेजने कुछ दूर दस बीस कदम साथ गया और उसने फिर से पूछ लिया कि क्षमा कीजिये, मेरी स्मरण शक्ति कमजोर है। मैं भूल गया आपने क्या नाम बताया था? सन्त जी ने उसकी ओर गौर से देखा और कहा कि शान्तिप्रसाद, अभी तो मैंने बताया था। वह व्यक्ति बोला हाँ ठीक-ठीक ध्यान आ गया आपका नाम शान्तिप्रसाद है। अभी जरा दूर और पहुँचे थे कि पुन: वह व्यक्ति बोला कि क्या करूं? कैसा मेरा कर्म का तीव्र उदय है कि मैं बार-बार भूल जाता हूँ। आपने क्या नाम बताया था? अब की बार सन्त जी ने घूर कर उसे देखा और बोले शान्तिप्रसाद, शान्तिप्रसाद- मैंने कहा ना। वह व्यक्ति चुप हो गया और आश्रम पहुँचते-पहुँचते जब उसने तीसरी बार कहा कि एक बार और बता दीजिये आपका शुभ नाम। उसे तो जितनी बार सुना जाए उतना ही अच्छा है। अब सन्त जी की स्थिति बिगड़ गयी, गुस्से में आ गये। बोले क्या कहता है तू। कितनी बार तुझे बताया कि शान्तिप्रसाद, शान्तिप्रसाद! वह व्यक्ति मन ही मन मुस्कराया और बोला, मालूम पड़ गया है कि नाम आपका शान्तिप्रसाद है, पर आप तो ज्वालाप्रसाद हैं। अपने मान को अभी जीत नहीं पाये क्योंकि मान को जरा सी ठेस लगी और क्रोध की ज्वाला भड़क उठी। बंधुओ! ध्यान रखो जो मान को जीतने का पुरुषार्थ करता है वही मार्दव धर्म को अपने भीतर प्रकट करने में समर्थ होता है। पुरुषार्थ यही है कि ऐसी परिस्थिति आने पर हम यह सोचकर चुप रह जायें कि यह अज्ञानी है। मुझसे हँसी कर रहा है या फिर सम्भव है कि मेरी सहनशीलता की परीक्षा कर रहा है। उसके साथ तो हमारा व्यवहार, माध्यस्थ भाव धारण करने का होना चाहिए। कोई वचन व्यवहार अनिवार्य नहीं है। जो विनयवान हो, ग्रहण करने की योग्यता रखता हो, हमारी बात समझने की पात्रता जिसमें हो, उससे ही वचन व्यवहार करना चाहिए। ऐसा आचार्यों ने कहा है। अन्यथा 'मौन सर्वत्र साधनम्'। मौन सर्वत्र/सदैव अच्छा साधन है। द्वीपायन मुनि के साथ यही तो हुआ कि वे मौन नहीं रह पाये और यादव लोग भी शराब के नशे में आकर मौन धारण नहीं कर सके।'मदिरापानादिभिः मनस: पराभवो दृश्यते'- मदिरा पान से मन का पराभव होते देखा जाता है। पराभव से तात्पर्य है पतन की ओर चले जाना। अपने सही स्वभाव को भूलकर गलत रास्ते पर मुड़ जाना। गाली के शब्द तो किसी के भी कानों में पड़ सकते हैं लेकिन ठेस सभी को नहीं पहुँचती। ठेस तो उसी के मन को पहुँचती है जिसे लक्ष्य करके गाली दी जा रही है। या जो ऐसा समझ लेता है कि गाली मुझे दी जा रही है। मेरा अपमान किया जा रहा है। द्वीपायन मुनि को भीतर तो यही श्रद्धान था कि मैं मुनि हूँ। मेरा वैभव समयसार है। समता परिणाम ही मेरी निधि है। मार्दव मेरा धर्म है। मैं मानी नहीं हूँ, लोभी नहीं हूँ। मेरा यह स्वभाव नहीं है। रत्नत्रय धर्म उनके पास था, उसी के फलस्वरूप तो उन्हें ऋद्धि प्राप्त हुई थी। लेकिन मन में पर्याय बुद्धि जागृत हो गयी कि गाली मुझे दी जा रही है। आचार्य कहते हैं कि ‘पञ्जयमूढ़ा हि परसमया' जो पर्याय में मुग्ध हैं, मूढ़ है वह पर-समय है। पर्याय का ज्ञान होना बाधक नहीं है परन्तु पर्याय में मूढ़ता आ जाना बाधक है। पर्याय बुद्धि ही मान को पैदा करने वाली है। पर्याय बुद्धि के कारण उनके मन में आ गया कि वे मेरे ऊपर पत्थर बरसा रहे हैं, मुझे गाली दी जा रही है और उपयोग की धारा बदल गयी। उपयोग में उपयोग को स्थिर करना था, पर स्थिर नहीं रख पाये। उपयोग आत्म-स्वभाव के चिन्तन से हटकर बाहर पर्याय में लग गया और मान जागृत हो गया। जो अपने आप में स्थित है, स्वस्थ है उसे मान-सम्मान सब बराबर है। उसे कोई गाली भी दे तो वह सोचता है कि अच्छा हुआ अपनी परख करने का अवसर मिल गया। मालूम पड़ जायेगा कि कितना मान कषाय अभी भीतर शेष है। यदि ठेस नहीं पहुँचती तो समझना कि उपयोग, उपयोग में है। ज्ञानी की यही पहचान है कि वह अपने स्वभाव में अविचल रहता है। वह विचार करता है कि दूसरे के निमित्त से मैं अपने परिणाम क्यों बिगाड़ें? अगर अपने परिणाम बिगाड़ेंगा तो मेरा ही अहित होगा। कषाय दुख का कारण है। पाप-भाव दुख ही है। आचार्य उमास्वामी ने तत्वार्थसूत्र में कहा है 'दुखमेव वा', आनन्द तो तब है जब दुख भी ‘मेवा' हो जाये। सुख और दुख दोनों में साम्य भाव आ जाये। मान कषाय का विमोचन करके ही हम अपने सही स्वास्थ्य का अनुभव कर सकते हैं, साम्य भाव ला सकते हैं। जैसे दूध उबल रहा है अब उसको अधिक नहीं तपाना है तब या तो उसे सिगडी से नीचे उतार कर रख दिया जाता है या फिर अग्नि को कम कर देते हैं। तब अपने आप वह धीरेधीरे अपने स्वभाव में आ जाता है, स्वस्थ हो जाता है अर्थात् शान्त हो जाता है और पीने योग्य हो जाता है। ऐसे ही मान कषाय के उबाल से अपने को बचाकर हम अपने स्वास्थ्य को प्राप्त कर सकते हैं। मान का उबाल शान्त होने पर ही मार्दव धर्म प्राप्त होता है। मान को अपने से अलग कर दें या कि अपने को ही मान कषाय से अलग कर लें, तभी मार्दव धर्म प्रकट होगा। अन्त में इतना ही ध्यान रखिये कि अपने को शान्तिप्रसाद जैसा नहीं करना है। हाँ, यदि कोई गाली दे, कोई प्रतिकूल वातावरण उपस्थित करें तो अपने को शान्तिनाथ भगवान् को नहीं भूलना है। अपने परिणामों को संभालना अपने आत्म-परिणामों की सँभाल करना ही धर्म है। यही करने योग्य कार्य है। जिन्होंने इस करने योग्य कार्य को सम्पन्न कर लिया वे ही कृतकृत्य कहलाते हैं। वही सिद्ध परमेष्ठी कहलाते हैं, जिनकी मृदुता को अब कोई खण्डित नहीं कर सकता। हम भी मृदुता के पिण्ड बनें और जीवन को सार्थक करें।
  29. 1 point
    कोहुप्पत्तिस्स पुणो बहिरंग जदि हवेदि सक्खादं। ण कुणदि किंचिवि कोहो तस्स खमा होदि धम्मोति॥ (बारसाणुवेक्खा ७१) क्रोध के उत्पन्न होने के साक्षात् बाहरी कारण मिलने पर भी थोड़ा भी क्रोध नहीं करता, उसे क्षमा धर्म होता है। अभी कार्तिकेयानुप्रेक्षा का स्वाध्याय चल रहा है, उसमें एक गाथा आती है | धम्मो वत्थुसहावो,खमादिभावो स दसविहो धम्मो। रयणात्तयं च धम्मो, जीवाणां रक्खणं धम्मो॥ अर्थात् वस्तु के स्वभाव को धर्म कहते हैं। दस प्रकार के क्षमादि भावों को धर्म कहते हैं। रत्नत्रय को धर्म कहते हैं और जीवों की रक्षा करने को धर्म कहते हैं। यहाँ आचार्य महाराज ने धर्म के विविध स्वरूपों को बताया है। वस्तु के स्वभाव को धर्म कहा है और यह भलीभाँति ज्ञात है कि वस्तु की अपेक्षा देखा जाए तो जीव भी वस्तु है। पुद्गल भी वस्तु है। धर्म, अधर्म, आकाश और काल भी वस्तु है। सभी का अपना-अपना स्वभाव ही उनका धर्म है। अधर्म द्रव्य का भी कोई न कोई धर्म है। (हँसी) तो आज हम कौन से धर्म का पालन करें, कि जिसके द्वारा कम से कम दस दिन के लिए हमारा कल्याण हो। तब आचार्य कहते हैं कि स्वभाव तो हमेशा धर्म रहेगा ही, लेकिन इस स्वभाव की प्राप्ति के लिए जो किया जाने वाला धर्म है वह है- 'खमादिभावो या दसविहो धम्मो'- क्षमादि भाव रूप दस प्रकार का धर्म वह आज से प्रारम्भ होने जा रहा है। ध्यान रखना आप लोगों की अपेक्षा, विशेष अनुष्ठान की दृष्टि से आज से प्रारम्भ हुआ माना जा रहा है, साधुओं के तो वह हमेशा ही है। यह दस प्रकार का धर्म रत्नत्रय के धारी मुनिराज ही पालन करते हैं। इसलिए गाथा में आगे कहा गया कि ‘रयणतयं च धम्मो'- रत्नत्रय भी धर्म है। सम्यकदर्शन, ज्ञान और चारित्र रूप आत्मा की जो परिणति है उसका नाम भी धर्म है। लेकिन इतना कहकर ही बात पूरी नहीं की। इस रत्नत्रय की सुरक्षा किस तरह, किस माध्यम से होगी, यह भी बताना आवश्यक है। इसलिए कहा कि 'जीवाण रक्खण धम्मो'- जीवों की रक्षा करना धर्म है। जीव का परम धर्म यही अहिंसा है। जो उसे अपने आत्मस्वभाव-रूप धर्म तक पहुँचायेगा। इस अहिंसा धर्म के बिना कोई भी जीवात्मा अपने आत्म-स्वरूप की उपलब्ध नहीं कर सकता। इस अहिंसा धर्म की व्याख्या आचार्यों ने विभिन्न प्रकार से की है। जो अहिंसा से विमुख हो जाता है उसके भीतर क्षोभ उत्पन्न होता है। जैसे कोई सरोवर शान्त हो और उसमें एक छोटा सा भी कंकर फेंक दिया जाये तो कंकर गिरते ही पानी में लहरें उत्पन्न होने लगती हैं। क्षोभ पैदा हो जाता है, सारा सरोवर क्षुब्ध हो जाता है और अगर कंकर फेंकने का सिलसिला अक्षुण्ण बना रहे तो एक बार भी वह सरोवर शान्त, स्वच्छ और उज्ज्वल रूप में देखने को नहीं मिल पाता। अनेक प्रकार की मलिनताओं में उसका शान्त स्वरूप खो जाता है। क्षोभ भी एक प्रकार की मलिनता ही है। मोहराग-द्वेष रूप भाव भी एक मलिनता है। जैसे सरोवर का धर्म शान्त और निर्मल रहना है, लहरदार होना नहीं है, ऐसा ही आत्मा का स्वभाव समता परिणाम है जो लहर रूपी क्षोभ और मोह रूपी मलिनता से रहित है, जो निष्कम्प और निर्मल है। सरोवर में कंकर फेंकने के उपरान्त उसमें हम जब जाकर देखेंगे तो अपना मुख देखने में नहीं आयेगा और न ही सरोवर के भीतर पड़ी निधि/वस्तु का अवलोकन कर सकेंगे। मान लीजिये सरोवर शान्त है तथा कंकर भी नहीं फेंका गया किन्तु कीचड़ उसमें बहुत है तो भी उस सरोवर के जल में मुख दिखने में नहीं आयेगा। आज मुझे यही कहना है आप लोगों से कि ऐसे ही हमारी आत्मा का सरोवर जब तक शान्त और मलिनता से रहित नहीं होगा तब तक हमें अपना उज्ज्वल स्वरूप दिखाई नहीं देगा। क्रोध के अभाव में ही क्षमा धर्म जीवन में प्रकट होगा। एक बार यदि यह क्षमा धर्म अपनी चरम सीमा तक पहुँच जाये और आत्मा से क्रोधादि कषायों का सर्वथा अभाव हो जाए तो लोक में होने वाला कोई भी विप्लव उसे प्रभावित नहीं कर सकता, उसे स्वभाव से च्युत नहीं कर सकता, नीचे नहीं गिरा सकता। 'काले कल्पशतैपि च गते शिवानां न विक्रिया लक्ष्या' अर्थात् सैकडों कल्पकाल भी बीत जायें तो भी सिद्धत्व की प्राप्ति के उपरान्त किसी भी तरह की विकृति आना सम्भव नहीं है। सरोवर का जल स्वच्छ होकर बर्फ बनकर जम जाये, उसमें सघनता आ जाये तो कंकर के फेंकने से कोई क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकता, ऐसा ही आत्मा के स्वभाव के बारे में समझना चाहिए। हमें आत्मा की शक्ति को पहचानकर उसे ऐसा ही सघन बनाना चाहिए कि क्षोभ उत्पन्न न हो सके। आत्मा को ज्ञान-घन रूप कहा गया है। हमारा ज्ञान, घन-रूप हो जाना चाहिए। अभी वह पिघला हुआ होने से छोटी-छोटी-सी बातों को लेकर भी क्षुब्ध हो जाता है। हमारे अंदर छोटी सी बात भी क्रोधकषाय उत्पन्न कर देती है और हम क्षमा धर्म से विमुख हो जाते हैं। अनन्त काल हो गया तब से हम इस क्रोध का साथ देते जा रहे हैं। क्षमा धर्म का साथ हमने कभी ग्रहण नहीं किया। एक बार ऐसा करो जैसा कि पाण्डवों ने किया था। पाण्डव जब तक महलों में पाण्डव के रूप में रहे तब तक कौरवों को देखकर मन में विचार आ जाता था कि ये भाई होकर भी हमारे साथ वैरी जैसा व्यवहार करते हैं अत: इनसे हमें युद्ध करना ही होगा। इन्हें धर्म-युद्ध के माध्यम से मार्ग पर लाना होगा। इस तरह कई प्रकार की बातें चलती थीं, संघर्ष चलता था। किन्तु जब वे ही पाण्डव गृहत्याग कर निरीह होकर ध्यान में बैठ गये तो यह विचार आया कि 'जीवाणां रक्खण धम्मो' जीवों की रक्षा करना, उनके प्रति क्षमा भाव धारण करना ही हमारा धर्म है। कौरव भी जीव हैं, अब उनके प्रति क्षमा भाव धारण करना ही हमारा कर्तव्य है। इसी क्षमा धर्म का पालन करते हुए जब उन पर उपसर्ग आया तो लोहे के गरम-गरम आभूषण पहनाने पर भी वे शान्त रहे, क्षुब्ध नहीं हुए, न ही मन में शरीर के प्रति राग-भाव आने दिया और न ही उपसर्ग करने वालों के प्रति द्वेष भाव को आने दिया। तप से तो तप ही रहे थे, ऊपर से तपे हुए आभूषण पहनाये जाने पर और अधिक तपने लगे। क्षमा-धर्म के साथ किये गये इस तप के द्वारा कर्मों की असंख्यात गुणी निर्जरा होने लगी। जैसे प्रोषधोपवास या पर्व के दिनों में आप लोग उपवास करते हैं या एकाशन करते हैं और भीषण गर्मी ज्येष्ठ मास की कड़ी धूप पड़ जाये तो कैसा लगता है? दोहरी तपन हो गयी। पर व्रत का संकल्प पहले से होने के कारण परीषह सहते हैं। ऐसे ही पाण्डव भी लोहे के आभूषण पहनाये जाने पर भी शान्त भाव से परीषह-जय में लगे रहे। कौरवों पर क्रोध नहीं आया क्योंकि जीवन में क्षमा-धर्म आ गया था।'जीवाण रक्खण धम्मो"यह मन्त्र भीतर ही भीतर चल रहा था। वे सोच रहे थे कि अब तो कोई भी जीव आकर हमारे लिए कुछ भी करे- उपसर्ग करे, शरीर को जला भी दे तो भी हम अपने मन में उसके प्रति हिंसा का भाव नहीं लायेंगे, क्रोध नहीं करेंगे और विरोध भी नहीं करेंगे। अब चाहे कोई प्रशंसा करने आये तो उसमें राजी भी नहीं होंगे और न ही किसी से नाराज होंगे क्योंकि अब हम महाराज हो गये हैं। महाराज हैं तो नाराज नहीं और नाराज हैं तो महाराज नहीं। लेकिन बात ऐसी है ध्यान रखना कि कभी-कभी लोगों के मन में बात आ जाती है कि महाराज जी तो नाराज हैं और आहार देते समय कह भी देते हैं कि महाराज तो हमसे आहार ही नहीं लेते, नाराज हैं। हमारी तरफ देखते तक नहीं हैं। अब उस समय हम कुछ जवाब तो दे नहीं सकते और ऐसा कहने वाले बाद में सामने आते भी नहीं हैं। कभी आ जायें तो हम फौरन कह देते हैं कि भइया, हम नाराज नहीं हुए और अगर आपकी दृष्टि में राजी नहीं होने का नाम ही नाराज होना कहलाता है तो आप अपनी जानी। आप तो इसी में राजी होंगे कि महाराज आप हमारे यहाँ रोज आओ। संसारी प्राणी राग को बहुत अच्छा मानता है और द्वेष को अच्छा नहीं मानता। लेकिन देखा जाये तो द्वेष पहले छूट जाता है फिर बाद में राग का अभाव होता है। दसवें गुणस्थान तक सूक्ष्म लोभ चलता है। मुनि महाराज तो प्रशंसा में राजी नहीं होते और न ही निन्दा से नाराज होते हैं, अपितु वे तो दोनों दशा में साम्य रखते हैं। राग और द्वेष दोनों में साम्य भाव रखना ही अहिंसा धर्म हैं, क्षमा धर्म है। रागादीणमणुप्पा अहसगत्तं ति देसिदं समये। तेस चे उप्पत्ती हसेति जिणहि णिद्दिट्टा॥ यह आचार्यों की वाणी है। रागद्वेष की उत्पत्ति होना हिंसा है और रागद्वेष का अभाव ही अहिंसा है। जीवत्व के ऊपर सच्चा श्रद्धान तो तभी कहलायेगा जब अपने स्वभाव के विपरीत हम परिणमन न करें अर्थात् रागद्वेष से मुक्त हों। क्रोधादि कषायों के आ जाने पर जीव का शुद्ध स्वभाव अनुभव में नहीं आता। संसारी दशा में स्वभाव का विलोम परिणमन हो जाता है। यही तो वैभाविक परिणति है, जो संसार में भटकाती है। पाँचों पाण्डव ध्यान में लीन थे। सिद्ध परमेष्ठी के ध्यान में लीन थे। शरीर में रहकर शरीरातीत आत्मा का अनुभव कर रहे थे। वास्तव में यही तो उनकी अग्नि परीक्षा की घड़ी थी। जह कणायमग्गितवियं पि कणयसहावं ण तं परिच्चयदि । तह कम्मोदयतविदो ण जहदि णणी दु णाणिक्तं॥ (समयसार - १९१ ) जिस प्रकार स्वर्ण को तपा दिये जाने पर भी स्वर्ण अपनी स्वर्णता को नहीं छोड़ता बल्कि जितना आप तपाओगे उतनी ही कीमत बढ़ती जायेगी, उतने ही उसके गुणधर्म उभरकर सामने आयेंगे। स्वर्ण को जितना आप कसौटी पर कसोगे उतना ही उसमें निखार आयेगा, उसकी सही परख होगी। आचार्यों ने उदाहरण दिया है कि जिस प्रकार अग्नि में तपाये जाने पर स्वर्ण, स्वर्णपने को नहीं छोड़ता उसी प्रकार ज्ञानी भी उपसर्ग और परीषह के द्वारा खूब तपा दिये जाने पर भी अपने ज्ञानीपने को नहीं छोड़ता, 'पाण्डवादिवत्।' यानि पाण्डवों के समान। पाण्डवों का उदाहरण दिया, सौ कौरवों के साथ युद्ध करते समय के पाण्डवों का या राज्य सुख भोगते हुए पाण्डवों का उदाहरण नहीं दिया। बल्कि उन पाण्डवों का उदाहरण दिया जो राजपाट छोड़कर वीतरागी होकर ध्यान में लीन हैं और उपसर्ग आने पर भी 'जीवाणां रक्खण धम्मो, रयणतयं च धम्मो'- जीवों की रक्षा की धर्म मानकर, रत्नत्रय को धर्म मानकर उसी की सुरक्षा में लगे हुए हैं। वे क्षमाभाव धारण करते हुए विचार कर रहे हैं कि जानना-देखना ही हमारा स्वभाव है। जो कोई इस आत्मा के स्वभाव को नहीं जानता और अज्ञानी होता हुआ यदि बाधा उत्पन्न करता है, तो वह भी दया और क्षमा का पात्र है। कोई यदि स्वर्ण की वास्तविकता के बारे में संदेह कर रहा हो तो यही उपाय है कि उसको तपाकर दिखा दिया जाए या कसौटी के पाषाण पर कस दिया जाए ताकि विश्वास प्रादुभूत हो जाए। पाण्डव ऐसी ही अग्नि परीक्षा दे रहे थे। आप भी यदि दूसरे के अंदर स्वभाव के प्रति श्रद्धान पैदा कराना चाहते हैं या स्वयं के ज्ञानीपने की परीक्षा करना चाहते हैं तो आपको भी ऐसी अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ेगा। अपने जीवत्व की रक्षा के लिए सभी जीवों की रक्षा का संकल्प पहले करना होगा। तुलसी दया न छोड़िये, जबलों घट में प्राण-जब तक घट में अर्थात् शरीर में प्राण हैं तब तक हम जीव दया अर्थात् जीवों की रक्षा करने रूप धर्म को नहीं छोड़ेंगे, ऐसा संकल्प होना चाहिए। आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी ने बोधपाहुड में कहा है कि 'धम्मो दया विसुद्धो।' धर्म, दया करके विशुद्ध होता है। इस दया-धर्म के अभाव में मात्र धर्म की चर्चा करने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। आत्मा के स्वभाव की उपलब्धि रत्नत्रय में निष्ठा के बिना नहीं होती और रत्नत्रय में निष्ठा दया धर्म के माध्यम से, क्षमादि धर्मों के माध्यम से ही जानी जाती है। जहाँ रत्नत्रय के प्रति निष्ठा होगी वहाँ नियम से क्षमादि धर्म उत्पन्न होंगे। तभी आत्मा के शुद्ध स्वभाव की प्राप्ति होगी। दस प्राणों से अतीत (मुक्त) आत्मा ही अपनी वास्तविक ज्ञान-चेतना का अनुभव करती है। आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी कहते हैं कि- सव्वे खलु कम्मफलं थावरकाया तसा हि कज्जजुदं। पाणित्तमदिक्कंता ।णाणं विंदंति ते जीवा। सभी स्थावर जीव शुभाशुभ कर्मफल के अनुभवन रूप कर्मफल चेतना का अनुभव करते हैं किन्तु त्रस-जीव उसी कर्मफल के अनुभव में विशेष रागद्वेष रूप कर्मचेतना का भी अनुभव करते हैं। यह कर्मचेतना तेरहवें गुणस्थान तक चलती है क्योंकि रागद्वेष का अभाव होने के बावजूद भी वहाँ अभी योग की प्रणाली चल रही है, कर्मों का सम्पादन हो रहा है। भले ही एक समय के लिए हो लेकिन कर्मबंध चल ही रहा है। चौदहवें गुणस्थान में यद्यपि अभी स्वभाव की पूर्णत: अभिव्यक्ति अर्थात् गुणस्थानातीत दशा की प्राप्ति नहीं हुई है तथापि तेरहवें गुणस्थान की अपेक्षा वह श्रेष्ठ है। वहाँ योग के अभाव में कर्म का सम्पादन नहीं हो रहा अपितु मात्र कर्मफल की अनुभूति अभी शेष है। इसके उपरान्त दस प्रकार के द्रव्य प्राणों से रहित सिद्ध भगवान् ही शुद्ध ज्ञान चेतना का अनुभव करते हैं। ऐसे सिद्ध भगवान् के स्वरूप के समान हमारा भी स्वरूप है। 'शुद्धोऽहं, बुद्धोऽहं, निरज्जनोऽहं, निर्विकार स्वरूपोऽहं' आदि-आदि भावों के साथ पर्यायबुद्धि को छोड़कर पाण्डव ध्यान में लीन हैं। लेकिन प्रत्येक की क्षमता एक सी नहीं होती। क्षमा-भाव सभी धारण किये हैं, पर देखो कैसा सूक्ष्म धर्म है कि अपने बारे में नहीं, अपने से बड़े भाईयों के बारे में जरा सा विचार आया कि मुक्ति में बाधा आ गयी। वे नकुल और सहदेव सोचने लगे कि 'हम तो अभी युवा हैं, यह परीषह सह लेंगे। लेकिन बड़े भाई तो वृद्ध होने को हैं, वे कैसे सहन कर पायेंगे। अरे! कौरवों ने अभी भी वैर नहीं छोड़ा' -ऐसा मन में विकल्प आ गया। कोई विरोध नहीं किया, मात्र विचार आया। क्षमा धर्म में थोड़ी कमी आ गयी और उस विकल्प का परिणाम ये हुआ कि उन्हें सर्वार्थसिद्धि की आयु बँध गयी, मुक्ति पद नहीं मिल पाया। मान लीजिये, कोई अरबपति बनना चाहता है तो कब कहलायेगा वह अरबपति? तभी कहलायेगा जब उसके पास पूरे अरब रुपये हों। लेकिन ध्यान रखना यदि एक रुपया भी कम है तो भी अरबपति होने में कमी मानी जायेगी। एक पैसे की कमी भी कमी ही कहलायेगी। यही स्थिति उन अंतिम पाण्डवों की हुई। 'जीवाण रक्खण धम्मो' जीवों की रक्षा तो की लेकिन अपने आत्म परिणामों की संभाल पूरी तरह नहीं कर पाये। शेष तीन पाण्डव निर्विकल्प समाधि में लीन होकर अभेद रत्नत्रय को प्राप्त करके साक्षात् मुक्ति को प्राप्त करने में सफल हुए। भइया! क्रोध पर विजय पाने के लिए ऐसा ही प्रयास हमें भी करना चाहिए। आज तो सर्वार्थसिद्धि भी नहीं जा सकते, तो कम से कम सोलह स्वर्ग तक तो जा ही सकते हैं। सोलहवें स्वर्ग तक जाने के लिए सम्यकदर्शन सहित श्रावक के योग्य अणुव्रत तो धारण करना ही चाहिए। आप श्रावक हैं तो इतनी क्षमा का अनुपालन तो कर ही सकते हैं कि कोई भी प्रतिकूल प्रसंग आ जाये तो भी हम क्रोधित नहीं होंगे। क्षमाभाव धारण करेंगे। रत्नत्रय हमारी सहज शोभा है और क्षमादि धर्म हमारे अलंकार हैं, इसी के माध्यम से हमारा जीवत्व निखरेगा। अनन्तकाल से जो जीवन संसार में बिखरा पड़ा है, उस बिखराव के साथ जीना, वास्तविक जीना नहीं है। अपने भावों की सम्भाल करते हुए जीना ही जीवन की सार्थकता है। किसी कवि ने लिखा है कि "असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। और मृत्यो र्मा अमृतोगमय।" जो असत् है या जो सत्य नहीं है, जो झूठ है, जो अपना नहीं है, जो सपना है, उससे मेरी बुद्धि हट जाये। मैं मोह की वजह से उस असत् को सत् मान रहा हूँ और अपने वास्तविक सत् स्वरूप को विस्मृत कर रहा हूँ। हे भगवन्! मुझे अज्ञान के अंधकार से बचा लें और जल्दी-जल्दी केवल ज्ञान रूप ज्योतिपुञ्ज तक पहुँचा दें। मेरा अज्ञानरूपी अंधकार मिट जाये और मैं केवलज्ञान में लीन हो जाऊँ। हे भगवन्! यह जन्म, यह जरा, यह मृत्यु और मेरे कषाय भाव- यही हमारे वास्तविक जीवन की मृत्यु के कारण हैं। अमृत वहीं है जहाँ मृत्यु नहीं है। अमृत वहीं है जहाँ क्षुधा-तृषा की वेदना नहीं है। अमृत वहीं है जहाँ क्रोध रूपी विष नहीं है। इस तरह हम निरन्तर अपने भावों की सम्भाल करें। रत्नत्रय धर्म, क्षमा धर्म या कहो अहिंसा धर्म यही हमें अमृतमय हैं। क्षमा हमारा स्वाभाविक धर्म है। क्रोध तो विभाव है। उस विभाव-भाव से बचने के लिए स्वभाव भाव की ओर रुचि जागृत करें। जो व्यक्ति प्रतिदिन धीरे-धीरे अपने भीतर क्षमा-भाव धारण करने का प्रयास करता है उसी का जीवन अमृतमय है। हम भगवान् से यही प्रार्थना करते हैं कि हे भगवन्! क्षमा धर्म के माध्यम से हम सभी का पूरा का पूरा कल्याण हो। जीवन की सार्थकता इसी में है।
  30. 1 point
    अब दस धर्मों को कहते हैं- उत्तमक्षमा-मार्दवार्जव-शौच-सत्य-संयमतपस्त्यागाकिञ्चन्य-ब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥६॥ अर्थ - उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य, ये दस धर्म के भेद हैं। क्रोध की उत्पत्ति के निमित्त होते हुए भी परिणामों में मलिनता न होना क्षमा है। उत्तम जाति, कुल, रूप, विज्ञान, ऐश्वर्य वगैरह के होते हुए भी उनका घमण्ड नहीं करना मार्दव है। मन, वचन और काय की कुटिलता का न होना आर्जव है। लोभ का अत्यन्त अभाव शौच है। लोभ चार प्रकार का होता है- जीवन का लोभ, नीरोगता का लोभ, इन्द्रियों का लोभ और भोग्य सामग्री का लोभ। इन चारों ही लोभों का अभाव होना शौच धर्म है। सज्जन पुरुषों के बीच में सुन्दर वचन बोलना सत्य धर्म है। English - Supreme forbearance, modesty, straightforwardness, purity, truthfulness, self-restraint, austerity, renunciation, non-attachment and celibacy constitute virtue or duty. शंका - सत्य धर्म और भाषा समिति में क्या अन्तर है ? समाधान - संयमी मनुष्य साधुजनों से या असाधुजनों से बातचीत करते समय हित मित ही बोलता है, अन्यथा यदि बहुत बातचीत करे तो राग और अनर्थ-दण्ड आदि दोषों का भागी होता है। यह भाषासमिति है। किन्तु सत्य धर्म में संयमी जनों को अथवा श्रावकों को ज्ञान चारित्र आदि की शिक्षा देने के उद्देश्य से अधिक बोलना भी बुरा नहीं है। ईर्या समिति वगैरह का पालन करते समय एकेन्द्रिय आदि जीवों को पीड़ा न पहुँचाना प्राणिसंयम है और इन्द्रियों के विषयों में राग का न होना इन्द्रियसंयम है। इस तरह संयम दो प्रकार का है। कर्मों का क्षय करने के लिए अनशन आदि करना तप है। चेतन और अचेतन परिग्रह को छोड़ना त्याग है। शरीर वगैरह से भी ममत्व न करना आकिंचन्य है। पहले भोगी हुई स्त्री को स्मरण न करके तथा स्त्री मात्र की कथा के सुनने से विरक्त होकर स्त्री से संयुक्त शय्या, आसन पर भी न बैठना और अपनी आत्मा में ही लीन रहना ब्रह्मचर्य है। ये दस धर्म संवर के कारण हैं। इनके पहले जो उत्तम विशेषण लगाया है, वह यह बतलाने के लिए लगाया है कि किसी लौकिक प्रयोजन की सिद्धि के लिए क्षमा आदि को अपनाना उत्तम क्षमा नहीं है।
  31. 1 point
  32. 1 point
    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: Anuradha Paudwal, Anoop Jalota
  33. 1 point
    best.... pls upload such more songs.
  34. 1 point
    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: Nandan Jain
  35. 1 point
  36. 1 point
    आज धर्म को हम मार्दव के रूप में पायेंगे। जिसके द्वारा यह प्राणी दुख को निवृत्त कर सुख प्राप्त कर ले, वही धर्म है। मार्दव शारीरिक चेष्टा का नाम नहीं है मार्दव का मतलब कोमलता, ऋजुता का भाव है। मान कषाय का अभाव होने पर मार्दव गुण पैदा होता है। चार गतियों में चार कषायों की बहुलता है। क्रोध की बहुलता नरक में, लोभ की बहुलता देव गति में, वहाँ भोगों की सीमा नहीं है, संतोष भाव नहीं है। पशु पक्षी (तिर्यच) जिनके योगों की वक्रता होती है, चाल टेढ़ी होती है, मायाचारी चरम सीमा पर तिर्यचगति में है और मान कषाय की बहुलता मनुष्य गति में है। मान ऐसा जहर है, ऐसी विकृति है, जिसके पीछे घर-बार, खाना, पीना यहाँ तक कि देश धर्म सब कुछ छोड़ देता है। परिग्रह संज्ञा के पीछे तो परिग्रह का संग्रह हो गया और मान-कषाय के पीछे त्याग (दान) होगा। मान का प्रादुर्भाव कुल मद, जाति मद, विद्या मद, तप मद इत्यादि आठ मदों द्वारा होता है। आय के बढ़ने के साथ-साथ मान कषाय भी बढ़ती है। जब हम धार्मिक क्षेत्र में भी प्रवेश करते हैं, तो भी मान को लेकर चलते हैं। आज हमें मार्दव धर्म के बारे में सोचना है। मार्दव निजी (स्व की) चीज है। मान पर है, यह दूसरे को (पड़ोसी को) देखकर खड़ा होता है। जैसे कहा है कि Other is Hell, हमारे आचार्यों ने भी कहा है कि दूसरे को पकड़ना दुख है। मान निजी वस्तु को लेकर नहीं होता है। मार्दव धर्म ‘स्व” की ओर इंगित करता है, जिसमें बहुत कोमलता है, फूल से भी ज्यादा कोमलता। मार्दव को चिमटा आदि से, आँख-नाक-कान आदि से नहीं पकड़ सकते हैं। यह स्व की चीज है। इसे पर से नहीं पकड़ सकते। दूसरे को पकड़ने की जो चेष्टा है, वह दुख है, नरक है। अपनी चीज को पकड़ने की आवश्यकता ही नहीं है। पकड़ना पर को पड़ता है। इसी कारण अपने स्वरूप को नहीं पहचान पा रहे हैं। जहाँ वात्सल्य, प्रेम हृदय में हो उसके पास भले ही ऊँचा सर वाला आ जाये पर हृदय से ऊपर नहीं हो सकता। मान विनिमान तोलने में आते हैं। जो चीज तोलने में आती है उसका कोई मूल्य नहीं है। ऊँचे सिंहासन पर बैठने में पूज्यता प्राप्त नहीं होती बल्कि पूज्यता, पवित्रता, पावनता मात्र गुणों के विकास में, रत्नत्रय को धारण करने में है। मान सम्मान जो कर रहा है, वह अन्दर की ओर, अमूर्त की तरफ नहीं देख रहा है। जिसके पास तत्व ज्ञान नहीं है वह एक प्रकार से अन्धा ही है। वीतरागता, निरभिमानता एक अनोखी चीज है। पूजा करने वाले और घात करने वाले दोनों के प्रति जो समता रखता है वह सम्यक दर्शन की भूमिका तक पहुँचने लगता है। निरभिमानता आत्मा का स्वभाव है। मान तो आत्मा को तोलने वाला तराजू है। आत्मा की कीमत कोई आंक नहीं सकता है। जहाँ क्रोध है, वहाँ मान भी है। मानी बनना आत्मा के लिए खतरा है। रग रग से करुणा झरे दुखी जनों को देख। चिर रिपु लख ना नयन में, आये रुधिर की रेख ॥
  37. 1 point
    मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र संसार का कारण है। ज्ञान बाहर से नहीं आया और न बाहर चला गया है। पुद्गल और जीव दो द्रव्य हैं। ये दोनों कुछ निमित्त को प्राप्त हो कर विपरीत परिणमन कर देते हैं। स्फटिकमणि के समान जीवात्मा भी स्वभाव को लिए हुए है पर दूसरे के संसर्ग से एक ऐसी सन्धि हुई है कि जिस प्रकार स्फटिक मणि सफेद होते हुए भी सामने गुलाब का फूल होने पर वैसी ही दिखाई देती है। पारे के भस्म के साथ खटाई का मिश्रण हो जाये तो वह भस्म वापस पारा बन जाता है। इसी प्रकार आत्मा का स्वभाव यद्यपि स्फटिक मणि के समान होने पर भी अनादि से पुद्गल से सम्बन्ध जुड़ा होने के कारण अपने स्वभाव में नहीं है। जब तक हमारी विपरीत परिणति रहेगी तब तक हम दुख का अनुभव करते रहेंगे। विभाव सो संसार स्वभाव सो मुक्ति। आपकी भाषा में जो संसार दिख रहा है, वही संसार जो मिट जावे वही मोक्ष। अनन्तानन्त जीव है और अनन्तानन्त मोक्ष। सम्यक् दर्शन, ज्ञान, चारित्र, आत्मा का स्वभाव। सरलता, ऋजुता आत्मा का स्वभाव। पानी का स्वभाव शीतल है, परन्तु उष्णता को धारण कर लेने के बाद पानी पीने पर कंठ व जीभ जला देता है। इसी प्रकार आत्मा के बारे में यही बात है। सम्यक्त्व भाव पाप को छोड़ने व पुण्य को प्राप्त करने से ही नहीं होगा। स्थान से स्थानान्तर, घर से मन्दिर आने से ही सम्यक्त्व भाव नहीं होता है। पुण्य-पाप तो पुद्गल के रसायन हैं, जो आत्मा के राग द्वेष को लेकर के परिणमन करते हैं, इनका प्रदेश भिन्न है। इनसे सम्यक्त्व का प्रादुर्भाव नहीं है। धर्म आत्मा का एक स्वभाव है। जहाँ यह विश्वास हो जाता है कि सुख बाहर नहीं है, आत्मा को पुण्य-पाप से अलग रखते हुए उसमें लगी कालिमा को हटाने पर ही सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है। हमने यह विश्वास कर लिया है कि पुण्य को प्राप्त करने व पाप को त्याग करने में धर्म है। धर्म राग-द्वेष हटाने में है। सुख आत्मा में है न कि बाहरी वस्तुओं में, जो फल मिला है, मनुष्य उसकी सुरक्षा कर सकता है। भरत को चक्ररत्न मिला, वह संग्रहवृत्ति के लिए दिग्विजय नहीं करता बल्कि उसकी (चक्ररत्न) सुरक्षा के लिए करता है। आप लोगों की सुबह से शाम तक कितनी विपरीत दृष्टि रहती है। आप ये नहीं सोचते कि कर्म का जितना फल है, उतना ही भोगूँ। कमाने की भी कोई हद होती है। सम्यक दृष्टि दूसरों को भी सम्यक दृष्टि प्रदान करना चाहता है। कहते हैं कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है पर आज तो आविष्कार आवश्यकता की जननी हो रही है। बच्चे की तरह यह व्यक्ति भी आवश्यकता की वस्तु को भूलकर यह भी ले लुं वह भी ले लुं आदि अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह करता है। मन रागद्वेष से लिप्त है आवश्यकता के उपरांत आविष्कार हो तो ठीक है। जो इन्द्रियों के वश में नहीं है उसे आवश्यकता कहते हैं और जिसके लिए जो कार्य है, वह आवश्यक है। चक्रवर्ती का शासन प्रजा पर नहीं है, पर माण्डलिक राजाओं पर शासन होता है। कहीं ये राजा प्रजा पर अत्याचार न करें, इसलिए चक्रवर्ती दिग्विजय करता है। जीव के बारे में सम्यक दृष्टि सोचता है तब प्रयोजन मालूम हो जाता है, प्रयोजन सारतत्व है वह भी हेय-उपादेय में विभक्त हो जाता है। आस्त्रव और बंध हेय है, संवर-निर्जरा उपादेय है, मुक्ति है। ईधन डालते ही रहने से अग्नि की तृप्ति नहीं होती। जीव की परिणति अनादि से अप्रयोजनभूत तत्व की ओर ही रही है। स्वभाव की चाह की पूर्ति हो सकती है, लेकिन विभाव की, पर पदार्थ की पूर्ति कभी नहीं हो सकती। पदार्थ अनन्तानन्त है, उनको प्राप्त करने के लिए अनन्तानन्त समय चाहिए। इस चाहरूपी दाह की तृप्ति नहीं हो सकती है। पुण्य है, वही रहेगा। सम्यक् दर्शन कैसा है, अनुभव से मालूम कर सकते हैं। यह सुख अपने में उत्पन्न होता है, पाप पुण्य से नहीं। पुण्य उसको प्रादुभूति में सहायक हो सकता है, पाप उसको नष्ट करने में सहायक हो सकता है। पाप को छोड़कर पुण्य को प्राप्त करना, बाहरी है। वीतरागी होते हुए भी रागी लोगों का मार्ग प्रशस्त हो जाये यही बात करने के लिए आचार्य आदि प्रयत्न कर रहे हैं। साधु न बन सको तो कम से कम पीछे चलने का प्रयास करो, स्वादू तो मत बनो, कालांतर में साधु बन सकते हो। सुख को अपने में ढूँढ़ो वह बाहरी पदार्थों से प्राप्त ही नहीं होता है।
  38. 1 point
    सबसे ज्यादा अनर्थ होते हैं, तो मान-प्रतिष्ठा के कारण होते हैं। इसी के कारण आज बड़े-बड़े राष्ट्रों के बीच में संघर्ष छिड़ा हुआ है। मानी व्यक्ति अपनी पत्नी को छोड़ सकता है। मानी व्यक्ति अपनी प्रजा को छोड़सकता है। मानी व्यक्ति अपने भ्राता को छोड़ सकता है। लेकिन अपने मान को नहीं छोड़ सकता । आज यह पर्व का द्वितीय दिन है। जो व्यक्ति दूसरे को नहीं देखना चाहता है वह एक प्रकार से मानी कहलाता है। बिल्कुल ठीक। भगवान् को आप देखते हैं। भगवान् किसी को देखते हैं क्या? नहीं। आप लोग प्रतिदिन भगवान् को देखकर के आ जाते हैं। क्या भगवान् ने किसी को देखा? नहीं देखते। और जो किसी को नहीं देखना चाहे, उनको क्या कहा जाय ? मानी। बिल्कुल ठीक। दुनियाँ को देखते-देखते अनन्तकाल व्यतीत हो गया। और उसी का यह परिणाम है कि हमने अपने आप का महत्व खो दिया। भगवान् के दर्शन करने से हमें यही तो ज्ञात होता है। इस दुनियाँ को देखने से ही हमारे भीतर कषाय उत्पन्न होती चली जाती है। दुनियाँ को देखने से कभी भी अभिमान नहीं होता। किन्तु अपने स्वरूप से च्युत होकर के जब हम भिन्न पदार्थों के संयोग से अपने आपको बड़ा समझते हैं, उस समय यदि कोई हमारे इक्वल, बराबर मिल जाते हैं, तो कषाय के भाव जागृत हो जाते हैं। विधर्मी से इतनी लड़ाई, इतना संघर्ष नहीं होता, जितना कि साधर्मी भाई से होता है। कोई भी व्यक्ति विदेश से यहाँ आ जाय, तो उससे आप कभी भी अभिमान नहीं करेंगे। अन्य प्रान्त से आ जाता है, तो उससे भी नहीं करेंगे। अन्य संभाग से आ जाता है, तो उससे भी कोई लेनदेन नहीं। अन्य जिला से भी आता है तो बनती कोशिश उससे भी नहीं होगा। अब बात आ जाती है अपनी तहसील की। वह भी कभी कभार मिल जाते हैं तो बात अलग है। नहीं तो वह भी यूँ ही निकल जाते हैं। अब बात आती है अपने गाँव की। उसमें भी कोई दूर रहता है। अन्य किसी मुहल्ले में और उसके साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है, तो उससे भी कोई मान-अभिमान की बात नहीं होगी। अब बात आ जाती है अड़ोस-पड़ोस की। बस, एक दुकान भी बीच में हो, तो दूसरी दुकान से भी अभिमान ज्यादा नहीं होगा। कषाय नहीं होगी। साथ-साथ रहते हैं, तो वहाँ पर अभिमान उत्पन्न होने लग जाता है। जितना निकट हो, उतना परिचय प्राप्त हो, उन्हीं के साथ हम लोगों का इस प्रकार का संघर्ष चलता रहता है। इससे शान्ति पाने के लिये और अपने स्वभाव की कीमत देखकर विश्व को देखना ही बंद कर दिया, स्वभावनिष्ठ हो गये, ऐसे भगवान् की मूर्ति देखते हैं, तो हमको कभी भी अभिमान उत्पन्न नहीं होता है। अभिमान तो दूसरे के ऊपर से होता है। इसलिए वह महामानी सिद्ध होते हैं। और मान का अर्थ भी एक प्रकार से ज्ञान वाचक है। क्योंकि प्रमाण की उत्पत्ति होती है, तो मान को प्र उपसर्ग लगाने से ही होती है। जिसको स्व व पर का सही मूल्य ज्ञात नहीं है, वही व्यक्ति प्रत्येक द्रव्य के पास अपने उपयोग को भेजकर उसका आदर करना प्रारम्भ करता है। दुनियाँ की छोटी से छोटी वस्तु भी हमारे आकर्षण का केन्द्र बन जाती है। और तीन लोक की सम्पदा से भरा हुआ वह व्यक्तित्व भी जो छिपा हुआ है, उसके बारे में हम कभी भी सोचते तक नहीं। यह ध्यान रखो, दश खण्ड का प्रासाद, भवन भी अपने काम में नहीं आने वाला और अपनी कुटिया भी बहुत अच्छी छायादार नजर आयेगी। स्वाभिमान वाला जो व्यक्ति होता है, वह सोचता है कि महान प्रासाद में अपने को नहीं रहना है। अपने को अपनी कुटिया में ही रहना है, अर्थात् स्वतन्त्रता यहीं पर है। वहाँ पर स्वतन्त्रता नहीं। एक-एक पाई के लिये एक-एक मांग की पूर्ति के लिये दुनियाँ का यह प्राणी कहाँ-कहाँ पर नहीं गया ? जैसे कि कल उदाहरण दिया था, मान का। व्यक्ति जब दूसरे पदार्थ की इच्छा रखता है, तो वह क्या-क्या नहीं करता ? सब कुछ करने के लिये तैयार रहता है। पाँचों इन्द्रियों के भिन-भिन्न विषय हैं। यह मान-प्रतिष्ठा कौन-सी इन्द्रिय का विषय है ? खुराक है ? थोड़ा सा देख लें, तो बहुत अच्छा है। किसका पेट भरता है, मान को खाने से ? स्पर्शन इन्द्रिय की भी खुराक यह नहीं है। इसकी खुराक क्या है ? आठ प्रकार के स्पर्श हैं। मान प्रतिष्ठा उसकी खुराक नहीं। रसना इन्द्रिय का विषय अनेक प्रकार के रस हैं। पाँच प्रकार के रस हैं। रसना इन्द्रिय की भूख भी मान प्रतिष्ठा के माध्यम से मिटती नहीं। तीसरे नम्बर की है नासिका। उसकी क्या आशा है ? वह भी कभी मान-प्रतिष्ठा नहीं चाहती। गन्ध चाहती है। सुगन्ध हो या दुर्गन्ध हो, कोई भी हो, वह पसन्द करती है। चक्षु इन्द्रिय अर्थात् आँख, यह भी मान-प्रतिष्ठा नहीं चाहती है। चाहती है क्या ? महाराज! जब अपमान हो जाता है तो आँखों में से पानी आ जाता है। है ना ? हाँ, इसीलिये आँख की खुराक मान है। यदि मान नहीं मिले तो पानी आ जाता है। अन्यथा आँखें फूल जाती हैं, खिल जाती हैं। इससे स्पष्ट है कि आँख की खुराक मान है। नहीं, आँख की खुराक रूप है। अब रही कान की बात। अपनी प्रशंसा सुन लेते हैं, तो कान उठकर ही खड़े हो जाते हैं। पैर आ जाते हैं उनके पास। वह भी नहीं। क्यों इसलिए सुबह कहा था ना, संज्ञी वही होता है जो संकेत को समझकर के काम कर लेता है। इस तरह पाँचों इन्द्रियाँ गायब हो गई। किन्तु प्रतिष्ठा किसकी खुराक है ? एक मात्र मन रह जाता है, वही एक मात्र इसकी भूख रखता है। किन्तु वह हमेशा रखे, यह नियम नहीं। जब व्यक्ति दरिद्र रहता है, उस समय वह मान की ओर प्राय: नहीं देखता। तब सब तरह से दरिद्रता रहती है। जब एक-एक विषय की पूर्ति होती चली जाती है, तो धीरे-धीरे मन को एक प्रकार से जीवन मिल जाता है। जिसका पेट ही नहीं भरता, वह चक्रवर्ती बनना नहीं चाहेगा। स्वप्न तक नहीं देखेगा वह। क्योंकि यह संभव नहीं, थोड़े से ऊपर खड़े हो जाते हैं तो फिर भागने की बात आ जाती है। जो उठकर देख भी नहीं पा रहा है, पैर ही नहीं हैं, तो फिर भागने की बात ही नहीं होती। एक-एक विषयों की पूर्ति होती चली जाती है तो मान-प्रतिष्ठा की ओर भी चला जाता है। मन का विषय मान है, क्योंकि छोटा व्यक्ति बड़े के पास जाना नहीं चाहता। वह मुझे खरीद लेगा। बड़ा व्यक्ति छोटे के पास जाना चाहता है। क्यों? उसकी पूर्ति उन्हीं के माध्यम से होगी। अब देखो! मान की भूख किसको हो गई। बड़ों को हो गई। अब उसकी पूर्ति किससे करेंगे ? एक बड़े व्यक्ति की भूख को मिटाने वाला छोटा व्यक्ति बड़ा है या वह बड़ा है। नहीं समझे। कि एक बड़ा व्यक्ति चक्रवर्ती भी अपनी भूख को मिटाने के लिये दरिद्र के पास चला जाता है। उसकी भूख वह मिटा देता है, तो बड़ा कौन हो गया ? चक्रवर्ती सोचता है, बड़े साहूकार सोचते हैं-मेरी वजह से इसका कार्य हो रहा है। सही पूछा जाय तो ज्ञान के द्वारा सोच लेना चाहिए कि इसके द्वारा मेरा काम चल रहा है। यदि यह नहीं चलेगा तो ब्लडप्रेशर में कमी-वेशी होने लगेगी, यह निश्चित बात है। अब मुझे कौन पूछेगा ? पूछ लगा लो, तो पूछेगा ही। किससे आप पूंछ लगवा रहे हैं ? मनुष्य होकर पूंछ चाहते हो। वाह! तब वह जागृत हो जाता है। सबसे ज्यादा अनर्थ होते हैं, तो मान-प्रतिष्ठा के कारण होते हैं। इसी के कारण आज बड़े-बड़े राष्ट्रों के बीच में संघर्ष छिड़ा हुआ है। हमने खोज की, हम वहाँ पर गये, हमने यह किया, वह किया, यह सब बातें केवल प्रतिष्ठा की अपेक्षा से आ जाती हैं। एक व्यक्ति ने कहा था-आज सौरमंडल के बारे में जितनी भी छानबीन हो रही है, उसमें जितना पैसा खर्च हो गया, आगे की जो योजनायें हैं, उसका खर्च भी निकालकर रख जाय, तो उससे तीन वर्ष तक विश्व की आबादी के लिये अनाज की पूर्ति की जा सकती है। हमें समझ में नहीं आता-इन राष्ट्रों के उद्देश्य क्या हैं ? तीन वर्ष तो बहुत हो गया। इतना खर्च किया जा रहा है, वहाँ जाने के लिये। इससे क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? इससे कुछ सिद्ध नहीं होने वाला। इससे कोई ज्ञान का विकास होने वाला नहीं। फिर कहाँ गये, इस पर भी एकमत नहीं है। कोई दरिद्र हैं, कोई अकाल में पड़े हैं। कोई ईति से ग्रसित हैं, बहुत ही हीन दशा में पहुँच गये हैं। उनके लिये थोड़ा प्रबन्ध किया जाता है, तो बहुत बड़ा कार्य हो सकता था। लेकिन उसके बारे में नहीं सोचते। यह व्यक्ति मान-प्रतिष्ठा का ऐसा शिकार बन चुका है कि उसका सोच ही नहीं रहा। यह क्यों नहीं सोचता ? आचार्य कहते हैं-कि अफसोस की बात यही है। दुनियाँ के बारे में सोच रहा है। इसलिए ऐसा हो रहा है। जहाँ मान कषाय आ रही है, तो उसका कारण बस एक ही है कि वह दुनियाँ के बारे में छानबीन करता चला आ रहा है। यदि अपने बारे में सोच ले या स्वभाव के बारे में सोच ले, तो यह नहीं हो सकता। दूसरी बात यदि दूसरे के बारे में सोचता भी है तो, दीन व्यक्तियों की बात अलग है। मानी से मानी व्यक्ति भी किसी दीन-दुखी व्यक्ति को देख लेगा तो उसको नीचे से ऊपर उठाने का प्रयास भी करेगा। कुछ बातें पूछने के लिए बात करेगा। यद्यपि और किसी से वह बातचीत नहीं करता। लेकिन रोते हुए व्यक्ति को देखकर, भयभीत व्यक्ति को देखकर, वह बड़ा है, यह अपने आप ही भूलकर उसका सुख-दुख सुनने को तैयार हो सकता है। ये दो बातें हैं। पर को देखने से, दीन दरिद्र को देखने से अपना मान कम हो सकता है, और स्वभाव की ओर देख लें, तो मान समाप्त ही हो सकता है, हो जाता है। महाभारत कब हुआ, और क्यों हुआ ? इसकी जड़ क्या है ? क्या खाने के लिये नहीं था या रहने के लिये जगह नहीं थी ? जंगल में मंगल हो सकता है। दस-दस खण्ड के मकान में रहने वाले यहाँ पर, क्षेत्र पर एक भी मकान नहीं मिल रहा। महाराज! इतनी जगह मिल गई, बहुत पर्याप्त है। पर्याप्त है, मान कहाँ चला गया ? वहाँ न पंखा है, न कूलर है, न फ्रिज है, न कुकर। क्या है ? कुछ भी तो नहीं है। बस इतना ही पर्याप्त है, महाराज! कैसे दिन निकल रहे हैं ? महाराज! पता नहीं चलता। ऐसा लगता है दिन आता है तो रात सामने है। रात आती है तो दिन सामने है। यानि सुबहशाम निकल रहे हैं। और आनन्द मंगल है। हमें पहले यह देखना है कि हमारी ऐसी दशा कैसे हुई ? मान-प्रतिष्ठा के कारण हमने बहुत सारे गुणों का अनादर किया। महाभारत इसीलिये हुआ। मान-प्रतिष्ठा के कारण हुआ। इतनी यातनायें, ये सभी मान-प्रतिष्ठा के कारण और अन्त में मान की चरम सीमा है। अपमान करने की एक चरम सीमा है। दूसरे को अपमान करके अपना पेट भरने की चरम सीमा है। दुर्योधन और दु:शासन ने यह निश्चित कर लिया कि द्रौपदी के वस्त्र का हरण कर लेना। उसमें कौन-सी बात छिपी हुई थी, मुझे बताओ ? उसमें एक मात्र यही बात बनेगी कि हमारे देखते ही देखते मानप्रतिष्ठा समाप्त हो गई। इस प्रकार उनको नीचा दिखने का एकमात्र उद्देश्य था। यह कौन-सी भूख है ? यह किसकी भूख है ? यह राक्षसी भूख है। शीलवती स्त्री के ऊपर भी इस प्रकार का कार्य हो सकता है। जब मान खड़ा हो जाता है, तब यह महान अनर्थ का कार्य भी कर सकता है। योद्धा कहना तो फिर भी ठीक है, लेकिन इन दोनों के साथ दुर् ही लगा है। हमारी समझ में नहीं आता। योद्धा अच्छा हो तो सद्योद्धा, सुयोद्धा और योद्धा कह सकते हैं। अयोद्धा कह सकते हैं। लेकिन इन दोनों भाईयों के पीछे एक ही नाम दुर्योधन, दु:शासन और एक नाम दुष्यन्त में दु क्यों लगा? यह समझ में नहीं आता। जिनकी बुद्धि ही दुष्ट है, जिनका शासन ही दुष्ट है। क्या सोचता है मन? पाँच इन्द्रियाँ सोचतीं नहीं और यह मन सोचता है। इनको दुखित बनाने का मात्र एक ही उपाय है-इनकी पत्नि को नग्न कर देना। बहुत बड़ा अनर्थकारी निर्णय। और वह कौन ? भीष्म पितामह। कैसे देखते रह गये, जो महाभारत की सभा में सिरमौर जैसे, और देखते रह गये वह कौन-सी भीतर की इच्छा है ? लोभ, ललक है। यह कौन सी खुराक है ? क्या नीति ही डूब गई ? मानी व्यक्ति के सामने सब कुछ डूब जाता है। रावण आखिर नरक क्यों गया ? इसका भी उत्तर यही है। मैंने पुरुषार्थ किया है, तो तुमको भी पुरुषार्थ करना है। सामने दिख रहा है, स्पष्ट दिख रहा है, इसमें मेरी मृत्यु निश्चित है। मृत्यु तो हमेशा होती है, किन्तु क्षत्रिय का कर्तव्य होता है कि मान-प्रतिष्ठा बढ़ाकर चलना चाहिए। अब प्राण प्यारी मन्दोदरी से रावण कहता है- मेरी बात मंजूर है, तो ठीक है, नहीं तो यहाँ पर आने की जरूरत नहीं है। रावण स्वयं नीतिज्ञ है। उसके सामने नीति सिखाने का यह प्रयास ठीक नहीं। मानी व्यक्ति अपनी पत्नि को छोड़ सकता है। मानी व्यक्ति अपनी प्रजा को छोड़ सकता है। मानी व्यक्ति अपने भ्राता को छोड़ सकता है। लेकिन अपने मान को नहीं छोड़ सकता। सबको छोड़ सकता है वह मानी व्यक्ति, प्राण प्यारे जीवन को भी छोड़ सकता है। लेकिन मान को नहीं छोड़ सकता। नरक जाना मंजूर है, लेकिन मान को कभी भी, किसी के सामने बेचेंगा नहीं। यही क्षत्रियता के लिये कलंक है। मैं अपने परिवार में व राज्य में राजा होकर कभी अपने जीवन को कलंकित नहीं करूंगा। ध्यान रखो, मैं क्षत्रिय मर जाऊँ, मैं कभी मर नहीं सकता। यह शरीर आज नहीं तो कल मरना ही है। मुझे अपने जीवन की अमरगाथा बनाकर के ही जाना है। रावण का नाम युगों-युगों तक यह जग याद करता रहेगा। मैं राम बनना नहीं चाहता, रावण बनना चाहता हूँ। ऐसा सबको बता देता है। समझे। इस चीज की प्राप्ति के लिये कितने अनर्थ किये जा सकते हैं। पुराण ग्रन्थ उनके लिये साक्षी हैं। एक भी पुराण ऐसा नहीं है, जिसमें मान के कारण कोई नरक नहीं गया हो। एक भी युग ऐसा नहीं है, जहाँ पर इस प्रकार मान-प्रतिष्ठा को धक्का लगने से व्यक्ति भीतर ही भीतर घुटकर नहीं मरा हो। बहुत दयनीय स्थिति है। इतिहास को देखिये। उनमें हमारा भी नम्बर अवश्य होगा, शायद। आज तक मान कषाय पनप रही है। उसका क्या कारण है ? मान का परिवेश क्रोध से कम नहीं है। ये दोनों द्वेष के प्रतीक हैं। सभा में यदि विप्लव हो सकता है तो दो व्यक्तियों के माध्यम से हो सकता है। एक क्रोधी या एक मानी के माध्यम से। किसी को क्रोध आ जाय, तो वह सभा में विप्लव कर दे। एक मानी व्यक्ति आकर के सबसे सामने बैठ जाय। आपकी आँखों के सामने बैठ जाये। पीछे वालों को देखो, आगे वालों को भी देखो। क्या बात है ? जो सामने है उसी को देखो। आपको सामने देखना है। मैं उनको ही सामने देख रहा हूँ। मान-प्रतिष्ठा के लिए यह संसारी प्राणी बहुत अनर्थ करता है। पेट भरता नहीं। पेट कहता है- भैया! मैं तो भूखा हूँ, और मेरे लिये आधा पाव आटा आवश्यक है। भैया! आटो ढूंढ़ रहे हो आप लोग। समझ में नहीं आता, आप आटो में घुमा दोगे तो मेरा कुछ होगा नहीं और किसको क्या भर रहा है ? हमें समझ में नहीं आ रहा है। मन पूरा भी नहीं समझता। क्योंकि हम तो घूम आये और ऐसी कार में बैठकर घूम आये जो किसी के पास नहीं थी। ऐसी कार। सब बेकार बैठे हैं। ऐसी कार में घूमकर सबके सामने से आ गया हूँ। पेट कहता- मेरे लिये क्या मिला ? कुछ तो खिलाते। कुछ तो पिलाते। उसकी ओर कोई नहीं देखता। प्रयोजनभूत तत्व के बारे में जब हम सोचते हैं, तब मान-प्रतिष्ठा अप्रयोजनीय सिद्ध हो जाती है। और जिस व्यक्ति की दृष्टि में तत्वचर्चा करने के उपरान्त भी मान-प्रतिष्ठा की भूख रहती है, तो इस तत्वज्ञान का कोई मूल्य नहीं है। क्योंकि यह प्रयोजनभूत ही नहीं है। इसीलिये कथचित् आचार्यों ने कहा है, कि तुम्हारे लिये प्राणों की रक्षा करना है। सुन रहे या नहीं। सुनाने की सामग्री तो अब सुन ही लो, कानों से सुन लो, तो अच्छा है। उसमें क्या इनडायरेक्ट दिखता है ? यहाँ जो हमारे लिये मोक्षमार्ग में कार्यकारी है, ऐसी पाँचों इन्द्रियों को प्राण के रूप में स्वीकार किया है। आयु को भी प्राण के रूप में स्वीकार किया है। लेकिन मान को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया। मोक्षमार्ग में मान का क्या महत्व है ? पूछा जाये, तो कोई महत्व नहीं है। एक सेकेंड के लिये भी वह कार्यकारी नहीं है। बल्कि मान के कारण मोक्षमार्ग में दूषण लगते हैं। मान को मिटाने के लिये पुरुषार्थ बताया है। इसलिए प्राण के स्थान पर होने वालीं इन्द्रियाँ, जिसके माध्यम से ज्ञान प्राप्त कर हम मोक्षमार्ग पर चल सकते हैं, वे तो हमारे लिये कार्यकारी हैं। किन्तु मान-प्रतिष्ठा नहीं। यदि आप मान की प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहते हो, तो मान कषाय की प्रतिष्ठा मत बढ़ाओ। प्रमाण की प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहिए। सही ज्ञान की प्रतिष्ठा वह है जिसके माध्यम से तत्वज्ञान से हीन व्यक्ति भी तत्वज्ञान की ओर आकृष्ट हो जाये। तत्वज्ञान की संभाल करो यानि सम्यग्ज्ञानी का सम्मान करो और सम्मान करो अर्थात् उसको मान नहीं दी। मान और सम्मान में बहुत अन्तर है। क्योंकि ज्ञानी का सम्मान करने से अनेक अज्ञानी भी ज्ञान की ओर आ जायेंगे और मान देने से वही विपरीत चलने लग जाता है। उसको मान कभी न दें, क्योंकि वह सोचेगा, मैं जो कार्य कर रहा हूँ, मैं जो सोच रहा हूँ, वह समीचीन है और बहुत अच्छा है। इसलिए एक प्रकार से आपके माध्यम से उसका पतन हो जायेगा। मान सम्मान अनिवार्य है लोक में। पर प्रयोजनभूत तत्व की ओर लाने के लिये उसको क्षय कर देना चाहिए। प्रयोजनभूत तत्व क्या है? मान प्रयोजनभूत तत्व नहीं है, यह पहले समझें। महाभारत, रामायण और भी पुराणों को देखने से ऐसा लगता है, कि बड़े-बड़े क्षत्रियों में भी मान की बातें थी। मान का आधार क्या है ? किन-किन चीजों को लेकर मन में मान जागृत हो जाता है? मान का अधिकृत स्थान मन है। और मन क्या चाहता है ? किन-किन चीजों के लेकर मान करता है ? आचार्य समन्तभद्र जी महाराज ने कहा, उनकी यह कारिका बहुत अच्छी लगती है। इस कारिका को पढ़ने, सुनने और अध्ययन करने से लगता है कि यह एक मात्र कारिका ही पर्याप्त है, दुनियाँ में सम्यग्ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए, अध्यात्म के प्रचार-प्रसार के लिये। पहले क्या रखा? पहले ज्ञान रखा ज्ञानं पूजां कुलं जातिं बलमृद्धिद्रं तपो वपुः। अष्टावाश्रित्य मानित्वं स्मयमाहुर्गतस्मयः॥ (रत्नकरण्डक श्रावकाचार-२५) गतस्मय: यह विस्मय की बात है। किसके ऊपर यह मद करता है। मय यानि मद होता है। ज्ञान को लेकर व्यक्ति मद करता है, किन्तु यह विपरीत हो गया। ज्ञान तो दीपक का काम करता है। विज्ञान अपने को भी बचाता है और उसकी छाया में जो आता है वह भी बच जाता है। लेकिन ज्ञान के माध्यम से सम्यग्दर्शन समाप्त हो जाता है। यह तो समझ में नहीं आता। ज्ञान के माध्यम से नहीं, ज्ञान का मद करने से। ज्ञान के माध्यम से तो स्व-पर प्रकाशन हो जाता है। ज्ञान का मद करने से स्व का भी ज्ञान और पर का भी ज्ञान, दोनों ही पतित हो जाते हैं और मान करते-करते कहाँ पर चले जाते हैं ? पता नहीं लगता और अनर्थ हो जाता है। दो व्यक्ति आये और कहा- महाराज! हम दोनों मिलकर काम कर रहे हैं, हमारे लिए आशीर्वाद दे दो, ताकि हम दोनों के बीच कोई मतभेद न हो। घबराते क्यों हो ? दोनों व्यक्तियों में से एक व्यक्ति ने कहा - हमारा सामंजस्य बना रहे, महाराज! हमें विश्वास है, कि सामंजस्य बना रहेगा, क्योंकि तुम देने में से एक ही विद्वान् है। दो विद्वानों के बीच में ही मतभेद होते हैं। और मतभेद होते-होते मनभेद भी हो जाते हैं। घबराओ नहीं। दो विद्वानों के मिलने से ही झगड़े शुरू होते हैं। ऐसा बड़ा तूफान भी हो जायेगा। किन्तु एक विद्वान् के पीछे नहीं। हमारी बात क्यों नहीं मानी जा रही ? इसीलिये झगड़ा होता है। मेरी बात नहीं मानी जा रही है। हमें क्या कम समझते हो ? तो ज्यादा कौन है ? कम तो कोई नहीं है। मैं भी नहीं। तू ही है मैं कहने से तो दोनों व्यक्ति आ सकते हैं। मैं कहने की अपेक्षा से ही तब वह कहेगा आपको तुम कहो। और तुम उनको कह दो। दोनों ही आ जायेंगे। वह होना चाहिए। पर ऐसा होता नहीं। इसलिए पहले ज्ञान को रखा। ज्ञान चूँकि राग-द्वेष का अभाव करने के लिये था, किन्तु उसके कारण मद कर लिया, तो ज्ञान का ही दम निकल गया। मद का विलोम परिणामन हो जाता है। दम निकल गया। जिसके द्वारा जीवन बनना था, उसी से जीवन बिगड़ गया। जिसके माध्यम से विकास होना था, विकास समाप्त हो गया। मद आने के उपरान्त आचार्यो ने कहा है-अन्धकार फैल जाता है। मद वाले अन्धे होते हैं। मदान्ध जिसको कहते हैं। मद हो जाता है तो अन्धा हो जाता है। और यदि मद नहीं है तो अन्धा भी ज्ञानी हो जाता है। यही एकमात्र कारण है, जिसके करने से सम्यग्दर्शन समाप्त हो जाता है। कुल का मद, जाति का मद, ऐश्वर्य का मद, शारीरिक बल का मद आदि ये सारे के सारे मद के स्रोत हैं। जिस ज्ञान के माध्यम से मद आता है, तो वह दूसरों को समाप्त करना चाहता है। जो व्यक्ति मद के कारण दूसरों को समाप्त कर देता है, वह अपने आत्मधर्म को ही मिटा देता है और कुछ नहीं कर रहा है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को इसी मद के कारण मिटाने पर तुले हुए हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को गिराने के लिये बल का प्रयोग करता है। यदि उस बल का प्रयोग विकास के लिये करता है तो क्या कहना ? यह नहीं हो रहा है। 'न धमों धार्मिकैबिना' धर्म कभी भी हम देख नहीं सकते, इस दुनियाँ में धर्मात्माओं के अभाव में। और धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति यदि अपने मद के कारण धर्मात्माओं को अपमानित करता है, उनको नीचा गिराने का प्रयास करता है, तो यथार्थतया वह व्यक्ति क्या कर रहा है ? धर्म को ही निर्मूल समाप्त कर रहा है। मान की एक ऐसी गर्मी है, जिसके द्वारा ठण्ड के दिनों में भी पसीना आ जाता है। नहीं आता क्या ? हाँ। मान के कारण बाहर ही बैठ जाता है, उनको वहाँ भी कुछ नहीं होगा। मान के कारण भीतर भी नहीं आते, क्योंकि हमें बुलाया नहीं गया। उन्हें ठण्ड नहीं लगेगी, इतनी गर्मी है, सर्दी कहाँ से लगेगी ? उनको तो लग ही नहीं सकती। जब तक वह उतरेगा नहीं मान के शिखर से, तब तक उन पर ठण्ड की कोई अनुभूति नहीं। न चादर की आवश्यकता, न कमरे की आवश्यकता, न पाटे की आवश्यकता, न चटाई की आवश्यकता, किसी की आवश्यकता नहीं। जब तक यह गर्मी रहेगी, तब तक तो वहाँ बिल्कुल हीटर जल रहा है। निश्चित बात है, यदि हम लोग प्रयोजनभूत तत्व को देख लें तो बहुत बड़े-बड़े लाभ कर सकते हैं। और हम उस प्रयोजन को गौण कर लें तो बहुत बड़े-बड़े अनर्थ भी हो सकते हैं। तुम्हारा यह मौलिक जीवन धूल में मिल सकता है। मिलता आया है। गुस्सा से हम बहुत कुछ काम कर सकते हैं। मान से हम बहुत कुछ कर सकते हैं। लेकिन धार्मिक भाव से, आज तो धर्म युग नहीं है, महाराज! क्यों? पंचमकाल है। और पंचमकाल में धर्म-कर्म नहीं होता है। स्ववश धर्म होना आज दुर्लभ है। परवश बहुत कुछ हो सकता है। इससे तो बढ़िया यहीं-कहीं उपवास करके रह जायें। बस वह ४-५ दिन तक खायेगा नहीं। एक व्रत करना भी मुश्किल था, उसके लिये और इस तरह डॉट दिया, तो वह पाँच दिनों तक उपवास कर सकता है। हम आयेंगे नहीं, बुलायेंगे। छह दिन तक आप बुलाते रहोगे, फिर हम आयेंगे। यह अत्यधिक तीव्र होता है। अब कहें क्या ? दिखता तो है नहीं, महाराज। मान इतने बड़े व्यक्तित्व को भी क्यों हिला देता है ? समझ में नहीं आता। कल ही कहा था परं परं सूक्ष्मम्॥ प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक् तैजसात्॥ अनन्तगुणे परे॥ (तत्त्वार्थसूत्र - २/३७, ३८, ३९ ) हाँ, अनन्तगुण भरे हैं। अनन्तानन्त पुद्गल परमाणुओं के माध्यम से मान का निष्पादन होता है। वह गोली का काम करता है उसके पास ऐसी शक्ति है। बल्कि वह शब्द तो निकल जाता है। लेकिन जब कभी याद आ जाय तब भी वह जैसे अभी गोली लगी हो, ऐसा अनुभव होता है। इसी को बोलते हैं प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ स्थान यानि फल देने की शक्तियाँ। चौदहवें गुणस्थानवर्ती के लिये भी यह संभव है। क्यों होता है ऐसा ? इसके पास उसकी शक्ति रहती है। मनोभाव के साथ अच्छे भाव के बारे में हम सोच लेते हैं तो उसी प्रकार अचेतन को लेकर भी कार्य हो सकता है। बुराई को लेकर कर सकते हैं तो बुरे कार्य भी हो सकते हैं। तो अच्छे भावों के साथ प्रथम स्थान, द्वितीय स्थान, तृतीय स्थानगत बन्ध होता था, परन्तु ज्यों ही सम्यग्दर्शन की भूमिका आ जाती है, आचार्यों का उल्लेख है - प्रशस्त प्रकृतियों में चतुर्थ स्थानीय बंध होना प्रारम्भ हो जाता है। हम कषायों के द्वारा चतुर्थ स्थानीय को द्वितीय स्थान तक ले जाते हैं। और यदि धार्मिक कार्यों की ओर झुकाव हो जाता है, सात्विक जीवन की ओर चला जाता है उपयोग, तो निश्चित रूप से वह चतुर्थ स्थानीय बंध करना प्रारम्भ कर देता है। वह ऐसी पोटेंसी होती है, जिसका बिना बोले ही मात्र भावों के माध्यम से उस व्यक्ति के ऊपर प्रभाव पड़ जाता है। सम्मान के ऐसे कार्य भी आप कर सकते हैं, जिसके माध्यम से बड़े-बड़े कार्य जो रुके हुए हैं, वह भी यूँ ही खेल-खेल में हो जाते हैं। ज्ञान का सदुपयोग आप करना चाहें तो अवसर है। इस समय उस ज्ञान को वितरित करो, फैला दो, जिसके द्वारा मानी व्यक्ति भी इस ओर घूमना चाहे तो घूम सके। आज मान-प्रतिष्ठा के लिये ही कुछ जीवों का वध किया जा रहा है। और आपके मान को और बढ़ाने का संकल्प लिया गया है। आज पचास वर्ष हो गए आपकी उन्नति के लिये। राष्ट्र ने संकल्प लिया है, भारतवासियों को विश्व के सामने लाकर के खड़ा कर देना है। अरे! हम तो संकल्प लेते हैं। रात-दिन एक करके, आपके जीवन की उन्नति के लिये, आपकी शान को बढ़ाने के लिए, कितने ही जीवों का वध हो जाय, कोई बाधा नहीं, यह वध जो हो रहा है, भुखमरी है, इसलिए नहीं हो रहा है। ध्यान रखो, आप लोगों के पेट भरने के उपरान्त अब आपका मान और भर जाय। विश्व के सामने स्टेण्डर्ड कायम हो जाय, इसके लिये यह काम किया जा रहा है। आपकी मंजूरी है। हाँ, आप मान बढ़ाना चाह रहे हैं। पशुओं का वध कर यहाँ से मांस और खून का निर्यात करके, वहाँ से विदेशी मुद्रा लाकर राष्ट्र को उन्नत बनाने का संकल्प ठीक नहीं है। यदि ठीक नहीं है, तो फिर पचास साल से आपने सोचा क्यों नहीं ? राष्ट्र को इस प्रकार उन्नत बनाने का संकल्प ठीक नहीं है। जिस समय राष्ट्र को स्वाधीनता मिली, उस समय एक-एक व्यक्ति के पास कुछ न कुछ धन था। किन्तु आज प्रत्येक नागरिक पर हजार रुपये का कर्ज है। कर्ज के साथ ही भारतीय व्यक्ति का जन्म हो रहा है। पेट में आया नहीं कि वह कर्जदार हो गया। अब पहले कर्ज को मिटाओ। क्या कर्जदार व्यक्ति बाजार में सूटेड-बूटेड जा सकता है ? शाम को जल्दी-जल्दी जाकर काम निकाल दो, भैया। मेन रोड से मत चलो, वायपास से चलो। बाजार में मुख दिखाने लायक नहीं, भारत के ऊपर कर्ज होकर भी भारत कहता है - कि हम उन्नति की ओर अग्रसर हैं। विकासशील राष्ट्रों में भारत का भी नम्बर है। मतलब कर्ज लेने में वह विकासशील है। खूबी की बात तो यह है कि किसी को करुणा नहीं आ रही है। इस कर्ज को यदि समाप्त करना चाहें, तो कर सकते हैं। यदि कोई भारतीय सोच ले कि भारत के धन को जो बाहर रखा गया है, वह आ जाय, तो पूरा कर्ज समाप्त हो सकता है। पशुओं को काटने की क्या आवश्यकता है ? लेकिन मान-प्रतिष्ठा की बात आ जाती है। समन्तभद्र महाराज कहते हैं - मान-प्रतिष्ठा की पूर्ति के लिये हम कौन-कौन से अनर्थ नहीं करते ? सब कुछ कर सकते हैं। सोऽत्येति धर्ममात्मीयं न धर्मो धार्मिकैर्बिना॥ हम दूसरों को समाप्त करने के लिये तुले हैं। स्वामी समन्तभद्र कहते हैं- धर्मात्माओं के बिना धर्म नहीं हो सकता। यदि धर्मात्मा यहाँ पर हैं तो धर्म की रक्षा करना चाहिए। यह परम कर्तव्य है, संस्कृति को सुरक्षित रखना, अहिंसा को सुरक्षित रखना। भारत की संस्कृति अहिंसा है। इस अहिंसा में सारी संस्कृतियां अपने आप समाहित हो जाती हैं। सभी कलायें, सभी ज्ञान की विधायें सारा का सारा साहित्य सुरक्षित रह जाता है। इस साहित्य को तो सुरक्षित आप रखो और जो जीवित प्राणी हैं, उनको मौत के घात उतारकर संस्कृति की रक्षा करना चाहो, तो यह कभी भी नहीं हो सकता। प्राणियों के प्रति जिस व्यक्ति के हृदय में वात्सल्य/प्रेम/करुणा/दया नहीं है, वह व्यक्ति भी नहीं है। उसके कदम किस ओर हैं ? हम कह नहीं सकते। अच्छाई की ओर तो वह नहीं ही है। इसलिए कि पचास वर्ष के उपरान्त भी आप लोगों ने यह नहीं सोचा कि सही उन्नति किसमें निहित है। हमारा हित किसमें निहित है ? ज्यादा शास्त्रों को रखने से, ज्यादा वस्तुओं के संकलन करने से, अच्छे-अच्छे बिल्डिंग बनाने से हमारी संस्कृति का संरक्षण नहीं है। अपितु हमारे विचार, हमारे आचार जितने सात्विक बनेंगे, उतना ही आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ आत्मोन्मुखी होने का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। विषय सामग्री जितनी फैलती चली जायेगी इस धरती पर, उतना ही व्यक्ति परोन्मुखी ही होता चला जायेगा, आत्मोन्मुखी तो हो ही नहीं सकता। बहिर्मुखी होना इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप माना जायेगा। पहले अन्तर्मुखी और ऊध्र्वमुखी हुआ करते थे। हमारा लक्ष्य ऊध्र्वमुखी होना था, किन्तु आज दूरमुखी बहिर्मुखी हो रहा है। और दूरदृष्टि की आवश्यकता है, दूरदर्शन की नहीं। क्योंकि दूरदर्शन को देखने से आँखों की ज्योति खराब होती है, और दूरदृष्टि रखने से हमारा मानसिक स्तर बढ़ता चला जाता है। जितनी दूरदृष्टि रखोगे, चिन्तन की धारा उतनी ही डीप तक पहुँच जायेगी और जितनी गहराई में आप पहुँचोगे उतने ही माणिक-मोतियों का खजाना आपको मिलेगा। उसी के बारे में आप क्या सोच रहे हैं। छोटी-छोटी बातों के ऊपर शोध चल रहे हैं। आत्मा की खोज के बारे में, वस्तुत: जीवन के विकास के बारे में क्या सोचा जा रहा है ? कुछ नहीं। यही अकर्मण्यता है। सही उद्योग करने से जीवन उन्नत हो सकता है, लेकिन आज बिना उद्यम का व्यवसाय माना जाता है। पहले के व्यक्ति इस प्रकार के कार्य की सोचते तक नहीं थे। सही व्यवसाय के माध्यम से यदि धन का अर्जन होता है, तो कोई बाधा नहीं। सुनते हैं कि जैन समाज में पहले चूने का काम नहीं करते थे। जैन समाज में ईटों का काम नहीं करते थे। जैन समाज में और भी कुछ ऐसे कार्य हैं, जिनको नहीं करते थे। कुछ ऐसे व्यापार, धन-धान्य भी जिनमें वर्षा के दिनों में ज्यादा कीड़े/लटें पड़ जाती हैं, स्वीकृत नहीं करते थे। उनको दो महीने तक लाना बिल्कुल बंद कर दिया जाता था। किन्तु आज किसी भी प्रकार से आये, जैसा-तैसा आवे, पैसा आवे। बस ये तुकबंदी अच्छी लग रही है आप लोगों को, किन्तु यह अच्छा नहीं है। ज्यादा पैसा लाने से पैसा वाले थोड़े ही होते हैं। लेकिन पैसे का भी अपना महत्व रहता है। सात्विक पैसा अलग काम करता है। राजसता पूर्ण पैसा अलग काम करता है। खानदानी और नया पैसा इनमें क्या अन्तर है ? ओल्ड को गोल्ड माना जाता है। और नया बोल्ड माना जाता है। आप कितना भी करो उसके द्वारा कभी भी शक्ति नहीं मिलती, क्योंकि प्राणों में शान्ति जब आती है, जब अन्न अच्छा मिलता है। अन्न अच्छा तभी माना जाता है, जब धन अच्छा होता है। इसलिए नया पैसा अच्छा नहीं है। पैसा तो पुराना ही अच्छा है, क्योंकि पुरानी की ही कीमत का आज पैसा है, यह भी ध्यान रखना। एक व्यक्ति ने आकर कहा-महाराज! पहले में और आज में कुछ अन्तर नहीं। हाँ, बिल्कुल अन्तर नहीं। आपको कितना वेतन मिलता है ? मैंने पूछा। महाराज! पाँच हजार मिलता है। पहले कितना मिलता था? पहले तीस वर्ष पूर्व सौ रुपये मिलते थे। बहुत उन्नति हो गई, पचास गुना हो गया। नहीं! महाराज, उस में भी उतने में एक तोला सोना आता था और भी वही है। कहाँ है वह उन्नति बताओ ? तेली के बैल की भांति आप पचास वर्ष की उन्नति के बाद भी वहीं के वहीं हैं। इस समय एक जीरो और आ गया। पाँच हजार में हम कैसे काम चलायें ? सूघ-सूघ कर रखना पड़ता है। पहले शक्कर के लिये मुंह में पानी आता था, आज शक्कर का नाम सुनकर आँखों में पानी आ जाता है। सोचिये, विचार करिये। क्या जमाना आ गया ? वह ठीक था, कि यह ठीक है ? महाराज, क्या दोनों एक ही हैं सूखापना आ गया है। सौ रुपया कहीं भी बांध बूध कर रख जाते थे। पाँच हजार रखने के लिये स्थान ही नहीं। अब नोट के बंडल बहुत हो गये हैं, कहाँ रखें। आज जमाना आ गया टोकरे में तो नोट ले जाओ और दुकान से सामान खरीदकर पाकेट में ले आओ। अब पैकिट में कोई भी देखता नहीं, भैया। यह क्या है जेब में ? यह देखलो, बहुत मंहगाई है। वस्तुस्थिति देखते हैं तो कुछ हुआ ही नहीं है। हुआ है, ऐसा कहा जा रहा है या धारण बनाई जा रही है। आपका जीवन वहीं पर और ज्यों का त्यों है। विकास कहाँ है बता दीजिये ? अपितु हमारे देश का ह्रास हुआ है। आज सात्विकता समाप्त होने के कारण से ऐसी दशा हो रही है। मान-प्रतिष्ठा के कारण से हम चमक-दमक में फैंसते जा रहे हैं। मान-प्रतिष्ठा को बढ़ाने में प्रत्येक व्यक्ति लगा हुआ है। सब अपनी चिन्ता में है, देश की चिन्ता किसी को नहीं। भगवान् के स्वरूप को उनके दर्शन से लाखों व्यक्तियों में परिवर्तन आ जाता है। आज भारत की इस धरती पर ऐसे व्यक्तित्व की आवश्यकता है, जो चारों तरफ शान्ति का वातावरण ला सके। आज हमें ऐसे दीपक की आवश्यकता है, जो इस अन्धकार को दूर कर सके, ऐसे रत्नदीपक की बहुत आवश्यकता है। कषाय छोड़ने से शान्ति मिलती है। अपनी प्रतिष्ठा के लिये दूसरे को क्यों अपमानित किया जाता है ? वह मूक पशु जो स्वयं पीड़ित रहता है, तुम क्यों अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये उसे पीड़ित कर रहे हो ? वह पशु तो रूखा-सूखा घास ही तो खाता है, लेकिन आपको क्या देता है ? इसके बारे में विचार करो। पशु सीमा में रहकर कभी भी प्रकृति विरुद्ध नहीं होता। नारकी और देव भी विरुद्ध नहीं होते। अगर होते हैं तो मानव। मनु यानि मानी नहीं। वही मान करना सिखाते हैं। मनु चले गये पर ये महामना बन गये, जो मान रखते हैं। मान का भूखा है यह मानव। पेट भरते हैं जीवन चलाने के लिये और पेटी भरते हैं जीवन को चढ़ाने के लिये। पेट आधा घंटे में भर जाता है और पेटी जीवन भर में नहीं भरेगी। संकल्प करें - कषाय कम करने का। मूल्य को बढ़ाने के लिये सद्धर्म का आश्रय लेना आवश्यक होता है। अब भारत को मान-प्रतिष्ठा की दौड़ को छोड़कर आत्मनिष्ठा की ओर आना चाहिए। भारत की धरती पर जो दुष्कृत्य बढ़ रहे हैं, उन्हें मिटाने की बात करना चाहिए। मांस का निर्यात करना भारत जैसे राष्ट्र को शोभा नहीं देता। इस कार्य को अविलम्ब रुकवाने के लिये आवाज उठाना चाहिए, और भारत में मांस निर्यात बन्द होना चाहिए। इसी में राष्ट्र का हित है। इसी भावना के साथ... उत्तम मार्दवधर्म की जय.......
  39. 1 point
    प्रभु के प्रति किस में ? इस में... प्रीति का वास है प्रतीति पास है पर्याप्त है यह, अब इसकी नयन-ज्योति चली भी जाय कोई चिन्ता नहीं, किन्तु कहीं ऐसा न हो, ........कि प्रभु-स्तुति से पूर्व प्रभु-नुति से पूर्व इसके करुण-नयनों में नीर कम पड़ जाय |
  40. 1 point
    कंखाभावणिवित्तिं,किच्चोवेरग्यभावणाजुत्तो। तस्स दु धम्मे हवे सोच्चं॥ जो परम मुनि इच्छाओं को रोककर और वैराग्य रूप विचारधारा से युक्त होकर आचरण करता है उसको शौच धर्म होता है। जब मैं बैठा था वह समय, सामायिक का था और एक मक्खी अचानक सामने देखने में आयी। उसके पंख थोड़े गीले से लग रहे थे। वह उड़ना चाहती थी पर उसके पंख सहयोग नहीं दे रहे थे। वह अपने शरीर पर भार अनुभव कर रही थी और उस भार के कारण उड़ने की क्षमता होते हुए भी उड़ नहीं पा रही थी। जब कुछ समय के उपरान्त पंख सूख गये तब वह उड़ गयी। मैं सोचता रहा कि वायुयान की रफ्तार जैसी उड़ने की पूरी की पूरी शक्ति ही मानों समाप्त हो गयी। थोड़ी देर के लिए उसे हिलना-डुलना भी मुश्किल हो गया। यही दशा संसारी-प्राणी की है। संसारी-प्राणी ने अपने ऊपर अनावश्यक न जाने कितना भार लाद रखा है और फिर भी आकाश की ऊँचाईयां छूना चाहता है। प्रत्येक व्यक्ति ऊपर उठने की उम्मीद को लेकर नीचे बैठा है। स्वर्ग की बात सोच रहा है लेकिन अपने ऊपर लदे हुए बोझ की ओर नहीं देखता जो उसे ऊपर उठने में बाधक साबित हो रहा है। वह यह नहीं सोच पाता कि क्या मैं यह बोझ उठाकर कहीं ले जा पाऊँगा या नहीं? वह तो अपनी मानसिक कल्पनाओं को साकार रूप देने के प्रयास में अहर्निश मन-वचन और काय की चेष्टाओं में लगा रहता है। अमूर्त स्वभाव वाला होकर भी वह मूर्त सा व्यवहार करता है। यूँ कहना चाहिए कि अपने स्वरूप को भूलकर स्वयं भारमय बनकर उड़ने में असमर्थ हो रहा है। ऐसी दशा में वह मात्र लुढ़क सकता है, गिर सकता है और देखा जाए तो निरन्तर गिरता ही आ रहा है। उसका ऊँचाई की ओर बढ़ना तो दूर रहा देखने का साहस भी खो रहा है। जैसे जब हम अपने कन्धों पर या सिर पर भार लिये हुए चलते हैं तो केवल नीचे की ओर ही दृष्टि जाती है। सामने भी ठीक से देख नहीं पाते। आसमान की तरफ देखने की तो बात ही नहीं है। ऐसे ही है संसारी प्राणी के लिए मोह का बोझा। मोह उसके सिर पर इतना लदा है, कहो कि उसने लाद रखा है कि मोक्ष की बात करना ही मुश्किल हो गया है। विचित्रता तो ये है कि इतना बोझा कन्धों पर होने के बाद भी वह एक दीर्घ श्वांस लेकर कुछ आराम जैसा अनुभव करने लगता है और अपने बोझ को पूरी तरह नीचे रखने की भावना तक नहीं करता। बल्कि उस बोझ को लेकर ही उससे मुक्त हुए बिना ही मोक्ष तक पहुँचने की कल्पना करता है। भगवान के समाने जाकर, गुरुओं के समीप जाकर अपना दुख व्यक्त करता है कि हमें मार्गदर्शन की आवश्यकता है। आप दीनदयाल हैं। महती करुणा के धारक हैं। दया-सिन्धु, दयापालक हैं। करुणा के आकार हैं, करुणाकार हैं। आपके बिना कौन हमारा मार्ग प्रदर्शित कर सकता है? उसके ऐसे दीनता भरे शब्दों को सुनकर और आँखों से अश्रुधारा बहते देखकर सन्त लोग विस्मय और दुख का अनुभव करते हैं। वे सोचते हैं कि कैसी यह संसार की रीत है कि परिग्रह के बोझ को निरन्तर इकट्ठा करके स्वयं दीन-हीन होता हुआ यह संसारी प्राणी संसार से मुक्त नहीं हो पाता | शुर्चेभार्व: शौच्यम्।' शुचिता अर्थात् पवित्रता का भाव ही शौचधर्म है। अशुचि भाव का विमोचन किये बिना उसकी प्राप्ति सम्भव नहीं है। शुचिता क्या है और अशुचिता क्या है? यही बतलाने के लिए आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार में एक कारिका के माध्यम से सम्यग्दर्शन के आठ अंगों का वर्णन करते हुए कहा है कि स्वभावतोऽशुचौ काये, रत्नत्रयपवित्रिते। निर्जुगुप्सा गुणप्रीतिर्मता निर्विचिकित्सिता॥ (रत्नकरण्डक श्रावकाचार-१३) शरीर तो स्वभाव से ही अपवित्र है, उसमें पवित्रता यदि आती है तो रत्नत्रय से आती है। रत्नत्रय ही पवित्र है। इसलिए रत्नत्रय रूपी गुणों के प्रति प्रीतिभाव रखना चाहिए। रत्नत्रय को धारण करने वाले शरीर के प्रति विचिकित्सा नहीं करना चाहिए।चिकित्सा का अर्थ ग्लानि से है। या कहें कि एक प्रकार से प्रतिकार का भाव ही चिकित्सा है और विचिकित्सा का अर्थ विशेष रूप से चिकित्सा या ग्लानि लिया गया है। विचिकित्सा का अभाव होना ही ‘निर्विचिकित्सा-अंग' है। जीवन में शुचिता इसी अंग के पालन करने से आती है। शरीर तो मल का पिटारा है, घृणास्पद भी है। हमारा ध्यान शरीर की ओर तो जाता है लेकिन उसकी वास्तविक दशा की ओर नहीं जाता। इसी कारण शरीर के प्रति राग का भाव या घृणा का भाव आ जाता है। वासना की ओट में शरीर की उपासना अनादिकाल से यह संसारी प्राणी करता आ रहा है। लेकिन उसी शरीर में बैठे हुए आत्मा की उपासना करने की ओर हमारी दृष्टि नहीं जाती। विषयों में सुख मानकर यह जीव अपनी आत्मा की उपासना को भूल रहा है। आचार्य कुन्दकुन्दस्वामी ने प्रवचनसार में कहा है कि- कुलिसायुहचक्कहरा सुहोवओगप्पगेहिं भोगेहिं। देहादीण वड़ी करेंति सुहिदा इवाभिरदा॥ (प्रवचनसार-७७) अर्थात् इन्द्र और चक्रवर्ती पुण्य के फलस्वरूप भोगों के द्वारा देहादि की पुष्टि करते हैं और भोगों में लीन रहते हुए सुखी जान पड़ते हैं, लेकिन वास्तविक सुख वह नहीं है। लोभ के वशीभूत हुआ संसारी प्राणी विषय रूपी वासना में लिप्त होने के कारण आत्मिक सुख से वञ्चित हो रहा है। चार कषायों के द्वारा चार गतियों में निरन्तर भटक रहा है। नरकों में विशेष रूप से क्रोध के साथ, तिर्यच्चों में माया के साथ, मनुष्यों में मान के साथ और देवों में लोभ के साथ यह जीव उत्पन्न होता है। वैचित्र्य तो यह है कि और लोभी बनकर आज यह संसारी प्राणी देव बनना चाहता है। एक तरह से और लोभी ही होना चाहता है। देखा जाए तो स्वर्ग में भी सागरोपम आयु वाले इन्द्र और अहमिन्द्र को भी विषय कषाय के अभाव में होने वाली आत्मानुभूति का अनुभव क्षण भर को भी नहीं होता। भले ही उन्हें सुखानुभूति मनुष्यों की अपेक्षा अधिक रही | प्रत्येक असंयमी संसारी प्राणी की स्थिति जोंक की तरह है। जैसे जोंक किसी जानवर या गाय/भैंस के थनों (स्तनों) के ऊपर चिपक जाता है और वह सड़े-गले खून को ही चूसता रहता है। ‘वैसे ही स्वर्ग के सुखों की भी ऐसी ही उपमा दी गयी है। ‘आचार्यों ने हमारे लोभ के भिन्न-भिन्न उपाय करते हुए भिन्न-भिन्न उपदेश दिये हैं। किसी भी तरह लोभ का विरेचन हो जाये, यही मुख्य दृष्टिकोण रहता है लेकिन इतने पर भी ऐसा उदाहरण सुनकर भी संसारी प्राणी लोभ का विरेचन करने के लिए तैयार न हो, तो उसका कल्याण कौन कर सकेगा? जिस लोभ को छोड़ना था, उसी लोभ के वशीभूत हुआ। आज संसारी-प्राणी अपनी ख्याति, पूजा, लाभ और यश-कीर्ति चाह रहा है। स्वर्गों में सम्यकद्रष्टि के लिए भी ऐसी उपमा देने के पीछे आशय यही है कि विषय भोगों की लालसा यदि मन में है तो वह मुक्ति में बाधक है। आज प्रगति का युग है, विज्ञान का युग है। लेकिन देखा जाये तो दुर्गति का भी युग है। क्योंकि आज आत्मा में निरन्तर कलुषता आती जा रही है। लोभ-लालसा दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। जितने सुविधा के साधन जुटाये जा रहे हैं, उतना ही व्यक्ति में तृष्णा और असन्तोष बढ़ रहा है। कीचड़ के माध्यम से कीचड़ धोना सम्भव नहीं है। कीचड़ को धोने के लिए तो वर्षा होनी चाहिए। पवित्र-जल की वर्षा से ही पवित्रता आयेगी। समसंतोसजलेण जो धोवदि तिव्वलोहमलपुंजु। भोयणगिद्धिविहीणो तस्स सउच्चं हवे विमलं॥ निर्मल शौच धर्म उसे ही होता है, जो समता और संतोष रूपी जल के द्वारा अपने तीव्र लोभ रूपी मल के पुञ्ज को धोता है और भोजनादि अन्य पदार्थों में अत्यन्त आसक्त नहीं होता। स्वर्गों में देव पूरी तरह विषय भोगों का परित्याग तो नहीं कर सकते जैसा कि मनुष्य जीवन में कर पाना सम्भव है। लेकिन वे देव भी जहाँ-जहाँ भगवान् के पंचकल्याणक होते हैं वहाँ-वहाँ अवश्य जाते हैं और परिवार सहित विषय-भोग को गौण करके उन महान् आत्माओं की सेवा, आराधना करके अपने आत्मा-स्वरूप की ओर देखने का प्रयास करते हैं। भगवान की वीतराग-छवि और वीतराग स्वरूप की महिमा देखकर वे मन ही मन विचार भी करते हैं कि हे भगवन्! आपकी वीतरागता का प्रभाव हमारे ऊपर ऐसा पड़े कि हमारा रागभाव पूरा का पूरा समाप्त हो जाए। आपकी वीतराग छवि से समत्व की ऐसी वर्षा हो कि हम भी थोड़ी देर के लिए शान्ति का अनुभव कर सकें और राग की तपन से बच सकें। यदि देवगति में रहकर देव लोग इस प्रकार की भावना कर सकते हैं तो आप लोग तो देवों के इन्द्र से भी बढ़कर हो। क्योंकि आप लोगों के लिए तो उस मनुष्य काया की प्राप्ति हुई है जिसे पाने के लिए देव लोग भी तरसते हैं। आपकी यह मनुष्य काया की उपलब्धि कम नहीं है, क्योंकि यह मुक्ति का सोपान बन सकती है। लेकिन यह उसे ही सम्भव है जो विषय-भोगों से विराम ले सके। जब तक हम विषय-भोगों से विराम नहीं लेंगे तब तक आत्मा का साक्षात् दर्शन सम्भव नहीं है। पवित्र-आत्मा का दर्शन विषय-भोगों के विमोचन के उपरान्त ही सम्भव है। यदि कषायों का पूरी तरह विमोचन नहीं होता तो कम से कम उनका उपशमन तो किया ही जा सकता है। आचार्य कुन्दकुन्द और समन्तभद्र जैसे महान् आचार्य धन्य हैं, जिन्होंने इस भौतिक युग में रहते हुए भी जल से भिन्न कमल के समान स्वयं को संसार से निलिप्त रखा और विषयकषाय से बचते हुए अपनी आत्मा की आराधना की। विषय कषाय से बचते हुए वीतराग प्रभु के द्वारा प्रदर्शित पथ पर चलने का प्रयास किया। रात-दिन अप्रमत्त रहकर, जागृत रहकर उस जागृति के प्रकाश में अपने खोये हुए, भूले हुए आत्मतत्व को ढूँढ़ने का प्रयास किया। इतना ही नहीं ऐसे महान् आचार्यों ने हम जैसे मोही, रागी, द्वेषी, लोभी और अज्ञानी संसारी प्राणियों के लिए, जो कि अंधकार में भटक रहे हैं, अपने ज्ञान के आलोक से पथ प्रकाशित करके हमारी आँखें खोलने का प्रयास भी किया है अज्ञानतिमिरान्धानाम् ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरून्मीलितं येन, तस्मै श्रीगुरूवे नमः॥ ज्ञानरूपी अञ्जन-शलाका से हमारी ऑखों की खोलकर अज्ञान रूपी अंधकार का नाश कर दिया है। ऐसे परम गुरुओं को हमारा नमस्कार होवे। उनके अपार उपकार का स्मरण करना चाहिए। ऐसे महान् आचार्यों के द्वारा ही हजारों-लाखों वर्षों से चली आ रही अहिंसा-धर्म की परम्परा आज भी जीवन्त है। वस्तुत: ध्वनियाँ क्षणिक हैं, लेकिन जो भीतरी आवाज है, जो दिव्यध्वनि है, जो जिनवाणी है, वही शाश्वत और उपकारी है। एक बार यदि हम अपना उपयोग उस ओर लगा दें तो बाह्य-ध्वनियों की कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इस भीतरी ध्वनि के सामने दुनियाँ की सारी बाहरी शक्ति फीकी पड़ जाती है। जैसे प्रभाकर के सामने जुगनू का प्रकाश फीका है, कार्यकारी नहीं है, इस प्रकार उत्तम शौच का पान करने वाले मुनियों के लिए बाह्य-सामग्री कार्यकारी मालूम नहीं पड़ती और वे निरन्तर उसका विमोचन करते रहते हैं। आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी ने समयसार का मंगलाचरण करते हुए कहा है कि- वंदितु सव्वसिद्ध ध्रुवमचलमणोवमं गदि पत्तो। वोच्छामि समयपाहुडमिणमो सुदकेवली भणिदं॥ हे भव्यजीव! मैं शाश्वत, अचल और समस्त उपमाओं से रहित ऐसी पञ्चमगति को प्राप्त सब सिद्धों को नमस्कार करके श्रुत-केवली भगवान् के द्वारा कहे गये समयप्राभूत ग्रन्थ को कहूँगा। उपनिषदों में शुद्ध तत्व का वर्णन करते हुए जो बात नहीं लिखी गयी, वह आचार्य कुन्दकुन्द महाराज ने लिख दी कि एक सिद्ध भगवान् को नहीं, सारे सिद्ध भगवानों को प्रणाम करके ग्रन्थ का प्रारम्भ करता हूँ। सिद्ध एक ही नहीं हैं, अनन्त हैं। सभी में, प्रत्येक जीवात्मा में सिद्धत्व की शक्ति विद्यमान है। आचार्य महाराज ने भीतर बैठी इसी शुद्धात्मा की शक्ति को दिखाने का प्रयास किया है और कहा है कि यदि थोड़ा-थोड़ा भी, धीरे-धीरे भी लोभ का मल कम करके भीतर झाँकने का प्रयास करोगे तेा जैसे दूध में घृत के दर्शन होते हैं, सुगंधी का पान करते हैं, रस का अनुभव आता है, ऐसे ही शुद्धात्मा का दर्शन, पान और अनुभवन सम्भव है। आप दूध तपाकर मावा बनाते हैं। उसे कहीं-कहीं खोवा या खोया भी कहते हैं। वस्तुत: वह खोया ही है। दूध को 'खोया' तभी मिला खोया। (हँसी) यूँ कहो कि जो खो गया था, वह मिल गया। हमारा आत्म-तत्व मानों खो गया है और कषायों के नीचे दब गया है यदि हम लोभ को खो दें, तो हमारा खोया हुआ आत्म-तत्व हमें मिल जायेगा। तब खोया मिल जायेगा। लोभ की स्थिति बड़ी जटिल है। इसके माध्यम से ही सभी कषायों की सेना आती है। आचार्यों ने लिखा है कि क्रोध, मान, माया और लोभ ये सभी क्रम-क्रम से उपशम या क्षय को प्राप्त होती हैं। सबसे अन्त में लोभ जाता है। लोभ की पकड़ भीतर बहुत गहरी है। इस लोभ के पूरी तरह क्षय होते ही वीतरागता आने में और भगवान बनने में देर नहीं लगती। मन में यह जागृति आ जाये कि- "जानूँ कि मैं कौन हूँ" तो सारी सांसारिक लोभ, लिप्सा समाप्त होने लग जाती है। भीतर प्रज्ज्वलित होने वाली आत्म-ज्ञान की ज्योति में अपने स्वभाव की ओर दृष्टि जाने लगती है। हमें ज्ञात हो जाता है कि भले ही मेरी आत्मा के साथ कर्म एकमेक हुए के समान हों और वह शरीरादि बाह्य सामग्री नोकर्म के रूप में मुझे मिली हो। रागद्वेषादि भाव मेरे साथ मिलजुल गये हों। लेकिन इन सभी कर्म, नोकर्म और भाव-कर्म से मैं भिन्न हूँ। वास्तव में, बाहरी संबंधों में अपने को मुक्त कर लेने के उपरान्त हमारी आत्मा की दशा ऐसी हो जाती है कि फिर बाह्य वस्तुओं को पहचानना भी मुश्किल सा लगने लगता है। एक निर्मोही की दृष्टि में बाह्य पदार्थों की जानकारी पाने के लिए उत्सुकता शेष नहीं रह जाती। संसारी प्राणियों में बहुत सारी विचित्रताएँ देखने में आती हैं। मनुष्य की विचित्रता यह है कि वह सब कुछ जानते हुए भी अपने जीवन में कल्याण की बात नहीं सोचता। मैं पूछता हूँ आप सभी लोगों से कि आपने कभी परिग्रह को पाप समझा या नहीं? आपने वस्तुओं के प्रति अपने मूछ भाव को पाप समझा है या नहीं? आप सभी यह मानते हैं कि हिंसा को हमारे यहाँ अच्छा नहीं माना गया, झूठ भी पाप है। चोरी करना भी हमारे यहाँ ठीक नहीं बताया। कुशील की तो बात ही नहीं है। इस तरह आप चारों पापों से दूर रहने का दावा करते हैं किन्तु जो पापों का सिरमौर है, जो परम्परा से चला जा रहा है परिग्रह, उसे आप पाप नहीं मानते। बात यह है कि उसके माध्यम से सारे के सारे कार्य करके हम अपने आपको धर्म की मूर्ति बताने में सफल हो जाते हैं। भगवान का निर्माण करा सकते हैं, मन्दिर बनवा सकते हैं चार लोगों के बीच अपने को बड़ा बता सकते हैं। इस तरह आपने परिग्रह को पाप का बाप कहा अवश्य है, लेकिन माना नहीं है। बल्कि परिग्रह को ही सब कुछ मान लिया है। सोचते हैं कि यह जब तक है तभी तक हम जीवित हैं या कि तभी तक घर में दीपक जल रहा है। हमें लगता है कि धन के बिना धर्म भी नहीं चल सकता। देखने में भी आता है कि अच्छा मञ्च बनाया है, बड़ा पण्डाल लगाया है तभी तो घण्टों बैठकर प्रवचन सुन पा रहे हैं। लेकिन ध्यान रखना धर्म की प्रभावना के लिए धन का उतना महत्व नहीं है जितना कि धन को छोड़ने का महत्व है। यह भगवान् महावीर का धर्म है जिसमें कहा गया है कि जब तक धन की आकांक्षा है, धन की महिमा गायी जा रही है, तब तक धर्म की बात प्रारम्भ ही नहीं हुई है। किसी आँग्ल कवि (इंग्लिश पोयट) ने कहा है कि सुई के छेद से ऊँट पार होना सम्भव है, लेकिन धन के संग्रह की आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति को मुक्ति सम्भव नहीं है। हमारे यहाँ धर्म के अर्जन की बात कही गयी है, धन के अर्जन की बात नहीं कही गयी, बल्कि धन के विसर्जन की बात कही गयी है। हम इस मनुष्य पर्याय की दुर्लभता को समझे और यह भी समझे कि हम इस दुर्लभ वस्तु को किस तरह कौड़ियों के दाम बेच रहे हैं। किस तरह धन के पीछे हम अपना मूल्यवान आत्म-धन नष्ट कर रहे हैं। जैसे कोई हमेशा अंधकार में जीता रहे तो उसे कभी दिन का भान नहीं हो पाता, उसे पूर्व और पश्चिम दिशा का ज्ञान भी नहीं हो पाता। ऐसे ही जो व्यक्ति हमेशा धन की आकांक्षा में और विषय भोगों की लालसा में व्यस्त रहता है उसे यह पहचान ही नहीं हो पाती कि भगवान् वीतराग कैसे हैं? उन्होंने किस तरह परिग्रह का विमोचन करके तथा लोभ का त्याग करके पवित्रता, वीतरागता पायी है। ध्यान रखना वीतरागता कभी धन के माध्यम से या लोभ के माध्यम से नहीं मिलती। ‘‘परितः समन्तात् गृह्णाति आत्मानम् इति परिग्रहः" जो आत्मा को चारो ओर से अपनी चपेट में ले, वह परिग्रह है। लोग कहते हैं ग्रह दशा ठीक नहीं चल रही, तो मैं सोचता हूँकि परिग्रह से बड़ा भी कोई ग्रह है, जो हमें ग्रसित करे? परिग्रह रूपी ग्रह ही हमें ग्रसित कर रहा है। इसी के कारण हम परमार्थ को भूल रहे हैं और जीवन के वास्तविक सुख को भूलकर इन्द्रिय सुखों को ही सब कुछ मान रहे हैं। जिसके पास जितना परिग्रह है या आता जा रहा है, वह मान रहा है कि परिग्रह (बाह्य पदार्थों का संग्रह) हमारे हाथ में है और हम उसके मालिक हैं। लेकिन ध्यान रखना परिग्रह आपके वश में नहीं है बल्कि आप ही परिग्रह के वशीभूत हैं, परिग्रह ने ही आपको सब ओर से घेर रखा है। तिजोरी के अन्दर धन-सम्पदा बन्द है और आप पहरेदार की तरह पहरा दे रहे हैं और सेठ जी कहला रहे हैं। क्या पहरा देने वाला सेठ जी हो सकता है? वह तो पहरेदार ही कहलायेगा वह मालिक नहीं नौकर ही कहलायेगा। धन संपत्ति मालिक बनी हुई है और आराम से तिजोरी में राज्य कर रही है, आप उसी की आरती उतार रहे हैं और स्वयं को धन्य मान रहे हैं। दीपावली के दिन भगवान महावीर को मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति हुई थी, लेकिन आज आप लोग परिग्रह रूपी धनसंपत्ति को लक्ष्मी मानकर उसी की पूजा कर रहे हैं, जो अज्ञानता का ही प्रतीक है। आचार्यों ने परिग्रह संज्ञा को संसार का कारण बताया है और संसारी प्राणी निरन्तर इसी परिग्रह के पीछे अपने सर्वश्रेष्ठ मानव जीवन को गाँवा रहा है। जिस आत्मा में परमात्मा बनने की, पतित से पावन बनने की क्षमता है वही आत्मा परिग्रह के माध्यम से, लोभ-लिप्सा के माध्यम से संसार में रुल रहा है। एक बार यदि आप अपने भीतरी आत्म-वैभव का दर्शन कर लें तो आपको ज्ञात हो जायेगा कि अविनश्वर सुख-शांति का वैभव तो हमारे भीतर ही है। अनन्त गुणों का भण्डार हमारे भीतर ही है और हम बाहर हाथ पसार रहे हैं। कम से कम आज आप ऐसा संकल्प अवश्य लेकर जाइये कि हम अनन्त-काल से चले आ रहे इस अनंतानुबंधी संबंधी अनन्त लोभ का विमोचन अवश्य करेंगे और अपने पवित्र स्वरूप की ओर दृष्टिपात करेंगे। आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी ने समयसार में आत्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा है कि- अरसमरूवमगंध, अव्वत्तं चेदणागुणमसद्दं। जाण अलिंगग्गहणं, जीवमणिद्विठ्ठसंठाणं॥ (समयसार- ५४) जो रस रहित है, जो रूप-रहित है, जिसकी कोई गन्ध नहीं है, जो इन्द्रियगोचर नहीं है, चेतना-गुण से युक्त है, शब्द रहित है, किसी बाहरी चिह्न या इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण नहीं होता और जिसका आकार बताया नहीं जा सकता, ऐसा यह जीव है आत्मतत्व है। जिन आचार्य कुन्दकुन्द, आचार्य समन्तभद्र और आचार्य पूज्यपाद जैसे महान् निष्परिग्रही आत्माओं के द्वारा इस आत्मस्वरूप की उपासना की गयी है, उन्हीं निष्परिग्रही आत्माओं के हम भी उपासक हैं, होना भी चाहिए। अभी जैसे आप स्वयं ही अनुभव कर रहे हैं कि देह रूपी परिग्रह तक का ध्यान भूलकर किस तरह तन्मय होकर धर्मलाभ लिया जा सकता है। भाई! अपने जीवन को इसी प्रकार लोभ-मल से बचाकर पवित्र होने का, शौच-धर्म प्राप्त करने का उपाय करना ही सच्चा पुरुषार्थ है। आज सीप का नहीं, मोती का, आज दीप का नहीं, ज्योति का स्वागत करना है और अपने जीवन को, आदर्श भास्वत करना है। संसारी प्राणी इस रहस्य को नहीं जान पा रहा है कि शुचि क्या है और अशुचि क्या है? इन दोनों के बीच भेद क्या है? यह क्रम अनादि से चला आ रहा है, लेकिन संसारी प्राणी जैसे इस बात से अनभिज्ञ हैं। जहाँ पर कमल उगता है वही देखा जाए तो नीचे कीचड़ भी देखने में आता है। सीप में से मोती निकलता है और दीप में ज्योति जलती है, प्रकाश होता है। मोती मूल्यवान है तथा प्रकाश की महत्ता है। भगवान् के चरणों में चक्रवर्ती जैसे महापुरुष अज्जुलि भर-भर कर मोती ही चढ़ाते हैं। कीचड़ में उगने वाला कमल भगवान् के चरणों में चढ़ाया जाता है। कीचड़ को कोई छूना भी नहीं चाहता। किन्तु आज उस कमल का, उस ज्योति का और मोती का अनादर किया जा रहा है और अशुचि रूप कीचड़ में ही जीवन लथपथ हो रहा है। संसारी प्राणी मोती को छोड़कर सीप में ही चाँदी की कल्पना करके फंसता जा रहा है। इसी प्रकार अशुचि का भण्डार यह शरीर भी है। हम शरीर को ही आदर देते जा रहे हैं। अस्सी साल का वृद्ध भी दिन-भर में कम से कम एक बार दर्पण देखने का अवश्य इच्छुक रहता है। किन्तु आत्मतत्व देखने के लिए आज तक किसी ने विचार नहीं किया। यह कोई नहीं सोचता कि ऐसा कौन सा दर्पण खरीद ले जिसमें मैं अपने आपका वास्तविक रूप देख सकूं। आकर्षण का केन्द्र शरीर न होकर उसमें रहने वाली आत्मा ही आकर्षण का केन्द्र हो जाये। लेकिन संसार की रीत बड़ी विपरीत है। बहुत कम लोगों की दृष्टि इस ओर है। गगन का प्यार, धरा से ही नहीं सकता और मदन का प्यार कभी जरा से ही नहीं सकता। यह भी एक नियति है, सत्य है कि सज्जन का प्यार कभी सुरा से हो नहीं सकता। विधवा को कभी अंगराग रुचता नहीं, कभी सधवा को भी संग त्याग रुचता नहीं, संसार से विपरीत रीत, विरलों की ही होती है कि भगवान् को कभी भी राग दाग रुचता नहीं? मैं मानता हूँ अशुचिता से अपने आपके जीवन को ऊपर उठाना, हँसी-खेल नहीं है। लेकिन खेल नहीं होते हुए भी उस ओर दृष्टिपात तो अवश्य करना चाहिए। ऐसे-ऐसे व्यक्ति देखने में आते ằ fh vàơi Commentary सुनने में दिन-रात लगा देते हैं और भूख-प्यास सब भूल जाते हैं। शरीर की ओर दृष्टि नहीं जाती। यह एक भीतरी लगन की बात है। जैसे खेल नहीं खेलते हुए भी खेल के प्रति आस्था, आदर और बहुमान होने के कारण यह व्यवहार हो जाता है। उसी प्रकार यदि आज हम स्वयं आत्मतत्व का दर्शन नहीं भी कर पाते, उसे नहीं पहचानते तो कोई बात नहीं। किन्तु जिन्होंने उस आत्म-तत्व को पहचाना है उनके प्रति आस्था, आदर और बहुमान रखकर उनकी बात तो कम से कम सुनना ही चाहिए। माँ उस समय चिन्तित हो जाती है, जब लड़का अच्छा खाना नहीं खाता और खेलकूद के लिए भाग जाता है। उसी प्रकार सारे विश्व का हित चाहने वाले आचार्यों को भीतर ही भीतर उस समय चिन्ता और दुख होता है, जब संसारी प्राणी अपने उस स्वभाव से जिसमें वास्तविक आनन्द है जो वास्तविक सम्पदा है, उससे एक समय के लिए भी परिचित नहीं हुआ। आचार्य समन्तभद्र महाराज, जो दर्शन (फिलासफी) के प्रति गहरी रुचि और आस्था रखते थे और जिनकी सिंह गर्जना के सामने हाथियों के समान प्रवादियों का मद (अहकार) गल जाता था। वे कहते हैं संसारी प्राणी ने आज तक पवित्रता का आदर नहीं किया है और अपवित्रता को ही गले लगाया है। यही कारण है कि उसे आत्म-तत्व का परिचय नहीं हुआ। अशुचिमय शरीर में बैठे हुए आत्मा का जो ज्ञानदर्शन लक्षण वाला है, दर्शन नहीं हुआ। कीचड़ के संयोग से लोहा जंग खा जाता है लेकिन स्वर्ण, कीचड़ का संयोग पाकर भी अपने स्वर्णत्व को नहीं छोड़ता। ऐसे ही शरीर के साथ रहकर भी आत्मा अपने ज्ञान-दर्शन गुण को नहीं छोड़ता। हाँ, इतना अवश्य है कि स्वर्ण-पाषाण की भाँति हमारा आत्मा अभी अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त नहीं कर पाया है। जैसे स्वर्ण पाषाण में स्वर्ण है और उसे विधिवत् निकाला जाये तो निकल सकता है, उसी प्रकार आत्म-तत्व को कर्म-मल के बीच से निकालना चाहें तो निकाला जा सकता है। वास्तविक मल तो सही कर्म-मल है जो अनादिकाल से आत्मा के साथ चिपका हुआ है और आत्मा में विकार उत्पन्न करता है। बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा ये आत्मा की विभिन्न दशाएँ हैं। इनमें से अपनी परमात्मदशा को विधिवत् निकाल लेना ही सच्चा पुरुषार्थ है और जो ऐसा करता है वह फिर शरीर को महत्व नहीं देता। बल्कि आत्मा को बचाकर पवित्र बनाने का प्रयास करने में जुट जाता है। शरीर का इतना ही महत्व है कि उसके माध्यम से आत्म-तत्व को प्राप्त करना है यह ज्ञानी जानता है और शरीर को सावधानी पूर्वक सुरक्षित रखकर आत्म-तत्व को प्राप्त करने में लग जाता है। हमें जानना चाहिए कि आत्म-तत्व के द्वारा ही शरीर को महत्व मिलता है अन्यथा उसे कोई नहीं चाहता। वह अशुचिमय है और आत्मा से पृथक् है। हमारा कर्तव्य है कि हम उसकी अशुचिता को समझे और उसके प्रति आसक्ति को छोड़कर रत्नत्रय से पवित्र आत्मा के प्रति अनुरक्त हों। वीतराग यथाजात दिगम्बर रूप ही पवित्र है, क्योंकि इसी के माध्यम से आत्मा चार प्रकार की आराधना करके मुक्ति को प्राप्त होती है और पवित्र होती है। वस्तुत: पवित्रता शरीराश्रित नहीं है लेकिन यदि आत्मा शरीर के साथ रहकर भी धर्म को अंगीकार कर लेती है तो शरीर भी पवित्र माना जाने लगता है, क्योंकि तब उसमें राग नहीं है और उसमें द्वेष भी नहीं है। वह सप्त-धातु से युक्त होते हुए भी पूज्य हो जाता है। शरीर के साथ जो धर्म के द्वारा संस्कारित आत्मा है, उसका मूल्य है और उस संस्कारित आत्मा के कारण ही शरीर का भी मूल्य बढ़ जाता है। जैसे कोई व्यक्ति धागे को गले में नहीं लटकाता किन्तु फूलों की माला के साथ या मोती की माला के साथ वह धागा भी गले में शोभा पाता है और फूल सूख जाने पर फिर कोई उसे धारण नहीं करता। इसी प्रकार यदि धर्म साथ है तो शरीर भी शोभा पाता है। धर्म के अभाव में जीवन शोभा नहीं पाता। उसे कोई मूल्य नहीं देता तथा उसे कोई पूज्य भी नहीं मानता। हमारे यहाँ जड़ का आदर नहीं किया गया। आदर तो चेतना का ही किया जाता है। जो इस चेतना का आदर करता है, उसका परिचय प्राप्त कर लेता है, वही वास्तविक आनन्द को प्राप्त कर लेता है। वही तीन लोक में पूज्यता को प्राप्त होता है। जैसे कोई अन्धा हो या आँख मूंद कर बैठा हो तो उसे प्रकाश का दर्शन नहीं होता और वह सोच लेता है कि प्रकाश कोई वस्तु नहीं है, अंधकार ही अंधकार है। उसी प्रकार संसारी प्राणी लोभ के कारण अन्ध हुआ है उसे आत्म-तत्व प्रकाशित नहीं हो रहा है। उसे रत्नत्रय का दर्शन नहीं हो पा रहा है और उसका जीवन अंधकारमय हो रहा है। वह सोचता है कि जीवन में आलोक सम्भव ही नहीं है। लेकिन जो अाँख खोल लेता है, लोभ को हटा देता है, विकारों पर विजय पा लेता है, उसे प्रकाश दिखायी पड़ने लग जाता है और उसका जीवन आलोकित हो जाता है। शरीर के प्रति रागभाव हटते ही शरीर में चमकने वाला आत्म-तत्व का प्रकाश दिखायी पड़ने लगता है और वह आत्मा उस औदारिक अशुचिमय शरीर से युक्त होकर परम औदारिक शरीर को प्राप्त कर लेता है। परम पावन हो जाता है। बन्धुओ! आज अशुचि का नहीं, शुचिता का आदर करना है। सीप का नहीं, मोती का आदर करना है। दीप का नहीं, ज्योति का स्वागत करना है और अपने जीवन को प्रकाशित करना है। ब्रह्मचर्य प्रतिमा धारण करने वाले के लिए समन्तभद्र आचार्य ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार में लिखा है कि वह शरीर के बारे में ऐसा विचार करें मलबीजं मलयोनिं गलन्मलं पूतिगन्धि बीभत्सं। पश्यन्नङ्गमनङ्गाद्विरमति । यो ब्रह्मचारी सः॥ (रत्नकरण्डक श्रावकाचार-१४३) ब्रह्मचारी वह है, जो शरीर को मल का बीज मानता है, मल की उत्पति का स्थान मानता है और दुर्गध तथा घृणास्पद चीजों का ढेर मानकर उससे राग नहीं करता। उससे विरक्त रहकर अपने ब्रह्म अर्थात् आत्म-तत्व का ही अवलोकन करने में आनन्द मानता है। जिस शरीर को शुद्ध बनाने के लिए, सुगंधित बनाने के लिए हम नाना प्रकार के उपाय करते हैं, वह शरीर कैसा है उसका विचार करें तो मालूम पड़ेगा कि केशर चन्दन पुष्प सुगंधित वस्तु देख सारी। देह परसते होय अपावन निशदिन मलझारी। (मंगतरायकृत बारहभावना) केशर लगाओ, चाहे चन्दन छिड़को या सुगंधित फूलों की माला पहनाओ, यह सब करने के उपरान्त भी शरीर अपावन ही बना रहता है। ये सभी चीजें शरीर का सम्पर्क पाकर अपावन हो जाती है। ऐसा यह शरीर है। शरीर की अशुचिता के बारे में ऐसा विचार किया जाए तो शरीर को सजानेसँवारने के प्रति लोभ कम होगा और आत्म-तत्व की ओर रुचि जागृत होगी। शरीर की अशुचिता और आत्मा की पवित्रता का चिन्तन करना ही उपादेय है। आप शरीर की सुन्दरता और गठन देखकर मुग्ध हो जाते हैं और कह देते हैं कि क्या पर्सनालिटी है लेकिन वास्तव में देखा जाए तो व्यक्तित्व, शरीर की सुन्दरता या सुडौलता से नहीं बनता, वह तो भीतरी आत्मा के संस्कारों की पवित्रता से बनता है। अशुचिता हमारे भावों में हो रही है, उसे तो हम नहीं देख रहे हैं और शरीर की शुचिता में लगे हैं। हमें भावों में शुचिता लानी चाहिए। भावों में निर्मलता लानी चाहिए। भावों में मलिनता का कारण शरीर के प्रति बहुत आसक्त होना ही है। इसी की सोहबत में पड़कर आत्मा निरन्तर मलिन होती जा रही है। आत्मा की सुगन्धि खोती जा रही है और आत्मा निरन्तर वैभाविक परिणमन का ही अनुभव कर रही है। सम्यकद्रष्टि शरीर को गौण करके आत्मा के रत्नत्रय रूप गुणों को मुख्य बनाता है। वह जानता है कि जब तक शरीर के प्रति आसक्ति बनी रहेगी, आत्मा का दर्शन उपलब्ध नहीं होगा। इसलिए शरीर के संबंधों को, शरीर के रूप लावण्य को, शरीर के आश्रित होने वाले जाति और कुल के अभिमान को, लोभ को गौण करके एक बार आत्मा के निर्मल दर्पण में झाँकने का प्रयास करना ही श्रेयस्कर है। सिद्ध परमेष्ठी तो पारदर्शी काँच के समान हैं और अहन्त भगवान काँच के पीछे चाँदी का Polish (लेप) लगे हुए दर्पण के समान हैं। लेकिन यह संसारी प्राणी तो दर्प का पुतला बना हुआ है। लोभ का पुतला बना हुआ है। शरीर के प्रति जो दर्प (अभिमान) है उसे छोड़ने के उपरान्त ही दर्पण के समान निर्मल अहन्त पद की प्राप्ति सम्भव दर्पण स्वयं कह रहा है कि मुझमें दर्प न अर्थात् अहंकार नहीं रहा। सब उज्ज्वल हो गया। जैसा है वैसा दिखायी पड़ने लगा। बन्धुओ! शरीरवान होना तो संसारी होना है। शरीर से रहित अवस्था ही मुक्ति की अवस्था है। शरीर से रहित अवस्था ही वास्तव में पवित्र अवस्था है। अशरीरी सिद्ध परमात्मा ही वास्तव में परम पवित्रात्मा है। छहढाला की तीसरी ढाल में कहा है ज्ञानशरीरी त्रिविधकर्ममल वर्जित सिद्ध महन्ता | ते हैं निकल अमल परमातम भोगें शर्म अनन्ता || ज्ञान ही जिनका शरीर है, जो तीनों प्रकार के कर्ममल-द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म अर्थात् शरीर रूपी मल से रहित हैं ऐसे सिद्ध परमात्मा ही अत्यन्त निर्मल हैं और अनंत सुख का उपभोग करते हैं। हमें भी आगे आकर अपने सिद्धस्वरूप को, आत्मा की निर्मलता को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
  41. 1 point
    जो आत्मा को संसार में परिभ्रमण कराती है, वह कषाय कहलाती है, ऐसी कषाय कितनी होती हैं, उनका स्वरूय क्या है, उनका फल क्या है आदि का वर्णन इस अध्याय में है। 1. कषाय किसे कहते हैं ? जो आत्मा के चारित्र गुण का घात करे, उसे कषाय कहते हैं। कषाय शब्द दो शब्दों के मेल से बना है। ‘कष+आय'। कष का अर्थ संसार है क्योंकि इसमें प्राणी अनेक दु:खों के द्वारा कष्ट पाते हैं और आय का अर्थ है ‘लाभ'। इस प्रकार कषाय का अर्थ हुआ कि जिसके द्वारा संसार की प्राप्ति हो, वह कषाय है। आत्मा के भीतरी कलुष परिणामों को कषाय कहते हैं, इनके द्वारा जीव चारों गतियों में परिभ्रमण करता हुआ दु:ख प्राप्त करता है। कषाय चुम्बक के समान है, जिसके द्वारा कर्म चिपक जाते हैं। 2. कौन-सी गति में जीव के उत्पन्न होते समय कषाय कौन सी रहती है ? नरकगति में उत्पन्न जीवों के प्रथम समय में क्रोध का उदय, मनुष्यगति में मान का उदय, तिर्यञ्चगति में माया का उदय और देवगति में लोभ का उदय नियम से रहता है (आ. श्री यतिवृषभ के अनुसार) तथा इन गतियों में इन्हीं कषायों की बहुलता रहती है, किन्तु स्त्रियों में माया कषाय की बहुलता रहती है। 3. कषाय कितने प्रकार की होती हैं ? कषाय सामान्य से चार प्रकार की होती हैं। क्रोध, मान, माया, लोभ। इनमें अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ। अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ । प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ एवं संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ। 4. अनन्तानुबन्धी कषाय किसे कहते हैं ? अनन्त भवों को बाँधना ही जिसका स्वभाव है, वह अनन्तानुबन्धी कषाय कहलाती है। यह कषाय सम्यक्त्व और चारित्र दोनों का ही घात करती है। (गोक, 45) 5. अप्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं ? जो देशसंयम का घात करती है, वह अप्रत्याख्यानावरण कषाय है। अप्रत्याख्यान अर्थात् देशसंयम को जो आवरण करे, देशसंयम को न होने दे, वह अप्रत्याख्यानावरण कषाय है। (गोक,45) 6. प्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं ? जो सकल संयम का घात करती है, वह प्रत्याख्यानावरण कषाय है। प्रत्याख्यान अर्थात् संयम को जो आवरण करे, संयम को न होने दे, वह प्रत्याख्यानावरण कषाय है। (गोक,45) 7. संज्वलन कषाय किसे कहते हैं ? जिस कषाय के रहते सकल संयम तो रहता है किन्तु यथाख्यात संयम प्रकट नहीं हो पाता है, वह संज्वलन कषाय है। 8. कषायों की शक्तियों के दृष्टान्त व फल कौन-कौन से हैं ? निम्न तालिका में देखें - कषाय दूष्टान्त अनन्तानुबन्धी क्रोध अप्रत्याख्यानावरण क्रोध प्रत्याख्यानावरण क्रोध संज्वलन क्रोध अनन्तानुबन्धी मान अप्रत्याख्यानावरण मान प्रत्याख्यानावरण मान संज्वलन मान अनन्तानुबन्धी माया अप्रत्याख्यानावरण माया प्रत्याख्यानावरण माया संज्वलन माया अनन्तानुबन्धी लोभ अप्रत्याख्यानावरण लोभ प्रत्याख्यानावरण लोभ संज्वलन लोभ पत्थर की रेखा के समान। भूमि की रेखा के समान। (पानी से मिट जाती है) बालू की रेखा। (हवा से मिट जाती है) जल की रेखा। पत्थर का स्तम्भ। अस्थि स्तम्भ। (पुरुषार्थ से मुड़ जाती है) काष्ठ का स्तम्भ। (पिच्छी की डंडी) लता स्तम्भ। बाँस की जड। मेढ़े के सींग समान। (बांस की जड़ से कम टेढ़ी ) गोमूत्र के समान (गो के मूत्र की वक्र रेखा के समान) खुरपे के समान या लेखनी के समान। कृमिराग के रंग समान। गाडी का ऑगन। (केरोसिन से साफ हो जाता है) कीचड़ के समान। (जल से धुल जाता है) हल्दी का रंग। फल - अनन्तानुबन्धी कषाय का फल नरकगति, अप्रत्याख्यानावरण कषाय का फल तिर्यज्ञ्चगति, प्रत्याख्यानावरण कषाय का फल मनुष्यगति एवं संज्वलन कषाय का फल देवगति है। (गोजी, 284-287) 9. कषायों का संस्कार काल कितना है ? अनन्तानुबन्धी कषाय का संस्कार काल छ: माह से ज्यादा तथा संख्यात-असंख्यात एवं अनंत भवों तक रहता है। अप्रत्याख्यानावरण का संस्कार काल छ: माह तक है। प्रत्याख्यानावरण का संस्कार काल एक पक्ष अर्थात् 15 दिन तक है एवं संज्वलन का संस्कार काल अन्तर्मुहूर्त है। (गोजी,46) 10. क्रोध कषाय किसे कहते हैं ? अपने और पर के उपघात या अनुपकार आदि करने के क्रूर परिणाम क्रोध हैं। इससे किसी का अहित हो या न हो, स्वयं का अवश्य हो जाता है। क्रोध जलते हुए अंगारे की तरह है, जिसे दूसरों पर फेंकने से वह जले या न जले, स्वयं का हाथ जल ही जाता है। इसमें हृदय की धड़कन बढ़ जाती है। हाथ-पैर कांपने लगते हैं, आँखें लाल हो जाती हैं, हित-अहित का विवेक समाप्त हो जाता है। 11. क्रोध कषाय के कौन-कौन से कारण हैं ? क्रोध कषाय के निम्न कारण हैं- कषाय का उदय होना, भूख-प्यास के कारण, इच्छा पूर्ति नहीं होना, मेरे सही को कोई गलत कहे, अज्ञान के कारण। 12. क्रोध कषाय का फल बताइए ? द्वीपायन मुनि क्रोध के कारण अग्नि कुमार देव हुए। क्रोध के समय किया गया भोजन-पानी भी विष बन जाता है। राजा अरविन्द क्रोध के कारण नरक गया। 13. क्रोध कषाय से कैसे बच सकते हैं ? क्रोध कषाय से निम्न प्रकार से बच सकते हैं पर की वेदना को अपनी वेदना समझे। वस्तु स्थिति जानें। नेवला-सर्प-बालक-महिला की कहानी। स्थान परिवर्तन कर देना चाहिए। जैसे-श्रवणकुमार ने किया था। जवाब न देना-मौनेन कलहो नास्ति। कुछ क्षण के लिए ऊपर आकाश की ओर देखें। 14. किसका क्रोध कब तक रहता है ? गुरुजनों का क्रोध प्रणाम करने पर्यन्त रहता है, प्रणाम करने के पश्चात् नष्ट हो जाता है। क्षत्रियों का क्रोध मरण पर्यन्त अर्थात् चिरकाल तक रहता है अथवा उनका क्रोध प्राणों को नष्ट करने वाला होता है। ब्राह्मणों का क्रोध दान पर्यन्त रहता है, दान मिलने से शांत हो जाता है। वणिकों का क्रोध प्रियभाषण पर्यंत होता है, ये लोग मीठे वचनों द्वारा क्रोध को त्यागकर शांत हो जाते हैं। जमींदारों (साहूकारों) का क्रोध उनका कर्जा चुका देने से शांत हो जाता है। (नीतिवाक्यामृत) विद्वानों का क्रोध तब तक रहता है, जब तक वह अपनी प्रशंसा नहीं सुन लेता। प्रशंसा सुनते ही क्रोध शांत हो जाता है। बच्चों का क्रोध तब तक रहता है, जब तक उन्हें उनकी प्रिय वस्तु नहीं मिलती। वह वस्तु मिलते ही क्रोध शांत हो जाता है। महिलाओं का क्रोध तब तक रहता है, जबतक उन्हें मन पसन्द साड़ी और आभूषण नहीं मिलते। ये मिलते ही क्रोध शान्त हो जाता है। 15. मान कषाय किसे कहते हैं ? रोष से अथवा विद्या, तप और जाति आदि के मद से दूसरों के प्रति नम्र न होने को मान कहते हैं। (ध.पु., 1/351) 16. मान कषाय का क्या फल है ? रावण विद्याधर मान के कारण नरक गया, दुर्गन्धा नामक बालिका ने अनेक दु:ख भोगे तथा मरीचि को अहंकार के कारण अनेक दुर्गतियों में भटकना पड़ा। 17. मान कषाय को कैसे रोक सकते हैं ? 8 मदों में से जिसका भी मद हो तो अपने से बड़ों को देखो तो मद अपने आप नहीं होगा। ज्ञान का मद है तो केवलज्ञानी को देखें। धन का मद है तो चक्रवर्ती को देखें। रूप का मद है तो कामदेव को देखें। बल का मद है तो भीम, रावण को देखें। इसी प्रकार और भी जानना चाहिए। 18. माया कषाय किसे कहते हैं ? दूसरे को ठगने के लिए जो कुटिलता या छल आदि किए जाते हैं, वह माया कषाय है। अपने हृदय में विचार को छुपाने की जो चेष्टा की जाती है, उसे माया कषाय कहते हैं। मन, वचन, काय की प्रवृत्ति में एकरूपता नहीं होने को मायाचार कहते हैं। ऐसे व्यक्ति ठगी या मायावी कहलाते हैं। माता-पिता, भाई-बहिन तक उसकी बातों का विश्वास नहीं करते हैं। 19. माया कषाय का क्या फल है ? मायाचार के कारण मृदुमति महाराज भी हाथी की पर्याय में गए। युधिष्ठिर के नाम पर कलंक लगा क्योंकि उन्होंने युद्ध में कहा था ‘अश्वत्थामा हतो नरो वा 20. माया कषाय को कैसे रोक सकते हैं ? आज तक किसी का मायाचार छिपा नहीं है, वह प्रकट हो ही जाता है। अत: सादगी, सरलता, ईमानदारी, स्पष्टवादिता, कथनी-करनी में एकरूपता, अपने गुणों को छिपाना और दोषों का निकालना आदि के प्रयोग करने से तथा हमेशा याद रखना, दगा किसी का सगा नहीं। 21. लोभ कषाय किसे कहते हैं ? धन आदि की तीव्र आकांक्षा को लोभ कषाय कहते हैं। बाह्य पदार्थों में जो यह मेरा है, इस प्रकार अनुराग रूप बुद्धि होती है, वह लोभ है। इसे पाँचों पापों का बाप (पिता) कहा है- लोभी कभी सुखी नहीं होता है, सदा और मिले- सदा और मिले वह चाह की आग में जलता रहता है, न स्वयं भोग पाता है न दूसरों को भोगने देता है। 22. लोभ कषाय का फल क्या है ? लोभ के कारण कौरवों को भी नरक जाना पड़ा। पाप का बाप कौन है, इस प्रश्न के उत्तर में पंडित जी को नगरनारी के द्वारा अपमानित होना पड़ा। वह किसान जिसे 1000 रूबल (रूस की मुद्रा) में इच्छित भूमि मिलने वाली थी लोभ में दौड़-दौड़ कर मर गया । 23. लोभ कषाय से कैसे बच सकते हैं ? हजारों नदियों से समुद्र की तृप्ति नहीं हुई, हजारों टन ईंधन से अग्नि की तृप्ति नहीं हुई। सागरोपम काल तक स्वर्गों में भोग भोगने से तृप्ति नहीं हुई तो यहाँ 60-70 वर्ष की उम्र में क्या हो सकता है ? भरत चक्रवर्ती भी भाई से लड़े अंत में राज्य छोड़ना पड़ा तो हम सब इसके पीछे क्यों पड़े हैं और अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं। ऐसा विचार करें। 24. नो कषाय किसे कहते हैं ? नो अर्थात् ईषत् (किंचित्) कषाय का वेदन करावे, उसे नोकषाय या अकषाय कहते हैं। 25. नो कषाय कितनी होती हैं ? नो कषाय 9 होती हैं -हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद एवं नपुंसकवेद।
×
×
  • Create New...