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  1. Vidyasagar.Guru

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  2. संयम स्वर्ण महोत्सव

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Showing content with the highest reputation since 06/15/2020 in all areas

  1. 2 points
    इस सूची को अद्यतित करने हेतु संबंधित मुनिराज, आर्यिका माताजी का स्थान एवं तिथि कमेंट बॉक्स में पोस्ट करें चातुर्मास स्थल कलश स्थापना तिथि 1 आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ तीर्थोदय धाम, प्रतिभास्थली, रेवतीरेंज, इंदौर, म.प्र रविवार, 12 जुलाई 2020, दोपहर 1ः30 बजे 2 निर्यापक मुनिश्री समयसागर जी ससंघ शांतिधाम, बीना बारहा, म.प्र. मंगलवार, 7 जुलाई 2020, दोपहर 2ः00 बजे 3 निर्यापक मुनिश्री योगसागर सी ससंघ हिंगोली, महाराष्ट्र 4 निर्यापक मुनिश्री नियमसागर जी ससंघ तिगडोली, जि.बेलगांव, कर्नाटक 5 निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी ससंघ तपोदय तीर्थ, बिजौलियाँ, राजस्थान शनिवार, 4 जुलाई 2020, प्रातः संपन्न 6 मुनिश्री समतासागर जी ससंघ विदिशा, म.प्र. 7 मुनिश्री प्रमाणसागर जी ससंघ कटनी, म.प्र. 5 जुलाई 2020, रविवार दोप.2 :00 बजे 8 मुनिश्री पवित्रसागर जी ससंघ वर्धा, महाराष्ट्र 9 मुनिश्री प्रशांतसागर जी ससंघ पथरिया, म.प्र. 10 मुनिश्री विनीतसागर जी ससंघ गायत्री नगर, जयपुर, राज. 11 मुनिश्री निर्णयसागर जी ससंघ . 12 मुनिश्री पायसागर जी ससंघ बननिकोप्पा, कर्नाटक 13 मुनीश्री प्रसादसागर जी ससंघ मुँगावली, अशोकनगर म.प्र 8 जुलाई 2020, बुधवार, दोपहर 2 बजे 14 मुनिश्री अभयसागर जी ससंघ आरोन, म.प्र. 15 मुनिश्री अक्षयसागर जी ससंघ 16 मुनिश्री प्रणम्यसागरजी ससंघ मुज़फ्फरनगर, उ.प्र. 17 मुनिश्री अजितसागरजी ससंघ किला मंदिर, आष्टा (सिहोर), म.प्र 5 जुलाई 2020, रविवार, दोपहर 2 बजे 18 मुनिश्री संभवसागर जी ससंघ अकोदिया शाजापुर जिले (म. प्र.) 19 मुनिश्री श्रेयांससागर जी ससंघ सानोधा, जि. सागर, म.प्र. 20 मुनिश्री विमलसागर जी ससंघ बीना, म.प्र. 21 मुनिश्री कुन्थुसागर जी ससंघ सागर, म.प्र. 22 मुनिश्री वीरसागर जी ससंघ सरधना, उ.प्र. 23 मुनिश्री आगमसागर जी ससंघ मानगाँव (कोल्हापुर) महाराष्ट्र 24 मुनिश्री विनम्रसागर जी ससंघ खातेगाँव, म.प्र. 12 जुलाई 2020 1 आर्यिका गुरुमति जी ससंघ जैन मंदिर परवारपुरा, इतवारी, नागपुर 5 जुलाई 2020, दोप.1 :00 बजे 2 आर्यिका दृढमति जी ससंघ गढ़ा, जबलपुर (म.प्र.) 7 जुलाई 2020, दोप.1 :00 बजे 3 आर्यिका मृदुमति जी ससंघ 4 आर्यिका ऋजुमति जी ससंघ कुण्डलपुर दमोह म. प्र. 5 जुलाई 2020, दोप.1 :00 बजे 5 आर्यिका तपोमति जी ससंघ 6 आर्यिका गुणमति जी ससंघ 7 आर्यिका प्रशांतमति जी ससंघ 8 आर्यिका पूर्णमति जी ससंघ कुण्डलपुर दमोह म. प्र. 5 जुलाई 2020, दोप.1 :00 बजे 9 आर्यिका अनंतमति जी ससंघ 10 आर्यिका भावनामति जी ससंघ 11 आर्यिका आदर्शमति जी ससंघ पपौरा जी 12 आर्यिका दुर्लभमति जी ससंघ पपौरा जी 13 आर्यिका अंतरमति जी ससंघ पपौरा जी 14 आर्यिका अनुनयमति जी ससंघ 15 आर्यिका अपूर्वमति जी ससंघ श्री चंद्रप्रभ जिनालय, कठाली बाजार, सिरोंज (विदिशा) मप्र 5 जुलाई 2020, दोप.1 :00 बजे 16 आर्यिका अनुभवमति जी ससंघ 17 आर्यिका उपशांतमति जी ससंघ कुण्डलपुर दमोह म. प्र. 5 जुलाई 2020, दोप.1 :00 बजे 18 आर्यिका अकंपमति जी ससंघ
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    आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज द्वारा दिनांक - 31 जुलाई, 2015, शुक्रवार, द्वितीय आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा वि० सं० २०७२, श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र बीनाबारहा, सागर (म० प्र०) में तीन मुनि दीक्षायें प्रदान कीं मुनिश्री संधानसागर जी मुनिश्री संस्कारसागर जी मुनिश्री ओंकारसागर जी इस वर्ष आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा की पावन तिथि दिनांक - 5 जुलाई 2020 को हम सभी मुनिश्री के रत्नत्रय की अनुमोदना करते है | 6 वें मुनि दीक्षा दिवस के पावन अवसर पर सभी मुनिराजो के पावन चरणों में कोटि कोटि नमन। 🙏 नमोस्तु गुरुवर 🙏
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  5. 2 points
    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: आचार्य विद्यासागर जी, रवीन्द्र जैन
    नंदीश्वर भक्ति भक्ति पाठ : पूज्यपाद भक्तियाँ (संस्कृत) का आचार्य श्री द्वारा पद्यानुवाद गायन : रवीन्द्र जैन
  6. 2 points
    अब सम्यग्दर्शन का लक्षण कहते हैं - तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्॥२॥ अर्थ - जो पदार्थ जिस स्वभाव वाला है, उसका उसी स्वभाव रूप से निश्चय होना तत्त्वार्थ है और तत्त्वार्थ का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। English - Belief in substances ascertained as they are is right faith. विशेषार्थ - ‘तत्त्व’ और ‘अर्थ’ इन दो शब्दों के मेल से ‘तत्त्वार्थ' शब्द बना है। तत्त्व शब्द भाव सामान्य का वाचक है। अतः जो पदार्थ जिस रूप में स्थित है, उसका उसी रूप में होना ‘तत्त्व है। और जिसका निश्चय किया जाता है, उसे ‘अर्थ' कहते हैं। अतः तत्त्व रूप अर्थ को तत्त्वार्थ कहते हैं। आशय यह कि तत्त्व का मतलब है भाव और अर्थ का मतलब है भाववान्। अतः न केवल भाव का और न केवल भाववान् का श्रद्धान सम्यग्दर्शन है। किन्तु भाव-विशिष्ट भाववान् का श्रद्धान करना ही सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शन के दो भेद हैं - सराग सम्यग्दर्शन और वीतराग सम्यग्दर्शन। प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य ये सराग सम्यग्दर्शन के सूचक हैं। रागादिक की तीव्रता के न होने को प्रशम कहते हैं। संसार, शरीर और भोगों से भयभीत होने का नाम संवेग है। सब प्राणियों को अपना मित्र समझना अनुकम्पा है। आगम में जीवादि पदार्थों का जैसा स्वरूप कहा है, उसी रूप उन्हें मानना आस्तिक्य है। सराग सम्यग्दृष्टि में ये चारों बातें पायी जाती हैं तथा आत्मा की विशुद्धि का नाम वीतराग सम्यग्दर्शन है |
  7. 1 point
    आचार्य श्री जी के स्वास्थ में पहले से बहुत सुधार हुआ है। आज के वीडियो आचार्य श्री जिनेन्द्र दर्शन करते हुए। सभी भक्त निरंतर जाप करते रहे जिससे आचार्य भगवन जल्दी से पूरी तरह से स्वस्थ हो जाये और भक्तो को अपना आशीर्वाद प्रदान कर सके।
  8. 1 point
    कलश स्थापना सूचना https://vidyasagar.guru/blogs/blog/8-सूचना-पट्ट-आचार्य-श्री-१०८-विद्यासागर-जी-महाराज-ससंघ/
  9. 1 point
    अत्यंत पुण्यशाली अवसर आया है । मेरे पूरे परिवार - विमलचंद , मनोज कुमार , मुकेश कुमार बाकलीवाल , इंदौर को आचार्य श्री का प्रथम कलश लेने का सौभाग्य मिला है । 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
  10. 1 point
    मुनि श्री प्रबुद्धसागर जी महाराज का चतुर्मास गोटेगाँव मे होगा।
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    दिनांक - 27 जून 2020 ,शनिवार जहाँ हम भक्त टकटकी लगाए एकटक अपने आचार्य भगवन् गुरूवर श्री विद्यासागर जी को अपलक देख रहे थें कि गुरुजी का इस वर्ष का चौमासा कहा होगा,लेकिन यहाँ गुरुकृपा की बारिश और और बढ़ती जा रही है....... इंदौर नगरी में विगत 5 माह उपरान्त जिनशासन की अनूठी प्रभावना में गुरु आज्ञा से हुआ नवीन उपसंघ 27 जून 2020 #रेवतीरेंज #भावनात्मकदृश्य😊👣 #विहार पूर्व, आचार्य भगवन की वंदना करते हुए सभी संघस्थ एवं विहाररत मुनिराज। *सभी मुनिराज की सूचि लिंक पर अपडेट हो गई हैं | *आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ* https://vidyasagar.guru/sangh/ *मुनिश्री संभवसागर जी ससंघ* *मुनिश्री विनम्रसागर जी ससंघ* *मुनि श्री संभवसागर जी ससंघ विहार अपडेट* मुनिश्री विनम्रसागर जी ससंघ विहार अपडेट *शिष्य महाराज संघ सूचि* https://vidyasagar.guru/aagyaanuvartee-sangh/ ✨मुनि श्री १०८ संभव सागर जी महाराज ⭐मुनि श्री १०८ विराटसागर जी महाराज ⭐मुनि श्री १०८ विशदसागर जी महाराज ⭐मुनि श्री १०८ निर्मोहसागर जी महाराज ⭐मुनि श्री १०८ निष्पक्षसागर जी महाराज ⭐मुनि श्री १०८ निस्पंदसागर जी महाराज ⭐मुनि श्री १०८ निष्कामसागर जी महाराज ⭐मुनि श्री १०८ नीरजसागर जी महाराज ⭐मुनि श्री १०८ निस्संगसागर जी महाराज ⭐मुनि श्री १०८ समरससागर जी महाराज ⭐मुनि श्री १०८ संस्कारसागर जी महाराज 11 मुनिराजों का गुरुचरणों से मंगल विहार..... 🚩सम्भावित विहार दिशा👉🏻 भोपाल म.प्र. ✨पूज्यवर श्री १०८ विनम्रसागर जी महाराज जी ⭐मुनि श्री १०८ निःस्वार्थसागर जी महाराज जी, ⭐मुनि श्री १०८ निष्पृहसागर जी महाराज जी, ⭐मुनि श्री १०८ निश्चलसागर जी महाराज जी, ⭐मुनि श्री १०८ निर्भीकसागर जी महाराज जी, ⭐मुनि श्री १०८ नीरागसागर जी महाराज जी, ⭐मुनि श्री १०८ निर्मदसागर जी महाराज जी, ⭐मुनि श्री १०८ निसर्गसागर जी महाराज जी, ⭐मुनि श्री १०८ ओंकारसागर जी महाराज जी। 🚩दिशा - अगली सूचना जल्दी मिलेगी 9 मुनिराजों का गुरुचरणों से मंगल विहार..... ■समस्त श्रावको से विनम्र निवेदन■ ★ विहार के दौरान सरकारी नियमो का ध्यान रखें। ★ मार्ग के दोनों और निश्चित दुरी बनाकर ही वंही से आरती, वन्दन, नमन करें। ★राह में कंही भी मुनिराजो के पाद प्रक्षालन का प्रयास न करें। ★ भीड़भाड़ से बचें, मास्क का प्रयोग करें। ★विहार के फोटो,वीडियो वायरल करने का प्रयास बिल्कुल भी न करें। 👉🏻आपकी एक जरा सी असावधानी गुरुचरणों के विहार में बाधा का कारण बन सकती है।
  12. 1 point
  13. 1 point
    बुन्देलखंड में आचार्य महाराज का यह पहला चातुर्मास था। एक दिन रात्रि के अँधेरे में कहीं से बिच्छू आ गया और उसने एक बहिन को काट लिया। पंडित जगन्मोहनलाल जी वहीं थे। उन्होंने उस बहिन की पीड़ा देखकर सोचा कि बिस्तर बिछाकर लिटा दूँ, सो जैसे ही बिस्तर खोला उसमें से एक सर्प निकल आया। उसे जैसे-तैसे भगाया गया। दूसरे दिन पंडित जी ने आचार्य महाराज को सारी घटना सुनाई और कहा कि महाराज! यहाँ तो चातुर्मास में आपको बड़ी बाधा आएगी। पंडित जी की बात सुनकर आचार्य महाराज हँसने लगे। बड़ी उन्मुक्त हँसी होती है महाराज की। हँसकर बोले कि-‘पंडित जी, यहाँ हमारे समीप भी कल दो-तीन सर्प खेल रहे थे। यह तो जंगल है। जीव-जन्तु तो जंगल में ही रहते हैं। इससे चातुर्मास में क्या बाधा ? वास्तव में, हमें जंगल में ही रहना चाहिए और सदा परीषह सहन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। कर्म-निर्जरा परीषह-जय से ही होती है।' उपसर्ग और परीषह को जीतने के लिए इतनी निर्भयता व तत्परता ही साधुता की सच्ची निशानी है। कुण्डलपुर(१९७६)
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    आयुष मंत्रालय (भारत सरकार)🇮🇳 के Youtube चैनल पर अर्हं 🙏मुनि श्री प्रणम्य सागर जी का देश के युवाओं 👬👭 के लिए संबोधन।
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  22. 1 point
    बहुत ही ज्ञान वर्धक
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    💲® *🦚ध्यान में लीन मुनि श्री संधान सागर जी महाराज🦚* _संत शिरोमणी आचार्य श्री १०८ विधासागर जी महामुनिराज के परम प्रभावी शिष्य पूज्य मुनि श्री १०८ संधान सागर जी महाराज इस वर्ष भी पुनः ३६ घंटे के लियेे *२८ अगस्त* को शाम से ध्यान में बैठ गए हैं। *मुनि श्री दीक्षा के उपरांत प्रतिवर्ष ३६ घंटे या ४८ घंटे* के लियेे ध्यान में बैठते हैं।_ _किसी ने सच कहा हैं...!!_ _*जो "शिष्य" हैं वो सदा ऋणी रहेगा* _*उपकार गुरु का कोई कभी चुका न सकेगा*_ _*🔅 सौमिल जैन ललितपुर*_ 💲®
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    आगे बतलाते हैं कि सम्यग्दर्शन कैसे उत्पन्न होता है। तन्निसर्गादधिगमाद्वा॥३॥ अर्थ - वह सम्यग्दर्शन दो प्रकार से उत्पन्न होता है - स्वभाव से और पर के उपदेश से। जो सम्यग्दर्शन पर के उपदेश के बिना स्वभाव से ही उत्पन्न होता है, उसे निसर्गज सम्यग्दर्शन कहते हैं और जो सम्यग्दर्शन पर के उपदेश से उत्पन्न होता है, उसे अधिगमज सम्यग्दर्शन कहते हैं। English - That (This right faith) is attained by intuition or by acquisition of knowledge. विशेषार्थ - दोनों ही सम्यग्दर्शनों की उत्पत्ति का अन्तरंग कारण तो एक ही है, वह है दर्शनमोहनीय कर्म का उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम्। उसके होते हुए जो सम्यग्दर्शन दूसरे के उपदेश के बिना स्वयं ही प्रकट हो जाता है, उसे निसर्गज कहते हैं और परोपदेशपूर्वक जो होता है, उसे अधिगमज कहते हैं। सारांश यह है कि जैसे पुरानी किंवदन्ती के अनुसार कुरुक्षेत्र में बिना ही प्रयत्न के सोना पड़ा हुआ मिल जाता है, वैसे ही किसी दूसरे पुरुष के उपदेश के बिना, स्वयं ही जीवादि तत्त्वों को जानकर जो श्रद्धान होता है, वह निसर्गज सम्यग्दर्शन है और जैसे सोना निकालने की विधि को जानने वाले मनुष्य के प्रयत्न से खान से निकाला हुआ स्वर्ण पाषाण सोना रूप होता है। वैसे ही दूसरे पुरुष के उपदेश की सहायता से जीवादि पदार्थों को जानकर जो श्रद्धान होता है, वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है।
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    साधु का जीवन वस्तुतः साधना तप ही हुआ करता है लेकिन आगम ग्रन्थों को सरलीकृत प्रस्तुतिकरण के साथ सामान्यजन तक पहुँचाने का भाव भी आत्मसाधना के साथ मानस पटल में उत्पन्न होते रहते हैं। लेखनकला, साहित्यसृजन, काव्यकला ये सब अपने ही उपयोग को स्थिर रखने के साधन हैं, ना कि ख्याति-लाभ-पूजा की दृष्टि से लिखे जाते हैं। यह मूकमाटी महाकाव्य आचार्य गुरुदेव की दृष्टि में आया और उन्होंने संस्कृत भाषा में लिखने का मन बनाया था, बाद में सोचा यह जनहितकारी नहीं बन पायेगा, फिर हिन्दी में लिखने का विचार आया फिर बुन्देली कहावत अनुभवों का सहारा ले कार्य प्रारम्भ हुआ, जिस पर देशभर के ३५० मनीषियों ने समीक्षा लिखी जो मूकमाटी मीमांसा नाम से प्रकाशित हुई, संघ के साधुओं ने भी समीक्षा लिखी। माटी की तीन अवस्थाओं के बारे में लिखा-आचार्य गुरुदेव को यह समीक्षा मैंने पढ़कर सुनाई, उन्हें बहुत पसंद आयी, फिर भी जब प्रकाशन की बात सामने आई तो उन्होंने संघ के साधुओं की समीक्षा ग्रन्थ में शामिल करने का निषेध कर दिया, तब समझ में आया गुरुदेव की सोच के बारे में अपनों के द्वारा लिखी हुई समीक्षा निष्पक्ष कैसे हो सकती है? दिल्ली के एक साहित्यकार रामप्रसाद शर्मा ने समीक्षा कटु आलोचन के साथ लिखी, उसमें जैन आगम में वर्णित वेदों की चर्चा थी। जैसे-स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद इस कथानक को पढ़कर शर्माजी समझे यह दिगम्बर साधु आचार्य विद्यासागर वेदों के आलोचक हैं। तब रामटेक में दिल्ली के डॉक्टर सत्यप्रकाश जैन के साथ आचार्यश्री के दर्शन के लिए एवं चर्चा के लिए आना हुआ, तब वे दर्शन कर अभिभूत हुए चर्चा कर शंका का समाधान हुआ जैन साधु जैनधर्म के प्रति नतमस्तक हुए आचार्यश्री ने समाधान करते हुए कहा-यहाँ वेद ग्रन्थों की चर्चा नहीं है। जैनधर्म कथित स्त्री, पुरुष, नपुंसक वेदों की चर्चा है। अब शर्माजी की मन की कलुषता का अंत हुआ, चेहरे पर प्रसन्नता की लकीरें छा गयीं, तब उनके मन में यही भाव आया। इतने बड़े साहित्यकार संत जीर्ण-शीर्ण स्थान पर अपना बैठना-उठना बनाये रखे हैं। इन ५० वर्षों में गुरुदेव ऐसे तामझाम से दूर रहकर साहित्य-सृजन में लगे रहे।
  29. 1 point
    दया 'धर्म' का मूल है। दया बिना सब शून्य है। अहिंसा का दिग्दर्शन दया के भाव में दया के कार्य में सन्निहित है। जिसके पास दया का गुण है, करुणा उसके रग-रग में समाहित होती चली जाती है। बाहर में प्रेम और वात्सल्य का प्रसाद बाँटते हुए बिखरे लोगों को एक बनाने में औषधि के गुण के समान कार्य सम्पादित करते हुए देखा जा सकता है। कोई कलाकार पत्थर में काष्ठ में मूर्ति को अपनी श्रम साधना के द्वारा प्रकट कर देता है लेकिन प्राणी मात्र के प्रति मैत्री का भाव, करुणा का भाव, अनुकंपा का भाव, दया का भाव जिस जीव आत्मा में समाहित होता चला जाता है। वह जीव, आत्मा समीचीन दर्शन से परिपूरित होता चला जाता है। देखभाल कर चलने की योग्यता हासिल कर लेता है। इसी को आचार्य उमास्वामी महाराज ने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की संज्ञा प्रदान की है। क्या इस प्रकार के गुणों से समाहित जीव आत्मा को दया, प्रेम, करुणा, वात्सल्य की मूर्ति लोगों के चक्षु इन्द्रिय का विषय बने बिना रह नहीं सकता। इन ५० वर्षों में गुरुदेव जैन जगत् में दया और प्रेम की मूर्ति के रूप में प्रकट हुए।
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    जीवन जीने की कला संयम की साधना के साथ क्रमशः निखार को लिए हुए चलती रहती हैं। शांत रहने का परिणाम अशांत प्रवृत्ति वाले पुरुष को शांत होने की नित्य प्रेरणा देता रहता है। क्रूर से क्रूर हिंसक प्राणी भी अपनी हिंसा की प्रवृत्ति को छोड़ लाभदायी सिद्ध मंत्र की तरह काम करता चला जाता है। जटिल व कठिन प्रश्नों का उत्तर अंदर और बाहर से शांत होने पर अपने आप चला आता है। शांति का परिणाम क्षयोपशम को बढ़ाने में सहयोगी कारण बनता है। जब आदमी कोलाहल से रहित शांत वातावरण में चला जाता है तो उसका तनाव भी अपने आप उस शांत वातावरण में विलीन होता चला जाता है। ऐसे संयम साधक गुरुदेव ५० वर्षों में अंदर व बाहर से शांत बने रहे इसलिए बाहर में शांत छवि का दर्शन देकर सैकड़ों-हजारों युवक, युवतियों को विषय वासना से निकालकर हमेशा के लिए शांत बनाकर उनकी दिशा बदलकर दशा का परिवर्तन कराने वाले शांत छवि वाले गुरुदेव जयवंत हैं।
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    महान सन्त आचार्य भगवंत के चरणो मे कोटि कोटि नमोस्तु।
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    मैं ज्ञानधारा हूँ- प्रतिपल प्रवाहमान ध्रुव धावमान सतत गतिमान रहती हूँ प्रत्येक आत्मा में, बहती हूँ... निःशब्द मैं...।। विकारों की सघन चट्टानों से ढक देते अज्ञानी मुझे, कल-कल करती कर्मधारा का ही तब संवेदन करते हैं वे, विरला कोई ज्ञानी ही जान पाता है मुझे। मैंने आँखों से अगम और बुद्धि से दुर्गम गूढ़ रहस्यों को जाना है, अतीत के भूगर्भ को अनागत के गोद की अतलांत गहराइयों को और वर्तमान की धरा को पहचाना है। आने वाले समय की पदचाप सुनने की क्षमता । सामान्य मनुष्य में कहाँ? नियति के खेल से सब अपरिचित थे, लेकिन मैं परिचित थी मेरी ही कोख में तो समायी थी नियति की परिणति और उसका नियन्ता… जो ध्रुव अडिग दृढ़ संकल्पी चैतन्य चिन्मयी सहज निर्विकल्पी। जिनके परिचय से स्वयं का सहज परिचय होने लगता है, जिनके दर्शन से स्वयं का दर्शन कर निज को निज में ही खोने लगता है। जो नाम, काम और जगत के धाम से परे आप्तकाम, कृतकाम, पूर्णकाम होने को लालायित है..." जो अपने ही पूर्वकृत् पुण्य कर्मों से ‘माँ श्रीमंति' की कोख में अवतरित है। प्रकृति भी आज अत्यधिक पुलकित है; मानो स्वर्ग से चयकर किसी पवित्र आत्मा के आने का दे रही है संकेत… कि अचानक कुछ हल्का-सा, झलका-सा, अपूर्व-सा। सुखद अनुभूत हुआ कुछ अदभुत हुआ पर दृश्य कुछ नहीं। गर्भ के रहस्य में समा गया चेतनात्मा...! गर्भस्थ के गर्भ में ज्ञान और ज्ञान में समाया भगवान... प्रगट नहीं, किंतु इसमें बहुत कुछ अप्रगट सत्य निहित है। अंतर्मुहूर्त में आहार, शरीरादि छहों पर्याप्तियाँ पूर्णकर गर्भ में ही जगत कल्याण की कामना से मानो प्राणियों को संकेत दे रहा हो, भगवान होने की भावना ले। पर्याप्त सुख-शांति का आश्वासन दे रहा हो। कौन जानता था कि ब्रह्मचारी, मुनि, आचार्य बन मोक्षमार्ग की दूरी तय करेंगे और एक दिन अपना गंतव्य पा लेंगे।
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    किसी सज्जन ने आचार्य श्री से शंका व्यक्त करते हुए कहा कि - ध्यान करने से क्या फायदा होता है ? तब आचार्य श्री ने कहा कि- ध्यान करने से स्वार्थ मिट जाता है एवं जीव परमार्थ की ओर बढ़ जाता है। आचार्य श्री जी ने एक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि एक व्यक्ति ध्यान के बारे में शोध कर रहे थे। जैन-जैनेत्तर सभी ग्रथों का अध्ययन किया एवं सभी साधकों से मिलने का पुरुषार्थ किया। कन्याकुमारी से हिमालय तक गये। वह अपने पास भी आये थे। सब लोगों ने अपनी-अपनी बात रखी। मैं भी ध्यान करता हूँ। स्थान-स्थान पर गया पर ध्यान के विषय में जो उत्तर मिलना चाहिए था वह नहीं मिला। ध्यान के बारे में आपका क्या मन्तव्य है? सुख मिलेगा क्या? स्वर्गादि की प्राप्ति होगी क्या? या कोई और ध्यान का फल है? हमने कहा- ध्यान का परोक्ष और प्रत्यक्ष दो तरह का फल मिलता है। साक्षात् फल- निराकुलता की प्राप्ति होना व असंख्यात गुणी कर्म की निर्जरा होना। जिसका दृढ़ श्रद्धान हो। उसकी ही असंख्यात गुणी निर्जरा होती है। और दूसरा फल है मोक्ष की प्राप्ति होना।
  36. 1 point
    दिगम्बर एवं श्वेताम्बर आम्नाय की चर्चा चल रही थी। इसके बारे में आचार्य श्री जी विस्तार से समझा रहे थे कि भगवान् महावीर के निर्दोष मार्ग में भी दो धाराओं का जन्म हो गया। इस बात को सुनकर किसी सज्जन ने शंका व्यक्त करते हुए कहा कि- आचार्य श्री जी दिगम्बर एवं श्वेताम्बर आम्नाय में से मूलधारा कौन-सी है। इस बात को सुनकर आचार्य श्री कुछ क्षण मौन रहे, ऐसा लगा जैसे चिंतन में खो गये हों। फिर नदी का उदाहरण देते हुए बोले कि- जब नदी की धारा अबाध रूप से बह रही हो और बीच में यदि बड़ा पत्थर (पहाड़) आ जाए तो दो धारायें बन जाती हैं। ठीक उसी प्रकार महावीर भगवान की मूल दिगम्बर धारा अबाध रूप से चल रही थी बीच में 12 साल का अकाल पड़ने रूप (पत्थर) बीच में आ गया तो एक धारा श्वेताम्बर और बन गयी अब आप स्वयं तय कर लो मूल धारा कौन है ? संख्या की अपेक्षा नहीं चर्या की अपेक्षा भी पहचान कर सकते हैं। सूक्ष्मता से व्रतों का पालन जिस धारा में हो वही मूलधारा है।
  37. 1 point
    प्रत्येक जैनी के कुलाचार में रात्रिभोजन त्याग, पानी छानकर पीना, एवं देव-दर्शन करना अर्थात् प्रतिदिन मंदिर जाना ये तीन नियम बताये हैं। जो इन तीन नियम का पालन करता है वही सच्चा जैनी माना जाता है। जैन कुल में जन्म लेना पुण्य का उदय है। लेकिन जैन बनना पुण्य की क्रिया है। एक बात हमेशा याद रखना पुण्य के उदय में पुण्य की क्रिया को कभी नहीं छोड़ना वरना पाप बंध से नहीं बच सकोगे। कई लोगों की धारणा होती है कि हमारी आत्मा तो पवित्र है हमें मंदिर जाने की क्या आवश्यकता? इसी प्रकार की धारणा वाले एक व्यक्ति ने आचार्य श्री जी से शंका व्यक्त करते हुए कहा कि- हे गुरुवर ! मंदिर जाने से क्या प्राप्त होता है? तब आचार्य श्री जी ने कहा कि- मंदिर जाने से अपने स्वरूप का ज्ञान हो जाता है। मंदिर जी में कोई जाता है और वह कहता है भगवान के सामने कि आप कौन हैं? तब प्रतिध्वनि आती है, आप कौन है? वह कहता है आप तो भगवान हैं। तब प्रतिध्वनि आती है आप तो भगवान् हैं अर्थात् मंदिर जी में जाने से हम अपने स्वरूप का बोध प्राप्त कर लेते हैं। हमें अपने स्वरूप का ज्ञान हो जाए इससे बड़ी और क्या महिमा हो सकती है। मंदिर जी की सबसे बड़ी महिमा तो यही है कि देव-दर्शन से निज दर्शन की ओर बढ़ जाते हैं।
  38. 1 point
    “सम्यक्काय कषाय लेखना - सल्लेखना "- सम्यक् प्रकार से शरीर और कषायों को कृष करने का नाम सल्लेखना है। शरीर के पोषण से कषायों में वृद्धि होती है इसलिए शरीर का पोषण हमारे लिए अभिशाप सिद्ध हो जाता है, क्योंकि इससे कर्मों का बंध जारी रहता है रुकता नहीं है। उसी प्रकार यदि कषायों के वशीभूत होकर शरीर को तपाया जाता है तो भी वह हमें और अभिशाप सिद्ध होता है क्योंकि कषाय के माध्यम से बन्ध जारी रहता है। इसी बात को समझाते हुए आचार्य महाराज ने यह कहा कि सल्लेखना मत्यु के समय ही होती हो ऐसा नहीं है, किन्तु सल्लेखना प्रति समय भी चल सकती है क्योंकि सल्लेखना का अर्थ है- काय के प्रति निरीहता। सल्लेखना में मात्र शरीर को ही क्षीण नहीं किया जाता, बल्कि कषायों को भी क्षीण किया जाता है। जिस प्रकार वृक्ष की ऊपरी वृद्धि करने के लिए नीचे की हरी-भरी पत्ती की कटिंग कर दी जाती है उसी प्रकार से व्रतों की वृद्धि करने के लिए शरीर के प्रति निरीहता होना और कषायों का कृष् होना आवश्यक है। How are you old? तुम कितने पुराने हो गये हो। यह मुहावरा अपने आप में बहुत मायना रखता है। मत्यु महोत्सव को याद कराता है। आचार्य महाराज हम सभी को यही शिक्षा दे रहे हैं कि प्रत्येक साधक, धर्मात्मा को प्रतिक्षण कषायों को कम करते जाना चाहिए। आयु का कोई भरोसा नहीं है इसलिए आज एवं अभी आत्मकल्याण में प्रवृत्त हो जाना चाहिए। धन्य हैं, हमारे गुरूवर जो स्वयं कषायों को दिन-प्रतिदिन कृष् करते जा रहे हैं एवं हम सभी साधकों को भी यही उपदेश दे रहे हैं।
  39. 1 point
    भक्ष्य का अर्थ खाने योग्य और अभक्ष्य का अर्थ नहीं खाने योग्य। जो वस्तुएं विशेष जीव हिंसा में कारण हैं, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, प्रमाद वर्धक एवं बुद्धि विकार में कारण होती हैं, ऐसी वस्तुएं अभक्ष्य कहलाती हैं। अभक्ष्य पदार्थ भी मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं प्रथम तो जिनका सेवन करना, सर्वथा निषेध है, दूसरे वे, जो एक समय सीमा, परिस्थिती तक तो खाने योग्य होते है उसके बाद नहीं, वे अमर्यादित पदार्थ भी जीव हिंसा में कारण होने से त्यागने योग्य हैं। अभक्ष्य पदार्थ अनेक प्रकार के हैं। कुछ का वर्णन यहाँ करते हैं :- मद्य, मांस, मधु व नवनीत ये चार महाविकृतियाँ कही गई है अत: सर्वथा अभक्ष्य हैं। मद्य (मदिरा, शराब) - अनेक फल-फूलादि को सड़ाकर शराब बनाई जाती है। इसमें अनेकों जीव उत्पन्न हो जाते हैं, इसे पीने वाला व्यक्ति बुद्धि और विवेक खो देता है। एक दो बार इनका सेवन करने वाला व्यक्ति फिर इतना आदि हो जाता है कि उसके बिना उसका किसी कार्य में मन ही नहीं लगता, धीरे-धीरे दरिद्रता उसे घेर लेती है। नशे की हालत में मारना-पीटना, गाली बकना, गंदी नालियों में पड़े रहना, आदि दुष्कृत्य उसके द्वारा हो जाते हैं। ऐसे ही अन्य पदार्थ गाँजा, भांग, अफीम, चरस, तम्बाकू, बीड़ी-सिगरेट, पान-मसाले आदि जो कि स्पष्ट ही कैंसर, हृदय रोग आदि बड़े-बड़े रोगों के कारण है तथा और भी तरह-तरह के नशीले पदार्थ भी अभक्ष्य की ही श्रेणी में आते हैं। मांस - जीव/प्राणियों की हत्या करके ही मांस प्राप्त होता है अत: मांसभक्षण करने वाले को नियम रूप से हिंसा का पाप लगता है। स्वयं मरे हुए पशु के मांस में भी अनन्त निगोदिया जीव होते हैं, मांस को अग्नि से गर्म करने पर भी वह जीव रहित नहीं होता उसमें तजाति(उसी पशु की जाति वाले) निगोदिया जीव निरन्तर उत्पन्न होते रहते हैं अत: मांस खाने योग्य तो दूर, छूने योग्य भी नहीं है। मांस व अन्न दोनों प्राणियों के अंग होने से समान है ऐसा कहना योग्य नहीं है स्त्रीपने की अपेक्षा समानता होने पर जैसे माता और पत्नी एक नहीं है उसी प्रकार मांस के सेवन से जैसे नरकादि दुर्गति प्राप्त होती है। वैसे अन्न, वनस्पतियों के सेवन से नहीं। मधु (शहद) - मधुमक्खियों की उगाल है। मांस के समान ही शहद कभी भी निगोदिया जीवों से रहित नहीं होता है। कई बार शहद प्राप्ति के लिए छत्ते को तोड़ दिया जाता है जिसके सैकड़ों मक्खियाँ मर जाती हैं। तथा शहद में सैकड़ों त्रस जीवों की उत्पत्ति होती रहती है। एक बूंद शहद के सेवन से सात गाँव को जलाने से भी अधिक पाप लगता है। मधुत्याग के दोष से बचने हेतु फूलों का रस अथवा आसव, गुलकन्द तथा अन्य शहद युक्त खाद्य पदार्थों का त्याग करना चाहिए। नवनीत (मक्खन) - काम, मद (अभिमान, नशा) और हिंसा उत्पन्न करने वाला है। बहुत से उसी वर्ण, जाति के जीवों का उत्पत्ति स्थान भूत होने से नवनीत विवेकी जन के द्वारा खाने योग्य नहीं है। अन्तर्मुहूर्त पश्चात ही उसमें अनेक सूक्ष्म जीव उत्पन्न हो जाते है। जिस बर्तन में नवनीत पकाया जाता है वह बर्तन भी छोड़ने/ त्यागने योग्य हैं। नवनीत को निकालते ही तुरन्त गर्म कर लेने पर प्राप्त घी खाने योग्य हैं। पाँच उदम्बर फल - बड़, पीपल, ऊमर, पाकर, कलूमर के फल, त्रस जीवों की उत्पति स्थान ही है। अत: अभक्ष्य है। सूख जाने पर भी विशेष रागादि रूप भाव हिंसा का कारण होने से अभक्ष्य है। अनजान फल जिसका नाम, स्वाद आदि न पता हो वह भी अभक्ष्य है। द्विदल अभक्ष्य है - जिसके दो भाग हो ऐसे दाल आदि को दही में मिलाने पर, तथा (मुख में उत्पन्न) लार के संयोग से असंख्य त्रस जीव राशि पैदा हो जाती है। इसका सेवन करने से महान हिंसा व त्रस जीवों के भक्षण का दोष लगता है। अत: द्विदल अभक्ष्य है इसका सर्वथा त्याग करना चाहिए जैसे दही बड़ा, दही की बड़ी, दही पापड़ आदि। कच्चे दूध से बनी दही व छाछ तथा गुड़ मिला दही व छाछ भी अभक्ष्य हैं। चुना व संदिग्ध अन्न अभक्ष्य है - चुने हुए अन्न में अनेक त्रस जीव होते हैं यदि सावधान होकर नेत्रों के द्वारा शोधा भी जाए तो भी उसमें से सब त्रस जीवों का निकल जाना असम्भव है। अत: सैकड़ों बार शोधा हुआ भी घुना अन्न अभक्ष्य है। तथा जिस पदार्थ में त्रस जीवों के रहने का संदेह हो ऐसा अन्न भी त्यागने योग्य है। कंदमूल (गडन्त) अभक्ष्य है - कंद अर्थात् सूरण, मूली, गाजर, आलू, प्याज, लहसुन, गीली हल्दी आदि जमीन के भीतर पैदा होने वाली गड़न्त वस्तुएं साधारण वनस्पति, अनन्तकाय होने से अभक्ष्य है अन्य वनस्पतियों की अपेक्षा इनमें अधिक हिंसा होती है। अत: जीवदया पालने वालों को इनका सेवन नहीं करना चाहिए। पुष्प व पत्रादि अभक्ष्य हैं - जो बहुत जन्तुओं की उत्पति के आधार के हैं जिनमें नित्य त्रस जीव पाये जाते हैं, ऐसे केतली के फूल, द्रोण पुष्पादि सम्पूर्ण पदार्थों को जीवन पर्यन्त के लिए छोड़ देना चाहिए क्योंकि इनके खाने में फल थोड़ा और घात बहुत जीवों का होता है तथा पते वाले शाक में सूक्ष्म त्रस जीव अवश्य होते हैं उसमें कितने ही जीव तो दृष्टिगोचर हो जाते हैं और कितने ही दिखाई नहीं देते। किन्तु वे जीव उस पते वाले शाक का आश्रय कभी नहीं छोड़ते। अत: अपना आत्म कल्याण चाहने वाले जीव को पते वाले सब शाक तथा पान तक छोड़ देना चाहिए। जिनका रूप, रस, गन्ध व स्पर्शादि चलित हुआ, विकृत हुआ है, फफूंद लगा हो ऐसे त्रस व निगोद जीवों का स्थान, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थ भी अभक्ष्य कहे गये हैं। होटल में अमर्यादित एवं अशोधित आटे आदि से तथा अनछने पानी से बनी वस्तुएँ सर्वथा अभक्ष्य हैं। अमर्यादित अचार, मुरब्बा आदि त्रस जीवों से संसत होने से अभक्ष्य हैं। कुछ पदार्थ भक्ष्य होने पर भी अनिष्टकारक होने से अभक्ष्य माने जाते हैं जैसे बुखार वाले को घी एवं शीत प्रकृति वालों के लिए ठंडे फल आदि। जो सेवन करने योग्य न हो ऐसे लार, मूत्र, कफ आदि अनुपसेव्य पदार्थ भी अभक्ष्य हैं। अभक्ष्य बाईस भी माने गये हैं - ओला घोर बड़ा निशि भोजन, बहुबीजा बैंगन संधान । बड़, पीपर, ऊमर, कठऊमर, पाकर फल या होय अजान । कंदमूल माटी विष आमिष, मधु माखन अरू मदिरापान। फल अतितुच्छ तुषार चलित रस, ये बाईस अभक्ष्य बखान । दूध को दुहने के पश्चात् अड़तालीस (४८)मिनिट के भीतर ही भीतर गर्म कर लेना चाहिए अन्यथा वह भी अभक्ष्य की कोटि में आ जावेगा, क्योंकि दूध के दुहने के एक मुहुर्त पश्चात् तजाति निगोद जीव उत्पन्न हो जाते हैं। अत: दूध की मर्यादा का विशेष ख्याल रखना चाहिए। भक्ष्य पदार्थों की मर्यादा निम्र प्रकार से है दूध उबलने के बाद चौबीस घंटे तक मर्यादित माना जाता है। गर्म दूध का दही जमावे पर चौबीस घंटे तक मर्यादित माना जाता है। बिलौते समय पानी डालने पर बनी छाछ बारह घंटे तक मर्यादित मानी गई है। मीठे पदार्थ मिले दही की मर्यादा ४८ मिनट की है। पिसे नमक की मर्यादा अड़तालीस मिनट एवं गर्म कर पीसे गये नमक की मर्यादा चौबीस घंटे की हैं एवं मसालेदार नमक की छह घंटे की मर्यादा है। मौन वाले पकवान की मर्यादा चौबीस घंटे, रोटी, पूड़ी, हलवा, बड़ा, कचौड़ी की मर्यादा बारह घंटे एवं खिचड़ी, दाल, सब्जी की मर्यादा छह घंटे की है। आटा, बेसन एवं पिसे मसाले की शीतकाल में सात दिन, ग्रीष्म काल में पाँच दिन एवं वर्षाकाल में तीन दिन की मर्यादा जाननी चाहिए। घी, गुड़, तेल स्वाद बिगड़ने पर अभक्ष्य माना जाता है। ७. चौबीस घंटे के बाद का मुरब्बा, आचार, बड़ी पापड़ आदि खाने योग्य नहीं है।
  40. 1 point
    चातुर्मास में पयुर्षण-पर्व से पहले हम तीन साधुओं की मुनि-दीक्षा सम्पन्न हुई। एक अत्यन्त सादगीपूर्ण समारोह में हमें दीक्षा दी गई। हमने आचार्य महाराज के द्वारा दिलाई गई सभी प्रतिज्ञाएँ दुहराई। जीवन भर उनकी आज्ञा-पालन करने का नियम लिया। दीक्षा लेकर हम उनके पीछे-पीछे पर्वत पर स्थित पार्श्वनाथ जिनालय में पहुँचे। जैसे ही हमने उनके चरणों में माथा टेका, उन्होंने अत्यन्त हर्षित होकर हमें आशीष दिया और बड़े गम्भीर स्वरों में बोले कि-‘देखो, आज जिनेन्द्र भगवान् के दिगम्बर/निग्रन्थ-लिंग को तुमने अंगीकार किया है। अब इस जिनलिंग के साथ-साथ अपने अंतरंग परिणामों की सँभाल करना तुम्हारा परम कर्तव्य है। मैं तो निमित मात्र हूँ।” आचार्य महाराज का यह कर्तव्य-मुक्त व्यवहार देखकर हम क्षण भर को दंग रह गए। कर्तृत्वभाव से मुक्त होकर अपने कर्तव्य का पालन करना, यही अध्यात्म की कुंजी है। अध्यात्म पोथियों या परिभाषाओं तक सीमित नहीं है। आज भी आचार्य महाराज जैसे साधक अध्यात्म को अपने जीवन में प्रतिक्षण जीते हैं। नैनागिरि (१९८२)
  41. 1 point
    भविष्य के गर्त में क्या है? आज तक कोई समझा नहीं है। लेकिन कभी-कभी भविष्य के चिन्तन में कुछ न कुछ रहस्य अवश्य होता है। आचार्यश्री ने भी ऐसा नहीं सोचा। पर विचार जरूर बनाया। वह आचार में आया। उसका यह संस्मरण है जो आचार्यश्री के श्रीमुख से सुना था। 25 मार्च 2001 की प्रात:काल विहार करके बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में पहुँचना था। रास्ते में एक महाराज ने आचार्यश्री जी से पूछा- आचार्यश्रीजी आपने पहले बुंदेलखंड के बारे में न सुना था ना देखा था | फिर आपने क्या सोचा था की यहाँ इतना बड़ा संघ बनेगा। आचार्यश्री ने कहा- ऐसा तो सोचा नहीं था, लेकिन सब हो गया। बुंदेलखंड के विषय में हमने उस समय सुना जब मैं अजमेर में था। उस समय पं. जगनमोहनलालजी शास्त्री कटनी वाले आए थे। उन्होंने हमें कुंडलपुर (म.प्र.) में पंचकल्याणक महोत्सव में आने के लिए कहा था और बड़े बाबा के बारे में परिचय दिया था। पंडितजी वगैरह ने उस पंचकल्याणक महामहोत्सव में मुख्य अतिथि श्री भागचंदजी सोनी को बनाया था। वे उसके लिए अजमेर गए थे, उस समय उन्होंने हमें यहाँ (कुंडलपुर) के विषय में बताया था, हमने उस समय इस तरफ आने का विचार बनाया था। बस वह विचार क्रिया में परिणत हुआ और सन् 1976 में प्रथम चातुर्मास बुन्देलखण्ड में बड़े बाबा के श्रीचरणों में चातुर्मास हो गया। उसके बाद बड़े बाबा के चरणों में मन लीन हो गया और रम गया यहीं पर और बढ़ता गया संघ। आज सब जो है वह सामने है।
  42. 1 point
    हर समय मनुष्य अपने ज्ञान का सदुपयोग करे तो हमेशा लाभ ही लाभ होता है। वह कैसे? जैसे बचपन में अपने ज्ञान-चतुरता से बाल विद्याधर करते थे, कैसे करते थे। पूज्य गुरुदेव के मुख से सुना उनके बचपन का यह प्रसंग है | 14 जून 2000 रविवार, भाग्योदय तीर्थ सागर शाम का समय था। हम लोग आचार्यश्री की वैय्यावृत्ति कर रहे थे। तभी जनेऊ को लेकर चर्चा चल पढ़ी। तब आचार्यश्री ने अपने बचपन की चतुरता के बारे में बताया। दक्षिण भारत में परंपरा है कि आषाढ़ पूर्णिमा एवं भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी) को सभी नया जनेऊ पहनते हैं। बूढ़ा हो या बच्चा-आबाल-वृद्ध सभी जनेऊ धारण करते हैं। उस समय सामान्यत: जनेऊ बेचने वाले से भी एक पैसे में एक जनेऊ ले लेते थे। लेकिन हम तीन जनेऊ लेते थे। क्योंकि एक पैसे के तीन ही आते थे पर लोग अपनी जरूरत के हिसाब से एक पैसा देकर एक ही लेते थे। हम देखते कोई जनेऊ लेने जा रहा है। उससे पूछ उसे एक जनेऊ दे दिया और एक पैसा ले लेते थे। ऐसा करके एक बार में 2 पैसा अपने जेब में आ जाता था। हम लोगों ने पूछा - ऐसा कितनी बार करते थे। आचार्यश्री जी - हँसने लगे। ज्यादा नहीं करते बस एक-दो बार ही करते थे। हम लोगों ने कहा - यानि आप बचपन में बड़े होशियार थे। जनेऊ भी ले लिया और पैसा भी दूने आ गए। आचार्यश्री हँस दिए। यह तो बुद्धि का खेल है। जैसी लगा लो, बस पैसा कमा लो। पर प्रचलित कीमत से ज्यादा नहीं लेना चाहिये। वैसे ही मोक्षमार्ग में विशुद्धि का खेल है। जितनी विशुद्धि बढ़ाओगे, उतना ही हमारा मोक्षमार्ग प्रशस्त होगा और मोह का प्रभाव कम होगा। ज्ञानवान हर क्षण करे, अपना ज्ञान प्रयोग | बह्म लाभ के साथ हो, आत्मिक लाभ सुयोग ||
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    आज का द्रश्य बोहोत ही भाव विभोर था । जिस भी व्यक्ति ने वो क्षण देखा वे लोग अपने आंसू नहि रोक पाए । आहार लेते समय भी सभी महाराजों के आँखो से आंसू छलक रहे थे ।
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