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  1. संयम स्वर्ण महोत्सव

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  2. Vidyasagar.Guru

    Vidyasagar.Guru

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  3. Nandan Jain

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  4. Sìñgêr ÄńŞh Jåįñ

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    _*💦🥀नेमावर अपडेट🥀💦*_ _*✨गुरुवार,1 अगस्त 2019✨*_ _*गौवंश को किसी ट्रक वाले ने टक्कर लगा कर घायल कर दिया।* अहो सौभाग्य उस गौवंश का जो सिद्धोदय नेमावर जी के मंदिर जी के बाहर ही *आचार्य श्री विद्यासागर जी मुनिराज* द्वारा बहुत ही करुणा भाव से उसे *णमोकार मंत्र* सुनाया गया...हम सब ये दृश्य देखकर उपस्थित सभीजन *भाव विभोर* हो गये।_ VID-20190801-WA0065.mp4
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    आगे बतलाते हैं कि सभी पदार्थों के अवग्रह आदि चारों ज्ञान होते हैं या उसमें कुछ अन्तर है- व्यञ्जनस्यावग्रहः॥१८॥ अर्थ - व्यञ्जन अर्थात् अस्पष्ट शब्द वगैरह का केवल अवग्रह ही होता है, ईहा आदि नहीं होते। English - (There is only) apprehension of indistinct things. विशेषार्थ - स्पष्ट पदार्थ के अवग्रह को अर्थावग्रह कहते हैं और अस्पष्ट पदार्थ के अवग्रह को व्यञ्जनावग्रह कहते हैं। जैसे श्रोत्र इन्द्रिय में एक हल्की-सी आवाज का मामूली-सा भान होकर रह गया। उसके बाद फिर कुछ भी नहीं जान पड़ा कि क्या था ? ऐसी अवस्था में केवल व्यञ्जनावग्रह ही होकर रह जाता है। किन्तु यदि धीरे धीरे वह आवाज स्पष्ट हो जाती है, तो व्यञ्जनावग्रह के बाद अर्थावग्रह और फिर ईहा आदि ज्ञान भी होते हैं। अत: अस्पष्ट पदार्थ का केवल अवग्रह ज्ञान ही होता है। और स्पष्ट पदार्थ के चारों ज्ञान होते हैं।
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    11 जुलाई 2019 - मुनि श्री निकलंकसागर जी महाराज प्रवचन
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    आगे संसारी जीव के और भी भेद बतलाते हैं संसारिणस्त्रसस्थावराः ॥१२॥ अर्थ - संसारी जीव त्रस और स्थावर के भेद से दो प्रकार के हैं। जिसके त्रस नाम कर्म का उदय होता है, वह जीव त्रस कहलाता है और जिसके स्थावर नाम कर्म का उदय होता है, वह जीव स्थावर कहलाता है। English - The transmigrating souls are also divided into two kinds i.e. the mobile and the immobile beings. विशेषार्थ - कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि जो चलें फिरें, वे त्रस हैं। और जो एक ही स्थान पर ठहरे रहें, वे स्थावर हैं। किन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने से जो जीव गर्भ में हैं या अण्डे में हैं, वा चुपचाप पड़े सोते हैं अथवा मूर्छित पड़े हैं। वे त्रस नहीं कहे जा सकेंगे। तथा हवा, आग और पानी स्थावर हैं, किन्तु इनमें हलन चलन वगैरह देखा जाता है अतः वे त्रस कहे जायेंगे। इसलिए चलने और ठहरे रहने की अपेक्षा त्रस स्थावर पना नहीं है, किन्तु उस और स्थावर नामकर्म की अपेक्षा से ही है। इस सूत्र में भी उस शब्द को स्थावर पहले रखा है क्योंकि उस स्थावर से पूज्य है तथा अल्प अक्षरवाला भी है।
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    आगे बतलाते हैं कि ये बहु, बहुविध आदि किसके विशेषण हैं- अर्थस्य॥१७॥ अर्थ - ये बहु, बहुविध आदि पदार्थ के विशेषण हैं। English - (These are attributes) of substance (objects). अर्थात् बहु यानि बहुत से पदार्थ, बहुविध यानि बहुत तरह के पदार्थ । इस तरह बारहों भेद पदार्थ के विशेषण हैं ? शंका - इसके कहने की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि बहु, बहुविध तो पदार्थ ही हो सकता है, अन्य नहीं हो सकता, उसी के अवग्रह, ईहा आदि ज्ञान होते हैं। समाधान - आपकी शंका ठीक है; किन्तु मतावलम्बियों के मत का निराकरण करने के लिए ‘अर्थस्य सूत्र कहना पड़ा है। कुछ मतावलम्बी ऐसा मानते हैं कि इन्द्रियों का सम्बन्ध पदार्थ के साथ नहीं होता, किन्तु पदार्थ में रहने वाले रूप, रस आदि गुणों के साथ ही होता है। अतः इन्द्रियाँ गुणों को ही ग्रहण करती हैं, पदार्थ को नहीं। किन्तु ऐसा मानना ठीक नहीं है; क्योंकि वे लोग गुणों को अमूर्तिक मानते हैं और इन्द्रियों के साथ अमूर्तिक का सन्निकर्ष नहीं हो सकता। शंका - तो फिर लोक में ऐसा क्यों हो जाता है - मैंने रूप देखा, मैंने गंध सूँघी ? समाधान - इसका कारण यह है कि इन्द्रियों के साथ तो पदार्थ का ही सम्बन्ध होता है, किन्तु चूंकि रूप आदि गुण पदार्थ में ही रहते हैं, अतः ऐसा कह दिया जाता है। वास्तव में तो इन्द्रियाँ पदार्थ को ही जानती हैं।
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: Nandan Jain
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: Nandan Jain
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    प्राचीन रसोईशाला विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/anya-sankalan/praacheen-rasoeeshaala/
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: NandKumar
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: NandKumar
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    आपकी बाल्यावस्था अत्यंत रोचक एवं आश्चर्यकारी घटनाओं से भरी है। आप बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के धारी हैं। आपकी मातृभाषा कन्नड़ है। आपने कक्षा नवमी तक मराठी माध्यम से अध्ययन किया। इसके उपरांत आपका लौकिक बढ़ाई से मन उचट गया और आप अलौकिक आत्म तत्व की खोज में लग गये।चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी के प्रवचन सुनकर 9 वर्ष की बाल उम्र में आपके हृदय पर वैराग्य का बीज अंकुरित हो गया। 12 वर्ष की उम्र में आचार्य श्री देशभूषण जी के सान्निध्य में आपका मूंजी बंधन संस्कार हुआ। अपनी मित्र मंडली के साथ खेल-खेलते समय आपको मुनि श्री महाबल जी के दर्शन हुए। आपकी तीक्ष्ण प्रज्ञा से प्रभावित होकर उन्होंने आपको बाल्यावस्था में ही तत्वार्थ सूत्र और सहस्रनाम कण्ठस्थ करने की प्रेरणा दी। आपके पिता ने भी आपको घर में धार्मिक शिक्षण प्रदान किया। यौवन की दहलीज पर पग रखते ही (20 वर्ष की अवस्था में) जुलाई 1966 आपने सदा-सदा के लिए सदलगा त्याग दिया और राजस्थान प्रांत अंतर्गत जयपुर पहुंचकर आचार्य श्री देशमुख जी से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार कर लिया। 1967 में श्रवणबेलगोला में श्री बाहुबली भगवान के महामस्ताकाभिषेक के समय आप आचार्य संघ के साथ पदयात्रा करते हुए वहाँ पहुंचे और वहीं आपने आचार्य श्री देशभूषण जी से सप्तम प्रतिमा के व्रत ग्रहण किये।आपकी ज्ञान पिपासा ने आपको मुनि श्री ज्ञानसागर जी के पास पहुंचा दिया। आपको सुपात्र जानकर गुरूवर श्री ज्ञानसागर जी ने यह कहकर आपकी परीक्षा ली-विद्याधर जब नाम है तो विद्याधरों की तरह विद्या लेकर उड़ जाओगे, फिर मैं श्रम क्यों करूँ ? गुरू के यह वचन सुनकर आपने आजीवन वाहन का त्याग करके अपनी गुरूभक्ति एवं समर्पण का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया। जिस तरह एक शिल्पी किसी अनगढ़ पत्थर से व्यर्थ को हटाकर उसमें भगवान को तराशता है, उसी तरह आपके गुरू ने अत्यंत लगन एवं तत्परता से आपको तराशा। जब उन्हें प्रतीत हुआ कि यह प्रस्तर पूर्ण रूप से तराशा जा चुका है, तो उन्होंने इस प्रतिमा को जग के सम्मुख प्रस्तुत करने का विचार किया। आषाढ़ शुक्ल पंचमी 30 जून 1968 को अजमेर की पुण्यभूमि पर आचार्य गुरूवर श्री ज्ञानसागर जी ने आपको दिगम्बरी दीक्षा प्रदान की। आपकी उत्तम पात्रता एवं प्रखर प्रतिभा से प्रभावित होकर आपके गुरू ने आपको अपना गुरू बनाया। हाँ, 22 नवम्बर 1972 को नसीराबाद की पुण्यधारा पर आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने अपना आचार्य पद आपको सौंपकर आपका शिष्यत्व स्वीकार कर, आपके चरणों में अपनी सल्लेखना की भावना व्यक्त की। यह उनकी मृदुता और ऋजुता का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण था। ऐसा गुरूत्व और ऐसा शिष्यत्व इतिहास में दुर्लभ है। आपके दीक्षित होते ही आपके माता-पिता एवं भाई-बहिनों ने भी आपके मार्ग का अनुसरण किया। यह इस सदी की प्रथम घटना है। जहाँ एक ही परिवार के आठ सदस्यों में सात सदस्य, सात तत्वों का चिंतन करते हुए मोक्ष मार्ग पर आरूढ़ हो गए। माँ श्रीमंती ने आर्यिका व्रत ग्रहण कर आर्यिका श्री समयमति नाम पाया, तो पिता श्री मल्लप्पा जी मुनिव्रत अंगीकार कर 108 मुनि श्री मल्लिसागर नाम पाया। दोनों अनुज भ्राता मुनि श्री समयसागर जी एवं मुनि श्री योगसागर जी के नाम से वर्तमान में आचार्य संघ की शोभा बढ़ा रहे हैं। दोनों बहनें शांता एवं सुवर्णा आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत से अलंकृत होकर धर्म साधना मंे रत हैं। मात्र अनुज भ्राता महावीर अष्टगे ही उदासीन भाव से अपने गृहस्थ धर्म का पालन कर रहे हैं। आपके पवित्र कर कमलों से अभी तक 120 मुनि दीक्षा, 172 आर्यिका दीक्षा, 56 ऐलक दीक्षा, 64 क्षुल्लक दीक्षा एवं 3 क्षुल्लिका दीक्षा सम्पन्न हो चुकी है। वर्तमान में विराट संघ है। आपकी निर्दोष चर्या से प्रभावित होकर 1000 से अधिक युवा-युवतियाँ आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण करने वाले ये सभी भाई-बहिन उच्च शिक्षित एवं समृद्ध परिवार से हैं। तीर्थंकर प्रकृति के बंध के कारणभूत लोक कल्याण की भावना से अनुप्राणित होकर आपने अपने लोकोपकारी कार्यों हेतु अपनी प्रेरणा व आशीर्वाद प्रदान किया।जैसे जीवदया के क्षेत्र में सम्पूर्ण भारत वर्ष में संचालित गौ शालाएँ, चिकित्सा क्षेत्र में भाग्योदल चिकित्सा सागर, शिक्षा क्षेत्र में-प्रतिभा स्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ जबलपुर (म.प्र.) डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़) एवं रामटेक (महाराष्ट्र), शांतिधारा दुग्ध योजना बीना बारहा, पूरी मैत्री, हथकरघा आदि लोक कल्याणकारी संस्थाएँ आपके आशीर्वाद का ही सुफल है।
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