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  1. संयम स्वर्ण महोत्सव

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  2. Vidyasagar.Guru

    Vidyasagar.Guru

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  3. प्रवीण जैन

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  4. Nilam Ashish Jain

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Showing content with the highest reputation since 05/24/2019 in all areas

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    पूज्यगुरूदेव आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी एवं संघस्थ मुनिश्री मुनिश्री सौम्यसागर जी मुनिश्री दुर्लभसागर जी मुनिश्री विनम्रसागर जी मुनिश्री निष्पक्षसागर जी मुनिश्री निश्चलसागर जी मुनिश्री निरापदसागर जी मुनिश्री नीरागसागर जी मुनिश्री श्रमणसागर जी मुनिश्री संधानसागर जी के तिलवारा, जबलपुरमें हुए केश लोच | WhatsApp Video 2019-06-16 at 1.25.05 PM (1).mp4 WhatsApp Video 2019-06-16 at 1.25.05 PM (2).mp4 WhatsApp Video 2019-06-16 at 1.25.06 PM.mp4
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    जैन श्रावक की पहचान के तीन चिह्न कहे गये हैं। उसमें सर्वप्रथम प्रतिदिन देव दर्शन, दूसरा रात्रि भोजन त्याग और तीसरा छान कर पानी पीना है। रात्रि भोजन त्याग का अर्थ – सूर्य अस्त होने के पश्चात् चारों प्रकार के आहार (भोजन) का त्याग करना है। वे चार प्रकार के आहार- खाद्य - दाल, रोटी भात आदि। स्वाद - इलायची, लौंग, सौंफ आदि। लेय - रवड़ी, लपसी, दही आदि। पेय - जल, रस, दूध आदि। जो श्रावक रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग करता है उसे एक वर्ष में छह महीने के उपवास का फल मिलता है। दिन का बना भोजन रात में करने से अथवा रात में बना भोजन रात में करने से रात्रि भोजन का दोष तो लगता ही है किन्तु रात में बना भोजन दिन में करने से भी रात्रि भोजन का दोष लगता है। वैज्ञानिकों के अनुसार - सूर्य के प्रकाश में अल्ट्रावायलेट और इन्फ्रारेड नाम की अदृश्य किरणें होती हैं। इन किरणों के धरती पर पड़ते ही अनेक सूक्ष्म जीव यहाँ - वहाँ भाग जाते हैं अथवा उत्पन्न ही नहीं होते, किन्तु सूर्य अस्त होते ही वे कीटाणु बाहर निकल आते हैं, उत्पन्न हो जाते हैं। रात्रि में भोजन करने पर वे असंख्यात सूक्ष्म त्रस जीव जो भोजन में मिल गए थे मरण को प्राप्त हो जाते हैं अथवा पेट में पहुँचकर अनेक रोगों को जन्म देते हैं। चिकित्सा शास्त्रियों का अभिमत है कि कम से कम सोने से तीन घंटे पूर्व तक भोजन कर लेना चाहिए। रात्रि में भोजन करते समय यदि चींटी पेट में चले जाये तो बुद्धि नष्ट हो जाती है, जुआ से जलोदर रोग उत्पन्न हो जाता हैं, मक्खी से वमन हो जाता है, मकड़ी से कुष्ट रोग उत्पन्न हो जाता है तथा बाल गले में जाने से स्वर भंग एवं कंटक आदि से कण्ठ में (गले में)पीड़ा आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते है। अत: स्वास्थ्य की रक्षा हेतु भी रात्रि भोजन का त्याग अनिवार्य है। धार्मिक दृष्टिकोण - रात्रि में बल्व आदि का प्रकाश होने पर भी जीव हिंसा के दोष से बच नहीं सकते, बरसात के दिनों में साक्षात् देखने में आता है कि रात्रि में बल्व जलाते ही सैकड़ों कीट - पंतगे उत्पन्न हो जाते हैं, जो कि दिन में बल्व (लट्टू)जलाने पर उत्पन्न नहीं होते। सूक्ष्म जीव तो देखने में ही नहीं आते। तथा रात्रि के अंधकार में भोजन करने पर सैकड़ों जीवों का घात होना संभव हैं अत: धर्म, स्वास्थ्य तथा कुल परम्परा की रक्षा हेतु रात्रि भोजन का त्याग नियम से करना चाहिए। रात्रि भोजन से उत्पन्न पाप के फलस्वरूप जीव उल्लू, कौआ, विलाव, गृद्ध पक्षी, सूकर, गोह आदि अत्यन्त पाप रूप अवस्था दुर्गति को प्राप्त होता है तथा मनुष्य अत्यन्त विद्रुप शरीर वाला, विकलांग, अल्पायु वाला और रोगी होता है एवं भाग्य हीन, आदर हीन होता हुआ नीच कुलों में उत्पन्न होकर अनेक दु:खों को भोगता है। जल गालन - जल स्वयं जलकायिक एकेन्द्रिय जीव है एवं उस जल में अनेक त्रस जीव पाए जाते हैं। वे इतने सूक्ष्म होते हैं कि नग्न आँखों से दिखाई नहीं पड़ते। वैज्ञानिकों ने सूक्ष्मदर्शी यंत्रों की सहायता से देखकर एक बूंद जल में 36,450 जीव बताए हैं। जैन ग्रंथों के अनुसार उक्त जीवों की संख्या काफी अधिक (असंख्यात) है। ऐसा कहा जाता है कि एक जल की बूंद में इतने जीव पाए जाते हैं कि वे यदि कबूतर की तरह उड़े तो पूरे जम्बूद्वीप को व्याप्त कर लें। उक्त जीवों के बचाव के लिए पानी छानकर ही पीना चाहिए। जल को अत्यन्त गाढ़े (जिससे सूर्य का विम्ब न दिखे) वस्त्र को दुहरा करके छानना चाहिए। छन्ने की लंबाई, चौड़ाई से डेढ़ गुनी होनी चाहिए। छना हुआ जल एक मुहूर्त (४८ मिनट) तक, सामान्य गर्म जल छह (६) घंटे तक तथा पूर्णत: उबला जल चौबीस (२४) घंटे तक उपयोग करना चाहिए। इसके बाद उसमें त्रस जीवों की पुन: उत्पत्ति की संभावना रहने से उनकी हिंसा का दोष लगता हैं। छने हुए जल में लौंग, इलायची आदि पर्याप्त मात्रा में (जिससे पानी का स्वाद व रंग परिवर्तित हो जाए) डालने पर वह पानी प्रासुक हो जाता है एवं उसकी मर्यादा छह घंटे की मानी गई हैं।
  6. 1 point
    24 जून 2019 4 : 30 PM विश्व पूज्यनीय, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार तेंदुखेंडा से गाडरवाड़ा की ओर हुआ..!! ● रात्रि विश्राम- गुआरी 8 km ● कल की आहरचर्या- ककराघाट/नर्मदा नदी 8 km 23 जून 2019 4 : 10 PM राजमार्ग से हुआ विहार ⛳ आज रात्रि विश्राम:- गुटौरी 9 km कल की आहारचर्या - तेंदूखेड़ा (संभावित) 22 जून 2019 ● आज रात्रि विश्राम- कुम्हरोड़ा । ● कल की आहार चर्या- राजमार्ग चौराहा । कुम्हरोड़ा 🎷विशेष - पूज्यगुरुदेव की मंगल आगवानी करेगी आर्यिका माँ अनंतमति माताजी , आर्यिका माँ भावना मति माताजी , आर्यिका माँ अकम्पतिमति माताजी , आर्यिका माँ उपशांतमति माताजी ससंघ करेगी मंगल आगवानी🎷 *⛳मध्यप्रदेश विहार सूचना⛳* *🗓२१/०६/२०१९, शुक्रवार🗓* 👣➡⛳ *आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ* का आज सुबह विहार नहीं हुआ 🌳 आज आचार्यश्री ससंघ की *आहार चर्या मेरेगांव, जिला जबलपुर, मध्यप्रदेश* में हुई 👣➡⛳ *आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ* का आज आहार एवं सामयिक के बाद *मेरेगांव* से *🌳वर घटिया जंगल🌳* की ओर विहार हुआ (७ km) 🌌 आज आचार्यश्री ससंघ का *रात्रि विश्राम 🌳वर घटिया जंगल🌳 जिला नरसिंहपुर, मध्यप्रदेश* में *🎪अस्थाई तंबुओं में🎪* हो रहा है 🌳 कल *२२/०६/२०१९* को आचार्यश्री ससंघ की *आहार चर्या जंगल में स्थित सरसला वन ग्राम, जिला नरसिंहपुर, मध्यप्रदेश* में *🎪अस्थाई तंबुओं में🎪* होने की संभावना है (८ km) ➡👣⛳ 20 जून आहार चर्या - बेलखेड़ा ग्राम आज रात्रि विश्राम:- मेरे गाँव (संभावित) दिनांक - 19 जून 2019 रात्रि विश्राम सम्भावित - मनकेड़ी 5.1 किमी कल की आहार चर्या - बेलखेड़ा ग्राम में सम्भावित। दिनांक - 18 जून 2019 दिन - मंगलवार, अपरान्ह काल। परम् पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार सहजपुर से हुआ। रात्रि विश्राम- राजदीप पब्लिक स्कूल शहपुरा भिटौनी। सम्भावित आहारचर्या - लम्हेटा से 2 किमी आगे करैया ग्राम मे | ( दिनांक - 17-जून-2019 समय - दोपहर 04:30 बजे अभी अभी परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज ससंघ का तिलवारा घाट जबलपुर से हुआ विहार। प्रतिभास्थली दयोदय जबलपुर में आचार्य संघ का प्रवेश 21 मार्च को हुआ था, कुल 88 दिन का प्रवास यहाँ हुआ। आज सम्भावित रात्रि विश्राम - राजदीप स्कूल शहपुरा acharya shri vihar 2019-06-17 at 17.49.51.mp4 विहार .mp4
  7. 1 point
    श्रमण संस्कृति इस युग में भगवान आदिनाथ के द्वारा प्रथम तीर्थंकर के रूप में सर्वप्रथम प्रवाहित हुई। भगवान आदिनाथ चतुर्थकाल में हुए। जैन दर्शन के अनुसार यह काल 1 कोड़ा कोड़ी (असंख्यात वर्षों) का होता है। भगवान आदिनाथ की ध्यान की मुद्राएँ पद्मासन और कायोत्सर्ग के साथ आज भी विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं जैसे हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो में प्राप्त मोहरों पर अंकित हुई मिली श्रमण संस्कृति में दिगम्बर मुनि ज्ञान और ध्यान में ही पूरा जीवन व्यतीत करते हैं। ध्यान से ही कर्मों का क्षय होता है। आत्मिक गुणों की उपलब्धि होती है। जैन दर्शन में चार प्रकार के ध्यानों का वर्णन भगवान ऋषभदेव ने सर्वप्रथम किया। उसके बाद आने वाले 23 तीर्थकरों ने भी ध्यान से कर्मों का क्षय होता है यह उपदेश दिया। वर्तमान में चौबीसवें तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी का तीर्थ चल रहा है, जिसमें अनेक श्रमण मुनि, साधु, दिगंबर ऋषियों ने प्रयोग करके ध्यान से आत्मिक शांति प्राप्त की है। इस तरह ध्यान और योग की परम्परा सनातन है और श्रमण संस्कृति के द्वारा प्रवाहमान रही है। णमोकार महामंत्र ध्यान का आलम्बन रहा है, इसी णमोकार मंत्र से अनेक बीजाक्षरों की उत्पत्ति हुई है। ॐ, अर्हम् आदि बीजाक्षर इसी णमोकार मंत्र से निकले हैं। जिनके ध्यान करने की विधि और उसके फल, ध्यान के महान ग्रंथ ज्ञानार्णव में विस्तृत रूप से दी गई है। ॐ को प्रणव मंत्र माना जाता है और अर्हम् को मंत्रराज स्वीकार किया गया है। अर्हं मंत्र के बारे में ज्ञानार्णव में लिखा है। अकारादि हकारांतं रेफमध्यं सबिन्दुकम्। तदेव परमं तत्त्वं यो जानाति स तत्त्ववित्।। ज्ञानार्णव 35/25-1 अर्थ - जिसके आदि में अकार है, अंत में हकार है और मध्य बिंदु रेफ सहित है। वही उत्कृष्ट तत्त्व है। जो इस अर्हं को जानता है, वह तत्त्वज्ञ बन जाता है। इस अर्हम् के ध्यान से योगी अनेक ऋद्धियों को प्राप्त करता है। अनेक दैत्य, राक्षस, भूत-प्रेत स्वयं वश में हो जाते हैं। यह अर्हम् का ध्यान अतीन्द्रिय, अविनश्वर आत्म सुख प्राप्त कराता है। केवल ज्ञान, सम्पूर्ण ज्ञान, सर्वज्ञ की प्राप्ति इसी से होती है। इस तरह अर्हम् का इतिहास उतना ही प्राचीन है। जितना मानव जाति का इतिहास है। मुनि श्री 108 प्रणम्यसागर जी महाराज कहते है कि - णमोकार मंत्र का संक्षिप्त रूप अर्हम् है और अर्हम् का विस्तार णमोकार मंत्र है। पवित्र आत्माओं की विशिष्ट शक्तियाँ इस णमोकार मंत्र के अंदर समाहित हैं। जैसे घर्षण से आग उत्पन्न होती है, ऐसे ही मंत्र के ध्यान से एक आग उत्पन्न होती है, जिसमें हमारे सारे विकार, अहंकार, दुराचार, आक्रामक भावनाएँ, अराजक उद्देश्य, अश्लील मनोवृत्तियां (मानसिकताएँ), अशुभ विचार आदि सभी निष्क्रिय हो जाते हैं। स्वाभाविक शक्तियाँ प्रकट होने लग जाती हैं। यहीं से मनुष्य का विकास प्रारम्भ होता है। मनुष्य का यह विकास उसे देवत्व की ओर ले जाता है और आगे चलकर वही परम ब्रह्म ईश्वर की प्राप्ति कर लेता है एवं ईश्वर को अपने अंदर प्रकट कर लेता है। इस अर्हम् योग परम्परा को परम पूज्य मुनिराज 108 श्री प्रणम्य सागर जी ने पुनजीर्वित कर मानव सृष्टि को एक ऐसी नई राह दिखाई है, जो प्राणियों के जीवन को सुन्दर एवं स्वस्थ बना सके। अर्हम् योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है। अपितु ध्यान के साथ चित्त और आत्मा को स्थाई आध्यात्मिक प्रभाव (Deep Spiritual Impact) भी देता है। गुरूदेव श्री प्रणम्य सागर जी महाराज ने पंच नमस्कार मुद्रा का स्वरूप बताकर सभी प्राणियों को प्रतिदिन इन्हें जीवन में अपनाकर अपने जीवन को स्वस्थ एवं सुंदर बनाने का उपदेश दिया है। यह पंच नमस्कार मुद्राएं निम्न प्रकार है:- लाभ :- 1) आलस्य दूर होता है। 2) कमर एवं रीढ़ की हड्डी सम्बन्धी रोग दूर होते हैं। 3) कद बढ़ता है। 4) नई ऊर्जा का संचार होता है। 5) मोटापे में कमी आती है। लाभ :- 1) ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है। 2) हृदय सम्बन्धी रोगों में आराम। 3) श्वास सम्बन्धी बीमारी ठीक होती है। 4) लगातार अभ्यास से अपनी ऊर्जा को नाप सकते हैं। लाभ :- 1) एकाग्रता बढ़ती है। 2) स्मरण शक्ति बढ़ती है। 3) मानसिक तनाव में कमी आती है। 4) कंधे मजबूत होते हैं। लाभ:- 1) सर्वाईकल (गर्दन) के दर्द में आराम 2) फ्रोजन सोल्डर में आराम 3) कलाई के दर्द (कंधे के दर्द में आराम 4) ज्ञान की वृद्धि लाभ :- 1) विनम्रता का विकास 2) सकारात्मक सोच की वृद्धि 3) पेट-पीठ सम्बन्धी रोग में आराम 4) अनिद्रा में लाभ 5) डायबिटीज आदि रोगों में लाभ। पंच मुद्राएं पंच तत्वों का भी नियंत्रण करती हैं तथा तत्त्व की कमी को पूरा करती हैं। “वृक्ष बीज में छिपा हुआ है जागेगा अंतर्बल से नर में नारायण बैठा है प्रकटेगा चिंतन से”
  8. 1 point
    आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज के चरणो में मेरा कोटी कोटी नमननमोस्तु भगवन नमोस्तु गुरूदेव नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु*जैनम् जयतु शासनम्**वंदे विघा सागरम्* 
  9. 1 point
    रामटेक या कुण्डलपुर जहा के भक्तो का पुण्य प्रबल होगा वही के लोगो को मिलेगा गुरु जी का सानिध्य हम गुजरात मे रहते है तो चाहते है की गुरुवर एक बार फिर से गुजरात आये 🙏🙏🙏
  10. 1 point
    M to roj sab Kutch dekti hu pr Kutch Lik nahi pati bahut hi acha lagta h roj ka roj sab ghar bathkar mil Jata h kahi nahi jana padta hum dono roj pravachan sunte h y aapne itna acha kam kar diya bahut logo ko Lavh mil raha h Hum lo lagta h mumbai m ho guru ji ka chaturmas pr Kya mil payega ha Kundalpur m ho sakta h
  11. 1 point
    until
    विशेष प्रदर्शनी पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के दीक्षा शिक्षा गुरु पूज्य आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के साहित्य प्रबुद्ध प्रदर्शनी जयपुर समय - 3 से 7 जून 2019 सुबह 8 से शाम 5 बजे तक खुली रहेगी | स्थान - तिलवारा घाट जबलपुर, संत निवास, प्रतिभास्थली गौवशाला संपर्क - 9425155038, 9425656312, 9300603794 श्रीमद् आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज ससंघ के सानिध्य में आयुर्वेद कौशलम् (3 जून से 7 जून 2019) दयोदय तीर्थ, तिलवाराघाट,जबलपुर सोमवार 3 जून 2019 - गुरूणां गुरु, आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महामुनिराज के समाधि दिवस पर विशेष आयोजन - मध्यान्ह 3 बजे आचार्यश्री जी के विशेष प्रवचन मंगलवार 4 जून 2019 - प्रातः 6.00 बजे योग शिविर - स्वस्थ्य व्यक्ति की आरोग्यता एवं पंच इन्द्रिय क्रियात्मकता क्षमता बढ़ाने (योगाचार्य डॉ. अवनीश तिवाटी) प्रातः 8.45 - आचार्यश्री जी के [विशेष प्रवचन] बुधवार 5 जून 2019 - प्रातः 6.00 बजे :- पंचकर्म नस्य क्रिया (108 लोगो की पंचकर्म नस्य क्रिया एक साथ सम्पन्न होगी) प्रातः 8.45 बजे - आचार्यश्री जी के विशेष प्रवचन गुरुवार 6 जून 2019 - राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त आयुर्वेद के चिकित्सक राजवैद्य, चिकित्सा विशारद आचार्य श्री जी से परिचर्चा एवं संवाद कर जिज्ञासा समाधान प्राप्त करेगें। प्रातः 8.45 बजे - आचार्यश्री जी के विशेष प्रवचन शुक्रवार 7 जून 2019 - प्रात: 7.30 से 9.00 बजे एवं दोप. 2.00 से 5.00 बजे तक आयुर्वेद के विशेषज्ञों की संगोष्ठी एवं आचार्यश्री जी से विशेष मार्गदर्शन प्रातः 9.00 बजे - श्रुत पंचमी पर कार्यक्रम आचार्यश्री जी के प्रवचन आयुर्वेद का वरदान जनमानस को पुष्य नक्षत्र के विशेष योग पर पूर्णायु अमृत प्राशन का नि:शुल्क सेवन कराया जायेगा। बच्चों को विभिन्न रोगो की वैक्सीन की उपयोगी। प्रत्येक उम्र के पुरुष, महिलाओं को बलवर्द्धक, आरोग्यवर्द्धक। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाकर निरोगी जीवन के लिये वरदान। पूर्णायु आयुर्वेद चिकित्सालय एवं अनुसंधान विद्यापीठ श्री दिगम्बर जैन संरक्षिणी सभा प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ दयोदय तीर्थ तिलवाराघाट, जबलपुर सभी शिविरों में सम्मिलित होने पूर्व से ही रजिस्ट्रेशन अवश्य कराये।
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    मर्म जीवन का (भाग -1) : लेखक - मुनि प्रमाणसागर जी
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    सागर के सुरखी कस्बे में मंगलवार काे आचार्यश्री विद्यासागर महाराज ने धर्मसभा में कहा की यदि मन में छोड़ने के भाव हैं तो बिल्कुल भी विलंब नहीं करना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्र में आपके द्वारा छोड़ने के भाव जल्दी बन जाते हैं। शहरों में यह काम देर में होता है आचार्य श्री ने कहा दक्षिण में छोटे-छोटे बच्चों को झबला पहनाया जाता है। उसमें बटन नहीं होते, चैन नहीं होती, लेकिन एक धागा होता है। उस धागे को खींच दो और छोड़ दो तो वह टाइट हो जाता है या थोड़ा खुल जाता है। इससे बच्चों को दिक्कत नहीं होती है। यही हाल सुरखी में देख रहा हूं थोड़ा सा खींचा और दान देने के भाव आप लोगों के बढ़ गए। जब धार्मिक अनुष्ठान होता है तो निश्चित रूप से छोड़ने के भाव होते हैं ग्रामीण जन सीधे-साधे होते हैं। व्यापारी वस्तु तो देते हैं पर मुद्रा लेते हैं। संतोषी व्यक्ति आकुलता नहीं करता,जो आकुलता रखता है वह बिन मतलब के बंध का कारण बनता है। चितौरा से आचार्यश्री ससंघ पहंचे सुरखी चितौरा से आचार्य संघ का विहार मंगलवार काे सुबह 7 बजे हुआ। 12 किमी बिहार कर आचार्य संघ सुरखी पहुंचा। जहां आचार्य श्री का पूजन भक्ति भाव से हुअा। आचार्यश्री का प्रक्षालन सुरेंद्र,अरविंद,महेश,कमल पठा परिवार और सुरेंद्र जैन, संभव जैन चिताैरा परिवार ने किया। आचार्य श्री की आहार चर्या का सौभाग्य ब्रम्हचारी मयूर भैया, मुकेश बड़कुल, राकेश बड़कुल, मनोज जैन परिवार को प्राप्त हुआ। बड़कुल परिवार ने सर्वतोभद्र जिनालय भाग्योदय तीर्थ में एक बड़ी प्रतिमा विराजमान कराने की बात कही। अाचार्य श्री ने दोपहर बाद गौरझामर की ओर विहार किया। रात्रि विश्राम बरकोटी तिराहे पर हुआ। मंगलवार काे 9 मुनि महाराज और 58 आर्यिका माता जी की दीक्षा दिवस विभिन्न स्थानों पर मनाया गया। सुरखी में अरविंद बड़कुल की पुत्री रुपाली जैन ने आचार्यश्री के समक्ष आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया। 20 फरवरी को आचार्य संघ की गौरझामर मैं अगवानी आर्यिका विज्ञानमति माता ससंघ करेंगी। गौरझामर में नई गौशाला का उद्घाटन आचार्य संघ के सानिध्य में हाेने की संभावना है।
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: आचार्य विद्यासागर जी
    आचार्यश्री के मुखारविंद से सुनें मूकमाटी महाकाव्य के चयनित अंश भाग 2
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    कल्याणमन्दिर स्तोत्र (1971) ‘कल्याणमंदिर स्तोत्र' आचार्य कुमुदचन्द्र, अपरनाम श्री सिद्धसेन दिवाकर द्वारा विरचित है। इसका पद्यानुवाद आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने मदनगंज-किशनगढ़, अजमेर (राज.) में सन् १९७१ के वर्षायोग में किया। इस स्तोत्र को पार्श्वनाथ स्तोत्र भी कहते हैं। मूल स्तोत्र एवं अनुवाद दोनों ही वसन्ततिलका छन्द में निबद्ध हैं। इस कृति में उन कल्याणनिधि, उदार, अघनाशक तथा विश्वसार जिन-पद-नीरज को नमन किया गया है जो संसारवारिधि से स्व-पर का सन्तरण करने के लिए स्वयम् पोत स्वरूप हैं। जिस मद को ब्रह्मा और महेश भी नहीं जीत सके, उसे इन जिनेन्द्रों ने क्षण भर में जलाकर खाक कर दिया। यहाँ ऐसा जल है जो आग को पी जाता है। क्या वड़वाग्नि से जल नहीं पिया गया है? स्वामी! महान गरिमायुत आपको वे, संसारि जीव गह, धार स्व-वक्ष मेंऔ। कैसे सु आशु भवसागर पार होते; आश्चर्य! साधुजन की महिमा अचिन्त्य ॥१२॥
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    सुना है जब कंस करता है अत्याचार तब धरा पर आता है कोई कृष्ण बनकर, जब हिंसा का तांडव नृत्य हो रहा था तब भू पर आया कोई वीर बनकर, रावण के आतंक से मुक्ति दिलाने आये मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बनकर, जब संस्कृति पर हो रहा कुठाराघात तब दक्षिण से उत्तर में आये । गुरुवर विद्यासागर बनकर… कुंठित होती प्रतिभाओं को देकर अपना जादुई आशीर्वाद प्रतिभास्थली का रूप देकर जगाया जन-जन का सौभाग्य, किया संस्कारों का शंखनाद... जहाँ शिक्षिकाएँ हैं उच्च शिक्षा संपन्न बाल ब्रह्मचारिणी द्वारा होता अध्यापन, सर्वाङ्गीण होता यहाँ विकास देख जबलपुर, रामटेक, डोंगरगढ़ की प्रतिभास्थली आती है तक्षशिला और नालंदा की याद। प्राचीन गुरुकुलों की पवित्र जीवनशैली इन विद्यालयों में झलक रही... कन्याएँ पढ़ने को यहाँ ललक रहीं! अन्य दिल्ली इंदौर मढ़ियाजी वहाँ भी समुचित व्यवस्था है विद्यार्जन की, यह सब गुरु-कृपा का फल है। अन्यथा लोगों के विचारों में क्या बल है? मन में विचार मकड़ी के तंतु से भी अधिक हैं कोमल उसे टूटते देर नहीं लगती, फहराती पताका के समान हैं अस्थिर उसे दिशा बदलने में देर नहीं लगती बहते स्पंदन” की भाँति हैं तरल उसे गति बदलने में देर नहीं लगती समुद्र की लहरों के समान हैं चंचल उसे उसी के अंदर समाने में देर नहीं लगती। जानते हैं यह गुरूवर कि खाली दिमाग शैतान का घर ज्ञान से भरा दिमाग भगवान का घर। कोई न रहे बेरोजगार स्वाभिमानी बन पाये स्वरोजगार इस हेतु गाँधी का हथकरघा चलायें स्वाधीन अहिंसक पद्धति अपनायें। परापेक्षी पराधीन हो जीता है दीनहीन-सा । स्वावलंबी निजाधीन हो जीता है मालिक-सा । प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख घटक कृषि व हथकरघा थे, इसी से भारत था सोने की चिड़िया रोटी, कपड़ा और मकान मूलभूत थी आवश्यकता ये। रोटी पाते कृषि से कपड़ा हथकरघा से । मकान गाँव की माटी से, यों स्वदेशी वस्तुएँ अपनाते भारत का भाग्य चमकाते, भारतीय हथकरघा ब्रांड है। आज भी इसकी बहुत माँग है, किंतु भारत को इंडिया बनाने की चाह में पाश्चात्य विकृति के दुष्प्रभाव में अपने ही पैरों पर मारी कुल्हाड़ी जिससे तेजी से फैली भुखमरी बेरोजगारी... आज लोकतंत्र में पल रहा लोभतंत्र लोकतंत्र में दृष्टि होती चेतन की ओर किंतु लोभतंत्र में होती है अचेतन की ओर... वर्तमान प्रधानमंत्री का कहना है गुलामी से मुक्ति के लिए। हथकरघा एक सशक्त हथियार था। तो आज़ाद भारत में गरीबी से मुक्ति के लिए आज भी यह हथियार बन सकता है। आचार्य भगवंत की दूरदर्शिता ने आर्थिक सुरक्षा के साथ नैतिक हो उन्नति सं स्कृति, चारित्र व धर्म हो सुरक्षित यह विचार कर हथकरघा का दिया उपदेश, जाति, संप्रदाय से परे संत का पाकर संदेश कई ब्रह्मचारी गुरु भक्त बड़े-बड़े पदों का कर त्याग गाँव, नगर, घर-घर खुलवाने लगे हथकरघा। इस योजना में लाभ ही लाभ है। इससे आर्थिक सशक्तता घर-घर रोजगार की उपलब्धता झालधारा राष्ट्र निर्माण में सहभागिता कार्य-प्रणाली में स्वाधीनता आत्म-निर्भरता भारतीय संस्कृति की सुरक्षा, साथ ही कौशल का विकास आर्थिक गुलामी का विनाश हो जाता है स्वयमेव। धन्य हैं महासंत! जिन्हें अपनी-सी लगती समूची वसुधा भारत की धरा पर विहार करते गुरुवर... न जाने कब पहुँच जाते। अपने अंतर्जगत् में, वैसे बाहर का विहार-पथ तय किया जाता है चलकर, लेकिन आत्म विहार-पथ तय करते हैं उपयोग को स्थिर कर। बाह्य विहार में थकते हैं चरण, किंतु अंतर्विहार में सुख पाता है चेतन... यूँ अनुभव कर निजात्मा को निहारते हैं। जनमानस की सुषुप्त चेतना को जगाते हैं। कहते गुरूदेव-अरे प्राणियों! खानपान यदि करोगे दूषित तो मन कैसे होगा पवित्र? जैसा करोगे भोजन वैसा होगा भजन इसीलिए शुद्ध पद्धति से उत्पन्न हो छने जल से खाद्य-पेय का निर्माण हो। भारत स्वाधीन बने जिससे ‘पूरी मैत्री' नाम दिया इसे पूरे जीवों से मैत्री भाव हो । एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय तक किसी का न घात हो अहिंसा की बात हो निश्छल मन से अर्थ कमाये । बच्चों को शुद्ध शाकाहारी बनाये… क्योंकि अब तो बच्चों के बिस्कुट गोली में मिलावट जहाँ देखो वहाँ... खाद्य पदार्थों में मिलावट पानी से वाणी तक दूषित अन्न से मन तक दूषित, कहीं सुअर की चर्बी, । तो कहीं गाय की चर्बी, मांस भक्षी निर्दयी जीव नभ के सब जीव खा गये बच गया हवाईजहाज! जल के सब जीव कर गये भक्षण बच गया केवल जहाज! थल के सब चौपाए खा गये बच गई मात्र चारपाई। हाय! कैसी दुनिया में हिंसा की मची तबाही!! कुछ कहा नहीं जाता इन मूक जीवों का दर्द सहा नहीं जाता... फिर भी बैठे सब हाथ पर हाथ धरकर तभी गुरूवर आये धर्मदूत बनकर जिनकी हर श्वास में दया की आहट है। जिनकी हर धड़कन में करुणा का प्रवाह है। जिनकी हर सोच में सागर से अधिक गहनता परमाणु से अधिक सूक्ष्मता । इसीलिए मिल रही अब शुद्ध भोजन की सामग्री खुल गई है पूरी मैत्री। लक्ष्य है भोजन शुद्धि का आत्मा में विशुद्धि हो, उद्देश्य है भाग्योदय का प्रत्येक मानव निरोगी हो, इस हेतु गुरु आशीष से । ‘सागर' में हुआ भाग्य का उदय जनसंकुल से भक्ति-भरा पूँजा स्वर जयवंत हो गुरू करूणाम! पद प्रतिष्ठा पैसा परिवार इन सबसे थक हारकर इंसान पाना चाहता है शरण भगवान की भगवान हैं तो भक्त है। धार्मिक हैं तो धर्म है। संस्कार हैं तो संस्कृति है। सन्मति है तो सद्गति है। जिनसंस्कृति की हो चिर सुरक्षा यही है आचार्यश्री की भावना इस हेतु बुंदेलखंड का प्रधान । कुंडलपुर में हुआ विशाल मंदिर का निर्माण पाषाण से जो निर्मित है। बड़े बाबा की जहाँ अप्रतिम मूरत है। और भी अनेकों हैं जिनालय निर्माणाधीन हैं सहस्रकूट आदि चैत्यालय। अमरकंटक क्षेत्र सर्वोदय सुंदर छटा मनहर प्रकृतिमय ऋषभदेव का मंदिर उन्नत बारीक शिल्पकला को लखकर दर्शक का मन होता हर्षित जय-जय गुरुवर जन-जन वंदित, नेमावर सिद्धोदय भू पर त्रिकाल चौबीसी जिनगृह सुंदर त्यागी व्रतीजनों का आश्रम, चंद्रगिरि डोंगरगढ़ प्यारा- बनी विशाल पत्थर की प्रतिमा हैं जिनभवन त्रिकालचौबीसी सब निर्माणाधीन अभी भी, । रामटेक में मन रुक जाता जो भी जिनगृह दर्शन पाता... नगर नागपुर, सागर में भी भाग्योदय के प्रांगण में भी जबलपुर की मढ़ियाजी में जिला रायसेन सिलवानी बीना बारहा, कोनी, पाटन और अन्य भी कई जिनभवन... । गुरूदेव के आशीर्वाद से कुछ बने कुछ बन रहे हैं, इस तरह स्वयं शिवपथिक बन औरों को भी पथ दिखा रहे हैं। यदि गुरु को मार्ग दिखाने का राग नहीं आता । तो हमें राग-रहित तत्त्व कौन समझाता? अनुभूत हुआ ज्ञानधारा को... कि गुरु नाव नाविक गुरू, गुरु बिन तिरा न जाय। गुरु-कृपा से प्रभु मिले, गुरु बिन मुक्ति न पाय॥ जैसा गुरू को लखा, सो ही लिखा स्वर्ण-सम निरखते देखा चन्दा-सा दमकते देखा। सूरज-सम चमकते देखा सुमन-सा महकते देखा; क्योंकि स्व-पर कल्याण करते हुए भी पर का कर्तृत्व भोक्तृत्व भाव नहीं पर से एकत्व ममत्व राग नहीं, जो होता है सो होने दो ज्ञान को ज्ञाता रहने दो इसी सूत्र के बल पर- कर्तव्य करते हुए भी गुरूवर अन्य पर अधिकार नहीं रखते देह में रहते हुए भी देह से ममकार नहीं धरते पग-पग पर प्रसिद्धि पाते हुए भी पुण्य का अहंकार नहीं करते; क्योंकि अध्यात्म योगी यतिवर जानते हैं कि जो मुझे चाहिए वह सब मुझमें ही है, अनंतज्ञान किसी ग्रंथों में नहीं निज-ज्ञाता में ही है, अनंतदर्शन किसी दृश्य में नहीं स्वात्म-दृष्टा में ही है, अव्याबाध सुख पर के भोगों में नहीं शुद्ध चेतन के भोग में ही है, अनंतवीर्य देह की अस्थि में नहीं चिन्मय अस्ति शक्ति की व्यक्ति में ही है। जो जगत को जाने ज्यादा से ज्यादा भले ही मान ले दुनिया उसे ज्ञानी, किंतु जो जान ले केवल अपने को वही है सच्चा ज्ञानी। ऐसे आत्मज्ञानी, सद्ध्यानी आचार्य श्री जी महादानी, अपने शिवगामी चरणों से चरैवेति चरैवेति' शब्दों को कर रहे सार्थक... । उधर समय भी निःशब्द, अपनी चाल से चल रहा अनवरत… इधर ज्ञानधारा भी अविरल बहती गयी भू पर विद्यासिंधु की कहानी उकेरती गयी, तूफानी हवाओं ने कई बार धरा पर लिखे लेख को हटाना चाहा पर वह हटा न पायी, ज्ञान की टाँकी से टाँके अक्षरों को मिटा न पायी, संत के जीवन की कविता यह मात्र पढ़ने या जानने की ही नहीं वरन् स्वयं को पाने की प्रक्रिया भी है। निज को पाना कहें या स्व को जानना कहें, बात एक ही है। ज्ञानधारा की कविता महज़ रचना नहीं प्रमाण है उसके पास कि गुरू को हर-पल निहारा है उसने हर पल हर जगह से निरख सकती उन्हें हो गयी वह ऐसी मगन साक्षी भाव से समझ सकती उन्हें ऐसी धारा को सौ-सौ नमन्। धारा के स्वच्छ ज्ञान जल में झलकी संत की भावी परछाई यद्यपि संत हैं विरत, किंतु कभी प्रमत्त कभी अप्रमत्त कभी गुप्ति कभी समिति, कभी प्रभु रूप कभी चिद्रूप निरख कर यो संख्यात हज़ार बार परिवर्तन कर, पा रहे गुणस्थान अष्टम।। क्षपक श्रेणी का सोपान प्रथम अपूर्व-अपूर्व परिणामों का संवेदन कर । नवमें अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में जाकर निवृत्त हो कषाय और वेद से सूक्ष्मसाम्पराय में सूक्ष्म लोभ के उदय से मोह राजा जीवित रहता यहाँ तक, यह जानकर प्रथम शुक्लध्यान के बल पर सीधे पहुँचे क्षीणमोह गुणस्थान हार गया मोह रिपु बलवान, तभी द्वितीय शुक्लध्यान के प्रभाव से शेष तीन घाति कर्म का घात करके प्राप्त की अरहंत अवस्था, घातिया कर्म से मुक्त दशा अनंत चतुष्टय वान जयशील हो केवली भगवान। यों तीन लोक के स्वामी पूज रहे उन्हें पपीहे की भाँति दिव्य वचनामृत पी रहे ज्ञानधारा ने सब देखा परछाई में यह पूर्व में जो विद्याधर से हुए 'विद्यासागर यतिराज' । आज वे ही हो गये पूर्ण ज्ञानसागर मुनियों के नाथ देखकर अरहंत अवस्था परमानंद से लहरों के बहाने अर्घ्य चढ़ाकर प्रफुल्लित हो आयी।
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    सन् उन्नीस सौ छियानवें में गिरनार यात्रा के दरम्यान मांस-निर्यात रोकने का किया आंदोलन कहा गुरु नेसंविधान की डायरी में दया, करुणा, अनुकंपा प्रमुख हो, ‘जीओ और जीने दो' वीर का नारा सार्थक हो। यदि अर्द्धरात्रि में भी ज्ञात होगा मुझे, कि मांस निर्यात बंद हो गया भारत से, मौन खोलकर तभी बोलूंगा मैं जय... हर्ष भाव से ‘अहिंसा परमोधर्म' की । यों बोले आचार्य श्री विद्यासागरजी।
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    कहना है गुरू का कि जड़ के बिना वृक्ष नहीं दया के बिना धर्म नहीं, पशुओं पर करुणा करना मानव का धर्म है, दया, प्रेम, अनुकंपा रखना यह व्यवहारिक धर्म है। पापों की शुद्धि करने आचार्यों ने गौदान कहा फिर गायों की हत्या करना निश्चित महापाप माना, पशु-वध से आ रही । प्राकृतिक आपदाएँ। नष्ट हो रहीं नैतिक संपदाएँ, रक्षक ही भक्षक बना मालिक ही मारक बना भंडारी ही लूट रहा खजाना देख यह देश की दुर्दशा संत की रो पड़ी आतमा...
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    स्वातम को निरखते लखते गुरूवर आये लखनादौन विहार करके सर्दी का समय था वैय्यावृत्ति करने शिष्यगण खड़े थे शीत के कारण शरीर में काँटे उठ रहे थे, विराग भाव से बोले गुरुदेव चाहे कितना देह को खिलाओ-पिलाओ इसकी सुरक्षा करो, फूल-सा रखो फिर भी यह नहीं देता फूल देता है शूल ही शूल फूल भी इसके संपर्क में आ मुरझा ही जाते हैं आखिर इसकी क्यों सेवा करते हैं? सुनते ही भेदज्ञान की वार्ता शिष्यों का शीश गुरुपद में झुक गया। एक शाम चलते-चलते आचार्य श्री पधारे गैरतगंज ‘विद्यासागर' नाम के वाहनों की देख कतार एक अजैन भाई रह गया दंग पूछने लगा लोगों से कितने बड़े सेठ हैं ये इतनी सारी मोटर, कार और क्या-क्या है इनके पास? एक भक्त ने इशारा किया गुरु की ओर... देख निर्वसन श्रमण, हो गया विभोर समझ गया वह श्रद्धा से भक्त लिख देते गुरू का नाम वाहन पर और गुरू संयम वाहन ले जा रहे मोक्षनगर...।
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    बहती-बहती ज्ञानधारा कभी देखती नहीं पीछे मुड़कर, किंतु शेष रह जाती कुछ स्मृतियाँ उसके मानस पटल पर… एक आराधिका कर रही पद विहार अनायास चलते-चलते हो गई बीमार, संघस्थ सभी पहुँच गये गंतव्य तक रह गई एकाकी वह! गंतव्य था बहुत... दू...र... आराधिका थी मजबूर दिन ढल रहा था अंधेरा घिर रहा था साथ ही रुक गईं चार बहने संग में चल रहे दो श्रावक रूक गये वे कुछ दूरी पर जहाँ थी सड़क। प्रतिक्रमण संपन्न कर देव, गुरु-वंदन कर ज्यों ही सामायिक को हुई तत्पर चुपके से कहा किसी ने मन में “यह स्थान अनुकूल नहीं है किंतु अब कहीं जा नहीं सकते; क्योंकि रात घिर चुकी है। सोचकर यह सिद्धशिला पर विराजमान अनंत सिद्धों को वंदन कर त्रियोग से गुरु को नमन कर समर्पण भाव से सर्वस्व अर्पण कर स्मरण कर सबका, प्रत्येक दिशा में एक सौ आठ बार महामंत्र का भक्ति से जाप कर मंत्र से मजबूत दीवार बना की गुरु से प्रार्थना हे नवजीवन दाता! दीक्षा-प्रदाता इस सुनसान वन में मेरे शील की रक्षा करना यहाँ कोई नहीं मेरा सहायक आप मेरे हृदय में विराजमान रहना उपासिका ने मन-वचन-कायिक भावों से की छह घड़ी सामायिक, उस दिन था शनिवार अमावस्या का घना अंधकार ज्यों ही सामायिक के उपरांत पैरों को किया लंबायमान... त्यों ही कई लोगों के आने का हुआ आभास अचानक बिजली चमकी... प्रकाश में कई मानवाकृति झलकीं... लाल वस्त्र, मोटा-सा तन सबका एक-सा बदन अपने पैरों पर मानव छाया देख सिकुड़ लिए झट पैर। सभी ने देखा यह दृश्य... तभी कर्णपटल को चीरते से गूंजे शब्द मारो... मारो.... मारो... सुनते ही तत्काल उपासिका ने करके मन में सर्वस्व समर्पण कर जोड़ किया गुरु से निवेदन ग्रहण करती हूँ उत्तमार्थ सल्लेखना अब चाहे छिन्न-भिन्न हो जाये तन विकल्प नहीं मुझे किञ्चित् मैं हूँ मात्र चेतना, चारों बहनों ने डरकर पकड़ लिया साधिका को कसकर बचाओ... बचाओ... बचाओ... यूँ जब पुकारा... तभी आकाश से हुई मेघ गर्जना साथ ही विद्युत का हुआ उजाला देख उपासिका को गुरु-भक्ति में लीन सभी अचानक हो गये विलीन... आते वक्त आहट नहीं आई जाते वक्त पदचाप नहीं सुनी गुरु-कृपा का ही है यह जीवंत चमत्कार बार-बार कर रहे प्रयास करने को शस्त्र प्रहार, किंतु गुरु मंत्र के घेरे में बनी थी जो सशक्त दीवार! आश्चर्य यही रहा कि कर न सका उसमें शस्त्र प्रवेश वज्र से भी वह अधिक मजबूत थी; क्योंकि गुरु-कृपा की विशेष ऊर्जा थी तेरह मिनट की घटना थी यह ज्ञानधारा को कुछ पल विस्मित कर गई आखिर कौन थे वह? यह बात समझ नहीं आई, किंतु इस घटना में हुआ जो चमत्कार इसमें गुरु का ही था पूर्ण आशीर्वाद। संकटों की बरसात में भी सम्यक् चिंतन की धारा बहती रहती... स्वयं के प्रति कठोर औरों के प्रति मुलायम ऐसी गुरु की है जीवनशैली समझ में आया है यह! खड़ी रख नहीं सकते खाली बोरी को झुका सकते नहीं भरी बोरी को इसीलिए इतने भी मत होना दीन कि अपने पैरों पर खड़े न हो सकें, इतना भी मत करना मान कि गुरु के चरणों में झुक न सकें, फसल पाने जमीं चाहिए नरम गुरू-कृपा पाने व्यवहार चाहिए विनम्र जिसका हृदय है निष्कपट उसके निश्चित मिट जाते संकट। सार्थक हो रही पंक्तियाँ यह इस घटना से एक गुरु-भक्त पथिक शिखरजी वंदना को जा रहा था रेल से... पानी बरस रहा था जोर से... शांत मन से करने लगा गुरु-नाम का जाप निर्विघ्न रास्ता हो पार, तभी रेल में मच गई हलचल, जिस लंबे बाँध पर चल रही रेल टूट रहा वह पुल सभी अपने-अपने बचाव का सोच रहे साधन, किंतु भक्त, मन में आस्था ले कर रहा आराधन। निश्चिंत था उसका मन; क्योंकि गुरु-भक्ति में डूबा था चेतन देखते ही देखते गाड़ी पहुँच गई उस पार इधर पुल गिरने की आई आवाज़ सबके बच गये प्राण यह सब प्रभाव था गुरु नाम का! जो उपयोग रूपी गाड़ी को बचा लेते हैं विकार की खाई में गिरने से, भक्ति से भरे भक्त रूपी वाहन को बचा लेते हैं संसार-समंदर में गिरने से, तो फिर जड़ वाहन को गुरु का नाम बचा ले यदि बहती सरिता से इसमें अचरज ही क्या? कर्तव्य करते हुए जो कर्तृत्व नहीं रखते बाहर में रहकर भी अंतर में रमते; क्योंकि देह का राग प्रारंभ में लगता लुभावना लेकिन अंत है उसका डरावना.. इसीलिए देह राग से उपरत निराले संत हैं ये विरत! बात उन दिनों की है गुरूवर जब पेन्ड्रा में थे असाता ने दिखाया अपना रूप, किंतु निर्मोही साधक जानते थे। निजातम स्वरूप, लाल-लाल दाने उभर आये पैर पर वेदना थी भयंकर, चाकू से घाव को कुरेदने पर डाला जाये उसमें नमक पीड़ा होती जितनी या घाव में चुभाने पर सुई पीड़ा होती जितनी उससे भी कई गुना अधिक वेदना हवा के स्पर्श मात्र से होती... किंतु कभी आह नहीं भरी मुख से किसी से कुछ कहा नहीं वचन से, ज्ञात हुआ अनेकों वैद्य चिकित्सकों से रोग है यह भयंकर अग्निमाता कहते हिंदी में हरपिस कहते अंग्रेजी में देख तन की पीड़ा करुणा को भी आ गई करुणा, किंतु दारुणिक देह-वेदना में भी सत् की स्वात्म संवेदना में किञ्चित् भी कमी नहीं आई आत्म-आराधना में सम्यक् संयम की साधना में कहीं से अरुचि नहीं आई। रात-भर करवट बदलते रहे.. किंतु थे पूर्ण सजग हर बार परिमार्जन करते थे एक तो भयानक असाता का संकट दूसरी ओर चौमासा का समय था निकट, जो चल नहीं पा रहे पचास कदम वो कैसे चल पायेंगे पैंतीस मील, किंतु अमरकंटक की प्रकृति पुकार रही थी प्रकृति पुरुष को... हो गये परिचित जो अमर तत्त्व से फिर भला क्यों डरे वे क्षणभंगुर असाता के कंटक से? बुलाकर समीप शिष्य गणों को दिया आदेश कि- जो भी साधु हैं बीमार कर लें कच्चे रास्ते से शीघ्र विहार, ज्यों ही चले आचार्य भगवंत जोरों से हुआ जल वर्षण अनिल-सलिल का योग बढ़ा देता है यह रोग। एक तरफ मौसम की प्रतिकूलता दूसरी असाता से तीव्र वेदना, भक्त-नयन से बहने लगा झर-झर नीर प्रकृति के अंत से भी फूट रही पीर... पार कर पैंतीस मील जलवृष्टि के साथ ही आ पहुँचे गंतव्य तक। सैकड़ों बिच्छू एक साथ काटने पर होती है जो वेदना तन पर पीड़ा है ऐसी भयंकर... किंतु अपूर्व चमक है चेहरे पर देख संत की अस्वस्थ दशा धरा का कण-कण रो पड़ा... आचार्य श्री पहुंचे सीधे मंच पर कहा संचालक ने बहुत मुश्किल से आये गुरु यहाँ तक बोले गुरु महाराज “चल नहीं रहा था मैं चला रहे थे गुरू मुझे, ये पैर क्या चढ़ते इरादों ने चढ़ाया पहाड़ मुझे।” जलते-जलते अगरबत्ती छोटी होती जाती है, परंतु अंत तक सुगंध नहीं घटती है कष्टों की भरमार में भी संत की अनुभूति गहराती गयी आखिर असाता भी हरती गयी... और कुछ ही दिनों में गुरूदेव का तन स्वस्थ हो गया भक्तों का मन प्रशस्त हो गया।
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    कटनी की अस्वस्थ एक बच्ची की कुंडली देख दिल्ली के ज्योतिष ने बताया इसकी आयु ज्यादा नहीं अंतिम समय है आया, एक दिन माँ उसे ले गई श्री गुरूवर की शरण, शास्त्र की चौकी पर बँधी एक राखी देखते ही माँ के मन में आस एक जागी, खोलकर झट गुरु आशीष ले बाँध दी बेटी के गले में... पचास वर्ष की पुत्री उसकी जीवित है आज भी, ऐसे अलौकिक चमत्कार को भक्त आत्मा भूल सकती है कभी? विदिशा के जैन कुल का चिराग बीमारी थी उसे जान लेवा जिसका कोई नहीं दुनिया में इलाज खड़ा भी रह नहीं पाता था वह गुरू-दर्शन को लाये उसे जब करूणा उँडेलकर सस्नेह बोले गुरूवर ‘‘नित्य देव-दर्शन करना रात्रि भोजन कभी नहीं करना,” श्रद्धा से किया संकल्प छोटे से नियम से कुछ ही दिनों में हो गया कायाकल्प, बालक बिल्कुल ठीक हो गया सारा परिवार गुरु-भक्ति में खो गया। कैंसर से पीड़ित था नरसिंहपुर का एक श्रावक श्रद्धा से अभिभूत हो आया गुरुवर के निकट गुरू ने उसे ‘रात्रि जल’ का दिया त्याग उसने हाथ जोड़कर सविनय कहा- महाराज! “यदि ठीक हो गया मैं तो आजीवन ब्रह्मचर्य से रहूँगा।'' श्रद्धा से ग्रहीत व्रतों का कुछ ही दिनों में हुआ ऐसा असर भयानक रोग भी हो गया छूमंतर। आठ माह से मूर्छित थी बालिका... उसे लेकर आये बीना बारहा देखकर उसे करूणा से आचार्य श्री के हाथ उठे स्नेह से, पाते ही आशीर्वाद टूट गई तत्काल मूर्च्छा बोल पड़ी ‘नमोस्तु महाराज!’ दो नवम्बर का दिन था वह सारा परिवार झूमने लगा खुशी से गुरु-कृपा का प्रत्यक्ष चमत्कार है यह! जब-जब हुआ भक्त पर उपसर्ग सँभाला है गुरु ने, जब- जब भटका है भक्त पथ दर्शाया है गुरू ने, प्रभु के तो भक्त ही बन पाते शिष्य नहीं, किंतु गुरू के भक्त भी बन पाते। और शिष्य भी। तभी तो गुरु की महिमा गाते वेद-पुराण भी, बिना गुरु के अधोगामी हो गया बेचारा रावण भी, इसीलिए तो समूची प्रकृति गुण गाती है गुरू की...
  26. 1 point
    कर सकते जो स्वयं का स्वयं से मिलन प्रभु की आज्ञा का पालन . प्रकृति भी करती विनम्रता से ऐसे संतों की आज्ञा का पालन, बाह्य चमत्कार से परे चैतन्य चमत्कार में रमे स्वानुभवी आचार्यश्री भवसागर की लहरों से बचकर ही किनारे-किनारे सँभल-सँभलकर संयम से चले जा रहे थे... चले जा रहे थे… पवित्र हो यदि मन तो आसमान की ऊँचाई से भी अधिक उन्नत हो सकता है, मलिन हो यदि मन तो नरक लोक से भी और नीचे तक जा सकता है, मन का दुर्गुण है यह कि करता स्व का विस्मरण पर का रखता स्मरण तभी तो रहता मलीन तन में सदा तल्लीन, किंतु संत निरखते नहीं तन को न ही चंचल मन को वे तो निरखते हैं नित जिन भगवन् सम निज चेतन को। संसारी विकारों में जीता है संन्यासी विकारों को जीतता है, सज्जन डरता है दुष्कर्म करने से दुर्जन नहीं, भोगी डरता है साधना से योगी नहीं, कोयला डरता है अग्नि परीक्षा से हीरा नहीं, मृदु पाषाण डरता है छैनी के प्रहार से प्रतिमा का पत्थर नहीं, पाप से परे रहते संत निडर हो स्वात्म में रमते भावी मुक्तिकंत! गुरु के जाप से कट जाते तत्क्षण ही पाप गुरू-भक्ति से भक्त को हो जाता पूर्वाभास सँभल जाता वह आगत संकट से, कितना ही तीव्र पापोदय हो घबराता नहीं वह गुरू-कृपा के प्रभाव से बुंदेलखंड के एक नगर का किस्सा है यह गुरु नाम का नित्य जाप करता था वह घर में थी सुंदर तस्वीर गुरू की। दीप जलाकर भाव से नमन करता था वह, एक दिन करते-करते जाप अंदर से आयी आवाज़ इस कक्ष का सारा कीमती सामान रख आओ दूसरे स्थान उठकर अचिन्त्य ने किया वही काम शाम ढली रात घिर आयी... अचानक अर्द्ध रात्रि के समय धू-धू कर आग लग गयी। ज्यों ही खुली नींद पत्नी जया जोरों से चिल्लायी माँ जागो! जागो माँ! सब कुछ जल गया सब कुछ लुट गया बर्बाद हो गये हम! रोती हुई पत्नी ने कहा अजी जागो! अभी तक सो रहे हो तुम! रखे थे जहाँ स्वर्णाभूषण डेढ़ करोड़ रुपया व कागज महत्त्वपूर्ण सब जलकर हो गया खाक हमारी तो जिंदगी हो गई साफ, दिलासा देते हुए बोला अचिन्त्य चिंता क्यों करती हो जया रोती क्यों हो माँ? अपना सब कुछ है अपने पास अपनी श्रद्धा पर रखो विश्वास। गुरूभक्ति से पहले ही हो गया मुझे आभास इसीलिए तो शाम को ही मैंने कक्ष कर दिया था खाली गुरु की महिमा है निराली! अरे! वे तो कर्मों की आग में जलते चेतन को बचाने की रखते हैं सामर्थ्य तो फिर गुरूभक्ति से जड़ धन को बचा लिया इसमें क्या है आश्चर्य? जिनकी पूजा कर हो जाते स्वयं पूज्य जिनकी वंदना से हो जाते स्वयं वंद्य, ऐसे महिमावंत गुरु की भक्ति में ज्ञानधारा लीन हुई स्वयं उछलती हुई ज्ञान-बिंदुओं के बहाने कह गई संत की महिमा कि छोटे से बड़ा तो पागल भी हो जाता है गर्दभ, डाकू, श्वान भी दिन बीतने पर हो जाता है बड़ा, किंतु श्रेष्ठ होने का संबंध न काल से है, न कल से है न समय से है, न शरीर से है अपितु समय का सदुपयोग करता हुआ समय अर्थात् निजात्मा जान ले अपनी शक्ति को पहचान ले वही है महात्मा! भविष्य का भगवान आत्मा-परमात्मा। जिनकी कृपा-दृष्टि मात्र से गूंगे भी हो जाते वाचाल करुणाभरी नज़र पा करके निर्धन हो जाते मालामाल लंगड़े की बदल जाती है चाल, बाह्य जगत की क्या बात करें? अंतर्जगत् में पाकर स्वयं को हो जाता वह निहाल! प्रत्यक्षीकरण हुआ इस बात का मुक्तागिरी की घटना से जब श्रीफल चढ़ाकर दर्शन किया, मूक बालिका सुकन्या ने भाव से... कोशिश कर रही आचार्य श्री से कुछ बोलने की करुणाभरी दृष्टि पड़ी उस पर गुरू की। किया संकेत गुरु ने जाओ वंदना करो पहाड़ की चल पड़ी वह पर्वत की ओर... मन में अपार वेदना लिए “हे प्रभो! मैंने आखिर कौन से पाप किये? ‘नमोऽस्तु' तक बोल नहीं पाई भक्ति भी ना कर पाई नहीं बोलना चाहती जगत से बस बोल सकूँ एक बार जगतगुरु से यही प्रार्थना है प्रभु आपसे” यूँ उत्तम भावना से भरकर पर्वतराज से उतरकर ज्यों ही पहुँची गुरु-चरण में अश्रु छलक आये नयन से... पढ़ ली गुरू ने आँसुओं की कहानी स्नेह से उँडेल दिया आशीर्वाद का पानी अवरूद्ध कंठ से वचन हो गये प्रवाहित जैसे गिरि से फूट गया हो झरना कोई... अठारह वर्ष की उम्र में आज प्रथम बार हो गया अदभुत चमत्कार… बोल गई सुकन्या ‘‘न...नमोऽस्तु” “आचार्य विद्यासागर महाराज की जय करुणा के सागर विद्यासागर महाराज की जय अनंत उपकारी विद्यासागर महाराज की जय मुक्तागिरि सिद्धक्षेत्र की जय-जय-जय” सच ही है गुरूकृपा से मूक भी हो जाते मुखर वाचाल भी हो जाते मौन! जो अनेक भाषाविद् माने जाते विद्वत्-प्रवर वे भी पूछते गुरु से आखिर ‘मैं’ हूँ कौन? शरणागत पा जाते सम्यक् समाधान पुलकित होते पाकर गुरु से ज्ञान। अदभुत थे वह प्रत्यूषा के क्षण सत्य था वह नहीं था स्वप्न जब गुरु के निकट पहुँचा एक भक्त, ध्यान में थे गुरू लीन वातावरण था शांत निःशब्द अधर थे बंद पूरी तरह निस्पंद... फिर भी मंद स्वर में ओंकारनाद... कहाँ से आ रही यह आवाज़? देखा इधर-उधर पर कुछ समझ नहीं पाया दूर...दूर... तक थी खामोशी वह संत के अति निकट आया, ज्यों-ज्यों आता गया समीप ओम् ध्वनि का स्वर बढ़ता गया अधिक; क्योंकि यह अनहद नाद कहते हैं जिसे अजपा जाप कहीं और से नहीं था ध्वनित, चिन्मय में डूबे संत की धड़कनों से जीवंत ध्वनि हो रही गुंजित, ग्रंथों में पढ़ा था कभी भक्त ने संतों के हृदय से उठती है यह झंकार आज हुआ इसका साक्षात्कार! साधक को सहस्रारचक्र की गहराईयों तक ले जाता है यह प्रतिध्वनित ओंनाद… जो मोह से बच गये वो मोक्ष के निकट पहुँच गये, जैसे-जैसे समीप होता है मोक्ष तत्त्व क्षरण होते हैं दुष्कर्म भी जैसे-जैसे प्रगट होता है देवाधिदेवत्व शरण में आते हैं देव भी! प्रथम बार गुरुवर आये सिद्धक्षेत्र नैनागिरि... शाम को लौट जाते सब श्रावक जब अपने-अपने घर तब गुरु को लीन देख ध्यान में रात के गहन सन्नाटे में... छम-छम बजती घुंघरुओं की स्पष्ट आवाज़ गुरु के कक्ष तक जाती... सुनी शिष्यों ने अपने श्रवण से। जैसे अभिन्नदशपूर्वी का अभिवादन करते देवतागण फूले न समाते वैसे ही सुरगण यहाँ नृत्यगान करते, किंतु दृष्टिगोचर नहीं होते। समझ गये वे कोई और नहीं ये गुरुदेव के भक्त हैं ये! दिन में मनुष्य तो रात्रि में देव आते।
  27. 1 point
    प्रारंभ हो चुकी थी वर्षा अति निकट था चौमासा नेमावर से हो गया विहार... खातेगाँव तक आये ही थे गुरु महाराज कि काली घनी मेघ घटाएँ छा गईं बारिश की झड़ी लग गयी जहाँ देखो वहाँ पानी ही पानी! खुश था वहाँ का हर प्राणी अब गुरुवर यहाँ अवश्य रूकेंगे चौमासा नेमावर में ही करेंगे। सारी समाज ने श्रीफल चढ़ाए पुल पर है बहुत पानी निवेदन है- यहीं रुक जाएँ... कुछेक पल मूंद ली आँखें कर ली स्वयं से मुलाकात, बाल तुल्य निश्छल मुस्कान ले पिच्छी-कमण्डल ले हाथ चल दिये यतिनाथ… आये पुल तक ज्यों ही देख पुल पर अथाह पानी नीले-नीले विस्फारित नयनों ने निरखा नीलगगन को... प्रकृति को दिया संकेत बिना खोले अधर को, संत का संदेश पा प्रकृति झटपट वर्षा को समेटती गुरु की आज्ञाकारिणी शिष्या-सी देखते ही देखते बंद हुई वर्षा सभी शिष्यों का मन हरषा, तभी संत ने उठाकर नज़र देखा नीचे पुल की तरफ दृष्टि पड़ते ही हुआ गजब चमत्कार भक्तों ने देखा अपनी आँखों से पानी हौले-हौले हो गया पुल के नीचे... गूँज उठी शुरू की जय-जयकार' हो गया सानंद इंदौर की ओर विहार।
  28. 1 point
    सुरखी से विहार करते समय आ गये ग्रामवासी करने निवेदन भीषण गर्मी है भगवन्! विहार मत कीजिए गुरूराज कल का उपवास आज का पूरा अंतराय! ऊपर से धूप सघन नीचे धरती की तपन यही चाहते थे सभी शिष्य-गण, किंतु दृढ़ संकल्पी महाश्रमण ज्यों ही विहार करने हुए उद्यत शिष्यों ने कहा विनम्रता से विहार करना है तो कर लीजिए पर हमसे पगतली में कुछ लगवा लीजिए। खुले आसमान को देख कहने लगे गुरूदेव नीचे से लगाना चाहते हो या ऊपर से गिरवाना चाहते हो? कहते हुए देकर निश्छल मुस्कान ले पिच्छी-कमण्डल हुए गतिमान… दो किलोमीटर भी चले नहीं कि मंद-मंद हवाएँ चलने लगीं... पिघल गया मेघेन्द्र का हृदय लो! जल की बूंदें बरसने लगीं... कुछ ही देर में तपन शांत हुई धरा की, देवों ने भी प्रशंसा की गुरु तपस्या की शिष्य-मण्डली आश्चर्य चकित थी। गुरू को पूर्व से ही कैसे यह बात ज्ञात थी! जिनके शब्दों का ध्यान सुरगण भी रखते हैं। आशीष को तरसते हैं, इन्द्रियजयी, दृढ़ निश्चयी देख परिणति ज्ञानमयी प्रकृति भी कुछ कह गई काँच के टुकड़े मिलते हैं हर जगह ढूंढना पड़ता है हीरे को! मिल जाते हैं दुर्जन हर जगह ढूँढ़ना पड़ता है सज्जनों को! अशांत मन असंत दिख जाते सर्वत्र शांतमना संत के दर्शन हैं दुर्लभ! चुपके से हर-हर हवाओं के बहाने गुरू-चरणों को छू गयी प्रकृति...
  29. 1 point
    आध्यात्मिक संत पुरूष की प्रत्येक क्रिया लगती है। ऋषियों की चर्या-सी शब्दावलियाँ लगती हैं। अनहद नाद-सी विचारधारा लगती है मंद सुगंधित बहती मलयानिल-सी आशु कवि-सा मिलता है उत्तर गुरू से वह भी अक्षरशः सटीक, सज्जन ने प्रश्न पूछा आकर समीप मुझे किसी ने दिया है यंत्र कहा है उसने ‘रखना अपने घर’ अच्छे से सँभालकर, मैं कुछ जानता नहीं आपकी आज्ञा बिन कुछ करना चाहता नहीं गुरुवर! मुझे समझाइये अबोध पर कृपा कीजिये! सहज भाव से कहा गुरु ने “घबराओ मत! घर में यंत्र रखो या न रखो। महत्त्वपूर्ण नहीं इतना, किंतु निज घट में महामंत्र को अवश्य रखना।" संशयहरणी जन-जन कल्याणी करूणा पूरित गुरु-वाणी सज्जन ने उतार ली अपने हृदय में... जिनकी चर्चा औ चर्या में जीवन और जिह्वा में कथनी और करनी में अंतर नहीं किञ्चित्, तभी तो देवता स्वयं रक्षा करते इनके वचनों की सत्य घटना है यह बात नहीं है सपनों की।
  30. 1 point
    व्यस्त रहकर भी प्राणी मात्र का ध्यान रखते अपने में लीन रहकर भी भक्त की भावना समझ लेते हज़ारों के हाथ में जाकर भी दो हज़ार का नोट टिकाये रखता है अपना मूल्य, संतात्मा अनेकों को जानते हुए भी बनाये रखते हैं निज का बोध। एक सज्जन सोचकर गया घर से पूछूंगा पाँचों प्रश्न गुरुवर से पर, पूछ नहीं पाया डर के मारे... कमाल तो यह हुआ कि पूछे बिना ही कक्षा में समाधान मिल गये सारे... मान गया वह अंतःकरण की बात गुरू जान लेते सब। नौकरी पेशे वाला भक्त दिन हो गये अट्ठाईस हुआ नहीं आहार अभी तक पुत्र को देने जाना है परीक्षा दो दिन बाद क्यों नहीं पधारे गुरु महाराज ? बेटे को हो रही आकुलता पिता ने किया आश्वस्त... अश्रु न बहाओ मेरे लाल! दयालु गुरूवर पढ़ लेते मन के भाव अवश्य आयेंगे हमारे द्वार एक-एक पल लग रहा सागर-सा परिवार सारा जाप कर रहा गुरू-नाम का मन में विचार हैं टंकी में भरे जल के समान, वचन में आने वाले शब्द हैं नल के समान, और तन में प्रगट आचरण है जल से भरे बर्तन के समान। यदि मन से की है अर्चना आराध्य की आराधना तो फलीभूत होती है अवश्य। दूसरे ही दिन वेला थी पड़गाहन की प्रतीक्षा थी गुरु के आगमन की लो! “भाव ही भव का मूल है भाव ही भव का कूल है” पंक्तियाँ यह सार्थक होती-सी सारा परिवार खड़ा है पड़गाहने हृदय में विश्वास मन में है पूरी आस जैसे-जैसे चरण आगे बढ़ते गये अन्य लोग अपने भाग्य को कोसते रहे... ज्यों ही कदमों की गति हुई धीमी हर्षाश्रु से आँखें हुईं गीली भवों-भवों का अतिशय पुण्य आ गया उदय में चरण रुक गये आकर सामने... खुशी का पारावार न रहा; क्योंकि गुरु ने हृदय-पृष्ठ को पढ़ लिया अनकहे ही अंतर्भावों को संत ने सुन लिया। विधिपूर्वक आहार देकर अंत में गुरूवर का आशीष पाकर शांत छवि को हृदय में बसाकर कर दिया प्रयाण अपने नगर की ओर… वाहन से आ पाये कुछ ही दूरी पर कि सामने से गाड़ी से हो गई जोर से टक्कर... सभी के मुख से निकली एकसाथ “जय हो श्री विद्यासागर जी महाराज” तीन-चार पलटी खाकर गाड़ी रूक गई। जहाँ थी गहरी खाई भक्त डूबा था गुरू-भक्ति में अचानक गुरु ने दर्शन दिये उसे किरणे निकलती हुईं आशीष की मुद्रा में। अदभुत करिश्मा हुआ! किसी को खरोंच तक नहीं आई गुरु-नाम की शक्ति ने सबको बचा लिया, आहारदान के प्रभाव से सभी ने नवजीवन पाया, संकट टला तो सारा परिवार पुनः गुरू-दर्शन को आया।
  31. 1 point
    जगतवंद्य हैं ऐसे संत धन्य हैं ये भावी भगवंत जो अतीत के विकल्प से परे हैं वर्तमान के आनंद से भरे हैं, इसीलिए कुछ अनागत को जान लेते हैं यह घटना साक्षी है इस बात की जब श्रावक ने किया गुरूवर का पड़गाहन, ले गया कक्ष में की भक्ति से पूजन गुरु-चरण पा फूला न समाया, पर ज्यों ही सात मिनट में छोड़ अंजली कर लिया आहार संपन्न। उसका हृदय भर आया रोते-रोते गुरू-पद में सिर टेक बोल गया वह तनिक तन का भी ख्याल करिये... अपना नहीं तो हम भक्तों का ध्यान रखिये! श्रावक की बात सुनकर भी बिना बोले ही मुस्कान मात्र से संतुष्ट कर, चले आये मंदिर के द्वार साथ ही आ गया सारा परिवार... ज्यों ही निकल आये घर से छत गिर गई ऊपर से अचरज से देख रही सारी जनता यह कैसा है करिश्मा... भावी घटना को कैसे जान लिया? तरह-तरह की करने लगे बातें आश्चर्य से भर आयी सबकी आँखें… इसी श्रावक के यहाँ आहार को आये; क्योंकि मरण से बचाना था उन्हें, शीघ्र आहार कर आये इसीलिए कि स्वयं को अकालमरण से बचना था इन्हें धन्य है गुरु की विशुद्ध परिणति परिमार्जित प्रबुद्ध मति! दो तरह के विकल्प आते हैं लौकिक व्यक्ति में एक वह कि ऐसा सटीक लिखूँ कि लोग पढ़ने को मजबूर हो जाये, दूसरा यह कि ऐसा जीवन जीऊँ कि मुझ पर लिखने को लोग मजबूर हो जायें, किंतु अध्यात्मयोगी गुरूवर कहते हैं कि पढ़ने योग्य लिखा जाये इसकी अपेक्षा बेहतर है लिखने योग्य किया जाये।” वास्तव में दीपक को स्वयं के बारे में आवश्यकता नहीं पड़ती बोलने की, दीपक के विषय में बोल देता है प्रकाश स्वयं ही। संत को अपने बारे में आवश्यकता नहीं बोलने की उनका सदाचरण ही बोल देता है उनके बारे में। ज्ञानधारा के पास नहीं हैं कर्ण फिर भी सुना-अनसुना कर लेती है वह श्रवण, नहीं है उसके पास नयन फिर भी कर लेती है दरश, नहीं हैं उसके पास घ्राण फिर भी आ जाती है महक, नहीं है उसके पास रसन फिर भी कर लेती है रसास्वादन, नहीं है उसके पास परस फिर भी कर लेती है स्पर्शन, नहीं है उसके पास मन फिर भी रखती है वह स्मरण | स्मृतियाँ ताजी हो आयीं उसकी बात पुरानी है गिरनार के विहार की पद-विहार करते-करते दायें पैर के अँगूठे में। अचानक हो गई भयंकर पीड़ा... धरती से भी छू जाये तो हो असह्य वेदना फिर भी चलते रहे लगातार भीतर में चलती रही स्वसंवेदना… शिष्यों ने गुरु की पीड़ा जानकर अनेकों चिकित्सकों को बुलवाकर कराया उपचार, किंतु तनिक न मिली राहत परिश्रम व्यर्थ रहा निस्सार... तभी वहाँ दर्शनार्थ आये कहा एक भक्त ने “बड़ी कृपा होगी मुझ पर बस एक बार दें मुझे सेवा का अवसर इस दर्द को ठीक कर सकता हूँ मैं तकलीफ किञ्चित् भी नहीं होगी उन्हें निवेदन है आप विश्वास रखें मुझ पे।" देख उसके भावों की दृढ़ता भाषा की विनम्रता सौंप दिये चरण निश्चिंतता से प्रथमतः परोक्ष ही प्रणाम कर आज्ञा ली उसने अपने गुरु से, चरण को सीने से लगा दिया दोनों आँखों को मूंद लिया। लगे सब सोचने कि अब यह अँगूठे को खींचेगा कहीं दर्द तो नहीं बढ़ा देगा? लेकिन कुछ किया नहीं उसने श्रद्धा से सहलाया उसने आँखें खोल बोला वह दर्द रह गया क्या अब? सभी जन थे अति विस्मित चलकर देखा गुरुवर ने दर्द चला गया जड़ से चलने में वेदना नहीं किञ्चित्, घेर लिया लोगों ने उसे आखिर यह चमत्कार सीखा किससे? कुछ कहा नहीं उसने ज्यों ही ऊपर के वस्त्र उतार दिये बदन से, सबने पढ़ा अपनी आँखों से लिखा था उसके सीने पे “आचार्य विद्यासागरजी महाराज की जय” इन्हीं की कृपा से करता हूँ इलाज यही है मेरी चिकित्सा का राज़! हतप्रभ हुई शिष्य मण्डली एकसाथ फूटी स्वरावली, जिनका नाम खुदा है तुम्हारे सीने में वह यही हैं तुम्हारे सामने! सुनते ही वह लिपट गया गुरु के चरणों से... खोज रहा था जिन्हें वह वर्षों से, परोक्ष में ही सुनकर गुरु की वार्ता हो गई जिसे अपूर्व आस्था आज मिल गये वह गुरू-चरण... गुरु की कृपा ने ही गुरु को निरोग कर दिया, अपनी झोली में उसने सातिशय पुण्य भर लिया। सभी को श्रीराम का स्मरण हो आया नदी में बाँध हेतु पत्थर डालते राम तत्काल वह डूब जाता, शेष नल-नील आदि भक्तगण लेकर राम का नाम डालते पत्थर तो तैर जाता, राम-नाम से मंत्रित पत्थर भी तैरता है। राम के हाथ से छूटा पत्थर भी डूबता है। गुरु-नाम के स्पर्श से रोग भी भाग जाता है। सोया हुआ भाग्य भी जाग जाता है, ‘स विभवो मनुष्याणां यः परोपभोग्यः’ मानव का वही धन है सही जो अन्य के लिए हो उपयोगी।
  32. 1 point
    शाम ढले वैय्यावृत्ति करते-करते बोल गया एक शिष्य मेरी अंतिम श्वास तक इस जीवन की शाम न हो तब तक, गुरूदेव आपका प्रत्यक्ष बना रहे संयोग य ही है कर जोड़ आपसे अनुरोध… क्योंकि भूखे के लिए भोजन आवश्यक है। प्यासे के लिए जल आवश्यक है। रोग के लिए औषध आवश्यक है। तो सम्यक् मरण के लिए आप जैसे गुरु का समागम आवश्यक है... सुनते ही बात शिष्य की मुखरित हुए आचार्यश्री जब तक तुम्हें भासित होता रहेगा मेरा संयोग, तब तक मिल न पायेगा तुम्हें निज स्वभाव का सहयोग, इसीलिए अब करो कुछ ऐसा स्थिर कर त्रियोग हो समयोग, स्वभाव में संयोग का अभाव हो अनुभूत तभी गुरु का संयोग हो फलीभूत। कहकर घंटों डूबे रहे स्वयं में निज ज्ञानबाग में विचरण कर वैराग्य की फुहार पाकर स्वानुभूति-कोयल की कुहुक श्रवण कर निज में ही आनंदित रहते स्वातम में नित रमते... क्योंकि अपनों के घेरे में अंधेरा ही अंधेरा है... और अपने घर में उ जाला ही उजाला है। भगवंत-पथ पर चलते आध्यात्मिक रस चखते जानते वे अंतर्मना कि ‘परायत्तं परोक्षं स्वायत्तं प्रत्यक्ष पराधीन है परोक्ष स्वाधीन है प्रत्यक्ष, अक्ष का लक्ष्य है जब मेरा तब पर का पक्ष ले वर्द्धन नहीं करना जग-फेरा अक्ष अर्थात् आत्मा के प्रति प्रीत रहे मेरी यह स्वाधीन परिणति ही मीत है मेरी।
  33. 1 point
    नियमित दिनचर्या देख इनकी समझ में आता ‘मूलाचार' देख अध्यात्म-प्रवृत्ति इनकी दिख जाता ‘समयसार। आचरण में डूबा ज्ञान जिनका सहज होता रहता ध्यान जिनका, ज्ञान से सामने वालों को आकर्षित नहीं करना है जिन्हें बल्कि स्वयं के अज्ञान को प्रक्षालित करने का लक्ष्य है जिन्हें। स्मृति दिलाती है यह घटना जब मथुरा पहुँचे आचार्यश्री शाहदरा से आये तब लाला सुमतप्रसादजी बोले वह कर दी है मैंने आगे की सारी व्यवस्था, सुन लाला की बात कहा गुरु ने मंद मुस्कान के साथ मुझे पाना है सिद्धावस्था आवश्यक नहीं कोई व्यवस्था।'' तभी उठाकर पिच्छी कमण्डल पीछे-पीछे सारा शिष्य-मण्डल च ल दिये मथुरा से आगरा दिल्ली छूट गया भक्तों का मन से दिया।
  34. 1 point
    बहती सरिता को कोई रोक न पाता आसमान को आँचल में कौन बाँध पाता ! श्रावक मनाते निवेदन करते पलक पावड़े बिछा देते, पर गुरू-पद आगे बढ़ जाते रूआँसे श्रावक घर लौट आते... गोंदिया बालाघाट से पधारे घंसोर चमत्कार हो गया जनता हुई आत्म विभोर... वर्षों से खारे जल के नाम से बदनाम था कूप आज मिश्री-सम मिष्ट जल में हुआ परिवर्तन, हुआ जब आहार गृह में चरणोदक को डाला जो कूप में उधर मीठे जल के स्रोत फूट पड़े ज्ञात होते ही कूप की ओर लोग दौड़ पड़े... जिनके स्पर्श से प्राणी का क्षार हृदय भी हो जाता क्षीर-सा फिर भला पानी का क्षारपना क्यों न हो क्षीर-सा!! जबलपुर वासियों का अंतर्नाद करके श्रवण कहीं न रूके संत के चरण जिधर देखो उधर दुल्हन-सा लग रहा महानगर बच्चों में कौतुहल, श्रावकों में उत्साह नारियों की उत्सुकता का कहना ही क्या! ज्यों वीर के आगमन की चंदना देख रही राह... घर-घर में आबाल वृद्ध-गण। ‘ विद्यासागर'- ‘विद्यासागर' गा रहा कण-कण... चल पड़े चरण पिसनहारी मढ़िया की ओर… सभी जिनालय का करके दर्शन । आ विराजे गुरुकुल- भवन मढ़िया का समूचा परिसर भर गया सौभाग्यवती की गोद की तरह। चतुर्थकाल के दिखने लगे नज़ारे सैकड़ों की तादाद में लगे चौके ऐसा लगा मानो आश्विन की नयी सुहानी धूप में वैशाख की सन्नाटे-भरी तपती दोपहरी में उमड़ आये हों घटाटोप बादल-दल। गुरु वचनामृत सुन श्रोता धन्य! व्यवस्थापक स्वयं को मानते धन्य! नगर के नर-नारी सभी धन्य! प्रवचन में यथार्थ ज्ञान के भंडारी शांत भाव के अधिकारी गुरू-मुख से अध्यात्म बरसने लगा... चातक की भाँति टकटकी लगाये श्रद्धा से जो श्रवण करने आये उन श्रोताओं का मिथ्यात्व विनशने लगा। यथार्थ ही है। ज्ञानी स्वानुभव के समंदर में आनंदानुभूति-जल को पीकर होते तृप्त, अज्ञ संसार-समंदर में वैकारिक जल को पीकर होते हैं संतप्त। स्व तत्त्व की समझ से पर तत्त्व की परख से भव्यों का समकित सुमन विकसने लगा जीवन का सार दिखने लगा । भक्तों को यह ज्ञात हो गया कि आत्मनिधि-सी कोई निधि नहीं, गुरू समागम-सी कोई सन्निधि नहीं, अन्य निधि है पराधीन, आत्म निधि है स्वाधीन पराधीनेषु नास्ति शमसंपत्तिः'' दिखलाई गुरु ने जो निधि । मिलती इसी से स्वात्मोपलब्धि! इस प्रसंग में पंक्तियाँ उभर आईं ज्ञानधारा में गुरोरेव प्रसादेन लभ्यते ज्ञानलोचनः" इसी मढ़िया की सौंधी माटी पर गुरू की अनुभूति भरी लेखनी ज्ञान की स्याही में डूबकर आनंद पृष्ठों पर उकेर कर प्रगट हो आयी 'मूकमाटी' के रूप में। रात के गहन सन्नाटे में भाव-समुद्र लहराता। एकाकी अपने आप में मन गहन चिंतन में डूब जाता... प्रातः तरणि” के आने पर शब्दों के पहनाकर अंबर उतार लेते स्मृति को पृष्ठों पर... प्रत्येक दिन नव्य नूतन कविताएँ... लेखनी की नोंक पर क्रीड़ा करते शब्द भावों से भरी भाषा की विविध भंगिमाएँ पढ़ते ही मन होता तृप्त, माटी के मिष चेतना को मिल जाता बोध! मूक होकर भी है मुखरित महाकाव्य जगाता है अंतर्शोध आत्मोन्नति का कारण अनूठा काव्य है यह! जन-जन के लिए श्राव्य है यह। कर रहे थे जब पनागर से जबलपुर विहार भक्तों की भारी भीड़ में ‘आचार्य भगवंत' की दाहिनी कोहनी में लग गई तेजी से चोट तत्क्षण आ गई सूजन सारे भक्त गण हो गए बेचैन अपनी लापरवाही पर कर रहे पश्चाताप, किंतु निर्मम गुरुवर के मन में किञ्चित् भी नहीं ताप मुख से निकली नहीं 'आह'! देह-नेह के त्यागी चलते चले जा रहे थे सहजता से मढ़िया जी तक आ गये थे हाथ की ललाई देख लगा निश्चित ही हड्डी टूटी है ऐसी स्थिति में भी लेखनी ले मूकमाटी की लिखाई चल रही है... एक कवि लेखक से रहा न गया मंद स्वर में आखिर वह कह गया गुरूदेव! थोड़ा आराम दे दो हाथ को मुस्कुराते हुए बोले माना कि पर है यह गात भले ही साथ न दे यह हाथ, लेकिन चेतना है जब तक मेरे साथ। परम के विषय में लिखता रहूँगा निज के लिए लखता रहूंगा। तभी सामायिक के काल में एक अविवेकी भक्त ने हल्दी-चूना लगा, कर दी सिकाई सामायिक में लीन थे मुनिराई। बाद में देखा संघस्थ शिष्यों ने बड़े-बड़े फोले पड़ गये हाथ में, जल गई चमड़ी वेदना थी भारी पर आचार्य श्री के चेहरे पर एक भी सलवट नहीं आई धन्य हो! ऐसे निर्मोही संत!
  35. 1 point
    जिन दर्शन या धर्म प्रभावना निज दर्शन औ आत्म भावना लेकर यह उद्देश्य, आगे बढ़ते जा रहे शिवपथ पथिक दूर रहा उड़ीसा, छत्तीसगढ़ समीप। जब आता है बसंत । तो मुस्काती है प्रकृति जब आते हैं संत तो मुस्काती है संस्कृति यही स्थिति है यहाँ की… राजिम में स्वागतार्थ जनता हुई सम्मिलित । गूंज उठी अविराम जयघोष की ध्वनि ‘जय हो, जय हो विद्यासागरजी मुनि अमिट धर्म-प्रभावना कर रायपुर से दुर्ग होकर रूके कदम राजनांदगाँव, सेवार्थ रुके थे जो श्री मल्लिसागरजी के सरलमना पूज्य श्री योगसागरजी मुनि आ गये वे यहीं, पा गये पुनः गुरू पद-छाँव ‘युज' धातु से बनता है योग स्वभाव है उनका
  36. 1 point
    नैनागिर में चल रहा चौमासा अचानक तलहटी पर छा गया गहन सन्नाटा... आचार्य श्री हो गये अस्वस्थ जन-समूह पर्वत की ओर भागता दिखा ऊपर कोलाहल व्याप्त था। श्वास लेने में कष्ट हो रहा था... हृदय की धड़कनें हो रहीं अनियंत्रित बोले आचार्यवर्य मुझे लेकर समाधि, होना है समाधिस्थ। तभी गुरूभक्त कवि मिश्रीलाल जी ने कहा आप हैं श्रमण संस्कृति के सिरमौर मैं अल्पज्ञ हूँ क्षमा कीजिए मुझे समाधि का कारण एक भी नहीं दिख रहा बलजोर। कुछ तीव्र स्वर में बोले आचार्य श्री तुम मोही हो रागी । मैं जान रहा रोग को भलीभाँति अंत समय तक स्वात्म तत्त्व में लीन रह सकूँ इसीलिए चेतना पूर्वक लेना चाहता हूँ समाधि...।" सुन शब्दावली काँप उठी चेतना, किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई कवि की आत्मा कहीं मुख से कह न दें कि । लेता हूँ समाधि इसके पूर्व ही बटोरकर साहस सहसा बोले विनम्र हो “गुरुवर! आचार्यपद भी है परिग्रह इसे त्याग कर किसे देंगे आप? कौन है वह योग्य शिष्य आपका?'' सुनते ही यह चिंतन की बदल गई दिशा... तत्क्षण कंपित कंठ से किया अनुनय कवि ने पण्डित जगन्मोहनलालजी को बुलवाकर समीप में क्षुल्लक सन्मतिसागरजी से वार्ता कर पश्चात् करिये सल्लेखना स्वीकार… तीन-चार दिन में दोनों आये नैनागिरि सौभाग्य से तब तक स्वस्थ हुए आचार्य श्री भक्तों ने चैन की साँस ली बदलियाँ मँडरायी पर बरसी नहीं दीये की लौ कॅपी पर बुझी नहीं।
  37. 1 point
    अपलक नयनों से निरखते एक सज्जन ने कह दी आखिर अंतस की बात बहुत कुछ पूछने आते हैं समीप आपके, लेकिन दर्शन करते ही सहज समाधान पा जाते हैं। देखते ही आपको वचन शांत हो जाते हैं, निर्मोही यतिवर ने कहा ‘‘निजात्मदर्शन का बनाओ लक्ष्य जिससे कर्म ही शांत हो जाते हैं। '' देश के प्रख्यात विद्वान् कैलाशचंद्र शास्त्री की दृष्टि में नहीं था वर्तमान में कोई अनगार, पर आचार्यश्री के किये दरश ज्यों ही दूर हुई भ्रांति... लिखा उनने लेख कि मेरे मन में था यह भ्रम संप्रति में होता नहीं सच्चा श्रमण किंतु आचार्य श्री विद्यासागरजी के दर्शन से मेरे मन में हो गया परिवर्तन निष्परिग्रही आगम सम्मत सच्चे साधु को देख मेरा मस्तक हुआ नत। निमित्त मिल जाते अवश्य यदि उपादान है सशक्त, ऐसे ही विद्यासागर संत परिग्रह से रहित निर्लेप सुमेरू से अडिग अकंप हर वाक्य में जिनके झलकता वैदुष्य ऐ से यतिवर के दर्शन पा जीवन हुआ धन्य! अज्ञ को भय रहता है दुख का सदा विज्ञ को भय रहता है दोष का सदा, आचरण नित्य निर्दोष हो स्वातम में ही संतोष हो ऐसे संत सदा जयवंत हों!
  38. 1 point
    कि इधर... चलते-चलते कदम संत के पहुँच गये कटनी नगर अचानक उदित हुई असाता देह की बढ़ गई उष्णता... बिगड़ गया मलेरिया ज्वर से तपा देह सारा आहार को भी उठ न पाये घबरा गये भक्तगण, देह की बढ़ती जा रही जलन पर भीतर ही भीतर चल रहा ज्ञायक स्वरूप का आस्वादन... भेदज्ञान पूर्वक मंथन-मनन चिन्मय चेतना का चिंतन। स्वरूप का लक्ष्य होने पर रूप की ओर ध्यान जाता नहीं । विदेह पद का उद्देश्य होने पर देह से नेह रहता नहीं, अंतर्जगत् में विहार करने पर बाह्य जगत में उपयोग टिकता नहीं। एक तो चूने सीमेंट की नगरी कटनी। ऊपर से मच्छरों का प्रकोप! संत की देह काँपने लगी नाड़ी धीमी मंद पड़ने लगी इधर भक्तों की धड़कनें तीव्र होने लगीं। इस भाँति असाता दिखा रहा पराक्रम पूरा ज्वर की तीव्रता से देह होने लगा निष्क्रिय-सा, तभी अंतर्जागृति से बोले मंद स्वर में ध्यान से सुनो हे योगसागर! “आठ दिन तक मुझे कोई न पुकारे ‘आचार्य' कहकर..." अद्भुत थी काय की सु-दृढ़ता गुरू के मन की सरलता वचनों में सहजता, आत्मा में समता, तभी आचार्य श्री ने पण्डित जगन्मोहनलाल शास्त्री जी को लाने का कर दिया इशारा... सल्लेखना मरण की तैयारी में लग गया संत का चेतनात्मा। पूछा पण्डितजी ने- कैसे हो महाराज? सजग हूँ अंतर में स्वस्थ हूँ। देह काम नहीं कर रहा, पर विदेह का जानन-देखन कार्य चल रहा अनवरत।'' सुनते ही पण्डितजी रह गये अवाक् यह सामान्य संत नहीं हैं संत भावलिंगी। श्रावक गण जाप करते रहे रातभर णमोकार मंत्र का बोर्डिंग के प्रांगण में, ले लो समूचा पुण्य हमारा पर स्वस्थ कर दीजिए मेरे गुरु को यूँ भावों से करने लगे प्रभु से प्रार्थना… कोई मौन तो कोई मुखर रूप में अ श्रु बहाते हुए प्रभु की शरण में, आखिर भक्तों की भावना से। और संत की सत्य साधना से त पस्वी के तप से कर्म काँपने लगे ज ड़ कर्म ढीले पड़ने लगे...। कर्मों की तुच्छ तपन पर संत की साम्य भावना के जलाशय का प्रभाव पड़ा अद्भुत, ज्वर करने लगा पलायन जैसे विशल्या के समीप आते ही लक्ष्मण की मूच्र्छा दूर होने लगी वैसे ही निजानुभूति गाढ़ होते ही कर्म की उष्णता चूर होने लगी, भक्तों की व्याकुलता बदल गई निराकुलता में ढाई माह बीत गये यूँ असाता को करवट लेने में। मृत्यु को जीतने चले हैं जो मृत्यु की लघु सहेली असाता से पराजित कैसे हो सकते हैं वो! शिथिल शरीर से, किंतु दृढ़ मनोबल से संयमाचरण रूपी चरण से धरती नापते... राजस्थानी मखमली धरा छोड़ चल रहे बुंदेली टीलों पर नदी-नाले, समतल, पहाड़ तो कहीं बियावान जंगल, पठार पार करते युवा योगी आ पहुँचे कुण्डलपुर।
  39. 1 point
    चातुर्मास फिरोजाबाद का सभी के लिए था अविस्मरणीय, प्रासंगिक है प्रसंग वहाँ का चार माह उपरांत बिना सूचना के विहार कर लिया गुरुवर ने... दो मील दूर जाने पर पता लगते ही लोग आये दौड़े-दौड़े चरणों में गिरकर नगर सेठ बोले… आप श्री ने तो कहा था कल होगा प्रवचन ‘अतिथि पर, फिर बिना किये प्रवचन क्यों गमन कर गये गुरुवर? मंद मुस्कान ले बोले आचार्यश्री यही तो है अतिथि पर प्रवचन जिनके गमनागमन की तिथि का होता नहीं नियमन, बिना आमंत्रण आया था मैं बिना सूचना दिये जा रहा हूँ मैं, व्यक्ति वस्तु व वसतिका की आसक्ति कहलाती है मूर्च्छा निर्ग्रथों में रहती नहीं मूर्च्छा। सुन आगम की वाणी जन-जन हुए आह्लादित पथ में सारी प्रकृति हो आयी पुलकित प्रसन्न होने लगी पत्ती-पत्ती । दोलायमान होने लगी डाली-डाली टहनियाँ टुकुर-टुकुर देखने लगीं, बहती पुरवैया एक लय में गुरू का गुणगान करने लगीं झिलमिल करते जल के झरने जय-जयकार करने लगे... फूल महकने लगे फल विकसने लगे...। इस तरह भाँति-भाँति की प्रकृति अतिथि का करने लगी आतिथ्य, यतिवर फिरोजाबाद से फिर आगरा, मथुरा, ग्वालियर होते हुए आ पहुँचे सिद्धक्षेत्र सोनागिर, दर्शन कर चन्द्रप्रभ भगवान का अभिभूत हो स्मरण हुआ गुरु का। कहा था श्री गुरु ने संघ को बनाना गुरुकुल रहे दिगम्बरत्व की परम्परा अक्षुण्ण! सो अनंत व शांतिनाथ को प्रदान कर क्षुल्लक दीक्षा बना दिये योगसागर, समयसागरजी बदलते ही नाम बदल गये काम। इधर दो भाई दिसम्बर माह में विरक्त हुए घर से उधर बड़े भ्राता महावीर उसी माह में अनुरक्त हुए विवाह-बंधन में। सोनागिर क्षेत्र से हो प्रभावित बुंदेलखंड के क्षेत्र दर्शन को मन हुआ भावित।
  40. 1 point
    आत्मविहारी आचार्य श्री महावीर जी से कर विहार भरतपुर मथुरा आगरा से... चातुर्मास स्थापना में एक दिन था शेष पधारे फिरोजाबाद नित्य-प्रतिदिन प्रवचन होते विशेष... वहाँ के एक श्रावक प्रमुख ने संकलित कर प्रवचन किया प्रकाशन। एक दिन भीमसेन ब्रह्मचारी उदर-पीड़ा से कराहते कहने लगे मैं नहीं बनूंगा जीवित काश! आचार्य महाराज के दर्शन कर पाता अंतिम तो मिल जाता मनवांछित। गंभीर रूप से अस्वस्थता के सुन समाचार बिना प्रवचन किये लौट आये गुरु महाराज, देखते ही गुरू को हर्षित भीमसेन सल्लेखना की करने लगे याचना, तब आगमानुसार समझाने लगे “सुनो ब्रह्मचारी जी! मरण आने के पहले ही मर जाना कायरता है। और मरण समय उपस्थित होने पर भी आत्मा की अमरता पहचानना वीरों की वीरता है।'' कायर, नश्वर काय के संग जनमता-मरता बार-बार, वीर, अविनाशी आत्म वीर्य गुण-संग शाश्वत सुख पाता अपार... इसीलिए आदेश है मेरा "चिकित्सा करवाओ असाता कर्म से मत घबराओ अपने दुखों का दायित्व जड़ कर्मों पर मत डालो चिकित्सक ने आते ही देखकर कहा उलझ गई हैं पेट की आँतें शल्य चिकित्सा करने से भीमसेन हो गये खड़े।
  41. 1 point
    गर्भ में रखा जिसे नौ माह वह क्षेत्र की अपेक्षा दूर है बहुत, लेकिन मन से दूर कैसे हो सकता? रह-रहकर याद सताने लगी भूख जाती रही राते उनींदी बीतने लगीं। आखिर एक दिन बोली- स्वामी! पुत्र दर्शन बिन रहा नहीं जाता अब अधिक विरह सहा नहीं जाता आत्मीय निगाहों से निहार बोले मल्लप्पाजी अब नहीं वह पुत्र हमारा दीक्षा के पूर्व तक था विद्याधर हमारा... तुम्हें जाने से रोकता नहीं मैं, किंतु जा नहीं सकता अभी मैं..." हास्य-विनोद में कह गई वह कहीं श्रमण न बन जाओ क्या इसी भय से जाना नहीं चा... वाक्य पूर्ण होने से पूर्व ही कहने लगे मल्लप्पाजी गृहस्थ जीवन के दायित्व से करके पलायन आगम भी नहीं देता अनुमति दीक्षा की, ब दल जाए बाहर से भेष भले ही पर भीतरी भावना बदलती नहीं। दो पुत्रों में अभी प्रौढ़ता आयी नहीं दोनों पुत्रियों का भी है विकल्प, मुनि होने का मन में है विचार पर कर नहीं पाता संकल्प। इसी वार्तालाप में स्वामी से ले अनुमति आखिर श्रीमति और अनंतनाथ शांता, सुवर्णा को ले साथ चल पड़ी दर्शनार्थ… यात्रा के दौरान सोच रही शांता शांत मन से... यदि संख्या से निकाल दें। मूल एक का अंक तो गिर जाती है गणित की इमारत शून्य को निकालते ही ढह जाती है भूगोल की इमारत और अध्यात्म के हटाते ही बिखर जाती है आनंद की इमारत। मैं प्रवेश पाना चाहती हूँ। परमानंद के महल में, जड़ महल में होती चहल-पहल बहुत पर स्वातम का अनुभव कहाँ? परेशानियों का हल कहाँ? भोगों के भग्न भवन में दुखों का आसव रूकता कहाँ? अंतहीन अतृप्ति रूप-वासना में एक ही आत्म पदार्थ पर वास रहता कहाँ? अतः किसी से ऐसा राग करना नहीं कि वह न रहे तो मैं रह ना सँकू, और किसी से ऐसा द्वेष करना नहीं कि वह रहे तो मैं रह ना सँकू, यों शांत निःशब्द भावात्मक विरक्ति के दुर्गम पथ पर कल्पना से विचर रही थी... ‘सुवर्णा' भावों से भीगी कहे बिना कुछ भी वर्ण साथ दे अंतस् से बहन का साधना-पथ पर चाहती है अविराम चलना भावों की आहट को कोई सुन न ले इस शंका से रास्ते भर रही मौन।। किंतु साथ थे अनंतनाथ बचपन से ही मेधावी कार्य में कर्मठ योगी अकथ ही हृदय के समझ गये भाव बोले- व्रत लेने की भूल मत करना बहुत कठिन है संयम-पथ अपनाना। उल्लास उर्मियाँ उठ रही हैं। चित्त में नूतन अंगड़ाई है । दोनों के उमंगित हैं तन उल्लसित हैं कदम, पुलकित है मन। मनोरथ पर सवार देखा दोनों बहनों ने आ गया है अजमेर वहाँ से पहुँच कर सवाई माधोपुर अभिभूत हुए दर्शन कर, ब्रह्मचर्य व्रत लेने की भावना व्यक्त कर आशीर्वाद मिला ‘देखो आहारोपरांत प्रार्थना करने पर आजीवन व्रत ब्रह्मचर्य प्रदान किया ब्राह्मी, सुंदरी की परंपरा का निर्वाह किया। ज्ञात हुई जब यह बात बहुत रोये अनंतनाथ... यदि होता मुझे पता तो साथ में नहीं लाता, जब तक नहीं होती अध्यात्म की अनुभूति तब तक नियम-संयम लगते निरर्थक। इधर मल्लप्पाजी शांतिनाथ के साथ आ पहुँचे ‘सवाई माधोपुर दोनों पुत्रियों को देख श्वेत शाटिका में हुए चिंतातुर, पूछा आचार्यश्री से क्या आजीवन दिया है व्रत । या काल है नियत...?" यतिवर रहे मौन; क्योंकि जाना जा सकता है बिना बोले भी शब्दानुच्चारणेऽपि स्वस्यानुभवनमर्थवत्’ क्षेत्र महावीर जी में आये दर्शनार्थ अ नन्य भक्त कजौड़ीमल, तभी निर्देश दिया उन्हें पहुँचा दो दोनों ब्रह्मचारिणी को। ‘मुजफ्फरनगर' आचार्य धर्मसागरजी के संघ में। देख अपनी सुता को धवल परिधान में माँ का मन हो गया विरत, अनंतनाथ, शांतिनाथ लेने गये आज्ञा घर लौटने की तो वीतराग भाव से भरकर बोले मुनिश्री ‘पर घर का छोड़ो आकर्षण निज घर में करो पदार्पण! दुर्लभ मनुज जन्म रूपी रत्न को मत फेंको वासना के गहरे समंदर में जिस पथ का किया है अनुकरण मैंने चल पड़ो इसी अनंत शांति के पथ पे..." श्रुतिपुट में पड़ते ही सुमधुर शब्द खो गई मति स्मृति में। सुदू...र वर्षों पीछे कहते थे भैया विद्या “बैठकर णमोकार की कार में जाना है सिद्धों के दरबार में'' खेल-खेल में सिखाई जिन्होंने धर्म की वर्णमाला, प्रारंभ होती है जो दया से दया होती है भरपूर उन्हीं में, जो सिंहवृत्ति वाले होते साधु महानता के होते मेरू यही हैं हमारे आज से गुरू...। यूँ ठान मन में पूछ ली मन की बात, गुरूवर! वैराग्य होता है क्या? तत्काल दिया समाधान सधे शब्दों में राग-आग सम है तो वैर विकराल ज्वालामुखी-सा है द्वेष स्वरूपा, राग-द्वेष से रहित होने की साधना है वैराग्य। दृष्टि में विरक्ति है यदि आत्म रुचि है यदि तो मार्ग यह सरल है अत्यंत, दृष्टि में आसक्ति है यदि आत्म रुचि नहीं है यदि तो मार्ग यह जटिल है निश्चित। गहन भाषा कुछ उतरी भीतर कुछ तिरोहित हो गई बाहर, किंतु समझ में आ गई भावों की भाषा झट झुका दिया शीश एक चरण में अनंत तो दूसरे चरण में शांति। दर्शनीय था दृश्य मानो आदिप्रभु के चरणों में विराजित हों भरत, बाहुबली उन्नीस सौ पचहत्तर दो मई के दिन दोनों भ्राता ने ले लिया ब्रह्मचर्य व्रत संघ में ही रहकर हो गये साधना रत… इधर वैराग्य के वेग को रोक न पाये मल्लप्पाजी भी, सो श्रुतसागर आचार्य के संघ में रहकर करने लगे धर्म-साधना... कुछ ही समय में आचार्य धर्मसागरजी के संघ में सम्मिलित हो बन गये मुजफ्फरनगर में विशाल जनमेदिनी के मध्य ‘मल्लप्पा' से 'मुनि मल्लिसागरजी ‘श्रीमंति' से हो गई ‘आर्यिका समयमति' धन्य माता-पिता की मति!! चल पड़े जिन-पथ पर प्रशंसनीय है परिवार यह! घर में एक सदस्य को छोड़ साथ चल पड़े सत्पथ पर सप्तम परम स्थान को पाने, युग के आदि में आदिप्रभु के पूरे परिवार ने ग्रहण की थी ज्यों दीक्षा त्यों विलुप्त होती परम्परा को सं यम की संजीवनी बूटी दे पुनर्जीवित कर दिया।
  42. 1 point
    गुरु के गुण में डूबते गहराई से पहुँच जाते स्वयं तक और स्वयं की गहराई में डूबते तो बाहर आ जाते गुरु-तट तक, विद्या और ज्ञान में अंतर कहाँ रह गया था! जो ज्ञान था वह विद्या में प्रवेश कर चुका था, तभी तो जनता ने एक कंठ से कहा विद्यासागर भी यही हैं ज्ञानसागर भी यही हैं सिर्फ कुण्ड बदला है पानी तो वही है!! परिवर्तनशील है समय फिसलता जा रहा है रेत की भाँति वह मनुज अपने नाजुक कर से काल की सरकती प्रकृति को कहाँ थाम पाता, कितना पराधीन है वह? या यूँ कहें कि वास्तव में स्वाधीन ही है यह तभी तो परद्रव्य का मनाक्” भी कुछ कर नहीं सकता, जिसने संयम की श्वास दी उसे शिष्य भूल भी नहीं सकता। जिसने बनाया विद्याधर को विद्यासागर उन्हें कैसे बिसराया जा सकता? अतः शिष्य ने हृदय-पुस्तिका पर धड़कन की टाँकी से श्वासों का रूप दे उभार लिया, इस तरह गुरू-सा बन गुरु का ऋण उतार दिया। ज्ञानधारा ज्यों-ज्यों बढ़ती गई आगे त्यों-त्यों धरा पर उकेरती रही यादें उभरती गयीं अंतर की कुछ बातें और लिखती गयी... जब तक रवि-शशि गगन में, तब तक हो गुरू नाम। भावी भगवन् शिष्य-गुरू, द्वय को नम्र प्रणाम।" जब-जब पथिक गुजरते गुरू-शिष्य की कथा पढ़ते... अद्भुत संबंध की सराहना करते ज्ञानधारा के लिखे लेख से कुछ सीखते यूँ गुजर रहा था काल… कि सन् चौहत्तर सोनीजी की नसिया में हो रहे चौमासे में निज श्रामण्य के अनुभव से जो लखा सो लिखा रचा ‘श्रमण शतकम् प्रथम संस्कृत रचना के रूप में विमोचन के समय प्रकाण्ड विद्वान् जगन्मोहनलाल जी शास्त्री ने किया अवलोकन कृति का जब समझ न पाये शब्दार्थ तब ज्ञानी आचार्य विद्यासागरजी कृत पढ़कर हिन्दी अनुवाद ज्ञात हुआ अर्थ, बोले वे “संस्कृत पढ़ते पढ़ाते हो गए मुझे पचास वर्ष फिर भी समझ नहीं पाया मैं अज्ञ!" ‘कन्नड़ भाषी' होकर भी कितनी परिष्कृत है इनकी संस्कृत! नूतन आचार्य धनी हैं। विलक्षण प्रतिभा के, अनूठे संगम हैं ज्ञान व साधना के, स्वनाम धन्य, विद्वत् मान्य प्रबुद्ध चिंतक हैं निज शुद्ध आतमा के। मैं श्रेष्ठ हूँ यह सिद्ध करने अज्ञ करता साधना मैं सिद्धसम हूँ यह अनुभवने विज्ञ करते आत्म-आराधना। नहीं है चाहत चित्त में स्वयं को सच्चा मुनि सिद्ध करने की चाहत है चेतन में एकमात्र । सिद्धिवधू वरने की, सो पहुँच गये ‘श्मशान घाट' ‘छतरी योजना' नाम से प्रसिद्ध है जो। एकांत में निर्मोही संत ने किया केशकुंचन सहज हुआ क्लेश का विमोचन लगा आसन बैठ गये ध्यान में... जलती है धू-धू जहाँ देह की चिता... जलने लगी वहीं विकारों की चिता, चेतन में लीन होने लगा मन धाराप्रवाह पवित्र ऊर्जा का होने लगा आगमन पूर्वदिशा में सम्मेदशिखर से पश्चिम में गिरनार से उत्तर में विदेहक्षेत्र से द क्षिण में गोम्मटेश्वर से नैऋत्य से मूलभूत नायक ज्ञायक तत्त्व रूप निज को निज में थिर करने वाली, वायव्य से प्रभावित हुई वायु पाप धूल को उड़ाने वाली, ईशान से देवाधिदेव के देवत्व की विकारों को शांत करने वाली, आग्नेय कोण से पराकर्षण को निस्तेज कर तप तेज को बढ़ाने वाली, ऊर्ध्व से अनंत सिद्धों की पवित्र ऊर्जा का वर्षण संकल्प-विकल्प का गमन अधो से मूलाधार की शक्ति प्रदाता यों दसों दिशा से बहती ऊर्जा… ज्यों-ज्यों दिखने लगे निज दोष त्यों-त्यों बढ़ने लगा गुणकोष अनेक प्रतिकूलताओं में भी दिखने लगा भव का कूल आत्मिक सुख का मूल। जितना-जितना उपयोग गहराया उतना-उतना आत्मानंद उछल आया, ज्ञान ने ज्ञान को जाना अहा! अपूर्व था वह क्षण दृष्टि ने निज दृष्टा को पहचाना परमार्थ स्वरूप की ओर दृष्टि होते ही मिट जाती है सर्व निमित्ताधीन वृत्ति शुद्धात्म धरा पर ज्ञान वृष्टि होती है। दिख जाती है अनंत गुण संपत्ति!! निजात्म तत्त्व की कमनीयता निहारते-निहारते बीत गये एक दो नहीं पूरे छत्तीस घंटे मानो आचार्य के छत्तीस गुणों को पार कर जाना चाहते हैं शिवधाम को, लेकिन निश्चय के उपरांत आना पड़ता है व्यवहार में, संत अभी संसार में हैं। पर संसार नहीं रखते स्वयं में धन्य है आपका श्रामण्य। यूँ कहने लगा धरा का कण-कण जन-जन का अंतर्मन...
  43. 1 point
    सीकर जिला ग्राम ‘राणोली पिता चतुर्भुज, मात घृतवरी द्वितीय पुत्र होकर भी थे अद्वितीय अधर के नीचे तिल, कल था कमनीय रंग गोरा होने से लोग कहते भूरामल परम स्वाभिमानी परिणामों से निर्मल, दूर करने को कर्ममल । चल पड़े निष्क्रमण पथ की ओर पाने भव-सिंधु का छोर ऐसे हैं गुरु ज्ञानसागर तो शिष्य क्यों न हो विद्यासागर!! जिनका ज्ञानोपयोग निजात्मा का करता है स्पर्शन फिर भला क्यों न हो सविद्या का वर्षण! जितने-जितने स्वानुभव के समंदर में डूबते चले गये, उतने-उतने ज्ञानार्णव की गहराई में विद्या-मोती मिलते गये। आगम के अभ्यास से मात्र स्वयं के दोष दिखते हैं ऐसा नहीं मिटते भी हैं, मात्र सुकृत बँधते हैं ऐसा नहीं संवरित होकर दुष्कर्म झरते भी हैं। फिर प्रबल स्वात्म रूचि लगन निज प्रतीति स तत ज्ञानाभ्यास गुरु की महत् कृपा हो साथ तो कहना ही क्या... लोहे के चने चबाने जैसे न्यायशास्त्र भी लगने लगे मिष्ट मोदक सम, ‘प्रमेयरत्नमाला' प्रमेयकमलमार्तण्ड अष्टशती अष्टसहस्री को भी मिष्टसहस्री मानकर हृदय-पुस्तिका पर उतार लिया सहज प्रतिभा-संपन्न तीक्ष्ण बुद्धि शिष्य लख गुरू हुए अति प्रसन्न... कारण स्पष्ट है जहाँ इष्ट है वहाँ कष्ट नहीं जिससे संतुष्ट हैं उससे रुष्ट नहीं तो शिष्य मुनि भी ज्ञान को पुष्ट करते गुरु को संतुष्ट रखते। दर्शन के गूढ़तम रहस्य जानने में सक्षम प्रश्न करते गुरु तो समाधान करते शिष्य पढ़े अध्यात्म ग्रंथ 'समयसार 'नियमसार’ और ‘पावन प्रवचनसार ‘अष्टपाड़', 'पंचास्तिकाय' रत्नत्रयधारी ने पंचरत्न ग्रंथ का सम्यक् निग्रंथपन का किया आस्वादन, सूक्ष्मता से चउ अनुयोग का किया अध्ययन। जीत लिया मन ज्ञानी गुरू का मीत बन गया शिष्य गुरु का अनंत प्रीत का गीत गूंजने लगा आनंद का झरना फूटने लगा, गुरू-आज्ञानुसार चलने वाला। पात्र बनता है पुरस्कार का गुरू को अपने अनुसार चलाने वाला पात्र बनता है भव-भव तिरस्कार का। जब शिष्य स्वयं पंचमहाव्रतधारी हैं। चारित्र की प्रतिमूर्ति अहिंसा के पुजारी हैं, अपने-परायों के भेद से परे सर्व जीवों से आत्मीय भाव धरें, जीवन है निश्छल तेरे-मेरे के भाव से दूर प्रतिपल तब असत्य होना या असत्य बोलना लेश मात्र भी रहा कहाँ इनमें!! संयोग-वियोग के भाव से परे निजात्मा ही अपना है। शेष सब सपना ही सपना है, यह मान लिया जिनने अचौर्य भाव प्रगट हो गया जिनमें वस्तु और व्यक्ति के प्रति निर्मोही मिट्टी, हवा, पानी के सिवा । बिना दिये न लेते एक तिनका भी स्वानुभूति रमणी में करते रमण शील-झील में तैर... करते आनंद का अनुभवन। भाता जिन्हें निज चैतन्य का भोग लक्ष्य है जिनका निष्काम योग वे भला भ्रम में क्यों पड़ेंगे... ब्र ह्म में लीन क्यों न रहेंगे? किञ्चित् भी मूर्च्छा नहीं जिन्हें चिंतित वे क्यों रहेंगे? मूर्छित नहीं पर वस्तु में परिग्रह का आग्रह नहीं जिनमें, नौ ग्रह क्यों करें परेशान उन्हें! गृह ही तज दिया जिनने... नूतन चिन्मय गृह में प्रवेश पा लिया है जिनने, अपने आप में परिपूर्ण हैं। ज्ञान घन से सघन अन्य का प्रवेश अणुमात्र भी नहीं जिनमें। धन्य हैं शिष्य मुनिव्रत गुणधारी यह सब गुरू-कृपा की है बलिहारी शिष्य है इतना महान तो गुरु की महानता का कहना ही क्या! शिष्य ही है अति गुण-धाम तो दाता गुरु के गुणों का कहना ही क्या!! दिन के प्रकाश में मुक्ति की आस ले देख चार हाथ जमीं प्रत्येक कदम पर सर्व जीवों पर आत्मीयता अति यही है इनकी ईर्या समिति'। हित-मित-प्रिय वचन स्वयं पर पूर्ण अनुशासन अमृतपायी अमर भी करते हैं जन्म-मरण, मगर श्रवण कर इनके अमृत वचन मिटा देते भविजन संसार का परिभ्रमण, गूढ़ रहस्य के उद्घाटक अनेकों उलझे प्रश्न सुनकर इनकी वचनावली सुलझते झट ऐसी है इनकी ‘भाषा समिति'। निराहार स्वरूप की लगन ले अनासक्ति से निर्दोष आहार ले नीरस में भी स्वानुभूति का रस घोल सरस बना लेते मोक्षनगर तक जाने के लिए तप वृद्धि कर देह टिकाने के लिए ‘एषणा समिति' से करते आहार। उपकरणों को उठाने में करते प्रथम अवलोकन फिर करते परिमार्जन ‘आदाननिक्षेपण समिति पालन करते यूं… मलमूत्र आदि का प्रासुक निर्जन्तुक स्थान पर करते विसर्जन, पीड़ा न हो किसी जीव को प्राणी मात्र के प्रति है प्रीति इसीलिए पालते ‘प्रतिष्ठापन समिति'।
  44. 1 point
    लक्ष्य का निर्धारण करो या न करो उद्देश्य को वरो या न वरो पुरुषार्थ साध्य हैं। सर्व उपलब्धियाँ। मनन कर यों... अहर्निश बीत रहे गुरु सन्निधि में पुण्य भाव रूप परिणति में लो! अब तो एक माह ही पूरा होने को है, मगर अब सब कुछ खोने को है, सदलगा जाने का दिन आ गया नयन भीगे से सबके अब बरसने को हैं...। प्रस्थान होने पर भी मुड़-मुड़ कर देखते नयन उन्हें, जो देखते तक नहीं, बहुत कुछ कहना चाहते हैं वचन उनसे, जो कुछ कहते तक नहीं। | यही तो विशेषता है मन की जो बोलता नहीं उससे बोलना चाहता है जो मिलता नहीं उसे ही पाना चाहता है। जो पाता है वह भाता नहीं जो भाता है वह पाता नहीं। तभी तो सुख साता नहीं।' सुनी थीं ये पंक्तियाँ इन्हीं गुरू-मुख से सो परिवार को स्मृति हो आयी जाते-जाते कदम उठ नहीं रहे पैरों की गति बोझिल हो आयी। परिवार आया, गया लेकिन संत का मन सहज रहा अब गम नहीं रहा क्योंकि अवगम हो गया!
  45. 1 point
    तेजपुंज पुण्यधर श्री विद्यासागरजी को देख प्रकृति चुप न रह सकी। अपनी प्रसन्नता का संवरण न कर सकी। पुण्यानुसार आनंदवृष्टि करने लगी, श्रावक श्रमण का कर रहे पड़गाहन तो नूतन मुनिवर कर रहे अंतर में सिद्धों का पड़गाहन। श्रावक स्वगृह ले जा रहे मुनिवर सिद्धों को निजगृह ला रहे त्रय शुद्धि बोलकर उच्चासन दे। पद प्रक्षालन कर, की पूजन, मुनि ने भी त्रियोग से विशुद्धि धरकर सिद्धों को बिठाया हृदयासन पर, रत्नत्रय जल से क्षालन कर स्वातम का ज्ञानोदक लगा निजात्म प्रदेश पर भाव रूप द्रव्यों से की पूजन। ज्ञान दर्शनोपयोग की लगा अंजुलि चिंतन करते निराहार स्वरूप का देह को दे आहार, साक्षी भाव से स्वयं दृष्टा बने निज भावों के सृष्टा रहे... आहार देने वालों की लगी है भीड़ भारी । बारी-बारी से दें आहार नर और नारी अपने भाग्य को सराहते उमंग से भर आये, बार-बार देख निज हाथों को फिर मुनिवर की शांत निश्छल छवि को निरख-निरख कर हर्षित हो आये। मानो आहार देकर सब कुछ पा लिया, अपनी कलुषित चेतना को प्रशस्त पुण्य नीर से आज धो दिया। टाल कर छियालीस दोष निरीहता से ले आहार संपन्न हुआ। प्रथम आहार निरंतराय... जयनाद से गूंज उठी अजमेर की धरा, परम पूत की पद-रज स्पर्श कर। भाग्यशालिनी मान रही वसुंधरा। सतत सत् तत्त्व की साधना में लीन साधक की सुनने वार्ता सदलगा वासी जब कभी चले आते महावीर के निवास पर घिर गया घर विद्या के अपनों से, सुन-सुन कर दीक्षा की बातें कभी आँख तो कभी नाक पोंछते अपने रूमाल से, हर दिन भीड़ जमती पूजनीय हो गये सारे नगर में मल्लप्पाजी और श्रीमंति...। जो भी सुनकर जाने लगता अपना मस्तक उनके चरणों में नवाता, मंदिर की तरह बन गया घर जो भी गुजरता उस राह से देख विद्या का निवास श्रद्धा से निकलता हाथ जोड़कर। आस्था से अभिभूत जनता जनार्दन की सघन वर्णगाओं ने इधर परिवार के दर्शन की प्यास ने आखिर तय कर ही लिया अजमेर जाने का मन बना ही लिया, दीक्षा लिये आज दिन हो गये हैं सत्रह तैयारी हो चुकी पूरी तरह, कहा भरे गले से श्रद्धा की भाषा में ‘चढ़ाने को चरणों में रख लेना कुछ कहकर श्रीमति ने ‘जी' । रख लिया बहुत कुछ...। ‘जो कभी झुकते थे पिता के चरणों में वे स्वयं पिता के लिए वंदनीय हो गये जो रहते थे घर में संतान की तरह वे संन्यास ले दर्शनीय हो गये। परिवार के संग था बाल सखा मारूति भी जैन न था तो क्या था वह विद्या के बचपन का साथी। गुरूगंगा तक पहुँचने का रास्ता लंबा लग रहा है । रह-रहकर नयनों में भरता नीर गंगा को यहीं से अघ्र्य चढाने का आयाम प्रारंभ कर रहा है...। आँसू चाहे सुख के हों या दुख के मिलन के हों या विरह के अतिरेक के द्योतक हैं, आँसू बनते हैं आसरा सिर को हल्का करने में पर ये मोह के संकेतक हैं...। जैसे शंका के प्रभाव में श्रद्धा गौण हो जाती है। बुद्धि के उद्वेग में संवेदनाएँ गौण हो जाती हैं। धन के प्रभाव में धर्मात्मा गौण हो जाता है, वैसे ही मिलन की उत्कंठा में कितनी ही दूरी हो... सब दृश्य गौण हो जाता है। सब कुछ अदृश्य हो जाता है। यही हो रहा यहाँ इतनी लंबी यात्रा पूरी कर आ गया परिवार अजमेर शहर, करते ही प्रवेश मंदिर के प्रांगण में । दृष्टि पड़ी नव दीक्षित मुनिवर पर; नूतन साधक, आत्म आराधक नूतन अनुभूति, स्वात्म की प्रतीति नूतन चिंतन, भाव आकिञ्चन नूतन चर्या, आगमिक क्रिया । नूतन भावना, अदभुत प्रभावना नूतन वृत्ति की पवित्रता, दृष्टि की निर्मलता नूतन जीवन, जन-जन के संजीवन तन न, चेतन का पोषण!! यों पल-पल नव-नव परिवर्तन देख मुनिवर श्री विद्यासागरजी को । झुक गया सिर, हो गया वंदन दूर थे तो व्याकुल था हृदय निकट हैं तो व्याकुल हैं नयन, देखना चाहते जी भर पर देख नहीं पा रहे, कहना चाह रहे बहुत कुछ पर कह नहीं पा रहे, बैठना चाह रहे जाकर निकट पर कदम आगे नहीं बढ़ रहे, सुनना चाहते दो वचन मुख से पर निवेदन का साहस नहीं जुटा पा रहे, अपने होकर भी परिवार की पकड़ से परे हो गए इतने दूऽऽऽ र कि त्वरित गति से शिवधाम जा रहे... न कोई बात, न कोई संकेत मात्र करते दर्शन, बीते दिन अनेक... दिया परिचय संपूर्ण परिवार का एक दिन मल्लप्पाजी ने महामुनिवर श्री ज्ञानसागरजी को यह माँ है विद्या की विरह में विद्या के आँसू बिसारती रहती...।' विद्या से छोटा यह है ‘अनंतनाथ' जिम्मेदारी से देता है परिवार का साथ इन दिनों चुप्पी साधे न जाने क्या सोचता? यह इससे छोटा 'शांतिनाथ' स्वभाव से ही है शांत इन दिनों रहने लगा पूर्ण शांत दीक्षा के दिन से लगी है अजमेर आने की शांता अब दर्शन में हिचकिचाती है। यह सुवर्णा दुखी है यहाँ आकर भी। भैया बोलते क्यों नहीं? सोचकर वह रोती रहती है… यह मारुति, विद्या का सहपाठी सखा बचपन का सुनते ही नाम मित्र का... हँसकर बोले श्री ज्ञानसागरजी मुनिवर मीत वही जो प्रीत निभाए नित रीत नहीं यह अच्छी कि मुनि बन जाये मीत और घर में रहे सखा!'' देख मित्र को मुनि के भेष में मारूति भूत की भंवरों में घिर गये खेत की मेड़ पर खड़े विद्या दिखने लगे... हरी-भरी फसलों से बात करते पकी फसल को पंछी खा रहे। फिर भी उदारमना यह कुछ न कहते... विचारों में खोये मारुति को अतीत के अंधकूप से निकाल बोले ज्ञानी गुरूवर- कहाँ खो गये? सँभलकर हाथ जोड़ कहने लगे मारुति मैं अज्ञ हैं जानता कुछ नहीं चाहता हूँ मैं भी दीक्षा जैसा कहेंगे भैया विद्या वैसा ही कर लूंगा....” अरे! न कहो इन्हें भैया! 'विद्या ये हैं अब ‘विद्यासागर सुन ज्ञान-सिंधु मुनि की बात तत्क्षण क्षमा माँगी; क्योंकि भूल हुई ज्ञात कुछ सोच बोले मुनिवर “लेकर व्रत ब्रह्मचर्य रहो अपने घर समर्पित हृदय से जोड़ कर हर्षित हुए व्रत स्वीकार कर। गुरु ने आज्ञा दी शिष्य मुनि को परिवार से वार्तालाप की तभी विरागी दृष्टि उठाकर टिका दी सर्वप्रथम माँ श्रीमति की ओर...। आनंदातिरेक से रोम-रोम पुलक गया श्वासों का स्पंदन पल भर को थम गया मोही मन बेटे का परस करने मचल गया। दूसरे ही पल सँभालती स्वयं को सामान्य नहीं वह माँ महान योगी की जननी देखती रही बस लगाये टकटकी... अनबोले ही बहुत कुछ कह दिया मेरे हठीले लाल! तूने यह क्या कर लिया? दुख मिश्रित मोह के अश्रु सोखकर आँखों में ही झुक गई मात्र बोल पाई ‘नमोऽस्तु... पीड़ा अंतर्मन की छिपी न रह सकी विरागी संत ने निर्मोही होने का दिया आशीष तन हल्का हुआ तनिक, हलकी-सी खुशी झलकी। होने से राग का विराग में परिवर्तन कितना कुछ बदल गया है!! कल तक आशीष का हाथ उठता था माँ का आज बेटे का माँ के लिए उठ रहा है। बारी-बारी से सभी ने किया नमन। अनंत के अंतर्मन में उठते प्रश्नों का कोई समाधान नहीं मिला आखिर आपने हम सबको बीच मॅझधार में क्यों छोड़ दिया? मुझसे, सबसे, सारे सदलगा से नाता क्यों तोड़ दिया? इसका समाधान था मात्र एक निर्मोही नज़र... ना कुछ कह पाये अनंतनाथ ना ही कुछ बोले मुनिवर...। चौका लगा है मल्लप्पाजी का सौभाग्य से आज आहार हुआ श्री विद्यासागरजी का खुशी का पार न रहा आहारोपरांत पूरे परिवार का शीश मुनि चरणों में झुक गया!! अनंत व शांति का शीश देर तक झुका रहा कहा मुनिवर से हमें अच्छा आशीर्वाद दो'' बोले मुनिवर श्री विद्यासागरजी ‘शांतिसागर' आचार्य के बनो पथगामी अनुभवो अनंत शांति..." । मिटे मिथ्या भ्रांति, कर्म क्लाति वीतराग भाव में हो सदा विश्रांति यही है आशीर्वाद...। करके पद में प्रणिपात समझ नहीं पाये वे पूरी बात, किंतु प्रसन्न भाव से भर गये। भावी मुनि होने के बीज बो दिये...। संध्या वेला में परिवार सहित मल्लप्पाजी निकले जिनालय वंदना करने ‘नसिया सोनीजी' की देखी बारीकी से आँखें अपलक देखती रह गईं...। सोने-से मंदिर में प्रतिमा देख स्वर्ण की हृदय कली चटक-चटक कर खिलने लगी, मल्लप्पाजी की ममता कहने लगी। यह तो जड़ सोना है। मेरा विद्या अनमोल चेतन सोना है; जो जाग गया है सदा के लिए औरों को सोते से जगाने के लिए!! यों सुधियों के समंदर में डूबे ही थे कि पूछ लिया श्रीमति ने क्या सोच रहे हैं? देखो इधर ऊपर गगन चूमते शिखर पर स्वर्ण कलश त्रिलोकीनाथ का मानो गा रहा यश, समवसरण मंदिर का नज़ारा देखते ही बनता बड़े धड़े की नसिया हुई थी दीक्षा विद्याधर की जहाँ अब मन कहीं जाने को नहीं कहता।'' श्रीमंत न जाने कहाँ खो गई कुछ पल को अपनी सुध भूल गई... महावीर ने कही थी जो कथा यह वही दीक्षा का स्थल था, रह-रहकर मानस पटल पर दिल के टुकड़े को देखती चलचित्र की भाँति... ब्रह्मचारी विद्याधर केशलोंच करते हुए। हज़ारों लोगों के बीच, । श्री ज्ञानसागर जी मुनि संस्कार करते हुए। त्याग कर वस्त्राभूषण सदा के लिए हो गये अनंबर श्रमण सद्यःजात शिशु सम हो दिगम्बर अन्वर्थ नाम धरा विद्यासागर। " उठाकर रज पावन धरा की अपने माथे लगा ली, मानकर कृतार्थ स्वयं को हृदय में राहत पा ली। बचपन में कभी-कभी पहन लेते थे जो अँगूठी स्वर्ण की। उसे अब रखने का औचित्य क्या? जब पहनने वाला ही चला गया... स्वर्णिम अवसर है यह स्वर्ण चढ़ाने का स्वर्णाभा वाले सपूत साधु के पद में इसीलिए स्वर्ण-मुद्रिका एक सौ आठ स्वर्ण-सुमनों में परिवर्तित कर मारुति ने भी कुछ रजत-पुष्प लाकर । प्रभु-संग गुरु की पूजा कर जब पुष्प समर्पित किया सभी का मन भक्ति से विभोर हो गया। उत्तम पात्र को उत्तम द्रव्य चढ़ाकर स्वर्ग-सा सुख पा लिया, पूजनोपरांत दंपत्ति ने पूर्व से संकल्पित व्रत ब्रह्मचर्य गुरु-चरण में विधिवत् ग्रहण कर लिया...। देख संपूर्ण दृश्य भागचंद सोनी स्वयं को धन्य मानने लगे। ‘वंदनीय हैं यह निर्विकार मुनि सौभाग्यशाली हैं यह परिवारजन गुणी कहकर यूं सभी को जय जिनेन्द्र' करने लगे नसिया के कण-कण को साथ ही अपने जीवन को कृतार्थ हुआ-सा मानने लगे। काल के कदम रुकते कहाँ एक पल भी? चलते हुए भी दिखते कहाँ सामान्य जन को भी? जड़ है यह अचतेन भी। जानता नहीं कुछ भी पाओ या खोओ... जागो या सोओ... कुछ कहो या न कहो
  46. 1 point
    अजमेर की नसिया में चल रहा चातुर्मास, नित्य प्रवचन में आते अनेकों श्रोतागण जब आया पर्व दशलक्षण बिना शास्त्र खोले, कंठस्थ मोक्षशास्त्र का किया शुद्ध वाचन गुरू हुए प्रसन्न श्रोता हुए चकित, विद्याधर थे सहज । अभी बहुत सीखना है शेष... चारित्र को पाना है विशेष। व्रती विद्याधर की ज्ञान-गरिमा में लगे चार चाँद, किंतु मन को छू न पाया ज्ञान का मान। गुरु की वृद्धावस्था साथ ही रोग था 'सायटिका' गर्मी का था मौसम हवा में वर्जित था शयन अतः बंद कक्ष में करते शयन विद्याधर भी रहते वहीं गुरु के संग दर्द होने पर बार-बार दबाते । खुली हवा में सोने को कहते, किंतु गुरु के सोने पर वे वहीं सो जाते सेवा में त्रियोग से तत्पर गुरू का हृदय से रहता आशीष उन पर...। पूछा कजौड़ीमल से एक दिन विद्या रात में पढ़ता है या सोता रहता है? बोले वह लगता तो है पढ़ता ही होगा लेकिन ध्यान नहीं दिया। अब से ध्यान दूँगा, संत-निवास में ही रहकर देर रात में उठकर... जब देखा तब पढ़ रहा था ज्यों ही देखा घड़ी की ओर पूरा एक बज रहा था...। उठकर आये पास में बोले बड़े प्यार से ब्रह्मचारी जी! बंद करो पढ़ाई अभी कोई परीक्षा नहीं आई देर तक जगना अच्छा नहीं, बात उनकी मान शीघ्र समेटे शास्त्र सो गये बिछाकर चटाई। प्रभात में बैठे ही थे दर्शन करके पूछा मुनिवर ने कुछ पढ़ता है रात में? बोले गुरूभक्त कजोड़ीमल एक बात समझ नहीं आई हीरा भी लाकर दूँ और परख भी मैं ही करूं।' महाराज! आपका शिष्य है होनहार... बड़ी लगन है उसमें; रात्रि आठ से एक बजे तक पढ़कर, प्रातः साढ़े चार बजे उठकर सामायिक पाठ आदि करता है। सुनकर प्रशंसा शिष्य की गुरु आनंद से भर गये। स्वयं मन ही मन कहने लगे पहले क्यों नहीं आ गये! क्यों इतनी देर कर गये!! नित-प्रतिदिन नया विषय ज्ञान के खजाने से निकल रहा था लगन के साथ पढ़ते हुए विद्या का विकास हो रहा था...। सच ही कहा है ‘‘विद्या योगेन रक्ष्यते विद्या की रक्षा होती है अभ्यास से इसीलिए विद्यार्जन कर रहे पूर्ण लगन से। दो माह बीत गये पढ़ाने लगे अब आठ घंटे, चाहते थे संपूर्ण ज्ञानामृत शिष्य के हृदय में भर देना वह भी अपना चित्त-कटोरा करके रखते सदा सीधा गुरू-बादल से नीर बरसता मन-सीपी खुली रहती हर बूंद मोती बन जाती। इस तरह रात-दिन चिंतन-मनन-पठन चल रहा था, जो भी देते गुरू ज्ञान उसे करते उसी दिन याद छोड़ते नहीं कल पर क्योंकि वे जानते थे ‘कल कामने इच्छा के अर्थ में है कल् धातु जब तक रहेगी कल की कामना कल-कल करता रहेगा, पल-पल आकुल-व्याकुल होता रहेगा इसीलिए कल के लिए होना नहीं है विकल अकल से काम लेना है। नकल करना है अब निकल परमातम की। हे आत्मन्! कल का भरोसा नहीं आज का कार्य आज ही करना है, यों समझाते स्वयं को बढ़ते जाते आगे-आगे...। मानो मिल गया भूले को मार्ग प्यासे को समंदर भूखे को मिष्ठान्न अंधे को नयन। पाया जबसे गुरू-ज्ञान का भंडार मिल गया जीवन का आधार लगने लगा अब उन्हें... साँसों की सरगम में महागान गुरूवर हैं, हृदय-देश के शासक संविधान गुरूवर हैं, अज्ञान तमहारक अवधान गुरूवर हैं। मेरी हर समस्या का समाधान गुरूवर है...। गुरूपद में सर्वस्व अर्पण कर वरद हस्त प्राप्त कर चिंतन-मनन में ध्यान-अध्ययन में, भूल गये बाहर की दुनिया आहारोपरांत गुरू के । जो भी आते श्रावक बुलाने सिर झुकाये मौन से । चले जाते साथ उनके भोजन करने। बचपन से ही नहीं थी भोजन में गृद्धता खा लेते जो भी माँ के हाथ से मिलता, भोजन के प्रति निस्पृहता, सात्विकता देखकर गुरु ने एक दिन पूछा ठीक चल रही है साधना? कहकर- ‘हाँ । फिर हो गये मौन...। भोजन के बाद मन को थकाने वाले न करें कार्य, रखे मन प्रसन्न और शांत कर सके ताकि उत्साह से सामायिक, तब बनेगी एकाग्रता । यही साधना लायेगी ज्ञान में निखार सुनकर यों गुरु-वचन हितकार। उपयोग का उपयोग करना ही समय का सदुपयोग करना है, भोगों में उपयोग का भ्रमना ही समय का दुरूपयोग करना है, जानकर यूं स्वयं को साधना में डुबाने लगे। शब्द में छिपे छंद को मुक्त कर सुप्त संगीत को जगाकर वीणा बजाता है वादक। और इधर देह में सोये ब्रह्म को पुकार कर ज्ञानचक्षु से निहारकर विद्याधर हुए अद्भुत कलाविद्, आत्मज्ञायक, यह सब ज्ञानी गुरू का ही है चमत्कार अन्यथा कैसे मिल पाता। अल्प समय में ज्ञान का महान उपहार?? इस देश को चलाने चाहिए राष्ट्राधीश । अदालत को चलाने चाहिए न्यायाधीश विद्यालय में चाहिए अध्यापक मंच पर चाहिए संचालक और मुझे भी चाहिए पल-पल गुरू ज्ञानसागर, जो पामर को बनाते हैं परम ब्रह्म से मिला देते हैं मिटाकर भरम अहं को विसर्जित कर बना देते हैं अर्हं। ऐसे गुरु लाखों में हैं एक, जैसे पुत्र का पिता होता है एक सती का पति होता है एक गुलाम का मालिक होता है एक, यूँ मन ही मन गुरु-गुण गाते रहे आनंद-सर में गोते लगाते रहे… ‘जैसा संग वैसा रंग इस उक्ति को चरितार्थ करते रहे। छाता खोल लोग बारिश से बचते रहे, मगर ये गुरु-वचनामृत से भीगते रहे शीत में लोग देह को ढंकते रहे, मगर ये गुरू-कृपा की शीतलता अनुभवते रहे गर्मी में लोग तप्त उर्मियों से व्याकुल होते रहे। कृत्रिम हवा खाते रहे, मगर ये दिन-रात ज्ञानाचरण में तपते रहे। यूँ पता ही न चला पलक झपकते ही वर्ष बीत गया, दक्षिण का विद्या उत्तर में जा ज्ञान में खो गया।
  47. 1 point
    बहुत ही सुन्दर भजन है
  48. 1 point
    प्राणायाम हमारे प्राणों के आयाम को बढ़ाने की प्रक्रिया है। इसे प्राचीन योगियों ने अन्वेषित कर मनुष्य को दीर्घायु बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है। प्राणायाम के विभिन्न प्रकारों से मनुष्य के वासोच्छवास का नियमन होकर आयाम में वृद्धि होती है, जो मानव चित्त को शांत एवं स्थिर कर देती है। इसके द्वारा शरीर के विभिन्न शक्ति केन्द्रों पर एक विशेष प्रभाव होता है, जो उन्हें विशेष ऊर्जावान बनाकर मानव को असीमित योग्यताओं से लाभान्वित करता है। अर्हम् प्राणायाम के विभिन्न चरण:- यह तीन चरणों में शामिल हैं:- अनुलोम-विलोम प्राणायाम भस्त्रिका प्राणायाम कपाल भाति प्राणायाम प्राणायाम के उद्देश्य:- प्राणायाम निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति करता है: दीर्घायु विकास, विस्तार और महत्वपूर्ण ऊर्जा का नियंत्रण भौतिक शरीर और आत्मा के बीच एक कड़ी का निर्माण शारीरिक और मानसिक विकारों के उपचार सहानुभूति और तंत्रिका प्रणाली के बीच सद्भाव मधुर वाणी, गायन की विशेष योग्यता, स्मरण शक्ति में वृद्धि निम्नलिखित सावधानियां प्राणायाम करते समय रखी जानी चाहिए: एक स्वच्छ, साफ और शोर मुक्त स्थान का चयन करें हमेशा खाली पेट के साथ प्राणायाम प्रदर्शन गर्दन और रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें शरीर को ढीला रखें। अर्हम् योग के लाभ:- मानसिक एवं शारीरिक क्षमताओं का विकास । स्वाभाविक गुणों का विकास अध्यात्म के उच्च स्तरों पर पहुंचना विश्व मैत्री एवं शांति की भावना का विकास सही एवं उचित मार्गदर्शन में किया गया अर्हम् प्राणायाम निम्न योगों का उपचार करने में सक्षम है क्योंकि यह शरीर की रक्त धमनियों के माध्यम से ऊर्जा का निर्बाध प्रवाह पूरे शरीर को देता है। अनुलोम-विलोम से पेट की बीमारियां ठीक हो जाती हैं तथा रक्त शुद्ध होकर शरीर ऊर्जा से भर जाता है। प्राणायाम श्वास दर को नियंत्रित कर रक्तचाप को ठीक कर देता है तथा मानसिक तनाव (Mental Stress) को दूर कर देता है। यह मानसिक एकाग्रता तथा दिव्य शक्तियों को प्राप्त करने में सहायक है। अर्हम् योग क्यों - प्रौद्योगिकी, औद्योगीकरण और जनसंख्या के इस युग में, हम लगातार जबरदस्त तनाव विकल्पों के अधीन हैं। इनमें उच्च रक्तचाप, अनिद्रा और हृदय की समस्याओं के विभिन्न प्रकार के मनोदैहिक रोगों का उत्पादन होता है। हताशा में लोग ख़तरनाक दवाओं को पीने और खाने के लिए लेते हैं, जो अस्थायी राहत देने के लिए होते हैं लेकिन और अधिक गंभीर समस्याएं पैदा करते हैं। अर्हम् थेरेपी, मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य की दिशा में एक समग्र दृष्टिकोण के लिए कार्यरत है। अर्हम् योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है अपितु ध्यान के साथ चित्त और आत्मा को स्थायी प्रभाव (deepimpact) देता है।
  49. 1 point
    ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के अंतिम पाद में शक्तिशाली नन्दवंश का उच्छेद कर मौर्य वंश की स्थापना करने वाले प्रधान नायक ये दोनों थे। जो गुरु-शिष्य थे। चाणक्य राजनीति विद्या-विलक्षण एवं नीति विशारद ब्राह्मण पंडित था। चन्द्रगुप्त पराक्रमी एवं तेजस्वी क्षत्रिय वीर था। इस विरल मणि-कांचन संयोग को सुगन्धित करने वाला अन्य सुयोग यह था कि वह दोनों ही अपनेअपने कुल परम्परा तथा व्यक्तिगत आस्था की दृष्टि से जैन धर्म के प्रबुद्ध अनुयायी थे। चाणक्य का जन्म ईसा पूर्व ३७५ के लगभग चणय नामक ग्राम में हुआ था। माता का नाम चणेश्वरी एवं पिता का नाम चणक था। चणक के पुत्र होने से उनका नाम चाणक्य हुआ। यह लोग जाति की अपेक्षा ब्राह्मण थे किन्तु धर्म की दृष्टि से पापभीरु जैन श्रावक थे। शिशु चाणक्य के मुंह में जन्म से ही दाँत थे, यह देखकर लोगो को बड़ा आश्चर्य हुआ। इस लक्षण को देख भविष्य वक्ता ने इसे 'एक शक्तिशाली नरेश' होना बताया। ब्राह्मण चणक श्रावको चित क्रिया करने वाला था, संतोषी वृत्ति का धार्मिक व्यक्ति था वैसे ही उनकी सहधर्मिणी थी। राज्य वैभव को वे लोग पाप और पाप का कारण समझते थे। अतएव चणक ने शिशु के दाँत उखड़वा डाले। इस पर साधुओं ने भविष्य वाणी की, कि अब वह स्वयं राजा नहीं बनेगा, किन्तु अन्य व्यक्ति के माध्यम से राज्य शक्ति का उपयोग और संचालन करेगा। बड़े होने पर तात्कालिक ज्ञान केन्द्र तक्षशिला तथा उसके आस-पास निवास करने वाले आचार्यों से शिक्षण प्राप्त किया। तीक्ष्ण बुद्धिमान होने से समस्त विद्याओं एवं शास्त्रों में वह पारंगत हो गया। दरिद्रता धनहीनता से पीड़ित चाणक्य पाटलीपुत्र के राजा महापद्मनंद के पास पहुंचा। अपनी विद्वता से उसने राजा को प्रभावित किया एवं दान विभाग के प्रमुख का पद प्राप्त किया। किन्हीं कारणो से राजपुत्र के द्वारा किये गये अपमान से क्षुब्ध एवं कुपित चाणक्य ने भरी सभा में नंद वंश के समूल नाश की प्रतिज्ञा की और पाटलिपुत्र का परित्याग कर दिया। घूमते-घूमते वह मयूर ग्राम पहुचा, वहाँ के मुखिया की इकलौती लाड़ली पुत्री गर्भवती थी, उसी समय उसे चन्द्रपान का विलक्षण दोहला उपत्पन्न हुआ। जिसके कारण घर के लोग चिंतित थे। चाणक्य ने उसके दोहले को शांत करने का आश्वासन दिया और यह शर्त रखी कि यह लड़का हुआ तो उस पर मेरा अधिकार होगा जब चाहे उसे ले जा सकता हूँ। अन्य कोई उपाय न देखकर शर्त मान ली गई, तब चाणक्य ने एक थाली में जल भरवाकर उसमें पूर्ण चन्द्र को प्रतिबिम्बित कर गर्भिणी को इस चतुराई से पिला दिया कि उसे विश्वास हो गया की उसने चन्द्रपान किया। कुछ दिनों बाद मुखिया की पुत्री ने एक पुत्र रत्न को जन्म दिया। जिसका नाम चन्द्रगुप्त रखा गया। यह घटना ईसा पूर्व ३४५ के आसपास की है। विशाल साम्राज्य के स्वामी नंद वंश को नष्ट करना हँसी खेल नहीं था। यह चाणक्य जानता था फिर भी धुन का पक्का था। अतएवं धैर्य के साथ अपनी तैयारी में संलग्न हो गया। अपने कई वर्ष उसने धातु विद्या की सिद्धी एवं स्वर्ण आदि धन एकत्र में व्यतीत किये। आठ-दस वर्ष बाद पुन: चाणक्य उसी मयूर ग्राम में आया। वहाँ पर उसने खेलते हुए कुछ बालक देखे। कौतुक वश वह उनके खेल को देखने लगा। बाल राजा के अभिनय से वह अत्यन्त आकृष्ट हुआ पास जाकर उसने उस बालक को राजा बनने योग्य लक्षणों को पाया, तब मित्रों से उसका पता पूछने पर ज्ञात हुआ यह वही मुखिया का नाती है चन्द्रगुप्त तब अत्यन्त प्रसन्न होता हुआ माता-पिता को अपने वचनों का स्मरण करा राजा बनाने के उद्देश्य वश उसे ले गया। कई वर्षों तक उसने चन्द्रगुप्त को विविध अस्त्र-शस्त्रों के संचालन, युद्ध-विद्या, राजनीति तथा अन्य उपयोगी ज्ञान-विज्ञान एवं शास्त्रों की समुचित शिक्षा दी एवं धीरे-धीरे युवा वीर साथी जुटा लिये। ई.पू. 325 के लगभग चाणक्य के पथ प्रदर्शन में मगध राज्य की सीमा पर अपना एक छोटा सा स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। कुछ दिनों पश्चात् इन्होंने छद्म भेव में नन्दों की राजधानी पाटलीपुत्र में प्रवेश कर आक्रमण कर दिया। चाणक्य के कूट कौशल के बाद भी नंदों की असीम सैन्य शक्ति के सम्मुख ये बुरी तरह पराजित हुए। औरे जैसे-तैसे प्राण बचाकर भागे। एक बार घूमते हुए रात्रि में उन्होंने एक झोपड़े में बुढ़िया की डाट सुनी कि हे पुत्र! तू भी चाणक्य के समान अधीर एवं मूर्ख है, जो गर्म-गर्म खिचडी को बीच से ही खा रहा है, हाथ न जलेगा तो क्या होगा। चाणक्य को समझ आयी कि सीधे राजधानी पर हमला बोलकर मैने गलती की फिर उन्होंने नंद साम्राज्य के सीमावर्ती प्रदेशों पर अधिकार करना प्रारंभ किया। एक के पश्चात् एक ग्राम नगर, गढ़ छल-बल कौशल से जैसे भी बना हस्तगत करते चले गये। चन्द्रगुप्त के पराक्रम, रण कौशल एवं सैन्य संचालन पटुता, चाणक्य की कूट नीति एवं सदैव सजग गिद्ध दृष्टि के परिणाम स्वरूप प्रायः सभी नन्दकुमार लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए। वृद्ध महाराज महापद्म चाणक्य को धर्म की दुहाई दे, सपरिवार सुरक्षित अन्यत्र चले गये। नंद दुहिता राजरानी सुप्रभा का विवाह चन्द्रगुप्त के साथ हुआ और वह अग्रमहिषी बनी। इस प्रकार ई.पू. ३१७ में पाटलीपुत्र में नंदवंश का पतन और उसके स्थान पर मौर्य वंश की स्थापना हुई। व्यक्तिगत रुप से सम्राट चन्द्रगुप्त धार्मिक एवं साधु सन्तों को सम्मान करने वाला था। प्राचीन सिद्धान्त शास्त्र तिलोय पण्णक्ति में चन्द्रगुप्त को क्षत्रिय कुलोत्पन्न मुकुटबद्ध माण्डलिक सम्राटो में अंतिम कहा गया है जिन्होंने दीक्षा लेकर अंतिम जीवन जैन मुनियों के रूप में व्यतीत किया। उनके गुरु आचार्य भद्रबाहु थे। जिन्होंने श्रवण बेलगोला में समाधि मरण ग्रहण किया। उसी स्थान के एक पर्वत पर कुछ वर्ष उपरांत चन्द्रगुप्त मुनिराज ने सल्लेखना पूर्वक देह त्याग किया। लगभग २५ वर्ष राज्य भोग करने के पश्चात् ईसा पूर्व २९८ में अपने अपने पुत्र बिम्बसार को राज्यभार सौंपकर और उसे गुरु चाणक्य के ही अभिभावकत्व में छोड़ दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया। कुछ दिनों पश्चात् चाणक्य ने भी मन्त्रित्व का भार अपने शिष्य राधागुप्त को सौंपकर मुनि दीक्षा लेकर तपश्चरण के लिए चले गये थे। अंत समय में सल्लेखना पूर्वक देह त्याग किया।
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