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  1. संयम स्वर्ण महोत्सव

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  2. दिपाली जैन

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  3. Durga jain

    Durga jain

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  4. प्रतीक जैन गोकुल

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Showing content with the highest reputation since 07/20/2018 in all areas

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    ऐतिहासिक मंगल कलश स्थापना से चातुर्मास शुरू सम्यकज्ञान, सम्यक चारित्र और दान आपके साथ रहेगा - आचार्य विद्यासागर छतरपुर । आध्यात्म एवं पर्यटन नगरी खजुराहो में आचार्य विद्यासागर जी महाराज का आज से चातुर्मास प्रारंभ हुआ। कलशस्थापना समारोह में देश-विदेश से भारी संख्या में उनके अनुयायी यों ने पर्यटन नगरी खजुराहो पहुंचकर उनका आर्शीवाद लिया। जिला कलेक्टर रमेश भंडारी और उनकी पत्नी ने भी इस मौके पर पहुंचकर आचार्य विद्यासागर जी के चरण पखारे और आर्शीवाद प्राप्त किया। इस मौके पर कलशस्थापना भी की गयी। आज के इस कार्यक्रम में भारी संख्या में जैन समाज सहित अन्य धर्मो के लोग भी शामिल हुए। कलश स्थापना के इस कार्यक्रम का संचालन और निर्देशन बा.ब्र. सुनील भैया अनन्तपुरा वालों द्वारा किया गया। रविवार को दोपहर २ बजे से से तीन प्रकार के कलशों के माध्यम से समाज के श्रावकगण चातुर्मास की कलश स्थापना हर्सोल्लास के साथ की गयी। प्रथम कलश यानि सबसे बड़े 9 कलश स्थापित किये गये ,मध्यम 27 कलश और सबसे छोटे 54 कलश स्थापित किये किये। ये सभी कलश आचार्य श्री के मुखारविंद से विधिविधान पूर्वक मंत्रो के उच्चा रण से स्थापित हुए,जिसे श्रावकगण बोली लेकर स्थापित किया गया। ये सभी कलश विश्व शांति और विश्व कल्याण के उद्देश्य और वर्षायोग के निर्विघ्न सम्पन्न होने की कामना से स्थापित किये जाते है। प्रथम कलश का सौभाग्य तरूण जी काला मुम्बई 2 करोड़ 7 लाख, द्वितीय कलश डॉ. सुभाषशाह जैन मुम्बई 1 करोड़ 51 लाख, तृतीय कलश का सौभाग्य हुकुमचंद्रजी काका कोटा 1करोड़ 17 लाख, चतुर्थ कलश का सौभाग्य उत्तमचंद्र जैन कटनी कोयला वाले 1 करोड़ 8 लाख, पंचम कलश का सौभाग्य प्रेमीजैन सतना वाले 1 करोड़ 31 लाख, छठवां कलश का सौभागय श्री प्रभातजी जैन मुम्बई पारस चैनल करोड़ 8 लाख, सातवां कलश ऋषभ शाह सूरत 1 करोड़ 8 लाख, आठवां कलश पं. सुभाष जैन भोपाल 54 लाख एवं पुष्पा जैन बैनाडा आगरा वाले एवं नौवां कलश का सौभाग्य अशोक पाटनी 2 करोड़ 52 लाख को प्राप्त हुआ। स्थानीय विधायक विक्रम सिंह नाती राजा और नगर परिषद् अध्यक्षा कविता राजे बुंदेला, इंदौर विधायक रमेश मेंदोला ने भी कलश स्थापना समारोह में आचार्य श्री को श्रीफल भेंटकर आशीर्वाद प्राप्त किया। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में कहा कि आप सब यहां सम्यकज्ञान, सम्यक चारित्र और दान देकर अगले भव के लिए अपने साथ ले जाने वाले है। आचार्यश्री ने कहा कि लगभग 38 वर्ष पूर्व मै खजुराहो पंचकल्याणक के लिए आया था। यहां कि कमेटी बार-बार खजुराहो के लिए आग्रह करती रही। मैं भी इस बार चलते-चलते यहां पहुंच गया। आचार्यश्री ने कहा कि यहां के राजा छत्रसाल का कुण्डलपुर के बड़े बाबा से गहन संबंध रहा है। राजा छत्रसाल ने बड़े बाबा को जब छत्र चढ़ाया उसके साथ ही उन्हें विजय प्राप्त हुयी। महाराजश्री ने कहा कि व्यक्ति को धन अपने पास श्वास जैसा रखना चाहिए ताजी ग्रहण करें और पुरानी निकालते जाए, सम्पत्ति हाथ का मैल है इसे साफ करते रहें। आचार्यश्री ने कहा कि आप सबका उत्साह सराहनीय है। खजुराहो क्षेत्र के विकास के लिए अपना योगदान देते रहें। पूर्व में खजुराहो क्षेत्र कमेटी सहित जैन समाज छतरपुर, पन्ना,सतना, टीकमगढ़ सहित एवं बाहर से पधारे अतिथियों ने आचार्यश्री को श्रीफल भेंट किया।
  3. 3 points
    अमेरिका के राजदूत ने आज खजुराहो पहुंचकर, पूज्य आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के दर्शन किये। आपने गुरुदेव के समक्ष सप्ताह में एक दिन माँसाहार त्यागने का भी संकल्प लिया। खजुराहो में प्रतिदिन देश विदेश सेलोगों का, पूज्य आचार्यश्री के दर्शन हेतु आने का क्रम जारी है। साभार- ब्र श्री सुनील भैया जी, इंदौर 28 जुलाई
  4. 3 points
    गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर आचार्य श्री को मेरा शत शत नमन पंचम काल भी भाग्य पर अपने 🌻 मन ही मन इतराता है 🌻 ब्रहद हिमालय अपनी गोद मैं 🌻 पा हर्षित हो जाता है 🌻 चट्टानों पर पग रखें तो 🌻 पुष्प वहाँ खिल जाते है 🌻 मरुथल मैं विहार करें तो 🌻 नीर कुण्ड मिल जाते है 🌻 चरण धूलि जिनकी पाने को 🌻 अम्बर तक झुक जाता हो 🌻 सिद्ध शिला पर बैठे प्रभु से 🌻 जिनका सीधा नाता हो 🌻 वर्तमान के वर्द्धमान की 🌻 छवि मैं जिनमें पाता हूँ 🌻 ऐसे गुरू विद्यासागर को 🌻 अपना शीश नवाता हूँ 🌻 नमोस्तू भगवन 🌻
  5. 3 points
    20 जुलाई 18 खजुराहो । मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री जहां प्रदेश में चौथी बार सरकार बनाने के लिए जन आशीर्वाद यात्रा के माध्यम से मप्र की जनता का आशीर्वाद लेने में इन दिनों लगे हुए है। वहीं उन्हें अब एक नई जिम्मेदारी मिल गई है। लेकिन, वह जनता के आशीर्वाद से नहीं बल्कि गुरू के आशीर्वाद है। जी हां, गुरू की शरण में पहुंचे शिवराज को जो जिम्मेदारी मिली है, उससे शिवराज भी खुश है। दरअसल, सतना दौरे से लौटे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पत्नी साधना सिंह के साथ रात में खजुराहो पहुंचे। जहां रात्रि विश्राम भी उन्होंने किया। इसके बाद शुक्रवार की सुबह वह यहां विराजमान जैन संत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के दर्शन करने पहुंचे थे। जहां आचार्यश्री के चरणों में जाकर जब शिवराज ने पुन: मध्यप्रदेश की जनता की सेवा करने का आशीर्वाद मांगा तो आचार्यश्री मुस्कराने लगते है। भरे कार्यक्रम के बीच आचार्य कहते है कि शिवराज अब आप सिर्फ मध्यप्रदेश नहीं, बल्कि भारत की १२१ करोड़ जनता के बारे में सोचना शुरू कर दीजिए। *कार्यक्रम के दौरान पहुंचे थे मुख्यमंत्री* खजुराहो से मिली जानकारी के अनुसार खजुराहो में जैन समाज द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शुक्रवार को सुबह मुख्यमंत्री पहुंचे थे। जहां उन्होंने आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के चरणों का प्रच्छालन किया। साथ ही मध्यप्रदेश की उन्नति और खुशहाली का आशीर्वाद मांगा। शिवराज सिंह को खजुराहो प्रबंध समिति ने मंच पर स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। इस मौके पर मप्र शासन की राज्यमंत्री ललिता यादव भी मुख्यमंत्री के साथ थी। मुख्यमंत्री कार्यक्रम स्थल पर 30 मिनट तक रुकने के बाद सीधे खजुराहो विमानतल के लिए रवाना हो गए। यहां से वे भोपाल के चले गए। आज प्रातः पूज्य आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज को मप्र के मुखिया श्री शिवराजसिंह चौहान सहित अतिशय क्षेत्र खजुराहो सम्पूर्ण कमेटी ने श्रीफल समर्पित कर खजुराहो में वर्षायोग हेतु आशीर्वाद माँगा, पूज्य आचार्य भगवन ने आशीर्वाद प्रदान किया। एक तरह से अब आचार्यश्री ससंघ का चातुर्मास खजुराहो में होना निश्चित हो गया है। इससे देश भर की समाज में उत्साह और हर्ष की लहर छा गई। संघस्थ बाल ब्र. सुनील भैया ने बताया कि माननीय मुख्यमंत्री जी ने आज पूज्य आचार्यश्री जी के समक्ष मंच से घोषणा भी की, कि मप्र शासन द्वारा दिया जाने जीव दया सम्मान, आगामी अगस्त माह में ही आचार्यश्री जी के पावन सान्निध्य में खजुराहो में ही प्रदान किया जाएगा । ज्ञातव्य है कि पूज्य आचार्यश्री जी की प्रेरणा एवम् आशीर्वाद से ही जीव दया के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य हेतु यह पुरस्कार मप्र शासन द्वारा घोषित किया गया है। अब 29 जुलाई को आयोजित होने बाले कलश स्थापना की तैयारियों की गति तेज़ हो गई है। समाचार एजेंसियां एवं अनिल जैन बड़कुल, ए बी जैन न्यूज़
  6. 2 points
    विद्यार्थियों के लिए संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार सूत्र https://vidyasagar.guru/quotes/anya-sankalan/vidyaarthiyon-ke-lie/
  7. 2 points
    *परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज* के ससंघ सानिध्य में *चार दिवसीय भव्य कार्यक्रम* 14 अगस्त 24 मुनिराजों का दीक्षा दिवस 15 अगस्त - स्वतंत्रता दिवस 16 अगस्त - 25 मुनिराजो का दीक्षा दिवस 17 अगस्त - मुकुट सप्तमी निर्वाण लाडू एवं भगवान पार्श्वनाथ मोक्ष कल्याणक महोत्सव निवेदक -- श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र प्रबंध समिति खजुराहो जिला छतरपुर
  8. 2 points
    एक समाचार मिला था कि चपरासी के लिए नौकरी निकली,उसमें २५0 से ज्यादा पी-एच.डी. वाले, जिनको डॉक्ट्रेट की उपाधि मिली हुई है उन्होंने उस नौकरी को करने के लिए परीक्षा दी। मात्र १0– १२ हजार रुपये के लिए वे मोहताज हो गए। यह समाचार सुनकर मैंने सोचा-इतनी पढ़ाई करने के बाद भी किसी काम की नहीं! इसका मतलब उन्हें विद्या प्राप्त नहीं हुई, तभी तो वे लोग मोहताज हो गए। जाती थी कि वह अपने जीवन के साथ-साथ दूसरे के जीवन को भी सहारा दे देता था। कला बहत्तर पुरुष की, तामें दो सरदार। एक जीव की जीविका, एक जीव उद्धार ॥ यह भारतीय संस्कृति की देन है-स्त्रियों के लिए ६४ कलाएँ एवं पुरुषों के लिए ७२ कलाएँ बताई गई हैं। यदि दो कलाओं से रहित जीवन है तो किसी काम का नहीं। ऐसे युवा-युवतियाँ लाखों नहीं करोड़ों हैं भारत में। जो खूब पढ़ रहे हैं। लोन ले लेकर पढ़ रहे हैं लेकिन ऐसी शिक्षा किस काम की। जो पढ़े लिखों को मोहताज बनाए। आज शिक्षण के लिए भी बच्चों को कर्ज लेना पड़ रहा है, क्योंकि फीस लम्बी-चौड़ी है, माता-पिता कहाँ से पढ़ाएँ। वो घर चलाएँ या अपना एवं बच्चों का पालन-पोषण करें या सिर्फ बच्चों को पढ़ाते रहें? वो अपना धर्म आराधन भी करें या नहीं?'लोन' लेना पड़ रहा है। से चुकायेंगे। उस योग्य नौकरी ही नहीं है तो फिर पिताजी के नाम पर रोना रोते हैं। इस कारण पूरा परिवार तनाव भरा जीवन जीता है। ऐसी स्थिति में विचार करना आवश्यक है। सम्यग्दर्शन के आठ अंग कहे गए हैं। जिनमें वात्सल्य और प्रभावना अंग महत्वपूर्ण है। अपने साधर्मियों के तनाव भरे जीवन को देखकर उन्हें सहयोग करना चाहिए तभी वात्सल्य अंग पूर्ण होगा और उससे प्रभावना होगी। उपगूहन और स्थितिकरण को मिला लो तो ये चार अंग समाज को लेकर के हैं। समाज में कमजोर वर्ग को सहयोग देकर उसे अपने जैसे बनाना, यह आप लोगों का कर्तव्य है। अर्थ से कभी भी अपने जैसा नहीं बनाया जा सकता किन्तु अर्थोपार्जन का साधन देकर सत्कर्म सिखाया जा सकता है। इसके लिए यह अहिंसक कार्य हथकरघा सर्वोत्तम कार्य माना जा सकता है। आजकल के इन शोध प्रबन्धों को मैं मानता नहीं, क्योंकि शोध केवल विद्या नहीं, शोध केवल नौकरी का साधन नहीं, शोध तो वह है जिसके उपरांत हम नई चीज, नई अनुभूति समाज के सामने लाकर के रखें और अपने जीवन में अनुभव करें उसका नाम है शोध। जो व्यक्ति अर्थ के पीछे पड़ा हुआ है वह व्यक्ति परमार्थ की परिभाषा नहीं समझ सकता । बहुत विचार करने के बाद सक्रिय सम्यग्दर्शन के रूप में समाज के सामने इस अहिंसक कार्य की भूमिका बनाई और कार्य प्रारम्भ हुए। युग के आदि में आदिब्रह्मा ऋषभदेव भगवान के सामने भी जब आजीविका की समस्या खड़ी हुई तो उन्होंने विचार करके षट् कर्म सिखाए, उन षट् कर्मों में स्व-पर जीवन के लिए आजीविका बताई। उन्होंने अहिंसक कर्म सिखाए थे किन्तु आज हिंसा के लिए कर्म हो रहे हैं। कपड़ा बनाना एक शिल्प कर्म है। पर आप लोग जो कपड़ा उपयोग कर रहे हैं, चाहे पहनने के लिए हो या पानी छानने के लिए हो या भगवान के बिम्ब को पोंछने के लिए हो। वह कपड़ा कहाँ से आ रहा है? कैसा बन रहा है? कभी विचार किया? बनाने वालों ने बताया कि धागा को मजबूत बनाने के लिए धागे पर मांस की चर्बी लगाई जाती है। यह बहुत ही सोचनीय विषय है। सम्यग्दृष्टि का अहिंसक वस्तुओं के प्रति झुकाव होता है और वह अहिंसा की रक्षा के लिए ऐसे सत्कर्म (हथकरघा) करता है। बताओ, क्या यह धर्म नहीं है। जो धर्म की रक्षा करता है वह कारण भी धर्म कहलाता है। इस अहिंसक कार्य हथकरघा से प्रत्येक व्यक्ति को, समाज को, देश को जुड़ना चाहिए। गाँव-गाँव, शहर-शहर में आजीविका हीन हाथों को कार्य मिले। आप सबको मिलकर विचार करना है। अहिंसा के प्रति उत्साह होना ही चाहिए तभी शान्ति प्राप्त हो सकती है। चाहे आपकी रसोईघर हो, चाहे आपका परिधान हो, चाहे मन्दिर हो; सभी जगह शुद्ध अहिंसक वस्तुएँ होना चाहिए। भारतीय इतिहास उठाकर पढ़ो तो मालूम पड़ेगा कि सुन्दर से सुन्दर वस्त्र इसी अहिंसक हथकरघा की देन हैं। आज हिंसा के बीच अहिंसक बनाने के लिए यह योगदान है। अहिंसा मन्दिर की वस्तु नहीं है। अहिंसा तो जीवन के प्रत्येक कर्म में होना चाहिए। प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि तीर्थकर की वाणी समझना बहुत कठिन है। अनन्त बार वाणी ब्रह्माण्ड में गूँजी है लेकिन अभी तक हमें यह समझ में नहीं आई। अब एक बार समझ में आ जाए तो फिर कहना ही क्या? पूरी दुनिया उससे लाभान्वित हो, ऐसी भावना है। -११-o७-२o१६, राहतगढ़ (हथकरघा केन्द्र उद्घाटन पर आचार्य श्री के भाव)
  9. 2 points
    अपना स्वाभिमान कायम रखो, शान से जीओ
  10. 1 point
    नमोस्तु गुरूदेव ।
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  12. 1 point
    आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के संयम सवर्ण महोत्सव पर आयोजित नि:शुल्क चिकित्सा शिविर योग, प्राणायाम, जड़ी बूटी का काढ़ा, एक्यूप्रेशर से तुरन्त इलाज ४ व ५ अगस्त २०१८ शनिवार, रविवार प्रात: ७ बजे से जैन मंदिर, खजुराहो (म.प्र.) डॉ. नवीन जैन जबलपुर, डॉ. आशीष जी दिल्ली, डॉ.पारस भोपाल, डॉ. सुरेन्द्र टीकमगढ़, डॉ. शान्तिकांत मुंबई, डॉ. सुभाष उड़ीसा संपर्क सूत्र - 9837636708, 9425342180, 9827359275 आयोजक - प्रबंध समिति दि. जैन अतिशय क्षेत्र व् जैन समाज खजुराहो
  13. 1 point
    आज गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर हे गुरुदेव ! आपके श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम.... आप जिस पद में विश्रांति पा रहे हैं, हम भी उसी पद में विशांति पाने के काबिल हो जायें.... अब आत्मा-परमात्मा से जुदाई की घड़ियाँ ज्यादा न रहें.... ईश्वर करे कि ईश्वर में हमारी प्रीति हो जाय.... प्रभु करे कि प्रभु के नाते गुरु-शिष्य का सम्बंध बना रहे. *गुरूपूर्णिमा की हार्दिक बधाइयाँ*
  14. 1 point
  15. 1 point
    आचार्य श्री के संघस्थ ब्रह्मचारी सुनील भैया ने बताया खजुराहो में आचार्य श्री के चरण पढ़ने के पश्चात से ही प्रतिदिन विदेशी सैलानियों आचार्य श्री के दर्शनों का लाभ ले रहे हैं। आज स्पेन और इटली से आए सैलानियों ने आचार्य श्री से आशीर्वाद ग्रहण किया और सप्ताह में एक दिन मांसाहार न खाने का संकल्प लिया। आचार्य श्री ने उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया। साथ ही नार्वे से आये पर्यटक ने 5 साल तक शाकाहारी रहने का आचार्य श्री के समक्ष संकल्प लिया। इसके अलावा चीन, कोरिया, अर्जेंटीना, स्पेन, इटली मैक्सिको से आए 75 सैलानी सप्ताह में एक दिन मांस ना खाने का संकल्प ले चुके हैं । खजुराहो अंतरराष्ट्रीय पर्यटक स्थल है प्रतिदिन विदेशी लोग आचार्य श्री की चर्या के बारे में सुनकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं। दिन में एक बार आहार और पानी लेना, नंगे पैर पद बिहार करना ,शक्कर नमक हरी सब्जियां आदि आहार में नहीं लेना आदि चर्या को सुनकर विदेशी सैलानी दांतो तले उंगली दबा लेते हैं और भारतीय संस्कृति और जैन धर्म के इतिहास के प्रति जागरुक हो रहे हैं|
  16. 1 point
    खजुराहो में दर्शनार्थ के लिए पहुँचे, मप्र के मुख्यमन्त्री जी
  17. 1 point
    आ गई वो घडी,उलटी गिनती शुरु। एक सपना था संयम स्वर्ण महोत्सब मनाने का,गुरुजी का आशिर्वाद मिला और मन खुशी से झुम उठा। 5 जुलाई को हम सब मिल गुरुवर का जयकारा लगाएगे कि सुन हमारी पुकार ,गुरु जी चरण या गुरुजी की छाया को मुम्बई मे आना होगा। और वो हम करके दिखलाएँगे।हम प्रतिदिन प्रगतिशील समाज मे देख रहे है कि उन्नति तो कर ली किन्तु हर समाज मे उसके नुकसान देखने को मिलते।अहंकार जब हावी होता तब व्यक्ति सब मर्यादा भुल, सप्त व्यसनो मे लिप्त हो परिवार बरबाद कर देता। आओ आज देखे अहंकार के दुष्परिणाम और हमारी प्रस्तुति ...... OLX PAR BECH DE “अहंकार का दहन" तारक मेहता का उल्टा चश्मा के सेलेब्रिटी संग।। उच्च पद पर कार्यरत जैन बंधुओं का सत्कार जीव दया का प्रण लेते हुए चमड़े की वस्तु का त्याग कराने फॉर्म का विमोचन दिनांक -5 जुलाई 2018 को समय-दोपहर 2 बजे से 5 बजे स्थान-मैसूर असोसीएशन ऑडिटोरियम, भाऊदाजी रोड, माटुंगा Mysore Association Auditorium 393, Bhaudaji Rd, Matunga, Mumbai, Maharashtra 400019 022 2402 4647 https://goo.gl/maps/WQ5prt3Zeqm
  18. 1 point
  19. 1 point
    गुरु विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/anya-sankalan/guru/
  20. 1 point
    With the blessings of Achary Shri 108 Vidyasagar Ji Maharaj, we've started our first store in Bhopal. Presenting the inside view of 🔅 Shramdaan Store in Bhopal 🔅 Do visit us Habibganj Jain Mandir Campus, Bhopal Contact: +91 900 961 7692
  21. 1 point
    (श्री दिगम्बर जैन चन्द्रगिरि तीर्थक्षेत्र डोंगरगढ़, (छ.ग.) जून २o१७ में राष्ट्रीय चिंतक संत शिरोमणि जैनाचार्य प.पू. गुरुवर श्री विद्यासागर जी महाराज से प्रिंट मीडिया एवं दृश्य मीडिया का संवाद) पत्रकार - आचार्य श्री जी हथकरघा को लेकर आपने बहुत बड़ा प्रयोग स्वावलंबन बनाने के लिए किया। इस दिशा में काम को और बेहतर बनाने के लिए क्या किया जा सकता है? आचार्य श्री - इस दिशा में काम बहुत आगे बढ़ सकता है, आवश्यकता है योग्य प्रशिक्षित प्रशिक्षकों की। उन योग्य प्रशिक्षकों की पूर्ति के लिए ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारणियाँ आगे आ रहे हैं और दान-दातार भी आगे आ रहे हैं। यह बहुत अच्छा काम है। सरकार स्वयं चाहती है कि इसको (हथकरघा को) आगे कैसे बढ़ाया जाए, किन्तु कहने मात्र से तो यह कार्य आगे बढ़ने वाला नहीं है और यह कार्य सरकार मात्र का नहीं है। वह कहाँ तक करेगी, किन्तु जो समाजसेवा करना चाहते हैं या कर रहे हैं उनके लिए ये दिशा निर्देश देना चाहता हूँ कि जो महिलाएँ घर से बाहर काम पर निकलती हैं तो उनके लिए समस्या खड़ी हो जाती है। बच्चों को सँभालना, शिक्षा देना, घर का काम करना, रिश्तों में सामंजस्य बनाना आदि कार्य सुनियोजित नहीं हो पाते और उनके जीवन में अशान्ति आ जाती है। यदि महिलाओं को प्रशिक्षण दे दिया जाए और वे घर बैठे आजीविका का काम करें तो उनके लिए सब कार्य सहज और सरल हो जाएगा। उनके जीवन के लिए बहुत बड़ा सहयोग हो जाएगा। ऐसे विचार आने पर समाज वालों को प्रेरित किया। ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारणियों को भी यह कार्य अच्छा लगा, तो सभी लोग इस कार्य को करने के लिए तैयार हो गए। अपनी सेवा, सहायता या दान योग्य व्यक्ति को दो ताकि वह खड़ा हो जाए, लेकिन पैसे से सहयोग कब तक देते रहेंगे? सरकार भी यही चाहती है कि बेरोजगारों को काम, श्रम या रोजी जिसे काम-धंधा कहते हैं वह मिलना चाहिए। साथ ही धंधा मात्र देने से भी काम नहीं चलेगा। उनका काम आगे चले और वे व्यवस्थित हो जाएँ। इसके लिए सहकार समिति की जरूरत है। समाज ने यह काम किया। इस क्षेत्र में प्रतिभास्थली शिक्षण संस्था की प्रतिभामणि शिक्षिकाओं ने भी इस काम को आगे बढ़ाने के लिए कौशल प्राप्त किया और प्रशिक्षण देना प्रारम्भ कर दिया है। शुरुआत में ९ हथकरघा खुले, फिर ४0 तक पहुँच गए। उनके उत्साह ने १o८ हथकरघा का विचार कर लिया और सीखने के लिए महिलाओं की संख्या बहुत आ रही है। इस उत्साह को देखते हुए जैन समाज ने उनकी आने-जाने की व्यवस्था बनाई। सब की समय की पाली बनाकर उन्हें काम दिया। प्रतिभास्थली के बच्चे भी हथकरघा सीखने में रुचि ले रहे हैं। उनमें ये प्रेरणा जागृत होना अच्छी बात है। १२वीं कक्षा के बाद वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकतीं हैं और माता-पिता की चिंता को दूर कर सकतीं हैं जिससे उनका महाविद्यालयीन अध्ययन सतत चलता रहे। घर में रहकर यह सब संभव है। बस, समाज में इस प्रकार की व्यवस्था बनाना आवश्यक है।इसी प्रकार चिकित्सा की भी बात है।
  22. 1 point
    जो आत्मा को परतंत्र करता हैं, दु:ख देता है, संसार में परिभ्रमण कराता है उसे कर्म कहते हैं। अनादि काल से जीव का कर्म के साथ सम्बन्ध चला आ रहा है, इन दोनो का अस्तित्व स्वत: सिद्ध है। 'मैं हूँ।" इस अनुभव से जीव जाना जाता है और जगत में कोई दरिद्र है कोई धनवान है, कोई रोगी है कोई स्वस्थ्य है इस विचित्रता से कर्म का अस्तित्व जाना जाता है। वे कर्म मुख्य रुप से आठ प्रकार के हैं - (१) ज्ञानावरणी (२) दर्शनावरणी (३) वेदनीय (४) मोहनीय (५) आयु (६) नाम (७) गोत्र (८) अंतराय ज्ञानावरणी कर्म - जो कर्म ज्ञान को न होने दे अथवा ज्ञान की हीनाधिकता जिस कर्म के उदय से हो उसे ज्ञानावरण कर्म कहते हैं। जैसे एक व्यक्ति विद्वान और दूसरा मूख, किसी को बार-बार पढ़ने पर याद होता है तो किसी को एक बार पढ़ने पर याद होता है। मूर्ति पर पड़ा हुआ कपड़ा जिस तरह मूर्ति का ज्ञान नहीं होने देता वैसे ही ज्ञानावरण कर्म का कार्य है। दूसरों के गुणों को देखकर भीतर ही भीतर जलना, गुरु का नाम छिपाना, दूसरों के ज्ञान का आदर न करना, किताब कॉपी आदि फाड़ देना, पढ़ने वालों को बाधा उत्पन्न करना इत्यादि अनेक कारणों से ज्ञानावरणी कर्म का आस्त्रव-बंध होता है। दर्शनावरणी कर्म - जो कर्म ज्ञान के पूर्व होने वाले दर्शन को न होने दे तथा जिस कर्म के उदय से बहुत निद्रा आवे, गहन निद्रा आवे, कम निद्रा आवे उसे दर्शनावरण कर्म कहते हैं। द्वारपाल जैसे महल में प्रवेश ही नहीं करने देता है उसी प्रकार दर्शनावरणी कर्म भी पदार्थ का सामान्य अवलोकन (दर्शन) नहीं होने देता है। जिनवाणी का अनादर पूर्वक श्रवण करना, दर्शन आदि में बाधा पहुँचाना, बहुत देर तक सोना, दिन में सोना, आलस्य करना, इन्द्रिय की विपरीत प्रवृत्ति करना इत्यादि कारणों से दर्शनावरणी कर्म का आस्त्रव-बंध होता है। वेदनीय कर्म - जिस कर्म के उदय से सुख और दु:ख रूप वेदन हो, अनुभव हो, उसे वेदनीय कर्म कहते हैं। पीड़ा होने पर दु:ख तथा अच्छे भोग सामग्री मिलने पर सुख की अनुभूति होना वेदनीय कर्म का कार्य है। जैसे गुड़ की चाशनी लपटी तलवार को चाटने पर जीभ के कटने पर उसकी पीड़ा में दु:ख तथा गुड़ की मधुरता में सुख का अनुभव होता है। स्वयं रोना एवं दूसरों को रुलाना, मारना, पीटना, बाँधना, दूसरों की निन्दा, विश्वास घात इत्यादि कार्यों से असाता वेदनीय कर्म का बंध होता है। सभी प्राणियों पर अनुकम्पा, अर्हत् पूजा, दान, तपस्वी की वैयावृत्य करना, विनयशीलता आदि कायों से साता वेदनीय कम का बंध होता है। मोहनीय कर्म - जिस कर्म के उदय से जीव पदार्थों के यथार्थ स्वरूप को नहीं जान पाता उसे मोहनीय कर्म कहते हैं अथवा जिस कर्म के उदय से बुद्धि में भ्रम उत्पन्न होता है, गाफिलता हो उसे मोहनीय कर्म कहते हैं। शरीर को ही जीव (आत्मा) मानना, अपने से पृथक वस्तुओं को अपना मानना, संयम पालन में कष्ट मानना इत्यादि मान्यताएं मोहनीय कर्म के उदय से होती है। जैसे शराब पिया हुआ व्यक्ति कभी माँ को पत्नी कहता है तो कभी पत्नी को माँ कहता है, इस तरह का विपरीत परिणमन मोहनीय कर्म कराता है। सच्चे धर्म की निंदा करना, धार्मिक कार्यों में अन्तराय पहुँचाना, अत्यधिक कषाय करना, बहुत बोलना, बहुत हँसना इत्यादिक कार्यों से मोहनीय कर्म का आस्रव व बंध होता है। आयु कर्म - जिस कर्म के उदय से मनुष्यादि भवों में गतियों में रुकना होता है उसे आयु कर्म कहते हैं। जैसे दोनों पैरों में पड़ी हुई बेड़ी (सांकल) मनुष्य को स्वेच्छा से यहाँ-वहाँ नहीं जाने देती एक ही स्थान पर रोके रखती है। बहुत आरम्भ करने व बहुत परिग्रह रखने से नरक आयु का, मायाचारी करने से तिर्यच्च आयु का, अल्प आरंभ और परिग्रह से मनुष्य आयु का तथा सराग संयम, संयमासंयम रुप परिणामों से देव आयु का बंध होता है। नाम कर्म - जिस कर्म के उदय से अनेक प्रकार से शरीर की रचना होती है उसे नार्म कर्म कहते हैं। मोटा-पतला, काला-गोरा, सुरुप-कुरुप इत्यादि कार्य नाम कर्म के माने जाते हैं। जैसे चित्रकार अनेक प्रकार के चित्र बनाता है उनमें रंग भरता है इसी तरह का कार्य नाम कर्म का है। मन, वचन, काय की कुटिलता से अशुभ नाम कर्म का तथा मन, वचन काय की सरलता से शुभ नाम कर्म का बंध होता है | गोत्र कर्म - जिस कर्म के उदय से उच्च कुलों में अथवा नीच कुलों में जन्म होता है उसे गोत्र कर्म कहते हैं अथवा जिस कर्म के उदय से उच्च आचरण में व नीच आचरण में प्रवत्ति होती है उसे गोत्र कर्म कहते हैं। जैसे कुम्हार अनेक प्रकार के बड़े घड़े बनाता है उसी प्रकार गोत्र कर्म भी उच्च गोत्री व नीच गोत्री बनता है। दूसरों की निन्दा, अपनी प्रशंसा करने से जाति आदि का मद (घमंड) करने से नीच गोत्र का बंध होता है। आत्म निन्दा पर प्रशंसा, निरभिमानता, नम्र व्रती रखने से उच्च गोत्र का बंध होता है। अन्तराय कर्म - जिस कर्म के उदय से दाता और पात्र के बीच लेन-देन में वित्र उत्पन्न हो जाये उसे अंतराय कर्म कहते हैं अथवा वस्तु सामने होते हुए भी जिस कर्म के उदय से उसका ग्रहण, भोग, उपयोग न हो सके उसे अंतराय कर्म कहते हैं जैसे मुनिराज को आहार दान देना चाहे किन्तु मुनिराज के पड़गाहन का योग ही प्राप्त न हो, घर में मिठाई बनाई हो और बुखार हो जाये, मिठाई न खा सके इत्यादि अंतराय कर्म के कार्य है | इस क्रम को खजांची की उपमा दी है | प्राणियों की हिंसा करना, दूसरों की वस्तु चुरा लेना, दान आदि देने नहीं देना, निर्माल्य का ग्रहण करना इत्यादि कार्यों से अंतराय कर्म का बन्ध होता है। उपरोक्त कमों का बन्ध चार प्रकार का होता है १. प्रकृति बन्ध २. स्थिति बंध ३. प्रदेश बंध ४. अनुभाग बंध प्रकृति बन्ध - प्रकृति का अर्थ स्वभाव है, बंधे हुए कर्मों में अपने स्वभाव के अनुसार प्रकृति पड़ जाना प्रकृति बंध है जैसे ज्ञानावर्णी कर्म का प्रकृति बंध ज्ञान को न होने देने रूप। स्थिति बंध - बंधा हुआ कर्म कितने समय तक अपना फल देगा यह समय सीमा निर्धारण स्थिति बन्ध है, जेसे यह कर्म एक वर्ष तक अपना फल देगा । प्रदेश बन्ध - बन्धे हुए कर्म स्कंध में प्रदेशों की स्कंध संख्या प्रदेश बंध पर निर्भर करती है, जैसे अमुख कर्म में संख्यात अथवा असंख्यात प्रदेश हैं। अनुभाग बन्ध - बन्धे हुए कर्म में फल देने की शक्ति की होनाधिकता का निर्धारण अनुभाग बंध से होता है जैसे यह कर्म तीव्रता से उदय में आया अथवा मन्दता से यानि सिर दर्द बहुत तेज है अथवा हल्का-हल्का। एक उदाहरण के माध्यम से इन चारों बन्धों को समझे- बाजार से एक नींबू खरीदा, नींबू का स्वभाव खट्टा है, प्रकृति बन्ध का परिणाम | नीबूं एक माह तक खाने योग्य है - स्थिति बन्ध का परिणाम, नींबू बहुत खट्टा है - अनुभाग बन्ध का परिणाम, नीबू २०० पुदगल परमाणु से मिलकर बना है अथवा इसमें ८ कली हैं, प्रदेश बंध का परिणाम है। इस प्रकार शुभाशुभ कर्म के बंध को जानकर उनके बंध के कारण उनका फल जानकर विवेक पूर्वक कर्मों से बचने का छुटकारा पाने का उपाय ही कर्म सिद्धान्त को पढ़ने समझने का प्रयोजन है।
  23. 1 point
    महा महापुरुषों की संख्या प्रत्येक काल में ६३ ही होती है। जिनमें २४ तीर्थकर, १२ चक्रवर्ती, ९ बलदेव, ९ नारायण, ९ प्रतिनारायण होते हैं। तीर्थकरों के माता-पिता ४८ ९ नारद ११ रुद्र, २४ कामदेव तथा १४ कुलकर मिलाने से १६९ शलाका पुरुषा होते हैं। तीर्थकर :- तीर्थकर नामक विशेष पुण्य प्रकृति का जिनके उदय होता है, वे तीर्थकर कहलाते हैं। चक्रवर्ती :- एक आर्यखण्ड तथा पाँच म्लेच्छखण्ड इस प्रकार छह खण्डों का स्वामी ३२ हजार मुकुटबद्ध राजाओं का तेजस्वी अधिपति चक्रवर्ती हुआ करता है। वह १४ रत्न एवं ९ निधियों का मालिक होता है। चक्रवर्ती की ९६ हजार रानियाँ होती है। प्रतिदिन स्वादिष्ट भोजन बनाकर देने वाले ३६५ रसोईया होते हैं। चक्रवर्ती के वैभव स्वरूप- तीन करोड़ गौशालायें, एक करोड़ हल, एक करोड़ स्वर्ण थाल, ८४ लाख हाथी इतने ही रथ, १८ करोड घोड़े, ८४ करोड योद्धा एवं ४८ करोड़ पदाति होते हैं। १४ रत्न एवं ९ निधियाँ इस प्रकार है:- १ चक्र रत्न २. छत्त्र रत्न ३. खड्ग रत्न ४. दण्ड रत्न ५. काकिणी रत्न ६. मणि रत्न ७. चर्मरत्न ८. सेनापति रत्न ९. गृहपति रत्न १०. गज रत्न ११. अश्व रत्न १२. पुरोहित रत्न १३. स्थपित रत्न १४. युवति रत्न निधियों १- कालनिधि २– महाकाल ३– पाण्डु ४- मानव ५- शंख ६– पद्म ७– नैसर्प ८. पिंगल ९– नाना रत्न बलदेव - वे नारायण के भ्राता होते हैं और उनसे प्रगाढ़ स्नेह रखते हैं। ये अतुल पराक्रम के धनी, अतिशय रूपवान और यशस्वी होते हैं। इनकी ८ हजार रानियाँ होती हैं। तथा ये पाँच रत्नों के स्वामी होते हैं। वासुदेव (नारायण) - प्रतिवासुदेव (प्रतिनारायण) – ये दोनों समकालीन होते हैं। पूर्वभव में निदान सहित तपश्चरण कर स्वर्ग में देव होते हैं और वहाँ से च्युत होकर वासुदेव-प्रतिवासुदेव बनते हैं। दोनों अर्धचक्रवर्ती होते हैं। इनकी सोलह-सोलह हजार रानियाँ होती हैं। प्रतिनारायण (प्रतिवासुदेव) प्राय: विद्याधर होते हैं और नारायण (वासुदेव) भूमिगोचरी, इनका आपस में जन्मजात बैर होता है। इनमें किसी निमित्त से युद्ध होता है, जिसमें नारायण के द्वारा प्रतिनारायण मारा जाता है। ये दोनों निकट भव्य होते हैं, परन्तु अनुबद्ध बैर के कारण नरक में जाते हैं। नारद - ये नारायण -प्रतिनारायण के काल में होते हैं, ये अत्यन्त कौतूहली और कलहप्रिय होते हैं। नारायण और प्रतिनारायण को आपस में लड़ाने में इनकी प्रमुख भूमिका रहती है। ये ब्रह्मचारी होते हैं और इन्हें राजर्षि का सम्मान प्राप्त होता है। ये सारे राजभवन के बेरोकटोक आते जाते रहते हैं, ये निकट भव्य होते है, परन्तु कलहप्रियता के कारण नरक में जाते हैं। रुद्र - ये सभी अधर्मपूर्ण व्यापार में संलग्न होकर रौद्रकर्म किया करते हैं, इसलिये रुद्र कहलाते हैं। ये कुमारावस्था में जिनदीक्षा धारण कर कठोर तपस्या करते हैं। जिसके फलस्वरूप इन्हें अंगों का ज्ञान हो जाता है, किन्तु दशवें विद्यानुवाद पूर्व का अध्ययन करते समय विषयों के आधीन होकर पथभ्रष्ट हो जाते हैं। संयम और सम्यक्त्व से पतित होने के कारण सभी रुद्र नरकगामी ही होते है। तिलेायपण्णत्ति के अनुसार रुद्रों एवं नारदों की उत्पत्ति हुण्डावसर्पिणी काल में ही होती है। कामदेव - प्रत्येक कालचक्र के दुषमासुषमा काल में चौबीस कामदेव होते हैं। ये सभी अद्वितीय रूप और लावण्य के धनी होते हैं।
  24. 1 point
    परम श्रद्धेय गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के अनेक रूपों में दर्शन होते हैं जब प्रज्ञाचक्षु उन्हें किसी भी अवस्था में देखते हैं तो वे मुनि, आचार्य, उपाध्याय, निर्यापकाचार्य, अभीक्षणज्ञानोपयोगी, आगमनिष्ठ, श्रेष्ठचर्यापालक, साधना की कसौटी, श्रमणसंस्कृति उन्नायक, ध्यानयोगी, आत्मवेत्ता-आध्यात्मिक संत, निस्पृही साधु, दार्शनिक कवि, साहित्यकार, महाकवि, बहुभाषाविद्, भारतीय भाषाओं के पैरोकार, भारतीय संस्कृति के पुरोधा महापुरुष, युगदृष्टा, युगप्रवर्तक, राष्ट्रीय चिंतक, शिक्षाविद्, सर्वोदयी संत, नवपीढ़ी प्रणेता, अपराजेय साधक आदि के रूप में पाते हैं। सन् १९६८ अजमेर नगर (राज.) में महाकवि आचार्य ज्ञानसागर जी मुनिराज से दिगम्बर मुनि दीक्षा लेकर आज तक २८ मूलगुणात्मक कठोर व्रतों का पालन कर मुनित्व को सार्थक कर रहे हैं। २२ नवम्बर १९७२ को नसीराबाद (राज.) में आचार्य गुरुवर ज्ञानसागर जी मुनि महाराज ने आपकी योग्यता को देखते हुए अपना आचार्यपद देकर उन्हें ही अपना आचार्य बना लिया और स्वयं शिष्य बन गए। ऐसे महान् आचार्य आज तक ३६ मूलगुणों का पालन करते हुए १२o मुनि, १७२ आर्यिका (साध्वी), ५६ ऐलक (साधक), ६४ क्षुल्लक (साधक), ३ क्षुल्लिका (साध्वी) को दीक्षा देकर एवं ५00 से अधिक ब्रह्मचारीब्रह्मचारिणियों को साधना के सोपानों पर आरूढ़ कर आचार्यत्व से शोभायमान हो रहे हैं। सम्पूर्ण आगम के अध्येता एवं शिष्यों को सतत् अध्यापन कराते रहने के कारण उपाध्याय परमेष्ठी का सच्चा स्वरूप दर्शक आप में ही पाते हैं। सन् १ जून १९७३ नसीराबाद (राज.) में आपने अपने गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज की आगमयुक्त सल्लेखना समाधि के साथ-साथ मुनि श्री पार्श्वसागर जी की आकस्मिक समाधि कराई उसके बाद से आज तक 30 से अधिक मुमुक्षु साधकों ने आपके कुशल निर्यापकाचार्यत्व में I समाधि धारण कर मृत्यु महोत्सव मनाकर सिद्ध कर दिया कि सल्लेखना आत्मघात नहीं है। बचपन से ही सत्संग से जागृत ज्ञान की पिपासा आज तक अतृप्त है। यही कारण है कि आपको हमेशा सरस्वती की आराधना करते हुए देख विद्वत् वर्ग आप जैसे अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी से सम्यग्ज्ञान के प्रकाश की चाहत में सतत् आपकी सत्संगति करते हुए देखे जाते हैं। आप सतत् आगम स्वाध्याय से आत्मशोधन करते हुए निजज्ञान, विचार, चिंतन, मनन, लेखन से अपने आप को परिष्कृत करते रहते हैं। यही कारण है कि पाठक-शोधार्थी आपके विचार साहित्य को आगमनिष्ठ पाकर संतुष्ट होते हैं। जैनागम अध्येता आपकी हर क्रिया में मुनिचर्या का संविधान मूलाचार को इस कलिकाल में भी चरितार्थ होते हुए पाता है। यही कारण है कि आज आपको श्रमणत्व की कसौटी के रूप में पाकर श्रमण अनुयायी जयकारा बुलन्द करते हैं। हमारा गुरु कैसा हो-विद्यासागर जैसा हो, दिगम्बर मुनि देख लो-त्याग करना सीख लो, माँ का लाल कैसा हो विद्यासागर जैसा हो। सही मायने में आप श्रमण संस्कृति उन्नायक हैं। आप से श्रमण-मुनियों ने आगमयुक्त चर्या को पालने में उत्साह, साहस, साधना, प्रेरणा को पाया है। जैन श्रमण-मुनि के स्वरूप कथन करते हुए प्राचीन आचार्यों ने लिखा है- "ज्ञानध्यानतपोरत्नस्तपस्वि स प्रशस्यते।” उपरोक्त सूत्र को आज आपमें जीवंत होते हुए देखा जा रहा है। यथा-सन् १९६८-६९ अजमेर में, १९७३ ब्यावर में, १९७४ अजमेर एवं भीलवाड़ा में चातुर्मास के दौरान कई बार १२घण्टे, २४ घण्टे, २८ घण्टे, ३६घण्टे, ४४घण्टे, ७२ घण्टे तक समाज ने आपको ध्यानयोग में लीन देखा है। तब से आप ध्यानयोगी की पहचान बन गए हैं। बचपन के परमात्म ध्यानी आप आज अरिहंतों का अनुशरणकर्ता बन आत्मवेत्ता आध्यात्मिक संत शिरोमणि के रूप में प्रख्यात हैं। आप शरीर से इतने निस्पृह रहते हैं कि सर्दी-गर्मी हो या हजारों किलोमीटर की पदयात्रा, कीड़े-मकोडों का उपसर्ग हो या रोगादि परिषह हों। हर स्थिति में आत्मस्थ बने रहते हैं। स्वयं किसी भी प्रकार का प्रतिकार न तो करते और न ही करवाते एवं न ही शरीर की पुष्टता के लिए स्वादिष्ट रस नमकमीठा, फल-मेवे ग्रहण करते हैं। आप आचार्यत्व के धनी होने के साथ-साथ एक प्रतिभावान दार्शनिक कविहृदय संत भी हैं। आपके ४ हिन्दी कवितासंग्रह एवं १२ हिन्दी शतक, ६ संस्कृत शतक, सहस्राधिक जापानी काव्य शैली में हिन्दी भाषा की हाईकू की रचना प्रकाशित हो चुकी है। आपके साहित्य पर डॉक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त साहित्यविदों ने आपको उच्चकोटि के साहित्यकार के रूप में स्थापित किया है। आपने हिन्दी भाषा में 'मूकमाटी' महाकाव्य की रचना कर महाकाव्य की परिमित परिभाषा को पुनर्समीक्ष्य पटल पर ला खड़ा किया है। आपने न केवल हिन्दी भाषा में रचनाएँ की हैं अपितु संस्कृत, प्राकृत, कन्नड़, बंगला, अंग्रेजी भाषा में भी काव्य सृजन किया है। इसके साथ ही आप मराठी एवं अपभ्रंश भाषाविद् भी हैं। बहु भाषाओं से सम्पृक्त आपकी प्रज्ञा ने भारतीय भाषाओं के संरक्षण की वैचारिक क्रान्ति पैदा की हैं। आज आप भारतीय भाषाओं में शिक्षा के पैरोकार बन गए हैं। आज आप भारतीय सांस्कृतिक जीवन मूल्यों के पतन को देखते हुए संरक्षणात्मक संवाद का बिगुल बजा रहे हैं, यही कारण है कि आप जनमानस के बीच भारतीय संस्कृति के पुरोधा महापुरुष के रूप में आदरणीय बन गए हैं। भारतीय जीवन पद्धति को कुचलने के लिए आज शिक्षा में विदेशी भाषा को आधार बना दिया गया है। इस कुचक्र के कुचाल को भाँपकर युगदृष्टा, युगप्रवर्तक आपश्री के द्वारा राष्ट्रहित में युगांतरकारी मशाल को पुन: प्रज्ज्वलित किया गया है। यथा- राष्ट्रीय भाषा ‘हिन्दी' हो, देश का नाम 'इण्डिया' नहीं ‘भारत' हो, भारत में भारतीय शिक्षा पद्धति लागू हो, अंग्रेजी में नहीं, भारतीय भाषा में सरकारी एवं न्यायिक कार्य हो छात्र-छात्राओं की शिक्षा पृथक्-पृथक् हो, भारतीय प्रतिभाओं का पलायन रोका जाए शत-प्रतिशत मतदान हो शिक्षा के क्षेत्र में योग्यता की रक्षा हो। इसके साथ ही आपने अपने शैक्षणिक विचारों को मूर्तरूप प्रदान करते हुए प्रेरित किया, फलस्वरूप बालिका शिक्षा के तीन शिक्षायतन प्रतिभास्थली के नाम से जबलपुर (म.प्र.), डोंगरगढ़ (छ.ग.), रामटेक (महा.) में स्थापित हुए। जो आपके द्वारा प्रदत्त शिक्षा के उद्देश्य-स्वस्थ तन, स्वस्थ मन, स्वस्थ वचन, स्वस्थ चतन, स्वस्थ वेतन, स्वस्थ वतन, स्वस्थ चिंतन आदि विचारों के संस्कार प्रदान कर रहे हैं। यही कारण है कि आप एक महान शिक्षाशास्त्री के रूप में शोधार्थियों के शोध के विषय बन गए हैं। आप करुणाहृदयी, दयालु, देशप्रेमी संत हैं, देश में बढ़ती बेरोजगारी एवं विदेशी परावलंबता को सुनकर गाँधी जी के विचारों का समर्थन करते हैं और सबको रोजगार मिले एवं देश स्वावलंबी बने इस दिशा में अहिंसक रोजगार की प्रेरणा देते हैं। आप उद्घोषणा करते हैं नौकरी नहीं, व्यवसाय करो, चिकित्सा व्यवसाय नहीं, सेवा है, अहिंसक कुटीर उद्योग संवर्धित करो, बैंकों के भ्रमजाल से बचो और बचाओ, खेतीबाड़ी देश का अर्थतंत्र है-ऋषि बनो या कृषि करो, खादी अहिंसक है और हथकरघा रोजगार को बढ़ाता है, पर्यावरण की रक्षा करता है तथा स्वावलम्बी बनने का सोपान है मांस निर्यात, कुकुट पालन, मछली पालन कृषि नहीं है, इसे कृषि बताना छल है, गौशालाएँ जीवित कारखाना हैं। आपके इन सर्वोदयी विचारों ने आपको सर्वोदयी संत के रूप में पहचान दी है। नवपीड़ी के लिए आप सशक्त प्रणेता के रूप में विचार प्रकट करते हैं। आपके सर्वोदयी राष्ट्रीय चिंतन से नवयुवा उत्साह, ऊर्जा, दिशाबोध पाकर निजजीवन को परोपकार में लगा रहे हैं। ऐसे अपराजेय साधक महामना के स्वर्णिम विचारों को संकलित कर राष्ट्रहित में राष्ट्रीय हाथों में "सर्वोदयी संत की राष्ट्रीय देशना” समर्पित करते हुए हर्ष हो रहा है। – क्षुल्लक धैर्यसागर
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    अज्ञान विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार स्वर्ण कभी भी बाह्य पदार्थ के सम्पर्क में जंग नहीं खाता बल्कि लोहा ही जंग खाता है, वैसे ही ज्ञानी कभी पर पदार्थों से मोहित नहीं होता, बल्कि अज्ञानी होता है। विषयों में आकर्षण 'अज्ञान' का प्रतीक है। अज्ञान का अर्थ है - कषाय के वशीभूत हो जाना, परिग्रह के पीछे पड़ जाना। जब सूर्य अस्ताचल की ओर जाता है तो वह प्रकाश का त्याग कर पाताल में डूब जाता है, फिर अंधकार का साम्राज्य हो जाता है। वैसे ही जो संयम की उपेक्षा कर असंयम का स्वागत करता है, वह रसातल की ओर चला जाता है, उसका ज्ञान 'अज्ञान' रूप हो जाता है। विपरीत धारणा को छोड़ देने से मन हल्का हो जाता है। मन दूसरे को समझाना चाहता है, स्वयं को नहीं यह एक सबसे बड़ा अज्ञान है।
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