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राजेश जैन भिलाई

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    भिलाई छतीसगढ़

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  1. मूकमाटी को कई बार पढ़ा लेकिन पूज्यवर गुरुदेव के मुख से यह महाकाव्य सुन कर मन अल्ल्हादित हो जाता है यह दुर्लभ संकलन सभी तक परोसने हेतु सविनय आभार
  2. माँ आर्यिका रत्न १०५ पूर्णमति माताजी द्वारा रचित भजनों कि श्रंखला के भजन को सुन मन आनन्दित हो झूम उठता है इन भजनों के शब्दों भावो और उच्च स्तरीय संगीत सुनकर पैर अपने आप थिरक उठते है आप सभी एक बार अवश्य सुने.
  3. हमारे पहनावे हमारे भोजन बेकार साहित्य का हमारे जीवन पर प्रभाव पड़ता है मैंने आचार्यश्री के प्रवचन सुने मन आनन्दित हो गया मेरा निजी आग्रह है किएक बार जरुर सुने अन्यथा आप आचार्यश्री के विशाल चिंतन से वंचित रहेगे
  4. छोटे बाबा बड़े बाबा से ज्यादा दिन दूर नही रह पाते शायद इसी लिए बड़े बाबा कि ओर ही विहार करेंगे
  5. कुछ "बड़ा " होने की सुगबुगाहट या फिर अटकलें....... विगत दिनों हमारे यहां पुलवामा में हुई अमानवीय आतंकी घटना की प्रतिक्रिया की आशंकाओं को देखते हुए विश्व की नज़र भारत की ओर लगी है शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के मुखिया ट्रम्प भी कह चुके कि कुछ बड़ा होने जा रहा है। इन दिनों सुख चैन सरिता तट पर अवस्थित अतिशयक्षेत्र बीना बारह में श्रमणोत्तम आचार्यश्री ससंघ विराजित है कुछ दिनों से इसी दिशा में पूज्यवर मुनिराजों सहित वन्दनीया आर्यिका संघो के सतत अनवरत सरितावत प्रवाहमान विहार आगामी दिनों में इस अतिशय क्षेत्र में महाकुम्भ का संकेत दे रहे है। देश विदेशों के जैन समाज के बुजुर्गों से लेकर किशोरों तक और पढ़ी लिखी उच्चशिक्षित बिटिया लोगो से लेकर अनपढ़ या कम पढ़ी लिखी लेकिन अनुभवी माँ लोगो मे सुबह सन्ध्या एक ही चर्चा है कि आगामी इस महाकुम्भ में कुछ बड़ा होने जा रहा है। एक ओर बहुसंख्यक वर्ग का मानना है कि बरसों से प्रतीक्षित दीक्षा के प्रत्याशियों को शुभ सूचना मिल सकती है और इस गुरुकुल और विशाल आकार ले सकता है। वही दूसरी ओर कुछ लोग दबी जुबान से कहते पाए जा रहे है कि इन दिनों आचार्य प्रवर क्षमा, संयम, तपस्या के अस्त्र शस्त्र के संग बचे हुए कर्म सैन्यबल को नेस्तनाबूद करने की ठान चुके है सो सम्भव है कि कुछ उपसंघो को निर्यापक जिम्मेदारी मिल जाये। अब ये तो बाते है और बाते तो बातों ही बातों में बनती रहती है इन बातों का क्या ठिकाना इन ज्ञानविद्या के विशाल प्रशांत महासिंधु की थाह कोई जान पाया है सुनते है कि इन दिनों अमरकंटक की मुडेरों में कौओं की टोलियों की कांव कांव बढ़ने लगी है सो छतीसगढ़ भी इसी आशा में हर्षित है कि हमारे यहां भी अच्छे दिन...... आ सकते है। ◆ राजेश जैन भिलाई ◆ 🌈🌈🌈🏳‍🌈🏳‍🌈🌈🌈🌈
  6. वज्र पाषाण हृदयी, निर्मोही, निर्दयी, निष्ठुर, निर्मम, आचार्यश्री...... प्राणिमात्र के हितंकर, दयावन्त, श्रमणेश्वर,साक्षात समयसार, मूलाचार के प्रतिबिम्ब समस्त चर ,अचरो के प्रति आपकी दया, करुणा, हम मानवों में ही नही स्वर्गों के इंद्रो देवताओं में भी जगजाहिर है आप अनुकम्पा के विशाल महासागर अथवा चारित्र के उत्तुंग हिमालय जाने जाते हो ऐसे में उपरोक्त शीर्षक में आपके प्रति कठोर सम्बोधन लिखते समय मेरी उंगलियां कांप रही है लेकिन मैं क्या करूं जो है, सो है...... मेरे आपके हम सबके सामने है। भला कभी ऐसा होता है क्या..... जो पूज्यवर, यतिवर, गुरुदेव अपने दिव्यदेह के प्रति कर रहे है...... अक्सर कहा जाता है कि जो अपने प्रति सहयोग करे उसका ध्यान रखना चाहिये अपने अनुचर, सहयोगी, उपकारी पर भी करुणा करना चाहिए लेकिन पिछले इक्यावन वर्षो से आचार्यश्री अपनी दिव्यदेह के प्रति ज़रा से भी करुणावान, दयालु नही दिखते चाहे ग्रीष्मकाल में सूरजदादा 48 डिग्री तापमान पर भी कीर्तिमान गढ़ने ततपर हो वह आपके सामने पानी पानी हो जाता है | लेकिन आप अपने करपात्र में दूध, फल, मेवा तो बड़ी दूर की बात, कुछ ही अंजुली जल और कुछ गिने नीरस ग्रास का आहार उदर तल तक तो दूर कंठ से उदर तक ही नही पहुचता और आपके आहार सम्पन्न हो जाते है। शीतकालीन तुषारी ठंड में भी आप अपनी दिव्यदेह को 3 से चार घण्टे विश्राम करने निष्ठुर पाटा ही देते हो। हम सभी पथरीले, हठीले, कटीले तपते विहार पथ में आपके कोमल कोमल लाल लाल, मृदुल पावन चरणयुगलो को छालों युक्त, रक्तरंजित देख चुके है और आप ऐसे निर्दयी है कि उनकी ओर नज़र तक नही उठाते और आज हम सबने देख और सुन भी लिया कि पिछले दिनों से आपकी दिव्यदेह जर्जर हो चुकी है सप्ताह हो चुके दिव्यदेह के अस्वस्थ हुए और आपके निराहार के लेकिन आप तो ठहरे निर्मोही, अनियतविहारी, वीतरागी महासन्त आपको भला कोई रोक पाया है और वह बेचारा रोकने का विचार ही कैसे कर सकता है...... क्योंकि इन दिव्यदेहधारी ने अपनी दिव्यदेह के माता पिता भैया बहनों की नही मानी तो फिर हम दूसरों की क्या बिसात.... हमने माना कि चौथेकाल में ऐसे ही श्रमण होते थे उस काल मे वज्र सहनन क्षमता भी होती थी लेकिन इस महा पंचमकाल में जर्जर, वार्धक्य, दिव्यदेह के संग आपकी यह साधना, तपस्या सन्देश दे रही है कि कुछ ही भवों में दिव्यदेह धारी आचार्यश्री तीर्थंकर बन समोशरण में विराजित होंगे ऐसे कालजयी महासन्त के पावन चरणयुगलो में हृदय, आत्मा की असीम गहराइयों से कोटि कोटि नमोस्तु....... हे गुरुदेव! मेरी भी सुबुद्धि जागे काश..... मैं भी आपके समोशरण बैठ अपना भी कल्याण कर सकू..... क्षमाभावी एक नन्हा सा गुरुचरण भक्त..... राजेश जैन भिलाई
  7. कठिन परीक्षा और मोक्षपथ के कठोर परीक्षक...….. कड़कड़ाती, कम्पकपाती, सुई सी चुभोने वाली तुषार सी बर्फीली हवाओ की सहेली महारानी "ठंड" महादेवी जो हिमालय से उतर कर कुछ गिने चुने दिनो के लिए अपने मायके उत्तर भारत में आई है आरम्भ के कुछ दिनों में तो बड़ी संस्कारी आज्ञाकारी नई बहु सी लगती है लेकिन कुछ ही दिनों में अपने तेवर दिखाते दुर्दान्त आतंकवादी सी लगने लगती है यहां तक इसके रौब ख़ौफ़ देख बेचारे सूरजदादा भी से डरे सहमे से एक कोने में दुबके रहते है। कल जब आधी रात में मेरी नींद खुली तो.…. दोहरे तिहरे कम्बलों की परतों से झांकते हुए.... डरते डरते मैंने ठंड से कहा हे माते! तू तो महीने भर से देश मे बढ़ती, महंगाई, आतंकवाद भ्रष्टाचार सी पसर कर बैठ ही गई। तूने कभी विचार किया कि इस समय यथाजात दिगम्बराचार्य,आचार्यश्री लकड़ी के निष्ठुर पाटे पर अपनी आत्मा में लीन साधनारत विराजित है और तू अनुशासनहीन गुरुभक्त की तरह बिना अनुमति लिए बिना कपाट खटखटाए, खिड़की दरवाजो के छिद्रों से चोरों की तरह कक्ष में घुस जाती हो ऐसा पाप क्यो करती हो तुम उनके पास जाती ही क्यो??????.......। मुझ पर तेज हवा के तीर फेकते हुये ठंड ने आंखे तरेरते हुए कहा हे! "कम बल " वाले "कंबल " के दास अरे बावले ! तुम क्या जानो....मैं तो सिर्फ उनके दुर्लभ दिव्य दर्शन करने आती हूँ..... मेरी परदादी परनानी बताया करती थी कि चौथे काल मे दिगम्बर मुनिराज कैसी तपस्या करते थे ऐसे चौथेकाल के ऋषिराज की तरह साक्षात आचर्यश्री के दिव्य दर्शन कर आंखे, मन, हृदय अतृप्त ही रहता है.... मैं तो ठगी ठगी सी वहीं ठहर जाती हूँ उनके दिव्य अतिशयकारी आभामंडल के समीप पहुच कर मेरा जीवन धन्य हो जाता है उनकी साधना तपस्या, कठोर परीक्षक की कठिन परीक्षा देख मैं खुद कांप जाती हूं। और सुन! जब आचार्यश्री आत्मगुफ़ा में तपस्या साधना करने वाले आचार्यश्रेष्ठ जब बाहर आते है तब मुझ पर मोहक मुस्कानों से युक्त आशीषों की ऐसी वर्षा कर देते है मानो मैं उनके चरणों की शिष्या होऊ.....। मैं तो उनके पावन पुनीत चरणों मे लज्जित सी सिर झुकाए बैठी रहती हूँ ऐसे दुर्लभ गुरुचरणों से वापस दूर जाने का मन ही नही करता भला कुछ दिनों के लिए पीहर आई बेटी अपने जगतपिता से इतनी जल्दी दूर कैसे जा सकती है। और सुन तुम जैसे डरपोक भक्तो को डरा कर मुझे बड़ा ही आनन्द आता है। भयानक सी ठंड भरी आधी रात में मुझे डराती कम्पाती वह देवी कब वापस लौट गई पता ही न चला सुबह सुबह बंद आंख नाक गले ने छीकते हुए शिकायत की और कहा ..... मालक इन ठंड देवी से पंगा आप लेते हो भुगतना हमे पड़ता है.... भावाभिव्यक्ति ◆ राजेश जैन भिलाई ◆ विनम्र अनुरोध : कभी मध्यरात्रि में नींद खुल जाए तो हम आप ऐसे चरणों को साक्षात मान नमोस्तु अवश्य करें🙏🏻 🌈🌈🌈🏳‍🌈🏳‍🌈🌈🌈🌈🌈
  8. आज जब मै पूज्यवर गुरुदेव के स्वावलम्बन एवम आत्मनिर्भरता के चिंतन पर आधारित हथकरघा पर विचार करता हूँ तब लगता है कि हथकरघा के बारे में इतना सब कुछ तो वे बचपन से जानते समझते थे जितना हम आज भी नही जान पाते मेरा सभी से आग्रह अनुरोध निवेदन है कि एक बार इस ग्रन्थ का स्वाध्याय अवश्य करे
  9. खजुराहो में आयोजित सयम स्वर्णजयंती आयोजन में आचार्य विद्यासागर डॉट गुरु की पूरी टीम सहित टीम के सक्रिय सदस्य भाई सौरभ जैन को भी आचार्यश्री के समक्ष मंच पर आमंत्रित किया गया था लेकिन शायद वे संकोच वश मंच पर नही आये थे
  10. आचार्यश्री एयरपोर्ट सिर्फ देखने नही गए थे उन्होंने इस विषय पर विशाल चिन्तन किया होगा सम्भव है आने वाले दिनों के प्रवचन में इसका उल्लेख हो उनके विशाल विस्तृत चिन्तन को कोटि कोटि नमन
    भाई सौरभ जी एवम उनकी समस्त टीम के इस परिश्रम युक्त कार्य की अनुमोदन एवम बधाईयाँ आपका यह प्रयास देश विदेश के गुरुभक्तो को अनमोल उपहार प्रदान कर रहा है
  11. आचार्यश्री का चिन्तन बहुत ही विराट, विशाल, विस्तृत है उनके चिन्तन को शब्दों में बाँध पाना किसी के बीएस की बात नही
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