Jump to content
आचार्य विद्यासागर स्वाध्याय नेटवर्क से जुड़ने के लिए +918769567080 इस नंबर पर व्हाट्सएप करें Read more... ×

नवीनतम गतिविधि

This stream auto-updates     

  1. Yesterday
  2. इस स्तुत्य कार्य को गुरु सामीप्य प्रदान कर जहाँ इन स्वर्णिम अध्याय वाले वंशजो को पूज्य श्री का मंगल आशीष मिला, वही हम जेनो का परिचय महान क्रांतिकारियों के वंशजो सेे हुुुआ। कार्यक्रम के सर्जक बधाई के पात्र हैं।
  3. *शरद पूर्णिमा पर विशेष* *आचार्य श्री विद्यासागर जी* *तपस्या में सर्वश्रेष्ठ है* भारत भूमि के प्रखर तपस्वी, चिंतक, कठोर साधक, गौरक्षक, लेखक, महाकवि, राष्ट्रहित चिंतक आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज का आज अवतरण दिवस है आपका जन्म कर्नाटक के बेलगाँम (सदलगा) जिले के ग्राम चिक्कोड़ी में आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा), दिनाँक 10 अक्टूबर 1946, विक्रम संवत्‌ २००३ को हुआ था। आपका पूर्व का नाम विद्याधर था। आपको आचार्य श्रेष्ठ महाकवि ज्ञानसागरजी महाराज का शिष्यत्व पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। विद्यासागरजी में अपने शिष्यों का संवर्धन करने का अभूतपूर्व सामर्थ्य है। उनका बाह्य व्यक्तित्व सरल, सहज, मनोरम है किंतु अंतरंग तपस्या में वे वज्र से कठोर साधक हैं। रात्रि में लकड़ी के पाटे पर विश्राम करते है और ठंड में भी रात्रि में कुछ भी नही ओढ़ते है। कन्नड़ भाषी होते हुए भी विद्यासागरजी ने हिन्दी, संस्कृत, कन्नड़, प्राकृत, बंगला और अँग्रेजी में लेखन किया है। आपने अनेक ग्रंथो का स्वयं ही पद्यानुवाद किया है। आपके द्वारा रचित संसार में सर्वाधिक चर्चित, काव्य प्रतिभा की चरम प्रस्तुति है- ‘मूकमाटी’ महाकाव्य जिसके ऊपर मूकमाटी मीमांसा (भाग 1 2 3) लगभग 283 हिंदी विद्वानों ने समीक्षाएं लिखी है जो भारतीय ज्ञान पीठ से प्रकाशित हो चुकी है इस पर 4 डी. लिट्. 50 पी. एच्. डी. 8एम . फिल. 2 एम. एड. तथा 6 एम. ए. आदि हो चुके है मूक माटी का मराठी, अंग्रेजी, बंगला, कन्नड़, गुजराती, उर्दू , संस्कृत ब्राम्ही लिपि आदि में अनुवाद हुए हैं और हो रहे हैं। राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी के द्वारा रामटेक में 22 सितंबर 2017 को मूक माटी के उर्दू अनुवाद का विमोचन हुआ था पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल जी के द्वारा 14 जून 2012 को राष्ट्रपति भवन में 'द साइलेंट अर्थ' मूक माटी के अंग्रेजी अनुवाद का विमोचन हुआ था। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा भोपाल में मूक माटी के 14 अक्टूबर 2016 को भोपाल में गुजराती अनुवाद का विमोचन हुआ था। आचार्य श्री का साहित्य अनेक विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हो चुका है कई जगह प्रक्रिया चल रही है जबलपुर अजमेर ट्रेन का नाम *दयोदय एक्सप्रेस* आपके गुरु की रचित कृति के नाम पर हुआ था। *भाग्योदय तीर्थ सागर* में मानव सेवा एवं शिक्षा फार्मेसी कॉलेज नर्सिंग कॉलेज चल रहे है। बीना बारह, मंडला, भोपाल , कुंडलपुर, खजुराहो, मुम्बई, अशोकनगर, जगदलपुर, डिंडोरी में *हथकरघा* चल रहे है। जिसमें अहिंसक पद्धति से वस्त्र बनाए जा रहे हैं और युवाओं को रोजगार दिया जा रहा है और शांति धारा दुग्ध योजना चल रही है जिसमें 500 से अधिक गायों का पालन करके दूध घी आदि शुद्ध वस्तुओं का उत्पादन हो रहा है जैविक पद्धति से सभी वस्तुओं का उत्पादन होता है आचार्य श्री विद्यासागर शोध संस्थान भोपाल में विभिन्न पदों के लिए कोचिंग मिलती है भारतवर्षीय प्रशासकीय प्रशिक्षण संस्थान जबलपुर में स्थित है जिसमे हजारो युवाओ ने शिक्षण करके प्रसाशन के उच्च पदों को प्राप्त किया है । सुप्रीम कोर्ट से 7 जजों की बेंच से ऐतिहासिक गौ वध पर प्रतिबंध का फैसला हुआ था बैलों की रक्षा एवं रोजगार हेतु दयोदय जहाज का गंज बासौदा विदिशा में वितरण किया गया था मध्य प्रदेश में सरकार द्वारा *आचार्य विद्यासागर जी गौ संवर्धन योजना* भी चल रही है पूरे देश में लगभग 135 गौशालाओ में लाखों पशुओं का संरक्षण हो रहा है आपके दर्शन से पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी बाजपेई वर्तमान राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी और अनेक मुख्यमंत्री और अनेकों राज्यपाल सुप्रीम कोर्ट के जज, हाई कोर्ट के जज, आयोग अध्यक्ष एवं विशिष्ट पदों वाले व्यक्तियों से चर्चा के दौरान अनेक अच्छे कार्य हुए हैं आपके दर्शनार्थ हेतु आये राजनैतिक, चिंतक, विचारक, साहित्यकार, शिक्षाविद, न्यायधीश, धर्माचार्य, डॉक्टर, संपादक, समाज सेवी, उद्योगपति, अधिवक्ता, जिलाधीश, पुलिस अधीक्षक, कुलपति आदि ने मार्गदर्शन प्राप्त किया है। आपने मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड आदि में बिहार किया है आपने नमक मीठा का सन 1969 से त्याग किया है। चिटाई का त्याग सन 1985 से किया है। वनस्पति फल सब्जी का त्याग 1994 से किया है। 9 निर्जल उपवास लगातार आपने किए थे। आपके द्वारा रूपक कथा काव्य, अध्यात्म, दर्शन व युग चेतना का संगम है। संस्कृति, जन और भूमि की महत्ता को स्थापित करते हुए आचार्यश्री ने इस महाकाव्य के माध्यम से राष्ट्रीय अस्मिता को पुनर्जीवित किया है। उनकी रचनाएँ मात्र कृतियाँ ही नहीं हैं, वे तो अकृत्रिम चैत्यालय हैं। उनके उपदेश, प्रवचन, प्रेरणा और आशीर्वाद से अनेको तीर्थ, मंदिर का निर्माण औषधालय भाग्योदय तीर्थ, अनेको अस्पताल, प्रतिभास्थली, हथकरघा, त्रिकाल चौबीसी आदि की स्थापना कई स्थानों पर हुई है और अनेक जगहों पर निर्माण जारी है। कितने ही विकलांग शिविरों में कृत्रिम अंग, श्रवण यंत्र, बैसाखियाँ, तीन पहिए की साइकलें वितरित की गई हैं। शिविरों के माध्यम से आँख के ऑपरेशन, दवाइयों, चश्मों का निःशुल्क वितरण हुआ है। ‘सर्वोदय तीर्थ’ अमरकंटक में विकलांग निःशुल्क सहायता केंद्र चल रहा है। जीव व पशु दया की भावना से देश के विभिन्न राज्यों में दयोदय गौशालाएँ स्थापित हुई हैं, जहाँ कत्लखाने जा रहे हजारों पशुओं को लाकर संरक्षण दिया जा रहा है। आचार्यजी की भावना है कि पशु मांस निर्यात निरोध का जनजागरण अभियान किसी दल, मजहब या समाज तक सीमित न रहे अपितु इसमें सभी राजनीतिक दल, समाज, धर्माचार्य और व्यक्तियों की सामूहिक भागीदारी रहे। ‘जिन’ उपासना की ओर उन्मुख विद्यासागरजी महाराज तो सांसारिक आडंबरों से विरक्त हैं। जहाँ वे विराजते हैं, वहाँ तथा जहाँ उनके शिष्य होते हैं, वहाँ भी उनका जन्म दिवस उनके समर्थन से नहीं मनाया जाता। तपस्या उनकी जीवन पद्धति, अध्यात्म उनका साध्य, विश्व मंगल उनकी पुनीत कामना तथा सम्यक दृष्टि एवं संयम उनका संदेश है। अपनेंवचनामृतों से जनकल्याण में निरत रहते हुए व साधना की उच्चतर सीढ़ियों पर आरोहण करते हुए आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज समग्र देश में पद-विहार करते हैं। भारत-भूमि का कण-कण तपस्वियों की पदरज से पुनीत हो चुका है। इस युग के तपस्वियों की परंपरा में आचार्यश्री विद्यासागरजी अग्रगण्य हैं। वीतराग परमात्मा बनने के मार्ग पर चलने वाले इस पथिक का प्रत्येक क्षण जागरूक व आध्यात्मिक आनंद से भरपूर होता है। उनका जीवन विविध आयामी है। उनके विशाल व विराट व्यक्तित्व के अनेक पक्ष हैं तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष उनकी कर्मस्थली है। पदयात्राएँ करते हुए उन्होंने अनेक मांगलिक संस्थाओं, विद्या केन्द्रों के लिए प्रेरणा व प्रोत्साहन का संचार किया है। उनके आगमन से त्याग, तपस्या व धर्म का सुगंधित समीर प्रवाहित होने लगता है। लोगों में नई प्रेरणा व नए उल्लास का संचरण हो जाता है। असाधारण व्यक्तित्व, कोमल, मधुर और ओजस्वी वाणी व प्रबल आध्यात्मिक शक्ति के कारण सभी वर्ग के लोग आपकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। कठोर तपस्वी, दिगम्बर मुद्रा, अनन्त करुणामय हृदय, निर्मल अनाग्रही दृष्टि, तीक्ष्ण मेधा व स्पष्ट वक्ता के रूप में उनके अनुपम व्यक्तित्व के समक्ष व्यक्ति स्वयं नतशिर हो जाते हैं। अल्पवय में ही इनकी आध्यात्मिक अभिरुचि परिलक्षित होने लगी थी। खेलने की उम्र में भी वीतरागी साधुओं की संगति इन्हें प्रिय थी। मानो मुनि दीक्षा के लिए मनोभूमि तैयार हो रही थी। ज्ञानावरणीय कर्म का प्रबल क्षयोपशम था, संयम के प्रति अंत:प्रेरणा तीव्र थी। आचार्यश्री की प्रेरणा से उनके परिवार के छः सदस्यों ने भी जैन साधु के योग्य संन्यास ग्रहण किया। उनके माता-पिता के अतिरिक्त दो छोटी बहनों व दो छोटे भाइयों ने भी आर्यिका एवं मुनिदीक्षा धारण की। आचार्यश्री विद्यासागरजी का बाह्य व्यक्तित्व भी उतना ही मनोरम है, जितना अंतरंग, तपस्या में वे वज्र से कठोर हैं, पर उनके मुक्त हास्य और सौम्य मुखमुद्रा से कुसुम की कोमलता झलकती है। वे आचार्य कुन्दकुन्द और समन्तभद्र की परम्परा को आगे ले जाने वाले आचार्य हैं तथा यशोलिप्सा से अलिप्त व शोर-शराबे से कोसों दूर रहते हैं। शहरों से दूर तीर्थों में एकान्त स्थलों पर चातुर्मास करते हैं। खजुराहो में लगभग 2000 विदेशियो ने मांसाहार, शराब आदि का त्याग किया । आयोजन व आडम्बर से दूर रहने के कारण प्रस्थान की दिशा व समय की घोषणा भी नहीं करते हैं। वे अपने दीक्षार्थी शिष्यों को भी पूर्व घोषणा के बिना ही दीक्षा हेतु तैयार करते हैं। हाथी, घोड़े, पालकी व बैण्ड-बाजों की चकाचौंध से अलग सादे समारोह में दीक्षा का आयोजन करते हैं। इस युग में ऐसे संतों के दर्शन अलभ्य-लाभ है। आचार्यश्री जैसे तपोनिष्ठ व दृढ़संयमी हैं, वैसी ही उनकी शिष्यमण्डली भी है। धर्म के पथ पर उग आई दूब को उखाड़ फेंकने में यह शिष्य-मंडली अवश्य समर्थ होगी। केवल कथनी में धर्मामृत की वर्षा करने वालों की भीड़ के कारण धर्म के क्षेत्र में दुःस्थिति बनी हुई है। आचार्यश्री विद्यासागरजी जैसे संत इस दुःस्थिति में आशा की किरण जगाते हैं। वह अपने बाल भी प्रत्येक 2 माह में अपने हाथों से निकालते है एवं 24 घंटे में एक बार भोजन एवं जल ग्रहण करते है। योगी, साधक, चिन्तक, आचार्य, दार्शनिक आदि विविध रूपों में उनका एक रूप कवि भी है। उनकी जन्मजात काव्य प्रतिभा में निखार संभवतः उनके गुरुवर ज्ञानसागरजी की प्रेरणा से आया है। आपका संस्कृत पर वर्चस्व है ही, शिक्षा कन्नड़ भाषा में होते हुए भी आपका हिन्दी पर असाधारण अधिकार है। आपने हिंदी भाषा अभियान के लिए अपना समर्थन दिया है हिंदी भाषा , मातृभाषा को हम भूले नही और इंडिया नही भारत बोले इसके लिए भी आपने मार्गदर्शन प्रेरणा दी है। आपके सारे महाकाव्यों में अनेक सूक्तियाँ भरी पड़ी हैं, जिनमें आधुनिक समस्याओं की व्याख्या तथा समाधान भी है, जीवन के सन्दर्भों में मर्मस्पर्शी वक्तव्य भी है। सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक क्षेत्रों में व्याप्त कुरीतियों का निदर्शन भी है। आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज वीतराग, निस्पृह, करुणापूरित, परीषहजयी समदृष्टि-साधु के आदर्श मार्ग के लिए परम-आदर्श हैं। आपकी भावना जन जन के कल्याण की रहती है। ऐसे दुर्लभ संत का समागम सभी प्राप्त हो उनके द्वारा दीक्षित शिष्य भी दर्शन के लिए लालायित रहते है।
  4. पिढीको जय हो विद्यासागरजी की और शहीदो के याद की बहुत संस्मरणीय नमोस्तु गुरुवर जय जिनेंद्र सौ सुलोचना जैन श्रीरामपूर
  5. देश धर्मट|कोऊंचाईयोप्ररआगेलेजानेवाला एफबहुतही अद्भूत सुंदर नजारा है हमको भी और आने वाली पिढी दर पिर्य
  6. स्वराज सम्मान समारोह के तहत महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में जैन समाज के शीर्षस्थ संत आचार्य विद्यासागर के सानिध्य में “जरा याद करो कुर्बानी इस कार्यक्रम में देश के अमर शहीदों के वंशजों का श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र समिति खजुराह्य द्वारा सम्मान किया गया। इस अवसर पर सभी अमर शहीदों के साथ ब्रिटिश हुकूमत द्वारा की गई बर्बरता, उनकी फांसी आदि को लेकर डाक्यमेटी फिल्म भी दिखाई गई। जैसे ही डाक्यूमेंट्री फिल्म में अंग्रेजों की बर्बरता और देश के वीर सपूतों को फांसी देते दिखाया गया तो उनके वंशजों की आंखों से आंसू बहने लगे। कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों की आंखें नम हो गई। अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर के वंशज शाह मुहम्मद खान ने कहा कि बादशाह बहादुर शाह की अस्थियां रंगून में रखी हैं। मेरा आचार्य श्री से आग्रह है कि वह देश की सरकार से कहें कि अस्थियां वापस भारत लाई जाएं। राष्ट्र हित चिंतक परम पूज्य 108 आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महामुनि राज के अवचेतन में चलने वाले विचार चक्र को पकड़ने का प्रयास हमने इससे पहले सर्वोदय सम्मान 2018 के माध्यम से किया था, जिसमें देश के अलग अलग हिस्सों में नेपथ्य में काम करने वाले नायकों का सम्मान किया गया था, उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए खजुराहो में स्वराज सम्मान वर्ष 2018 का आयोजन किया गया | सम्मान का मुख्य उद्देश है कि देश की बाल युवा पीढ़ी अपने इतिहास से वाकिफ हो, उस बलिदान के इतिहास से जिसके कारण वे आज खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं, यह बाल युवा पीढ़ी आजादी के रणबांकुरों के बलिदान से प्रत्यक्ष अवगत हो और जाने की आजादी हमें बहुत आसानी से नहीं मिली थी इसके लिए लाखों जाने अनजाने लोगों ने अपने प्राणों की आहुति लगाई थी| याद करो बलिदान कार्यक्रम में 18 शहीद परिवारों को स्वराज सम्मान से सम्मानित किया गया है| इतिहास क्रम के माध्यम से चुने गए उदाहरण के तौर पर महाराणा प्रताप से लेकर श्रीकृष्ण सरल तक शहीदों में दक्षिण भारत की जैन रानी महादेवी अबबका चोटा भी शामिल है, जिन्होंने 6 बार पुर्तगालियों और अंग्रेजों को पराजित किया और मूड बद्री में अपनी रियासत को आजाद रखा तो दूसरी तरफ नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निजी अंगरक्षक व ड्राइवर कर्नल निजामुद्दीन के सुपुत्र मोहम्मद अकरम को भी आमंत्रित और सम्मानित किया गया है| 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार का गठन किया गया ,उसके 75 वर्ष पूर्ण होने पर यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था जरा याद करो बलिदान कार्यक्रम की रूपरेखा उस समय बनी जब अपने एक उपदेश में उन्होंने कहा कि शरीर राष्ट्रीय संपदा है| सम्मान समारोह मे क्रांतिकारी बलिदानियों के वंशजो को सम्मानित किया गया जिनके नाम निम्न प्रकार है -
  7. Vidyasagar.Guru

    शरद पूर्णिमा

    आज शरद पूर्णिमा 5 अक्टूबर २०१७, संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज का 72 वा अवतरण दिवस -आइये सभी एक साथ मिलकर उनको नमोस्तु लिखें | https://vidyasagar.guru/forums/topic/127-vidyasagar-guru/
  8. *🇮🇳भारत बोलो आंदोलन🇮🇳* आहारचर्या ❗ *खजुराहो* ❗ _दिनाँक :२३/१०/१८ *आगम की पर्याय महाश्रमण युगशिरोमणि १०८ आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज* को आहार दान का सौभाग्य *ब्र. पदम भैया, सचिन भैया, विपुल भैया,प्रशांत भैया,किरण भैया,आकाश भैया,प्रवीण भैया जी एवं श्रीमान आकाश जी जैन,श्री अंकित जी जैन,श्री विपिन जी जैन दोडल महाराष्ट्र एवं उनके परिवार वालो* को प्राप्त हुआ है।_ इनके पूण्य की अनुमोदना करते है। 💐🌸💐🌸 *भक्त के घर भगवान आ गये* *_सूचना प्रदाता-:श्री अंकित जैन खजुराहो,श्री अजित जी जैन छतरपुर_* 🌷🌷🌷 *अंकुश जैन बहेरिया *प्रशांत जैन सानोधा
  9. एक अपूर्व अवसर खजुराहो के इतिहास मे लगभग एक हजार वर्ष के बाद आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज के ससंघ सानिध्य मे समवसरण जिनालय का भव्य शिलान्यास दिनांक 24/10/2018 दोपहर 1:30 शरद पूर्णिमा पर्व पर होने जा रहा है जिसमे आपकी गरिमामय उपस्थिति से कमेटी गौरान्वित महसूस करेगी| प्रात: स्मरणीय, विश्व वंदनीय, संत शिरोमणी 108 आचार्यश्रेष्ठ ममगुरू श्री विद्यासागरजी महामुनिराज के मंगल अवतरण दिवस, शरद पूर्णिमा, के शुभावसर पर प्रसिद्ध गायक अवशेष जैन एंड पार्टी, जबलपुर द्वारा "एक शाम गुरुवर के नाम" रंगारंग संगीतमय भजन संध्या का आयोजन किया जा रहा है। स्थान - अतिशय क्षेत्र खजुराहो समय - शाम ७:३० दिनांक - 24/10/2018 आयोजक :- स्वर्णोदय तीर्थ न्यास एवं प्रबंध समिति खजुराहो जिला छतरपुर म0प्र0 आप सभी इस संगीतमय भक्ति संध्या का आनंद लेने हेतू सपरिवार ईष्ट मित्रो सहित सादर आमंत्रित है।
  10. धन्य है उनका वह परिवार जिसके ७ सदस्य विद्यासागर जी से प्रेरित होकर उनके ही मार्ग पर राही बने। इतिहास में ऐसी अनोखी घटनाएँ विरली ही होती हैं।
  11. Last week
  12. चमक उठी है कुल की नारी हथकरघा की साड़ी न्यारी हथकरघा का सुन्दर कपडा वदन, वतन की रक्षा करता हथकरघे का पानी छन्ना दया धर्म को पाले मुन्ना हथकरघा व जेविक खेती स्वस्थ रहेंगे बेटा-बेटी संस्कृति रक्षा स्वास्थ्य सुरक्षा आश्रय दान करे हथकरघा यह पूर्ण अहिंसक विधि से बना है। यह शुद्ध है। (पावरलूम से बने वस्त्रों में मटन टेलो, पशुओं की चर्बी आदि हिंसक वस्तुओं का उपयोग होता है) यह त्वचा के रोगों की रोकथाम करता है। यह देश के बेरोजगारों को, आशा की नई किरण दिखाने वाला है। ? यह ध्यान व एकाग्रता बढ़ाने में सहायक है। यह भारतीय हस्तशिल्प, कला कौशल का परिचायक है। यह आधुनि परिधान के अनेक रंगों व डिजायनों में उपलब्ध है। इसमें पर्यावरण विकास व स्वदेशी भावना की शक्ति है। यह आपके पसीने से, आपको ही ठंडक का एहसास दिलाने वाला है। यह “जियो और जीने दो” व “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” की कहावत चरितार्थ करता है इसमें ऋषि, मुनि, साधु व साध्वियों की सद्भावनायें जुड़ी हैं। यह जेल के कैदियों के श्रम का प्रतिफल है। करे हथकरघा-तन की सुरक्षा । आश्रयदान व संस्कृति की रक्षा ।। - आचार्य विद्यासागर
  13. पत्र क्रमांक-१३९ २३-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर अपृथग्भूत-पृथग्भूत चैतन्यपरिणाम स्वरूप उपयोग से परिणमित दादागुरु परमपूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों की सदा वन्दना करता हूँ... हे गुरुवर! आपने अपने लाड़ले शिष्य को समयसार का स्वाध्याय कराया तो उन्होंने उसकी अनुभूति रूप पुरुषार्थ भी किया। जब आपने मूलाचार पढ़ाया तो उसकी साधना को भी साधने लगे। इस सम्बन्ध में पूर्व में लिख चुका हूँ किन्तु वे जब कभी अवसर मिलता तो विशेष साधना करते, जो लोगों को देखने में आ जाती, जिससे लोग बड़े प्रभावित होते । इसी तरह की एक साधना के बारे में दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने बताया- मूलगुणों के विशेष साधक मुनि श्री विद्यासागर ‘‘रेनवाल चातुर्मास में मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज अपने २८ मूलगुणों के साथ-साथ उत्तर गुणों की भी विशेष साधना करते रहे। चातुर्मास के दौरान उन्होंने २८ मूलगुणों के अन्तर्गत भू-शयन नामक मूलगुण को विशेष रूप से पालन किया। आषाढ़ शुक्ला १४ से कर्तिक शुक्ला १४ तक, ४ माह चौबीसों घण्टे जमीन पर बिना पाटे, बिना चटाई, बिना घास-फूस के बैठते-उठते-सोते । मात्र दोपहर में प्रवचन करने के समय पर सामाजिक दृष्टि से मर्यादा का पालन करने के लिए समाज के नम्र निवेदन पर तखत पर बैठते थे। वर्षायोग में कई बार धूप नहीं निकलती और ठण्ड भी लगती थी फिर भी उनकी शीत परिषहजय की साधना अखण्ड चलती रही जो पंचमकाल में श्लाघनीय है, स्तुत्य है और सबसे बड़ी साधना तो यह देखने में आयी कि चार माह के प्रवचन में इस विषय पर कोई भी चर्चा नहीं की। इस तरह आपके लाड़ले शिष्य मेरे अपने गुरुवर को हमने कभी भी मुँह मिट्ठू बनते नहीं देखा अर्थात् अपने मुख से स्वयं की प्रशंसा करते नहीं देखा-सुना। यही कारण है कि वे अपने बारे में कभी भी चर्चा नहीं करते। गुरुदेव की इस विशिष्ट साधना के बारे में जब चर्चा की तो लोगों ने बताया कि हमारे पिताजी बताते थे कि मुनिराज विद्यासागर जी को कहते कि महाराज आप पाटे पर बैठ जाएँ, जमीन पर अच्छा नहीं लगता; तो विद्यासागर जी कहते-‘मैं प्रकृति के पाटे पर बैठा हूँ, धरती माँ की गोद में बैठने पर कैसी शरम? गुरु शरण में कोई तकलीफ होने वाली नहीं है।' उनकी साधना से बहुत बड़ी प्रभावना हुई। तबसे आज तक रेनवाल के लोग उनको अपना गुरु मानते हैं। दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने मेरे गुरु की प्रभावना का एक और संस्मरण भीलवाड़ा २०१५ में बताया- मुनि श्री विद्यासागर जी के प्रभावोत्पादक प्रवचन ‘‘रेनवाल चातुर्मास में मुनि श्री विद्यासागर जी के प्रवचन लोगों को बहुत अच्छा लगा करते थे, खास तौर पर युवा वर्ग के लिए। एक दिन प्रवचन में दो पंक्ति की कविता बोली- अधिक हवा भरने से फुटबॉल फट जाये। बड़ी कृपा भगवान की पेट नहीं फट पाये ॥ इन शब्दों पर प्रवचन करते हुए बड़ी गहरी बात बोली-'अइमत्तभोयणाए' अर्थात् अतिमात्रा में भोजन करना अचौर्याणुव्रत का उल्लंघन है। एक बार प्रवचन में सुमधुर स्वरों में गाते हुए चार पंक्तियाँ बोलीं- साधना अभिशाप को वरदान बना देती है। भावना पाषाण को भगवान बना देती है । विवेक के स्तर से नीचे उतरने पर। वासना इन्सान को शैतान बना देती है । इन पंक्तियों पर विशेष प्रभावोत्पादक प्रवचन किया। प्रवचन समाप्त होने पर बहुत सारे लोगों ने तरह-तरह के नियम लिए। कुछ लोगों ने सप्त व्यसन का त्याग किया। कुछ लोगों ने नशीले पदार्थ बीड़ीसिगरेट-तम्बाकू आदि का त्याग किया। कुछ श्राविकाओं ने जमीकंद का त्याग किया। कुछ बुजुर्गों ने रात्रि जल का त्याग किया। ऐसे हैं मुनि श्री विद्यासागर जी, जो शुरु से ही आज तक प्रभावशाली प्रवचन करते यह सब आपका ही ज्ञान संस्कार है जो मेरे गुरु के अन्दर बोलता है। आप जैसे गुरु-शिष्यों को नमन करता हूँ... आपका शिष्यानुशिष्य
  14. पत्र क्रमांक-१३८ २२-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर भक्तों के मन में भक्ति पैदा करने वाले आचरण के धारक गुरुवर आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में कोटिशः नमोऽस्तु करता हूँ...। हे गुरुवर! आपके संघ सान्निध्य में धर्म का आनन्द पाने से समाज आपका चातुर्मास कराने हेतु हर रोज निवेदन करने लगी, किन्तु आप न तो आश्वासन देते न ही कुछ बोलते, क्योंकि बन्धन आपको स्वीकार नहीं। आश्वासन से तो बंधन की स्वीकारोक्ति है। समाज के लोग आश्वासन चाहते किन्तु आपने आगम अनुसार मौन धारण किया और रेनवाल दिगम्बर जैन समाज की भक्ति-भावना-समर्पण को देखते हुए आपका मन रेनवाल में चातुर्मास करने का हो गया। यद्यपि आस-पास के कई गाँव व शहरों के लोग आपका चातुर्मास कराने का निवेदन कर चुके थे, तथापि अतिश्रद्धा-भक्ति-समर्पण की जीत हुई और किशनगढ़-रेनवाल में चातुर्मास की स्थापना हुई । इस सम्बन्ध में दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने बताया- रेनवाल ने देखा सन् १९७० का चातुर्मास १७-०७-१९७० शुक्रवार आषाढ़ शुक्ल १३-१४ विक्रम संवत् २०२७ को प्रात:काल आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज, मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज, ऐलक सन्मतिसागर जी महाराज, क्षुल्लक सुखसागर जी महाराज, क्षुल्लक सम्भवसागर जी महाराज, क्षुल्लक विनयसागर जी महाराज, ब्र.मांगीलाल जी, ब्र. बनवारीलाल जी, ब्र. दीपचंद जी आदि सभी ने उपवास पूर्वक भक्तियों के पाठ कर चातुर्मास स्थापित किया। तत्पश्चात् मंच पर मुनि श्री विद्यासागर जी एवं आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का मार्मिक प्रवचन हुआ और चातुर्मास का बंधन क्यों किया जाता है? और मुनि आश्वासन क्यों नहीं देते? इस पर विशद व्याख्या की। रेनवाल चातुर्मास की दैनन्दिनी ‘‘चातुर्मास में प्रतिदिन प्रातः ७:३०-८:३० बजे तक धर्मसभा का अयोजन जैन भवन में होता था। जिसमें पूज्य गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज छहढाला के छन्दों को सुरीले स्वर में गाकर बोलते थे और इस पर प्रवचन करते थे। इसमें पूरी समाज उपस्थित होती थी। फिर ९:३० बजे आहारचर्या, १२:00 सामायिक, १:३० बजे से आचार्य महाराज मुनि श्री विद्यासागर जी को न्याय विषयक ग्रन्थ प्रमेयकमल मार्तण्ड एवं अष्टसहस्री पढ़ाते थे। मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज उच्चारण करते और आचार्य महाराज उसका शब्दार्थ, भावार्थ, विशेषार्थ बताते थे। फिर दोपहर में ३:00-४:00 बजे तक मुनि श्री विद्यासागर जी प्रवचन करते थे। इसके बाद आचार्य गुरुदेव मुनि श्री विद्यासागर जी को आचार्य पूज्यपाद स्वामी विरचित संस्कृत व्याकरण ग्रन्थ जैनेन्द्र प्रक्रिया पढ़ाते थे। फिर संघ प्रतिक्रमण करता, देवदर्शन करता और अंधेरा होने से पूर्व सामायिक में हम सब बैठ जाते थे, फिर रात्रि में गुरुदेव की वैयावृत्य करके १० बजे विश्राम में चले जाते थे। चातुर्मास में पूज्य मुनिश्री विद्यासागर जी महाराज जब कभी समय मिलने पर गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज द्वारा ब्रह्मचारी अवस्था में रचित 'जयोदय महाकाव्य' की सूक्तियाँ लिखा करते थे।' इसी प्रकार रेनवाल के श्रीमान् गुणसागर जी ठोलिया ने बताया कि दोपहर में प्रतिदिन मुनि श्री विद्यासागर जी का प्रवचन होता था। तब उस प्रवचन में आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज भी बैठते थे और प्रवचन सुनते थे। जब मुनि श्री प्रवचन में कन्नड़ की कोई विशेष बात बताते तो ज्ञानसागर जी महाराज हँसते थे। उनके प्रवचन की टोन कन्नड़ भाषा से प्रभावित थी इसलिए हम सभी को बड़े अच्छे लगते थे।'' इसी प्रकार ‘जैन सन्देश' में ०६-०८-१९७० को रेनवाल के प्रचारकर्ता रतनलाल जी गंगवाल ने समाचार प्रकाशित करवाया- संघ समाचार ‘‘किशनगढ़-रेनवाल में श्री १०८ आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के संघ का चातुर्मास सानन्द सम्पन्न हो रहा है। प्रातः ७:३०-८:३० बजे तक प्रौढ़ शिक्षण शिविर को आरम्भ किया गया है। जिसमें पूज्य आचार्य महाराज स्वयं छहढाला का अध्ययन कराते हैं। दोपहर में श्री १०८ मुनि श्री विद्यासागर महाराज का प्रभावशाली सरस प्रवचन होता है। आचार्य श्री से श्री नेमीचंद जी गंगवाल पचार वालों ने ७ प्रतिमा के व्रत लिए। इस तरह रेनवाल चातुर्मास में आपने प्रथम बार प्रौढ़ जनों का शिविर आयोजित किया और स्वयं अपने अनुभवों से समाज को संस्कारित किया। ऐसे सम्यग्ज्ञान संस्कार दाता के पावन चरणों में त्रिकाल वन्दन करता हूँ... आपका शिष्यानुशिष्य
  15. पत्र क्रमांक-१३७ २१-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर इच्छा उत्सुकता व्याकुलता रहित ज्ञानजीवी ज्ञानमूर्ति परमपूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चिह्नांकित कर्ता चरणों में कोटिशः नमन नमोऽस्तु निवेदित करता हूँ... | हे गुरुवर! आप जहाँ पर भी जाते तो संघ की भव्य आगवानी होती कारण कि आपकी ज्ञान-यशसुरभि जो सर्वत्र व्याप्त थी। आपके तार्किक, आध्यात्मिक, आगमिक प्रवचन सुनने को लोग लालायित रहते थे। इस कारण आपको पाकर लोग आनन्द उल्लास से भर जाते थे। इस सम्बन्ध में दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने बताया ‘जून के अन्तिम सप्ताह में गुरुदेव रेनवाल पहुँचे थे। रेनवाल वालों ने भव्य आगवानी की ऐसा लग रहा था जैसे रेनवाल वालों को पूर्व से ही गुरुवर के आने की सम्भावना थी और इसलिए भव्य आगवानी की तैयारी कर रखी थी। आगवानी का जुलूस दिगम्बर जैन मन्दिरजी पहुँचा संघ ने दर्शन किए फिर संघ को जैन भवन में रुकाया गया था। २-३ दिन बाद मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज ने दीक्षोपरान्त आठवाँ केशलोंच किया। पूरी समाज केशलोंच देखने उपस्थित हुई। फिर कुछ दिन बाद आचार्य गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने भी केशलोंच किया। इससे सम्बन्धित रेनवाल के गुलाबचंद जी गंगवाल ने संघ आगमन का समाचार ‘जैन गजट' में प्रकाशित कराया। जो २ जुलाई १९७० को प्रकाशित हुआ- संघ का शुभागमन ‘‘किशनगढ़ (रेनवाल)-यहाँ श्री १०८ आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के संघ का पदार्पण हुआ है। संघ का यहाँ गाजे-बाजे से अभूतपूर्व स्वागत हुआ है। संघ का चातुर्मास किशनगढ़ में ही होने की पूर्ण संभावना है। संघ में २ मुनि, १ ऐलक, १ क्षुल्लक तथा ३ ब्रह्मचारी हैं। प्रतिदिन दोपहर में श्री १०८ मुनि विद्यासागर जी महाराज का धर्मोपदेश होता है। धार्मिक समाज को यहाँ पधारकर धर्मलाभ लेना चाहिए।' परमपूज्य मुनिराज श्री १०८ श्री विद्यासागर जी महाराज की पूजन स्थापना दोहा-चरित मूर्ति परीषहजयी, जितेन्द्रिय गंभीर। निर्मल अविकारी छवि, दयावान अरु धीर ॥ बाल ब्रह्मचारी सुधी, विनयवान गुणवन्त। शान्तिपुंज तेजोमयी, विद्यासागर सन्त ॥ ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वर! अत्र अवतर-अवतर संवौषट्। ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वर! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठः ठः। ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वर! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट्। द्रव्याष्टक शीतल सुरभि जल लाय, चरण पखार करै । दुःख जन्म जरा मृत जाय, पूजत पाप टरै ।। विद्याधर विद्यावान, तुम विद्यासागर । चन्द्रोज्ज्वल कान्तिवान, बालयती मनहर ॥ ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वराय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि. स्वाहा। ये चंदन सहित कपूर, घिसकर हूँ लाया। भव ताप दुःख से पूर, मेटो मुनिराया। विद्याधर... ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वराय संसारतापविनाशनाय चन्दनं नि. स्वाहा। ये तन्दुल चन्द्र समान, पूजन को लाया। अक्षय पद करुणावान, पाने ललचाया। विद्याधर.. ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वराय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि. स्वाहा। पूजन को फूल गुलाब, बेला मंगवाये। नहीं जूही का है जवाब, काम व्यथा जाये। विद्याधर... ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वराय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि. स्वाहा। ये मोदक और मिष्ठान, पूजन को लाया। नश जाये क्षुधा ये जान, गुरु चरणन आया। विद्याधर... ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वराय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि. स्वाहा। ये घृत से पूरित दीप, तुम ढिंग आय धरूँ।। मोहान्ध रहे न समीप, इतनी विनय करूं। विद्याधर... ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वराय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि. स्वाहा। ले गंध सुगंध अनूप, धूपायन डा। पूजन कर शुद्ध स्वरूप, करमन को जाऊँ। विद्याधर... ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वराय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि. स्वाहा। नारंगी आम अंगूर, बहुफल हूँ लाया। शिव फल चाहूँ मैं हुजूर, गुण गण तब गाया। विद्याधर... ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वराय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि. स्वाहा। ले अष्ट द्रव्य का थाल अर्घ चढाऊँ मैं। पद अनर्घ पाऊँ दयाल, बलि बलि जाऊँ मैं। विद्याधर... ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वराय अनर्थ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा। जयमाला दोहा-आभा मुख लख शान्त हो, मन ज्यूँ चन्द्र चकोर । मगन होय नाचन लगे, मेघ देख ज्यूँ मोर ।। पाप रहे ना पास में, शुद्धातम बन जाय। ऐसे गुरु पद पूज के, धन्य ‘प्रभु' कहलाय ।। पद्धरी छन्द जय विद्यासागर शीलवान, तुम बाल ब्रह्मचारी महान। तुम प्रभापुंज हो वीर्यवान, समताधारी हो धैर्यवान ॥ तब कामदेव सम सुभग रूप, मुख मण्डल महिमा है अनूप। अति प्रभावकर व्यक्तित्व आप, लख पड़े हृदय पर अमिट छाप ।। निर्ग्रन्थ रूप जन करत दर्श, बरबस चरणन पड़े धार हर्ष। मृदुभाषी लेते मन को जीत, जागृत करते मन धर्म प्रीत ॥ शुभ भाव अनेकों मन जगाय, उन्नत पथ पर दीना लगाय। हर घड़ी रहें रत धर्म ध्यान, कर ज्ञानार्जन निज पर कल्याण ॥ तुम धन्य-धन्य श्रीमंती लाल, दिया पितु मल्लप्पा कुल उजाल ।। लिया जन्म सदलगा ग्राम मांय, विद्याधर लीना नाम पाय। तुम नवम वर्ष की उम्र मांय, जब शेडवाल नगरी में आय ॥ आचार्य शान्ति के दर्श पाय, वैराग्य पौध मन में लगाय। श्री देशभूषण से शील जाय, ले लिया श्रवण बेलगोल मांय ॥ कालान्तर में गुरु ज्ञान पास, अजमेर आये ले एक आस। गुरु ज्ञानसिन्धु की शरण पाय, किया शास्त्र पठन बहु मन लगाय॥ मुनि पद ताईं अभ्यास कीन, की विनय गुरु से होय दीन। तिथि पंचम सुद आषाढ़ मास, दो हजार पचीस में वरी आस ॥ हुई अजयमेर भूमि पुनीत, भू गगन गा उठे हर्ष गीत। हर्षित हुए इन्द्रादिक अपार, ढोरे थे कलश बहा नीर धार ॥ बाईस वर्ष लिया जोग धार, तुम धन्य जैन शासन सिंगार। अनुपम आदर्श रखा है लोक, ऐसे मुनि चरणन सहस ढोक ॥ ॐ ह्रः श्री विद्यासागरमुनीश्वराय पूर्णार्धं निर्वपामीति स्वाहा। दोहा-तजकर जग के भोग सुख, वरन चले शिवनार । ऐसे साधु चरण गह, ‘प्रभु' होगा उद्धार । ॥ इत्याशीर्वादः ॥ इस प्रकार मुनि श्री का दीक्षादिवस सानन्द सम्पन्न हुआ ही था और ५ दिन बाद पुनः महोत्सव हो गया। इस सम्बन्ध में दीपचंद जी छाबड़ा ने बताया रेनवाल में हुई क्षुल्लक दीक्षा ‘ब्र. जमनालाल जी ने केसरगंज अजमेर में २०२६ आषाढ़ शुक्ला १० को आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज से सप्तम प्रतिमा ग्रहणकर संघ में प्रवेश किया और उन्होंने कई बार गुरुदेव से दीक्षा का निवेदन भी किया था। तब गुरुदेव कहते थे देखो अभी साधना करो और जैसे ही रेनवाल पहुँचे तो समाज को ब्रह्मचारी जी की दीक्षा का संकेत किया और मुहूर्त बताया। समाज में उत्साह आ गया सब तैयारियाँ कर ली गईं। मुनि श्री विद्यासागर जी का द्वितीय दीक्षा दिवस से लेकर १४ जुलाई तक का कार्यक्रम प्रचारित हो गया।' जमनालाल जी के परिचय के बारे में रैनवाल के गुणसागर जी ने ज्ञानदीपिका नामक छोटी-सी पुस्तिका लाकर दी जिसके रचयिता मुनिराज श्री विजयसागर जी हैं। जिसमें सूरजमल जी गंगवाल ने रचयिता का परिचय दिया है। संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है-खाचरियावास (सीकर राज.) ग्राम में सेठ श्री उदयलाल जी गंगवाल की धर्मपत्नी श्रीमती धापूबाई जी की मंगलकुक्षि से भादवा सुदी १० दीतवार वि. संवत् १९७२ को आपका शुभ जन्म हुआ नाम रखा गया जमनालाल। लौकिक शिक्षा ग्रहणकर १६ वर्ष की अवस्था में विवाह हुआ और ३ पुत्र एवं २ पुत्रियाँ हुईं। आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के सम्पर्क में वि. संवत् २०१९ खाचरियावास में आये । वि. संवत् २०२३ अजमेर में दर्शन प्रतिमा ली। क्षुल्लक दीक्षा से सम्बन्धित मुनि श्री अभयसागर जी महाराज के द्वारा ‘जैन गजट' १३ अगस्त १९७0 अखबार की कटिंग प्राप्त हुई जिसमें गुलाबचंद जी गंगवाल ने इस प्रकार समाचार प्रकाशित कराया- क्षुल्लक दीक्षा समारोह आषाढ़ शुक्ला १० मंगलवार १४ जुलाई ७0 वी.नि.स. २४९३ को किशनगढ़-रेनवाल में आ. श्री ज्ञानसागर जी महाराज के संघस्थ ब्रह्मचारी श्री जमनालाल जी गंगवाल खाचरियावास ने क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की (नाम-क्षुल्लक विनयसागर जी)। इस अवसर पर आचार्य महाराज के संघस्थ युवा मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज का बहुत ही सारगर्भित प्रवचन हुआ। यहाँ आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के संघ का चातुर्मास सानन्द सम्पन्न हो रहा है। प्रातः ७:३०-८:३० बजे तक प्रौढ़ शिक्षण शिविर प्रारम्भ किया गया है। जिसमें स्वयं पूज्य आचार्य महाराज छहढाला का अध्ययन कराते हैं। करीब २५ प्रौढ़ पुरुष एवं महिलाएँ अध्ययन कर रहीं हैं। दोपहर में मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज का प्रवचन होता है। दोपहर में ही स्थानीय करीब १०० बालक-बालिकाओं को ब्र. श्री दीपचंद जी धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन कराते हैं। अपूर्व धर्म प्रभावना हो रही है।'' इस प्रकार रेनवाल प्रवेश से लेकर जो धर्म प्रभावना शुरु हुई वो चातुर्मास के अन्त तक चलती रही। क्षुल्लक दीक्षा के दिन श्री विजय कुमार जी शास्त्री एम.ए. जोबनेर ने परमपूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर । जी महाराज की भक्ति करते हुए अपनी भावांजली व्यक्त की जो ‘जैन गजट' में छपी- हे! पूज्य ज्ञानसागर मुनिवर... ओ मानवता के चरम बिन्दु जीवन निधियों के धनागार। भविजन विकासि, हे पूर्ण इन्दु, तुम करुणा के सागर अपार ॥१॥ काँटों की कुछ परवाह न कर, बढ़ चले साधना के पथ पर। दुर्दान्त तपस्वी परम धीर तुम सत्य शिवं सुन्दर के घर ॥२॥ जग की मादक मोहकता ने तुमको न कभी ललचा पाया। पर में ममता को छोड़ सकल निज में शाश्वत सुख को पाया ॥३॥ ओ श्रमण धीर, तुम घोर श्रमी, श्रम का मूल्यांकन कर पाये। कर घोर तपश्चर्या अविरत निज की निधियों को पा पाये ॥४॥ तुम सागर से होकर गम्भीर, धरती सा धीरज धरते हो। गंगा-जल से पावन होकर ज्योत्स्नाकर सम सुख भरते हो ॥५॥ तुम हिमधर से होकर उत्तुंग समता का पूर बहाते हो। रत्नत्रय निधि की गाँठ बाँध, योगी निर्ग्रन्थ कहाते हो ॥६॥ तुम में शिशु का पावन तन है, माँ का स्नेह अमर्यादित । नीरस मावस सम एक दृष्टि, पर स्वात्म ज्योति से अवभासित ॥७॥ तुम फले हुए तरु से विनम्र जग आशा से न कभी झुकते। परिमल वाहक मलयानिल से, पर हित पथ पर न कभी रुकते ॥८॥ निर्मुक्त गगन से हो स्वतन्त्र, बाह्याडम्बर का लेश नहीं। तुम साम्यवाद के अग्रदूत, तुमको श्रम का परिताप नहीं ॥९॥ तुमने परिमित परिधान त्याग, दिग्मण्डल का अम्बर पहिना। तुम भूल सके क्या कभी इसे कैसा होता दुख का सहना ॥१०॥ तुमने मन-वच-काया की सब अभिलाषाओं को ठुकराया। पर स्रोत अहिंसा का कैसे जग जीवन में नित सरसाया ॥११॥ तुम साधक हो, अन्वेषक हो, परमार्थ तत्त्व के चिन्तक हो। फिर सतत निस्पृही बन करके क्यों निरी पहेली बनते हो ॥१२॥ ओ जान चुका मानव विराट, तुम आत्म तेज के पुंज अहो! ओ साधक, ज्ञायक बनकर तुम, चित्त में आनन्द समीहक हो ॥१३॥ हे वीतराग, हे निर्विकार, हो शान्ति-मूर्ति तुम आत्मजयी। जड़-चेतन का करते विचार हे उग्र तपस्वी कर्म-जयी ॥१४॥ कल्याण मार्ग के परिचायक आत्मिक निधियों के हो अगार। भौतिक जग के प्रति उदासीन जीवन सम रसता के उभार ॥१५॥ हे पूज्य ज्ञान-सागर मुनिवर, आचार्यवर्थ्य, यतिराज अहो। जग पूज्य तपस्विन् तुम सा है जग में भी कोई साधु कहो ॥१६॥ समता के सागर हे ऋषिवर, तुम को इस जन का नमस्कार। भव-वारिधि में जो डूब रहे, तुम उनको नित लेते उबार ॥१७॥ ओ पूज्य तपोनिधि चरणों में श्रद्धा से शीष झुकाता हूँ। तब सौम्य-मूर्ति की आभा में, मैं अपने पन को पाता हूँ ॥१८॥ इस प्रकार किशनगढ़-रेनवाल में धर्म की गंगा बहने लगी। ऐसी ज्ञानगंगा बहाने वाले गुरु-शिष्य के पावन चरणों में त्रिकाल वंदन करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  16. पत्र क्रमांक-१३६ २०-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर हस्तावलम्बन दाता तारणहार दादा गुरुजी के पावन चरणों में प्रतिक्षण नमोऽस्तु करता हूँ... हे गुरुवर! आप मण्डा से मिण्डा गए फिर वहाँ से रेनवाल के लिए विहार किया। तब आपका स्वास्थ्य अनुकूल नहीं होने से और गर्मी की भीषणता के बावजूद आपने विहार कर दिया। उस समय का एक संस्मरण दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने सुनाया जिसे सुनकर मुझे अपने गुरु पर गौरव होता है और उसे सुनकर आप भी पुनः गौरव से भर उठेंगे- शिष्य ने उठाया गुरु को पीठ पर ‘मिण्डा से जब गुरुदेव ने किशनगढ़-रेनवाल के लिए लगभग २५ जून को प्रातः विहार किया था और गुरुजी का स्वास्थ्य अनुकूल नहीं था। तब बीच में मेण्डा नदी पड़ी जो सूखी बालू-रेत की थी। जिस पर चलने से ताकत ज्यादा लगानी पड़ती है पैर धस जाता है और फिसलता भी है। ऐसी स्थिति में मुनि श्री विद्यासागर जी ने अपनी पीठ पर गुरुजी ज्ञानसागर जी महाराज को उठा लिया और दो-तीन कि.मी. तक ले गए थे। वहाँ पहुँचने पर मैंने मुनिवर विद्यासागर जी से कहा-आप थक गए होंगे आपके पैर दबा देता हूँ। तब मुनि श्री बोले-गुरु की सेवा में थकान कैसी?'' इस तरह मेरे गुरु ब्रह्मचारी अवस्था से ही गुरुओं की सेवा में तत्पर, लगनशील, समर्पित रहे। जब वे आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज के संघ में थे। तब ३० मार्च १९६७ को होने वाले गोम्मटेश्वर महामस्तकाभिषेक महोत्सव में आचार्य संघ जा रहा था, तब मार्ग में आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज की पालकी भी ब्रह्मचारी विद्याधर जी उठाकर चलते थे। हे दादागुरु! मेरे गुरुवर ने आपको नदी पार कराई आपने उन्हें संसार-सागर पार करा दिया। धन्य हैं! ऐसे तारक गुरु-शिष्य के पावन चरणों में कोटि-कोटि वंदन करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  17. पत्र क्रमांक-१३५ १९-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर वात्सल्य रत्नाकर परमपूज्य गुरुवर आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पवित्र चरणों में स्नेहिल नमस्कार नमस्कार नमस्कार... हे गुरुवर! मई के अन्तिम सप्ताह अन्तर्गत आप संघ सहित मण्डाभीमसिंह पहुँचे थे और वहाँ लगभग १ माह का आत्मविहार किया। मेरे गुरुवर साधना के साथ-साथ सेवा-स्वाध्याय में सदा तत्पर रहते। इसके बारे में मैं क्या-क्या बता पाऊँगा, फिर भी मेरे गुरुवर के बारे में कोई भी व्यक्ति संस्मरण सुनाता है तो मन पुलक-पुलक हो उठता है। मण्डाभीमसिंह प्रवास के तीन संस्मरण श्री दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने सुनाये। वे आपको भी बताने का मन हो रहा है- गुरु-शिष्य एक दूसरे के हितचिंतक “मई माह में अत्यधिक गर्मी पड़ रही थी दोपहर में तेज लपट चलती थी। आचार्य महाराज का स्वास्थ्य कमजोर हो जाता था तो मुनि श्री विद्यासागर जी के साथ हम भी आचार्य गुरुवर की वैयावृत्य करते थे और उनके पैरों में घी-कपूर की मालिश करते थे एवं रात में भी नित्य-प्रति वैयावृत्य करते थे। गर्मी को देखते हुए गुरुदेव इशारा करके कहते विद्यासागर जी की भी वैयावृत्य करो बहुत गर्मी है। तो हम लोग जैसे ही मुनि श्री विद्यासागर जी की वैयावृत्य करने की कोशिश करते तो वे मना कर देते और कहते- “मुझे जरूरत नहीं।' हम लोग निवेदन करते महाराज जी! गुरु महाराज की आज्ञा है। तो तत्काल कहते-‘गुरु महाराज की शीतल छाया में गर्मी कहाँ?' इस प्रकार गुरुदेव शिष्यों का पूरा-पूरा ख्याल रखते थे।' भीषण गर्मी में भी स्वाध्याय तप में लीन ‘मण्डा में भीषण गर्मी में दोपहर में मुनि श्री विद्यासागर जी को गुरु महाराज स्वाध्याय कराते थे। उस स्वाध्याय में एक व्यक्ति आते थे। जो थे तो जैन किन्तु मुनियों को नमस्कार नहीं करते। इसके बावजूद गुरु महाराज उस व्यक्ति के कल्याणार्थ उस व्यक्ति के प्रश्नों का जवाब देते थे। वे कभी पूछते चौथे गुणस्थान में आत्मानुभूति, केवलज्ञान की किरण, तो कभी कहते व्रत औदयिक भाव है, पुण्य-पाप सब एक भाव हैं, काललब्धि जब आयेगी तो स्वत: पुरुषार्थ हो जायेगा, पंचमकाल में मुनि चर्या पालने वाले सच्चे मुनि नहीं आदि विषयों पर गुरुदेव आगम प्रमाण से तर्क-वितर्क करते हुए उदाहरण पूर्वक समझाते थे किन्तु पूर्वाग्राही, हठग्राही व्यक्ति को गुरु के आगमप्रमाणित वचन एवं तर्को, उदाहरणों को सुनकर आनन्द की अनुभूति नहीं होती अपितु अपूर्वग्राही-ज्ञानग्राही को गुरुमुख से सर्वज्ञवाणी को सुनकर आनन्द की प्राप्ति होती है। किसी को लाभ मिला या नहीं किन्तु हम संघस्थ साधकों को बहुत लाभ मिला। इस प्रकार वाचना-स्वाध्याय के साथ-साथ पृच्छना-स्वाध्याय का अपूर्व लाभ आपने दिया, संघ ने लिया। गुरु भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण ‘‘मण्डा की भयंकर गर्मी में भी गुरुवर एवं मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज कक्ष के अन्दर ही विश्राम करते थे। सन् १९६९ में हम संघ में आये तब से हमने देखा कि आचार्य गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज, जहाँ पर रात्रि में सोते थे वहीं पर मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज भी चरणों के निकट सोते थे। मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज कभी भी उनके बराबर में नहीं सोये । हमेशा चरणों की ओर ही सोते थे। यह उनकी उत्कृष्ट गुरुभक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण हमने अन्यत्र नहीं देखा । गुरुदेव रात्रि के तृतीय प्रहर अर्थात् ३ बजे उठ जाते थे और दिन में कभी लेटते नहीं थे। मुनि श्री विद्यासागर जी भी गुरुदेव के उठते ही उठ जाते थे और दिन में सोने का कोई प्रश्न ही नहीं था क्योंकि वे गुरुजी को छोड़कर अन्यत्र रहते ही नहीं थे। इस तरह गुरुवर आप साईटिका के रोग के कारण बाहरी तेज हवा से बचने के लिए भयंकर गर्मी में कक्ष के अन्दर ही रात्रि विश्राम करते थे, जबकि भयंकर गर्मी में शाम आठ बजे के बाद कक्ष भभका मारता है- घुटता है। फिर भी आपकी तपस्या का तो कारण समझ में आता है किन्तु मेरे गुरुवर भी इस परिस्थिति में बाहर विश्राम नहीं करते थे। आपके साथ ही ग्रीष्म परिषहजय करते थे। इसकी वजह सिर्फ आपके श्रीचरणों की भक्ति ही थी, जो गुरुचरणों में शीतलता की अनुभूति कराती और उनकी सेवा से एक पल भी दूर नहीं रहने देती थी। ऐसे वीतरागी चरण जिनसे राग हो जाता है। उनको त्रिकाल वंदन करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  18. पत्र क्रमांक-१३४ १८-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर स्वाभिमानी अयाचकवृत्ति सम्पन्न परमपूज्य आचार्य गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में विनयार्थ्यं समर्पित करता हूँ... हे गुरुवर! आपने ब्र. विद्याधर जी को दीक्षा देकर बाहर से ही नहीं भीतर से भी नंगा कर एक वर्ष से भी कम अवधि में मूलाचार को ऐसा हृदयंगम कराया कि वह आचरण में बोलने लगा। इस सम्बन्ध में आपको एक संस्मरण लिख रहा हूँ जो मुझे दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने बताया । यद्यपि आपको पढ़ते ही यह बात स्मरण में आ जायेगी क्योंकि इस संस्मरण में आपका जवाब भी लाजवाब है- स्वाभिमानी मुनि श्री विद्यासागर की अयाचकवृत्ति ‘‘सन् १९७0 मई माह की बात है आचार्य गुरुदेव संघ सहित फुलेरा पहुँचे। तब एक दिन मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज को चौके में प्रारम्भ में एक लोटा भरकर नीम का पानी दिया और श्रावकश्राविकाएँ गर्म दूध को ठण्डा करने बैठ गए। मुनिश्री जी की अंजुली कुछ समय खाली रही इस कारण मुनिश्री जी अन्तराय मानकर बैठ गए। श्रावक-श्राविकाएँ घबरा गये। मुनिश्री जी ने मन्दिर आकर गुरु महाराज को चर्या सम्बन्धी समाचार दिये। तब श्रावकों ने गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज से पूछा- ‘विद्यासागर जी महाराज ने ऐसा क्यों किया?' तो गुरुदेव बोले- ‘दिगम्बर मुनि महाराज अयाचकवृत्ति वाले होते हैं। वे किसी भी वस्तु की याचना नहीं करते इसलिए ज्यादा समय तक अंजुली खोलकर नहीं रखते ।ज्यादा समय तक अंजुली खोलकर रखने पर दीनता प्रकट होती है, जो दिगम्बर मुनि की सिंहवृत्ति के विपरीत है। इसलिए विद्यासागर जी ने अच्छा किया।' श्रावक अपनी गलती पर पश्चाताप करते हुए रोते रहे और मुनि श्री विद्यासागर जी मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए आशीर्वाद देते रहे।" इस तरह स्वाभिमानी आत्मरस के रसिक मेरे गुरुवर की सिंहवृत्ति ने आज इस पंचमकाल में चतुर्थकाल की साधना को करके दिखा दिया है कि भगवान महावीर की चर्या कैसी थी? और पंचमकाल के अन्तिम समय तक आगम वर्णित दिगम्बर मुनि की २८ मूलगुणात्मक चर्या विद्यमान रहेगी। ऐसे भगवान महावीर के लघुनंदन गुरु-शिष्य के पावन चरणों में त्रिकाल त्रिकरणयुक्त त्रिभक्तिपूर्वक कोटि-कोटि नमोऽस्तु करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  19. पत्र क्रमांक-१३३ १५-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी ज्ञानमूर्ति दादा गुरुवर के पावन चरणों में त्रिकाल त्रिभक्तिपूर्वक नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु.... ज्ञान का अभीक्ष्ण अभ्यास हे गुरुवर! आपकी चर्या-क्रिया-ज्ञान-ध्यान-साधना के संस्कारों ने मनोज्ञ मुनिराज श्री विद्यासागर जी पर ऐसा प्रभाव छोड़ा कि वे आपकी ही तरह अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी साधना में संलग्न हो गए। यह बात तो आप भी जानते हैं कि मेरे गुरुवर आपकी कक्षा में पढ़कर आते फिर उसका रिवीजन करते और धारणा की पर्याय जब तक नहीं बना लेते तब तक सोते नहीं थे। जब आपने आचार्य विद्यानंद जी स्वामी कृत ' आप्तपरीक्षा' नामक न्याय ग्रन्थ पढ़ाया तब ग्रन्थ में अच्छे से प्रवेश करने के लिए उन्होंने उस ग्रन्थ के स्वोपज्ञवृत्ति सहित, कन्नड़ भाषा में नोट्स बनाना प्रारम्भ किए थे। इस सम्बन्ध में हमने श्रीमान् अशोक जी पाटनी (मदनगंज-किशनगढ़) के हाथ से जिज्ञासा गुरुदेव के समक्ष रखी तब उन्होंने यही बताया, सो हमने आपको लिखा। ऐसे अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी गुरु-शिष्य के चरणों में ज्ञान की प्यास बुझाने हेतु अभीक्ष्ण वन्दन करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  20. पत्र क्रमांक-१३२ १४-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर परमोपकारी जीवहितैषी परमपूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी दादा गुरुवर के पावन चरणों को हृदय में विराजमान कर त्रिकाल नमस्कार करता हूँ। हे गुरुवर! जब आप मौजमाबाद से धमाना होते हुए चौरू पहुँचे और चौरू में पाँच दिन का प्रवास किया था। उस प्रवास के दौरान का एक संस्मरण वहाँ के श्री लक्ष्मण जी कासलीवाल ने बताया सो आपको बता रहा हूँ- औषधदान के प्रेरक दादागुरु ‘‘चौरू में जैन समाज के लगभग ५० घर थे। शाम को पूरी समाज मन्दिरजी में जाती थी और गुरु महाराज की आरती करती थी। उसके बाद मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज बच्चों को बालबोध भाग पढ़ाया करते थे। सुबह गुरु महाराज का प्रवचन होता था। दोपहर में मुनि श्री विद्यासागर जी का प्रवचन होता था। उसी समय गुरु महाराज के आशीर्वाद से एवं उनके ही सान्निध्य में जैन समाज ने आयुर्वेदिक औषधालय स्थापित किया एवं प्रारम्भ किया था। जिसमें वैद्यराज द्वारकाप्रसाद जी को नियुक्त किया गया था। गुरु महाराज ने उन्हें आशीर्वाद प्रदान करके कहा था- बिना कोई कारण के छोड़कर नहीं जाना' और समाज को कहा था-'वैद्य जी का पूरा-पूरा ध्यान रखना' तब से आज तक औषधालय चल रहा है।' इस प्रकार हे गुरुवर! आपने भारतीय संस्कृति की आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से औषध दान करने के लिए आशीर्वाद प्रदान कर जैन समाज को पुण्यार्जन करने का मार्ग प्रशस्त किया। ऐसे करुणानिधान गुरुवर के आरोग्यधाम चरणों में कोटि-कोटि वंदन करते हुए। आपका शिष्यानुशिष्य
  21. पत्र क्रमांक-१३१ १३-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर कलिकाल जिनमुद्रा धारक परमपूज्य आचार्य गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के जगत्शरण चरणों में त्रिकाल नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु... हे गुरुवर! शास्त्रों में पढ़ा करते हैं कि चतुर्थकाल में मुनियों के दर्शन आशीर्वाद से संसारी प्राणियों के दु:ख-दर्द दूर हो जाया करते थे किन्तु पंचमकाल में भी जो सच्ची निर्दोष आगमयुक्त साधना करता है। तो उनके दर्शन भी मंगलकारी होते हैं। यह आज हम अनुभव कर रहे हैं। आपका आशीर्वाद जिसे मिल जाता उसकी मनोकामना शीघ्र पूर्ण हो जाती। इस सम्बन्ध में कई बातें हमने आपके भक्तों से सुनी हैं। दूदू के उम्मेदमल जी छाबड़ा ने १२-०२-२०१८ को संस्मरण सुनाया वह मैं आपको बता रहा हूँ- गुरु आशीर्वाद ने शिष्य की मनोकामना पूर्ण की ‘‘मौजमाबाद में एक दिन मुनि श्री विवेकसागर जी ने आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज से कहा कि मेरी सिद्धक्षेत्र की वंदना करने की प्रबल भावना हो रही है। तब गुरुवर बोले-‘राजस्थान में सिद्धक्षेत्र हैं नहीं। मध्यप्रांत में हैं जो काफी दूर हैं।' तो विवेकसागर जी बोले- 'मैं धीरे-धीरे विहार कर वंदना कर लूँगा| जब तक मैं सिद्धक्षेत्र की वंदना नहीं कर लूँगा तब तक मैं गेहूँ से बने भोजन का त्याग करता हूँ। हे गुरुदेव! आप आशीर्वाद प्रदान करें मेरी सिद्धक्षेत्र की वंदना सकुशल हो जाये।' तब गुरुवर ने योग्य मुहूर्त बताया और आशीर्वाद दिया। मुनि श्री विवेकसागर जी ने आशीर्वाद लेकर विहार किया। संघस्थ साधु थोड़ी दूर छोड़ने गए। इस तरह गुरु आशीष से मुनि विवेकसागर जी महाराज की सिद्धक्षेत्र सोनागिरि जी की यात्रा सकुशल पूर्ण हुई।'' इस तरह और भी लोगों ने इस प्रसंग के संस्मरण सुनाये किन्तु वे फिर कभी लिखूंगा। मौजमाबाद के प्रवास में एक और बड़ी प्रभावना हुई जिसके बारे में वहाँ के बड़जात्या जी ने बताया- मौजमाबाद में धर्म-ध्यान की प्रभावना “जब आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज संघ सहित मौजमाबाद आये थे तब १९ अप्रैल को महावीर जयंती का महामहोत्सव संघ सान्निध्य में मनाया गया था। सुबह रथोत्सव हुआ फिर कलशाभिषेक हुए थे और दोपहर में आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का केशलोंच हुआ। इस अवसर पर क्षुल्लक सिद्धसागर जी एवं मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज का मार्मिक प्रवचन हुआ। इसके बाद परमपूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का प्रवचन हुआ था एवं रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ था। उस समय संघ का प्रवास बड़े मन्दिरजी में था। मुनि विद्यासागर जी महाराज दोपहर में छोटे बहरे (तलघर) में ही सामायिक करते थे। दो-तीन बार तो रात्रि में भी वहीं ध्यान लगाकर बैठे रहे।” इस सम्बन्ध में अप्रैल १९७० ‘जैन गजट' में समाचार प्रकाशित हुए। इस तरह आपके पदकमल गाँव-गाँव नगर-नगर नये-नये इतिहास को गढ़ते हुए जैन संस्कृति के संस्कारों को प्रसारित करते रहे और आपके अन्तेवासिन् लाड़ले शिष्य मुनि श्री विद्यासागर जी मानो अपने तीन उद्देश्य सेवा-स्वाध्यायसाधना' को हर स्थिति-परिस्थिति में साधने में लगे हों। ऐसे ऐतिहासिक पदचिह्नों को त्रिकाल स्मरणपूर्वक वंदन करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  22. पत्र क्रमांक-१३० १२-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर आकाशसम निरालम्बी परमपूज्य आचार्य गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के मांगलिक चरणों में मंगल हेतु नमस्कार नमस्कार नमस्कार... हे गुरुवर! दूदू से आप ककराला होते हुए मौजमाबाद पहुँचे तब के बारे में श्री दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने बताया- जनगणना में नाम के साथ जैन लिखें आचार्य गुरुवर एवं मुनि श्री विद्यासागर जी के केशलोंच हुए तब एक वक्ता ने कहा कि अगले वर्ष जनगणना होने वाली है। सभी लोग नाम के साथ जैन लिखें जिससे जैन समाज की संख्या का सही-सही आकलन होगा। तब गुरुवर ने अपने आशीर्वादात्मक प्रवचन में कहा- ‘सभी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि नाम के साथ जैन लिखें जिससे अपनी समाज का बाहुल्य दिखे और एकता संगठन दिखे। जैन शब्द पर तो गौरव होना चाहिए क्योंकि यह शब्द तो ‘जिन भगवान से बना है। जो शाश्वत हैं अतः जैन शब्द भी शाश्वत है। बाकी गोत्र तो देशज शब्द हैं, स्थान विशेष से बने हैं, जो शाश्वत नहीं। समाज बचेगी तो संस्कृति बचेगी।'' इस सम्बन्ध में उन्होंने मुझे एक जैन गजट' १६-०४-१९७0 की कटिंग दी। जिसमें इस प्रकार संक्षिप्त में समाचार प्रकाशित थे- केशलोंच एवं रथयात्रा ‘‘मौजमाबाद-यहाँ ५ अप्रैल को रथयात्रा एवं आचार्य श्री १०८ ज्ञानसागर जी का केशलोंच हुआ। एकत्रित जनसमुदाय के बीच १९७१ में होने वाली जनगणना के समय कालम नं. १ में जैन शब्द लिखाने हेतु निवेदन किया गया। इस अवसर पर श्री १०५ क्षुल्लक सिद्धसागर जी एवं १०८ श्री विद्यासागर जी महाराज का सारगर्भित उपदेश हुआ। अंत में आचार्य महाराज ने शुभाशीर्वाद दिया। (पदमचंद बड़जात्या)'' इस प्रकार आप धर्म-समाज-संस्कृति की रक्षार्थ अपने चिंतन से समाज को जागृत करते रहते थे। यही कार्य आज मेरे गुरुवर कर रहे हैं। दीपचंद जी छाबड़ा ने मौजमाबाद के २८ दिवसीय प्रवास का एक और संस्मरण सुनाया जिसे आपको सुनाने में मुझे गर्व महसूस हो रहा है कि मेरे गुरु ज्ञान विनय में कितने निष्णात थे- शास्त्रीय चर्चाओं में समय का पता नहीं चलता ‘‘परमपूज्य आचार्य गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज जब संघ सहित मौजमाबाद पहुँचे तब वहाँ पर श्री १०५ क्षुल्लक श्री सिद्धसागर जी महाराज जो झाबुआ मध्यप्रदेश के थे (उन्होंने आचार्य श्री १०८ वीरसागर जी महाराज से विक्रम संवत् १९९५ में सिद्धवरकूट मध्यप्रदेश में क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की थी) वे विराजमान थे। उन्होंने संघ की आगवानी की थी और प्रतिदिन गुरु महाराज से तत्त्वचर्चा करते थे। एक दिन मध्याह्नकाल में मुनिवर श्री विद्यासागर जी महाराज ने साधक क्षुल्लक सिद्धसागर जी महाराज की प्रशंसा करते हुए कहा- आप बहुत संतोषी-शांत एवं गम्भीर स्वभावी हैं, आपका शास्त्रीय ज्ञान भी अच्छा है। अब तो आपको परिग्रह का आलम्बन छोड़कर स्वानुभूति का रसास्वादन करना चाहिए।' मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज भी प्रतिदिन क्षुल्लक जी से शास्त्रीय चर्चायें करते रहते थे। कभी-कभी तो समय कम पड़ जाता था। उनकी चर्चाओं में समय कैसे बीत जाता पता ही नहीं पड़ता। गुरु महाराज ठीक समय पर आवश्यक करते थे, तो जैसे ही वे निकलते तब समय पर ध्यान जाता कि इसका समय हो गया।" इस प्रकार आप अपने आवश्यकों के पालन में सावधान थे और मेरे गुरुवर, ज्ञानी की पहचान कर उनसे ज्ञान की चर्चा करने में सचेत रहते। ऐसे सम्यग्ज्ञानी गुरु-शिष्य के पावन चरणों में प्रणति निवेदित करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  23. पत्र क्रमांक-१२९ ११-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर सम्यक्त्व विशुद्धिधारक आचार्य गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महामुनिराज के चरणों में सम्यक्त्व विशुद्धिवृद्धिंगत हो इस हेतु त्रिकाल वंदना करता हूँ... हे गुरुवर! आपमें सम्यक्त्व का प्रभावना अंग फलता-फूलता सबको सुवासित करता। आपका सान्निध्य पाकर समाज धर्मप्रभावना का कोई भी अवसर चूकती नहीं थी। इस सम्बन्ध में श्रीमान् उम्मेदमल जी छाबड़ा दूदू ने बताया- छोटे-छोटे गाँव में धर्म प्रभावना आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज साली से साखून, पड़ासोली, रामनगर, हरसोली में प्रभावना करते हुए छप्या गए। छप्या में ६ घर की समाज की भक्ति ने १६ दिन रोका। वहाँ पर मन्दिर जी में नवीन वेदी बनकर तैयार थी। उस पर श्री जी को विराजमान करना था। तो समाज ने गुरुजी से निवेदन किया कि आपके सान्निध्य में वेदीप्रतिष्ठा करना चाहते हैं। तो गुरुजी ने आशीर्वाद प्रदान कर दिया। वेदीप्रतिष्ठा सानंद सम्पन्न हुई। संघ के सान्निध्य में जुलूस निकला, आस-पास की समाज आयी, प्रीतिभोज हुआ, प्रतिदिन तीनों महाराजों का प्रवचन होता और अच्छी प्रभावना हुई। इसी प्रकार दूदू में भी संघ सान्निध्य में महाप्रभावना का इतिहास रचा गया। जिसे लोग आज तक भूले नहीं हैं। ज्ञानसागर जी महाराज छप्या से दूदू पधारे, तो ३५ घर की समाज ने भव्य आगवानी की लगभग १ माह का प्रवास रहा। होली के बाद दूसरे दिन मौजमाबाद की तरफ विहार कर गए थे। दूदू प्रवासकाल में दो जुलूस निकले और मुनि विद्यासागर जी एवं ऐलक सन्मतिसागर जी के केशलोंच की जानकारी २-३ दिन पहले हो जाने से चारों तरफ समाचार भेज दिया गया था। तो आस-पास के २५-३० गाँवों से बहुत अधिक भीड़ मुनि श्री विद्यासागर जी के केशलोंच देखने आयी। इससे पहले और भी साधुओं के केशलोंच हुए किन्तु इतनी भीड़ नहीं आयी, जितनी मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज के केशलोंच देखने आयी । कारण कि बाल ब्रह्मचारी युवा मनोज्ञ मुनि घुंघराले काले बालों को कैसे उखाड़ते हैं यह कौतूहल का विषय होता था । १000-१२00 लोगों का उस दिन भोज हुआ था। यह केशलोंच समारोह राजकीय विद्यालय के मैदान में हुआ था। इस कारण अजैन जनता भी खूब आई थी।" इस कार्यक्रम की खबर को ‘जैन गजट' में १२ मार्च १९७० को प्रकाशित की गई। वह इस प्रकार है- श्रद्धाञ्जलि दिवस एवं केशलोंच समारोह “दूदू ग्राम में पूज्य आचार्य १०८ श्री ज्ञानसागर जी महाराज का संघ सहित फाल्गुन ३ को २४ फर. मंगलवार को पदार्पण हुआ। तब से इस गाँव में महती धर्म प्रभावना हो रही है। पूज्य स्वर्गीय आचार्य प्रवर १०८ श्री शिवसागर जी महाराज का स्वर्गारोहण दिवस गत फाल्गुन कृष्णा अमावस्या ता. ७ मार्च १९७0 शनिवार उनके प्रथम शिष्य चारित्र विभूषण ज्ञानमूर्ति आचार्य १०८ श्री ज्ञानसागर जी महाराज के सान्निध्य में मनाया गया। सर्वप्रथम गाजे-बाजे के साथ श्री १००८ जिनेन्द्र भगवान की सवारी व पूज्य श्री का फोटो सहित जुलूस दिगम्बर जैन धर्मशाला में आया जहाँ पर पहले से ही चौसठ ऋद्धि मण्डल विधान पूजन का आयोजन था। पूजन के पश्चात् स्व. पूज्य आचार्य श्री को श्रद्धांजलि अर्पित की गई । ब्रह्मचारी श्री प्यारेलाल जी बड़जात्या अजमेर तथा बाल ब्रह्मचारी श्री दीपचंद जी ने आचार्य श्री के चरणकमलों में हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित की। मुनिराज १०८ श्री विवेकसागर जी व १०८ श्री विद्यासागर जी के बाद पूज्य आचार्य श्री ने अपने गुरुवर्य के चरणारविंद में विनयपूर्वक हार्दिक श्रद्धांजलि समर्पित करते हुये उनके जीवन पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला। फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा वी.सं. २४९६ रविवार ८ मार्च १९७० को ग्राम के बाहर बाल ब्रह्मचारी मुनिराज श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज व ऐलक श्री १०५ सन्मतिसागर जी महाराज जी का केशलोंच हुआ। जुलूस १००८ श्री जिनेन्द्र प्रभु के रथ में विराजमान कर विशाल पण्डाल में पहुँचा। पंडित श्री हीरालाल जी सिद्धान्त शास्त्री ब्यावर, पंडित चम्पालाल जी नसीराबाद व ब्रह्मचारी श्री दीपचंद जी आदि के भाषण हुए। तत्पश्चात् मुनिराज विद्यासागर जी का भाषण व अन्त में पूज्य आचार्य श्री का आशीर्वादात्मक प्रवचन होकर श्रीजी की सवारी गाजे-बाजे के साथ मन्दिरजी में पहुँची। बालकों को धार्मिक शिक्षा प्रदान करने के लिए आचार्य श्री ज्ञानसागर दिगम्बर जैन पाठशाला की स्थापना की गई। इस प्रकार मुनि श्री विद्यासागर जी का दीक्षोपरान्त ७वां केशलोंच महती प्रभावना के साथ सम्पन्न हुआ। हे गुरुवर! आप श्री का संघ जहाँ भी जाता वहाँ धर्म प्रभावना के साथ-साथ सम्यग्ज्ञान की प्रभावना भी होती जाती। दूदू में आपकी प्रेरणा से आचार्य श्री ज्ञानसागर दिगम्बर जैन पाठशाला में अध्यापन का कार्य मास्टर भंवरलाल जी बोहरा ने सम्भाला। दूदू प्रवास के दो संस्मरण और लिख रहा हूँ। जो मुझे दूदू के उम्मेदमल छाबड़ा जी ने १२-०२२०१८ को सुनाये- मुनि श्री विद्यासागर जी ज्ञान का अवसर न चूकते “आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज जब संघ सहित दूदू में प्रवास कर रहे थे। तब प्रतिदिन मैं रात्रि में वैयावृत्य के समय पर पुराने कवियों की जकड़ियाँ (भजन) सुनाया करता था। उनको विद्यासागर जी महाराज बड़े ध्यान से सुनते और प्रसन्न होते थे। जिन शब्दों का अर्थ उन्हें समझ में नहीं आता था तब दूसरे दिन सुबह जब मैं मन्दिर जाता, उन्हें नमोऽस्तु करता तो वे बड़े उत्साह के साथ उन शब्दों का अर्थ पूछते थे। इस तरह वे अपना हिन्दी का ज्ञान मजबूत बनाते रहते थे। पुराने कवियों में दौलतरामकृत, भूधरदासकृत, रामकृष्णकृत, जिनदासकृत आदि जकड़ियों को सुनाते थे। मनोविनोदी मुनि श्री विद्यासागर “एक दिन मुनि श्री विद्यासागर जी शाम की सामायिक खुले में कर रहे थे। उस समय शाम को ठण्डक हो जाया करती थी और ठण्डी हवा चला करती थी। तो दूसरे दिन हमने निवेदन किया-महाराज! अभी शाम को खुले में ठण्डक हो जाती है और जाती हुई ठण्ड से बचना चाहिए क्योंकि यह रोग का कारण होती है, ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।' तो हँसते हुए विद्यासागर जी बोले-' धनमाद्यं खलु गृहस्थधर्मसाधनम्।' यह सुनकर गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज को भी हँसी आ गयी।" इस प्रकार आपके लाड़ले शिष्य सतत ज्ञानार्जन में लगे रहते और उनका विकासशील ज्ञान उनके प्रवचन, तत्त्वचर्चा, व्यवहार में परिलक्षित होता। ऐसे ज्ञानी गुरु-शिष्य के चरणों में निज सम्यग्ज्ञान के विकास हेतु त्रिकाल वंदन करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  24. पत्र क्रमांक-१२८ १०-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर सिद्धान्तसागर में अवगाहित परमपूज्य आचार्य गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पुनीत चरणों में कोटिशः नमस्कार करता हूँ... हे गुरुवर! आप जब साली ग्राम में प्रवास कर रहे थे तब का एक संस्मरण साली के आपके अनन्य भक्त श्रीमान् पदमचंद बड़जात्या जी ने १२-०२-२०१८ को सुनाया वह मैं आपको बता रहा हूँ- मुनि विद्यासागर जी ने अंग्रेजी में आरती कराई हम बच्चे लोग मुनि विद्यासागर जी महाराज के पास बैठते थे तो हम लोगों को वे ज्ञान की बातें सिखाया करते थे। एक दिन उन्होंने भगवान की आरती अंग्रेजी में बनाई और हम लोगों को सिखाई। फिर दूसरे दिन हम लोग रटकर गए। तो उन्होंने वह आरती कराई थी। जब तक वे साली में रहे तब तक रोज हम लोग उनके साथ वह आरती पढ़ते थे।" इस तरह मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज बच्चों के साथ मनोविनोद में भी ज्ञान की बातें करते थे। जो बड़े-बड़े अंग्रेजी लिखने-पढ़ने-बोलने वाले भी नहीं कर पाते थे, अंग्रेजी में पोयम बनाने का वह कार्य आपके प्रतिभावान् शिष्य कर देते थे। इसी प्रकार हिन्दी भाषा को अच्छी बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहते थे। आपके संकेतानुसार उन्होंने बच्चों को माध्यम बनाया और जैसा कि ज्ञान बाँटने से ज्ञान बढ़ता है इस बात को आपसे सीखकर बच्चों के साथ समय साझा करना शुरु कर दिया। इस सम्बन्ध में हरसौली के राजकुमार जी दोसी ने १२-०२-२०१८ को बताया- मुनि विद्यासागर जी ने लगाई बच्चों की कक्षा ‘‘हमारे गाँव में जब मुनि विद्यासागर जी आये थे तब उनके साथ में उनके गुरु ज्ञानसागर जी महाराज और गुरु भाई मुनि श्री विवेकसागर जी महाराज (मरवा वाले) एवं २-३ ऐलक, क्षुल्लक भी थे। तब हम छोटे थे लगभग १०-१२ वर्ष के। उस समय हमारे गाँव में एक बैण्ड पार्टी थी जो बाहर भी जाती थी। काफी प्रसिद्ध पार्टी थी। उस पार्टी को आगवानी में बुलाया गया था। संघ का ५-६ दिन का प्रवास रहा। सुबह गुरु महाराज ज्ञानसागर जी का प्रवचन होता था। दोपहर में मुनि श्री विवेकसागर जी, मुनि श्री विद्यासागर जी का प्रवचन होता था। मुनि श्री विद्यासागर जी हम बच्चों को देखकर मुस्कुरा देते थे। शाम को गुरु महाराज ने हम बच्चों से कहा-“जाओ विद्यासागर जी के पास बैठो और मुनि श्री विद्यासागर जी को कहा- इनको ‘ज्ञान प्रबोध' पुस्तक पढ़ाओ।' तब हम लोग मन्दिर जी से पुस्तक लेकर आये। हम १०-१२ बच्चों को प्रतिदिन शाम को उस पुस्तक में से २४ तीर्थंकर भगवानों के नाम-चिह्न, बारह भावना, मेरी भावना पढ़ाते और अर्थ समझाते थे। जब गाँव से उनका विहार हुआ तो जाते समय कहा- ‘रोज पढ़ना, याद हो जायेगा।' मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज के वे शब्द आज तक कानों में गूंजते हैं। तब हम बच्चे रोज पढ़ते रहे। तब से आज तक वे सब पाठ याद हैं। पूरा संघ मन्दिरजी की कोठड़ी में रहता था। शाम को हम बच्चे विद्यासागर जी महाराज के साथ चारा (प्याल) को कोठड़ी में बिछाते थे। बच्चे बाहर से प्याल लाते और विद्यासागर जी महाराज अपने वयोवृद्ध गुरुवर के निमित्त प्याल में पिच्छी लगाकर बिछाते जाते थे।'' इस तरह मुनि विद्यासागर जी महाराज अपने सेवाकर्तव्य का पालन करते और आपके संकेतानुसार बच्चों को संस्कार देते। जिससे उनकी हिन्दी अच्छी होती चली गई। यह तो आपने भी महसूस किया ही होगा। ऐसे पुरुषार्थशील गुरु-शिष्य को नमन करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  25. पत्र क्रमांक-१२७ ०९-०२-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर जगत के आश्रयभूत आचरण के धारक आचार्य गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महामुनिराज के जगत्पूज्य चरणों में कोटिशः नमोऽस्तु करता हूँ... हे गुरुवर! आप सदा चारित्रधारी साधुओं की आठों शुद्धियों को चिन्तन-मनन-आचरण करते थे। आगम प्रणीत चारित्र में आपकी अटूट निष्ठा थी। इस सम्बन्ध में दूदू के उम्मेदमल जी छाबड़ा (मरवा) ने १२-०२-२०१८ को ज्ञानोदय में तीर्थ पर बताया- छोटे-छोटे ग्रामों में प्रभावना ‘‘आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का जैसा नाम था वैसा ही काम था। वे मात्र शाब्दिक ज्ञान के धनी नहीं थे। वरन् भावज्ञान से ओत-प्रोत थे। यही कारण है कि उनका ज्ञान आचरण में बोलता था। विहार में भी अपनी चर्या-क्रिया में परिवर्तन नहीं करते थे। मरवा से विहार करके छोटा नरैना गए, वहाँ से साली ग्राम गए, साली में गुरुदेव ने ८ घर की समाज की भक्ति को देखते हुए १८ दिन का प्रवास किया। एक दिन भयंकर ठण्ड में भी केशलोंच किया तब मन्दिरजी में जैन-अजैन जनता समा नहीं रही थी और प्रतिदिन तीनों मुनिराजों के प्रवचन होते थे।" धन्य हैं आप गुरुवर! जो ऊपर से नारियल की तरह कठोर चर्या और भीतर से किसमिस की तरह मधुर व्यवहार करते। आपके पावन चरणकमलों की त्रिकाल वंदना करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
  1. Load more activity
×