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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • सब में वही ... मैं ...

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    अनुचरों

    सहचरों औ

    अग्रेचरों

    के विकासोन्मुखी

    विविध गुणों की  

    सुरभि-सुगंधि की

    जो अपनी धीमी गति से

    सुगंधित करती

    वातावरण को

    फैल रही...

     

    ...उपहासिका  

    नहीं बने

    किन्तु...

    सुगंधि को

    सूँघती हुई

    पूर्ण रूपेण

    सादर / सविनय  

    अपने चारों ओर

    बिखरे हुए

    घिरे हुए

    काँटों को भी

    खुल खिल हँसने

     

    जगने

    मृदुतम बनने की

    प्रेरणा देती हुई

    सकल दलों सहित

    उत्फुल्ल फूलों-सी

    फूली न समाये

    यह मम नासिका

    बने...ध्रुव गुण उपासिका

    ऐसी दो आसिका

    गुणावभासिका

    हे अविकल्पी

    अमूर्त शिल्प के शिल्पी...!

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