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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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भारत का इतिहास स्वर्णिम था, वर्तमान क्यों नहीं?

उत्थान का आधार क्रमिक विकास है, गति, प्रगति तदोपरान्त उन्नति सोपान है। छलांग लगाकर प्रमाण-पत्र प्राप्त किया जा सकता है, योग्यता प्राप्त नहीं होती। भारत की श्रमण साधना के उन्नायक, प्रख्यात विचारक दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी ने अमरकण्टक में यू.एन.आई. की दिल्ली ब्यूरो प्रमुख सहित अन्य चिन्तनशीलजनों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए सामाजिक, ऐतिहासिक, शैक्षिक सन्दर्भों में उपरोक्त मत व्यक्त कर बताया कि पाश्चात्य दृष्टि से आंकलन करने की अपेक्षा अपने गौरवशाली अतीत के दर्पण में देखना चाहिए।

वचन में बल होता है

सुप्रसिद्ध सन्त शिरोमणि दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने अमरकण्टक में वचन – बल का बोध कराते हुए कहा कि अल्प वचन से पर्याप्त प्रभाव उत्पन्न हो जाता है, अधिक शब्द प्रयोग की आवश्यकता नहीं। सत्य वचन में अहिंसा की आराधना समाहित रहती है। वचन ऐसे हों जिससे किसी प्राणी का जीवन न रूके। शब्दों के अनुरूप अंगों – उपांगो की मुद्रा हो जाती है। आचार्य श्री विद्यासागर जी ने शब्द, अर्थ और भाव का महत्व बताते हुए कहा कि जिस वचन से हिंसा की संभावना हो वह सत्य वचन नहीं है, सत्य वचन से प्रत्येक प्र

भेद – भाव, छुआ – छूत एक बीमारी है

तपोनिधि, ज्ञान वारिधि, साधना षिरोमणि दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने मैकल पर्वत माला के षिखर अमरकण्टक में कहा कि औषधि का आधार वनस्पति है, संसार की प्रत्येक वनस्पति औषधि गुण युक्त है, वनस्पति के विनाष से औषधि भी नष्ट हो जाती है। ताल (वृक्ष) में पल्लव, कोपल, लता, छाल, जड़ आदि सभी निहित है। सरल हृदय से निकली बोली व्याकरण युक्त सुसंस्कृत भाषा से अधिक प्रभावी है यह समझाते हुए बताया कि छुआ – छूत की भावना एक बीमारी है जो कि ‘स्टैन्डर्ड’ वृद्धि प्रतिस्पर्धा की देन है। आचार्य श्री वि

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

सन्त षिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने रमणीक स्थल अमरकण्टक में संस्कृति और विकृति के मध्य भेद का बोध कराते हुए कहा कि विकृति की उपासना कर मानव मन भटक रहा है। संस्कृति की उपासना कर मानव महामानव बन गया। मानव से महामानव बनने का क्रम विष्वास – आस्था से आरंभ होता है। प्रयोग की बताते हुए कहा कि खोज इसके आधार पर ही होती है। दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी ने बताया कि अठारह दोषों से रहित आत्मा ही भगवान है। आस्था और विष्वास के बल पर प्रयोग किया, साधना कर दोष मुक्त होकर मुक्ति को प्राप

‘‘शब्द भी होते हैं विस्फोटक’’

अमरकण्टक में विराजमान सन्त षिरोमणि दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी ने कहा कि स्व प्रषंसा, पर आलोचना ध्यान में नहीं लाना एक साधना है। वचनों की व्याख्या करते हुए बताया कि वचन से विस्फोट हो जाता है, अप्रिय वचन अर्पित वचन नहीं है। परस्पर आरोप प्रत्यारोप में व्यस्त पक्ष विपक्ष से राष्ट्रीय पक्ष पीछे रह जाता है। आचार्य श्री विद्यासागर जी ने षिष्य, साधकों एवं श्रोताओं को समझाते हुए कहा कि कौन से वचन कथनीय है कौन से नहीं, वचन व्यक्त करने के पूर्व विचार कर लेना चाहिए। अपने कथन पर ध्यान नहीं पर

शब्दों को नहीं भावों को पकडो

सुप्रसिद्ध सन्त षिरोमणि दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी ने मैकल शैल षिखर पर उपस्थित समुदाय को सम्बोधित करते हुए कहा कि सजग श्रोता वक्ता की कठिनाई पकड़ लेता है, शब्दों की यात्रा कान तक तथा भाव की मन तक होती है। भावों का महत्व बताते हुए समझाया कि भावाभिव्यक्ति के लिए शब्दों की अनिवार्यता नहीं है, मौन और संकेत से भी भाव व्यक्त हो जाते हैं। आचार्य श्री विद्यासागर जी ने कहा कि शब्द के अभाव में संकेत अच्छी तरह काम कर देता है। शीतल हवाओं के प्रभाव से शारीरिक क्षमता प्रभावित हो जाती है। अधिक ठण्ड

हाथ न मलो, हाथ न दिखाओ, हाथ मिला लो

अकलतरा: उक्त बातें जैन समाज के संत षिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए बालक प्राथमिक शाला में कही। उन्होंने कहा कि दूसरों का वैभव देखकर हम अपना हाथ मलते हैं तथा ईष्या करते हैं। हम पुरुषार्थ के द्वारा जीवन में तरक्की एवं आगे बढ़ सकते हैं। इससे हमें अपना हाथ नहीं मलना पड़ेगा। हम भाग्य भरोसे रहकर पुरुषार्थ पर विष्वास नहीं करते एवं दूसरों को अपनी हाथ की रेखा दिखाने का कार्य करते हैं एवं दूसरे व्यक्ति पर बातचीत से हल नहीं निकलने पर अपना हाथ उसपर छोड़ देते हैं, जो

जन्म मरण के चक्र को तोडे़ं

रायपुर राजधानी के टैगोर नगर में इन दिनों धर्म की अमृतधारा बह रही है। यहां संत शिरोमणी आचार्य गुरूवर 108 विद्यासागर जी महाराज ससंघ विराजमान है। आचार्य श्री विनय अपने मंगल प्रवचन में एक दृष्टांत सुनाते हुए कहा कि फल फुल से आता है, और फुल वृक्ष में उत्पन्न होता है। और वृक्ष की उत्पत्ति बीज से होती है, बीज फल से प्राप्त होता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है, बीज से वृक्ष, वृक्ष से फूल, फूल से फल और फल से पुनः बीज प्राप्त होता है। उन्होने श्रावको से सवाल किया इस चक्र को कोई तोड़ सकता है क्या तो सभी ने

आत्मा का वैभव न्यारा है और वर्णनातीत है

आज को नहीं देखा तो आज और कल दोनों हाथ से निकल जाएंगे जगदलपुर, 07 जनवरी। राष्ट्र संत शिरोमणी आचार्य विद्यासागरजी ने कहा कि जिस तरह स्टेशन में ट्रेन आ रही हो और हल्लागुल्ला हो रहा हो रहा है और रेडियो, टीवी भी चल रहा हो उसी समय किसी का मोबाईल आ जाये तो केवल उससे ही संपर्क होता है उसी तरह संत मुनि, श्रुति व ग्रंथों के माध्यम से पूर्व में घटी घटनाओं और विषयों को जान लेते हैं और उसका आनंद लेते हैं। दुकान पर हम आज नगद कल उधार लिखते हैं, लेकिन ग्राहक से ऐसा नहीं कह सकते। कल का कोई स्वरूप तो हमने दे

दर्पण हमें अपनी कमियां दिखलाता है

राष्ट्र संत जैनाचार्य विद्यासागरजी ने कहा कि वीतराग प्रभु को देखकर हमारे भाव शुद्ध होते हैं। मुनिराज भी पूज्य होते हैं, इनकी उपासना के महात्मय को चक्रवर्ती भरत और बाहुबली की कथा सुनाते हुए कहा कि अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए दोनों बाहुबल से लड़ रहे थे, किंतु सब कुछ जीतने बाद भी बाहुबली ने अपना सर्वस्व त्याग कर बैराग्य धारण कर लिया। उन्होंने कहा कि दर्पण हमें हमारी कमियां दिखाता है। हम अपनी कमियों को दूर कर भगवान की भक्ति पूजन करें, यही संदेश हमें प्रभु से मिलता है। आकांक्षा लॉन में दो

शिक्षा का स्वरूप बिगड़ गया है

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा कि आज विवाह का उद्देश्य बदल गया है। प्राण ग्रंथों में कथायें आती हैं पहले ब्रम्हचर्य व्रत का पालन करते थे, गुरूकुल पद्धति से शिक्षा होती थी संस्कार दिये जाते थे, आज शिक्षा का स्तर बिगड़ गया है। समवशरण विधान के छटवें दिन राष्ट्रीय संत छत्तीसगढ़ के राजकीय अतिथि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने एक कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि एक लड़का शुक्ल पक्ष और लड़की कृष्ण पक्ष ब्रम्हचर्य व्रत ले लेते हैं और आजीवन निभाते हैं। आचार्य श्री ने दिल्ली के कलाकारों द्वार

मन और इन्द्रियों पर विजय पाना ही जैन धर्म का सार है

राष्ट्र संत आचार्य विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि जैन धर्म भावों पर आधारित है। भावों से ही व्यक्ति का उत्थान और पतन होता है। जैन धर्म की परिभाषा बताते हुए उन्होंने कहा कि जैन वह होता है जो मन और इंद्रियों पर विजय पाता है। इंद्रियों को जीतना ही संयम है और संयम व्यक्ति के सच्चे सुख के लिए आधार प्रदान करता है। स्थानीय होटल आकांक्षा के लान में दिगम्बर जैन समाज द्वारा आचार्य विद्यासागर के सानिध्य में चल रहे समवशरण चैबीसी विधान में राष्ट्रीय संत के रूप में एवं गणधर परमेष्ठि के पद पर आसीन गुरूवर ने अपने

आग और धन पर सफलता के लिए बहुत जरुरी है नियंत्रण

प्रातरूकाल उठते ही सबसे पहली जरुरत आदमी को अग्नि की होती है। चाहे वह पानी गरम करने के लिए हो अथवा भोजन बनाने के लिए या फिर प्रकाश करने के लिए, हर कार्य के लिए अग्नि की जरुरत होती है। उसी प्रकार से धन पर भी नियंत्रण रखना अतिआवश्यक होता है। यदि धन आने के बाद उस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो वह भी विनाश का कारण बनता है। यहां प्रवास कर रहे आचार्य श्री  विद्यासागर महाराज ने एक जनसभा को स्थानीय जैन दिगम्बर मंदिर में प्रवचन करते हुए उक्त बातें कहीं।   उन्होंने आगे कहा कि यदि सीमा से अधिक अग्रि

भगवान की भक्ति से होता है कल्याण

भगवान की भक्ति से भक्त अपने आप को स्वयं भगवान बना सकता है। इसी उद्देश्य को लेकर आगामी तीस दिसंबर से आठ जनवरी तक छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल के मुख्यालय जगदलपुर में चैबीसी समवशरण विधान का आयोजन हो रहा है।   आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने नगर में होने वाले इस विश्व शांति महायज्ञ और चैबीसों जैन तीर्थंकरों की पूजा का महत्व प्रतिपादित करते हुए कहा कि यह पुण्य अवसर है कि समूचे भारत वर्ष में तीसरे स्थान पर यह विशेष अनुष्ठान का आयोजन हो रहा है। इसके लिए सीमित समय में बस्तर के दिगंबर जैन समाज ने

टेंशन  नहीं करो मैडिटेशन  करो।

चंद्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़  में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा कि साक्षात महावीर भगवान आज नहीं है लेकिन उनके द्वारा बताया हुआ मार्ग तो है। यह धारा अनादि अनिधन है। जिनेन्द्र भगवान के द्वारा दिया हुआ यह चिन्ह है। यहाँ व्यक्ति की पूजा नहीं व्यक्तित्व की पूजा होती है। मुद्रा घर की नहीं रहती है, देष के द्वारा छपती है, उसके लिये सभी मान्यता देते हैं। विदेश  की मुद्रा से यहाँ व्यापार नहीं होता है उसके लिये करेन्सी को कन्वर्ट करना पड़ता है। जीवन का निर्वाह नहीं निर्माण करन

शिक्षा  का मंदिर महत्वपूर्ण है। 

चंद्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़  में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा कि आज के दिन प्रभु को मुक्ति मिली उनका निमित्त   पाकर असंख्य जीवों का कल्याण हुआ है। आज प्रातः हमने वर्षायोग का निष्ठापन किया है। प्रतिभा स्थली बनाने की भावना छत्तीसगढ़  वालों की बहुत अच्छी है और वे अच्छा प्रयास भी कर रहे हैं। इसमें बहुत लोगो ने सहयोग किया है। अभी हमने आग्रह स्वीकार नहीं किया है। प्रतिभा स्थली की रेंज कहाँ तक है यह अभी ज्ञात नहीं होगा। ज्ञान को सर्वगत कहा है, शिक्षा  से जिंदगी क्या अगला

दुर्जन से की गई मित्रता हितकर नहीं होती दुःख दायक होती है।

चंद्रगिरि डोंगरगढ़ छ्त्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा कि दुर्जन से की गई मित्रता हितकर नहीं होती दुःख दायक होती है। कोई रूधिर से सने हुए वस्त्र को रूधिर से ही धोता है तो वह विषुद्ध नहीं होता है। उसी तरह वह आलोचना शुद्धि दोष को दूर नहीं करता। जिन भगवान के वचनों का लोप करने वाले और दुष्कर पाप करने वालों का मुक्ति गमन अति दुष्कर है। यदि उपचार नहीं कर सकते मरहम पट्टी नहीं कर सकते तो डण्डा तो मत मारो उस रोगी को। मैत्री उससे करो जो समय पर काम दें। सभा उसी का ना

मांस निर्यात शर्मनाक है । 

चंद्रगिरि डोंगरगढद्य छत्तीसगढ़  में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा कि कर्नाटक वालों ने कहा कुछ उद्बोधन  कन्नड़ में हो, तो हम कुछ पंक्तियाँ सुनाते हैं – ‘‘मेहनत करो तो मीठा खाना भी सार्थक होता है ’’। एक पिता ने अपने पुत्र को पत्र लिखा उसमें धन को शक्ति कहा है लेकिन इसका दुरूपयोग नहीं करना। गाय, भैंस, हाँथि, घोड़े आदि को भी धन कहा है। आज भारत से मांस का निर्यात हो रहा है और गोबर अर्थात खाद का आयात हो रहा है यह शर्मनाक है। जिससे पशुओं की हिंसा हो रही है। गुरू जी (आचार

धन का दुरूपयोग नहीं करें।

चंद्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा कि द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, भव पाँच प्रकार के संसार का वर्णन किया गया है। अनंत संसार सागर में मनुष्य पर्याय पाना दुर्लभ है। मनुष्य क्षेत्र अल्प है, त्रिर्यंच तो सब जगत में उत्पन्न होते हैं। बालू की लकीर के समान क्रोध, लकड़ी के समान मान, कीचड़ के समान लोभ है। दूसरे पर झूठा दोष लगाना, दूसरे के गुणों को न सहना, ठगना ये दुर्जनों के आचार है। दूसरे के धन को किसी भी बुरे माध्यम से लेना खोटा कार्य है। धन से भ

योद्धा जैसा होता है साधक।

चंद्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़  में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा कि यह जीव आहार मय है, अन्न ही इसका प्राण है। अनुशासन  में रहना कठिन होता है। सिंह को भी रिंग मास्टर अपने काबू में कर लेते हैं। ज्ञानी आचार्य के द्वारा श्रुत का ज्ञान कराने से और योग्य शिक्षा  रूप भोजन से उपकृत होने पर भूख प्यास से पीडि़त होते हुए भी ध्यान में स्थिर होता है। अनुशासन  रूपी भोजन 24 घंटे करो आप। डाॅ. रोगी के आवेश  से हताश  नहीं होते हैं और होने भी नहीं देते, रोगी को “यू आर प्रोग्रेसिव” कहते

आत्मा की कोई ऐज नहीं होती।

चंद्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़  में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने  एक वृद्ध का दृष्टांत सुनाते हुये कहा कि आपकी क्या चीज गुम गई है ? तो उन्होने कहा कि जवानी मेरी कहीं धूल में गुम गई है वह ढूंढ़ रहा हूँ। हम ठान ले तो कोई काम असंभव नहीं है । पासिबिलिटी  रहती है तो कार्य होता है। आत्मा की कोई ऐज नहीं है इसलिये अपने आपको वृद्ध या जवान नहीं समझें। चींटी में वही आत्म तत्व है और बड़े पशुओं आदि में भी वही आत्म तत्व है। जितना जाना माना उस पर शोध प्रारंभ कर दो। आँखें बंद करोगे तो आ

गाय से वात्सल्य करें ।

चंद्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़  में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा कि मेहमान के यहाँ खुलकर के कार्य नहीं कर पाते हैं संकोच से करते हैं। विदेश  में ऐसे प्रयोग कर रहे हैं गाय का दूध 45 रू. लीटर है। उस दूध का नाम अहिंसक दूध रखा है, वहाँ गाय के नाम भी रखे जाते हैं श्यामा, गोरी आदि शब्दों में अंतर आ जाता है, वह दूध ज्यादा देती है। आपके प्रेम, वात्सल्य से बहुत अंतर आता है जैसे बच्चों में आहलाद होता है वैसे ही गायों में होता है। उस दूध का सेवन करने के बाद कहते हैं ऐसा स्वाद क

सरकार की बुद्धि ठीक करें अहिंसा यूनियन से ।

मंच संचालक चंद्रकांत जैन ने बताया कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी के सानिध्य में विश्व   अहिंसा दिवस मनाया गया वैसे भी देखा जाये तो महात्मा गांधी जी का जन्म भी अक्टूबर में हुआ और आचार्य श्री विद्यासागर जी का भी जन्म अक्टूबर में हुआ । दोनों महापुरूषों ने अहिंसा का शंखनाद किया। आचार्य श्री के आशीर्वाद , प्रेरणा एवं उपदेश  से पूरे भारत में लगभग 100 गौशालायें चल रही है । हिंसा को मिटाने के लिये अहिंसा का प्रचार आवश्यक  है। आचार्य श्री के हृदय में  बहुत अनुकम्पा, दया है। वह प्रवचन में गाय की रक्ष
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