Jump to content
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

Blogs

सत्य धर्म 

पूज्य गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा की सत्य क्या है, संसार की कल्पनाएं असत्य हुआ करती हैं , द्रव्य का लक्षण सत्य होता है । स्वप्न जो साकार होते हैं उनका पूर्वाभास माहनआत्माओं को हो जाता है । 16 स्वप्न माता को दिखाई देते हैं और तीर्थंकर के आगमन का आभास हो जाता है  । उनके आने के पूर्व ही भोर का उदय हो जाता है एक आभा सूर्य के आभाव में भी सत्य का प्रकाश बिखेरती है । महापुरुष के जीवन में भी इसी प्रकार की सत्य की आभा फूटने लग जाती है ,ऐंसा सत्य का प्रभाव होता है। ऐंसे ह

तत्वार्थ सूत्र

64 लब्धियां होती हैं और आपके पास छयोपसम्म लब्धि है ।  सम्यक दर्शन ,ज्ञान , चारित्र को प्राप्त करने बाला भव्य होता है और जो इससे वंचित है बो अभव्य है । कर्म के क्षय के उपरांत भी आप रहने बाले हो । भव्य कभी अभव्य नहीं हो सकते और अभव्य कभी भव्य नहीं हो सकते किन्तु अभव्य के पास भव्य होने की क्षमता तो है परंतु अज्ञान दशा के कारण बह भव्यता से वंचित रहता है।  तत्व के आभाव में भी हमारा अस्तित्व रह सकता है कुछ ऐंसे तत्व भाव रहते हैं , उपयोग चैतन्य में होता है , नैमित्तिक सम्बन्ध में हमेशा आत्मा में रहने ब

माया से बचने का प्रयास

पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागरजी महाराज ने कहा क़ि माया से बचने का प्रयास करो क्योंकि माया की छाया पतन की ओर ले जाती है। जब छाया आपकी कहीं पड़ती है तो प्रकाशमान वो स्थान भी प्रकाश रहित हो जाता है इसी प्रकार माया की छाया से आपका प्रकाशित जीवन भी अंधकारमय हो जाता है।विक्रिया ऋद्धि सदुपयोग में लगती है तो दिन दूनी रात चौगुनी बृद्धि आपके जीवन में हो सकती है। अंधेरों से निकलकर उजालों की बात करो। देवलोक में कभी रात नहीं होती , थकावट नहीं होती परंतु वो धरती पर मनुष्यों को देखकर लट्टू हो जाते हैं । धरती

लोकनीति लोकसंग्रह है लोभसंग्रह नहीं

आचार्य श्री ने कहा की बड़ी बड़ी वस्तुएं होती है जो क्रेनें के माध्यम से उठाई जाती हैं । हिम्मत विश्वास और ताकत से ही दायित्व का भार उठाया जाता है । दायित्व दिया जाता है उसे जो सक्षम कंधे होते हैं , दायित्व का भार अनूठा होता है उसे ही दिया जाता है जो इस भरोसे को पूरा करने की सामर्थ रखता हो । जो जिसका रसिक होता है उसका पान आनंद के साथ करता है । आप सब दायित्व से न घबराएं अपने आदर्श पुरुषों को समक्ष रखकर कार्य प्रारम्भ करे । लोकतंत्र मैं जो लोक का हो जाता है उसके प्रति समर्पित हो जाता है बही लोकतंत्र

वस्तु को प्राप्त करने के लिए भूमिका बनाई जाती है

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में कहा की जिस वस्तु को प्राप्त करना है उस वस्तु को प्राप्त करने के लिए भूमिका बनाई जाती है। जैंसे आप लोगों को घी प्राप्त करना है और  घी से आप अपरिचित हैं तो फिर उसका स्रोत्र खोजने का प्रयास करेंगे तब आपको उसकी जानकारी लगेगी। स्रोत पर आप पूरा विश्वास करेंगे तो उससे घी प्राप्त कर लेंगे, दूध स्रोत है और उस पर श्रद्धान करेंगे तो अवश्य घी प्राप्त कर पाएंगे।   ऐंसे ही मोक्ष मार्ग का स्रोत मनुष्य पर्याय है और वीतरागी धर्म है जिस पर श्रद

त्याग किसी बस्तु मात्र का करने से कुछ नहीं होगा

" जो आप प्राप्त करना चाहते हैं पहले आपको छोड़ना पड़ेगा क्योंकी त्याग से ही प्राप्ति सम्भव है " उक्त कथन आज पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा की स्वार्थ और निस्वार्थ ये जीवन के लिए दोनों आवश्यक है जैंसे जो श्वास आपने अपने स्वार्थ के लिए भीतर ली है उसे बहार छोड़ना ही पड़ेगा ऐंसे ही मोक्ष मार्ग में आप भरोसा रखो या न रखो परंतु बिना भरोसे के मोक्ष मार्ग प्रशस्त भी नहीं हो सकता ।राग के मार्ग को छोड़े बिना बैराग्य का मार्ग प्रशस्त नहीं होता , त्याग किसी बस्तु मात्र का करने से कुछ नहीं होगा राग द्

पानी के वेग में उशी दिशा

"नदी में बाढ़ आती है , बाढ़ उसे बोलते हैं जिसमें पानी का वेग होता है जिसमें सब कुछ बेहतर जाता है ।"  उक्त उदगार पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा की  बाढ़ के वेग में अच्छे अच्छे कुशल नाविक भी घबराया जाया करते हैं ,पानी के वेग में उशी दिशा में बहना पड़ता है नदी को हम कुशलता पूर्वक पार कर सकते हैं ऐंसे ही कर्मों का वेग है जिसमें हमको उसी की गति के अनुसार बहना पड़ता है । जब कर्मों का वेग धीमा होता है उस समय हम अपना पुरुषार्थ कर सकते हैं।   आचार्यों ने कहा है की जब भूख न लगी हो तो कि

मन का काम नहीं करना

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में कहा कि जैंसा हम प्रयोग करते हैं बैंसा योग होता जाता है ,भावों के साथ प्रयोग करने पर शुभ योग होता है । जीवन एक प्रयोगशाला है जिसमें नित नए प्रयोग किये जाते हैं , आनंद की अनुभूति प्रयोग के बिना नहीं होती है।   भक्ति का प्रयोग जीवन में सतत् चलता रहना चाहिए , परंतु भक्ति के प्रयोग में अपने साधर्मी बंधुओं का ध्यान भी रखना चाहिए । भक्ति की अंजुली किसी की छोटी हो सकती है ,किसी की बड़ी हो सकती है ,किसी की अंजुली ऊपर से छोटी है परंतु भा

भक्ति करते समय अपनी भवन व्यक्त

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने अपने प्रवचनों में कहा क़ि जो भगवान का भक्त होता है बो भक्ति करते समय अपनी भवन व्यक्त करता है । सम्यक दर्शन की विशेषता क्या होती है ये आप सभी को ज्ञात होना चाहिए ताकि आप भक्ति के मार्ग को और सुदृढ़ बना सको ।सम्यक दर्शन होने के उपरांत जो बंध के कारन बिभिन्न परिस्तिथियां जीवन में उत्पन्न होती हैं उसके बारे में ज्ञात होना चाहिये । थोडा सा स्वाध्याय करने से ये ज्ञान भी जागृत किया जा सकता है । जिस दुकान को या व्यापर को आप जिस बारी की के साथ और समूचे बाजार पर नजर

जीवन में मौलिक क्षण

पूज्य आचार्य श्री ने कहा की महोत्सव प्रारम्भ हुआ जीवन में मौलिक क्षण आये चिरप्रतीक्षित समय आ गया है उमंगें तरंगें हैं सभी के मन में महोत्सव की प्रतीक्षा के लिए जिज्ञासा है , सौभाग्य के क्षण, तोरण द्वार सजे हैं , गीत , संगीत बज रहे हैं सबको प्रतीक्षा है उन क्षणों की । रोंगटे खड़े हो जाते हैं किन्तु महोत्सव किसके लिए है ये किन्तु कहते ही सब में जिज्ञासा जागृत है । होता बही है जो ललाट पर लिखा होता है उसे कोई बदल नहीं सकता ये लेखा मिटाया नहीं जा सकता है । लकीर मिटने से समय का लिखा मिटाया नहीं जा सकता

संत प्रभावित नहीं होते

जैन संत आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा है कि पानी गरम हो सकता है, बरफ नहीं, इसी प्रकार मनुष्य प्रभावित होता है, संत या मुनि नहीं।   उन्होंने कहा कि जल का स्वभाव शीतलता है, लेकिन वह कुछ समय के लिए गरम हो सकता है। उसमें गरम होने की क्षमता है। लेकिन यदि वह बरफ बन जाए तो उसे गरम नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार मनुष्य कुछ समय के लिए प्रभावित हो सकता है, उसमें प्रभावित होने की पात्रता है, लेकिन मनुष्य एक बार सच्चा संत बन जाए तो उसे प्रभावित नहीं किया जा सकता। क्योंकि वह आत्मा में रमण

जब हम यात्रा पर जाते हैं

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा क़ि जब हम यात्रा पर जाते हैं तो वाहन में पेट्रोल की आवश्यकता होती है और हमारा वाहन चालक आवश्यकता अनुसार उसमें पेट्रोल डालता है । अब मानलो क़ि किसी कारन से पेट्रोल पंप में पेट्रोल नहीं होने के कारण वाहन में पेट्रोल नहीं भर पाया तब वाहन उतना ही चलेगा जितना पेट्रोल पहले से भरा हो । ऐंसे ही प्रत्येक जीव एक गति से दूसरी गति में जाता है तो उसे कर्मों की ऊर्जा के हिशाब से चलना पड़ता है चाहे बो संसारी हो , चाहे नारकीय हो ,जहां का निमित्त हो बहिन जाना पड़ता है इस

चन्दन का स्वाभाव शीतल

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा की चन्दन का स्वाभाव शीतल होता है आप तिलक के रूप में माथे पर लगते हो जिस जगह लगाते हो बो केन्द्र बिंदु होता है जहाँ से आपको शीतलता का एहसास सब जगह तक होता है।   परमात्मा का सबको सुख पहुँचाने का दृष्टिकोण होता है इसे ही वीतरागी विज्ञानं कहते हैं।राग से रहित ज्ञान होता है तो तीन लोक में पूज्य ज्ञान होता है , ज्ञान को पूज्यता तभी प्राप्त होती है जब राग का आभाव होता चला जाता है , ज्ञान की पूज्यता इतनी विश्वव्यापी है की आज भी बो वीतरागिता की महक,

गृहस्थ जीवन

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने आज अपने प्रवचनों में कहा क़ी गृहस्थ जीवन में धन की आवश्यकता होती है और गृहस्थ आश्रम चलाने के लिए धन को गौंड़ नही करते हुए भी उसे सिरमौर नही बनाना चाहिए इसी तरह धर्म को सुरक्षित रखने के लिए अर्थ का सहारा ले सकते है इसमें कोई बाधा नही है किंतु आज कल की व्यवसथा इसके विपरीत हो गई है व्यवस्था बड़ी हो गई है बड़े बड़े धन वालो की लाइन लग गई है।उन्होंने कहा कि अर्थ के लिए बड़ा कार्य आवश्यक है दुकान यदि मौके पर नही होगी तो पुराना ग्राहक तो आ जायेगा नया नही आएगा और दूकान

चिकनाहट और रूखापन वस्तुओं की प्रकृतियां

पूज्य आचार्य  श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा क़ि चिकनाहट और रूखापन वस्तुओं की प्रकृतियां हैं। बंधन आसान है परंतु बंधन से मुक्ति आसान नहीं है । मिश्री और घी को मिलाते हैं तो इसकी गुणवत्ता अलग होती है और शहद मिलाते हैं बराबर अनुपात में तो उसकी गुणवत्ता अलग हो जाती है बो बिष बन जाता है । बंध की व्यवस्था अपने आप में महत्वपूर्ण है किसके संयोग से लाभ होता है किसके संयोग से हानि होती है ये समझने की बात है । ज्ञान नहीं होने के कारण संसारी प्राणी फंस जाता है , सब सुख की कामना में भटक रहे हैं, दुःख से मु

महाप्रलय का महाप्रयोग बंद करो

जैन संत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा है कि महाप्रलय को लेकर कई राष्ट्रों के वैज्ञानिकों द्वारा जो महाप्रयोग किया जाना है वह अभी भी जारी है। लगभग 27 किलोमीटर की सुरंग में महाविस्फोट करके यह प्रयोग किया जाना है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयोग नहीं होना चाहिए। प्रकृति की कई चीजें प्रयोग की नहीं, श्रद्धान का विषय है और उन्हें श्रद्धान तक ही सीमित रखना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जन्म सद्कर्मों से मिला है। इसे केवल खाने-पीने में दुरुपयोग मत करो। जन्म को सार्थक करना है तो आत्मा की लब्धि

जितना नापा तुला होता है

गुरुवर ने कहा क़ि जितना नापा तुला होता है उसका उतना महत्व होता है । जीवन मेला है सब अपने बारे मैं सोच रहे हैं अपनी पर्याय के बारे मैं कोई नहीं सोच रहा। सबका ध्यान सूर्य की और जाता है परन्तु सूर्य के पीछे की असली शक्ति की तरफ नहीं जाता उस शक्ति की तरफ हमारा ध्यान नहीं जा रहा जो भीतर विद्यमान है । आज संपर्क सूत्र एक नंबर मैं सिमट कर रह गया है जो आप पसंद करते हो बो नंबर हासिल कर लेता है। मैंने भी ऐंसे महामरणं का नंबर लगा रखा है  जो महामृत्युंजय की और जाता है जो समाधिमरण की और जाता है। उन्होंने कहा क

इन्द्रियों को काम में नहीं लेते

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में  कहा की जब हम सुनते हैं तब कान का प्रयोग करते हैं और बाकि 4 इन्द्रियों को काम में नहीं लेते हैं । हाथ में दीपक होता है तो हम दीपक को देखते हैं अन्यत्र नहीं देखते हैं इससे स्पष्ट होता है हमारा उपयोग जब स्थिर होता है तो दिखता है जिसको हम देखना चाहते हैं यदि स्थिर नहीं होता तो बही दिखता है जो मन सोचता है जैंसे दुकानदार ग्राहक को देखता है अपने सामान को बारबार नहीं देखता क्योंकि दुकान उसकी होती है सामान उसका होता है ग्राहक उसका नहीं होता। आप

भगवान बनने का पुरुषार्थ करो

जैन संत आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा है कि हर मनुष्य को भगवान बनने का पुरुषार्थ करना चाहिए। उन्होंने कहा है कि जो उस पार गए वो भगवान बन गए। भगवान आपको उस पार ले जाने की क्षमता रखता है लेकिन पुरुषार्थ तो आपको करना पड़ेगा।   आचार्यश्री ने कहा कि जो मनुष्य अपनी आत्मा का कल्याण कर इस संसार से पार चले गए वे भगवान बन गए जो इस पार रह गए उन्हें उस पार जाने  के लिए निरंतर पुरुषार्थ करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान आपको उधर बुला रहा है, भगवान में क्षमता है कि वह आपको उस पार ले जा भी

मोह को हटाने का पुरुषार्थ करो

जैन संत आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने कहा है कि आपको अपने निज स्वरूप को पहचानना है तो मोह को हटाना होगा। उन्होंने कहा कि मोह को हटाने का पुरुषार्थ मोक्ष मार्ग की ओर ले जाएगा।    आचार्यश्री ने कहा कि मोक्ष मार्ग के लिए क्रमबद्ध पुरुषार्थ  आवश्यक है, लेकिन यह मोह के साथ संभव नहीं है। उन्होंने उदाहरण दिया कि चांदी के बर्तन में पानी भरा है और उसमें रंग भी है। इस पानी के अंदर हम झांकने का प्रयास करें तो नजरें आगे नहीं जा सकती। हमें पानी कुछ दिखाई नहीं देता। दरअसल पानी के अंदर घुला हुआ रंग

स्वतंत्रता दिवस

जो राष्ट्र अपनी मातृभाषा से किनारा करके अन्यत्र भाषा के इस्तेमाल में लगते हैं बो अपनी पहचान खोने लग जाते हैं । ईस्ट इंडिया कंपनी देश छोड़ गई परंतु विरासत में इंडिया थोप गई जिसे हम अभी तक ढोते चले आ रहे हैं  । अंग्रेजी को सहायक भाषा के रूप में उपयोग करना अलग बात है परंतु उसे जबरदस्ती थोपना गलत है।   भारत में शिक्षा हिंदी माध्यम से अनिवार्य होना चाहिए तभी तस्वीर बदल सकते हैं । हमारी गुरुकुल परंपरा को भी क्षति पहुंचाई जा रही है जो तक्षशिला में बड़ा केंद्र था शिक्षा का आज वो कहाँ है। सारी दुनिय

काया है तो आत्मतत्व है

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने अपनी मंगल देशना में कहा क़ि काया है तो आत्मतत्व है आत्मतत्व है तो सब कुछ है । देह में होनहार देव बैठे है । मायाजाल और जड़ की बहुत पूजा हो चुकी अब तो दुर्लभता की पूजा होनी चाहिए । जीवन त्रैकालिक नहीं होता परंतु शरीर स्वस्थ्य रहेगा तो आत्मा निरोगी रहेगी । घी को घी की तरह लेना चाहिए पानी की तरह नहीं पीना चाहिए भोजन उतना ही लें जितना शरीर के लिए आवश्यक है । अधिक भोजन दुगना भोजन नुकसानदायक होता है उसी तरह संग्रह की प्रवत्ति भी जीवन को परिग्रह के पाप से ग्रस्त कर

दूसरों को देखकर कोई राष्ट्र विकसित नहीं हो सकता

जैन संत ने दिया देश के नेताओं को संदेश   जैन संत आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ने बुधवार को देश के नेताओं को एक बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि किसी दूसरे राष्ट्र को देखकर कोई भी राष्ट्र विकसित नहीं हो सकता। इसलिए भारत को विकासशील राष्ट्र कहना बंद करो। भारत पहले से ही विकसित राष्ट्र है। उन्होंने कहा कि हम अपने मन के नौकर बन गए हैं और यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है।    आचार्यश्री ने कहा कि भारत अब 70 साल का हो चुका है। एक तरह से परिपक्व राष्ट्र हो चुका है। हमारे नेता आज भी भ
×
×
  • Create New...