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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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राने रेडियो

पुज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि जिस तरह पुराने रेडियो में हम एक स्टेशन लगाते थे और यदि हाथ हिल जाता था तो दूसरा स्टेशन लग जाता था तो गीत की जगह कई अन्य कार्यक्रम सुनाई देने लगता था। क्योंकि स्टेशन की रेंज बदल जाती थी और ये रेंज ऊपर लगे एरियल के माध्यम से मिलती थी ठीक उसी प्रकार हमारे विचार रुपी विभिन्न स्टेशन हैं जो हमारे मस्तिष्क रुपी एरियल के माध्यम से बदलते रहते हैं, अच्छे विचारों वाला स्टेशन यदि लगाना है तो मस्तिष्क को निर्मल बनाना होगा। स्थिरता लाने पर ही हम एक विचारों वाले

अहिंसा स्थली (इक़बाल मैदान)

गुरुवर ने कहा कि तालाब में कंकर फेंकते हैं तो नीचे की और चला जाता है। लकड़ी बजनदार होती है फिर भी नहीं डूबती है,जबकि उसमें गाँठ भी होती है। जिसके भीतर पकड़ नहीं है बो तैरता रहता है छोटा डूब जाता है। लकड़ी पानी में गलती नहीं है और पत्थर गल जाता है। पानी के जहाज में नीचे लकड़ी लगाई जाती है और उसी बजह से जहाज डूबता नहीं है। हमें भी लकड़ी की तरह बनना है ताकि हम संसार सिंधु में डूबें नहीं। ऊपर देखता हूँ तो भगवान दिखते हैं नीचे देखता हूँ तो होनहार भगवान दिखते हैं। आप सभी में भगवान बनने के गुण विद्यमान हैं 

सर्वांगीण विकास में बुद्धि

पुज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि सर्वांगीण विकास में बुद्धि और शरीर दोनों का विकास समाहित होता है। किसी भी अच्छे कार्य की यदि नींव रखी जाती है तो नीचे से लेकर ऊपर तक एक ही दीवार बनायीं जाती है उस पर छत डाली जाती है। बाँध पर भी पानी रोका जाता था उसके लिए पूर्ण प्रबंध किया जाता है उसे निकलने की व्यवस्था की जाती है और नहर के माध्यम से अनेक राज्यों में जाता है। भाखड़ा नंगल बांध में ऐंसी व्यवस्था है उसका उद्देश्य परिग्रह नहीं होता बल्कि कृषि का विकास हो इसके लिये होता है। आप भी यदि संग्

बड़े बड़े मंदिरों का निर्माण

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि आपने बड़े बड़े मंदिरों का निर्माण कर लिया अनेकों प्रतिमाओं को विराजित कर पुण्य कमा लिया परंतु मुख्य कार्य तो अभी बाकी है। अब इन वीतरागीयों की आराधना के लिए युवाओं में जागृति लाने का कार्य कीजिये और जो दूर दराज के विद्यार्थी राजधानी में अध्ध्यनरत हैं उन्हें प्रेरित कीजिये। ऐंसी व्यवस्था बनाइये की वे मंदिर के आसपास ही रहकर अध्यन कर सकें और इसके लिए एक व्यवस्थित छात्रावास होना चाहिए। संस्कारों को यदि प्रतिस्ठापित करना चाहते हैं तो सबसे पहले ये काम प्रार

शिक्षा और भारत

इस अवसर पर पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि बूँद बूँद के मिलन से जल में घट आ जाय बूँद मिले सागर से सागर बूँद समाय।   एक बूँद दूसरी बूँद से मिल जाती है तो प्यास बुझाती है। सागर का अस्तित्व क्या है,उत्पत्ति कैंसे है ये जानना जरूरी है। लोग कहते है सरकार सुनती नहीं है, आपकी आवाज में दम होगी तो बेहरी सरकार भी सुन लेती है। स्वर के मिलते ही व्यंजन में गति आ जाती है, आप स्वर बन जाएँ तो सरकार व्यंजन बन जायेगी। कर्ता यदि सरकार है तो कार्य की अनुमोदना आपको करना है। 70 बर्षों में सर

ज्वालामुखी का फटना

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि ज्वालामुखी का फटना अलग बात है, भूकंप अलग बात है और सूर्य की तेज किरणें अलग बात है। कांच पर जब किरणें पड़ती हैं तभी प्रकाश फैलता है । ज्ञान को बाँधने का नाम ध्यान है जब तक ज्ञान को बाँधने का उपक्रम नहीं करेंगे तब तक अन्तर्मुहरत की साधना को गति नहीं मिल पाती है। जब सूर्य की किरणों की उष्णता से कंडे में भी अग्नि प्रज्ज्वलित होती है। समयसार को रटने से ज्ञान प्रज्ज्वलित नहीं हो सकता है जब सूर्य की किरण की तरह वो अंतरात्मा में प्रवेश करता है तब ज्ञान की ज

तभी झुकने का उपक्रम

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा की जब लचक होती है तभी झुकने का उपक्रम होता है । तूफ़ान में भी वही टिक पाते हैं जिनकी जड़ें मजबूत होती हैं ,शीर्षासन से रक्त का संचार सही होता है इसलिए झुकने के परिणाम आने चाहिए । भारत को यदी बड़ा बनना है तो विनय शीलता को कायम रखना होगा । विनय से ही हम दूसरे के लिए पाठ्यक्रम बन सकते हैं । आजकल हाय तौबा का वातावरण बना हुआ है सभी लोग बहुत जल्दी शिखर को छूना चाहते हैं परंतु जब तक लोभ और तृष्णा को अपने ऊपर हावी रखेंगे तो ऊपर उठने की जगह गर्त में ही जाएंगे ।

अग्रिम पंक्ति

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहने बाले लोग अपने पीछे बाली पंक्ति के लोगों को बिसमृत कर देते हैं जबकि जो अधिकार आगे बालों को होते हैं बही अधिकार अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को भी होते हैं परंतु आगे बाला हमेशा अपने को श्रेस्ठ साबित करने में लगा रहता है, जरूरी नहीं की जो ज्येष्ठ हो बही श्रेष्ठ हो। श्रेष्ठा का मापदंड बड़ेपन से नहीं बल्कि बड़प्पन से माना जाता है। जो बड़े होते हुए भी कभी अपने को बड़ा सिद्ध करने की होड़ में नहीं लगते उन्ही के भीतर से बड़प्पन झलकता है।

भगवान महावीर निर्वाण महोत्सव और शुभ दीपावली के मंगल अवसर पर

भगवान महावीर स्वामी 24वें तीर्थंकर जिनके शासनकाल में हम सभी श्रावक धर्मचर्या करते हैं आज उनके मोक्ष कल्याणक का महामहोत्सव उन्ही के लघुनंदन आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के ससंघ सानिध्य में जैन मंदिर हबीबगंज में भक्ति भाव से सानंद सम्पन्न हुआ।   पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने अपने प्रवचनों में कहा कि जो व्यक्ति ऋण ले लेता है और नहीं दे पाता वो दिवालिया हो जाता है आज के दिन भगवान भी संसार के बैभव से दिवालिया हो गए। अनंत सिद्ध परमेष्टि भी संसार की चमक दमक से दिवालिया होकर  मोक

धन्य तेरस पर्व

धन्य तेरस पर्व पर पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा कि आज जो त्यौहार है वो दान की प्रेरणा देने वाला है। दान श्रावक का प्रमुख धर्म कहा गया है, दान देने और दान की अनुमोदना से ही कर्मों की निर्जरा होती है परंतु दान वो ही सार्थक होता है जो बोलने के बाद समय से पहले दे दिया जाय। दान के मामले में ग्रामीण अंचल के श्रावक हमेशा आगे रहते हैं और कालान्तर में शहर में रहने के बाद भी उनमें ये प्रवत्ति बनी रहती है।   उन्होंने कहा कि मैं जब भोपाल में पंचकल्याणक के लिए आया था तो सबने मिलकर ख

भारतीय किसान प्राचीन विज्ञान

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा कि भारतीय किसान प्राचीन विज्ञान के हिसाब से खेती करता आया है। खेती का तरीका बदल गया परंतु किसान वही है। किसान कई तरह के बीजारोपण करता है पांच जगह एक बार बीज जाता है यंत्र के माध्यम से। यंत्र में ऊपर ढक्कन लगा रहता है। किसान फिर भी चौकस निगाह रखता है खेत में फसल के साथ खरपतवार भी पैदा हो जाती है। जिसे किसान उखाड़ कर फेंकता जाता है साथ में कुछ अनुपयोगी और कमजोर पौधों को फेंकता जाता है। खरपतवार और फसल एक जैंसी दिखती है तो सावधानी से हटाना पड़ता है। इसी प्रकार आ

धार्मिक अनुष्ठान

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि धार्मिक अनुष्ठान के लिए द्रव्य काल के साथ साथ क्षेत्र भी अपेक्षित है। निंद्रा के समय सम्यकदर्शन की प्राप्ति नहीं हो सकती हाँ सम्यक दर्शन के बाद निंद्रा अवश्य आ सकती है। निंद्रा के समय हम बुद्धिपूर्वक किसी पर पदार्थ को पहचान नहीं पाते । इसलिए हमारा प्रयास बिफल हो जाता है । जितनी निंद्रा आवश्यक है उतनी ही लेना चाहिए।   उन्होंने कहा कि जब दिनकर यानि सूर्य का आभाव हो तो भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि पाचन सम्भव नहीं होता और शाम को भोजन भी

श्रावक को धर्म

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि श्रावक को धर्म के दायरे में रहकर ही धर्म के मूल सिद्धांतों का अक्षरशः पालन करना चाहिए। श्रावकों को जीवन में आचार,विचार, आहार, और व्यवहार का विशेष ध्यान रखना चाहिए।   उन्होंने कहा कि दृष्टि का उपयोग सही नहीं कर पा रहे हैं। अपने द्रष्टीकोण को सही दिशा में ले जाना है तो उसका उपयोग सही करना होगा। गुरुवर ने कहा कि पानी में रहने वाला प्राणी जितनी आवश्यकता हो उतना ही पानी लेता है पूरा नहीं पी जाता है परंतु आप जरूरत से ज्यादा संग्रह करते हो चाहे

वैराग्य का मर्म

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि वैराग्य का मर्म समझने के लिए अध्यात्म को समझना होगा। आपके बच्चे अभी पारंगत नहीं है फिर भी आप उस पर ऐंसा बोझ डाल रहे हो जो धनुपार्जन की भागदौड़ की सिवाय कुछ नहीं है। उसमें धर्म के संस्कार नहीं डाल रहे हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी यही चला आ रहा है। आज आने बाली पीढ़ी को संस्कारों का रोपण जरूरी है। ये संस्कार आपको ही देना होगा। मैं ऐंसा चिकित्सक हूँ जो आपकी नाड़ी देखकर आपको सही इलाज बता सकता हूँ। आप युवा पीढ़ी के सही चिकित्सक बनो,उसे सही प्रक्षिक्षण दो,उसे अच्छे बुरे

आपकी दृष्टि दूसरों पर

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि आपकी दृष्टि दूसरों पर है, पराये दृश्य को आप अपना दृश्य समझ रहे हो तो दोष आपका ही है क्योकि दृष्टि स्वयं के दोषों पर जायेगी तभी निर्दोष चर्या हो सकेगी।   उन्होंने कहा कि यदि भेद विज्ञान को मानते हो, यदि स्वाध्याय करते हो तो आपको धर्म की रस्सी बाँधना पड़ेगी ताकि आप संसार में कहीं खो न जाओ। भेद विज्ञान का प्रयोजन है की आप मोह को छोड़कर मोक्ष की तरफ अग्रसर हों। राग द्वेष की प्रवत्ति आपको मोह के बंधन से मुक्त नही होने देती है। अध्यात्म में गहरे

अभिनय करने वाला ऐंसा अभिनय करता है

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा कि अभिनय करने वाला ऐंसा अभिनय करता है की वास्तविक लगता है परंतु वो वास्तविक नहीं होता बनाबटी होता है। पूर्व के जो कर्म उदय में आते हैं उनसे बचने के लिए बनाबटी बातें नहीं चलेंगी बल्कि वास्तविकता को जानकार उन कर्मों का सामना किया जा सकता है। प्रत्येक सांस में आपके अतीत का फल वर्तमान में परिणाम के रूप में सामने आता है। साक्षी भाव होकर भी एकाक्षी बनकर जो रहते हैं वो कर्मों के यथार्थ को जान नहीं पाते। रुद्राक्ष में एक आँख को लौकिक पद्धति में दुर्लभ माना ज

नीचे रहकर भी पर्वत के मंदिर और शिखर को देख सकते हैं

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने अपने आशीष वचनों में कहा कि आप नीचे रहकर भी पर्वत के मंदिर और शिखर को देख सकते हैं। एक बार दृष्टी से दिखाई दे जाते हैं। जहां से रास्ता होता है वही से मंदिर की तरफ जाया जाता है। जब पहाड़ चढ़ते हैं तो झुकना पड़ता है,साबधानी रखनी पड़ती है। व्यबधान का समाधान एकाग्रता,संकल्पशक्ति में होता है। रास्ते को सुव्यवस्थित करने से आगे बढ़ा जा सकता है। रास्ते में नदी आती है तो नाव के सहारे नाविक आपको पतवार चलाकर पार लगाता है। जब उस पार पहुँच जाते हैं तो स्वयं चलकर फिर लक्ष्य

प्राशुक जल से सभी को शीतल

गुरुवर ने अपनी अमृतमयी वाणी के प्राशुक जल से सभी को शीतल कर दिया उन्होंने कहा कि प्रमाद और कषाय करने से  सुमेरु पर्वत के बराबर कचरा इकट्ठा हो जाता है। जो घाव हुआ था, धीरे धीरे भरते हुए आये औषधि उपचार किया पर प्रमाद के कारण पहले से और ज्यादा गहरा हो गया। पहले सात्विकता होते हुए भी कर्मों के थपेड़े ने एक को कर्जदार बना दिया, चुकाता गया वो थोड़ा सा रह गया अब वो चिंता से थोडा मुक्त हो गया और प्रमाद करने लगा तो फिर ऋणी हो गया। कषाय साफ़ हो जाती है माफ़ नहीं होती। हाथी निकल जाता है पूँछ रह जाती है। कषाय थ

मूकमाटी समापन सत्र

गुरुवर ने प्रवचनों में कहा कि  इस गोष्टी में विद्वानों ने तत्वों का उदघाटन किया। जिव्हा लोभ के कारण रोग को निमंत्रण दिया जा रहा है और चिकित्सकों को निमंत्रण दिया जा रहा है। जान बूझकर रोग को निमंत्रण देने से बचना चाहिए।   उन्होंने कहा कि गुणों के प्रति श्रद्धा भाव होना चाहिए,दुखित है, द्रवित है उसके प्रति आँखों में पानी आना चाहिए। पानी विज्ञान की देनें नहीं है वो तो भीतर से प्रकट होता है। वो पानी एक सात्विक जल है जिसमें दया का प्रतिष्ठापन हुआ है। सब अपने अपने ढंग से रोते हैं, दूसरों को

मूकमाटी चौथा सत्र

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने अपने आशीर्वचनों में कहा कि आजकल चित्र का जमाना चल रहा है, सभी लोग चित्र में अपना चित्त लगा कर बैठे हैं परंतु ये चित्र आपके चारित्र को कमजोर कर रहा है। बाहर का चित्र हमेशा आकर्षित करता है जिसके मोह में आप सभी पराश्रित हो जाते हैं । जब हम अंतरंग के चित्र को निहारते हैं तो  यथार्थ का बोध होता है और यहीं से चारित्र निर्माण की यात्रा प्रारम्भ होती है।   उन्होंने कहा की कोई भी काव्य शब्दों की अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का सशक्त साधन  होता है। आज विद्या

मूक माटी संगोष्टी

गुरुवर ने कहा की  आप लोग बकताओं को एकाग्रता से सुन रहे थे में भी एक एक श्रोता बनकर सुन रहा था । मंथन में ही जो देखते हैं वो गायब हो जाता है जो नहीं दिखता बो उभर कर सामने आता है । भावों की कोई भाषा नहीं होती है बो तो तैरते हुए ही दिखाई देते हैं । अपने भावों की तरंगें व्यक्त करते रहना चाइये |   गुरुवर ने कहा कि कल प्रधानमंत्री जी आये थे तो भारत की बात हुई। कोई कितना भी बड़ा कलाकार हो यदि पूर्ण निष्ठां से कला की अभिव्यक्ति नहीं करेगा तो सार्थकता दिखाई नहीं देगी। भाषा में उलझकर कभी कभी भाव

सम्यक दर्शन की भूमिका

गुरुवर ने कहा कि सम्यक दर्शन की भूमिका में परिणामों की स्थिति बदलती है। नारकीय जीवन बहुत ही बदतर होता है, फिर भी सम्यक दर्शन की स्थिति बन जाती है। नार्कियों की अपेक्षा हमें अपनी स्थिति वेहतर बनाना है इसलिए उनके जीवन के बारे में जानना जरूरी है। प्रधानमंत्री का जीवन भी बहुत ही अनुशासन से बंधा होता है उन्हें आहार विहार और व्यवहार का ध्यान रखना पड़ता है।   उन्होंने कहा कि सब अपनी वेदनाओं को लेकर व्यथित हो जाते हैं परंतु जब नारकीय जीवन को जानेंगे तो शायद अपनी व्यथा आपको छोटी लगने लगेगी। नरक

सम्यक दर्शन की उत्पत्ति

पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में कहा कि सम्यक दर्शन की उत्पत्ति में अनेक कारण होते हैं हरेक गति में धर्म श्रवण होता है, नरक में भी देवलोग जाकर नार्कियों को संबोधित करते हैं। 16 स्वर्ग वाले शुक्ल लेश्या वाले देवों के नीचे वाले देव जाते हैं। अधोगति में अपने ढंग की कषाय अलग होती हैं बहुत तीव्र होती है फिर भी सम्यक दर्शन उन्हें होता है। यदि आप दुसरे से सत्य बुलवाना चाहते हो तो आपको भी सत्य को अंगीकार करना होगा। वात्सल्य चाहते हो तो अपने ह्रदय को वात्सल्य से भरना होगा। अधोल
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