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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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सुविधा नही संयम - 62 वां स्वर्णिम संस्मरण


संयम स्वर्ण महोत्सव

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गर्मी का समय था, उन दिनों में मेरी शारीरिक अस्वस्थता बानी रहती थी। मैं आचार्य महाराज के पास गया और अपनी समस्या निवेदित करते हुए कहा - आचार्य श्री जी! पेट मे दर्द(जलन)हो रहा है। आचार्य महाराज ने कहा - गर्मी बहुत पड़ रही है, गर्मी के कारण ऐसा होता है और तुम्हारा कल अंतराय हो गया था इसीलिए पानी की कमी हो गई होगी सो पेट मे जलन हो रही है कुछ रुककर गंभीर स्वर में बोले की - क्या करे यह शरीर हमेशा सुविधा ही चाहता है लेकिन इस मोक्षमार्ग में शरीर और मन की मनमानी नही चल सकती। "वहिर्दुः खेषु अचेतनः"  अर्थात् बाहरी दुख के प्रति अचेतन हो जाओ उसका संवेदन नही करो सब ठीक हो जाएगा।
 

आचार्य श्री के एक वाक्य में पूरा सार भरा हुआ है; हमे यह श्रद्धान कर लेना चाहिए की मोक्षमार्ग में मन और शरीर को सुविधा नही देना है बल्कि मन और इंद्रियों में रखकर नियंत्रण में रखकर समाता भाव बनाये रखना है। वे हमेशा चाहे अनुकूल-प्रतिकूल कैसी भी पतिस्थिति रही आवे, मन मे समता का भाव बनाए रखते है और चेहरे पर कभी प्रतिकत जैसे भाव दिखाई नही देते।

वश में हो सब इन्द्रियाँ, मन पर लगे लगाम।
  वेग पढ़े निर्वीग का, दूर नही फिर धाम।।
  

अनुभूत रास्ता पुस्तक से साभार

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