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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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प्रथम-दर्शन - 60 वां स्वर्णिम संस्मरण


मैं (क्षमासागर जी) उस दिन पहली बार आचार्य महाराज के दर्शन करने कुण्डलपुर गया था।आचार्य महाराज छोटे से कमरे में बैठे थे। इतना बड़ा व्यक्तित्व इतने छोटे स्थान में समा गया, इस बात ने मुझे चकित ही किया। उनके ठीक पीछे खुली हुई एक बड़ी सी खिड़की और उससे झाँकता आकाश, उस दिन पहली बार बहुत अच्छा लगा। खिड़की से आती रोशनी में दमकती आचार्य- महाराज की निरावरित देह से निरन्तर झरते वीतराग-सौन्दर्य ने मेरा मन मोह लिया।

 

क्षण भर के लिए मैं वीतरागता के आकर्षण में खो गया और कमरे के बाहर ही ठिठका खड़ा रह गया। फिर लगा कि भीतर जाना चाहिए। दर्शन तो भीतर से ही संभव है। बाहर से दर्शन नही हो पाता, पर भीतर पहुँचना आसान भी नही था। दरवाजे पर भीड़ बहुत थी ही पर में स्वयं भी तो भीड़ से घिरा था। यह सोच कर की कभी संभव हुआ तो एकाकी होकर आऊँगा, मै वापस लौट आया, लेकिन सचमुच में आज तक लौट नही पाया। अब तो यही चाहता हूं कि-जीवन भर उन "श्रीचरणों में बना रहूँ, वहाँ से कभी दूर ना होऊँ।" उनके दर्शन करके मुझे वीतरागता के जीवन्त सौन्दर्य की जो अनुभूति हुई है वह सदा बनी रहे, यही मेरी प्रथम दर्शन की उपलब्धि  है। सच मे जो एक बार आचार्य महाराज को देख लेता है, वह जीवन पर्यन्त उन्ही का हो जाता हैं। यह उनकी वीतरागता, साधना और तपस्या का प्रभाव ही है।

कुण्डलपुर(1976) आत्मान्वेषी पुस्तक से साभार

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