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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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कर्म कैसे करें? भाग -3

हम सब यहाँ इस बात के लिये एक साथ बैठे हैं कि विचार करें कि जिस तरह का जीवन हमें प्राप्त हुआ है, इसकी जिम्मेदारी किसकी है? उसका उत्तरदायी कौन है ? जीवन को सुखपूर्वक या दुःखपूर्वक, ज्ञान के साथ या अज्ञान के साथ, अत्यन्त वैभव समृद्धि के साथ या कि दीन-हीन और दरिद्रता के साथ जीने की मजबूरी किसने हमको सौंपी है ? क्या कोई इन सबका विधाता और स्वामी है ? जो हमारे जीवन को इस तरह जीने के लिये मजबूर करता है। और हमने बहुत स्पष्ट रूप से विचार करके यह जान लिया है कि यह काम किसी और का नहीं है, यह काम मेरे अपने क

पुस्तक परिचय एवं प्राप्ति स्थान

संसारी जीव अनादिकाल से कर्म संयुक्त दशा में रागी-देषी होकर अपने स्वभाव से च्युत होकर संसार-परिभ्रमण कर रहा है। इस परिभ्रमण का मुख्य कारण अज्ञानतावश कर्म-आस्रव और कर्मबंध की प्रक्रिया है जिसे हम निरंतर करते रहते हैं। कर्म बंध की क्रिया अत्यन्त जटिल है और इसे पूर्ण रूप से जान पाना अत्यन्त कठिन है, लेकिन यदि हमें केवल इतना भी ज्ञान हो जाए कि किन कार्यों से हम अशुभ कर्मों का बंध कर रहे हैं तो सम्भव है हम अपने पुरुषार्थ को सही दिशा देकर शुभ कर्मों के बंध का प्रयास कर सकते हैं। जयपुरवासियों के पुण्योद

प्राक्कथन  : कर्म कैसे करें?

कर्म कैसे करें? संसारी जीव अनादिकाल से कर्म संयुक्त दशा में रागी-द्वेषी होकर अपने स्वभाव से च्युत होकर संसार-परिभ्रमण कर रहा है। इस परिभ्रमण का मुख्य कारण अज्ञानतावश कर्म-आस्रव और कर्म-बंध की प्रक्रिया है जिसे हम निरंतर करते रहते हैं। कर्म बंध की क्रिया अत्यन्त जटिल है और इसे पूर्ण रूप से जान पाना अत्यन्त कठिन है, लेकिन यदि हमें केवल इतना भी ज्ञान हो जाए कि किन कार्यों से हम अशुभ कर्मों का बंध कर रहे हैं तो सम्भव है हम अपने पुरुषार्थ को सही दिशा देकर शुभ कर्मों के बंध का प्रयास कर सकते हैं।

कर्म कैसे करें?  भाग -1 

हम सभी लोग आज से इस बात पर विचार करने के लिये तैयार हुए हैं कि इस संसार में जो विविधताएँ दिखाई पड़ती हैं, कोई कम ज्ञानवान है, किसी का ज्ञान अधिक है, कोई धनवान है, किसी के जिम्मे दरिद्रता और गरीबी आई है, वृक्ष हैं, अग्नि है, जल है, वायु है, पृथ्वी है, यह पंच भूत तत्व हैं। यह पूरा लोक जो हमें दिखाई देता है, विविधताओं से भरा हुआ है।   इस पूरे विश्व को कौन व्यवस्थित करता होगा ? मेरे अपने जीवन को, मेरे से पृथक् अन्य और जीवों के जीवन को, और यहाँ तक कि इस सारे दिखाई देने वाले दृश्

कर्म कैसे करें? भाग -2

हम सभी लोगों ने कल अपने मौजूदा जीवन को किस तरह हम जी रहे हैं और ये जो संसार में विविधताएँ दिखाई पड़ रही हैं इन सबकी जिम्मेदारी किसकी है, इस बात पर विचार किया था और अन्ततः हम इस निर्णय पर पहुँचे थे कि जो जिस तरह जी रहा है उसकी जिम्मेदारी उसकी खुद की है, किसी और की जिम्मेदारी इसमें नहीं है।  "कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि तस फल चाखा'।  ये सारा संसार कर्म प्रधान है, जो जैसा यहाँ कर्म करता है वो वैसा फल पाता है। वैसा फल उसे चखना पड़ता है। जो हम विचार करते हैं वो हमारे मन क

कर्म कैसे करें? भाग -4

हम सभी लोगों ने पिछले दिनों अपने जीवन के उत्थान-पतन में कौन कारण है, कौन उत्तरदरायी है, ये जिम्मेदारी किसकी है, इस बारे में विचार करना शुरू किया है और हम पिछले दिनों इस बात पर विचार करते हुए इस निर्णय पर पहुँच गये हैं कि इसकी जिम्मेदारी हमारी अपनी है। हमारा जीवन अगर सुखमय व्यतीत हो रहा है तो उसकी जिम्मेदारी हमारी है। हमारा जीवन यदि दुखमय और अभावग्रस्त है तो उसकी जिम्मेदारी भी हमारी है। हमारे अपने कर्म जो हम करते हैं, जिनका फल हमें भोगना होता है, और फल भोगते समय जैसी हमारी फीलिंग्स और थोट्स होते

कर्म कैसे करें? भाग -5

हम सभी लोगों ने पिछले तीन-चार दिनों में एक बार फिर से अपने जीवन को बहुत गौर से देखने का प्रयास किया है। हमारे अपने जो कर्म हैं जिन्हें हम रोज करते हैं या जिन्हें हम कर चुके हैं, वे कर्म हमारे पूरे व्यक्तित्व को, हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। वे कर्म हमारी वाणी, हमारे विचार, हमारी भावनाएँ और हमारी दिन भर की क्रियाओं को भी प्रभावित करते हैं।  ऐसी स्थिति में जबकि मेरे पहले किये हये कर्म मेरे वर्तमान को प्रभावित करते हैं और मेरे वर्तमान के किये हुये कर्मों से भी मेरा वर्तमान प्रभावित होता ह

कर्म कैसे करें? भाग -6

हम सभी एक बात बहुत अच्छी तरह से पिछले दिनों समझ गये हैं कि हम यहाँ निरन्तर नये-नये कार्य करते हैं और अपने किये कर्मों का फल भी चखते हैं और आगे के लिये नये कर्म का संचय भी करते हैं। संसार में कोई भी ऐसा नहीं है, देह को धारण करने वाला जिसे कि कर्म का बन्धन ना हो, चाहे साधु हो या कि एक सामान्य गृहस्थ हो, सभी के जीवन में कर्म बंधन निरन्तर चलता रहता है। हम जब चाहें कि अब हमें कर्म नहीं बाँधना है, तो हमारे चाहने से कर्म का बंधन रुक नहीं सकता। ठीक ऐसे ही जैसे कि एक बार किसी से कर्ज ले लिया, उधार ले लिय

कर्म कैसे करें? भाग -7

हम सभी लोगों ने पिछले दिनों अपने जीवन की विविधता और इस संसार की विचित्रता इन दोनों बातों को जानने के लिये एक प्रक्रिया, एक विचार की प्रक्रिया शुरू की थी और हमने यह बहुत अच्छे से समझ लिया है कि हमारे जीवन में जो भी घटित होता है उसका प्रमुख कारण मेरा अपना कर्म है। मैं कर्म निरन्तर करता हूँ, कर्मों का फल भी मुझे ही चखना होता है और इतना ही नहीं, कर्मों का फल चखते समय मेरी जो असावधानी है, मेरी जो गाफिलता है, मेरी जो अज्ञानता है, वो मुझे और नये कर्म बंधन के लिये मजबूर कर देती है।  कर्म सिर्फ एक

कर्म कैसे करें? भाग -8

हम सभी लोग पिछले कई दिनों से अपने जीवन में जो हम करते हैं उसी से हमारा व्यक्तित्व, उसी से हमारा जीवन, हमारी वाणी और हमारे विचार सभी प्रभावित होते हैं। तब हम क्यों ना ऐसा करें जिससे कि हमारा व्यक्तित्व ऊँचा उठे। हमारा जीवन अच्छा बने। हमारी वाणी और हमारे विचारों में भी श्रेष्ठता आये, जब ये जिम्मेदारी कर्मों की हमारी है तो फिर हमको कर्म करने का कौशल, कर्म करने की कुशलता भी होनी चाहिये। एक ज्ञानी और एक अज्ञानी दोनों अपने जीवन में कर्म करते हैं और उन कर्मों का फल भी भोगते हैं। एक सफल और एक असफल व्यक्

कर्म कैसे करें? भाग -9

हम सभी के जीवन में अनुभव करते हैं कि सुख भी हैं और दुःख भी हैं और ये ठीक ऐसा है, जैसे धूप-छाँव हैं, सूर्य उगता भी है और अस्त भी होता है। खेल खेलते हैं तो हार भी होती है, जीत भी होती है। धन्धा करते हैं तो लाभ भी होता है, हानि भी होती है। लेकिन कोई अगर इन दो में से किसी एक को स्थाई मान लेवे तो वही उसके दुःख का कारण है और जो दोनों के बीच, दोनों को स्थाई नहीं मानता है और दोनों के बीच शांति से अपना जीवन जीता है, वह बहुत आसानी से अपने जीवन को ऊँचा उठा लेता है। हम लोगों के साथ मुश्किल यह है कि जब सुख क

कर्म कैसे करें? भाग -10

एक संसार जिसे हम अपनी खुली आँखों से देखते हैं और जिसे हम अपने ही साथ तर्क व बुद्धि से मैनेज़ करने की कोशिश करते हैं, लेकिन ये जो हमारी खुली आँखों से दिखने वाला संसार है सिर्फ इतनी ही वास्तविकता नहीं है। एक और संसार है जो कि हमारी इन आँखों से नहीं दिखता है।  श्रुत यानी सुनी गई है, परिचित है, अनुभव में भी आई है, ये संसार जो दिखाई पड़ता है इसकी कथा। लेकिन वह जो एक अंतरंग जगत है उसके बारे में ये दोनों आँखें देख नहीं पातीं। और भी संसार में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिनको कि ये दो आँखें नहीं देख पात

कर्म कैसे करें? भाग -11

हम सभी के जीवन में जो कर्म हम करते हैं, उनका फल भी हमें चखना पड़ता है। बुरे कर्मों का फल बुरा होता है और भले कर्मों का फल भी हमें अच्छा या भला मिलता है। ये एक बहुत कॉमन सी चीज है। लेकिन नियम सिर्फ इतना ही नहीं है, नियम इससे भी ज्यादा है। जैसे अगर हवाएँ किसी बगीचे के ऊपर से गुजरती हैं तो वे हवाएँ सुगन्ध से भर जाती हैं और अगर वे ही हवाएँ किसी श्मशान में सड़ने वाले शवों के ऊपर से गुजरती हैं तो हवाएँ दुर्गन्ध से भर जाती हैं। ठीक इसी तरह हम किसी को अपने जीवन में उसके प्रति अच्छा करें, तब भी संभव है क

कर्म कैसे करें? भाग -12

हम सभी लोगों ने पिछले दिनों इस बात पर विचार करना शुरू किया था कि हाँ इस संसार में जो भी विविधता दिखाई पड़ती है, किसी के पास धन बहुत है, किसी के पास धन का अभाव है। किसी को शरीर स्वस्थ मिला है किसी के शरीर की अस्वस्थता पीड़ा देती है। किसी को पद प्रतिष्ठा मिली है, किसी को ज्ञान मिला है और किसी को पद प्रतिष्ठा कुछ भी नहीं मिली और ज्ञान भी बहुत अल्प है। ये ऐसी विविधता किसने दी होगी यहाँ हमें। तब हमने बहुत विचार करने के बाद ये निर्णय अपने अनुभव से लिया था कि यहाँ हम जो भी करते हैं जैसा भी करते हैं, उस

कर्म कैसे करें? भाग -13

हम लोगों ने यह बात बहुत अच्छी तरह से पिछले दिनों समझ ली है कि हम जैसा कर्म करते हैं, उसके प्रतिफलस्वरूप हमें वैसी ही जीवन में सुख-दुःख की प्राप्ति होती है। कोई नहीं चाहता कि वो अपने जीवन में दुःख पाये। जो दुःख बढ़ाने वाले काम करते हैं वो भी ये नहीं चाहते कि उनके जीवन में दुःख आये, पर क्या करें हमारी अपनी अज्ञानता, हमारी अपनी पुरुषार्थहीनता और इतना ही नहीं हमारे अपने जो संस्कारों की प्रबलता है, वो हमें कर्म कैसे करना चाहिये और कर्म का फल भोगते समय क्या सावधानी रखनी चाहिये, यहाँ जाकर के हम गड़बड़ा

कर्म कैसे करें? भाग -14

हम अगर इस संसार को बहुत गौर से, सावधानी से देखें तो यहाँ हम जो भी पाते हैं वे हमारे ही कर्मों का प्रतिफल है। हम जैसा करते हैं वैसा हम पाते हैं। जिस दिशा में हम चलते हैं वहाँ हम पहुँचते हैं। हम पाना कुछ और चाहें और करें कुछ और तो शायद हमारे सोचने से पाने का कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई व्यक्ति ये सोचे कि वो नदी के किनारे पहुँच जाये और उसके कदम बाजार की तरफ बढ़ रहे हों, तो कोई भी कह देगा कि आप सोच भले ही रहे हैं कि आप नदी पर पहुँचेंगे, लेकिन आपके कदम अगर बाजार की तरफ जा रहे हैं तो आप पहुँचेंगे तो बाजा

कर्म कैसे करें? भाग -15

हम सभी लोग एक ऐसी प्रक्रिया पर विचार कर रहे हैं जिससे कि हमारा पूरा व्यक्तित्व निर्मित हुआ है और आगे भी हमें अपने व्यक्तित्व को किस तरह निर्मित करना है ये भी हमारे हाथ में है। इस सबकी जानकारी के लिये हम लोगों ने पिछले दिनों एक प्रक्रिया शुरू की है, उसमें जो एक बात आई थी कि हम जैसा चाहें वैसा अपना जीवन बना सकते हैं तो इसका आशय क्या है? हम जैसा चाहें तो हम तो बहुत अच्छा चाहते हैं फिर बनता क्यों नहीं है ? तो जैसा चाहें वैसा जीवन बना सकते हैं, इसका आशय समझना पड़ेगा। जैसी हमारी दृष्टि होगी वैसा हमारा

कर्म कैसे करें? भाग -16

हमने अपने जीवन में जो भी पाया और जो भी खोया है वो अपने ही कर्मों से खोया है और कर्मों से ही पाया है। हम यहाँ जो जैसे और जितने हैं उस सबकी जिम्मेदारी हमारी अपनी और हमारे अन किये गये कर्मों की है। सिर्फ कर्मों की जिम्मेदारी हो ऐसा नहीं कह रहा हूँ। क्योंकि यदि सिर्फ कर्मों की जिम्मेदारी हो तो ऐसा लगेगा कि दूसरे के कर्मों से भी हमें अपने जीवन में सुख-दुख मिलेगा; दूसरे के किये गये कर्म हमारे जीवन में प्रभाव तो डाल सकते हैं, पर हमारे जीवन के निर्माण में तो हमारे किये कर्म ही कारण बनते हैं। हमें अच्छा

कर्म कैसे करें? भाग -17

हम सभी लोगों ने पिछले दिनों ये अनुभव किया है कि यदि हम बहुत गौर से देखें तो इस संसार में अच्छा और बुरा कुछ भी नहीं है। ये हमारी कल्पना है। हमारा राग-द्वेष है। जिन चीजों में हमारा राग होता है, वो चीजें हमें अच्छी जान पड़ती हैं, इष्ट मालूम पड़ती हैं और जिन चीजों में हमारा द्वेष होता है वे चीजें हमें अनिष्टकारी और बुरी जान पड़ती हैं। चीज तो चीज होती हैं न वो भली होती हैं न वो बुरी होती हैं। लेकिन क्या करें, हमारे संस्कार अनादि काल के ऐसे हैं कि हम चीज को चीज की तरह नहीं देखते, वस्तु और व्यक्ति को व

कर्म कैसे करें? भाग -18

हम सभी लोग यहाँ निरन्तर सुबह से शाम और शायद पूरे जीवन कोई ना कोई कर्म करते रहते हैं। और उन कर्मों का फल भी हमारे जीवन में हमको भोगना पड़ता है। उन कर्मों का फल भोगते समय जैसी हमारी विचारधारा होती है, वैसा नये कर्म का संचय भी हमारे साथ हो जाता है। अगर गौर से हम देखें तो कर्म उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि उस कर्म के पीछे जो विचारधारा है या कि हमारी जो भाव दशा है वो महत्वपूर्ण है। सुबह से जो लोग घूमने जाते हैं, रास्ता वही होता है जिस रास्ते से दोपहर में अपने ऑफिस अपनी दुकान या फिर किसी और सांसारि
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