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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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परीक्षा - संस्मरण क्रमांक 20


☀☀ संस्मरण क्रमांक 20☀☀
           ? परीक्षा ?
  चातुर्मास स्थापना का समय था, क्षुल्लक सुमति सागर जी की मुनि बनने की बड़ी भावना थी,साधना भी थी पर वृद्ध हो गए थे,
आचार्य महाराज ने उनकी भावना के अनुरुप उन्हें मुनि दीक्षा दे दी। और वह मुनि वैराग्य सागर हो गए। दो-तीन माह तक उन्होंने महाव्रतों का बड़ी सावधानी से पालन किया, जीवन का अंत निकट जानकर और वृद्धावस्था का विचार करके आचार्य महाराज से सल्लेखना ग्रहण कर ली।
मुनि की आहार चर्या सर्वोत्कृष्ट है, स्वस्थ व  अस्वस्थ हर दशा में समताभाव रखकर निर्दोष विधिपूर्वक आहार ग्रहण करना आसान काम नहीं है,
एक दिन विधि पूर्वक पड़गाहन के बाद जब वे जल ग्रहण करने के लिए खड़े हुए तो अंजली बांधकर जल ग्रहण करना मुश्किल सा लगा, जल नीचे गिर गया,आचार्य महाराज समीप खड़े थे,बोले चाहो तो गिलास ले लो 
हम सभी यह बात सुनकर चकित हुए, पर समझ गए की परीक्षा की घड़ी है, सल्लेखना ग्रहण करने वाले क्षपक की परीक्षा प्रतिक्षण है। अत्यंत वृद्ध होने के बाद भी एक सच्चे महाव्रती की तरह मुनि वैराग्य सागर जी ने ऐसा करने से इंकार कर दिया, और शांति भाव से अन्न - जल का जीवन पर्यंत के लिए त्याग करके यम सल्लेखना धारण कर ली
 आचार्य महाराज ने मुस्कुराकर आशीर्वाद दिया और कहा कि- सभी को इस परीक्षा में उत्तीर्ण होना चाहिए और परीक्षा में उत्तीर्ण होने की तैयारी जीवन भर करते रहना चाहिए।

 आहार जी1985
? आत्मानवेषी पुस्तक से साभार ?
? मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज

 हम सब भी भगवान से यही प्रार्थना करते है कि-हम भी उस परम समाधि अवस्था हो जीवन के अंतिम क्षणों में अवश्य प्राप्त करे, और पूज्य आचार्य भगवन के चरणों में ही दिगम्बर अवस्था मे गुरुदेव को देखते-देखते ही इस जीवन का अंत हो।और जिस प्रकार आज के दिन हमारा देश आजाद हुआ था,उसी प्रकार हमारी आत्मा को आगामी भवों में जल्द ही कर्मबन्धन और इस शरीर से आजादी मिले और हम उस परम मोक्षपद को प्राप्त कर सके।
 

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