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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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आत्मबोध - संस्मरण क्रमांक 21


संयम स्वर्ण महोत्सव

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  ☀☀ संस्मरण क्रमांक 21☀☀
           ? आत्मबोध ?
मुक्तागिरी का चातुर्मास सानंद संपन्न हुआ, आचार्य महाराज संघ सहित रामटेक होते हुए बालाघाट पहुंचे।सुबह संघ सहित शौच क्रिया के लिए जंगल की ओर गए। वहां वन-विभाग के ऑफिसर के बंगले पर दो शेर के बच्चे खेलते हुए दिखे सारा संघ  क्षणभर को वहां ठहर गया।वन विभाग के ऑफिसर ने उन बच्चों के मिलने की जानकारी दी। आचार्य महाराज सारी बातें चुपचाप सुनते रहे, फिर सहसा बोले कि- हे वनराज जैसे देश काल की परिस्थिति आज तुम वन के स्थान पर भवन में रह रहे हो ऐसे ही वनों में  निर्द्वन्द्व विचरण करने वाले मुनिराजों ने नगर में रहना स्वीकार तो कर लिया है,पर यह हमारा स्वभाव नहीं है हमें अपना यथाजात,एकाकी निर्द्वन्द्व विचरण करने का स्वभाव नहीं भूलना चाहिए।
उन क्षणों में आचार्य महाराज की निस्पृहता और स्वभाव की ओर रुचि देखते ही बनती थी, सभी लोग उनके द्वारा दी गई इस अध्यात्म की शिक्षा से अभिभूत हो गए।

 (बालाघाट 1991) 
? आत्मान्वेषी पुस्तक से साभार ?
? मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज
 

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