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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

उपासक का प्रशमभाव


संयम स्वर्ण महोत्सव

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उपासक का प्रशमभाव

 

जैसा कि महात्माओं के मुंह से उसने सुना है, उसके अनुसार वह मानता है कि आत्मत्व के रूप में सभी जीव समान हैं, सबमें जानपना विद्यमान है। अव्यक्त रूप से सभी परमात्मत्व को लिए हुए हैं, प्रभुत्व शक्तियुक्त है एवं किसी के भी साथ में विरोध, वैमनस्य करना परमात्मा के साथ में विरोध करना कहा जाता है। परमात्मा से विरोध करना सो अपने आपके साथ ही विरोध करना है। अत: किसी के भी साथ में बैश्र विरोध करने की भावना ही उसके मन में कभी जागृत ही नहीं होती। उसके हृदय में तो सम्पूर्ण प्राणियों की उपयोगिता को समझते हुए प्रेम के लिए स्थान होता है। बल्कि वह तो यह मानता है कि दुनिया का कोई भी पदार्थ अनुपयोगी नहीं है। यह बात दूसरी कि मनुष्य उससे अनभिज्ञ हो। अतः अपनी चपलता के वश में होकर उसका दुरुपयोग कर रहा हो।

 

एक बार की बात है - राजा और रानी अपने महल में सुकोमल सेज पर विश्राम कर रहे थे। इतने में राजा की नजर एक मकड़े पर पड़ी जो कि वहां महल की छत में अपने सहज भाव से जाला तान रहा था। राजा को उसे देखकर गुस्सा आया कि देखों यह बेहूदा जन्तु मेरे साफ सुथरे महल को गन्दा बना रहा है। अतः उसे मारने के लिए राजा ने तमंचा उठाया। परन्तु शीघ्रता के साथ उसका हाथ पकड़ कर रानी बोली, प्रभो ! यह आप क्या कर रहे हैं? आप इसे बेकार समझ रहे हैं, फिर भी अपनी-अपनी जगह सभी काम आने वाले हैं। समय पड़ने पर आपको इस बात का अनुभव होगा।
 

रानी के इस प्रकार मना करने पर राजा मान गया, किन्तु राजा के मन में यह शंका बनी ही रही कि क्या यह भी कोई काम में आने वाला है? अस्तु दूसरे ही रोज राजा अपने मंत्री आदि के साथ घूमने को निकला तो पिछाड़ी से आकर एक कुत्ते ने राजा की जांघ में काट खाया। वैद्य से पूछा गया कि अब क्या करना चाहिए? जवाब मिला कि यदि कहीं मकड़ी का जाला मिल जावे तो उसे लाकर इस घाव में भर दिया जावे। बस वहीं इसकी एक लाजवाब दवा है। यह सुनकर राजा को विश्वास हुआ कि रात वाला रानी साहिबा का कहना ठीक ही था।

 

मतलब यही कि अपनी-अपनी जगह सभी मूल्यवान हैं। अत: समझदार आदमी फिर क्यों किसी के साथ में मात्सर्यभाव को लेकर इसका मकलोच्छेद करना चाहें? क्योंकि न मालूम किसके बिना इसका कौनसा कार्य किस समय अटका रहे।

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