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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

दया की महत्ता


संयम स्वर्ण महोत्सव

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दया की महत्ता

 

किसी भी प्राणी का कोई भी तरह का कुछ भी बिगाड़ न होने पावे, सब लोग कुशलतापूर्वक अपना-अपना जीवन व्यतीत करें ऐसी रीति का नाम दया है। दयावान का दिल विशाल होता है, उसके मन में सबके लिये जगह होती है। वह किसी को भी वस्तुतः छोटा या बड़ा नहीं मानता, अपने पराये का भी भेदभाव उसके दिल से दूर रहता है। वह सब आत्माओं को समान समझता है। तभी तो वह दूसरे का दु:ख दूर करने के लिए अपने आपका बलिदान करने में भी नहीं हिचकिचाता है। एक बार की बात है कि हाई कोर्ट के एक जज साहब अपनी मोटर में सवार होकर कचहरी को जा रहे थे। रास्ते में जाते हुए देखते हैं कि कीचड़ में एक सूअर फंसा हुआ है जो कि निकलने के लिय छटपटा रहा है। जज साहब ने अपनी मोटर रुकवाई और खुद अपने हाथों से उस सूअर को निकाल कर बाहर किया। सूअर ने अपने अंग फड़फड़ाये जिससे जब साहिब के कपड़े छींटाछींट हो गये। कचहरी को देर हो रही थी। अत: उन्हीं कपड़ों को पहने हुए मोटर में बैठ कर फिर कचहरी को रवाना हो लिए। लोगों ने जब जज साहब का यह हाल देखा तो लोग आश्चर्य में डूब गये कि आज उनका ऐसा ढंग क्यों है। ड्राईवर ने बीती हुई बात बताई तो सब लोग वाह-वाह कहने लगे। जज साहिब बोले कि इसमें मैंने बड़ी बात कौनसी की है। मैंने सूअर का दु:ख दूर नहीं किया बल्कि मैंने तो मेरा ही दु:ख दूर किया है। मुझसे उसका वह दृश्य देखा नहीं गया तब मैं फिर और क्या करता?

 

ठीक ही है किसी को भी कष्ट में पड़ा देखकर दयालु पुरुष का दिल द्रवित हो उठता है इसमें संदेह नहीं है। वह अमरता का वरदाता होता है। जो कि अज्ञानी और असमर्थ बालकों को मातृ-भाव से उनके हित की बात कहते हैं, वे जो कुछ भूल कर रहे हों उसे हृदयग्राही मधुर शब्दों में उन्हें समझाकर उत्पथ में न जाने देते हुए प्रेम-पूर्वक सही रास्ते पर लाने की चेष्टा करता है। ऐसा करने में कोई व्यक्ति अपनी आदत के वश होकर आभार न मानते हुए प्रत्युत उसके साथ में विरोध दिखलाते हुए उसकी किसी प्रकार की हानि भी करता है तो दयालु पुरुष उसे भी सहन करता है परन्तु उसे मार्ग पर लाने की ही सोचता है। 

 

सुनते हैं कि इंग्लैंड में होमरलेन नाम का एक विद्वान था। वह जब भी किसी असहाय, दुःखी पुरुष को देखता था तो उसका दिल पिघल जाया करता था। कोई बालक किसी भी प्रकार की बुरी आदत में पड़ रहा हो तो उसे देखकर वह विचारने लगता कि इसकी तो सारी जिन्दगी ही बरबाद हो जायेगी। किसी भी तरह से इसकी यह कुटेव दूर होकर इसका भविष्य उज्जवल होना चाहिए। बस इस विचार के वश होकर उसने एक रिपब्लिकन नाम का आश्रम खोला, जिसमें बुरी आदत वाले बालक लाना और धीरे-धीरे उनके जीवन को सुधारना ही उसका उद्देश्य था।

 

एक दिन कोर्ट में एक ऐसा बालक पकड़ा गया जो कई बार चोरी कर चुका था। होमरलेन को जब पता लगा तो वह उसे वहां से अपने पास आश्रम में ले आया परन्तु उसने आते ही ऊधम मचाना शुरू कर दिया। वहां के लड़कों से लड़ने लगा और उनकी पुस्तकें फाड़ने लगा तो वहां के प्रबन्धक लोग घबराये और होमरलेन से बोले कि साब यह लड़का तो नटखट है। सारे बालकों को ही बिगाड़ देगा अतः इसे यहां रखना ठीक नहीं है। होमर लेन बोला- भाई मुझे इस पर दया आती है, अगर यहाँ आकर भी नहीं सुधरा तो फिर कहां सुधरेगा? इसका तो फिर सारा जीवन ही बरबाद हो जायेगा। खैर, इसे तुम यहां नहीं रखते तो मुझे दो, मैं इसे अपने पास रखूँगा। ऐसा कहकर जब उसे वह घर लाया तो वहां पर भी उसका तो वही हाल। उनके कमरे की बहुमूल्य चीजों को भी वह तो वैसे ही तोड़ने फोड़ने लगा। फिर भी होमरलेन ने बिल्कुल मन मैला नहीं किया बल्कि हंसते हुए बोला, कि बेटा यह घड़ी और बची है इसे भी तोड़ डालो।

 

बस यह सुनते ही उस लड़के के दिल में एकाएक परिवर्तन आ गया। वह सोचने लगा कि देखों मैंने इनका कितना नुकसान कर दिया, फिर भी मेरे प्रति इनके मन में कुछ भी मलाल नहीं आया, देखो ये कितने गंभीर हृदयी हैं और मैं कितना तूफानी! ये भी आदमी हैं तथा कहने के लिए तो मैं भी तो एक आदमी ही हूँ, मुझे कुछ सोचना तो चाहिए। ऐसा विचार अपने मन में करते हुए वह लड़का होमरलेन के पैरों में पड़ गया और अपने अपराध की क्षमायाचना करने लगा। बोला कि बस मैं अब आगे किसी भी प्रकार की बदमाशी नहीं करूंगा। होमरलेन बड़ा खुश हुआ और कहने लगा कि कोई बात नहीं, बल्कि मुझे तो इस बात की बड़ी प्रसन्नता है कि अब तुम समझ गये हो।

 

मतलब यही कि जिसका दिल दया से भीगा हुआ होता है वह किसी से भी मुँह मोड़ना नहीं जानता। वह तो अपना सब कुछ खोकर भी दुनिया के दु:ख को दूर करना चाहता है। क्योंकि उसका प्राणी मात्र के प्रति सहज स्वाभाविक प्रेम होता है, अत: वह तो सबको गुणवान देखना चाहता है एवं किसी भी गुणवान को जब वह देखता है तो उसका दिन प्रसन्नता से उमड़ उठता है, जैसा कि तत्वार्थसूत्र में है-

 

‘मेत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थयानिच सत्वगुणाधिक किल्श्यंमाना  विनयेषु ।'

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