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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

मन की एकाग्रता कैसे प्राप्त हो?


संयम स्वर्ण महोत्सव

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मन की एकाग्रता कैसे प्राप्त हो?

 

मन को एकाग्र करना, शान्त बनाना बड़े महत्त्व की बात है, यह तो समझ में आता है परन्तु विचारों का गुब्बार हमारे इस पोले मन में भरा हुआ है उसे निकाल बाहर किये बिना मन की एकाग्रता हो कैसे? प्रथम तो इसके पास मैं यह खा लें, यह पी लें, फिर टहल लें और सो लू इत्यादि इतने विचार उपसंग्रहीत हैं कि उनका दूर करना सरल बात नहीं है और अगर कहीं प्रयास करके इन ऊपरी विचारों को दूर कर भी दिया तो यह तो मकड़े की भांति प्रतिक्षण नये विचारों को जन्म देता ही रहता है। सो उन भीतरी विचारों पर रोक लग जाने का तो कोई भी उपाय नहीं दीख पड़ता है। बल्कि जहां ऊपरी विचार चक्र को दूर करने के लिए प्रयत्न करो तो भीतरी विचार परम्परा बड़े वेग के साथ उमड़ पड़ती है। ऐसी दशा में मन को यदि शान्त, एकाग्र किया जाय तो कैसे?

 

बात यह है कि इस बाह्य अपार संसारचक्र को हम अपनी मनोभावना के द्वारा अपने पीछे लगाये हुए ही रहते हैं। दिव्य ज्ञान-शक्ति को परमात्मा परमेश्वर के साथ तन्मय होकर रखने के बदले हम उसको दुनिया की क्षुद्र बातों में ही व्यर्थ खर्च करते रहते हैं आज यह रोटी मोटी हो गई और एक जगह से जल भी गई, यह साग भी अच्छा नहीं बना, इसमें नमक कम पड़ा इत्यादि जरा-जरा सी बातों की चर्चा में ही हम रस लेते हैं और अपने ज्ञान का दुरुपयोग करते हैं एवं मन की दौड़ निरन्तर बाहर ही होते रहने से यह निरंकुश बन गया है। अगर किसी के कहने सुनने से भगवान का भजन भी किया तो सिर्फ दिखाऊ। ऐसी दशा में यहां आसन जमा कर बैठना और आंखें मूंद लेना आदि सब व्यर्थ है। जैसा कि कहा है :-

 

दर्भासन पर बैठ कर माला ली कर माहि,

मन डोले बाजार में तो यह सुमिरण नाही।।

 

प्रायः लोगों का यही हाल है। कथा सुनने बैठे तो नींद सताती है और बिस्तर पर जाकर लेटते हैं तो चिन्ता आ घेरती है। यह कर लिया तो यह बाकी है और वह उजड़ रहा है इत्यादि विचार उठ खड़े होते हैं। नींद आ जाने पर भी स्वप्न में भी ये ही सब बातें याद आती रहती हैं। क्यों कि हम इन्द्रियों की वासनाओं के गुलाम बने बैठे हैं तो एकाग्रता कहा? एकाग्रता के लिये तो जीवन में परिमितता आनी चाहिए। हमारा सारा कार्यक्रम नपा, तुला समुचित होना चाहिए। औषधि जैसे नाप तोल की ली जाती है वैसे ही हमारा खाना सोना आदि सभी बाते नपी तुली होनी चाहिए। प्रत्येक इन्द्रिय पर नियन्त्रण होना चाहिए। एक महाशय बोले कि मैं जहाँ जाता हूं वहां उस कमरे की तमाम चीजों को देख सकता हूँ। मैंने कहा भगवन् मनुष्य ऐसा क्यों करे, क्या वह किसी का पहरेदार है या चोर, ताकि उसे ऐसा करना चाहिए? यह तो अपनी आंखों का दुरुपयोग करना है। मनुष्य की आंखें तो इसलिये हैं कि वह अपना आवश्यकीय कार्य देखभाल कर सावधानी से करे। यही हिसाब कानों के लिए भी होना चाहिए,

 

यदि श्री सद्दगुरु का आदेश उपदेश हो तो उसे मनुष्य ध्यानपूर्वक सुने और याद रखे किन्तु किसी की भी निन्दा को सुनने के लिए कभी भी तैयार न हो। मिट्टी के तेल की बदबू से नाक नहीं सड़ सकती परन्तु मनुष्य के दुश्चरित्र की बदबू फैल जाने से उसका खुद का जीवन बर्बाद हो जायेगा और धरातल को भी गन्दा बनाने में अग्रसर होगा। अत: बुरी बातों से हमें सदा बचते रहना चाहिए। मद्य मांस सरीखी सदोष चीजों को तो कभी याद भी नहीं करना चाहिए किन्तु निर्दोष वस्तुओं को भी आवश्यकता से अधिक प्रयोग में लाने से परहेज होना चाहिए। इस प्रकार अपने इन इन्द्रिय-रूपी घोड़ों को बे-लगाम न दौड़ने देकर इनके लगाम रखना ही मनोनिग्रह का मूल मंत्र है।

 

जो कि संत महन्तों की संगति से प्राप्त हो सकता है अत: सत्संगी बनना ही मनुष्य का आद्य कर्तव्य माना गया है। हाँ एक बालक के पास से भी इसी विषय का सबक सीखा जा सकता है। आप किसी भी बच्चे को लीजिये वह जिस चीज की तरफ देखता है, टकटकी लगाकर देखता है। अगर उधर हीन आप भी देखते हैं तो आपकी आँखों की पलकें दस बार झपकें किन्तु उसकी एक बार भी नहीं ! क्यों कि बच्चे के सम्मुख जो चीज आती है तो वह उसी को अपने उपयोग में पकड़ना चाहता है कि यह क्या है और कैसी। और किसी बात की उसे चिन्ता नहीं होती। बस इसीलिये वह उसे गौर से देखता है ताकि उसके दिल पर उसका प्रभाव पड़े, जो कि घर कर लेता है, फिर अनेक प्रयत्न करने पर भी उसका दूर हटाना कठिन हो जाता है, इसी का नाम संस्कार है।

 

लड़के को शुरू के दो चार सालों में जो शिक्षा मिलती है जिसे कि वह अपनी स्वाभाविक सरलता से ग्रहण करता है, बाद में वैसी सुदृढ़ होकर रहने वाली शिक्षा अनेक वर्षों में भी उसे नहीं दी जा सकती। बाद की शिक्षा सब कृत्रिमपने को लिए हुए होती है। और इसलिये आप लोगों को चाहिए कि आप अपने बच्चों के आगे कभी भूलकर भी चेष्टा और बुरी बात न करें क्यों कि बच्चे का दिल एक प्रकार का कैमरा होता है जो कि आपकी की हुई चेष्टाओं के प्रतिबिम्ब को ग्रहण करता है।

 

बच्चे के मन में विश्वास भी नैसर्गिक होता है। उसकी मां उसे जो भी कहे वहीं उसके लिए प्रमाण है। जो कुछ कहानियां जिस रूप से उसे कही जाती हैं वे सब उसे अक्षरशः सच मालूम होती हैं। वह तो अपनी माता को ही अपना हित करने वाली मानकर उसके कहने में चलना जानता है, अपनी माता पर उसकी अटल श्रद्धा रहती है। वह उसे जैसा कहे वैसा करना जानता है। और कुछ भी नहीं, बस इसीलिये उसके चित्त में व्यग्रता न होकर एकाग्रता अधिक होती है।

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