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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

लक्ष्मी का पति


संयम स्वर्ण महोत्सव

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लक्ष्मी का पति

 

सुना जाता है कि एक बार लक्ष्मी का स्वयंवर हो रहा था। उसमें सभी लोग अपनी शान और शौरत के साथ आ सम्मिलित हुए थे। जब स्वयंवर का समय हुआ तो लक्ष्मी आयी और बोली कि मैं उसी पुरुष को वरूँगी जो कि स्वप्न में भी मेरी इच्छा न रखता हो। इस पर सब लोग बड़े निराश और हतप्रभ हो रहे। लक्ष्मी चलते-चलते अन्त में वहां पर आयी जहां पर शेषनाग की शैय्या पर विष्णु महाराज बेफिकर सोये हुए थे। आकर उसने उनके गले में वरमाला डाल दी। विष्णु बोले कौन है? तो जवाब मिला कि लक्ष्मी हूं। फिर कहा गया कि चली जाओं यहां से, तुम क्यों आयी हो, यहां पर मुझे तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है। लक्ष्मी बोली, प्रभो, मुझे मत ठुकराईयें मैं सिर्फ आपकी पगचम्पी करती रहूंगी।
 

बन्धुओ ! यह सब अलंकारिक कथन है, इसका मतलब तो इतना ही है कि जो विपत्ति से डरता है और सम्पत्ति चाहता है उससे सम्पत्ति स्वयं दूर हो जाती है। परन्तु जो सम्पत्ति को याद भी नहीं करता एवं विपत्ति आ पड़ने पर उससे घबराता नहीं है, उस पुरुष के चरणों को सम्पत्ति स्वयं चूमती है। प्रभव को भी इससे आज प्रतिबोध प्राप्त हुआ, वह विचारने लगा कि जब ऐसी बात है तो फिर मैं भी इस बोझे को अपने सिर पर लादे क्यों फिरूं? बल्कि जिस मार्ग को यह सेठ का लड़का अपना रहा है, उसी पथ का पथिक मैं भी क्यों न बन रहूँ? जिसमें सबका हित हो ऐसा सोचकर वह जम्बूकुमार के चरणों में गिर पड़ा और बोला कि प्रभो ! अब मुझे किसी की भी भूख नहीं रही, आपके वचनामृत से ही मैं तो तृप्त हो गया हूँ,

 

अतः अब मैं सिर्फ यह चाहता हूँ कि मुझे भी आप अपने चरणों में ही जगह दें, न कि मुझे अब भी इस कीचड़ में ही फँसा रहने दे। इससे हमें यह सीख लेनी चाहिए कि एक साधुसेवी के संसर्ग में आकर भी जब प्रभव सरीखा दुरहंकारी जीव साधु समागम की महिमा का तो कहना ही क्या? उसके तो गीत, वेद और पुराणों में जगह-जगह गाये हुए हैं। अतः अपने आपको सुधारने के लिए साधु की संगति करनी ही चाहिए, जिससे कि मनुष्य का मन धैर्य क्षमादि गुणों को पाकर बलवान बने।

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