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तपस्या और तपस्या का फल - 105 वां स्वर्णिम संस्मरण

मुझे आज भी वो दृश्य याद है जब 1983 में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज कलकत्ता आये थे और कलकत्ता प्रवेश से पूर्व बाली मंदिर में ठहरे थे । मैं सुबह 4 बजे गुरुदेव का दर्शन करने तथा उनके साथ विहार करने के उद्येश्य से गया था । आचार्य श्री नवम्बर महीने की सर्दी में खुले में बैठकर सामायिक / ध्यान कर रहे थे । सारा शरीर मच्छरों से ढका था । मैं टकटकी लगाकर उन्हें देखता रहा । आँखों पर, कानों में, नाक में, हाथों पर, हाथों की अंगुलियों पर, पूरे पैरों पर मोटे मोटे मच्छर जमा हो रखे थे । आचार्य श्री दो घंटे से भी अधिक उसी अवस्था में बैठे थे । सामायिक / ध्यान से उठे तो सारे शरीर पर मच्छरों के काटे हुए उभरे हुए लाल निशान बन गये थे । मेरी आँखों से झर झर आंसू गिर रहे थे पर मैं कुछ नहीं कर सकता था । आस पास आने वाले व्यक्तियों को इशारे से मौन रहने का निवेदन करता रहता था । 


मैंने आचार्यश्री को श्रीफल चढ़ाकर नमोस्तु किया और मच्छरों के काटे हुए निशानों की ओर इशारा किया । आचार्यश्री कुछ नहीं बोले, बस मुस्करा दिये और कहा - कुछ नहीं सब ठीक है । और मैं और भी आश्चर्य चकित तब हुआ जब मैंने शाम को बेलगछिया मन्दिर जी में जाकर आचार्य श्री के दर्शन किये तो देखा कि मच्छर काटने का एक भी निशान शरीर पर नहीं था । पूरा शरीर बिल्कुल सामान्य था । यह कहलाती है साधना ! तपस्या और तपस्या का फल ! उपसर्ग सहना ! परिषह सहना ! 
धन्य हैं ऐसे सच्चे गुरु !!



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