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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

आत्मा की कोई ऐज नहीं होती।


संयम स्वर्ण महोत्सव

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चंद्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़  में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने  एक वृद्ध का दृष्टांत सुनाते हुये कहा कि आपकी क्या चीज गुम गई है ? तो उन्होने कहा कि जवानी मेरी कहीं धूल में गुम गई है वह ढूंढ़ रहा हूँ। हम ठान ले तो कोई काम असंभव नहीं है । पासिबिलिटी  रहती है तो कार्य होता है। आत्मा की कोई ऐज नहीं है इसलिये अपने आपको वृद्ध या जवान नहीं समझें। चींटी में वही आत्म तत्व है और बड़े पशुओं आदि में भी वही आत्म तत्व है। जितना जाना माना उस पर शोध प्रारंभ कर दो। आँखें बंद करोगे तो आत्म तत्व दिखेगा। गुरू जी (आचार्य श्री ज्ञानसागर जी) सभी की समस्याओं का हल निकाल देते थे| चाहे बूढ़े हो या जवान क्षमा भीतर से होना चाहिये। पहले गुरूकुल पद्धति से पढ़ाई होती थी, जब पढ़ाई होती थी ब्रह्मचर्य व्रत से रहते थे उसके बाद गृहस्थ मार्ग या मोक्ष मार्ग को धारण करते थे। एक लड़के ने कृष्ण पक्ष और एक लड़की ने शुक्ल पक्ष का ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया यह कथा सुनाते हुये कहा कि यह महत्वपूर्ण है। सत् संतान की प्राप्ति के लिये विवाह किया जाता है। मैं तो कन्या दान को ही विशेष  मानता हूँ। आज बच्चों के सारे संस्कार खत्म होते जा रहे हैं। विदेशी  संस्कृति से खान – पान आदि बिगड़ रहा है। ब्रह्मचर्य तो ठीक है पर परिवार ही नहीं रहेगा तो क्या करेंगे। बच्चों को अच्छे संस्कार देना चाहिये । भविष्य में आगे माता – पिता, भाई – बहिन, मामा आदि नहीं रहेंगे। “सत्यमेव  जयते कार्यक्रम” में भी दिखाया गया है ऐसा सुना है कि आज गर्भपात बहुत हो रहे हैं। सोनोग्राफी के द्वारा पहले ही बच्चे का पता चल जाता है फिर उसे इच्छानुसार न होने पर समाप्त किया जा रहा है। अपने बच्चों को समझाओ नही  तो बाद मे रोओगे। घर पर ताला रहेगा हमेशा , क्या स्थिति रहेगी बीमार होने पे पानी भी नहीं देगा कोई। ज्वाइंट फैमिली तो आज स्वप्न जैसा हो गया है। इसलिये माता – पिता का यह परम कर्त्तव्य  है कि अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें ताकि उनका भविष्य एवं संस्कृति अच्छी बन सके।

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