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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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दृढ़ संकल्प के धनी ब्र. विद्याधर - 100 वां हीरक संस्मरण


संयम स्वर्ण महोत्सव

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अविरल स्वभाव बोध में परिणमन कर असीमित रहस्य के समाधान प्राप्त गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के श्री चरणों में सम्पूर्ण विनय अर्पित करता हूं.... हे गुरुवर आपने ब्रह्मचारी विद्याधर को जितना दिया वो लेते गए, कुछ भी छोडना नहीं चाहते थे। इस कारण उन्होंने दृढ़ संकल्प कर रखा था कि रोज का होमवर्क रोज करके ही विश्राम करना एवं अपने संकल्प के पूरा करने में ऐसे दत्तचित्त रहते थे कि कोई भी बाधा उन्हें बाधा दे ही नहीं पाती थी। इस संबंध मे नसीराबाद के आपके भक्त कुंतीलाल जी गदिया ने ब्रह्मचारी विद्याधर जी के बारे में बताया कि वह कैसे दृढ़ संकल्पी थे उन्होंने उस समय का संस्मरण सुनाया-


अप्रैल - मई 1968 नसीराबाद में ब्रह्मचारी विद्याधरजी, ज्ञानसागर जी महाराज के साथ सेठ ताराचंद सेठी जी की नसिया में रुके हुए थे। जवान सुंदर ब्रम्हचारी जी को देख कर हम सभी लोग बड़े प्रभावित होते थे। हम सुबह - दोपहर - शाम तीनों वक्त नसिया जी आते थे। गुरु ज्ञानसागर जी महाराज ब्रम्हचारी जी को सुबह- दोपहर में संस्कृत और प्राकृत के धर्म ग्रंथ पढ़ाते थे। और नसीराबाद के विद्वान भी उन्हें हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत पढ़ाने आते थे। वह सदा पढ़ते ही रहते थे। और दीवार की ओर मुख करके स्वाध्याय करते थे। वह भी गुरु महाराज के कक्ष में सदा उनके सामने ही बैठते थे। समाज के लोग ज्ञान सागर जी महाराज से चर्चा करते तब भी विद्याधर जी स्वाध्याय में लीन रहते थे। उन्हें बाधा नहीं होती थी वह किसी को भी नजर उठाकर नहीं देखते थे। रात्रि में ज्ञान सागर जी महाराज की वैयावृत्ति के बाद हम लोग उनसे कहते - भैया जी बहुत पढ़ाई हो गई अब तो बंद करो। तो वे कहते थे- "गुरु जी ने जो पढ़ाया उसे पूरा याद करके ही विश्राम करूँगा।" एक भी दिन उन्हें सोते हुए नहीं देखा, कारण कि हम लोग रात को 10:00 बजे चले जाते थे। इस तरह ब्रह्मचारी विद्याधर जी ज्ञानोपजीवी बनकर ज्ञान को अपना भोजन बना बैठे थे। वह कण्ठगत ज्ञान आज उनके वचन- मन-काय से प्रगट हो रहा है और पुरुषार्थ को नमन करता हूं और भावना भलत हूं कि- मैं भी ज्ञानोपजीवी बनकर आत्मरस चखूँ......
 

अन्तर्यात्री महापुरुष पुस्तक से साभार

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