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आज्ञाकारी ब्रह्मचारी विद्याधर - 99 वां स्वर्णिम संस्मरण

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संयम स्वर्ण महोत्सव

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आत्मानुशासित चर्या में केंद्रित गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणो में नमोस्तु - नमोस्तु - नमोस्तु..... हे गुरुवर! ब्रह्मचारी विद्याधर आपकी हर आज्ञा को पूर्ण श्रद्धा, भक्ति के साथ पालन करते थे। इस में किसी भी प्रकार का प्रमाद नहीं करते थे। गुरु आज्ञा को दृढ़ता के साथ पालन करने का यह संस्कार बचपन से ही आ गया था। बचपन में यह संस्कार कहां से मिला इसका समाधान चिंतन में यह आता है कि - पूर्व जन्म के संस्कार जाग्रत हुए हैं। आज्ञाकारिता के बारे में नसीराबाद मे आप के परम भक्त श्री शांतिलाल जी पाटनी ने ब्रह्मचारी विद्याधर जी का गुरु समर्पण का संस्मरण सुनाया, वह मैं आपको लिख रहा हूं -

 

एक दिन नसीराबाद में हमने  ब्रह्मचारी विद्याधर जी को कहा- आप धोती दुपट्टा धोते हैं तो आपका समय खराब होता है, आप मुझे दे दिया करें मैं उनको धो दिया करुंगा। तो विद्याधर जी मना करते हुए बोले- "गुरु जी की आज्ञा है खुद के कपड़े स्वयं धोना, इसलिए मैं नहीं दे सकता।" तो मैंने कहा - मैं चुपचाप धो दिया करूंगा, गुरु महाराज को पता नहीं चलेगा तो ब्रह्मचारी जी बोले- "मुझे तो पता है ना, आज्ञा क्या है ?" यह सुनकर मेरे हर्षाशु आ गए, हमने कहा- भैया जी आप धन्य हैं, गुरु आज्ञा को सदा ध्यान रखते हैं। तो ब्रह्मचारी विद्याधर जी बोले- धन्य तो आप हैं, आपने मुझे गुरु आज्ञा याद कराई....। इस तरह उन्होंने गुरु आज्ञा में पूर्ण आस्था रखते हुए असंयमी श्रावक की बात नहीं मानी। ऐसी आस्था को नमन करता हुआ.....

                       

अन्तर्यात्री महापुरुष पुस्तक से साभार

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