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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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क्रोध - संस्मरण क्रमांक 33


संयम स्वर्ण महोत्सव

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   ☀☀ संस्मरण क्रमांक 33☀☀
           ? क्रोध ?
 प्रतिकूल परिस्थितियों में आने वाले आवे का नाम क्रोध है, क्रोध एक ऐसा विकारी भाव है जो हमारे तन मन और धर्म सभी को दूषित करता है, यह एक खतरनाक बीमारी है और हमेशा से चली आ रही है एवं व्यापक भी है इसलिए यह बीमारी नहीं लगती।
 दूसरों की गलती पर कॉल करने का अर्थ है-दूसरों की गलती की सजा स्वयं को देना।
 कुछ लोगों का लोगों का कहना है कि- क्रोध मैं नहीं करता कर्म का उदय आता है,इसका समाधान देते हुए,
आचार्य श्री जी ने कहा कि-कर्म कभी क्रोध नहीं करता, कर्म के उदय में आत्मा क्रोध करता है,पुदगल कर्म में क्रोध कराने की शक्ति है पर आप क्रोध करेगे तब वह कर सकता है वरना नहीं करा सकता।आचार्य श्री जी ने व्यक्ति अजीव से क्रोध कैसे करता है, यह उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे दर्पण सामने रखा है और मुर्गा उसके सामने खड़ा है उसमें दिखाई देने वाली अपनी ही आकृति से लड़ता है जब उसकी चौंच से खून आने लगता है तो वह समझता है दर्पण में बनी हुई आकृति से आ रहा है,  क्रोध भी उसी मुर्गी के समान है।
 आज उत्तम क्षमा का दिन है, तो हम सभी जीवों को क्रोध का त्याग करके उत्तम क्षमा को धारण करना चाहिए।

? संस्मरण से साभार ?
? मुनि श्री कुंथुसागर जी महाराज
 

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