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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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अंतर्बोध - संस्मरण क्रमांक 32


संयम स्वर्ण महोत्सव

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☀☀ संस्मरण क्रमांक 32☀☀
           ? अंतर्बोध ?
उस दिन शाम का समय था । आचार्य महाराज मन्दिर के बाहर खुली दालान में विराजे थे। थोड़ी देर तत्व-चर्चा होती रही। उस पवित्र और शान्त वातावरण में आचार्य महाराज का सामीप्य पाकर सभी बहुत खुश थे। फिर सामायिक का समय हो गया। आचार्य महाराज वह से उठकर भीतर मन्दिर में चले गए । बाहर किसी ने मुझसे कहा कि  भीतर भी बिजली जला आओ। आचार्य श्री ने यह बात सुन ली । मैंने जैसे ही भीतर कदम रखा कि भीतर से वे बोल उठे - " हाँ भाई, भीतर की बिजली जला लो।" 
उनका आशय आन्तरिक आत्म- ज्योति के प्रकाश से था। मैं अवाक्. खड़ा रह गया । उनके द्वारा कही गई वह बात बोध- वाक्य बन गई, जो हमे आज भी आत्म-ज्योति जलाए रखने के लिए निरन्तर प्रेरित करती हैं।
कुण्डलपुर (१९७७)
? आत्मान्वेषी पुस्तक से साभार?
? मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज
 

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