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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 55. बोलती : अस्थियाँ

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    संसार की विचित्रता का वर्णन करती हुई अस्थियाँ कहती हैं - कभी भयंकर काला राहु, सूर्य को पूरा का पूरा निगलता हुआ सूर्यग्रहण दिखा तो कभी आग उगलता हुआ सूर्य दिखा। जिसकी तपन में पेड़-पौधे पर्वत पाषाण पूरा का पूरा संसार पिघलता-गलता नजर आ रहा है। आग कभी हवा हुई, हवा जल बनी, जल कभी भूमि के रूप में परिवर्तित हुआ, भूमि में मिला जल कीचड़ बना। कभी अमृत को झराने वाली पूर्णिमा की रात दिखी, हँसता हुआ चन्द्रमा दिखा, कभी भौंरे के समान अमावश्या की रात दिखी। कभी हँसी-खुशी तो कभी गम। कभी सुगन्ध कभी दुर्गन्ध, कभी मित्रता तो कभी शत्रुता, कभी आँखें तो कभी अन्धता, कभी स्वतंत्रता तो कभी पराधीनता।

     

    कभी मधुर भी मधुरता से दूर दिखा, सुन्दर भी सुन्दरता से व्याकुल, भाई भी भाई बन्धुओं से रहित दिखा। भावुकता बढ़ती चली। बालक पालक बना, पालक चालक बना, कभी दमन कभी शमन और कभी सुख-चमन । कभी वह भी नहीं, कभी कुछ परिणमन हुआ । 

     

    इतना सब कहने के बाद भी अस्थियाँ थकी नहीं, रुकी नहीं और भी कुछ कहती हैं आगे कि-संसार के इन सब परिणमन को देख यह धारणा नहीं बना लेना कि ये कुछ है ही नहीं, यह सब कल्पना मात्र हैं। अभाव में से इनका जन्म नहीं होता, हाँ इतना जरुर है, ये रात्रि स्वप्न के समान क्षणभंगुर अवश्य हैं, अपना स्वभाव/स्व-पन इनमें नहीं है।

     

    वस्तु का नष्ट होना, नये रूप में जन्म लेना फिर भी उनका अस्तित्त्व सदा बने रहना यह सब कैसे होता है? शाश्वत सत्ता का दर्शन कब होगा, कब शाश्वत सत्य निजात्मा की आनन्दानुभूति मिलेगी? मिलने मिटने वाली प्रतिक्षण परिवर्तनीय दशा पकड़ में क्यों नहीं आती इन आँखों से? इन सब प्रश्नों का उत्तर अस्थियों की मुस्कान में हैं, जो कह रही हैं-

     

    "उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-युक्तं सत्'

    सन्तों से यह सूत्र मिला है

    इनमें अनन्त की अस्तिमा

    सिमट-सी गई है।

    यह वह दर्पण है

    जिसमें

    भूत, भावित और सम्भावित

    सब कुछ झिलमिला रहा है,

    तैर..... रहा है

    दिखता है आस्था की आँखों से देखने से!" (पृ. 184)

    उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य युक्तं सत्' अर्थात् जो है उसका यह लक्षण है कि प्रति समय उसमें नई पर्याय जन्म लेती है, पुरानी नष्ट हो जाती है तथा नई और पुरानी पर्यायों में वस्तु का अस्तित्त्व बताने वाली ध्रौव्यता को लिए द्रव्य सदा बना रहता है। वह कभी भी नष्ट नहीं होता। जैसे मिट्टी का लौंदा घट बना, घट पर्याय की उत्पत्ति-उत्पाद, लौंदा पर्याय का विनाश-व्यय और मिट्टी का दोनों अवस्था में बने रहना सो ध्रौव्य है। यह सूत्र अनन्त में शान्त, शाश्वतता में क्षणभंगुरता का भी दर्शन कराता है।

     

    यह वह दर्पण है जिसमें वस्तु की अतीत, वर्तमान और भविष्यकालीन तीनों पर्यायें स्पष्ट झलकती हैं, दिखाई पड़ती हैं, किन्तु इन चर्म चक्षुओं से नहीं, आस्था की आँखों से अर्थात् जिनवाणी पर श्रद्धान होने से। व्यवहारिक भाषा में कहा जाता है-आना, जाना, लगा हुआ है। इसका अर्थ भी यही है कि सत् का स्वरूप उत्पाद-व्यय और ध्रौव्य से सहित होता है यही सत्य है और यही तत्त्व ज्ञान है।


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