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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 47. भेट हो 'भी' से, ना कि 'ही' से

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    कुम्भ के मुख पर 'ही' और 'भी' ये दो अक्षर भी लिखे हैं, जो बीजाक्षर के समान सारभूत रहस्य को लिए हैं और अपनी-अपनी धारणाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

     

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    "‘ही' एकान्तवाद का समर्थक है

    ‘भी' अनेकान्त, स्याद्वाद का प्रतीक है।

    हम ही सब कुछ हैं

    यूँ कहता है 'ही' सदा,

    तुम तो तुच्छ, कुछ नहीं हो!

    और

    'भी' का कहना है कि

    हम भी हैं

    तुम भी हो

    सब कुछ !"  (पृ. 172)

    वस्तु में अनेक धर्म/स्वभाव होते हैं, उन्हें स्वीकार करने वाला अनेकान्त का प्रतीक भी है। अनेक धर्मात्मक वस्तु के स्वरूप को कहने की पद्धति स्याद्वाद है। जैसे एक व्यक्ति माँ की अपेक्षा से पुत्र है, तो अपने पुत्र की अपेक्षा से पिता एवं पत्नी की अपेक्षा से पति भी, किन्तु वस्तु के एक धर्म को ही स्वीकारने वाला एकान्त मत का प्रतीक ‘ही है। ‘भी सबको सदा सम्मान देता है तो ‘ही' सबको नकारता हुआ स्वयं को ही श्रेष्ठ मानता है।

     

     ‘ही' वस्तु के बाहरी रूप को ही पकड़ता है जबकि 'भी' वस्तु के भीतरी  भाग, सही स्वरूप को स्पर्श करता है।'ही' विध्वंसकारी पश्चिमी सभ्यता है तो 'भी' भाग्य निर्माता भारतीय संस्कृति । राम पूज्य हुए हैं और रहेंगे इसका कारण  भी यही है क्योंकि राम के भीतर भी रहता था वे ‘भी' के उपासक थे तो रावण  के भीतर ही था।

     

    यद्यपि ' भी कहने से भीड़ बढ़ती-सी दिखती है अवश्य, किन्तु लोकतन्त्र की सफलता इसी में है; हम भी हैं तुम भी हो सब कुछ। सदाचार और सद्विचार ‘भी' से उत्पन्न होते हैं। स्वच्छन्दता और अहंकारिता मिटती है और स्वतन्त्रता का सपना साकार होता है 'भी' के कारण ही। 'ही' में यह शक्ति नहीं है। इसलिए प्रभु से यही प्रार्थना है कि-संसार के सभी प्राणी 'ही' से दूर हों ‘भी से मुलाकात करें, अभी करें या कभी करें, किन्तु इन्हें अनेकान्त स्याद्वाद रूप जिनशासन की उपलब्धि हो, यही भावना है।


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