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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

दुर्जन से की गई मित्रता हितकर नहीं होती दुःख दायक होती है।


संयम स्वर्ण महोत्सव

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चंद्रगिरि डोंगरगढ़ छ्त्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा कि दुर्जन से की गई मित्रता हितकर नहीं होती दुःख दायक होती है। कोई रूधिर से सने हुए वस्त्र को रूधिर से ही धोता है तो वह विषुद्ध नहीं होता है। उसी तरह वह आलोचना शुद्धि दोष को दूर नहीं करता। जिन भगवान के वचनों का लोप करने वाले और दुष्कर पाप करने वालों का मुक्ति गमन अति दुष्कर है। यदि उपचार नहीं कर सकते मरहम पट्टी नहीं कर सकते तो डण्डा तो मत मारो उस रोगी को। मैत्री उससे करो जो समय पर काम दें। सभा उसी का नाम है जिसमें तालियाँ बजती रहे कभी – कभी कवि लोग बोलते हैं तो तालियाँ बजती रहती है। दोनों हाँथों की अंजली बनाकर सिर नवाकर गुरू के सामने उनकी बांयी ओर एक हाँथ दूर गवासन से बैठकर न अति जल्दी में और न अति रूक – रूक कर स्पष्ट आलोचना करें। आज इलाज होता है तो रिएक्षन का खतरा रहता है। चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत सारी परेशानियाँ रहती है यह सावधानी से करना चाहिये। प्रवचन के समय बारिष शुरू हुई तो आचार्य श्री ने कहा कि आरती भी हो रही है और संगीत भी हो रहा है। मन की कलुषता को दूर करना चाहिये। धर्म की शुरूआत होती है तो अषुद्ध मन शुद्ध बन जाता है। योजना बनाना तो सरल है लेकिन राॅ मटेरियल जब तक इकठ्ठा नहीं हो जाता योजना बनाना पर्याप्त नहीं है। फाउंडेषन मजबूत होना चाहिये। भूकम्प निरोधी फाउंडेषन होना चाहिये। भाव सबके एक होते हैं पर भाषा अलग – अलग हो सकती है। बच्चा माँ के भाव समझता है। बच्चा भी बार – बार आपकी फेस रीडिंग करता है। इसलिये प्लान आवष्यक है। जिस वस्तु से हमें राग हुआ है उसको छोड़ना चाहिये। आज परिवार के सदस्य सभी पार्टियों में रहते हैं जब कोई पार्टी नहीं बचती है तो निर्दलीय हो जाते हैं। 

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