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नव आचार्य श्री समय सागर जी को करें भावंजली अर्पित ×
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • अध्याय 9 : सूत्र 18

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    Vidyasagar.Guru

    अब चारित्र के भेद कहते हैं-

     

    सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसाम्पराय

    यथाख्यातमिति चारित्रम् ॥१८॥

     

     

    अर्थ - सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात, इस तरह पाँच प्रकार का चारित्र है। समस्त सावद्ययोग का एकरूप त्याग करना सामायिक चारित्र है। सामायिक चारित्र से डिगने पर प्रायश्चित के द्वारा सावद्य व्यापार में लगे हुए दोषों को छेदकर पुनः संयम धारण करना छेदोपस्थापना चारित्र है। अथवा समस्त सावद्य योग का भेद रूप से त्याग करना छेदोपस्थापना चारित्र है। अर्थात् मैंने समस्त पाप कार्यों का त्याग किया। यह सामायिक चारित्र का रूप है और मैंने हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का त्याग किया, यह छेदोपस्थापना चारित्र का रूप है। जिस चारित्र में प्राणीहिंसा की पूर्णनिवृत्ति होने से विशिष्ट विशुद्धि पायी जाती है, उसे परिहार विशुद्धि कहते हैं। जिसने अपने जन्म से तीस वर्ष की अवस्था तक सुखपूर्वक जीवन बिताया हो और फिर जिनदीक्षा लेकर आठ वर्ष तक तीर्थंकर के निकट प्रत्याख्यान नाम के नौवें पूर्व को पढ़ा हो और तीनों सन्ध्या कालों को छोड़ कर दो कोस विहार करने का जिसके नियम हो, उस दुर्द्धर चर्या के पालक महामुनि को ही परिहार विशुद्धि चारित्र होता है। इस चारित्र वाले के शरीर से जीवों का घात नहीं होता, इसी से इसका नाम परिहार विशुद्धि है। अत्यन्त सूक्ष्म कषाय के होने से सूक्ष्म साम्पराय नाम के दसवें गुणस्थान में जो चारित्र होता है, उसे सूक्ष्म साम्पराय चारित्र कहते हैं। समस्त मोहनीय कर्म के उपशम से अथवा क्षय से जैसा आत्मा का निर्विकार स्वभाव है, वैसा ही स्वभाव हो जाना यथाख्यात चारित्र है। इस चारित्र को अथाख्यात भी कहते हैं, क्योंकि अथ शब्द का अर्थ अनन्तर है और यह समस्त मोहनीय के क्षय अथवा उपशम होने के अन्तर ही होता है। तथा इसे तथाख्यात भी कहते हैं, क्योंकि जैसा आत्मा का स्वभाव है, वैसा ही इस चारित्र का स्वरूप है। सूत्र में जो यथाख्यात के बाद इति शब्द है, वह यह बतलाता है कि यथाख्यात चारित्र से सकल कर्मों के क्षय की पूर्ति हो जाती है ॥१८॥

     

    English - Equanimity, reinitiation in case of failure to keep the vow by taking to the vow again after penance, purity of non-injury, slight passion for greed and subsidence or dissociation of deluding karmas are the five kinds of conduct.


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