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anil jain "rajdhani"

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About anil jain "rajdhani"

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  • Birthday 01/11/1955

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    new delhi ..

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  1. व्यक्ति बढ़ता जितना अध्यात्म मार्ग में लगता बहुत दूर है मंज़िल अभी उसकी जितना चला लगता शुरूवात है ये उसकी .. होता गुरु जिनके पास नहीं होने देता उसे ऐसा अहसास संबोधता बताकर उसे आगे का मार्ग कठिन डगर भी उसे सरल लगने लगती ... नमोस्तु गुरुवर त्रियोग वंदन
  2. THANK YOU VERY MUCH VIDYGURU.COM... FOR MAILING EVERY ACTIVITY TO MY EMAIL ID . THANKS, ONCE AGAIN. JAI JINENDRA ANIL JAIN "RAJDHANI"
  3. गृहस्थी की दौड़ में रहते हुए रन आउट नहीं रनिंग में रहना है सावधानी पूर्वक जो रनिंग करता वो रन आउट नहीं होता जो सिर्फ दौड़ने में रहता वो जल्दी रन आउट हो जाता ... गृहस्थी में हो आप गृहमंत्री की भी रखनी पड़ती बात जभी चलता व्रत-नियम पूजा पाठ ... इसलिए ! स्वावलंबी रहकर जितने कर सकते हो अपने भाव उतने तक मिलता लाभ व्रत-नियम आदि लेने का परावलंबी क्रियायों के कारण यदि छूटता / होता कोई नुकसान उतने अंश का ही मिलेगा उसका लाभ जितने अंश में निभाया तुमने स्वावलंबन के रहते ... गृहस्थी की गाड़ी चलाते हुए इतना तो रखना पड़ेगा तुम्हे ध्यान वर्ना तो रन आउट होकर नहीं खेल पाओगे पारी लंबी नहीं खड़ा कर पाओगे स्कोर बड़ा .... यानि बढ़ना है यदि धर्म मार्ग में कर्म निर्जरा के क्षेत्र में संयम धारण करके मोक्षमार्ग में करते रहो रनिंग सावधानी से वर्ना तो नियम लिया छूटा / टूटा हो जाता खेल ख़त्म आगे बढ़ने का ... मम गुरवर आचार्यश्री विद्यासागर जी का मिला मुझे उदघोषण मेरे जन्मदिन पर संयोग ही था ये मेरा जो चार महीने पूर्व में किया था व्रत अंगीकार बैठकर गुरुवर के चरणों में मेरे विकल्पों का उपसंहार मिला आज के दिन उनकी देशना में मिल गया विराम/समाधान उन सभी विकल्पों को जिनके कारण मन में थी दुविधा ... पूर्णतया और ढृढ़ता से पालन होगा नियम का मेरा धन्यवाद विद्यागुरु डॉट कॉम जिनके माध्यम से मिल गया गुरु का निर्देश जो संयोग से दिया मेरे जन्मदिन की तिथि पर घर बैठे मिल गया समाधान पाकर प्रवचन अपने ईमेल पर .. मेरे विकल्पों को मिल गया निर्देश भी कभी न करना निदान बंध न कभी आवे मन में ख्याल ऐसा किसी के कुछ करने से हुआ है ये हाल मेरा कर्मनिर्जरा की बनी रहेगी तुम्हारी प्रक्रिया गृहस्थ में रहते हुए भी बिमारी को जो जान जाता प्रकृति ने उसके उपचार की भी दी है साथ में व्यवस्था इसलिए रखो ध्यान इस बात का बिमारी का कारण है क्या जो बनी है ऐसी अवस्था हर वर्ष मिले गुरुवर की मुझे प्रत्यक्ष देशना बनी रहे यूँ ही मुझपर गुरुकृपा ... नमोस्तु गुरुवर ! त्रियोग वंदन !!! अनिल जैन "राजधानी" समय रहते उपचार मिल जाएगा प्रकृति से स्वत:... प्रार्थना यही करता इस उपहार को पाने के मौके पर श्रुत संवर्धक १४.१.२०१९ गुरुवर का उपकार रहेगा सदा याद मेरे आग्रह को करके स्वीकार कर दिया मेरा विश्वास प्रगाढ़ देकर दर्शन स्वप्न में मेरे बर्थडे की पूर्व रात्रि में ... हो गया मैं अनुग्रहित नहीं ओझल हो रहा वो दृश्य जहां चलकर मेरे साथ पहुंचे थे अपने कक्ष में गुरुवर के चलने में बाधा को नोट किया था मैंने दाहिने पैर के घुटने से नीचे कुछ फुंसी सी दिखी थी मुझे सो उसके उपचार हेतु एक दवा थी जो मेरे पास में लेकर जा रहा था मानो उनके कक्ष में नहीं रोका था मुझे किसी ने उन तक पहुँचने में बैठे थे वहां मेरे समधी और बड़े भाई पहले से जो चल दिए थे उठ के बिना किसी वार्तालाप किये गुरुवर से .... भांप गया था मैं नहीं दिखा था समर्पण उनका गुरुवर के प्रति गुरुवर वैसे भी नहीं करते सांसारिक बात किसी से ... दवा लगाने के लिए इतना जरूर कहाँ ब्रह्मचारी भैया ने गुरुवर नहीं कराते कोई उपचार मैंने इतना ही कहा उनसे दवा तो बाहरी उपचार है गुरुवर की आँख बचते ही मैं लगा दूंगा दवा उनके कुछ यदि कहेंगे तो मुझे ही कहेंगे मेरे संकल्प को मेरे श्रद्धान को देखकर मानो आशीर्वाद दिया हो संकेत से ... मना नहीं करके मानो मेरे आग्रह को स्वीकृति मिल गई थी मुझे बस, इतने में ही आँख खुल गई मेरी ... इसे तो प्रसाद मानता अपने लिए जो अस्वस्थ अवस्था के होते हुए भी संग चले थे मेरे , बैठाया पास में धन्य हो गया मैं , आग्रह करके वैसे तो अनायास ही आते रहते गुरुवर मेरे स्वप्न में पहली बार फलीभूत हुआ जो आग्रह पर दर्शन दिए इस प्रकार से ... प्रार्थना यही ईश्वर से यदि कोई प्रतिकूलता हो स्वास्थ्य की गुरुवर को स्वस्थ होवे जल्दी उनकी व्याधि बेशक लग जाए मुझे ... नमोस्तु गुरुवर ! अनिल जैन "राजधानी" श्रुत संवर्धक १२.११.२०१९
  4. निष्ठापन की ओर बढ़ रहे अब चातुर्मास सभी जैन संतों के पिच्छी परिवर्तन करते सभी संत कार्तिक के महीने में बनते निमित्त ऐसे आयोजन अनेकों त्याग/व्रत/नियम आदि लेने वाले सुधि श्रवकों के ... जो भी श्रेष्ठि श्रावक करते भेंट संयोपकरण पिच्छी गुरुजनो को अथवा लेते पुरानी पिच्छी गुरुजनो की लेते वो भी नियम आदि बढ़ने को संयम मार्ग में अपने .... यदि सौभाग्य नहीं मिले तुम्हे ऐसा करो अनुमोदना लेकर कोई व्रत/नियम तुम भी मिलेगा उतना ही लाभ जितना मिल रहा पिच्छी लेने / देने वाले को होगी कर्मो की निर्जरा तुम्हारी भी ... अपनी शक्ति के अनुसार करो त्याग ऐसे अवसरों पर प्रशस्त बना रहेगा मोक्षमार्ग तुम्हारा भी ... जय जिनेन्द्र ! अनिल जैन "राजधानी" श्रुत संवर्धक ५.११.२०१८
  5. anil jain "rajdhani"

    कल्याणमन्दिर स्तोत्र (1971)

    guruvar ki har rachna adbhut aur niraali hai...swanbhustotra ka bhi padyanuvad kiya hai guruvr ne, aapki list me nahi dikha, jai jinendra STARTS FROM THIS.....AADIM TIRTHANKAR PRABHU, ADINATH MUNINATH , AADI VYADHI AGH MAD MITE - TUM PAD ME MAM MAH..CHARAN SHARAN HAI AAPKE DONO PAAD SARAAG ...BHAVDADHI TAK LE CHALO - KARUNAKAR JINRAJ....
  6. गलती हमारी यही नहीं चलना चाहते सड़क के अनुसार चलते अपनी मर्जी से चलाना चाहते सड़क पर खुद को अपने अनुसार फिर एक्सीडेंट तो होगा ही ... घट जाती जब जीवन में अपने कोई घटना अनचाही दोष देते कर्मो को अथवा मंढ देते दोष औरों पे स्वयं को पाक-साफ़ दिखा के नहीं होता उससे समस्या का समाधान उलटी बढ़ती जाती तकलीफे जिससे जीवन में .... सोचो ! विचारो ! कभी एकांत में परंपरा को निभाना ही होता कर्त्तव्य व्यक्ति का जो निभाता जाता कुल परंपरा नहीं उसके जीवन में आता / लगता ऐसा धोखा .... परंपरा तोड़ के जो चाहता दौड़ना समय की रेस के साथ में गिर जाता वो बीच में सौ में से एक / हज़ारो-लाखों में एक होता सफल इस तरह से सब उसी का अनुकरण करना चाहते भूलकर अपनी क्षमता / दक्षता क्या हर कोई बंबई जाने वाला बन पाया है हीरो अपने दम पे ? विचारो स्वयं की परंपरा स्वयं का दायरा स्वयं की क्षमता उसी के अनुसार जगाओ उम्मीदें अपने मन में मिलेगी सफलता तुम्हे नहीं लगेगा कभी रह गए तुम पीछे नहीं आओगे कभी डिप्रेशन में असफल होने पे क्योंकि ! जुड़े हो तुम कुल परंपरा से .... आज इतना ही जय जिनेन्द्र ! अनिल जैन "राजधानी" श्रुत संवर्धक २८.८.२०१८ संसार दुखों से है भरा क्षणिक सुखाभास को पाने में चलता रहता प्रपंच हमारा कैसे मिले दुखो से छुटकारा ? अथवा कैसे होवे एहसास कम उसका ? बता दो कोई सरल सी विधि जीने की ... सरलतम विधि बस, जैसे संयोग मिलते जाए / बन जाए कर लो स्वीकार उन्हें कर लो उनके अनुसार प्रवृत्ति अपनी दुखो का कम हो जायेगा पिटारा यही है सबसे सरल सहारा ... अथवा जुड़ जाओ धर्म से घटाकर व्यव्हार अपना जगत से बढ़ जाओ अध्यात्म मार्ग में मिल सकता इस प्रकार दुखो से भी छुटकारा .... प्रणाम ! अनिल जैन "राजधानी" श्रुत संवर्धक हो जायेगा कम एहसास दुखों का अध्यात्म में बढ़ने पर मिल सकता शास्वत सुख का भी आभास तुम्हे ... जैसी लगे सुविधा कर लो स्वीकार उस मार्ग को २८.८.२०१८
  7. bahut bahut anumodna, badhaai
  8. काम करेंगे तो गलती भी होगी बिना करे काहे की गलती ? इसलिए ! घबराकर गलती होने से किसी भी कार्य के करने में मत रहो पीछे ... चौका न लगाने से बेहतर है चौका लगाना अंतराय भी यदि हो जाए बेहतर होता उससे जिसने नहीं लगाया होता चौका इसलिए ! अंतराय के भय से मत रहो पीछे चौका लगाने में व्रत-नियम आदि लेने में ... गलती/चूक यदि हो भी जाती उसमे बेहतर स्थिति में ही होते उनसे जिन्होंने व्रत-नियम नहीं लिए होते आभास होते ही गलती का प्रायश्चित लेना उसका शोधन करना होता स्वयं को उस पाप से प्रक्षालन हो जाता पाप का इस तरह से उस अपराध का जो हो गया होता अनजाने में ... उत्कर्ष बना रहेगा चारित्र आपका इस तरह से ... इसलिए ! जितनी शक्ति है आज तुम में उसके अनुसार कर लो अंगीकार व्रत-नियम मत रहो पीछे घबराकर गलती होने से जब जिस समय होगा जैसा वैसा कर लेना संशोधन किसी गुरु के समक्ष जा के इतनी ही कहती मेरी मति इस विषय में ... नमोस्तु गुरुवर ! निरंतर अवलोकन करते रहें अपनी स्थिति का बनी रही इतनी जागृति सभी में निभते रहे नियम सभी के जो भी लिए होते गुरुजनो की साक्षी में .... अनिल जैन "राजधानी" २७.८.२०१८ उत्कर्ष रखनी है यदि जीवन शैली अपनी संस्कृति और प्रकृति की रक्षा को रखो सर्वोपरि .... जानो अपनी प्रकृति उसी के अनुरूप रखो अपनी प्रवृति यही है सबसे जरुरी ... मानुष शरीर की संरचना है ऐसी जो है शाकाहारी भोजन के अनुकूल शाकाहारी जीवों की होती लंबी आंतें जो पचाती भोजन धीरे धीरे नहीं सड़ता वो वहां पड़े पड़े जबकि मांसाहारी जीवों की होती छोटी आते जो जल्दी पचा के फेंक देती कचरा बाहर में ... इसलिए ! पहचान कर अपनी प्रकृति उसके अनुरूप ही रखो अपने भोजन की पद्यति बने रहोगे स्वस्थ शरीर से बने रहोगे स्वस्थ विचारों से बने रहोगे स्वस्थ अपने आचरण से ... जिसकी बिगड़ जाती भोजन की पद्यति हो जाते वो चिड़चिड़े - गुस्सैल कलुषित भवों से भरे नहीं रह पाती उनके करुणा और दया / संवेदना जीवों के प्रति .... इसलिए ! समझकर अपनी प्रकृति उसके अनुरूप बनाओ अपनी प्रवृति बची रहेगी जिससे संस्कृति जितनी जरुरत है उससे अधिक परिग्रह की मत करो अपनी नियति प्रकृति को सुरक्षित रखने की यही है सबसे सरल नीति ईर्ष्या और स्पर्धा को मिलता विराम इसी से बन जाता व्यक्ति संतोषी यही है हमारी संस्कृति .... विचारो ! सुधारो ! अपने खान-पान की पद्यति बची रहेगी संस्कृति और प्रकृति ... जय जिनेन्द्र ! अनिल जैन "राजधानी" श्रुत संवर्धक २७.८.२०१८ "रक्षा बंधन" यानि रक्षा करो अपनी उन कर्मबन्धनों से जो बंध जाते तुम्हारी गलती / कमी से ... रखो सावधानी हर क्रिया करते हुए नहीं बंधेंगे नवीन कर्म तुम्हारी आत्मा में जो है निर्मल पवित्र ज्ञानघन .. रक्षाबंधन संदेशा यही देती रक्षा करो स्वयं की स्वयं की उददंडता से बचे रहोगे नवीन कर्मबंध से .. जरा सी सावधानी मिटा देगी भवों भवों की नादानी संसार हो जायेगा ख़त्म जल्दी वर्ना तो सावधानी हटी - दुर्घटना घटी बिताते रहोगे अनंत काल संसार के बीच में नहीं मिलेगा सच्चा सुख जो है तुम्हारा प्रभुत्व इसलिए ! रक्षा करो - स्वयं की हे प्रभो ! रक्षा करो - रक्षा करो मेरी कर्मबन्धन से इसीलिए रक्षासूत्र बांधते हम मंदिर जी में - साधर्मियों में .... अनिल जैन "राजधानी" श्रुत संवर्धक २७.८.२०१८ उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य युक्तं द्रव्यं गुण-पर्याय युक्तं द्रव्यं सामान्य-विशेष गुण समुदाय द्रव्यं ... सामान्य गुण जो सभी द्रव्यों में पाए जाते एक से विशेष गुण जो प्रत्येक द्रव्य में भिन्न भिन्न होते इतना जानते हम सभी ... द्रव्य की पहचान होती विशेष से विशेष को जानकार ही सामान्य तक हम पहुँचते यानि सत तक पहुँचने के लिए बैक गियर लगाना ही होता विशेष में ही फंस कर नहीं पहुँचते हम सामान्य तक जिस प्रकार फंसी गाडी को जाम में से निकालने के लिए बैक मार के इधर उधर पहुँच जाते अपनी मंज़िल पर समय पर यदि रहते वहीँ खड़े तो क्या मंज़िल पा लेते समय से ? अर्थात नहीं हमें भी पुरुषार्थ अपना बढ़ाना चाहिए ज्ञान से दर्शनमय होने में साकार से आकर मात्र रहने में जभी प्रमाणता आएगी आपके ज्ञान में वर्ना तो उलझकर रह जाओगे संकल्प-विकल्पों में इतना ही आज ! अनिल जैन "राजधानी" श्रुत संवर्धक २७.८.२०१८ मौन रहना ही बेहतर होता जब लगे तुम्हे सामने वाला झूठ बोल रहा बस स्वयं को बड़ा दिखाने के लिए स्वयं को सही ठहराने के लिए वर्ना तो बढ़ा लोगे झगड़ा लंबा बिना बात के एक चुप सौ को हराये फार्मूला यही रखो सदा ध्यान में ... बोल रहा होता जो झूठ स्वयं को सही स्थापित करने में क्या होता हश्र उसका ये जानते हम सभी जिस प्रकार बच्चा जो बोलता था रोज झूठ गांव में शेर आया - शेर आया जब लोग इकठ्ठा हो जाते थे कह देता था मैं तो झूठ बहका रहा था एक दिन सच में ही शेर आ गया उसके सामने चिल्लाता रहा - नहीं निकल कर आया कोई बाहर घायल पड़ा रहा सारी रात सड़क पे उसी प्रकार झूठ जब पकड़ा जाता अधमरा हो जाता व्यक्ति झूठ के पकडे जाने पे प्रमाणिकता ख़त्म हो जाती उसकी वाणी की घर में / समाज में / व्यापार में पड़ा रह जाता अकेला वो अपने में .... इतना ही आज जय जिनेन्द्र अनिल जैन "राजधानी" श्रुत संवर्धक २७.८.२०१८
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