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नव आचार्य श्री समय सागर जी को करें भावंजली अर्पित ×
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • अध्याय 2 : सूत्र 49

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    Vidyasagar.Guru

    आगे आहारक शरीर का स्वरूप कहते हैं-

     

    शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ॥४९॥

     

     

    अर्थ - आहारक शरीर शुभ है, विशुद्ध है, व्याघात रहित है और प्रमत्तसंयत मुनि के ही होता है।

     

    English - The projectable body, which is auspicious and pure and without impediment, originates in the ascetic of the sixth stage only for clearing any doubts.

     

    विशेषार्थ - आहारक शरीर का रंग सफेद, और ऊँचाई एक हाथ होती है। समचतुरस्र संस्थान होता है, धातु उपधातु से रहित होता है। न किसी से रुकता है और न किसी को रोकता है। प्रमत्त-संयत मुनि के मस्तक से उत्पन्न होता है। कभी तो ऋद्धि का सद्भाव जानने के लिए आहारक शरीर की रचना होती है। कभी सूक्ष्म पदार्थ का निर्णय करने के लिए सो मुनि के मस्तक से निकल कर वह केवली भगवान् के पास जाता है और सूक्ष्म पदार्थ का निर्णय करके अन्तर्मुहूर्त में लौटकर मुनि के शरीर में ही प्रवेश कर जाता है, तीर्थ यात्रा के उद्देश्य से भी निकलता है।


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