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  • अध्याय 13 - तीर्थक्षेत्र

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    जहाँ पर जाने से मन को शान्ति मिलती है, पुण्य का संचय होता है, कमों की निर्जरा होती है एवं सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है। ऐसे तीर्थक्षेत्र कितने प्रकार के होते हैं तथा प्रमुख तीर्थक्षेत्रों का वर्णन इस अध्याय में है।

     

    1. तीर्थक्षेत्र किसे कहते हैं ? 
    जहाँ पर तीर्थंकरो एवं सामान्य केवलियों को मोक्ष (निर्वाण) की प्राप्ति हुई, जहाँ तीर्थंकरो के कल्याणक (मोक्ष के अलावा) हुए तथा जहाँ कोई विशेष अतिशय घटित हुआ, ऐसे स्थानों (क्षेत्रों) को तीर्थक्षेत्र कहते हैं।

     

    2. तीर्थक्षेत्रों को कितने भागों में विभाजित किया गया है ?
    तीर्थक्षेत्रों को चार भागों में विभाजित किया गया है

    1. सिद्ध क्षेत्र, 2. कल्याणकक्षेत्र, 3. अतिशय क्षेत्र, 4. कलाक्षेत्र ।

    1. सिद्ध क्षेत्र :- जिस क्षेत्र (स्थान) से तीर्थंकर और सामान्य केवली को मोक्ष की प्राप्ति हुई है, ऐसे परम पावन क्षेत्र को सिद्धक्षेत्र कहते हैं। जैसे - अष्टापदजी (कैलास पर्वत), ऊर्जयन्त पर्वत (गिरनारजी), श्रीसम्मेदशिखरजी, चम्पापुरजी, पावापुरजी, नैनागिरजी, बावनगजाजी, सिद्धवरकूटजी, मुक्तागिरि , सिद्धोदयजी (नेमावर), कुंथलगिरिजी, मथुरा चौरासीजी, तारंगाजी, शकुंजयजी, गुणावाजी, कुण्डलपुरजी आदि। 
    2. कल्याणक क्षेत्र :- जिस परमपावन क्षेत्र में तीर्थंकर के गर्भ, जन्म, दीक्षा (तप) और ज्ञानकल्याणक हुए हों, उन्हें कल्याणक क्षेत्र कहते हैं - जैसे- अयोध्याजी, श्रावस्तीजी, कौशाम्बीजी, काशीजी, मिथिलापुरजी, कुशाग्रपुरजी, शौरीपुरजी, कुण्डलपुरजी आदि। 
    3. अतिशय क्षेत्र :- श्रावकों के विशेष पुण्य से देवों द्वारा (देवगति के जीव) विशेष चमत्कार आदि किए जाते हैं, ऐसे क्षेत्रों को अतिशय क्षेत्र कहते हैं। जैसे- गोमटेश्वरजी, महावीरजी, तिजाराजी, नवागढ़जी, नेमगिरिजी (जिन्तूर), कचनेरजी, भातकुली, जटवाडा, चन्द्रगिरि जी डोंगरगढ़ (छ.ग.) अादि । 
    4. कला क्षेत्र :- जिन अतिशय क्षेत्रों में कलाकारों ने अपनी कला विशेष प्रदर्शित की है। ऐसे क्षेत्रों को कलाक्षेत्र कहते हैं। जैसे-धर्मस्थलजी, शंखबसदीजी (कर्नाटक), मूढबिद्री, खजुराहोजी, नौगामाजी (राजस्थान), एलोराजी आदि।

     

    3. धर्मक्षेत्रों में पाप करने का क्या फल होता है ?

    अन्य क्षेत्र में किया हुआ पाप धर्मक्षेत्र में समाप्त हो जाता है किन्तु धर्मक्षेत्र में किया हुआ पाप वज़लेप जैसा कठोरता से चिपकता है अर्थात् फल दिए बिना नहीं रहता। यथा -

    अन्य क्षेत्रे कृतं पापं धर्म क्षेत्रे विनश्यति ।

    धर्म क्षेत्रे कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति॥ 

     

    4. क्षेत्र और खेत में क्या अन्तर है ?

    किसान परिश्रम करके खेत में धान उगाता है, जिससे सारी सृष्टि के जीवों का पेट भरता है। यह धान (अनाज) भी धम्र्यध्यान में सहायक है क्योंकि बिना भोजन के धर्म भी नहीं हो सकता है तथा धर्मात्मा क्षेत्र में ध्यान लगाता है, जिससे यह आत्मा एक दिन परमात्मा बन जाती है। यथा -

    खेत अरु क्षेत्र में अन्तर इतना जान।

    धान लगत है खेत में, लगत क्षेत्र में ध्यान।

    प्रमुख क्षेत्रों का विवरण निम्न प्रकार है
    1. तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर जी - तीर्थराज सम्मेदशिखर दिगम्बर जैनों का सबसे बड़ा और सबसे ऊँचा शाश्वत् सिद्धक्षेत्र है। यह वर्तमान में झारखण्ड प्रदेश में पारसनाथ स्टेशन से 23 किलोमीटर पर मधुवन में स्थित है। तीर्थराज सम्मेदशिखर की ऊँचाई 4,579 फीट है। इसका क्षेत्रफल 25 वर्गमील में है एवं 27 किलोमीटर की पर्वतीय वन्दना है। सम्पूर्ण भूमण्डल पर इस शाश्वत् निर्वाणक्षेत्र से पावन, पवित्र और अलौकिक कोई भी तीर्थक्षेत्र, अतिशय क्षेत्र और सिद्धक्षेत्र नहीं है। इस तीर्थराज के कण-कण में अनन्त विशुद्ध आत्माओं की पवित्रता व्याप्त है। अतः इसका एक-एक कण पूज्यनीय है, वन्दनीय है। कहा भी है - एक बार वन्दे जो कोई ताको नरक पशुगति नहीं होई। एक बार जो इस पावन पवित्र सिद्धक्षेत्र की वन्दना श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनकी नरक और तिर्यञ्चगति छूट जाती है अर्थात्वो नरकगति में और तिर्यञ्चगति में जन्म नहीं लेता है। इस तीर्थराज सम्मेदशिखर से वर्तमान काल सम्बन्धी चौबीसी के बीस तीर्थंकरो के साथ-साथ अरबों मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया एवं इस तीर्थ की एक बार वन्दना करने से करोड़ों उपवासों का फल मिलता है। इस सिद्धक्षेत्र की भूमि के स्पर्श मात्र से संसार ताप नाश हो जाता है। परिणाम निर्मल, ज्ञान, उज्ज्वल, बुद्धि स्थिर, मस्तिष्क शान्त और मन पवित्र हो जाता है। पूर्वबद्ध पाप तथा अशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं। दु:खी प्राणी को आत्मशान्ति प्राप्त होती है। ऐसे निर्वाण क्षेत्र की वन्दना करने से उन महापुरुषों के आदर्श से अनुप्रेरित होकर आत्मकल्याण की भावना उत्पन्न होती है।

     
    2. श्री पावापुर जी (बिहार) - यहाँ से अन्तिम तीर्थंकर महावीर स्वामी को निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। यहाँ तालाब के मध्य में एक विशाल मन्दिर है, जिसे जलमंदिर कहते हैं। जलमंदिर में तीर्थंकर महावीरस्वामी, गौतमस्वामी एवं सुधर्मास्वामी के चरण स्थापित हैं। कार्तिक कृष्ण अमावस्या को तीर्थंकर महावीरस्वामी के निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है।


    3. श्री अयोध्याजी (उत्तरप्रदेश) - यहाँ तीर्थंकर ऋषभदेवजी, अजितनाथजी, अभिनन्दननाथजी, सुमतिनाथ जी और अनन्तनाथजी के गर्भ, जन्म, तप और ज्ञान कल्याणक हुए थे। (ऋषभदेव का ज्ञानकल्याणक प्रयाग में हुआ था) अयोध्या की रचना देवों ने की थी। यहाँ लगभग 9 फीट ऊँचाई वाली ऋषभदेव की कायोत्सर्ग प्रतिमा बड़ी मनोज्ञ है।

     
    4. श्री कुण्डलपुर जी (मध्यप्रदेश) - बुन्देलखण्ड का यह सुप्रसिद्ध सिद्धक्षेत्र है। इस क्षेत्र पर कुण्डल के आकार का एक पर्वत है, जिससे इस क्षेत्र का नाम कुण्डलपुर पड़ा है। यहाँ एक विशाल पद्मासन 12 फुट की प्रतिमा है। जिस पर चिह्न नहीं है। जिसे जैन-अजैन सभी ‘बड़े बाबा’ के नाम से जानते हैं। पर्वत एवं तलहटी में कुल मिलाकर लगभग 62 जिनालय हैं। विगत 17 जनवरी, 2006 को सुप्रसिद्ध दिगम्बर जैनाचार्य गुरुवर श्री विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से वह मूर्ति निर्माणाधीन बहुत विशाल मंदिर में स्थापित की जा चुकी है। इस क्षेत्र से अन्तिम केवली ‘श्रीधर स्वामी’ मोक्ष पधारे थे। उनके चरणचिह्न भी वहाँ स्थापित हैं। आचार्यश्री जी द्वारा यहाँ पर फरवरी, 2013 तक 84 आर्यिका दीक्षा एवं 4 क्षुल्लक दीक्षा प्रदान की जा चुकी हैं एवं 5 वर्षा योग सम्पन्न कर चुके हैं। 


    5. श्री सिद्धोदय जी (नेमावर) - यह क्षेत्र मध्यप्रदेश के देवास जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 86 पर स्थित है। यहाँ से रावण के पुत्र आदिकुमार सहित साढ़े पाँच करोड़ मुनिराजों को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। यहाँ सुप्रसिद्ध दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से खड्गासन। अष्टधातु की पञ्च बालयति एवं त्रिकाल चौबीसी के विशाल मंदिरों का निर्माण हो रहा है। अभी यहाँ एक मन्दिर है, जहाँ मूलनायक पार्श्वनाथ की प्रतिमा है तथा एक मन्दिर नगर (नेमावर) में है। जहाँ मूलनायक अतिशयकारी भगवान् आदिनाथ जी की प्रतिमा विराजमान है। सिद्धोदय क्षेत्र पर आचार्य श्री द्वारा सन् 2013 तक 33 मुनि, 43 आर्यिका, 8 एलक एवं 7 क्षुल्लक दीक्षा प्रदान की जा चुकी है एवं दो वर्षायोग सम्पन्न कर चुके हैं। 


    6. श्री मुक्तागिरि  - यह सिद्ध क्षेत्र मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में स्थित है। यहाँ से साढ़े तीन करोड़ मुनि मोक्ष पधारे थे। यहाँ पहाड़ पर 52 जिनालय हैं। 26 नम्बर के मन्दिर में मूलनायक भगवान् पार्श्वनाथ जी की प्रतिमा है एवं तलहटी में 2 मन्दिर हैं। इस क्षेत्र में अतिशय होते रहते हैं। अभी-अभी श्रीअरुण जैन, दिल्ली जो सन् 1978 से वैशाखी के सहारे चलते थे। मुतागिरि सन् 1994 में आए तो बिना वैशाखी के यात्रा (वन्दना) की, सन् 1995 में पुनः आए तो गेट से ही वैशाखी की आवश्यकता नहीं पड़ी, सन् 1996 में वापस बैतूल जाते समय स्टेशन तक वैशाखी की आवश्यकता नहीं पड़ी, सन् 1997 से पूर्णत: वैशाखी छूट गई। वह प्रतिवर्ष यहाँ दर्शन करने आते हैं। इस सिद्धक्षेत्र पर गुरुवर आचार्यश्री विद्यासागरजी द्वारा फरवरी 2013 तक 9 मुनि, 9 एलक, 7 क्षुल्लक एवं 1 क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान की जा चुकी है एवं तीन वर्षायोग सम्पन्न कर चुके हैं।

     
    7. श्री गिरनारजी (गुजरात) - 22 वें तीर्थंकर श्री नेमिनाथ जी के दीक्षा, ज्ञान एवं निर्वाण कल्याणक यहीं से हुए तथा 72 करोड़ 700 मुनि यहाँ से मोक्ष पधारे यहाँ कुल 5 पहाड़ी हैं। प्रथम पहाड़ी पर राजुल की गुफा, दूसरी पहाड़ी पर अनिरुद्धकुमार के चरणचिह्न, तीसरी पहाड़ी पर शम्भुकुमार के चरणचिह्न, चौथी पहाड़ी पर प्रद्युम्न कुमार के चरणचिह्न हैं। पाँचवीं पहाड़ी पर तीर्थंकर नेमिनाथ के चरणचिह्न हैं। चरणचिह्न के पीछे तीर्थंकर श्री नेमिनाथ जी की भव्य दिगम्बर प्रतिमा है। गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी ने इस पहाड़ी पर 5 एलक दीक्षा प्रदान की थीं। 


    8. श्री श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) - हासन जिले में श्रवणबेलगोला महान्अतिशय क्षेत्र है। इस क्षेत्र में दो पहाड़ियाँ हैं। एक विन्ध्यगिरिनाम की पहाड़ी है। विन्ध्यगिरिपहाड़ी पर भगवान्बाहुबली की 57 फीट ऊँचाई वाली एक प्रतिमा खुले आकाश में है। इसे गंगवंश के सेनापति चामुण्डराय ने निर्माण कराया था, जिसका अपर नाम गोम्मट था। अत: गोम्मट के ईश्वर(स्वामी) होने से इस क्षेत्र एवं प्रतिमा का नाम गोमटेश्वर पड़ गया। इस प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा सन् 981 में हुई है। तभी से प्रत्येक 12 वर्ष में यहाँ महामस्तकाभिषेक होता है। सामने दूसरी पहाड़ी पर चन्द्रगिरि है, जहाँ पर अनेक मन्दिर हैं। चामुण्डराय ने चन्द्रगिरि पर एक हस्त प्रमाण इन्द्रनीलमणि की तीर्थंकर नेमिनाथजी की प्रतिमा स्थापित की थी। एक गुफा में अन्तिम श्रुतकेवली श्री भद्रबाहु मुनिराज के चरणचिह्न बने हुए हैं। जहाँ उन्होंने सल्लेखना धारण की थी।



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    रतन लाल

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    तीर्थों पर विशेष ज्ञान प्राप्त किया

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