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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • अध्याय 17 - तिर्यञ्चगति

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    संसारी जीवों की दूसरी गति है तिर्यञ्चगति, इसमें जीवों को कैसे-कैसे दु:ख भोगने पड़ते हैं, इसमें कितने गुणस्थान होते हैं। इनकी आयु आदि कितनी होती है, इसका वर्णन इस अध्याय में है।

     

    1. तिर्यञ्चगति किसे कहते हैं ?

    1. जिस नाम कर्म का निमित्त पाकर आत्मा तिर्यञ्च भाव को प्राप्त होता है, वह तिर्यञ्चगति है ।
    2. जो मन, वचन और काय की कुटिलता को प्राप्त हैं, जिनकी आहारादि संज्ञाएँ सुव्यक्त हैं और जिनके अत्यधिक पाप की बहुलता पायी जाती है, उनको तिर्यच कहते हैं और उनकी गति को तिर्यच्च गति कहते हैं। (गो.जी., 148)
    3. तिरोभाव को अर्थात् नीचे रहना बोझा ढोने लायक कर्मोदय से तिरोभाव को प्राप्त हो, वे तिर्यञ्च योनि वाले हैं। (रा.वा., 4/27/3)

     

    2. तिर्यञ्चगति में कौन-कौन से जीव आते है ?

    देव, नारकी एवं मनुष्य के अलावा शेष सब जीव तिर्यञ्चगति वाले कहलाते हैं। अर्थात् एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय एवं पञ्चेन्द्रिय में पशु, पक्षी, सर्प आदि।

     

    3. पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च के तीन भेद कौन से हैं ?

    पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च के तीन भेद निम्न हैं

    1. जलचर - जो जल में रहते हैं, वे जलचर कहलाते हैं। जैसे-मछली, मगर, केकड़ा, ओक्टोपस (अष्टबाहु) अादि ।
    2. नभचर - आकाश में उड़ने वाले जीव, नभचर कहलाते हैं। जैसे-कोयल, मैना, तोता, चिड़िया आदि।
    3. थलचर - जो पृथ्वी पर रहते हैं, वे थलचर कहलाते हैं। जैसे-हाथी, घोड़ा, गाय, बकरी आदि।

    नोट - ये तीनों भेद चर (पञ्चेन्द्रिय) की अपेक्षा से हैं विकलेन्द्रिय की अपेक्षा से नहीं।

     

    4. क्षेत्र की अपेक्षा पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चों के कितने भेद हैं ?

    क्षेत्र की अपेक्षा पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चों के दो भेद हैं - कर्मभूमिज तिर्यञ्च और भोगभूमिज तिर्यञ्च।

     

    5. भोगभूमिज तिर्यञ्चों का आहार क्या होता है ? 
    भोगभूमि में सिंहादि तिर्यज्च भी शाकाहारी होते हैं, वे अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार माँसाहार के बिना कल्पवृक्षों से प्राप्त सामग्री का भोग करते हैं। (ति.प., 4/397) 


    6. क्या भोगभूमि में जलचर, थलचर एवं नभचर तीनों भेद होते है ? 
    नहीं। भोगभूमि में जलचर जीव एवं विकलचतुष्क (2, 3, 4 एवं असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय) नहीं होते हैं, लवण भोगभूमि सम्बन्धी हैं, वहाँ जलचर नहीं रहते हैं। भोगभूमि के नदी, तालाबों में भी जलचर नहीं होते हैं एवं विकलचतुष्क भी नहीं होते हैं। यही कारण है कि सौधर्म इन्द्र तीर्थंकर बालक के जन्माभिषेक के लिए क्षीरसागर (5वाँ समुद्र) का जल लाता है। क्योंकि उसमें त्रस जीव नहीं रहते हैं। (का.अ.टी., 144 ) 


    7. तिर्यञ्चगति में कौन-कौन से दु:ख हैं ? 
    तिर्यञ्चगति में अनेक प्रकार के दु:ख हैं। सिंह, व्याघ्र अपने से कमजोर पशुओं को खा जाते हैं, आकाश में गिद्ध चील उड़ते हुए पक्षियों को झपटकर पकड़ लेते हैं, जल में बड़े-बड़े मच्छ छोटी-छोटी मछलियों को खा जाते हैं, इनसे बच गए तो भूख, प्यास, रोग के दुखों को सहन करना पड़ता है, छेदन-भेदन के दु:ख बहुत हैं, सांड को बैल बनाया जाता है, सुअर के बाल उखाड़े जाते हैं, इनसे बच गए तो म्लेच्छ, भील, धीवर आदि मनुष्य उसे मार डालते हैं और आज 21वीं सदी में तिर्यञ्चों के दुखों का पार नहीं है, बूचड़खाने में प्रतिदिन लाखों पशु काटे जाते हैं। (का.अ., 40-44)


    8. क्या सभी तिर्यञ्चों को ऐसा दु:ख होता है ? 
    नहीं। भोगभूमिज तिर्यच्चों के केवल सुख ही होता है और कर्मभूमिज तिर्यच्चों के सुख व दुख दोनों होते हैं। (ति. प., 5/300)


    9. तिर्यञ्चों के कितने गुणस्थान होते हैं ?
    तिर्यच्चों में 1 से 5 तक गुणस्थान होते हैं। एकेन्द्रिय से असंज्ञी पञ्चेन्द्रियों तक मात्र प्रथम गुणस्थान होता है। कर्मभूमिज संज्ञी। पज्चेन्द्रिय में 1 से 5 तक गुणस्थान होते हैं। भोगभूमिज तिर्यच्चों में 1 से 4 तक गुणस्थान होते हैं। संज्ञी संमूच्छन तिर्यच्चों में 1 से 5 तक गुणस्थान होते हैं।

     
    10. संज्ञी संमूच्छन तिर्यञ्चों की क्या विशेषताएँ हैं ? 
    यह अन्तर्मुहूर्त काल में सर्व पर्याप्तियों से पर्याप्त हो पुन: अन्तर्मुहूर्त विश्राम करता हुआ एवं एक अन्तर्मुहूर्त में विशुद्ध होकर के संयमासंयम भी प्राप्त कर सकता है और एक पूर्व कोटि काल तक देशसंयम का पालन कर सकता है। जैसे-मच्छ, कच्छप, मेंढक आदि जीव, किन्तु इनका वेद नपुंसक ही रहता है एवं ये प्रथमोपशम सम्यक्त्व प्राप्त नहीं कर सकते हैं। मात्र क्षयोपशम (वेदक) सम्यक्त्व प्राप्त कर सकते हैं। (ध.पु., 4/350)

     
    11 .क्या भोगभूमि में भी पञ्चमगुणस्थानवर्ती तिर्यञ्च एवं विकलचतुष्क पाए जाते हैं ? 
    भोगभूमि में आदि के 4 गुणस्थान ही होते हैं वहाँ पञ्चम गुणस्थानवर्ती एवं विकलचतुष्क नहीं होते हैं, किन्तु पूर्व के बैरी देव यदि कर्मभूमि से उनका अपहरण करके भोगभूमि में छोड़कर चले जाते हैं तो वहाँ भी विकलचतुष्क एवं पञ्चम गुणस्थानवर्ती तिर्यञ्च पाए जाते हैं। (ध-पु. 4/8/168-189)

     
    12. पञ्चेन्द्रिय तिर्यज्च के पाँच प्रकार कौन-कौन से होते हैं एवं उनकी आयु कितनी होती है ?

    जलचर

    मछली आदि

    1 पूर्व कोटि

    परिसर्प

    गोह, नेवला, सरीसृप आदि

    9 पूर्वांग

    उरग

    सर्प

    42,000 वर्ष

    पक्षी

    भैरुण्ड आदि

    72,000 वर्ष

    चतुष्पद

    भोगभूमिज

    3 पल्य

    (रा.वा., 3/39/5)


    गणना - 1 पूर्वाग = 8400000 (चौरासी लाख वर्ष) एवं 8400000 पूर्वाग का एक पूर्व होता है। एक पूर्व में वर्ष 70560000000000 होते हैं।

    नोट - तिर्यञ्चों की जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त है।

    Edited by admin


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