Jump to content
आचार्य श्री विद्यासागर मोबाइल एप्प डाउनलोड करें | Read more... ×
  • Sign in to follow this  

    अध्याय 50 - गति - आगति

       (0 reviews)

    संसारी जीव मरण कर किस-किस गति में जाते हैं एवं उस गति में जीव मरण कर कहाँ-कहाँ से आते है और पञ्चम गति अर्थात मोक्ष कौन प्राप्त करता है | इसका वर्णन इस अध्याय में है |

     

    1. गति-आगति किसे कहते हैं ?

    गति का अर्थ जाना अर्थात् उस गति से मरण कर जीव कौन-कौन सी गति में जाते हैं। आगति का अर्थ आना अर्थात् उस गति में जीव कौन-कौन सी गति से मरणकर आते हैं।

     

    2. नरकगति से जीव मरणकर कहाँ-कहाँ जाते हैं एवं नरकगति में जीव मरण कर कहाँ-कहाँ से आते हैं ?

    नरकगति से नारकी मरण कर मनुष्य एवं तिर्यञ्चगति में जाते हैं तिर्यच्च में भी संज्ञी पञ्चेन्द्रिय, पर्याप्त एवं गर्भज ही बनते हैं।

    विशेष - सप्तम पृथ्वी से आने वाले जीव तिर्यच्च ही बनते हैं, किन्तु वह अपने जीवन में सम्यकदर्शन प्राप्त नहीं कर सकते हैं। छठवीं पृथ्वी से आने वाले मनुष्य और तिर्यञ्च बनते हैं, ये सम्यकदर्शन और देशसंयम प्राप्त कर सकते हैं किन्तु मनुष्य महाव्रती नहीं बन सकते हैं। पाँचवीं पृथ्वी से आने वाले मनुष्य और तिर्यच्च बनते हैं, तिर्यच्च देशव्रती भी बन सकते हैं, मनुष्य देशव्रती, महाव्रती तो बन सकते हैं, किन्तु मोक्ष नहीं जा सकते हैं। चतुर्थ पृथ्वी से आने वाले मनुष्य और तिर्यञ्च बनते हैं, तिर्यच्च देशव्रती भी बन सकते हैं, मनुष्य महाव्रती बनकर मोक्ष भी जा सकते हैं, किन्तु वह तीर्थंकर नहीं बन सकते हैं। तृतीय, द्वितीय एवं प्रथम पृथ्वी से आने वाले, मनुष्य और तिर्यञ्च बनते हैं। तिर्यच्च देशव्रती भी हो सकते हैं, मनुष्य तीर्थंकर भी बन सकते हैं। (रावा, 3/6/7) नरकगति में आने वाले जीव मनुष्य एवं तिर्यच्च गति से ही आते हैं। किन्तु असंज्ञी। पज्चेन्द्रिय प्रथम पृथ्वी से आगे नहीं जा सकते हैं। सरीसृप, गोह, द्वितीय पृथ्वी से आगे नहीं जा सकते हैं। पक्षी तृतीय पृथ्वी से आगे नहीं जा सकते हैं। भुजंगादि सर्प चतुर्थ पृथ्वी से आगे नहीं जा सकते हैं। सिंह पञ्चम पृथ्वी से आगे नहीं जा सकते हैं। स्त्रियाँ छठवीं पृथ्वी से आगे नहीं जा सकती हैं। मनुष्य एवं तंदुल मत्स्य सप्तम पृथ्वी तक जा सकते हैं। (त्रि.सा., 205)

     

    3. तिर्यञ्चगति से जीव मरणकर कहाँ-कहाँ जाते हैं एवं तिर्यञ्चगति में जीव मरणकर कहाँ-कहाँ से आते हैं ?

    तिर्यञ्चगति से जीव मरणकर चारों गतियों में जाते हैं, किन्तु देवगति में सोलहवें स्वर्ग से आगे नहीं जा सकते हैं। (गोक, 541) असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय भी मरणकर चारों गतियों में जाते हैं, किन्तु नरकगति में प्रथम पृथ्वी से आगे नहीं जाते हैं एवं देवगति में भवनवासी एवं व्यंतरों में जाते हैं एवं तिलोयपण्णती, त्रिलोकसार ग्रन्थ के अनुसार भवनत्रिक में जाते हैं, कल्पवासी में नहीं। एकेन्द्रिय एवं विकलेन्द्रिय मरणकर मनुष्य एवं तिर्यञ्चगति में जाते हैं, किन्तु अग्निकायिक, वायुकायिक मरणकर मात्र तिर्यच्च ही बनते हैं। तिर्यच्चगति में आने वाले चारों गतियों से आते हैं, किन्तु बारहवें स्वर्ग तक के देव तिर्यच्चगति में आते हैं, उससे ऊपर वाले नहीं। असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय में मनुष्य एवं तिर्यञ्चगति से आते हैं। विकलेन्द्रिय में जीव मनुष्य एवं तिर्यञ्च गति से आते हैं। एकेन्द्रिय में जीव तिर्यञ्च, मनुष्य एवं देवगति से आते हैं किन्तु दूसरे स्वर्ग तक के देव आते हैं उससे ऊपर वाले नहीं तथा एकेन्द्रिय के अग्निकायिक, वायुकायिक जीव तिर्यच्चगति एवं मनुष्यगति से आते हैं।

     

    4. मनुष्यगति से मरणकर जीव कहाँ-कहाँ जाते हैं एवं मनुष्यगति में जीव कहाँ-कहाँ से आते हैं ?

    मनुष्यगति से मनुष्य मरणकर चारों गतियों में जाते हैं एवं पञ्चमगति (सिद्धगति) अर्थात् मोक्ष भी जाते हैं। श्रावक सोलहवें स्वर्ग से ऊपर नहीं जा सकते हैं। द्रव्यलिंगी मुनि नवग्रैवेयक तक जा सकते हैं एवं भावलिंगी मुनि प्रथम स्वर्ग से सर्वार्थसिद्धि विमान तक जाते हैं। द्रव्यलिंगी मुनि के गुणस्थान 1 से 5 तक एवं भावलिंगी के गुणस्थान 6 से 12 तक किन्तु बारहवें गुणस्थान में मरण नहीं होता है। मनुष्य गति में जीव चारों गतियों से आते हैं किन्तु सप्तम पृथ्वी से आने वाले जीव मनुष्य नहीं बनते हैं एवं अग्निकायिक, वायुकायिक, जीव भी मरण करके मनुष्य नहीं बनते हैं।

     

    5. देवगति से मरण कर जीव कहाँ-कहाँ जाते हैं एवं देवगति में जीव कहाँ-कहाँ से आते हैं ?

    देवगति से मरणकर जीव मनुष्यगति एवं तिर्यञ्चगति में जाते हैं। दूसरे स्वर्ग तक के देव एकेन्द्रिय भी बनते हैं, किन्तु पृथ्वीकायिक, जलकायिक, वनस्पतिकायिक बनते हैं। अग्निकायिक, वायुकायिक नहीं। बारहवें स्वर्ग तक के देव तिर्यञ्च भी बनते हैं, किन्तु इससे ऊपर वाले मनुष्यगति में ही आते हैं। नव ग्रैवेयक तक के देव, स्त्री और नपुंसक भी होते हैं। इसके ऊपर वाले पुरुषवेदी ही होते हैं। (गोक, 542-543)  नोट - देव विकलचतुष्क में नहीं आते हैं।  देवगति में जीव मनुष्यगति एवं तिर्यच्चगति से आते हैं, तिर्यउच्च सोलहवें स्वर्ग तक आते हैं किन्तु असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय भवनत्रिक तक आते हैं, इससे ऊपर नहीं। मनुष्य सर्वार्थसिद्धि तक आते हैं।

     

    6. भोगभूमि के मनुष्य एवं तिर्यञ्च मरणकर कौन-कौन सी गति में जाते हैं एवं भोगभूमि में मनुष्य एवं तिर्यञ्च कौन-कौन सी गति से मरणकर आते हैं ?

    भोगभूमि के मनुष्य एवं तिर्यच्च मरण कर देवगति में ही जाते हैं, किन्तु मिथ्यादृष्टि और सासादन सम्यकद्रष्टि भवनत्रिक में ही जाते हैं एवं अविरत सम्यकद्रष्टि प्रथम एवं दूसरे स्वर्ग में जाते हैं। कर्मभूमि के मनुष्य एवं तिर्यञ्च ही भोगभूमि के मनुष्य एवं तिर्यञ्च होते हैं।

     

    7. कर्मभूमि के कौन से तिर्यञ्च भोगभूमि के मनुष्य एवं तिर्यञ्च होते हैं ?

    कर्मभूमि के संज्ञी पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च ही भोगभूमि के मनुष्य एवं तिर्यञ्च होते हैं।

     

    8. महापुरुष मरणकर कौन-कौन सी गतियों में जाते हैं एवं कौन-कौन सी गतियों के जीव मरणकर महापुरुष होते हैं ?

    महापुरुष

    गति

    आगति

    तीर्थंकर

    मोक्षगति

    नरकगति और देवगति

    चक्रवतीं

    नरकगति, देवगति और मोक्षगति

    देवगति

    बलभद्र

    देवगति और मोक्षगति

    देवगति

    नारायण (वासुदेव)

    नरकगति

    देवगति

    प्रतिनारायण (प्रतिवासुदेव)

    नरकगति

    देवगति

    कुलकर

    देवगति

    मनुष्यगति

    नारद

    नरकगति

     

    रुद्र

    नरकगति

     

    कामदेव

    मोक्षगति

     

    तीर्थंकर की माता

    देवगति

     

    तीर्थंकर के पिता

    देवगति और मोक्षगति

     

     

    9. अन्य मतावलम्बी साधु मरणकर कौन से स्वर्ग तक जाते हैं ?

    चरक

    ब्रह्मोत्तर स्वर्ग तक

    (त्रि.सा., 547)

    परिव्राजक

    ब्रह्य स्वर्ग तक

    (रा.वा., 4/21/10)

    आजीवक

    सहस्रार स्वर्ग तक

    (रा.वा., 4/21/10)

    तापस

    भवनत्रिक तक

    (त्रि.सा., 546)

    चरक - नग्नाण्ड है जिनका लक्षण, ऐसे चरक कहलाते हैं।

    परिव्राजक - एक दण्डि, त्रि दण्डि, ऐसे परिव्राजक कहलाते हैं।

    आजीवक - कॉजी का भोजन करने वाले नग्न आजीवक होते हैं। काँजी अर्थात् खट्टा किया हुआ जल। (त्रि.सा., 547 का विशेषार्थ )

    तापस - पञ्चाग्नि तप तपने वाले तपस्वी तापस कहलाते हैं।

    Edited by admin

    Sign in to follow this  


    User Feedback

    Create an account or sign in to leave a review

    You need to be a member in order to leave a review

    Create an account

    Sign up for a new account in our community. It's easy!

    Register a new account

    Sign in

    Already have an account? Sign in here.

    Sign In Now

    There are no reviews to display.


×