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  • अध्याय 44 - कषाय

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    जो आत्मा को संसार में परिभ्रमण कराती है, वह कषाय कहलाती है, ऐसी कषाय कितनी होती हैं, उनका स्वरूय क्या है, उनका फल क्या है आदि का वर्णन इस अध्याय में है।

     

    1. कषाय किसे कहते हैं ? 

    1. जो आत्मा के चारित्र गुण का घात करे, उसे कषाय कहते हैं। 
    2. कषाय शब्द दो शब्दों के मेल से बना है। ‘कष+आय'। कष का अर्थ संसार है क्योंकि इसमें प्राणी अनेक दु:खों के द्वारा कष्ट पाते हैं और आय का अर्थ है ‘लाभ'। इस प्रकार कषाय का अर्थ हुआ कि जिसके द्वारा संसार की प्राप्ति हो, वह कषाय है। 
    3. आत्मा के भीतरी कलुष परिणामों को कषाय कहते हैं, इनके द्वारा जीव चारों गतियों में परिभ्रमण करता हुआ दु:ख प्राप्त करता है। कषाय चुम्बक के समान है, जिसके द्वारा कर्म चिपक जाते हैं। 

     

    2. कौन-सी गति में जीव के उत्पन्न होते समय कषाय कौन सी रहती है ? 
    नरकगति में उत्पन्न जीवों के प्रथम समय में क्रोध का उदय, मनुष्यगति में मान का उदय, तिर्यञ्चगति में माया का उदय और देवगति में लोभ का उदय नियम से रहता है (आ. श्री यतिवृषभ के अनुसार) तथा इन गतियों में इन्हीं कषायों की बहुलता रहती है, किन्तु स्त्रियों में माया कषाय की बहुलता रहती है।

     

    3. कषाय कितने प्रकार की होती हैं ? 
    कषाय सामान्य से चार प्रकार की होती हैं। क्रोध, मान, माया, लोभ। इनमें अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ। अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ । प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ एवं संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ।

     

    4. अनन्तानुबन्धी कषाय किसे कहते हैं ? 
    अनन्त भवों को बाँधना ही जिसका स्वभाव है, वह अनन्तानुबन्धी कषाय कहलाती है। यह कषाय सम्यक्त्व और चारित्र दोनों का ही घात करती है। (गोक, 45)

     

    5. अप्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं ? 
    जो देशसंयम का घात करती है, वह अप्रत्याख्यानावरण कषाय है। अप्रत्याख्यान अर्थात् देशसंयम को जो आवरण करे, देशसंयम को न होने दे, वह अप्रत्याख्यानावरण कषाय है। (गोक,45)

     
    6. प्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं ?
    जो सकल संयम का घात करती है, वह प्रत्याख्यानावरण कषाय है। प्रत्याख्यान अर्थात् संयम को जो आवरण करे, संयम को न होने दे, वह प्रत्याख्यानावरण कषाय है। (गोक,45)

     

    7. संज्वलन कषाय किसे कहते हैं ? 
    जिस कषाय के रहते सकल संयम तो रहता है किन्तु यथाख्यात संयम प्रकट नहीं हो पाता है, वह संज्वलन कषाय है।

     

    8. कषायों की शक्तियों के दृष्टान्त व फल कौन-कौन से हैं ?
    निम्न तालिका में देखें -

    कषाय

    दूष्टान्त

    अनन्तानुबन्धी क्रोध

    अप्रत्याख्यानावरण क्रोध

    प्रत्याख्यानावरण क्रोध

    संज्वलन क्रोध

    अनन्तानुबन्धी मान

    अप्रत्याख्यानावरण मान

    प्रत्याख्यानावरण मान

    संज्वलन मान

    अनन्तानुबन्धी माया

    अप्रत्याख्यानावरण माया

    प्रत्याख्यानावरण माया

    संज्वलन माया

    अनन्तानुबन्धी लोभ

    अप्रत्याख्यानावरण लोभ

    प्रत्याख्यानावरण लोभ

    संज्वलन लोभ

    पत्थर की रेखा के समान।

    भूमि की रेखा के समान। (पानी से मिट जाती है)

    बालू की रेखा। (हवा से मिट जाती है)

    जल की रेखा।

    पत्थर का स्तम्भ।

    अस्थि स्तम्भ। (पुरुषार्थ से मुड़ जाती है)

    काष्ठ का स्तम्भ। (पिच्छी की डंडी)

    लता स्तम्भ।

    बाँस की जड।

    मेढ़े के सींग समान। (बांस की जड़ से कम टेढ़ी )

    गोमूत्र के समान (गो के मूत्र की वक्र रेखा के समान)

    खुरपे के समान या लेखनी के समान।

    कृमिराग के रंग समान।

    गाडी का ऑगन। (केरोसिन से साफ हो जाता है)

    कीचड़ के समान। (जल से धुल जाता है)

    हल्दी का रंग।


    फल - अनन्तानुबन्धी कषाय का फल नरकगति, अप्रत्याख्यानावरण कषाय का फल तिर्यज्ञ्चगति, प्रत्याख्यानावरण कषाय का फल मनुष्यगति एवं संज्वलन कषाय का फल देवगति है। (गोजी, 284-287) 

     

    9. कषायों का संस्कार काल कितना है ? 
    अनन्तानुबन्धी कषाय का संस्कार काल छ: माह से ज्यादा तथा संख्यात-असंख्यात एवं अनंत भवों तक रहता है। अप्रत्याख्यानावरण का संस्कार काल छ: माह तक है। प्रत्याख्यानावरण का संस्कार काल एक पक्ष अर्थात् 15 दिन तक है एवं संज्वलन का संस्कार काल अन्तर्मुहूर्त है। (गोजी,46)

     

    10. क्रोध कषाय किसे कहते हैं ? 
    अपने और पर के उपघात या अनुपकार आदि करने के क्रूर परिणाम क्रोध हैं। इससे किसी का अहित हो या न हो, स्वयं का अवश्य हो जाता है। क्रोध जलते हुए अंगारे की तरह है, जिसे दूसरों पर फेंकने से वह जले या न जले, स्वयं का हाथ जल ही जाता है। इसमें हृदय की धड़कन बढ़ जाती है। हाथ-पैर कांपने लगते हैं, आँखें लाल हो जाती हैं, हित-अहित का विवेक समाप्त हो जाता है।

     
    11. क्रोध कषाय के कौन-कौन से कारण हैं ? 
    क्रोध कषाय के निम्न कारण हैं-

    1. कषाय का उदय होना,
    2. भूख-प्यास के कारण,
    3. इच्छा पूर्ति नहीं होना,
    4. मेरे सही को कोई गलत कहे,
    5. अज्ञान के कारण।

     

    12. क्रोध कषाय का फल बताइए ?

    1. द्वीपायन मुनि क्रोध के कारण अग्नि कुमार देव हुए।
    2. क्रोध के समय किया गया भोजन-पानी भी विष बन जाता है। 
    3. राजा अरविन्द क्रोध के कारण नरक गया।

     

    13. क्रोध कषाय से कैसे बच सकते हैं ?
    क्रोध कषाय से निम्न प्रकार से बच सकते हैं

    1. पर की वेदना को अपनी वेदना समझे। 
    2. वस्तु स्थिति जानें। नेवला-सर्प-बालक-महिला की कहानी।
    3. स्थान परिवर्तन कर देना चाहिए। जैसे-श्रवणकुमार ने किया था। 
    4. जवाब न देना-मौनेन कलहो नास्ति।
    5. कुछ क्षण के लिए ऊपर आकाश की ओर देखें।

     

    14. किसका क्रोध कब तक रहता है ? 

    1. गुरुजनों का क्रोध प्रणाम करने पर्यन्त रहता है, प्रणाम करने के पश्चात् नष्ट हो जाता है।
    2. क्षत्रियों का क्रोध मरण पर्यन्त अर्थात् चिरकाल तक रहता है अथवा उनका क्रोध प्राणों को नष्ट करने वाला होता है।
    3. ब्राह्मणों का क्रोध दान पर्यन्त रहता है, दान मिलने से शांत हो जाता है।
    4. वणिकों का क्रोध प्रियभाषण पर्यंत होता है, ये लोग मीठे वचनों द्वारा क्रोध को त्यागकर शांत हो जाते हैं।
    5. जमींदारों (साहूकारों) का क्रोध उनका कर्जा चुका देने से शांत हो जाता है। (नीतिवाक्यामृत)
    6. विद्वानों का क्रोध तब तक रहता है, जब तक वह अपनी प्रशंसा नहीं सुन लेता। प्रशंसा सुनते ही क्रोध शांत हो जाता है। 
    7. बच्चों का क्रोध तब तक रहता है, जब तक उन्हें उनकी प्रिय वस्तु नहीं मिलती। वह वस्तु मिलते ही क्रोध शांत हो जाता है। 
    8. महिलाओं का क्रोध तब तक रहता है, जबतक उन्हें मन पसन्द साड़ी और आभूषण नहीं मिलते। ये मिलते ही क्रोध शान्त हो जाता है।

     

    15. मान कषाय किसे कहते हैं ? 
    रोष से अथवा विद्या, तप और जाति आदि के मद से दूसरों के प्रति नम्र न होने को मान कहते हैं। (ध.पु., 1/351)

     

    16. मान कषाय का क्या फल है ? 
    रावण विद्याधर मान के कारण नरक गया, दुर्गन्धा नामक बालिका ने अनेक दु:ख भोगे तथा मरीचि को अहंकार के कारण अनेक दुर्गतियों में भटकना पड़ा।

     

    17. मान कषाय को कैसे रोक सकते हैं ? 
    8 मदों में से जिसका भी मद हो तो अपने से बड़ों को देखो तो मद अपने आप नहीं होगा। ज्ञान का मद है तो केवलज्ञानी को देखें। धन का मद है तो चक्रवर्ती को देखें। रूप का मद है तो कामदेव को देखें। बल का मद है तो भीम, रावण को देखें। इसी प्रकार और भी जानना चाहिए। 

     

    18. माया कषाय किसे कहते हैं ?  

    1. दूसरे को ठगने के लिए जो कुटिलता या छल आदि किए जाते हैं, वह माया कषाय है। 
    2. अपने हृदय में विचार को छुपाने की जो चेष्टा की जाती है, उसे माया कषाय कहते हैं। मन, वचन, काय की प्रवृत्ति में एकरूपता नहीं होने को मायाचार कहते हैं। ऐसे व्यक्ति ठगी या मायावी कहलाते हैं। माता-पिता, भाई-बहिन तक उसकी बातों का विश्वास नहीं करते हैं। 

     

    19. माया कषाय का क्या फल है ? 

    1. मायाचार के कारण मृदुमति महाराज भी हाथी की पर्याय में गए। 
    2. युधिष्ठिर के नाम पर कलंक लगा क्योंकि उन्होंने युद्ध में कहा था ‘अश्वत्थामा हतो नरो वा

     

    20. माया कषाय को कैसे रोक सकते हैं ? 
    आज तक किसी का मायाचार छिपा नहीं है, वह प्रकट हो ही जाता है। अत: सादगी, सरलता, ईमानदारी, स्पष्टवादिता, कथनी-करनी में एकरूपता, अपने गुणों को छिपाना और दोषों का निकालना आदि के प्रयोग करने से तथा हमेशा याद रखना, दगा किसी का सगा नहीं।

     

    21. लोभ कषाय किसे कहते हैं ?

    1. धन आदि की तीव्र आकांक्षा को लोभ कषाय कहते हैं।
    2. बाह्य पदार्थों में जो यह मेरा है, इस प्रकार अनुराग रूप बुद्धि होती है, वह लोभ है।

    इसे पाँचों पापों का बाप (पिता) कहा है- लोभी कभी सुखी नहीं होता है, सदा और मिले- सदा और मिले वह चाह की आग में जलता रहता है, न स्वयं भोग पाता है न दूसरों को भोगने देता है।

     

    22. लोभ कषाय का फल क्या है ? 

    1. लोभ के कारण कौरवों को भी नरक जाना पड़ा। 
    2. पाप का बाप कौन है, इस प्रश्न के उत्तर में पंडित जी को नगरनारी के द्वारा अपमानित होना पड़ा। 
    3. वह किसान जिसे 1000 रूबल (रूस की मुद्रा) में इच्छित भूमि मिलने वाली थी लोभ में दौड़-दौड़ कर मर गया । 

     

    23. लोभ कषाय से कैसे बच सकते हैं ? 
    हजारों नदियों से समुद्र की तृप्ति नहीं हुई, हजारों टन ईंधन से अग्नि की तृप्ति नहीं हुई। सागरोपम काल तक स्वर्गों में भोग भोगने से तृप्ति नहीं हुई तो यहाँ 60-70 वर्ष की उम्र में क्या हो सकता है ? भरत चक्रवर्ती भी भाई से लड़े अंत में राज्य छोड़ना पड़ा तो हम सब इसके पीछे क्यों पड़े हैं और अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं। ऐसा विचार करें।

     

    24. नो कषाय किसे कहते हैं ? 
    नो अर्थात् ईषत् (किंचित्) कषाय का वेदन करावे, उसे नोकषाय या अकषाय कहते हैं। 

     

    25. नो कषाय कितनी होती हैं ?
    नो कषाय 9 होती हैं -हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद एवं नपुंसकवेद।

    Edited by admin



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