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    अध्याय 56 - गुणस्थान

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    जिस प्रकार शरीर का तापमान थर्मामीटर के द्वारा नाया जाता है, उसी प्रकार संसारी आत्मा का आध्यात्मिक विकास या पतन गुणस्थान रूपी थर्मामीटर के द्वारा नापा जाता है। अथात् अपने आत्मा के परिणाम को नापने के थममीटर का नाम गुणस्थान है। ये कितने होते हैं, इनका क्या स्वरूप्य है। इसका वर्णन इस अध्याय में है।

     

    1. गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    मोह और योग के निमित्त से आत्मा के परिणामों में प्रति क्षण होने वाले उतार-चढ़ाव को गुणस्थान कहते हैं। (गोजी, 3)

     

    2. गुणस्थान कितने होते हैं ?

    जीवों के परिणाम यद्यपि अनन्त हैं परन्तु उन सभी को चौदह श्रेणियों में विभाजित किया है, अत: गुणस्थान चौदह होते हैं-1. मिथ्यात्व, 2. सासादन, 3.मिश्र या सम्यग्मिथ्यात्व, 4.अविरत सम्यक्त्व, 5देशविरत या संयमासंयम, 6. प्रमत्तविरत, 7. अप्रमत्तविरत, 8. अपूर्वकरण,9. अनिवृत्तिकरण, 10. सूक्ष्मसाम्पराय, 11.उपशान्तमोह, 12. क्षीणमोह, 13.सयोगकेवली, 14.अयोगकेवली।

     

    3. मिथ्यात्व गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से होने वाले तत्वार्थ के अश्रद्धारूप परिणामों को मिथ्यात्व गुणस्थान कहते हैं। इन परिणामों से युक्त जीवों को मिथ्यादृष्टि कहते हैं। इसके दो भेद हैं (अ) स्वस्थान मिथ्यादृष्टि (ब) सातिशय मिथ्यादृष्टि। जो जीव मिथ्यात्व में ही रचपच रहा है, उसे स्वस्थान मिथ्यादृष्टि कहते हैं एवं सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के सम्मुख जीव के जो अध:करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण रूप परिणाम होते हैं, उसे सातिशय मिथ्यादृष्टि कहते हैं।

     

    4. सासादन गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    1. प्रथमोपशम सम्यक्त्व अथवा द्वितीयोपशम सम्यक्त्व के काल में कम-से-कम एक समय और अधिक-से-अधिक छ: आवली शेष रहने पर अनन्तानुबन्धी कषाय के चार भेदों में से किसी एक कषाय के उदय होने से उपशम सम्यक्त्व से च्युत होने पर और मिथ्यात्व प्रकृति के उदय न होने से मध्य के काल में जो परिणाम होते हैं, उसे सासादन गुणस्थान कहते हैं। (जी.का. 19)
    2. उपशम सम्यक्त्व से पतित होकर जीव जब तक मिथ्यात्व गुणस्थान में नहीं आता तब तक उसे सासादन सम्यग्दृष्टि कहते हैं। इस गुणस्थान का जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट से छ: आवली है।

    नोट - इस गुणस्थान में उपशम सम्यग्दृष्टि ही आता है।

     

    5. सम्यग्मिथ्यात्व या मिश्र गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    1. पूर्व स्वीकृत अन्य देवता के अपरित्याग के साथ-साथ अरिहंत भी देव हैं ऐसा अभिप्राय: वाला पुरुष मिश्र गुणस्थान वाला है। 
    2. जिस गुणस्थान में सम्यक् और मिथ्यारूप मिश्रित श्रद्धान पाया जाए, उसे सम्यग्मिथ्यात्व या मिश्र गुणस्थान कहते हैं। 
    3. दाल और चावल के मिश्रित स्वाद के समान सम्यक्त्व औरमिथ्यात्व से मिश्रित भाव को सम्यग्मिथ्यात्व कहते हैं।

    विशेष -

    1. सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान में मारणान्तिक समुद्धात नहीं होता है।
    2. सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान में मरण नहीं होता है।
    3. सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान में आयुबन्ध भी नहीं होता है।
    4. सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान का काल अन्तर्मुहूर्त है।
    5. सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान वाला संयम को भी प्राप्त नहीं कर सकता है।

     

    6. अविरत सम्यक्त्व गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    जहाँ सम्यग्दर्शन तो प्रकट हो गया हो किन्तु किसी भी प्रकार का व्रत (संयमासंयम या सकल संयम) न हुआ हो, उसे असंयत सम्यक्त्व या अविरत सम्यक्त्व गुणस्थान कहते हैं। (ध.पु., 1/172)

     

    7. देशविरत या संयमासंयम गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    इस गुणस्थान का धारक एक ही समय में संयत और असंयत दोनों होता है। वह श्रावक त्रसहिंसा से विरत होने से संयत है और स्थावर हिंसा से विरत न होने से असंयत है, अत: उसे देशविरत या संयमासंयम गुणस्थान कहते हैं। (धपु., 1/174-175)

     

    8. प्रमतविरत गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    जहाँ सकल संयम प्रकट हो गया है किन्तु संज्वलन कषाय का तीव्र उदय होने से प्रमाद हो, उसे प्रमतविरत गुणस्थान कहते हैं। (धपु., 1/176)

     

    9. अप्रमतविरत गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    जहाँ संज्वलन कषाय का मन्द उदय हो जाने से प्रमाद नहीं रहा उस परिणाम को अप्रमतविरत गुणस्थान कहते हैं। (ध.पु., 1/179)

     

    10. अप्रमतविरत गुणस्थान के कितने भेद हैं ?

    अप्रमतविरत गुणस्थान के दो भेद हैं -स्वस्थान अप्रमतविरत एवं सातिशय अप्रमतविरत। जो सातवें गुणस्थान से छठवें में और छठवें गुणस्थान से सातवें में आते-जाते रहते हैं, उनको स्वस्थान अप्रमतविरत कहते हैं। जो उपशम अथवा क्षपक श्रेणी के सम्मुख होकर अध:प्रवृत्त करण रूप परिणाम करते हैं, उनको सातिशय अप्रमतविरत कहते हैं। (गो.जी., 46-47)

     

    11. अध:प्रवृत्तकरण किसे कहते हैं ?

    जहाँ सम-समयवर्ती जीवों के परिणाम भिन्न-समयवर्ती जीवों के परिणामों से समान और असमान दोनों प्रकार के होते हैं, उन्हें अध:प्रवृत्तकरण कहते हैं। इन अध:प्रवृत्तकरण परिणामों की अपेक्षा अप्रमतविरत गुणस्थान का अपर नाम अध:करण भी है।

     

    12. अपूर्वकरण गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    1. अ = नहीं, पूर्व = पहले, करण = परिणाम। जिस गुणस्थान में आत्मा के जो पूर्व में परिणाम नहीं थे ऐसे अपूर्व-अपूर्व परिणाम उत्पन्न होते हैं वह अपूर्वकरण गुणस्थान है।

     2. इस गुणस्थान में सम-समयवर्ती जीवों के परिणाम समान-असमान दोनों होते हैं, किन्तु भिन्न समय में रहने वाले जीव के परिणाम भिन्न ही होते हैं। यहाँ मुनिराज पूर्व में कभी भी प्राप्त नहीं हुए थे, ऐसे अपूर्व परिणामों को धारण करते हैं इसलिए इस गुणस्थान का नाम अपूर्वकरण गुणस्थान है। (धपु., 1/181)

     

    13. अनिवृत्तिकरण गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    अनिवृत्तिकरण के अन्तर्मुहूर्त काल में से किसी एक समय में रहने वाले अनेक जीव जिस प्रकार शरीर के आकार आदि से परस्पर में भिन्न-भिन्न होते हैं, किन्तु उनके परिणामों में भेद नहीं पाया जाता है,उसे अनिवृत्तिकरण गुणस्थान कहते हैं। (गो.जी., 57) तीनों करण के उदाहरण निम्नलिखित हैं -

    1. अध:करण का उदाहरण - 1 बजे पाँच मुनिराजों ने विहार किया। वे गति की अपेक्षा से आगे-पीछे हो जाते हैं। एक तो सबसे आगे बढ़ गए तथा तीन पीछे रह गए तथा एक उनसे भी पीछे रह गए। इस प्रकार तीन भेद हो जाते हैं।

    1 बजकर 5 मिनट पर फिर पाँच मुनिराजों ने विहार किया, उनमें से एक की तीव्रगति होने पर वह 1 बजे निकले मुनिराजों में जो सबसे आगे थे उन तक तो नहीं पहुँच पाते लेकिन बीच में जो तीन मुनिराज थे उनकी बराबरी कर लेते हैं और एक जो पीछे वाले थे, तीन उनके साथ हो जाते हैं और एक उनसे भी पीछे रह जाते हैं।

    1 बजे निकले थे और जो 1 बजकर 5 मिनट पर निकले थे उनकी समानता मिल गई। इसी प्रकार जिन्होंने पहले अध:करण को प्राप्त किया उनकी विशुद्धि कम थी और जिन्होंने बाद में अध:करण को प्राप्त किया उनकी विशुद्धि अधिक थी तो पहले वाले के बराबर हो जाए उनसे मिल जाए, उसे अध:करण कहते हैं।

    2. अपूर्वकरण का उदाहरण - जैसे-पाँच मुनिराजों ने 1 बजे विहार किया और उनमें से एक आगे निकल गए, तीन बीच में रह गए तथा एक उनसे भी पीछे रह गए अर्थात् एक समयवर्ती जीवों के परिणामों में तारतम्यता पाई जाती है। किन्तु 1 बजकर 5 मिनट पर जो पाँच मुनिराजों ने विहार किया तो वे भी आगे-पीछे हो गए लेकिन कितनी भी तीव्रगति से चले तो भी पहले वाले (1 बजे विहार करने वाले) की बराबरी नहीं कर पाएंगे अर्थात् भिन्न समयवर्ती जीवों के परिणामों में असमानता ही पाई जाती है।

    3. अनिवृत्तिकरण का उदाहरण - 1 बजे पाँच मुनिराजों ने विहार किया, वे सब एक साथ ही रहे आगे-पीछे नहीं हुए और 1 बजकर 5 मिनट पर जिन पाँच मुनिराजों ने विहार किया तो वे भी आगेपीछे न होकर एक साथ ही रहे। अत: अनिवृत्तिकरण में एक समयवर्ती जीवों के परिणामों में समानता और पूर्वोतर समयवर्ती जीवों के परिणामों में असमानता ही होती है।

     

    14. ये तीन करण कहाँ-कहाँ होते हैं ?

    1. प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन प्राप्त करते समय।
    2. द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन प्राप्त करते समय।
    3. अन्तानुबन्धी की विसंयोजना करते समय।
    4. चारित्र मोहनीय का उपशम करते समय।
    5. चारित्र मोहनीय का क्षय करते समय।
    6. क्षायिक सम्यग्दर्शन प्राप्त करते समय।

    विशेष - क्षायोपशमिक सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक चारित्र एवं संयमासंयम से पूर्व आदि के दो करण होते हैं।

     

    15. करण किसे कहते हैं ?

    जिस परिणाम विशेष के द्वारा उपशमादि रूप विवक्षित भाव उत्पन्न किया जाता है, वह परिणाम करण कहलाता है। अथवा परिणाम को करण कहते हैं। (धपु., 1/181)

     

    16. सूक्ष्म साम्पराय गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    जिस गुणस्थान में संज्वलन लोभ कषाय का अत्यन्त सूक्ष्म उदय होता है, उसे सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान कहते हैं। सूक्ष्म = छोटा, साम्पराय=कषाय। (गो.जी., 59)

     

    17. उपशांत मोह गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    समस्त मोहनीय कर्म के उपशम से उत्पन्न होने वाले गुणस्थान को उपशांत मोह गुणस्थान कहते हैं। (ध.पु., 1/189)

     

    18. क्षीण मोह गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    समस्त मोहनीय कर्म के क्षय से उत्पन्न आत्मा का विशुद्ध परिणाम क्षीण मोह गुणस्थान कहलाता है। (ध.पु., 1/190)

     

    19. सयोग केवली गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    चार घातिया कर्मों के क्षय हो जाने से जहाँ अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तसुख व अनन्त वीर्य प्रकट हो जाते हैं, उन्हें केवली कहते हैं और उनके जब तक योग रहता है, तब तक उन्हें सयोग केवली कहते हैं। (रा.वा., 9/24)

     

    20. अयोग केवली गुणस्थान किसे कहते हैं ?

    सयोग केवली के जब योग नष्ट हो जाते हैं एवं जब तक शरीर से मुक्त नहीं होते हैं, तब तक इनको अयोग केवली कहते हैं। अयोग केवली का काल 5 हृस्व अक्षर (अ, इ, उ, ऋ, ल) बोलने में जितना समय लगता है, उतना ही है। इनके उपान्त्य समय में 72 एवं अन्तिम समय में 13 प्रकृतियों का क्षय हो जाता है।

     

    21. किस गुणस्थान वाला जीव कौन-कौन-से गुणस्थानों में जा सकता है ?

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    22. उपशम श्रेणी किसे कहते हैं ? इसमें कितने गुणस्थान होते हैं एवं उपशम श्रेणी एक जीव कितने बार चढ़ सकता है ?

    जहाँ चारित्र मोहनीय कर्म का उपशम करता हुआ जीव आगे बढ़ता है, वह उपशम श्रेणी है। इसमें 8, 9,10,11 गुणस्थान होते हैं। उपशम श्रेणी वाले ही नीचे के गुणस्थानों में आते हैं एवं मरण भी उपशम श्रेणी वालों का होता है। उपशम श्रेणी अधिक-से-अधिक चार बार चढ़ सकते हैं किन्तु एक भव में दो बार से अधिक नहीं चढ़ सकते हैं। पाँचवीं बार यदि चढ़ेगा तो नियम से क्षपक श्रेणी ही चढ़ेगा।

     

    23. क्षपक श्रेणी किसे कहते हैं ? इसमें कितने गुणस्थान होते हैं एवं क्षपक श्रेणी कितने बार चढ़ सकते है ?

    हाँ चारित्रमोहनीय कर्म का क्षय करता हुआ जीव आगे बढ़ता है वह क्षपक श्रेणी है। इसमें 8,9,10 एवं 12 वाँ गुणस्थान होता है। इसमें मरण नहीं होता है एवं जीव एक ही बार क्षपक श्रेणी चढ़ता है और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। (रावा, 9/1/18)

     

    24.अनादि मिथ्यादृष्टि किसे कहते हैं ?

    जिसने अभी तक सम्यक् दर्शन को प्राप्त नहीं किया है, उसे अनादि मिथ्यादृष्टि कहते हैं।

     

    25. सादि मिथ्यादृष्टि किसे कहते हैं ?

    जिसने एक बार सम्यग्दर्शन को प्राप्त कर लिया है एवं पुन: मिथ्यात्व में आ गया है, वह सादि मिथ्यादृष्टि है। अनादि मिथ्यादृष्टि प्रथम गुणस्थान से 4,5 एवं 7 वें गुणस्थान में जाता है एवं सादि मिथ्यादृष्टि प्रथम गुणस्थान से 3, 4, 5 एवं 7 वें गुणस्थान में जाता है।

     

    26. एक जीव की अपेक्षा कौन से गुणस्थान का कितना काल है ?

    क्र.

    गुणस्थान

    जघन्मय क्राल

    उत्कृष्ट काल 

    1.

    मिथ्यात्व

    अन्तर्मुहूर्त

    अनादिअनंत, अनादि सांत और सादि सांत

    2.

    सासादन

    एक समय

    6 आवली

    3.

    मिश्र या सम्यग्मिथ्यात्व

    अन्तर्मुहूर्त

    अन्तर्मुहूर्त

    4.

    अविरत सम्यक्त्व

    अन्तर्मुहूर्त

    एक समय कम 33 सागर एवं 9 अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्व कोटि

    5.

    देशविरत या संयमासंयम

    अन्तर्मुहूर्त

    एक पूर्व कोटि में 3 अन्तर्मुहूर्त कम

    6.

    प्रमतविरत

    एक समय

    (मरण की अपेक्षा)

    अन्तर्मुहूर्त

     

    7.

    अप्रमत्तविरत

    एक समय

    (मरण की अपेक्षा)

    अन्तर्मुहूर्त

     

    8.

    अपूर्वकरण

    एक समय

    (मरण की अपेक्षा)

    अन्तर्मुहूर्त

     

    9.

    अनिवृत्तिकरण

    एक समय

    (मरण की अपेक्षा)

    अन्तर्मुहूर्त

     

    10.

    सूक्ष्म साम्पराय

    एक समय

    (मरण की अपेक्षा)

    अन्तर्मुहूर्त

     

    11.

    उपशान्तमोह

    एक समय

    (मरण की अपेक्षा)

    अन्तर्मुहूर्त

     

    12.

    क्षीण मोह

    अन्तर्मुहूर्त

    अन्तर्मुहूर्त

     

    13.

    सयोग केवली

    अन्तर्मुहूर्त

     

    1 पूर्व कोटि में 8 वर्ष 8 अन्तर्मुहूर्तकम

    14.

    अयोग केवली

    अन्तर्मुहूर्त

     

    अन्तर्मुहूर्त 

    विशेष - जघन्य और उत्कृष्ट काल के बीच का समय मध्यम काल कहलाता है।

     

    27. मरण किन-किन जीवों के नहीं होता है ?

    सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान में, निवृत्यपर्याप्त अवस्था को धारण करने वाले मिश्रकाययोगी, क्षपकश्रेणी में, उपशम श्रेणी चढ़ते हुए अपूर्वकरण गुणस्थान के प्रथम भाग में, प्रथमोपशम सम्यक्त्व में, तेरहवें गुणस्थान में, सप्तम पृथ्वी (नरक) के द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ गुणस्थान में, अनन्तानुबन्धी कषाय की विसंयोजना करके मिथ्यात्व गुणस्थान को प्राप्त होने वाले जीव अन्तर्मुहूर्त तक मरण को प्राप्त नहीं होते हैं एवं कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टि का मरण नहीं होता है। जिसने अनन्तानुबन्धी चतुष्क, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व का क्षय कर दिया है एवं सम्यक् प्रकृति का अनन्त बहुभाग क्षय कर दिया है, उसे कृतकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टि कहते हैं। (गोक, 560-561) आचार्य श्री यतिवृषभ जी के अनुसार कृतकृत्य वेदक का मरण होता है।

    विशेष - आचार्य यतिवृषभ के अनुसार कृतकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टि के मरण के बारे में दोनों उपदेश हैं। (ज.ध.2/213,215)

     

    28. किस गुणस्थान में कितने जीव हैं ?

    1. प्रथम गुणस्थान में अनन्तानन्त जीव हैं। (धपु, 3/10)
    2. द्वितीय गुणस्थान में पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण जीव हैं।
    3. तृतीय गुणस्थान में पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण जीव हैं।
    4. चतुर्थ गुणस्थान में पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण जीव हैं।
    5. पञ्चम गुणस्थान में पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण जीव हैं। (धपु, 3/63)

     

    29. मनुष्यगति के किस गुणस्थान में उत्कृष्ट से कितने जीव हो सकते हैं।

    1. प्रथम गुणस्थान में - असख्यात

    2. द्वितीय गुणस्थान में - 52 करोड

    3. तृतीय गुणस्थान में - 104 करोड

    4. चतुर्थ गुणस्थान में - 700 करोड

    5. पञ्चम गुणस्थान में - 13 करोड

    6. छठवें गुणस्थान में - 5,9398,206

    7. सातवें गुणस्थान में - 2,9699,103

    8. उपशम श्रेणी के अष्टम गुणस्थान में - 299

    नवमे गुणस्थान में - 299

    दसवें गुणस्थान में - 299

    ग्यारहवें गुणस्थान में - 299

    9. क्षपक श्रेणी के अष्टम गुणस्थान में - 598

    नवमे गुणस्थान में - 598

    दसवें गुणस्थान में - 598

    बारहवें गुणस्थान में - 598

    10. तेरहवें गुणस्थान में - 8,98,502

    11. चौदहवें गुणस्थान में - 598

    छठवें गुणस्थान से चौदहवें गुणस्थान तक के जीवों की कुल संख्या - 8,99,99,997

    विशेष - कुल मनुष्यों की संख्या, असंख्यात है, वह सम्मूछन की अपेक्षा से है। गर्भज मनुष्यों की संख्या 29

    अङ्क प्रमाण है। उपशम श्रेणी के प्रत्येक गुणस्थान में 299,300 एवं 304 जीव भी होते हैं एवं इससे दुगुने क्षपक श्रेणी के प्रत्येक गुणस्थान में 598,600 एवं 608 जीव भी होते हैं एवं चौदहवें गुणस्थान में भी क्षपक श्रेणी के किसी भी गुणस्थान के समान 598,600 एवं 608 जीव भी होते हैं। ऐसी तीन मान्यताएँ हैं। (धपु, 3/244-252 एवं 3/89, 3/95-97)

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