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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

अष्ट प्रातिहार्य (आठ प्रातिहार्य)

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अष्ट प्रातिहार्य (आठ प्रातिहार्य)
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गवान जिनेन्द्रदेव की मूर्ति के साथ अष्ट मंगल या अष्टप्रातिहार्यों का अंकन पारंपरिक रूप से होता रहा है। प्रस्तुत आलेख में शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर अष्ट मंगलों का स्वरूप विवेचित किया गया है।

प्राचीन काल से जैन मंदिरों में अष्ट मंगल प्रातिहार्य का जिन प्रतिमाओं के साथ अंकन होता आ रहा है। अष्ट मंगल प्रातिहार्यमंगल स्वरूप बनाये जाते हैं। जिनेन्द्र भगवान की समवशरण स्थली में अनेंक मंगल द्रव्य रूपी सम्पदायें थीं। अष्टमंगल प्रातिहार्य उन्हीं सम्पदाओं में से हैं समवशरण तीर्थंकरों के धर्मोपदेश देने का पवित्र स्थान होता है, जिसे देवों द्वारा निर्मित किया जाता है। अष्ट मंगल प्रातिहार्य पूजनीय व पवित्रता के प्रतीक स्वरूप समवशरण स्थली में इस प्रकार समलंकृत हैं:-

तरू अशोक निकट में सिंहासन छविदार।

तीन छत्र सिर पर लसैं भा-मण्डल पिछवार।।
दिव्य ध्वनि मुख से खिरे, पुष्प वृष्टि सुर होय।
ढोरे चौसठ चमर चष, बाजे दुन्दुभि जोय।।

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