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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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दीक्षित क्षुल्लक जी

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क्षुल्लक श्री धैर्यसागरजी महाराज का जीवन परिचय 

पूर्व नाम : श्री संजय कुमार जी जैन

पिता का नाम : श्री प्रेमचंद जी जैन

माता का नाम : श्रीमती अंगूरी देवी जी जैन

भाई - बहिन (जन्म के क्रम से) : 1) श्री राजीव जी, 2) श्री सजीव जी, 3) आपका क्रम 4) श्री राजेश जी, 5) श्रीमती रश्मि जैन

जन्म दिनांक : 22 नवम्बर 1966, गुरुवार भाद्रपद शुक्ल - 8,वि.सं. - 2023

जन्म स्थान : जबलपुर(म.प्र.)

लौकिक शिक्षा : बी.कॉम.

ब्रह्मचर्य व्रत : 01 जनवरी 1987 श्रीदिग.जैन सिद्धक्षेत्र नैनागिरि जी जिला-छतरपुर(म.प्र.)

क्षुल्लक दीक्षा : 10 फरवरी 1987, मंगलवार माघ शुक्ल - 12, वि.सं. - 2043

दीक्षा स्थल : श्री दिग.जैन सिद्धक्षेत्र नैनागिरिजी जिला-छतरपुर(म.प्र.)

दीक्षा गुरू : प.पू. आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

मातृभाषा : हिन्दी

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  2. गवान जिनेन्द्रदेव की मूर्ति के साथ अष्ट मंगल या अष्टप्रातिहार्यों का अंकन पारंपरिक रूप से होता रहा है। प्रस्तुत आलेख में शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर अष्ट मंगलों का स्वरूप विवेचित किया गया है। प्राचीन काल से जैन मंदिरों में अष्ट मंगल प्रातिहार्य का जिन प्रतिमाओं के साथ अंकन होता आ रहा है। अष्ट मंगल प्रातिहार्यमंगल स्वरूप बनाये जाते हैं। जिनेन्द्र भगवान की समवशरण स्थली में अनेंक मंगल द्रव्य रूपी सम्पदायें थीं। अष्टमंगल प्रातिहार्य उन्हीं सम्पदाओं में से हैं समवशरण तीर्थंकरों के धर्मोपदेश देने का पवित्र स्थान होता है, जिसे देवों द्वारा निर्मित किया जाता है। अष्ट मंगल प्रातिहार्य पूजनीय व प
  3. द्रष्टान्त से सिद्धान्त की ओर (आचार्यश्री विद्यासागर जी की चिन्तन यात्रा ) संकलन प्रस्तुति - मुनिश्री प्रसादसागर जी आमुख जैन धर्म अनादि अनन्त काल से तीर्थकरों द्वारा प्रवर्तित होता चला आ रहा है। उनके अभावों में गणधर - आचार्यों द्वारा उन का अनुकरण कर जिनशासन की धर्म ध्वजा फहराई जाती रही है। आचार्यों ने जिनशासन के धर्म सिद्धान्तों को सरलीकरण करने के लिए जनभाषा एवं लौकिक उदाहरणों क मध्यम अपनाया । न्याय-दर्शन विदों ने उदाहरण/दृष्टान्त को भी तत्व को समझाने का एक साधन स्वीकार किया है। आज दार्शनिक-सन्त-विद्वान् आदि अपने व्याख्यानों में लौकिक-वैज्ञानिक उदाहरणों/दृष्टान्तों के माध्
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