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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • गुरु-ज्ञान का रहेस्य

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    सन् 2006 में सभी संघ कुण्डलपुर में इकट्ठा हुआ। उस समय मैं धीमी-धीमी चाल से चलकर आ रही थी। आचार्य श्री ज्ञान साधना केन्द्र में सिंहासन पर बैठे हुये थे। आचार्य भक्ति का समय हो गया था। सभी साधक बैठ चुके थे। जैसा भी हो आचार्य श्री ने मुझे कब धीमी चाल से चलता देख लिया, और मैं दीवाल के सहारे टिककर बैठ गई। यह सब गुरुदृष्टि में आ गया। आचार्यभक्ति के बाद कुछ आर्यिकायें उठ गई, कुछ बैठी थी। साधु निकल गये थे। आचार्य श्री कहने लगे- प्रशान्तमती कैसे चलती है? और कैसे बैठती है? क्यों ? मैंने यह बात सुन ली, मैं गुरु के निकट आकर बैठ गई, वह पुन: बोले- क्यों केसे चलती हो ?

     

    मैंने पहले इसका जबाव कुछ नहीं दिया। आँखों में आँसु भर आये, उसी आँसु भरी आवाज में कहा- आचार्य श्री, मुझे अशुद्धि सहन नहीं होती। अगर कोई भी मुझे स्पर्श कर लेता है तो कदम भारी हो जाते हैं। ऐसा लगने लग जाता है कि जैसे किसी ने लोहे की बेड़िया पहना दीं हो। सो मेरी चाल धीमी हो जाती है। चलते नहीं बनता। जैसे ही आचार्य श्री ने मेरे उदगार सुने, सभी आर्यिकाओं की तरफ हाथ से इशारा करते हुये कहा इसको कोई मत छुआ करो, इसको स्पर्शजन्यबाधा है। आचार्य श्री ने जैसे ही कहा, सभी आर्यिकायें भी कहने लगीं- इनको मत छुओ। कुछ ठीक से, कुछ व्यंग्य से। जो भी हो, इस पर रोक लग गई। मेरी चाल सही हो गई। यह आचार्य श्री ने कहकर उपचार करा दिया।

     

    वैसे जब मैं अकेली रहती या नगर या गाँव में होती तब सभी जानते हैं कि इनको स्पर्श नहीं करना। मैं स्वस्थ रहती हूँ। इसका फिर विकल्प नहीं होता। साधर्मी के बीच कठिन होता है। उनको आश्चर्य होता- मैंने जब दीक्षा ली, महिलाओं ने पैर स्पर्श किये, पैर वजनदार से हो गये। एक बालाघाट का ज्योतिषी, वह वैद्य भी था, उन्होंने मुझे देखकर कहा- महिलास्पर्श बन्द करो, ठीक हो जायेगा। ऐसा मैंने उपचार कर लिया था, लेकिन आचार्य श्री को नहीं बताया था। लेकिन अनकहे ही उन्होंने मेरी कमजोर चाल को देखकर स्वयं समझ लिया एवं साधर्मीजन के बीच का उपचार करवा दिया था।

     

    धन्य है गुरुराज ! प्रारम्भिक अवस्था से लेकर अभी तक चाहे मानसिक हो, सभी में मेरा सहयोग किया। एक बीज जब माली बगीचे में डालता है, उसकी वह किस प्रकार समय-समय पर देखभाल करता है, फिर वह अपनी मेहनत का फल देखता है, कि एक बीज में कितनी ताकत थी। जो बड़ा वृक्ष बन गया। माली देख-देखकर खुश होता है। मेरी मेहनत का फल आज दिखाई दिया। लेकिन यह मोक्षमार्ग है। गुरु से मेरी आत्मा को अन्दर से उपदेश-प्रवचन की कुछ पंक्तियाँ मिली थीं, उन पंक्तियों से मेरी आत्मा में पुरुषार्थ जागृत हुआ। समय-समय पर मुझे मोक्षमार्ग की भी शिक्षा देते रहे। अज्ञानी आत्मा को बोध के साथ बोधि की प्राप्ति कराने में कारण बनते रहे। प्रत्येक विषय का समाधान मेरी बुद्धि के अनुसार देते रहे, जिससे आज में बहुत खुश हूँ। गुरु मेरे तन से दूर भले हों, लेकिन मन हमेशा गुरु के पास रहता है। रोज स्वप्न में गुरुदर्शन और कुछ चर्चाओं के साथ निद्रा पूर्ण होती है। मैं खुशनसीब हूँ, ऐसे विश्वविख्यात गुरु का मुझे सान्निध्य मिला। बड़े बाबा के भक्त देवों ने स्वप्न देकर उपकार किया। वह मेरे लिये निमित्त बने, जिससे यह आत्मा जैन सिद्धान्त तथा गुरुज्ञान के रहस्य को समझ सकी।

     

    एक बार आचार्य श्री हम सभी के बीच बैठे हुए थे। आगम-सिद्धान्त की बातें बताते हुये बोले- तुम सभी जैनसिद्धान्त को समझ रहे हो, सौभाग्य है। तुम सभी अपना ज्ञान सभी को देना, कोई भी अज्ञान अन्धकार में न रहे। गुरुमुख से इस प्रकार के वाक्य सुने, तो लगा कि जैसे तीर्थकर प्रकृति के बंध के लिये इस प्रकार की भावना करनी होती है कि सबका भला हो, वैसे ही आज गुरुदेव कह रहे हैं कि सभी को ज्ञान मिले। अज्ञानान्धकार में कोई न रहे। धन्य हैं गुरुदेव ! आपका कर्तृत्व व व्यक्तित्व, जो सदा दुनिया में  अजर-अमर रहे।

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