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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • चिन्तन से चिन्ता तक गुरु जागरूक रहेते हैं

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    थुबौन जी का प्रसंग है। पूज्य आचार्य श्री आदिनाथ मन्दिर में बैठे हुये थे। मैंने उनको नमोऽस्तु किया। वे बोले- आज मैंने सोचा है तुम तीसरी प्रतिमा ले ली। आज सर्वार्थसिद्धियोग है। मैं पहले सोच में पड़ गयी कि आचार्य श्री तीसरी प्रतिमा लेने की कह रहे हैं। फिर आत्मा में आनन्द हो आया। आचार्य श्री कहते हैं- कर ली, कायोत्सर्ग।

     

    मैंने कायोत्सर्ग कर लिया। फिर आचार्य श्री जी से पूछा- तीसरी प्रतिमा में क्या करना होगा ? तीन बार सामायिक। सामायिक की विधि रत्नकरण्डक श्रावकाचार में लिखी है। उस विधि को देखकर दण्डक सहित पढ़कर करना, और जो दूसरी प्रतिमा में करती थी वह भी करना। इसमें सामायिक समय से की जाती है। अभी अभ्यास रूप में तीनों टाइम करती होंगी। लेकिन अब यह तो सामायिक प्रतिमा ही कहलाती है। इस प्रकार मुझे बड़े स्नेह से सुन्दर तरीके से समझाया। मैंने लौटते ही तीसरी प्रतिमा का स्वरूप समझने के लिए रत्नकरण्डक श्रावकाचार उठाया और उसी विधि के अनुसार दण्डक-कायोत्सर्ग थोस्सामि पढ़कर सामायिक का प्रारम्भ और समापन करना सीखा।

     

    एक बार मेरे मन में प्रश्न उठा कि प्रारम्भ और अन्त में इस प्रकार की विधि करने से पन्द्रह मिनिट तो लग ही जाते हैं। तो क्या यह समय 48 मिनिट की सामायिक या एक घण्टे की सामायिक में सामिल होगा। आचार्य श्री से यह प्रश्न किया तो सुनकर मुस्कुराने लगे। बोले- हाँ, उसी में सामिल होगा। फिर कहने लगे सवा दो घण्टे यानि बड़ी सामायिक करने का नियम ले लो। अच्छा रहेगा। बड़ी सामायिक का अभ्यास करना अच्छा माना जाता है। धीरे-धीरे मुझे बड़ी सामायिक करने का नियम दे दिया। यह सत्य है कि जितनी जिदगी बनाने की चिन्ता शिष्य को नहीं होती, उतनी गुरु को होती है। शिष्य तो गुरु की प्राप्ति के बाद अपनी जिंदगी को सुलझी महसूस करने लगता है। उसको शायद इतना ही पता होता है कि जिंदगी का सिर्फ इतना ही विकास है। आगे उसे पता नहीं होता कि और भी जिंदगी में कुछ करना होता है। यह तो गुरु जानते हैं कि शिष्य समर्पित होता है, उसके विकास का क्रम क्या है ? उस शिष्य को किस प्रकार से आगे आत्मा के उत्थान योग्य बनाना है। यह है मेरे उत्थान की चिन्ता। जो अनकहे ही आचार्य श्री मुझे आगे-आगे मार्ग दिखाते रहे। चिन्ता वे करते रहे, मैंने भविष्य की चिन्ता ही नहीं की।

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