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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • महाराज जी मैं तो मैनेजमेण्ट का स्टूडेण्ट हूँ लेकिन इतने बड़े संघ का सञ्चालन करना, मेरी सोच से बाहर है। आप ही इसका समाधान करें।

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    शंका - परम पूज्यवर! नमोऽस्तु! महाराजश्री! आचार्यश्री के लिए कहा जाता है कि वह पहले सोचते नहीं हैं, लेकिन मेरी यह मान्यता है कि वह जरूर सोचते होंगे। यह बात जरूर है कि वह किसी को बताते नहीं हैं। महाराज जी मैं तो मैनेजमेण्ट का स्टूडेण्ट हूँ लेकिन इतने बड़े संघ का सञ्चालन करना, मेरी सोच से बाहर है। आप ही इसका समाधान करें।

    - श्री एन. एल. जैन, जयपुर

     

    समाधान - देखिए, बात सही है। आपकी सोच के बाहर क्या, सभी की सोच के बाहर है। क्योंकि इतने बड़े संघ का सञ्चालन बड़ा आचार्य ही कर सकता है। ये उनकी ही सोच की बात है। जहाँ तक सोच का सवाल है तो रविन्द्र जैन ने उनके बारे में एक गीत लिखा "कुछ भी नहीं है पूर्वनियोजित, निज इच्छा से करें विहार" विद्या के भण्डार, विद्या के भण्डार। सच में उनका कुछ भी पूर्वनियोजित नहीं होता। मैं अपने साथ की एक घटना आपको बताता हूँ। सन् 1993 में जबलपुर में गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुआ। नन्दीश्वर द्वीप की पञ्चकल्याणक प्रतिष्ठा थी। इस महोत्सव की सम्पन्नता के उपरान्त एक दिन गुरुदेव ने मुझे बुलाया और मुझसे कहा कि देखो! ऐसा है, देवरी में पञ्चकल्याणक गजरथ होना है। तुम जाकर सम्पन्न करवा दो। मैंने कहा- मुझे अकेले थोड़े ही जाना है। उन्होंने कहा- ठीक है, समतासागर जी हैं, और निश्चयसागर जी को भी घुमा लाओ और ऐसा करना सागर भी चले जाना। मैंने कहा- महाराज जी! सागर का पञ्चकल्याणक तो हम लोग नहीं करवाएंगे। अभी हम उसका भूमिपूजन कराकर आए हैं। वहाँ तो आपकी प्रतीक्षा है, आप चलो और आप न चल सको तो कम से कम तीन चार संघ और भेजो। बोले ठीक है, तुम लोग जाओ मैं वहाँ के लिए देखता हूँ किसको भेजना है। बोले- आज ही विहार करना है। दिन में डेढ़ बजे चर्चा हुई और तीन बजे विहार हो गया। विहार करके हम लोग सहजपुर और सहजपुर से सुबह शाहपुरा भिटौनी पहुँचे। हमने सोचा था ढाई बजे यहाँ से विहार करेंगे इसलिए डेढ़ बजे से हमने प्रवचन का कार्यक्रम रखा था। एक बजकर सात मिनट पर मैसेज आता है कि आचार्य गुरुवर का शाहपुरा के लिए विहार हो गया है। हमने कहा सारा प्रोग्राम एक तरफ, पहले गुरुवर की अगवानी की तैयारी करो। गुरुदेव 24 किलोमीटर चलकर मढ़िया जी से सीधे शाहपुरा भिटौनी आ गए। हम लोगों ने अगवानी की, गुरुदेव विराजे, हमने कहा गुरुदेव अचानक ? बोले- मैंने सोचा कि चलो पञ्चकल्याणक में मैं ही चला जाता हूँ। अब आप बता दीजिए, उनका कार्यक्रम कैसा नियोजित होता होगा ? वह देवरी भी गए, सागर भी गए। वह कब क्या कर लें, कोई भरोसा नहीं। मैंने आचार्यश्री से एक बार पूछा- गुरुदेव आपके मन में इस तरह की प्लानिंग रहती होगी। उन्होंने कहा- ज्यादा योजना बनाने में आकुलता है। जिस समय मन जो बोले कर डालो और वह उसी हिसाब से चलते हैं। यही उनकी सफलता का मूल मन्त्र है।

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