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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • संहनन नहीं भाव

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    आचार्य श्री जी मोक्षमार्ग में श्रद्धा का महत्त्व के बारे में बता रहे थे कि- मोक्षमार्ग में श्रद्धा ही महत्त्वपूर्ण है। श्रद्धा एक निजी वस्तु है, निजी वस्तु के साथ-साथ संसार में सबसे दुर्लभ वस्तु है। इसे जो भी प्राप्त कर लेता है वह शीघ्र ही संसार-समुद्र से पार हो जाता है। यह संसारी प्राणी धर्म के कार्य छोड़कर बाकी सभी कार्य करते समय विश्वास रखता है। वह सोचता है कि धर्म करने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता। यदि कुछ नहीं करेंगे तो क्या खाएँगे लेकिन वह एक बात भूल जाता है कि- पुण्य के प्रभाव से जीवन में सब कुछ अनायास ही प्राप्त हो जाता है और एक बात यह भी है कि- जो दिखायी नहीं देता उसी पर तो यह श्रद्धा रखी जाती है कि वह वस्तु संसार में दिशा-बोध है। प्रायः लोगों को यह विश्वास नहीं हो पाता कि- धर्म करने का फल कालांतर में सुख का कारण बनता है। तब किसी ने शंका व्यक्त करते हुए कहा कि- आज हम लोग धर्म तो करना चाहते हैं, लेकिन हम लोगों के पास संहनन नहीं है? तब आचार्य श्री जी ने शंका का समाधान करते हुए कहा कि- आप लोगों को मोक्षमार्ग में बढ़ने के लिए ही संहनन याद आता है, विषयों को भोगते समय याद नहीं आता धन एवं पंचेन्द्रिय विषयों को प्राप्त करने के लिए भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, मान-अपमान आदि सभी प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक दुःखों को सहन कर लेते हो, क्योंकि आप लोगों को उनमें रुचि है एवं उसी में सुख मानते हो। परिस्थितिवश व लौकिक सुख की प्राप्ति के लिए आप लोगों को कितना भी कष्ट हो पर वह कष्ट जैसा नहीं लगता। माँ के पेट में नौ माह तक उल्टा लटका रहा हाथ पैर संकुचित रहे थोड़ा-सा भी हाथ पैरों को हिला तक नहीं पाया उस कष्ट को सहता रहा। अब मोक्षमार्ग में तपस्या करने के लिए साधना कष्ट महसूस हो रहा है। आचार्य श्री जी ने लिखा भी है कि-

     

    नौ मास उल्टा

    लटका आज तप

    कष्ट कर क्यों ?

    अर्थात्- इस जीव ने परवश होकर कितने कष्ट सहे हैं, उन्हें याद करें तो तपस्या में कभी कष्ट महसूस न हो। मोक्षमार्ग पर बढ़ने के लिए संहनन की नहीं भावों की आवश्यकता होती है।


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