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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • वात्सल्य एक अनुभूति

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    एक गाँव से विहार करते हुए चले जा रहे थे। मेरा अंतराय होने की वजह से मैं धीरे-धीरे चल रहा था। तभी पीछे से आचार्य महाराज एवं कुछ महाराज जी आ गये, मुझे हाथ का सहारा देते हुए कहते हैं क्यों कैसी है गाड़ी। मैंने कहा - आपका हाथ लगते ही ठीक हो गयी बैटरी चार्ज हो गयी। आचार्य श्री ने पूँछा (हँसकर) फिर भी कैसी है, तो मैंने कहा कम्पनी तो वही है (आपकी) भले लूना है। तो आचार्य श्री जी ने कहा- वह भी मैंने सोच समझ कर दी है। तब मैंने हाथ जोड़कर कहा - चला भी तो रहा हूँ बिना पेट्रोल के और पंचर भी है (अंतराय भी था और पैर में छाले भी)। हम तो आपकी गाड़ी को देखकर चलते रहते हैं। क्योंकि आचार्य श्री आपकी गाड़ी तो गेटर पर चल रही है। आचार्य श्री ने कहा - हाँ, आप लोगों के तो ट्यूब टायर नये हैं। हमने कहा - इसके अलावा एक और आश्चर्य की बात है कि इस ट्यूब में आपकी हवा भरी हुई है..... सभी लोग हँस पड़े।

     

    यह संवाद उनके वात्सल्य का प्रतीक है इतने महान शुद्धोपयोगी गुरु भी अपने शिष्यों पर गौ वच्छ समान वात्सल्य रखते हैं। उनकी असीम कृपा ही है जो मुझे यहाँ तक ले आयी। इसे मात्र अनुभव किया जा सकता है। सीमित शब्दों के द्वारा अभिव्यक्ति करण नहीं किया जा सकता।

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