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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • आर्यिका पूर्णमति माताजी संस्मरण

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               *भावभीनी भावांजलि*
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     *?आर्यिका माँ पूर्णमति माताजी के मोक्षगामी श्री चरणों मे......?*

    *संतत्व से सिद्धत्व की यात्रा के अविरल पथिक,जो 50 वर्षों से निरन्तर सिद्धत्व की ओर गमन कर रहे है।जो आगम की पर्याय बन चुके है।जिनकी चर्या में मूलाचार और समयसार की झलक दिखती है।*
          जिन्होंने असंख्य जनमानस को मिथ्यात्व के घने अंधकार से निकालकर उज्जवल प्रकाश से भर दिया,ऐसे सौम्य स्वभावी करुणामूर्ति, निरीह, निस्पृह,निरावलम्बी,अनियत विहारी,वर्तमान के वर्धमान, *जिनके अंदर आचार्य कुंदकुंद स्वामी,आचार्य समंतभद्र स्वामी,अकलंक देव आदि अनेक महान आचार्यों की छवि दिखती है,ऐसे परमोपकारी जीवन दाता, श्वासों के स्वामी,हृदय देवता, अद्वितीय संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज इस धरती पर युगों-युगों तक सदा जयवंत रहे।।*
    आपके तप,त्याग,संयम,साधना के कारण जैन धर्म की विजय पताका दिग्-दिगंत सारे विश्व में श्रमण संस्कृति की यशगाथा गा रही है।
    *ऐसे महान गुरु के कर-कमलों से भव्य जैनेश्वरी दीक्षा धारण करना बहुत ही दुर्लभ है।* अनंत जन्मों के पुण्य का संचय करना होता है तब कहीं जाकर ऐसे सद्गुरु के कर कमलों से जिन दीक्षा प्राप्त होती है।
          आचार्य श्री जी ने अनेक रत्नों की खोज कर उनमें अपने समान ही ज्ञान-चारित्र की स्थापना की। *उन्हीं रत्नों में दैदीप्यमान रत्न आर्यिका माँ 105 पूर्णमति माताजी है,जिन्होंने अपने गुरु के गुणों को,उनके संस्कारों को अपने अंतरंग में पूर्ण रूप से समाहित किया।*
    आपका गुरु के प्रति समर्पण समंदर ही से भी अगाध,अटूट है। आत्मा के प्रत्येक आत्मप्रदेश पर गुरु विराजमान हैं।
           आप उच्च कोटि की लेखिका,कवयित्री,गायिका आदि अनेक अनोखे व्यक्तित्व के धनी हैं। जो भी आपके पास दर्शन के लिए आता वह आपका ही हो जाता है।
           *29 वर्षों से स्वयं मोक्ष मार्ग पर चलकर आपने अनेकों भव्य जीवों को मुक्ति के मार्ग पर लगा दिया।आपकी अनुकम्पा,करुणा की बरसात प्रत्येक जीव पर होती है,चाहे वह कोई भी क्यों न हो।*
              उन्ही अनुकम्पा और करुणा से भींगा हुआ यह मेरा जीवन है।हमें आज भी याद है जब व्याबर में श्री समयसार जी शिविर के समाप्त होने के बाद पहली बार आपके दर्शनों के लिये *25 अक्टूबर 2016, गुना नगरी* में जाना हुआ।फिर क्या था...एक बार जाने के बाद यह जीवन आपका ही हो गया।मन बार-बार आपके चरणों के समीप जाने की भावना करता रहता।
                *आपके द्वारा दिये हुए संस्कार, नियम के द्वारा यह जीवन दिन-प्रतिदिन विकासोन्मुखी बनता गया।अपने इस छोटे से भक्त पर करुणा की असीम वर्षा कर इस जीवन को  मोक्षमार्ग पर लगाया।आपके उपकारों के बारे में लिखना इस लेखनी के लिये संभव नहीं है।उन उपकारों का मात्र स्मरण किया जा सकता है,व्यक्त नहीं किया जा सकता।*
                 आप इतने इतनी प्रतिकूलता में भी अपनी चर्या का निर्दोष पालन करके हमारे लिये प्रेरणा देती रहती हो।आपके समर्पण के कारण हमारे जीवन मे भी समर्पण की गहराई आती गई।
                कभी लगता नहीं कि-आपसे जुड़े कुछ वर्ष ही हुए हो,ऐसा लगता है जैसे *जन्मों-जन्मों का साथ हो।*
                 भले आप क्षेत्र की अपेक्षा दूर रहे,पर भावों से आप हमेशा निकट ही रहती हो।ऐसा लगता ही नहीं कि-आप हमसे दूर हो।जब आपकी याद आती तो आपकी एक बात हमें संभाल लेती है,आपने कहा था- *"मैं दुनिया मे कही भी चली जाऊं, हमेशा तेरे पास रहूँगी।"*
            आप हमेशा हमारे पास रहती हो,एक मां बनकर,एक मार्गदर्शक बनकर।।
            आपका नाम सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।आपके द्वारा दिया हुआ आशीर्वाद- *?"अध्यात्म वृद्धिरस्तु"?* हमारे जीवन में फलीभूत हो रहा है। आपने हमें हमेशा विनम्र बनना और मान-सम्मान से दूर रहना सिखाया।
            जब भी आपके चरणों में आते हैं तो हमारे पूछने से पहले ही आप पूछ लेती हो- *स्वास्थ्य कैसा है तेरा* इससे बड़ी अनुकम्पा,स्नेह और कुछ नहीं हो सकता। *आपके उपकारों को चुका पाए इतनी हमारी सामर्थ्य नहीं है।*
            आपको मोक्ष मार्ग पर चलते हुए 29 वर्ष हो गए हैं।आप इसी प्रकार गुरु आज्ञा का,निर्दोष चारित्र का पालन करते हुए मोक्ष मार्ग पर निरंतर गतिमान रहे। *आपके द्वारा धारण की हुई यह आर्यिका दीक्षा आगे चलकर आगामी भवों  में दीक्षा कल्याणक में परिवर्तित हो जाए।* आपके नाम *पूर्णमति* के समान ही आप की यह मति पूर्णज्ञान को धारण कर पूर्णता(केवलज्ञान)को प्राप्त करें।
            आप आगामी भवों में मुनि पद अंगीकार कर *केवलज्ञान प्राप्त कर तीर्थंकर की सत्ता धारण* करें,आपका विहार भव्यों जीवों की कल्याणार्थ हो और मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करें।
             *आप शीघ्रताशीघ्र मुक्ति वधू का वरण कर मोक्षमहल को प्राप्त करें।* और अनन्तानन्त काल अपनी आत्मा में लीन रहकर निज चैतन्य सुख का रसपान करें,यही शुभ भावना आपके चरणों मे करता हूँ।
      *तुमने दिया माँ मुझको सबकुछ,*
        कैसे भूलूँ,कैसे भूलूँ,कैसे भूलूँ
                   *उपकारों को।*
     कभी न भूलूँ उपकारों को।??????

     *✍? नरेन्द्र जैन जबेरा*
     (आपके चरणों का छोटा सा भक्त,आपके स्नेह से परिपूरित)

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