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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • ५८.सिद्ध स्तुति कर्ता

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    सिद्धों को मानना, उनकी कामना में मन के उपयोग को स्थिर कर कर्म के क्षय की विधि में समा जाना ही उस निराकार, अशरीरी परमात्मा की आत्मा को ध्यान का विषय बनाना अपने हाथ की हथेलियों को मिलाकर हाथ की रेखाओं में सिद्धशिला की मान्यता को स्थापित करना और अंगुलियों को सिद्धों की कायोत्सर्ग मुद्रा की परिकल्पना से अनंत सिद्धों का दर्शन बचपन से अभी तक करते चले आ रहे हैं। संघ में भी मुनियों के बीच में बैठकर आँख बंद करके ऐसा ही अनुभव करते हैं। मैं अनंत सिद्धों के बीच में बैठा हूँ। आत्मा का स्वरूप सिद्धों जैसा ही है। आत्मा अनंत निराकारमय शरीर रहितोऽहं की भावना से जब भी ध्यान सामायिक करते हैं तब यही भाव रहता है-मैं तो आत्मा हूँ शरीर नहीं। आत्मा शरीर से भिन्न है। सिद्धों के गुणों की स्तुति चलती ही रहती है। वे क्षायिक सम्यक्त्व, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतवीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अगुरुलघुत्व, अव्याबाधत्वरूप सुख ये आठ गुण सिद्धों की आत्मा में समाहित होते हैं। इन्हीं गुणों की प्राप्ति के लिये ही सारी चर्या और साधना निरंतर चल रही है। जो तप से सिद्ध हुए हैं उनके तप का ध्यान करते हुए तप सिद्धों की आराधना करना। जो नय से सिद्ध हुए हैं उनके नय का चिंतन करना यह नय सिद्धों की आराधना है। जो संयम से सिद्ध हुए हैं उनके विशुद्ध संयम भाव का चिंतन करना, इस प्रकार संयम सिद्धों की आराधना करते हुए जो चारित्र से सिद्ध हुए हैं, उनके विशुद्ध चारित्र को अपने ध्यान का विषय बनाना, यह चारित्र सिद्धों की आराधना है। जो ज्ञान से सिद्ध हुए हैं, उनके ज्ञान को नमन करना यह ज्ञान सिद्धों की स्तुति है। जो दर्शन से सिद्ध हुए हैं, उनके दर्शन का स्मरण करना इस प्रकार दर्शन सिद्धों की आराधना हुई। इस प्रकार ५० वर्षों से गुरुदेव भूतकाल, भविष्यकाल एवं वर्तमानकाल तीनों कालों के सिद्धों की आराधना करते हुए सिद्धों की श्रेणी में खड़े हुए नजर आ रहे हैं।


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