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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - ५७ ब्रः विद्याधर जी ने बताया सवारी त्याग का मतलब

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    २७-0२-२०१६

    भूगड़ा (बासवाड़ा राजः)

    तपकल्याणक महोत्सव

     

    चारित्र सौरभ के प्रवाही गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज! मेरे कोटि-कोटि नमन स्वीकारें...

    हे गुरुवर! आज मैं आपको वह दिन याद करा रहा हूँ जब भोले-भाले ब्रह्मचारी विद्याधर जी की बात सुनकर श्रावक समूह के साथ आपश्री अत्यधिक मुस्कुरा उठे थे। इस सम्बन्ध में मुनि निर्वेगसागर जी महाराज ने सन् १९९७ नेमावर चातुर्मास की स्वाध्याय कक्षा में आचार्यश्री के मुख से सुना संस्मरण लिख भेजा वह मैं आप तक प्रेषित कर रहा हूँ।

     

    ब्रः विद्याधर जी ने बताया सवारी त्याग का मतलब

    "जब विद्याधर किशनगढ़ में गुरु महाराज ज्ञानसागर जी के पास आया और सवारी का त्याग कर दिया। एक दिन एक श्रावक ने विद्याधर से कहा-त्यागी जी हमारे यहाँ भोजन को चलो, तो विद्याधर उनके साथ ताँगे पर बैठकर चला गया। ४-५ कि.मी. दूर घर था। वापस आया तो गुरु महाराज के पास कुछ श्रावक बैठे हुए थे, उन्होंने देखा कि विद्याधर जी किसके साथ आए और तब उन श्रावकों ने गुरु महाराज ज्ञानसागर जी से पूछा- यह कैसा सवारी का त्याग ये तो ताँगे पर बैठकर आहार लेने गए और वापस आए। तो बीच में विद्याधर बोल पड़े क्या ताँगा भी सवारी में आता है ? यह तो मुझे ज्ञात नहीं था। मेरा भाव सवारी त्याग करने का यह था कि आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। विद्याधर की इस सहजता, सरलता को देखकर ज्ञानसागर जी महाराज और श्रावक लोग मुस्कुराने लगे।" इस तरह विद्याधर की सहजता, सरलता और भोलापन आपको भा गया था। उस सहज, सरल भावों को प्रणाम करता हुआ...

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

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