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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - ४३ विद्याधर का ज्ञानविनय

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    पत्र क्रमांक-४३

    ०९-०२-२०१६ वेदीप्रतिष्ठा महोत्सव

    भादसोड़ा (चित्तौड़-राजः)

     

    आत्माभा में लीन गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में सीमातीत वंदन...

    हे गुरुवर! आपने ज्ञानपिपासु ब्रह्मचारी विद्याधर में जो ज्ञान ज्योति प्रज्ज्वलित की। जिसे आज तक मेरे गुरुदेव आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज दिन-रात जलाये रखते हैं। किसी भी उपसर्ग-परिषह संकटों के झंझावातों में बुझने नहीं देते हैं। यह संस्कार बचपन से ही विद्याधर को प्राप्त हुए थे। इस सम्बन्ध में विद्याधर की गृहस्थावस्था की बहिनें ब्रह्मचारिणी सुश्री शान्ता, सुश्री सुवर्णा जी ने जब वो अशोकनगर (म.प्र.) प्रवास में थीं तब संस्मरण लिखकर भेजा था। वह आपको बता रहा हूँ

     

    विद्याधर का ज्ञानविनय

    "ज्योति जल-जलकर उजाला देती है, जगत् में उजाला फैलाती है, खुद उजाले में रहकर उजाले में रहने की शिक्षा देती हैं एवं अखण्ड जलकर अखण्डता का उपदेश देती रहती है। ऐसी अखण्ड ज्योति घर पर जिनवाणी शास्त्रों के समक्ष पिताजी (मल्लप्पाजी) ने १८ वर्ष तक प्रज्वलित कर रखी थी। तब विद्याधर उसे बुझने नहीं देते थे। सदा उसे सम्हालते रहते थे। रात में भी उठकर देखते थे और बाती बगैरह ठीक करके घी डालते थे।" इस प्रकार लौकिक सगुन से जीवन का मंगल बनाये रखने के लिए पारिवारिक रीति-रिवाजों का पालन किया करते थे। ज्ञानज्योति प्रज्ज्वलित करने हेतु नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु...

     

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